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  • बंगाल SIR पर सुप्रीम कोर्ट में 31 सीटों का मुद्दा उठा, हटाए गए वोट और जीत के अंतर पर मांगा गया विस्तृत डेटा

    बंगाल SIR पर सुप्रीम कोर्ट में 31 सीटों का मुद्दा उठा, हटाए गए वोट और जीत के अंतर पर मांगा गया विस्तृत डेटा

    नई दिल्ली ।पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर चल रही कानूनी लड़ाई अब विधानसभा चुनाव के नतीजों तक पहुंच गई है। सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान 31 विधानसभा सीटों का मुद्दा सामने आया, जहां भारतीय जनता पार्टी के उम्मीदवारों की जीत का अंतर उन मतदाताओं की संख्या से कम बताया गया है, जिनके नाम SIR प्रक्रिया के दौरान हटाए गए थे।

    मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ कर रही है। सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि 31 सीटों पर जीत का अंतर और हटाए गए मतदाताओं की संख्या के बीच महत्वपूर्ण अंतर है। इसी संदर्भ में मुख्य न्यायाधीश ने सवाल किया कि क्या ऐसी स्थिति में अदालत नए सिरे से चुनाव कराने का निर्देश दे सकती है।

    हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने अभी पश्चिम बंगाल में दोबारा विधानसभा चुनाव कराने का कोई आदेश नहीं दिया है। अदालत ने संबंधित पक्ष को इस मुद्दे पर औपचारिक आवेदन दाखिल करने को कहा है। साथ ही चुनाव आयोग से SIR से जुड़ी अपीलों का विस्तृत और श्रेणीवार आंकड़ा पेश करने को कहा गया है।

    सुनवाई में सामने आए आंकड़ों के मुताबिक पश्चिम बंगाल में SIR से संबंधित करीब 38.1 लाख अपीलें दाखिल हुई हैं। इनमें लगभग 7 लाख अपीलें ऐसे लोगों से जुड़ी हैं, जिनके नाम मतदाता सूची से हटाए गए थे। दूसरी ओर करीब 31 लाख अपीलें मतदाता सूची में लोगों के नाम शामिल किए जाने पर आपत्ति से संबंधित बताई गई हैं।

    सबसे महत्वपूर्ण आंकड़ा उन अपीलों का है जिन पर अब तक फैसला हो चुका है। अदालत को बताया गया कि करीब 83 हजार अपीलों का निपटारा हुआ है। इनमें 75,443 मामलों में मतदाताओं के नाम दोबारा मतदाता सूची में शामिल किए गए। इसका अर्थ है कि निपटाए गए मामलों में 90 प्रतिशत से अधिक मामलों में बाहर किए गए मतदाताओं को राहत मिली।

    यह आंकड़ा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि SIR के दौरान हटाए गए नामों को लेकर पहले से राजनीतिक और कानूनी विवाद चल रहा है। हालांकि, यह समझना जरूरी है कि 90 प्रतिशत का आंकड़ा पूरे SIR के तहत हटाए गए मतदाताओं पर लागू नहीं होता। यह केवल अब तक निपटाई गई उन अपीलों से संबंधित है, जिनमें नाम हटाए जाने को चुनौती दी गई थी।

    न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची ने सुनवाई के दौरान चुनाव परिणाम और मतदाता सूची के बीच संभावित संबंध को समझाने के लिए एक उदाहरण रखा। उन्होंने कहा कि यदि किसी सीट पर जीत का अंतर 50 वोट हो और 100 मतदाताओं के नाम हटाए गए हों, तो बाद में इनमें से बड़ी संख्या में नाम हटाया जाना गलत पाए जाने पर स्थिति गंभीर हो सकती है।

    यही वजह है कि सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग से लंबित और निपटाई गई अपीलों का विस्तृत विवरण मांगा है। अदालत यह जानना चाहती है कि कितने मामले नाम जोड़ने और कितने मामले नाम हटाने से संबंधित हैं तथा अब तक उनके संबंध में क्या कार्रवाई हुई है।

    पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 में भाजपा ने 294 सदस्यीय विधानसभा में 207 सीटें जीतकर स्पष्ट बहुमत हासिल किया था, जबकि तृणमूल कांग्रेस को 80 सीटें मिलीं। सरकार बनाने के लिए 148 सीटों की जरूरत होती है। चुनाव परिणाम के बाद SIR से जुड़ी मतदाता सूची में बदलाव को लेकर राजनीतिक विवाद और तेज हुआ।

