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  • रिश्ता टूटने के बाद सहमति से बने संबंध रेप नहीं, सुप्रीम कोर्ट ने शादी के झूठे वादे पर स्पष्ट किया कानून

    रिश्ता टूटने के बाद सहमति से बने संबंध रेप नहीं, सुप्रीम कोर्ट ने शादी के झूठे वादे पर स्पष्ट किया कानून

    नई दिल्ली ।लिव-इन रिलेशनशिप और शादी के वादे के आधार पर बने शारीरिक संबंधों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। अदालत ने स्पष्ट किया कि दो बालिग व्यक्तियों के बीच आपसी सहमति से बने शारीरिक संबंध केवल इस वजह से दुष्कर्म की श्रेणी में नहीं आ सकते कि बाद में उनका रिश्ता टूट गया। हालांकि, यदि शुरुआत से ही शादी करने का इरादा नहीं था और झूठा वादा करके शारीरिक संबंध बनाए गए, तो कानूनी स्थिति अलग होगी। ऐसे मामलों में आरोपी की शुरुआती मंशा और सहमति हासिल करने की परिस्थितियां महत्वपूर्ण होंगी।

    यह टिप्पणी जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने शादी का झूठा वादा करके दुष्कर्म करने के आरोप से जुड़े एक मामले की सुनवाई के दौरान की। अदालत ने संबंधित मामले में आरोपी को आरोपों से मुक्त कर दिया। पीठ ने सुनवाई के दौरान सहमति से बने रिश्तों और उनके बाद समाप्त होने की परिस्थितियों के बीच कानूनी अंतर को स्पष्ट किया।

    अदालत के अनुसार, किसी रिश्ते का समाप्त हो जाना अपने आप में इस बात का प्रमाण नहीं है कि शुरुआत से ही शादी का वादा धोखे से किया गया था। दो वयस्कों के बीच आपसी सहमति से बना संबंध यदि बाद में किसी कारण से समाप्त हो जाता है, तो उसे केवल इसी आधार पर आपराधिक मामला नहीं माना जा सकता। इसके लिए यह देखना आवश्यक है कि संबंध बनाते समय दोनों पक्षों की सहमति किन परिस्थितियों में बनी थी।

    पीठ ने यह भी कहा कि हाल के वर्षों में ऐसे मामले सामने आए हैं, जिनमें आपसी सहमति से बने रिश्ते के खत्म होने के बाद आपराधिक कानून का सहारा लिया जाता है। अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि संबंध टूटने और शुरुआत से धोखाधड़ी करने के इरादे के बीच अंतर समझना जरूरी है। किसी व्यक्ति का बाद में शादी करने से इनकार करना और शुरुआत से ही शादी का झूठा आश्वासन देना, दोनों परिस्थितियां कानूनी रूप से एक जैसी नहीं हैं।

    शादी के झूठे वादे से जुड़े मामलों में आरोपी की मंशा का आकलन संबंध की शुरुआत के समय से किया जाना चाहिए। यदि यह साबित होता है कि व्यक्ति ने शुरू से ही शादी करने का इरादा नहीं रखा था और केवल शारीरिक संबंध बनाने के उद्देश्य से झूठा वादा किया था, तो इसे सहमति से जुड़ा सामान्य मामला नहीं माना जा सकता। ऐसी स्थिति में कानून के तहत कार्रवाई की जा सकती है।

    सुनवाई के दौरान पीठ ने व्यक्तिगत स्वतंत्रता के पहलू पर भी ध्यान दिलाया। अदालत ने सवाल उठाया कि क्या किसी व्यक्ति को अपनी इच्छा से रिश्ता समाप्त करने का अधिकार नहीं होना चाहिए। यदि संबंध खत्म करने के डर से किसी व्यक्ति को उसे जारी रखने के लिए मजबूर महसूस करना पड़े, तो इससे उसकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता प्रभावित होगी। अदालत के मुताबिक, किसी रिश्ते को जारी रखना या समाप्त करना व्यक्तिगत निर्णय का विषय है। केवल अलग होने के फैसले को धोखाधड़ी या दुष्कर्म का आधार नहीं बनाया जा सकता।

    हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने यौन अपराधों की गंभीरता को भी रेखांकित किया। अदालत ने माना कि यौन हिंसा, दबाव या धोखे के माध्यम से सहमति प्राप्त करने के मामलों में कानून के अनुसार कार्रवाई जरूरी है। सामाजिक बदनामी और अन्य कारणों से कई महिलाएं शिकायत दर्ज कराने से पीछे रह जाती हैं। इसलिए ऐसी शिकायतों को संवेदनशीलता और गंभीरता से देखना आवश्यक है।

    अदालत की इस टिप्पणी से यह स्पष्ट होता है कि सहमति से बने रिश्ते का टूटना और शुरुआत से शादी का झूठा वादा करके संबंध बनाना अलग-अलग कानूनी परिस्थितियां हैं। किसी मामले में अपराध तय करने के लिए केवल रिश्ते के अंत को आधार नहीं बनाया जा सकता, बल्कि शुरुआत से आरोपी की मंशा, सहमति की प्रकृति और उपलब्ध तथ्यों की जांच जरूरी है।

  • राहुल गांधी की संपत्ति मामले में CJI सूर्यकांत की वकील को फटकार, पूछा- क्या मीडिया का ध्यान खींचने के लिए दायर की याचिका?

    राहुल गांधी की संपत्ति मामले में CJI सूर्यकांत की वकील को फटकार, पूछा- क्या मीडिया का ध्यान खींचने के लिए दायर की याचिका?

    नई दिल्ली ।कांग्रेस नेता राहुल गांधी से जुड़े कथित आय से अधिक संपत्ति के मामले में मंगलवार, 27 अक्टूबर 2026 को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने याचिकाकर्ता पक्ष के वकील को फटकार लगाई। अदालत ने मामले को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध कराने की मांग पर सवाल उठाते हुए पूछा कि क्या याचिका दाखिल करने का उद्देश्य केवल मीडिया का ध्यान आकर्षित करना है। मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि इस मुद्दे को उठाने के पीछे कोई स्पष्ट आधार नजर नहीं आता और दलील में पर्याप्त दम भी नहीं है।

    सुनवाई के दौरान वकील ने राहुल गांधी के एक हालिया बयान का हवाला दिया। उनका दावा था कि राहुल गांधी ने एक कार्यक्रम में कहा था कि वह प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) और केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) के 200 अधिकारियों के संपर्क में हैं। इसी बयान के आधार पर वकील ने सुप्रीम कोर्ट से मामले को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने की मांग की।

