गवाहों के नाम पर खेल
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किसकी हो रही है सुनवाई
सिंडीकेट का बड़ा खुलासा
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न्याय के गले में फंसा ताला

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अगर कोई आरक्षित वर्ग का उम्मीदवार बिना किसी छूट के जनरल कट-ऑफ से ज्यादा नंबर लाता है, तो उसे जनरल कैटेगरी की सीट पर ही माना जाएगा।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या साफ किया?
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ओपन या जनरल कैटेगरी सभी के लिए खुली होती है, चाहे वह किसी भी जाति या वर्ग का हो। अगर SC, OBC, MBC या EWS का उम्मीदवार बिना किसी रियायत के जनरल कैटेगरी के उम्मीदवारों से बेहतर प्रदर्शन करता है तो उसे जनरल लिस्ट में शामिल किया जाएगा, न कि उसकी आरक्षित कैटेगरी में बांधा जाएगा।
कोर्ट ने यह भी कहा कि कई बार भर्ती में देखा गया है कि आरक्षित वर्ग का कट-ऑफ जनरल से ज्यादा चला जाता है। ऐसी स्थिति में अगर आरक्षित वर्ग का कोई उम्मीदवार जनरल कट-ऑफ पार कर लेता है, तो उसे बाहर करना गलत है।
‘जनरल कैटेगरी किसी की निजी नहीं’
कोर्ट ने दोहराया कि जनरल, ओपन या अनरिजर्व्ड शब्द का मतलब है- सभी के लिए खुला। यह किसी खास जाति, वर्ग या लिंग के लिए आरक्षित नहीं होता। सुप्रीम कोर्ट ने अपने पुराने फैसलोंइंद्रा साहनी केस और सौरव यादव केस का हवाला देते हुए कहा, “ओपन कैटेगरी में आने की एक ही शर्त है- मेरिट। यह नहीं देखा जाएगा कि उम्मीदवार किस वर्ग से है।”
‘डबल फायदा’ वाला तर्क खारिज
कोर्ट ने यह दलील भी खारिज कर दी कि ऐसे उम्मीदवारों को शामिल करने से उन्हें ‘डबल फायदा’ मिलेगा। साफ कहा गया कि अगर कोई रियायत नहीं ली गई है, तो यह कोई अतिरिक्त लाभ नहीं है। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि फॉर्म में अपनी जाति लिख देना अपने आप में आरक्षित सीट पाने का अधिकार नहीं देता, बल्कि सिर्फ यह बताता है कि उम्मीदवार आरक्षित सूची में भी दावेदार हो सकता है।
क्या था मामला?
यह मामला राजस्थान हाईकोर्ट की भर्ती से जुड़ा था। अगस्त 2022 में हाईकोर्ट ने 2756 पदों (जूनियर ज्यूडिशियल असिस्टेंट और क्लर्क ग्रेड-II) के लिए भर्ती निकाली थी। लिखित परीक्षा के बाद मई 2023 में जब नतीजे आए तो SC, OBC, MBC और EWS का कट-ऑफ जनरल से ज्यादा निकल गया। कुछ आरक्षित वर्ग के उम्मीदवारों ने जनरल कट-ऑफ पार किया, लेकिन अपनी कैटेगरी का कट-ऑफ न होने के कारण उन्हें अगले राउंड से बाहर कर दिया गया।
हाईकोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट का फैसला
इन उम्मीदवारों ने राजस्थान हाईकोर्ट में चुनौती दी। हाईकोर्ट ने कहा कि पहले जनरल लिस्ट सिर्फ मेरिट के आधार पर बननी चाहिए और जो उसमें आ जाएं उन्हें अलग से आरक्षित लिस्ट में नहीं रखा जा सकता। अब दिसंबर 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने भी इसी फैसले को सही ठहराते हुए राजस्थान हाईकोर्ट प्रशासन की अपील खारिज कर दी।
इस फैसले का मतलब क्या है?
जनरल कैटेगरी किसी एक वर्ग की नहीं, बल्कि मेरिट की कैटेगरी है
आरक्षित वर्ग का उम्मीदवार अगर बिना छूट जनरल कट-ऑफ पार करता है, तो वह जनरल सीट पर ही जाएगा
इससे जनरल उम्मीदवारों के अधिकार नहीं छिने, बल्कि मेरिट का नियम मजबूत हुआ है