    अब सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई का केंद्र यह तय करना नहीं है कि चुनाव स्वतः रद्द होंगे या नहीं, बल्कि यह देखना भी महत्वपूर्ण है कि मतदाता सूची से जुड़े विवादों का वास्तविक चुनावी परिणामों पर कितना प्रभाव पड़ा। अदालत के सामने चुनाव आयोग का विस्तृत डेटा आने के बाद इस मामले की कानूनी दिशा और स्पष्ट हो सकती है।

  • इमरान खान की छह डॉक्टरों ने की मेडिकल जांच, अस्पताल में भर्ती नहीं किया गया, फिर अदियाला जेल भेजे गए

    इमरान खान की छह डॉक्टरों ने की मेडिकल जांच, अस्पताल में भर्ती नहीं किया गया, फिर अदियाला जेल भेजे गए

    नई दिल्ली ।पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान को मेडिकल जांच के बाद एक बार फिर अदियाला जेल भेज दिया गया है। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद उन्हें कड़ी सुरक्षा के बीच शिफा इंटरनेशनल हॉस्पिटल ले जाया गया था। वहां छह विशेषज्ञ डॉक्टरों की टीम ने उनकी स्वास्थ्य संबंधी जांच की। जांच पूरी होने के बाद डॉक्टरों ने फिलहाल उन्हें अस्पताल में भर्ती करने की जरूरत नहीं बताई, जिसके बाद उन्हें वापस जेल भेज दिया गया।

    इमरान खान लंबे समय से अदियाला जेल में बंद हैं और उनकी स्वास्थ्य स्थिति को लेकर लगातार सवाल उठते रहे हैं। उनकी मेडिकल जांच कराने का मामला सुप्रीम कोर्ट के निर्देश से जुड़ा हुआ था। अदालत ने उनकी सेहत को ध्यान में रखते हुए निर्धारित समय के भीतर मेडिकल जांच कराने और जरूरत पड़ने पर उपचार उपलब्ध कराने की व्यवस्था करने को कहा था।

    सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद इमरान खान को शिफा इंटरनेशनल हॉस्पिटल ले जाने की प्रक्रिया शुरू हुई। अदालत की ओर से मेडिकल जांच के लिए मेडिकल बोर्ड गठित करने की बात भी कही गई थी। जांच और उपचार के दौरान डॉ. उजमा तथा इमरान खान के निजी चिकित्सक को भी मौजूद रहने की अनुमति दी गई थी। उनके इलाज से संबंधित खर्च उनके परिवार द्वारा वहन किए जाने की बात सामने आई थी।

    इमरान खान के अस्पताल पहुंचने से पहले वहां सुरक्षा व्यवस्था को काफी बढ़ा दिया गया था। अस्पताल के आसपास बड़ी संख्या में पुलिसकर्मियों को तैनात किया गया। वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों ने भी मौके पर पहुंचकर सुरक्षा व्यवस्था का जायजा लिया। अस्पताल में इमरान खान की मौजूदगी को देखते हुए प्रवेश और आवाजाही पर विशेष निगरानी रखी गई।

    छह विशेषज्ञ डॉक्टरों ने इमरान खान की स्वास्थ्य स्थिति का परीक्षण किया। मेडिकल जांच पूरी होने के बाद डॉक्टरों की राय के आधार पर उन्हें अस्पताल में भर्ती नहीं किया गया। इसके बाद सुरक्षा व्यवस्था के बीच उन्हें वापस अदियाला जेल ले जाया गया। फिलहाल उनकी स्वास्थ्य निगरानी जेल में ही किए जाने की बात सामने आई है।

    इमरान खान को निजी अस्पताल में जांच के लिए भेजे जाने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर पाकिस्तान सरकार ने पहले असहमति जताई थी। केंद्र सरकार ने अदालत के आदेश पर पुनर्विचार की मांग करते हुए कहा था कि इमरान खान की स्वास्थ्य जांच पहले भी कई बार हो चुकी है और उनके लिए मेडिकल बोर्ड गठित किए जा चुके हैं।