    इस दलील पर मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने सवाल किया कि क्या इस मुद्दे पर किसी न्यूज चैनल से सलाह ली गई है। उन्होंने टिप्पणी की कि ऐसा प्रतीत होता है कि मामले को उठाने का उद्देश्य मीडिया का ध्यान आकर्षित करना है। अदालत की इस टिप्पणी से स्पष्ट हुआ कि वह मामले की सुनवाई की मांग के पीछे प्रस्तुत आधार की पर्याप्तता को लेकर संतुष्ट नहीं थी।

    यह विवाद राहुल गांधी की संपत्ति की जांच से संबंधित उस मामले से जुड़ा है, जिसमें इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ पीठ ने मई 2026 में सीबीआई और ईडी को जांच करने का आदेश दिया था। इसके बाद राहुल गांधी ने हाई कोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। उन्होंने इस मामले को दिल्ली हाई कोर्ट में स्थानांतरित करने की मांग भी की थी।

    अगस्त 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के आदेश पर अंतरिम रोक लगा दी थी। साथ ही अदालत ने शिकायतकर्ता, सीबीआई और ईडी से जवाब मांगा था। सुप्रीम कोर्ट ने जांच एजेंसियों को हाई कोर्ट के समक्ष कोई रिपोर्ट दाखिल नहीं करने का निर्देश भी दिया था। इस रोक के कारण हाई कोर्ट के आदेश के तहत आगे की कार्रवाई पर अंतरिम स्थिति बनी हुई है।

    मामले की शुरुआत कर्नाटक के भारतीय जनता पार्टी कार्यकर्ता विग्नेश शिशिर की शिकायत से हुई थी। उन्होंने राहुल गांधी की संपत्ति को लेकर कई आरोप लगाए थे। शिकायत में लगाए गए आरोपों और संपत्ति की जांच से संबंधित मांगों के आधार पर यह मामला न्यायिक प्रक्रिया में पहुंचा।

    राहुल गांधी ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के आदेश को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था। इसके बाद शीर्ष अदालत ने मामले में संबंधित पक्षों से जवाब मांगा और जांच के आदेश पर अंतरिम रोक लगाई। अब सुनवाई के दौरान याचिका को सूचीबद्ध कराने की मांग और उसके समर्थन में दिए गए तर्क चर्चा में रहे।

    संपत्ति से जुड़े आरोपों के मामले में अदालत की कार्यवाही और जांच एजेंसियों की भूमिका महत्वपूर्ण बनी हुई है। हालांकि, शिकायत में लगाए गए आरोप अपने आप में दोष सिद्ध होने का प्रमाण नहीं हैं। मामले में आगे की स्थिति संबंधित पक्षों के जवाब और अदालत के आगामी आदेशों पर निर्भर करेगी।

  • सुप्रीम कोर्ट ने आसाराम की पेरोल बढ़ाने की याचिका खारिज की, शाम 5 बजे तक जोधपुर जेल में सरेंडर का आदेश

    सुप्रीम कोर्ट ने आसाराम की पेरोल बढ़ाने की याचिका खारिज की, शाम 5 बजे तक जोधपुर जेल में सरेंडर का आदेश

    नई दिल्ली ।सुप्रीम कोर्ट ने आसाराम को मेडिकल आधार पर पेरोल की अवधि बढ़ाने की अनुमति देने से इनकार कर दिया है। मंगलवार, 27 अक्टूबर 2026 को हुई सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने उनकी याचिका खारिज करते हुए शाम 5 बजे तक जोधपुर सेंट्रल जेल में आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया। आसाराम राजस्थान में नाबालिग से दुष्कर्म के मामले में उम्रकैद की सजा काट रहे हैं। अदालत के आदेश के बाद उन्हें निर्धारित समय तक जेल प्रशासन के सामने पेश होना होगा।

    आसाराम को स्वास्थ्य संबंधी कारणों से 20 दिनों की पेरोल दी गई थी, जिसकी अवधि 27 अक्टूबर को समाप्त हो रही थी। उनकी ओर से अदालत में पेरोल आगे बढ़ाने की मांग की गई थी। बचाव पक्ष ने दलील दी कि उनकी तबीयत ठीक नहीं है और वह मध्य प्रदेश के उज्जैन स्थित एक अस्पताल में भर्ती हैं। वकील ने बेहतर इलाज की आवश्यकता का हवाला देते हुए पेरोल की अवधि बढ़ाने का अनुरोध किया, लेकिन अदालत ने इस मांग को स्वीकार नहीं किया।

    सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने पेरोल की अवधि समाप्त होने के मद्देनजर आसाराम को उसी दिन शाम 5 बजे तक जोधपुर जेल में सरेंडर करने का आदेश दिया। अदालत ने इस मामले में राजस्थान सरकार को भी निर्देश दिए कि जेल में आसाराम के स्वास्थ्य का उचित ध्यान रखा जाए। साथ ही, उनकी जरूरत के अनुसार आवश्यक चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध कराने को कहा गया है।

    अदालत के निर्देश का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि पेरोल बढ़ाने से इनकार करने के बावजूद जेल में चिकित्सा देखभाल सुनिश्चित करने पर जोर दिया गया है। अब आसाराम की स्वास्थ्य संबंधी जरूरतों को ध्यान में रखते हुए जेल प्रशासन को आवश्यक उपचार की व्यवस्था करनी होगी। हालांकि, मेडिकल आधार पर राहत की मांग को अदालत ने मंजूरी नहीं दी है।

    आसाराम को वर्ष 2018 में राजस्थान के जोधपुर स्थित आश्रम में एक नाबालिग लड़की से दुष्कर्म के मामले में दोषी ठहराया गया था। अदालत ने उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। इसके बाद से वह जोधपुर जेल में सजा काट रहे हैं। मामले में दोषसिद्धि के बाद उनकी ओर से समय-समय पर स्वास्थ्य और इलाज से जुड़े आधारों पर राहत की मांग की जाती रही है।

    मौजूदा मामले में भी बचाव पक्ष ने स्वास्थ्य की स्थिति को आधार बनाकर पेरोल बढ़ाने की अपील की थी। दलील दी गई कि आसाराम की तबीयत ठीक नहीं है और बेहतर इलाज के लिए उन्हें अतिरिक्त समय की जरूरत है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने पेरोल की अवधि आगे बढ़ाने से इनकार करते हुए निर्धारित समय पर जेल लौटने का निर्देश दिया।