जस्टिस जे.के. माहेश्वरी और विजय बिश्नोई की पीठ ने भारतीय वन सेवा (आईएफएस) के अनारक्षित कैडर में एक अनुसूचित जाति के उम्मीदवार की नियुक्ति की मांग पर विचार करने से इनकार कर दिया, क्योंकि उक्त आवेदक ने आरंभिक परीक्षा में आरक्षण का लाभ उठाया था। पीठ ने फैसले में कहा कि एक बार जब किसी आरक्षित श्रेणी के उम्मीदवार ने आरक्षण का लाभ ले लिया है तो उसे सामान्य श्रेणी के रिक्तियों/सीटों पर नियुक्त नहीं किया जा सकता। इसके साथ सुप्रीम कोर्ट ने कर्नाटक हाईकोर्ट का फैसला रद्द कर दिया।
हाईकोर्ट ने आरक्षित श्रेणी के उम्मीदवार को सिर्फ इसलिए सामान्य श्रेणी में नियुक्त करने का आदेश दिया था क्योंकि उसने सामान्य श्रेणी के उम्मीदवार से ऊंची फाइनल रैंक हासिल की थी। अब सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि चूंकि आरक्षित श्रेणी के उम्मीदवार ने आरंभिक परीक्षा में आरक्षण का लाभ उठाया है, इसलिए, उन्हें सामान्य श्रेणी की सीटों पर नियुक्ति नहीं दी जा सकती।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि मुख्य परीक्षा में शामिल होने के लिए आरक्षित श्रेणी का लाभ उठाने के बाद, उम्मीदवार प्रतिवादी नंबर-1 (जी किरण) बाद में सिर्फ इसलिए सामान्य सीट पर चुने जाने का दावा नहीं कर सकता कि उसने बाद के चरणों में 34 सामान्य श्रेणी के आवेदक से बेहतर प्रदर्शन किया।
पीठ ने कहा कि अगर कोई उम्मीदवार परीक्षा के किसी भी स्टेज पर छूट का सहारा लेता है, तो वह परीक्षा नियम, 2013 के नियम 14(ii) के प्रोविजो के दायरे में नहीं आएगा और उस स्थिति में, कैडर आवंटन के लिए लागू पॉलिसी के मकसद से, वह जनरल स्टैंडर्ड पर चुने गए उम्मीदवारों की लिस्ट में नहीं आएगा, जो अपने होम स्टेट कैडर की जनरल इनसाइडर वैकेंसी पर इनसाइडर उम्मीदवार के तौर पर दावा कर रहा हो।
यह है मामला दरअसल, यूपीएससी द्वारा 2013 में भारतीय वन सेवा परीक्षा से मामले में विवाद शुरू हुआ। यह परीक्षाा दो चरणों में हुई थी, प्रारंभिक परीक्षा, मुख्य और साक्षात्कार। प्रारंभिक परीक्षा में सामान्य श्रेणी का कट-ऑफ 267 अंक था, जबकि अनुसूचित जाति (एससी) उम्मीदवारों के लिए कट-ऑफ 233 था। इस परीक्षा में आरक्षित श्रेणी के आवेदक जी. किरण ने रियायती कट-ऑफ का फायदा उठाकर 247.18 अंक के साथ क्वालिफाई किया, जबकि सामान्य श्रेणी के आवेदक एंटनी एस. मारियप्पा ने जनरल कट-ऑफ पर 270.68 अंक के के साथ क्वालिफाई किया।
हालांकि, अंतिम मेरिट लिस्ट में आरक्षित श्रेणी के उम्मीदवार जी. किरण की रैंक 19 थी और एंटनी की रैंक 37 थी। लेकिन, कैडर आवंटन के दौरान, कर्नाटक में केवल एक जनरल इनसाइडर वैकेंसी थी और कोई एससी इनसाइडर वैकेंसी नहीं थी। केंद्र सरकार ने जनरल इनसाइडर पोस्ट एंटनी को दी और किरण को तमिलनाडु कैडर में भेजा।