    सरकार का तर्क था कि किसी कैदी को अस्पताल भेजने का फैसला उसकी वास्तविक स्वास्थ्य स्थिति और डॉक्टरों की सलाह के आधार पर होना चाहिए। सरकार ने निजी अस्पताल में जांच के आदेश पर सवाल उठाते हुए इसे लेकर अदालत में पुनर्विचार की कोशिश की थी।

    हालांकि, सरकार की पुनर्विचार याचिका को सुप्रीम कोर्ट के रजिस्ट्रार कार्यालय ने कुछ कमियां बताते हुए वापस कर दिया था। इसके बाद अदालत के निर्देश के तहत इमरान खान को मेडिकल जांच के लिए अस्पताल ले जाया गया।

    मेडिकल जांच के बाद अस्पताल में भर्ती न किए जाने से फिलहाल इमरान खान को वापस जेल भेज दिया गया है। इस घटनाक्रम में अदालत के निर्देश, सरकार की आपत्ति और डॉक्टरों की मेडिकल राय तीनों महत्वपूर्ण पहलू रहे। इमरान खान की आगे की स्वास्थ्य निगरानी अदियाला जेल में ही किए जाने की संभावना है।

  • माता-पिता की संपत्ति पर नहीं चलेगा बच्चों का मनमाना हक, सुप्रीम कोर्ट ने बेदखली के ट्रिब्यूनल अधिकार को ठहराया सही

    माता-पिता की संपत्ति पर नहीं चलेगा बच्चों का मनमाना हक, सुप्रीम कोर्ट ने बेदखली के ट्रिब्यूनल अधिकार को ठहराया सही

    नई दिल्ली ।देश की सर्वोच्च अदालत ने वरिष्ठ नागरिकों के अधिकारों और सुरक्षा को लेकर एक अत्यंत महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया है कि ‘माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण एवं कल्याण अधिनियम, 2007’ के तहत गठित ट्रिब्यूनल के पास यह पूरा अधिकार है कि वह बुजुर्गों की संपत्ति से उनके बच्चों को बेदखल करने का आदेश जारी कर सके।

    शीर्ष अदालत ने कहा कि यदि ट्रिब्यूनल को लगता है कि माता-पिता के भरण-पोषण, सुरक्षा और सम्मानपूर्वक जीवन के लिए बच्चों को बेदखल करना आवश्यक है, तो वह ऐसा आदेश दे सकता है। अदालत ने अपने फैसले में रेखांकित किया कि बढ़ती उम्र किसी भी स्थिति में असुरक्षा का कारण नहीं बननी चाहिए। सभ्य समाज का असली पैमाना यही है कि वह अपने बुजुर्गों को कितना सम्मान, आदर और सुरक्षा प्रदान करता है।

    यह महत्वपूर्ण फैसला लखनऊ के विकासनगर निवासी रविकांत गुप्ता द्वारा दाखिल की गई याचिका का निपटारा करते हुए दिया गया। अपीलकर्ता अपने रिहायशी मकान के मालिक हैं और उन्होंने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के उस फैसले को चुनौती दी थी, जिसमें उच्च न्यायालय ने उनके बेटे और बहू के खिलाफ जारी बेदखली के आदेश को रद्द कर दिया था।

    सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान पाया कि उच्च न्यायालय ने ट्रिब्यूनल के बेदखली के आदेश में हस्तक्षेप करके गलती की थी। अदालत ने माना कि यह एक स्थापित कानूनी प्रक्रिया है जिसके तहत वरिष्ठ नागरिकों के कल्याण और शांतिपूर्ण जीवन को सुनिश्चित करने के लिए ट्रिब्यूनल को बेदखली का निर्देश देने की पूरी शक्तियां प्राप्त हैं।

    पीठ ने अपने दूरगामी फैसले में सांस्कृतिक और सामाजिक मूल्यों का उल्लेख करते हुए कहा कि विभिन्न संस्कृतियों, धर्मों और सभ्यताओं में वरिष्ठ नागरिकों को ज्ञान, अनुभव और सामूहिक स्मृति के अमूल्य भंडार के रूप में देखा गया है। ऐसे में उनकी संपत्ति, भरण-पोषण और गरिमा से कोई समझौता नहीं किया जा सकता।