    उज्जैन के अस्पताल में भर्ती होने की बात सुनवाई के दौरान आसाराम के वकील ने रखी थी। इसके बावजूद अदालत ने पेरोल बढ़ाने की मांग स्वीकार नहीं की। साथ ही राजस्थान सरकार को निर्देश देकर यह स्पष्ट किया कि जेल में रहने के दौरान उनकी चिकित्सा जरूरतों की अनदेखी नहीं होनी चाहिए।

    सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश के बाद आसाराम के लिए 27 अक्टूबर को शाम 5 बजे तक जोधपुर सेंट्रल जेल में आत्मसमर्पण करना जरूरी है। वहीं, जेल में उनके स्वास्थ्य की निगरानी और आवश्यक उपचार उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी संबंधित प्रशासन की होगी।

  • सुप्रीम कोर्ट में कोर्ट मास्टर के 20 पदों पर भर्ती, ग्रेजुएट उम्मीदवार 15 नवंबर तक कर सकते हैं आवेदन

    सुप्रीम कोर्ट में कोर्ट मास्टर के 20 पदों पर भर्ती, ग्रेजुएट उम्मीदवार 15 नवंबर तक कर सकते हैं आवेदन

    नई दिल्ली । सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया में नौकरी पाने के इच्छुक उम्मीदवारों के लिए भर्ती का अवसर सामने आया है। सुप्रीम कोर्ट ने कोर्ट मास्टर (शॉर्टहैंड) के 20 संभावित रिक्त पदों पर सीधी भर्ती के लिए आवेदन आमंत्रित किए हैं। इन पदों के लिए ऑनलाइन आवेदन प्रक्रिया 25 अक्टूबर 2026 से शुरू हो चुकी है। इच्छुक और योग्य अभ्यर्थी 15 नवंबर 2026 को रात 11:55 बजे तक आवेदन कर सकते हैं। उम्मीदवारों को निर्धारित समयसीमा के भीतर आधिकारिक वेबसाइट के माध्यम से आवेदन प्रक्रिया पूरी करनी होगी।

    इन पदों पर आवेदन करने के लिए उम्मीदवार के पास किसी मान्यता प्राप्त विश्वविद्यालय या संस्थान से स्नातक की डिग्री होना आवश्यक है। इसके साथ ही अंग्रेजी शॉर्टहैंड में 120 शब्द प्रति मिनट की गति और कंप्यूटर संचालन का ज्ञान होना चाहिए। उम्मीदवार की कंप्यूटर पर अंग्रेजी टाइपिंग स्पीड कम से कम 40 शब्द प्रति मिनट होनी जरूरी है।

    शैक्षणिक योग्यता और तकनीकी दक्षता के अलावा संबंधित पदों पर कार्य अनुभव भी अनिवार्य रखा गया है। अभ्यर्थियों के पास सरकारी विभागों, सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों या वैधानिक निकायों में प्राइवेट सेक्रेटरी, सीनियर पर्सनल असिस्टेंट, पर्सनल असिस्टेंट या सीनियर स्टेनोग्राफर के पद पर कम से कम पांच वर्ष की नियमित सेवा का अनुभव होना चाहिए। आवेदन करने से पहले उम्मीदवारों को यह सुनिश्चित करना होगा कि वे निर्धारित शैक्षणिक, तकनीकी और अनुभव संबंधी शर्तों को पूरा करते हैं।

    भर्ती के लिए न्यूनतम आयु सीमा 30 वर्ष और अधिकतम आयु सीमा 45 वर्ष निर्धारित की गई है। आयु की गणना 1 अक्टूबर 2026 के आधार पर की जाएगी। आरक्षित श्रेणियों से संबंधित उम्मीदवारों को नियमानुसार अधिकतम आयु सीमा में छूट का लाभ मिलेगा। अभ्यर्थियों को आवेदन करने से पहले अपनी आयु और श्रेणी से संबंधित पात्रता की जांच कर लेनी चाहिए।

    उम्मीदवारों का चयन कई चरणों में किया जाएगा। सबसे पहले प्राप्त आवेदनों की स्क्रीनिंग होगी। इसके बाद वस्तुनिष्ठ प्रकार की परीक्षा, अंग्रेजी शॉर्टहैंड परीक्षा, कंप्यूटर पर अंग्रेजी टाइपिंग स्पीड टेस्ट और व्यक्तिगत साक्षात्कार आयोजित किया जाएगा। चयन प्रक्रिया के सभी निर्धारित चरणों को पूरा करने वाले उम्मीदवारों के आधार पर अंतिम चयन किया जाएगा।

    कोर्ट मास्टर पद पर चयनित उम्मीदवारों को 67,700 रुपये से लेकर 2,08,700 रुपये प्रतिमाह तक वेतन मिलेगा। इसके अतिरिक्त नियमानुसार अन्य लाभ और भत्ते भी दिए जाएंगे। वेतनमान को देखते हुए यह भर्ती उन योग्य अभ्यर्थियों के लिए अवसर है, जिनके पास आवश्यक शैक्षणिक योग्यता के साथ शॉर्टहैंड, टाइपिंग और संबंधित कार्य का अनुभव है।

    आवेदन के दौरान उम्मीदवारों को अपनी श्रेणी के अनुसार निर्धारित शुल्क ऑनलाइन जमा करना होगा। सामान्य और अनारक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों के लिए आवेदन शुल्क 1,500 रुपये और बैंक शुल्क निर्धारित है। वहीं, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग की नॉन-क्रीमी लेयर श्रेणी और पूर्व सैनिकों के लिए आवेदन शुल्क 750 रुपये तथा बैंक शुल्क देना होगा।

    सुप्रीम कोर्ट में कोर्ट मास्टर के इन पदों पर आवेदन करने के इच्छुक उम्मीदवारों को 15 नवंबर की अंतिम समयसीमा का ध्यान रखना होगा। आवेदन से पहले पात्रता,

  • एमपी में 27% ओबीसी आरक्षण पर घमासान, विवेक तन्खा ने सरकार से मांगे ठोस आंकड़े, राकेश सिंह ने कांग्रेस को घेरा

    एमपी में 27% ओबीसी आरक्षण पर घमासान, विवेक तन्खा ने सरकार से मांगे ठोस आंकड़े, राकेश सिंह ने कांग्रेस को घेरा


    मध्य प्रदेश। में अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) को 27 प्रतिशत आरक्षण देने के मुद्दे पर राजनीतिक बहस तेज हो गई है। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के हालिया रुख के बाद कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी के बीच आरोप-प्रत्यारोप शुरू हो गए हैं। राज्यसभा सांसद और वरिष्ठ अधिवक्ता विवेक तन्खा ने राज्य सरकार से आरक्षण के समर्थन में ठोस आंकड़े जुटाकर सुप्रीम कोर्ट में पेश करने की मांग की है। वहीं, प्रदेश सरकार के मंत्री राकेश सिंह ने इस विवाद के लिए कांग्रेस की तत्कालीन सरकार को जिम्मेदार ठहराया है।