सुप्रीम कोर्ट का फैसला 5 जनवरी 2026
क्यों नहीं मिली जमानत
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि जमानत देने के मामले में अनुच्छेद 21 जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार का हवाला केवल तभी दिया जा सकता है, जब इसका आधार ठोस साक्ष्य और कानूनी प्रक्रियाओं से जुड़ा हो। यदि आरोप गंभीर हैं और साक्ष्य मजबूत हैं तो जीवन के अधिकार के आधार पर जमानत नहीं दी जा सकती।
अतीत के फैसले का संदर्भ
उमर खालिद शरजील इमाम और अन्य आरोपियों के खिलाफ यह मामला काफी लंबा खींच चुका है। इन आरोपियों को 2020 के दिल्ली दंगों की साजिश रचने का आरोप है और वे पांच साल से अधिक समय से जेल में हैं। 10 दिसंबर 2025 को कोर्ट ने इस मामले में जमानत पर अपना फैसला सुरक्षित रखा था। इससे पहले दिल्ली हाईकोर्ट और ट्रायल कोर्ट ने भी इन आरोपियों को जमानत देने से मना कर दिया था। 2 सितंबर 2025 को दिल्ली हाईकोर्ट ने उनकी जमानत याचिका खारिज कर दी थी जिसके बाद इन आरोपियों ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
अन्य आरोपियों की जमानत
सुप्रीम कोर्ट ने बाकी 5 आरोपियों को जमानत देने का फैसला सुनाया। अदालत ने यह स्पष्ट किया कि इन आरोपियों की जमानत से ट्रायल प्रक्रिया पर कोई असर नहीं पड़ेगा और मामले की सुनवाई जारी रहेगी।
फैसले का महत्व
यह सुप्रीम कोर्ट का फैसला यह दर्शाता है कि न्यायपालिका गंभीर साजिशों और सामूहिक हिंसा के मामलों में जमानत देने में बेहद सावधान रहती है, विशेष रूप से जब आरोप UAPA जैसे कड़े कानूनों के तहत होते हैं। कोर्ट ने यह भी कहा कि संवैधानिक अधिकारों को हमेशा कानूनी ढांचे और साक्ष्यों के संदर्भ में समझा जाएगा न कि केवल व्यक्तिगत कठिनाई या जेल में लंबे समय तक रहने के आधार पर।
आगे क्या होगा
उमर खालिद और शरजील इमाम अब ट्रायल कोर्ट में फिर से जमानत याचिका दायर कर सकते हैं। ट्रायल की प्रक्रिया अभी भी जारी रहेगी और अदालत भविष्य में साक्ष्यों और मामलों की गंभीरता के आधार पर निर्णय लेगी। यह मामला अब भी न्यायिक प्रक्रिया के अधीन है और अदालत के फैसले ही इन आरोपियों के भविष्य का निर्धारण करेंगे।

सीजेआई सूर्य कांत ने कहा, ‘मेरी कोशिश है कि शीर्ष न्यायालय और उच्च न्यायालयों को जनता की अदालत बनाया जा सके, ताकि लीगल इमरजेंसी के समय वह किसी भी समय अदालत का दरवाजा खटखटा सके।’ उन्होंने कहा, ‘संवैधानिक अदालतें अस्पताल के इमरजेंसी वार्ड की तरह काम करेंगी। लीगल इमरजेंसी के समय कोई भी नागरिक मामले को सुलझाने और व्यक्ति के अधिकारों और आजादी की सुरक्षा के लिए आधी रात को भी सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटा सकता है।’
SOP में क्या है
सीजेआई समेत सुप्रीम कोर्ट के अन्य जजों ने सोमवार को एक परिपत्र जारी किया है। इसमें मौखिक दलीलें प्रस्तुत करने की समयसीमा का पालन करने के लिए एसओपी तय की गई है। तत्काल प्रभाव से लागू इस एसओपी में कहा गया है, ‘वरिष्ठ अधिवक्ता, दलील रखने वाले वकील और रिकॉर्ड पर मौजूद अधिवक्ता, नोटिस के बाद और नियमित सुनवाई वाले सभी मामलों में मौखिक बहस करने की समय-सीमा सुनवाई शुरू होने से कम से कम एक दिन पहले प्रस्तुत करेंगे। यह समय-सीमा न्यायालय को ‘एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड’ (एओआर) को पहले से उपलब्ध कराए गए उपस्थिति पर्ची जमा करने के ऑनलाइन पोर्टल के माध्यम से प्रस्तुत की जाएगी।’
इसमें कहा गया है कि वरिष्ठ अधिवक्ताओं सहित बहस करने वाले वकील, अपने एओआर या पीठ द्वारा नामित नोडल वकील (यदि कोई हो) के माध्यम से, सुनवाई की तारीख से कम से कम तीन दिन पहले दूसरे पक्ष को एक प्रति देने के बाद संक्षिप्त नोट या लिखित प्रस्तुति दाखिल करेंगे। यह पांच पृष्ठ से अधिक का नहीं होगा।