    मध्य प्रदेश सहित देश के विभिन्न राज्यों में बुजुर्गों के साथ होने वाले संपत्ति संबंधी विवादों और पारिवारिक प्रताड़ना के मामलों को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला मील का पत्थर माना जा रहा है। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि इस फैसले से उन वरिष्ठ नागरिकों को बड़ी राहत मिलेगी जो अपने ही बच्चों द्वारा अपनी ही संपत्ति में उपेक्षित या प्रताड़ित महसूस कर रहे हैं।

  • नौ महीने बाद इमरान खान से मिलीं बुशरा बीबी और नूरीन नियाजी, सुप्रीम कोर्ट के आदेश से परिवार को राहत

    नौ महीने बाद इमरान खान से मिलीं बुशरा बीबी और नूरीन नियाजी, सुप्रीम कोर्ट के आदेश से परिवार को राहत

    नई दिल्ली ।पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री और पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ के संस्थापक इमरान खान से करीब नौ महीने बाद उनके परिवार के सदस्यों ने मुलाकात की। रावलपिंडी स्थित अडियाला जेल में उनकी पत्नी बुशरा बीबी और बहन नूरीन नियाजी ने उनसे मुलाकात की। लंबे समय बाद परिवार के साथ हुई इस मुलाकात को इमरान खान के लिए महत्वपूर्ण घटनाक्रम माना जा रहा है।

    यह मुलाकात पाकिस्तान सुप्रीम कोर्ट के हालिया आदेश के बाद हुई है। अदालत ने इमरान खान को हर सप्ताह परिवार के सदस्यों से मिलने की अनुमति दी है। इसके साथ ही उनकी स्वास्थ्य स्थिति को ध्यान में रखते हुए मेडिकल जांच और आवश्यक उपचार को लेकर भी निर्देश जारी किए गए हैं।

    नूरीन नियाजी ने इस साल पहली बार अपने भाई इमरान खान से मुलाकात की। जेल के कॉन्फ्रेंस रूम में हुई यह मुलाकात करीब 15 मिनट तक चली। इस दौरान इमरान खान की सेहत और अन्य महत्वपूर्ण विषयों पर बातचीत हुई। नूरीन ने उन्हें अदालत के उस निर्देश की जानकारी भी दी, जिसके तहत मेडिकल जांच और उपचार के लिए उन्हें शिफा इंटरनेशनल अस्पताल ले जाने की बात कही गई है।

    इमरान खान की पत्नी बुशरा बीबी ने भी जेल में उनसे मुलाकात की। यह मुलाकात करीब 30 से 35 मिनट तक चली। इसके बाद बुशरा बीबी ने अपने परिवार के अन्य सदस्यों से भी मुलाकात की। इस दौरान उनके बच्चों और परिवार के अन्य सदस्यों के साथ भी संपर्क हुआ।

    सुप्रीम कोर्ट ने परिवार से मुलाकात की अनुमति के साथ कुछ शर्तें भी तय की हैं। अदालत के अनुसार यदि इन मुलाकातों का इस्तेमाल राजनीतिक गतिविधियों या राजनीतिक लाभ के लिए किया जाता है, तो दी गई राहत वापस ली जा सकती है। इस व्यवस्था के तहत जेल में होने वाली पारिवारिक मुलाकातों को राजनीतिक गतिविधियों से अलग रखने पर जोर दिया गया है।

    इस बार इमरान खान की बहनों अलीमा खान और उजमा खान तथा उनके चचेरे भाई कासिम जमान को उनसे मिलने की अनुमति नहीं मिली। पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ के किसी राजनीतिक नेता को भी इस मुलाकात की अनुमति नहीं दी गई। इससे स्पष्ट है कि अदालत की ओर से दी गई राहत को निर्धारित शर्तों के साथ लागू किया जा रहा है।

    इमरान खान वर्ष 2023 से अडियाला जेल में बंद हैं। वह कई मामलों में कानूनी कार्रवाई का सामना कर रहे हैं। वर्तमान में वह अल-कादिर ट्रस्ट भ्रष्टाचार मामले में 14 वर्ष की सजा काट रहे हैं। जेल में लंबे समय से बंद रहने और स्वास्थ्य संबंधी चिंताओं के कारण उनके इलाज का मुद्दा भी अदालत के सामने पहुंचा है।

    सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को इमरान खान को दो दिनों के भीतर शिफा इंटरनेशनल अस्पताल ले जाने का निर्देश दिया है। अदालत ने उन्हें 16 सितंबर तक अस्पताल में रखने की बात कही है। इसी दिन उनके इलाज से संबंधित याचिकाओं पर अगली सुनवाई होनी है।

    करीब नौ महीने बाद परिवार से मुलाकात और स्वास्थ्य जांच तथा उपचार से जुड़े अदालत के निर्देश इमरान खान के मामले में महत्वपूर्ण घटनाक्रम हैं। अब उनकी अस्पताल में स्थानांतरण प्रक्रिया और 16 सितंबर को होने वाली सुनवाई पर ध्यान रहेगा। इन दोनों घटनाक्रमों से उनके स्वास्थ्य और आगे की कानूनी प्रक्रिया को लेकर स्थिति अधिक स्पष्ट होने की उम्मीद है।

  • पाकिस्तान सुप्रीम कोर्ट से इमरान खान को बड़ी राहत, मेडिकल जांच के लिए दो दिन में अस्पताल शिफ्ट करने का आदेशपरिवार की हर सप्ताह मुलाकात होगी

    पाकिस्तान सुप्रीम कोर्ट से इमरान खान को बड़ी राहत, मेडिकल जांच के लिए दो दिन में अस्पताल शिफ्ट करने का आदेशपरिवार की हर सप्ताह मुलाकात होगी

    नई दिल्ली । पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान को लंबे समय बाद सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत मिली है। जेल में बंद इमरान खान के स्वास्थ्य से जुड़ी याचिका पर सुनवाई करते हुए अदालत ने उन्हें मेडिकल जांच के लिए अस्पताल ले जाने का निर्देश दिया है। अदालत ने संबंधित अधिकारियों को आदेश दिया है कि उन्हें दो दिन के भीतर इस्लामाबाद स्थित शिफा इंटरनेशनल अस्पताल में जांच के लिए ले जाया जाए।

    सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में इमरान खान के परिवार के सदस्यों से मुलाकात की व्यवस्था को लेकर भी स्पष्ट निर्देश दिए हैं। अदालत ने कहा कि जेल में बंद पूर्व प्रधानमंत्री के परिवार के सदस्यों को उनसे प्रत्येक सप्ताह मुलाकात करने की सुविधा उपलब्ध कराई जानी चाहिए। इस व्यवस्था को सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी संबंधित अधिकारियों की होगी।

    मामले की सुनवाई तीन न्यायाधीशों की पीठ ने की। पीठ की अध्यक्षता जस्टिस शाहिद वाहिद ने की, जबकि जस्टिस नईम अख्तर अफगान और जस्टिस इश्तियाक इब्राहिम भी इसमें शामिल थे। इमरान खान के स्वास्थ्य और मेडिकल जांच से जुड़े मामले में दायर याचिका पर विस्तार से सुनवाई के बाद अदालत ने ये निर्देश जारी किए।

    अदालत ने संबंधित अधिकारियों से इमरान खान की स्वास्थ्य स्थिति को ध्यान में रखते हुए आवश्यक मेडिकल जांच कराने को कहा है। अस्पताल में उनकी जांच कराने का उद्देश्य उनके स्वास्थ्य से जुड़ी स्थिति का चिकित्सकीय आकलन करना है। सुप्रीम कोर्ट ने इसके साथ परिवार से नियमित संपर्क के अधिकार को लेकर भी स्पष्ट व्यवस्था करने का निर्देश दिया है।

    इससे पहले रावलपिंडी की अदियाला जेल के अधिकारियों ने अदालत को इमरान खान की आंखों की स्थिति के बारे में जानकारी दी थी। जेल अधिकारियों के मुताबिक उनकी आंखों की रोशनी अब लगभग सामान्य हो गई है और पहले की तुलना में उनकी स्थिति में सुधार हुआ है। इसके बावजूद सुप्रीम कोर्ट ने मेडिकल जांच के लिए अस्पताल ले जाने का निर्देश दिया है।