    जबलपुर पहुंचे विवेक तन्खा ने कहा कि कांग्रेस सरकार ने अध्यादेश के माध्यम से ओबीसी आरक्षण को 14 प्रतिशत से बढ़ाकर 27 प्रतिशत किया था। इसके बाद प्रदेश में सत्ता परिवर्तन हो गया, लेकिन कानून का बचाव करने की जिम्मेदारी राज्य सरकार की बनी रही। तन्खा के मुताबिक, वर्तमान सरकार को अदालत में इस व्यवस्था के समर्थन में पर्याप्त तथ्य और आंकड़े प्रस्तुत करने चाहिए थे।

    तन्खा ने हाईकोर्ट की कार्यवाही का उल्लेख करते हुए कहा कि राज्य सरकार की ओर से पर्याप्त और ठोस आंकड़े पेश नहीं किए जाने के कारण आरक्षण के पक्ष को मजबूती से रखने में कठिनाई हुई। उनका मानना है कि यदि अदालत के सामने समय रहते जरूरी आंकड़े रखे जाते, तो मामले की स्थिति अलग हो सकती थी। हालांकि, यह उनका आकलन है और अदालत के निर्णय का अंतिम आधार संबंधित कानूनी तथ्यों तथा न्यायिक निष्कर्षों पर निर्भर करता है।

    आरक्षण की सीमा को लेकर विवेक तन्खा ने सुप्रीम कोर्ट के इंदिरा साहनी मामले का हवाला दिया। उन्होंने कहा कि इस मामले में नौ न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने सामान्य परिस्थितियों में कुल आरक्षण की सीमा 50 प्रतिशत निर्धारित की थी। इस सीमा से आगे जाने के लिए असाधारण परिस्थितियों को प्रमाणित करना आवश्यक है। इसके लिए राज्य सरकार को पिछड़ेपन और संबंधित परिस्थितियों के समर्थन में प्रामाणिक मात्रात्मक आंकड़े अदालत के सामने रखने होते हैं।

    तन्खा ने कहा कि कानूनी प्रक्रिया के तहत अभी भी राज्य सरकार के पास अपना पक्ष रखने का रास्ता है। यदि सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका (एसएलपी) दायर की है, तो उसे पूरी तैयारी के साथ आगे बढ़ना चाहिए। उनके अनुसार, आरक्षण से जुड़े मामले में आंकड़ों और कानूनी आधार की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। सरकार को उपलब्ध प्रशासनिक जानकारी और संबंधित तथ्यों के आधार पर अपना पक्ष प्रस्तुत करना चाहिए।

    उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि किसी सरकारी अध्यादेश या कानून का बचाव करने की प्राथमिक जिम्मेदारी संबंधित राज्य सरकार की होती है। राजनीतिक दलों के प्रतिनिधि कानूनी प्रक्रिया में हस्तक्षेप या सहयोग कर सकते हैं, लेकिन सरकार के पास उपलब्ध आधिकारिक आंकड़ों और प्रशासनिक रिकॉर्ड को अदालत में पेश करने का दायित्व सरकार का ही है।

    दूसरी ओर, मंत्री राकेश सिंह ने कांग्रेस पर निशाना साधते हुए कहा कि वर्ष 2019 में तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने पर्याप्त तैयारी के बिना ओबीसी आरक्षण बढ़ाने का कदम उठाया था। उनके अनुसार, संबंधित विधेयक में तकनीकी और कानूनी कमियां थीं, जिनके कारण मामला विवादों में उलझा। उन्होंने आरोप लगाया कि कांग्रेस ने ओबीसी वर्ग के हितों के नाम पर ऐसा निर्णय लिया, जिसका कानूनी आधार पर्याप्त मजबूत नहीं था।

    राकेश सिंह ने कहा कि वर्तमान भाजपा सरकार ओबीसी सहित सभी वर्गों के अधिकारों की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध है। उन्होंने भरोसा जताया कि सरकार कानूनी मंचों पर अपना पक्ष रखेगी और ऐसा समाधान तलाशने का प्रयास करेगी, जिससे किसी भी वर्ग के साथ अन्याय न हो।इस पूरे विवाद में अब राज्य सरकार की कानूनी रणनीति और सुप्रीम कोर्ट में पेश किए जाने वाले तथ्यों की भूमिका महत्वपूर्ण होगी। एक ओर विवेक तन्खा ने आंकड़ों के आधार पर मजबूत पैरवी की जरूरत बताई है, वहीं भाजपा ने आरक्षण से जुड़ी मौजूदा कानूनी स्थिति के लिए कांग्रेस की पूर्ववर्ती सरकार को जिम्मेदार ठहराया है।

  • ट्विशा शर्मा डेथ केस में सुप्रीम कोर्ट का बड़ा कदम, भोपाल की अदालत में सुनवाई पर अंतरिम रोक

    ट्विशा शर्मा डेथ केस में सुप्रीम कोर्ट का बड़ा कदम, भोपाल की अदालत में सुनवाई पर अंतरिम रोक

    नई दिल्ली । पूर्व मॉडल और अभिनेत्री ट्विशा शर्मा की संदिग्ध मौत के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण कदम उठाया है। शीर्ष अदालत ने मामले की सुनवाई भोपाल से दिल्ली स्थानांतरित करने की मांग वाली याचिका पर केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई), गिरिबाला सिंह और समर्थ सिंह को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। इसके साथ ही अदालत ने भोपाल की निचली अदालत में चल रही सुनवाई पर अंतरिम रोक लगा दी है। यह याचिका ट्विशा के पिता की ओर से दायर की गई है।

    ट्विशा के पिता ने अपनी याचिका में मांग की है कि उनकी बेटी की मौत से जुड़े मामले की सुनवाई भोपाल के बजाय दिल्ली में कराई जाए। सुप्रीम कोर्ट ने इस मांग पर संबंधित पक्षों से जवाब तलब किया है। साथ ही, याचिका पर आगे विचार किए जाने तक भोपाल की अदालत में चल रही कार्यवाही पर अंतरिम रोक लगाने का आदेश दिया है। मामले की सुनवाई का स्थान बदलने को लेकर अंतिम निर्णय अभी होना बाकी है।