दिल्ली हाईकोर्ट का आदेश
CBI की चुनौती
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी
विरोध और जन प्रतिक्रिया

इस परिभाषा के अनुसार स्थानीय भू-भाग से 100 मीटर या उससे अधिक ऊंचाई वाली भू-आकृतियों को पहाड़ी माना जाएगा। इसके साथ ही ऐसी पहाड़ियों को घेरने वाली सबसे निचली सीमा रेखा के भीतर खनन पूरी तरह निषिद्ध रहेगा भले ही उस सीमा के भीतर मौजूद भू-आकृतियों की ऊंचाई या ढलान कुछ भी हो। सरकार ने यह भी साफ किया कि 100 मीटर से नीचे की सभी भू-आकृतियों को खनन के लिए खुला मानना पूरी तरह गलत निष्कर्ष है। यह प्रतिबंध केवल पहाड़ी के शिखर तक सीमित नहीं है बल्कि पूरी पहाड़ी प्रणाली और उसके भीतर आने वाले सभी क्षेत्रों पर लागू होता है।
इसके अलावा परिभाषा को और पारदर्शी बनाने के लिए अतिरिक्त सुरक्षा उपाय भी जोड़े गए हैं। इनमें 500 मीटर की दूरी पर स्थित पहाड़ियों को एक ही पर्वत श्रृंखला मानना खनन से पहले भारतीय सर्वेक्षण विभाग के मानचित्रों पर अनिवार्य मैपिंग और खनन निषिद्ध मुख्य व संरक्षित क्षेत्रों की स्पष्ट पहचान शामिल है। सरकार ने दोहराया कि अरावली की परिभाषा में बदलाव को लेकर फैलाया जा रहा भ्रम तथ्यात्मक रूप से गलत है और सुप्रीम कोर्ट द्वारा 20 नवंबर 2025 को इन सिफारिशों को स्वीकार किए जाने के बाद अरावली पर्वतमाला की कानूनी सुरक्षा पहले से कहीं अधिक मजबूत हुई है।

कुछ न्यायिक अधिकारी सेवानिवृत्ति से पहले ऐसे आदेश पारित करने लगते हैं मानो वे क्रिकेट मैच के आखिरी ओवर में छक्के मार रहे हों। यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण और चिंता का विषय है।
गलत आदेश बनाम बेईमानी – फर्क जरूरी
अगर कोई आदेश स्पष्ट रूप से बेईमानी, पक्षपात या बाहरी हितों से प्रेरित हो, तो क्या उसे सिर्फ एक गलती माना जा सकता है? यही सवाल इस पूरे मामले का केंद्र रहा।
जज का पक्ष: बेदाग रिकॉर्ड का दावा
सुप्रीम कोर्ट का संतुलित रुख
न्यायपालिका की साख पर बड़ा संदेश

अपराधियों की रणनीति पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी
NIA जैसी एजेंसी को अधिकार देने का सुझाव
विशेष अदालत बनाने की वकालत
कानूनी खामियों से अपराधियों को फायदा