    इमरान खान अगस्त 2023 से जेल में बंद हैं। उन्हें पांच अगस्त 2023 को तोशाखाना मामले में गिरफ्तार किया गया था। इस मामले में उन पर प्रधानमंत्री पद पर रहते हुए विदेशी मेहमानों से मिले महंगे उपहारों का कथित तौर पर गलत तरीके से निपटान करने और उनसे संबंधित जानकारी छिपाने के आरोप लगे थे।

    इमरान खान की जेल में लंबी अवधि के दौरान उनके स्वास्थ्य और परिवार से मुलाकात का मुद्दा लगातार चर्चा में रहा है। उनके समर्थक और परिवार समय समय पर उनके स्वास्थ्य तथा जेल में उपलब्ध सुविधाओं को लेकर सवाल उठाते रहे हैं। अब सुप्रीम कोर्ट के ताजा आदेश से उनके मेडिकल परीक्षण और परिवार से नियमित मुलाकात को लेकर स्पष्ट व्यवस्था बनने की उम्मीद है।

    अदालत के निर्देश के बाद संबंधित जेल और प्रशासनिक अधिकारियों के सामने अब इमरान खान को निर्धारित समयसीमा में अस्पताल ले जाने और उनके परिवार की साप्ताहिक मुलाकात सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी है। मेडिकल जांच के बाद उनकी स्वास्थ्य स्थिति से जुड़ी आगे की व्यवस्था चिकित्सकीय रिपोर्ट और संबंधित अधिकारियों के आकलन पर निर्भर करेगी।

    सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश इमरान खान के लिए इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि इससे उन्हें जेल से बाहर अस्पताल में विशेषज्ञ चिकित्सकीय जांच कराने का अवसर मिलेगा। साथ ही परिवार से हर सप्ताह मुलाकात की व्यवस्था उनके परिजनों के साथ नियमित संपर्क बनाए रखने में मदद करेगी। अब संबंधित अधिकारियों द्वारा अदालत के निर्देशों के पालन पर नजर रहेगी।

  • CJI सूर्यकांत ने सरकार से जांच जारी रखने वाली FIR की सूची मांगी, सभी पक्षों को कमेटी के सामने रखने होंगे अपने तर्क

    CJI सूर्यकांत ने सरकार से जांच जारी रखने वाली FIR की सूची मांगी, सभी पक्षों को कमेटी के सामने रखने होंगे अपने तर्क

    नई दिल्ली ।पेपर लीक के विरोध में दिल्ली के जंतर-मंतर सहित विभिन्न स्थानों पर हुए प्रदर्शनों के दौरान दर्ज FIR को रद्द करने की मांग पर मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई। मामले में प्रदर्शनकारियों की ओर से सभी FIR खत्म करने की मांग रखी गई, जबकि सरकार ने इसका विरोध करते हुए कुछ मामलों में जांच जारी रखने की जरूरत बताई।

    सुनवाई के दौरान भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अगुवाई वाली पीठ ने पूरे मामले के लिए हाई पावर्ड कमेटी गठित करने की बात कही। अदालत ने स्पष्ट किया कि सभी संबंधित पक्ष कमेटी के सामने अपनी बात रख सकेंगे। कमेटी मामले से जुड़े तथ्यों और विभिन्न पक्षों के तर्कों पर विचार करने के बाद अपनी रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट को सौंपेगी।

    प्रदर्शनकारियों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता वृंदा ग्रोवर ने अदालत से सभी FIR रद्द करने का आदेश देने का अनुरोध किया। उनका कहना था कि आंदोलन के दौरान दर्ज मामलों पर व्यापक स्तर पर विचार किया जाना चाहिए। वहीं सरकार की ओर से इसका विरोध किया गया और कुछ मामलों में आपराधिक पृष्ठभूमि वाले आरोपियों को राहत देने पर आपत्ति जताई गई।

    सरकार की ओर से पेश वकीलों ने कहा कि प्रत्येक मामले की परिस्थितियों को अलग-अलग देखना जरूरी है। उनका तर्क था कि यदि सभी FIR एक साथ रद्द कर दी जाती हैं तो इससे गलत संदेश जा सकता है। संसद मार्च का मुद्दा भी सुनवाई के दौरान उठाया गया और इसे कानून के दायरे में रहने की आवश्यकता से जोड़ा गया।