    ट्विशा शर्मा की मौत का मामला उनके परिवार की ओर से घटना पर सवाल उठाए जाने और निष्पक्ष जांच की मांग किए जाने के बाद चर्चा में आया था। ट्विशा पूर्व मॉडल और अभिनेत्री थीं। उन्होंने मॉडलिंग के अलावा तेलुगु फिल्मों में भी काम किया था। बाद में उन्होंने एमबीए की पढ़ाई पूरी की और कॉर्पोरेट क्षेत्र में काम करने लगीं।

    उपलब्ध जानकारी के अनुसार, ट्विशा की मुलाकात समर्थ सिंह से एक वैवाहिक वेबसाइट के माध्यम से हुई थी। दोनों की शादी दिसंबर 2025 में हुई थी। इसके बाद 12 मई को ट्विशा भोपाल स्थित अपने ससुराल में मृत पाई गई थीं। उनकी मौत के बाद मायके पक्ष ने घटना की परिस्थितियों को लेकर गंभीर सवाल उठाए और मामले की जांच की मांग की।

    ट्विशा के परिजनों ने उनके पति समर्थ सिंह और ससुराल के अन्य सदस्यों पर दहेज उत्पीड़न तथा मानसिक प्रताड़ना के आरोप लगाए हैं। उनके पिता नवनिधि शर्मा ने दावा किया था कि शादी से पहले ही समर्थ का व्यवहार ठीक नहीं था। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि हनीमून के दौरान उनकी बेटी के साथ दुर्व्यवहार किया गया था। परिवार की ओर से समर्थ की मां और पूर्व न्यायाधीश गिरिबाला सिंह पर भी दहेज के लिए ट्विशा को परेशान करने का आरोप लगाया गया है।

    मामले में सामने आई पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार, ट्विशा के सिर, कान और हाथ पर चोट के निशान पाए गए थे। रिपोर्ट में इन चोटों के मौत से पहले लगने की बात सामने आई थी। हालांकि, चोटों की परिस्थितियों और मौत से उनके संबंध को लेकर जांच तथा न्यायिक प्रक्रिया के निष्कर्षों को अलग-अलग समझना जरूरी है।

    इस मामले में ट्विशा के पति समर्थ सिंह और उनकी सास गिरिबाला सिंह को गिरफ्तार किया गया था। वहीं, जमानत याचिका में गिरिबाला सिंह की ओर से बहू के व्यवहार और कथित नशे की आदत को लेकर आरोप लगाए गए थे। आवेदन में दावा किया गया था कि ट्विशा को ड्रग्स की लत थी और नशा नहीं मिलने पर उनका व्यवहार असामान्य हो जाता था। ये दावे जमानत आवेदन में लगाए गए आरोप हैं, इन्हें अपने आप में न्यायिक रूप से सिद्ध तथ्य नहीं माना जा सकता।

    ट्विशा के भाई हर्षित शर्मा ने भी परिवार की स्थिति को लेकर जानकारी दी थी। उनके मुताबिक, ट्विशा काफी परेशान थीं और उन्होंने अपनी बेबसी जाहिर करते हुए नोएडा लौटने की इच्छा जताई थी।
    अब सुप्रीम कोर्ट के नोटिस और भोपाल की अदालत में सुनवाई पर लगी अंतरिम रोक के बाद मामले की आगे की प्रक्रिया संबंधित पक्षों के जवाब पर निर्भर करेगी। दिल्ली में सुनवाई स्थानांतरित करने की मांग पर अंतिम फैसला आना बाकी है। इस बीच, ट्विशा की मौत से जुड़े आरोपों और परिस्थितियों पर न्यायिक प्रक्रिया के तहत विचार जारी रहेगा।

  • राहुल गांधी और विपक्षी नेताओं की याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को नोटिस जारी कर मांगा जवाब, मार्च पर भी की टिप्पणी

    राहुल गांधी और विपक्षी नेताओं की याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को नोटिस जारी कर मांगा जवाब, मार्च पर भी की टिप्पणी

    नई दिल्ली ।सुप्रीम कोर्ट ने लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी और इंडिया गठबंधन के अन्य नेताओं की याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए चुनाव आयोग और संबंधित अधिकारियों को नोटिस जारी किया है। अदालत ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार तथा चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी से जवाब मांगा है। विपक्ष की इन याचिकाओं में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर की प्रक्रिया और कथित तौर पर मतदाताओं के नाम हटाए जाने को चुनौती दी गई है।

    विपक्षी नेताओं ने चुनाव आयोग की ओर से मतदाता सूची के पुनरीक्षण के दौरान अपनाई गई प्रक्रिया पर सवाल उठाए हैं। याचिकाओं में मतदाताओं के नाम हटाए जाने से संबंधित मुद्दे को उठाते हुए न्यायालय से हस्तक्षेप की मांग की गई है। इन याचिकाओं पर सुनवाई के बाद अदालत ने संबंधित अधिकारियों को नोटिस भेजकर अपना पक्ष रखने को कहा है।

    सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने राहुल गांधी के नेतृत्व में सुप्रीम कोर्ट तक निकाले गए विरोध मार्च का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि कोई भी अदालत को डराने या धमकाने की कोशिश नहीं कर सकता। ऐसी कोशिशें बेकार हैं और उन पर कोई ध्यान नहीं देता। मुख्य न्यायाधीश ने यह टिप्पणी विपक्षी नेताओं की याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान की।

    इस सुनवाई से पहले कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष दीपक बैज ने मामले को लेकर अपनी प्रतिक्रिया दी थी। उन्होंने बताया कि 12 अक्टूबर को राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे के नेतृत्व में इंडिया गठबंधन के नेताओं ने सुप्रीम कोर्ट की ओर मार्च किया था। इसके बाद विपक्षी नेताओं ने चुनाव आयोग के खिलाफ याचिकाएं दाखिल कीं। बैज के मुताबिक, अदालत ने इन याचिकाओं पर संज्ञान लिया और 15 अक्टूबर को सुनवाई हुई।

    दीपक बैज ने एसआईआर प्रक्रिया में गड़बड़ी होने का आरोप लगाया। उन्होंने दावा किया कि वोटों की चोरी करके सत्ता हासिल की गई और चुनाव आयोग तथा भारतीय जनता पार्टी के बीच गठबंधन है। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी ने इन आरोपों से जुड़े सबूत सुप्रीम कोर्ट के सामने रखे हैं। बैज ने यह भी कहा कि विपक्ष को मामले में अपने पक्ष में फैसला आने की उम्मीद है। हालांकि, ये बातें कांग्रेस नेता की ओर से लगाए गए आरोप और व्यक्त किया गया विश्वास हैं।

    इस मामले में विपक्षी नेताओं ने अदालत से मुलाकात करने और ज्ञापन सौंपने के लिए पहले भी समय मांगा था। 11 अक्टूबर को विपक्षी सांसदों ने मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखकर मुलाकात का समय देने का अनुरोध किया था। वे अपनी मांगों और शिकायतों से संबंधित ज्ञापन सौंपना चाहते थे, लेकिन उन्हें मुलाकात का समय नहीं मिला।

    इसके अगले दिन, यानी 12 अक्टूबर को राहुल गांधी और अन्य विपक्षी नेता सुप्रीम कोर्ट पहुंचे। इसके बाद उन्होंने मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण और कथित तौर पर मतदाताओं के नाम हटाए जाने के मुद्दे पर याचिकाएं दाखिल कीं। विपक्ष की ओर से इस कदम के जरिए चुनाव आयोग की प्रक्रिया को न्यायिक चुनौती दी गई है।

    15 अक्टूबर को हुई सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग, मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू तथा विवेक जोशी को नोटिस जारी कर जवाब मांगा। अब इन याचिकाओं में उठाए गए सवालों पर संबंधित अधिकारियों का पक्ष सामने आना है। मामले में आगे की कार्रवाई अदालत के समक्ष प्रस्तुत जवाब और सुनवाई के दौरान होने वाली कार्यवाही के आधार पर आगे बढ़ेगी।

  • कर्नाटक चुनाव की वीडियो रिकॉर्डिंग गायब होने पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, निर्वाचन आयोग से पूछा रिकॉर्ड कहां गया, अगली सुनवाई पर मांगा जवाब

    कर्नाटक चुनाव की वीडियो रिकॉर्डिंग गायब होने पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, निर्वाचन आयोग से पूछा रिकॉर्ड कहां गया, अगली सुनवाई पर मांगा जवाब

    नई दिल्ली । सुप्रीम कोर्ट ने कर्नाटक की शृंगेरी विधानसभा सीट पर वर्ष 2023 में हुई मतगणना की मूल वीडियो रिकॉर्डिंग उपलब्ध नहीं होने पर भारत निर्वाचन आयोग के प्रति कड़ी नाराजगी जताई है। अदालत ने सवाल किया कि चुनाव कराने वाली संस्था के पास अपने ही चुनाव से जुड़े महत्वपूर्ण रिकॉर्ड कैसे गायब हो सकते हैं। पीठ ने आयोग की ओर से रिकॉर्ड नहीं मिलने की दलील पर असंतोष जताते हुए स्पष्ट किया कि इस मामले में लापरवाही को सामान्य रूप से स्वीकार नहीं किया जा सकता। अदालत ने चेतावनी दी कि अगली सुनवाई तक उपलब्ध रिकॉर्ड पेश नहीं किए गए तो आयोग के खिलाफ प्रतिकूल कानूनी निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं।

    इस मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति संजय कुमार और न्यायमूर्ति संजीव सचदेवा की पीठ ने की। सुनवाई के दौरान निर्वाचन आयोग की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता शेषाद्रि नायडू ने बताया कि वर्ष 2023 की मूल मतगणना की वीडियो रिकॉर्डिंग नहीं मिल पा रही है और उसे खोजने के प्रयास किए जा रहे हैं। इस पर अदालत ने कड़ी आपत्ति जताई। पीठ ने कहा कि चुनाव कराना आयोग का मुख्य दायित्व है और इस प्रक्रिया से जुड़े दस्तावेजों तथा रिकॉर्ड का सुरक्षित रहना जरूरी है। अदालत ने आयोग से उपलब्ध सभी रिकॉर्ड अगली सुनवाई के दौरान पेश करने का निर्देश दिया है। मामले की अगली सुनवाई 15 फरवरी 2027 को निर्धारित की गई है।

    यह पूरा विवाद कर्नाटक विधानसभा चुनाव 2023 में शृंगेरी सीट के नतीजे से जुड़ा है। इस सीट पर कांग्रेस के टीडी राजेगौड़ा को मात्र 201 वोटों के अंतर से विजेता घोषित किया गया था। भारतीय जनता पार्टी के उम्मीदवार डीएनए जीवराज ने चुनाव परिणाम को कर्नाटक हाई कोर्ट में चुनौती दी थी। मामले की सुनवाई के बाद हाई कोर्ट ने अप्रैल 2026 में डाक मतपत्रों की दोबारा गिनती करने का आदेश दिया।

    इसके बाद 3 मई 2026 को जारी संशोधित परिणाम में राजेगौड़ा के मतों की संख्या कम हो गई और जीवराज को विजेता घोषित कर दिया गया। इस फैसले के खिलाफ राजेगौड़ा सुप्रीम कोर्ट पहुंचे। शीर्ष अदालत ने उन्हें अंतरिम राहत देते हुए विधायक पद पर बने रहने की अनुमति दी थी।

    राजेगौड़ा की ओर से पुनर्गणना की प्रक्रिया पर सवाल उठाए गए हैं। उनका तर्क है कि हाई कोर्ट ने केवल 279 खारिज किए गए डाक मतपत्रों की दोबारा जांच करने का आदेश दिया था। हालांकि, उनके अनुसार चुनाव अधिकारी ने निर्धारित दायरे से बाहर जाकर 562 वैध डाक मतपत्रों का भी पुनर्मूल्यांकन कर दिया। इसी प्रक्रिया की वैधता और निष्पक्षता से जुड़े सवालों के बीच मतगणना की मूल वीडियो रिकॉर्डिंग महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

    राजेगौड़ा ने मामले में पर्यवेक्षक की रिपोर्ट के साथ वर्ष 2023 की मूल मतगणना और पुनर्गणना की वीडियो रिकॉर्डिंग उपलब्ध कराने की मांग की है। इन दस्तावेजों के माध्यम से यह स्पष्ट करने की कोशिश की जा रही है कि मतगणना और पुनर्गणना के दौरान निर्धारित प्रक्रियाओं का पालन हुआ था या नहीं।

    सुप्रीम कोर्ट की नाराजगी के बाद अब निर्वाचन आयोग को अगली सुनवाई पर उपलब्ध रिकॉर्ड पेश करने होंगे। अदालत ने संकेत दिया है कि रिकॉर्ड प्रस्तुत नहीं होने की स्थिति में मामले में आयोग के विरुद्ध प्रतिकूल निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं। हालांकि, वीडियो रिकॉर्डिंग के गायब होने और पुनर्गणना की प्रक्रिया से जुड़े सभी सवालों पर अंतिम निर्णय अभी नहीं हुआ है। अगली सुनवाई में रिकॉर्ड की उपलब्धता और मामले से जुड़े कानूनी पहलुओं पर आगे विचार किया जाएगा।

  • सुप्रीम कोर्ट ने एसिड अटैक पीड़िता के इलाज पर सर गंगा राम अस्पताल को दिए सख्त निर्देश, छुट्टी तक मुफ्त उपचार जारी रखने का आदेश

    सुप्रीम कोर्ट ने एसिड अटैक पीड़िता के इलाज पर सर गंगा राम अस्पताल को दिए सख्त निर्देश, छुट्टी तक मुफ्त उपचार जारी रखने का आदेश

    नई दिल्ली । दिल्ली में एसिड अटैक की शिकार हुई महिला के इलाज को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। अदालत ने सर गंगा राम अस्पताल को निर्देश दिया कि पीड़िता को भर्ती रखकर सभी जरूरी चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएं। इसमें दवाएं, प्लास्टिक सर्जरी और जरूरत के अनुसार अन्य उपचार भी शामिल हैं। पीठ ने स्पष्ट किया कि पीड़िता को तब तक अस्पताल से छुट्टी नहीं दी जाए, जब तक वह वहां से जाने के लिए चिकित्सकीय रूप से फिट न हो जाए और उसे केवल बाह्य रोगी विभाग यानी ओपीडी में उपचार की जरूरत न रह जाए। अदालत ने इलाज पर होने वाले खर्च की परवाह किए बिना उपचार जारी रखने और उसका बिल अदालत में जमा करने को भी कहा।

    मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने शुक्रवार को मामले पर तत्काल सुनवाई की। पीठ में न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना भी शामिल थे। अदालत ने याचिका में सामने आए तथ्यों को चिंताजनक बताया। यह मामला एसिड अटैक पीड़ितों के पुनर्वास और कल्याण के लिए काम करने वाले संगठन ब्रेव सोल्स फाउंडेशन की ओर से उठाया गया था। संगठन की प्रमुख शाहीन मलिक के मुताबिक, महिला पर छह अक्टूबर को दिल्ली के भजनपुरा इलाके में एसिड अटैक हुआ था। इस हमले में वह लगभग 45 प्रतिशत तक झुलस गई थी।

    शाहीन मलिक ने अदालत को बताया कि कानून के तहत मुफ्त इलाज का अधिकार होने के बावजूद महिला को दिल्ली के बड़े निजी अस्पतालों में पर्याप्त उपचार नहीं मिल पा रहा था। उनके आरोप के मुताबिक, सर गंगा राम अस्पताल और अपोलो अस्पताल ने बर्न वार्ड की सुविधा उपलब्ध नहीं होने का हवाला देकर इलाज से इनकार किया था। पीड़िता को इलाज के लिए एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल ले जाना पड़ा। इस स्थिति के बाद संगठन ने मामले में हस्तक्षेप किया और पीड़िता के उपचार के लिए न्यायिक मदद मांगी।

    पीड़िता की मां के अनुसार, हमले के बाद पुलिस कंट्रोल रूम की मदद से उनकी बेटी को सबसे पहले जग प्रवेश चंद्र अस्पताल ले जाया गया। वहां से उसे गुरु तेग बहादुर अस्पताल भेज दिया गया। मां ने बताया कि बेटी को दर्द से जूझते देखना उनके लिए बेहद मुश्किल था और उन्हें लगा कि उसकी परेशानी पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जा रहा। उनके मुताबिक, गुरुवार दोपहर बेटी को गुरु तेग बहादुर अस्पताल से छुट्टी दिलाकर सर गंगा राम अस्पताल ले जाया गया। इसके बाद परिवार को उसके इलाज को लेकर लगातार परेशानियों का सामना करना पड़ा।

    मां ने आरोप लगाया कि शुक्रवार रात सर गंगा राम अस्पताल के कर्मचारियों ने परिवार से बाहर से दवाएं खरीदने को कहा। जब उन्होंने बताया कि उनके पास दवाएं खरीदने के लिए पैसे नहीं हैं, तो शनिवार सुबह उन्हें बेटी को किसी दूसरे अस्पताल ले जाने के लिए कहा गया। हालांकि, गुरु तेग बहादुर अस्पताल के अतिरिक्त निदेशक डॉ. प्रवीण कुमार ने वहां इलाज में लापरवाही के आरोपों से इनकार किया। उन्होंने कहा कि अस्पताल ने मरीज की जरूरत के अनुसार पूरा उपचार दिया था। उनके मुताबिक, परिवार अपनी पसंद के अस्पताल में इलाज कराना चाहता था, इसलिए मरीज को वहां से छुट्टी दिलाई गई।

    याचिका में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 397 का हवाला दिया गया है। इस प्रावधान के तहत सरकारी और निजी अस्पतालों को एसिड अटैक पीड़ितों को तत्काल प्राथमिक चिकित्सा और मुफ्त उपचार उपलब्ध कराना होता है। शाहीन मलिक ने कहा कि पीड़िता और उसके परिवार को इलाज के लिए कई अस्पतालों के चक्कर नहीं लगाने चाहिए थे। उन्होंने एसिड पर प्रतिबंध के बावजूद राष्ट्रीय राजधानी में इसकी बिक्री जारी रहने पर भी सवाल उठाए। उनका कहना था कि पीड़िता को इलाज दिलाने के लिए संगठन और वकीलों को हस्तक्षेप करना पड़ा तथा सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़ा।

  • 10 अक्टूबर के प्रदर्शन से पहले सार्वजनिक परिवहन बंद करने पर सुनवाई, सुप्रीम कोर्ट ने आम लोगों की परेशानी दूर करने के लिए संतुलित कदम उठाने को कहा

    10 अक्टूबर के प्रदर्शन से पहले सार्वजनिक परिवहन बंद करने पर सुनवाई, सुप्रीम कोर्ट ने आम लोगों की परेशानी दूर करने के लिए संतुलित कदम उठाने को कहा

    नई दिल्ली । दिल्ली में 10 अक्टूबर को जंतर-मंतर पर प्रस्तावित प्रदर्शन से पहले मेट्रो स्टेशनों को बंद करने और कुछ रेल सेवाएं रद्द किए जाने का मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। शुक्रवार को सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि मेट्रो स्टेशन और रेलवे सेवाओं पर पूरी तरह रोक लगाने के फैसले पर दोबारा विचार करने की जरूरत है। अदालत ने स्पष्ट किया कि वह फिलहाल प्रदर्शन की अनुमति देने के सवाल पर विचार नहीं कर रही, क्योंकि सुनवाई के दौरान कोई आयोजक उसके सामने उपस्थित नहीं हुआ। इस सुनवाई का मुख्य मुद्दा सार्वजनिक परिवहन पर पाबंदियों से आम लोगों को होने वाली परेशानी रहा। अदालत ने केंद्र सरकार से ऐसे कदम उठाने को कहा, जिनसे सुरक्षा और कानून-व्यवस्था की जरूरतों के साथ-साथ लोगों की आवाजाही भी प्रभावित न हो।

    यह याचिका भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के महासचिव और पूर्व राज्यसभा सांसद एमए बेबी ने दाखिल की थी। इसमें मेट्रो स्टेशनों को बंद करने और दिल्ली के प्रमुख रेलवे स्टेशनों पर कुछ ट्रेनों को रद्द करने के फैसले को चुनौती दी गई। याचिका के अनुसार, दिल्ली पुलिस ने 8 अक्टूबर को दिल्ली मेट्रो रेल कॉरपोरेशन को पत्र लिखकर 57 मेट्रो स्टेशनों के प्रवेश और निकास द्वार बंद करने को कहा था। यह व्यवस्था 9 अक्टूबर की रात 9 बजे से लागू किए जाने और हालात सामान्य होने तक जारी रखने की बात कही गई थी। याचिका में कहा गया कि इस कदम का असर केवल प्रदर्शन में शामिल होने वाले लोगों पर नहीं, बल्कि रोजाना काम, पढ़ाई, इलाज और अन्य जरूरी कामों के लिए यात्रा करने वाले नागरिकों पर भी पड़ सकता है।

    याचिका में जिन स्टेशनों का उल्लेख किया गया, उनमें सुप्रीम कोर्ट, हौज खास, लाजपत नगर, कश्मीरी गेट, जामिया मिल्लिया इस्लामिया, शाहदरा और रोहिणी सहित कई स्टेशन शामिल बताए गए। याचिकाकर्ता का कहना था कि इनमें से कई स्टेशन अस्पतालों, कॉलेजों, अदालतों और रिहायशी इलाकों तक पहुंचने के लिए महत्वपूर्ण हैं। याचिका में 10 अक्टूबर को नई दिल्ली और हजरत निजामुद्दीन रेलवे स्टेशनों पर सुबह 4 बजे से दोपहर 2 बजे के बीच पहुंचने वाली कई मेल और एक्सप्रेस ट्रेनों को रद्द करने पर भी सवाल उठाया गया। इनमें हावड़ा-नई दिल्ली राजधानी एक्सप्रेस और सियालदह-नई दिल्ली राजधानी एक्सप्रेस का जिक्र किया गया। याचिका में मरीजों, विद्यार्थियों, यात्रियों और दूसरे नागरिकों को संभावित परेशानी का मुद्दा उठाया गया। साथ ही, दावा किया गया कि प्रदर्शन में शामिल होने के लिए दिल्ली आ रहे कुछ लोगों को दूसरे राज्यों में रोका गया या हिरासत में लिया गया।

    याचिकाकर्ता ने अदालत से मेट्रो स्टेशनों को बंद करने का फैसला रोकने, सेवाएं सामान्य करने और रद्द ट्रेनों को जहां तक संभव हो दोबारा चलाने का निर्देश देने की मांग की थी। प्रभावित यात्रियों को पूरा रिफंड और वैकल्पिक यात्रा व्यवस्था उपलब्ध कराने की मांग भी की गई। याचिका में जंतर-मंतर पर शांतिपूर्ण प्रदर्शन की अनुमति देने और प्रदर्शन में शामिल होने के लिए दिल्ली आने वाले लोगों को केवल इसी कारण रोकने से बचने का अनुरोध किया गया। सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि मेट्रो सेवाओं पर पाबंदियों से लाखों लोगों की रोजमर्रा की आवाजाही प्रभावित हो सकती है। अदालत ने यह भी कहा कि वकीलों के पास निजी वाहन हो सकते हैं, लेकिन अदालतों में काम करने वाले कई कर्मचारी मेट्रो से आते हैं। पीठ ने अधिकारियों से बैरिकेडिंग की जानकारी सार्वजनिक करने और लोगों को वैकल्पिक सड़कों के बारे में बताने की जरूरत पर भी जोर दिया।

    सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि सरकार लोगों को होने वाली असुविधा के मुद्दे पर संबंधित अधिकारियों से चर्चा करेगी। उन्होंने दलील दी कि सुरक्षा संबंधी कदम सभी की सुरक्षा को ध्यान में रखकर उठाए जा रहे हैं। उन्होंने पिछली एक घटना का उल्लेख करते हुए कहा कि 20 जून को प्रदर्शन की एक दिन की अनुमति मांगी गई थी, लेकिन प्रदर्शन 17 दिनों तक चला और संसद की ओर जाने की कोशिश भी हुई। उनके अनुसार, उस दौरान 200 से अधिक पुलिसकर्मी घायल हुए थे। उन्होंने यह भी कहा कि इंटरनेट पर पाबंदी सीमित क्षेत्र में है और महिला पुलिसकर्मियों के साथ दुर्व्यवहार की घटनाएं हुई थीं। अदालत ने प्रदर्शन की अनुमति के सवाल पर विचार करने से इनकार करते हुए सार्वजनिक परिवहन और नागरिकों की परेशानी पर ध्यान केंद्रित रखा।

    सुनवाई में मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने जंतर-मंतर की भौगोलिक स्थिति और सीमित जगह को लेकर भी चिंता जताई। उन्होंने कहा कि जगह की कमी के कारण प्रदर्शनकारियों के लिए भोजन, स्वच्छता और एंबुलेंस जैसी व्यवस्थाओं में समस्याएं पैदा हो सकती हैं और उनके अधिकार भी प्रभावित हो सकते हैं। न्यायमूर्ति बागची ने कहा कि मेट्रो, ट्रेन और सड़क परिवहन को पूरी तरह बंद नहीं किया जा सकता तथा कदम हालात के अनुरूप होने चाहिए। अदालत ने लोगों को यह स्पष्ट जानकारी देने की जरूरत बताई कि कौन-सी सेवाएं कब उपलब्ध होंगी और किन रास्तों का इस्तेमाल किया जा सकता है। केंद्र की ओर से आश्वासन दिया गया कि अधिकारियों से बातचीत के बाद संतुलित कदम उठाए जाएंगे, यातायात का प्रवाह बनाए रखने की कोशिश होगी और लोगों की सुविधा के लिए सलाह जारी की जाएगी।