    इस पर मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि संविधान शांतिपूर्ण तरीके से अपनी मांग रखने का अधिकार देता है। हालांकि, अदालत ने यह भी संकेत दिया कि प्रदर्शन के दौरान कानून का उल्लंघन या गंभीर आपराधिक गतिविधि के आरोपों वाले मामलों को अलग नजरिए से देखा जा सकता है।

    सरकार की ओर से यह भी तर्क दिया गया कि सुप्रीम कोर्ट से अपनी विशेष शक्तियों का इस्तेमाल कर सभी FIR खत्म करने की मांग की जा रही है। अदालत ने सरकार की आपत्तियों और सुझावों को सुनते हुए कहा कि सभी पक्षों की बात को प्रस्तावित कमेटी के समक्ष रखा जा सकता है।

    सुनवाई के दौरान घायल पुलिसकर्मियों के परिवारों की ओर से भी अपनी बात रखने की मांग की गई। उनके पक्ष का कहना था कि FIR या अन्य मामलों में कोई निर्णय लेने से पहले प्रभावित पुलिसकर्मियों और उनके परिवारों की स्थिति पर भी विचार किया जाना चाहिए।

    मुख्य न्यायाधीश ने सरकार से उन मामलों की सूची भी मांगी जिनमें जांच आगे जारी रखना आवश्यक समझा जा रहा है। अदालत ने संकेत दिया कि प्रस्तावित कमेटी सभी मामलों को देखने के बाद यह समझने में मदद करेगी कि किन मामलों में कार्रवाई जारी रहनी चाहिए और किन मामलों में राहत पर विचार किया जा सकता है।

    कमेटी की संरचना को लेकर अदालत ने बताया कि एक पूर्व सुप्रीम कोर्ट न्यायाधीश, पूर्व पुलिस महानिदेशक और पूर्व सीबीआई निदेशक से सहमति ली गई है। इसके अलावा कमेटी में अन्य सदस्यों को शामिल करने के सुझावों पर भी विचार किया जाएगा।

    अदालत की इस पहल से अब FIR से जुड़े सभी पक्षों को अपनी स्थिति विस्तार से रखने का अवसर मिलेगा। कमेटी की रिपोर्ट के बाद सुप्रीम कोर्ट आगे की कार्रवाई पर विचार करेगा। फिलहाल अदालत ने सभी संबंधित मामलों की सूची और पक्षों की दलीलों को एक व्यापक प्रक्रिया के तहत देखने का रास्ता तैयार किया है।

  • पूर्व जज यशवंत वर्मा के खिलाफ FIR मांग पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, कहा- न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग और सस्ती लोकप्रियता

    पूर्व जज यशवंत वर्मा के खिलाफ FIR मांग पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, कहा- न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग और सस्ती लोकप्रियता


    नई दिल्ली ।
    पूर्व हाई कोर्ट जज यशवंत वर्मा के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने की मांग को लेकर दाखिल याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को सुनवाई से इनकार करते हुए उसे खारिज कर दिया। शीर्ष अदालत ने याचिका को न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग बताया और कहा कि इस तरह की याचिकाएं सस्ती लोकप्रियता हासिल करने के उद्देश्य से दाखिल की जा रही हैं। सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने याचिकाकर्ता अधिवक्ता को कड़ी टिप्पणी करते हुए मामले को आगे बढ़ाने से इनकार कर दिया।

    जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने अधिवक्ता घनश्याम उपाध्याय की ओर से दाखिल याचिका पर सुनवाई की। याचिका में मांग की गई थी कि पूर्व जज यशवंत वर्मा के खिलाफ एफआईआर दर्ज की जाए। याचिकाकर्ता का कहना था कि दिल्ली हाई कोर्ट में न्यायाधीश रहते हुए उनके आवास से कथित तौर पर बड़ी मात्रा में जली हुई नकदी बरामद हुई थी और इस मामले में पुलिस कार्रवाई होनी चाहिए।

    सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि उन्होंने पुलिस को शिकायत दी थी, लेकिन इसके बावजूद एफआईआर दर्ज नहीं की गई। उन्होंने कहा कि पूर्व न्यायाधीश अब पद पर नहीं हैं और उन्हें किसी तरह की कानूनी छूट प्राप्त नहीं है। याचिकाकर्ता का कहना था कि मामले की जांच जरूरी है और कानून के तहत कार्रवाई होनी चाहिए।

    हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया। पीठ ने कहा कि इससे पहले भी इसी तरह की एक याचिका अदालत द्वारा खारिज की जा चुकी है। जब वकील ने कहा कि पिछली याचिका तकनीकी आधार पर खारिज हुई थी क्योंकि उस समय शिकायत दर्ज नहीं की गई थी, तो अदालत ने कहा कि इस तरह की प्रक्रिया को बार-बार दोहराना उचित नहीं है।

    जस्टिस पीएस नरसिम्हा ने टिप्पणी करते हुए कहा कि याचिकाकर्ता एक अधिवक्ता हैं और उन्हें न्यायिक प्रक्रिया की गंभीरता को समझना चाहिए। अदालत ने कहा कि इस तरह की याचिकाएं न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग हैं और केवल प्रचार हासिल करने के उद्देश्य से दाखिल की जा रही हैं। इसके बाद पीठ ने याचिका को खारिज कर दिया।

    यशवंत वर्मा इससे पहले भ्रष्टाचार के आरोपों को लेकर चर्चा में आए थे। उनके खिलाफ पद से हटाने की प्रक्रिया के तहत महाभियोग की कार्रवाई शुरू की गई थी। हालांकि, उन्होंने बाद में अपने पद से इस्तीफा दे दिया था, जिसके बाद महाभियोग की प्रक्रिया प्रभावी नहीं रही। नियमों के अनुसार, संसद द्वारा हटाए जाने की प्रक्रिया से बचने के लिए संबंधित न्यायाधीश के पास इस्तीफा देने का विकल्प उपलब्ध होता है।

    मामला उस घटना से जुड़ा है, जब दिल्ली स्थित यशवंत वर्मा के आवास पर आग लगने के बाद कथित रूप से जली हुई नकदी मिलने की बात सामने आई थी। घटना के बाद इस मामले ने काफी चर्चा बटोरी थी और जांच की मांग उठी थी। हालांकि, एफआईआर दर्ज करने की मांग को लेकर दाखिल याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई से इनकार कर दिया है।

    सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद स्पष्ट हो गया है कि अदालत किसी भी मामले में केवल आरोपों के आधार पर न्यायिक प्रक्रिया के इस्तेमाल को मंजूरी नहीं देगी। शीर्ष अदालत ने अपने रुख से यह संदेश दिया है कि न्यायिक व्यवस्था में दाखिल होने वाली याचिकाएं ठोस आधार और वास्तविक कानूनी जरूरतों पर आधारित होनी चाहिए।

  • महुआ मोइत्रा को सुप्रीम कोर्ट से झटका, वर्चुअल पेशी की मांग खारिज, सांसद होने पर अलग सुविधा देने से कोर्ट का इनकार

    महुआ मोइत्रा को सुप्रीम कोर्ट से झटका, वर्चुअल पेशी की मांग खारिज, सांसद होने पर अलग सुविधा देने से कोर्ट का इनकार

    नई दिल्ली । सुप्रीम कोर्ट ने तृणमूल कांग्रेस सांसद महुआ मोइत्रा को सोशल मीडिया पोस्ट से जुड़े आपराधिक मामले में राहत देने से इनकार कर दिया है। अदालत ने पुलिस के सामने वर्चुअल तरीके से पेश होने की उनकी मांग वाली याचिका खारिज कर दी। सुनवाई के दौरान पीठ ने स्पष्ट किया कि केवल सांसद होने के आधार पर किसी आरोपी को जांच एजेंसी के सामने व्यक्तिगत रूप से पेश होने से छूट नहीं दी जा सकती।

    जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की पीठ के सामने महुआ मोइत्रा की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने पक्ष रखा। उन्होंने अदालत को बताया कि एक फेसबुक पोस्ट के संबंध में महुआ के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की गई है और पुलिस ने उन्हें उनके संसदीय क्षेत्र के संबंधित थाने में जांच अधिकारी के सामने उपस्थित होने को कहा है। उनकी ओर से वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से पेश होने की अनुमति मांगी गई थी।

    महुआ की ओर से अदालत में सुरक्षा संबंधी चिंता भी रखी गई। उनके वकील ने कहा कि पिछली बार जब वह पुलिस के सामने पेश हुई थीं, तब उनके खिलाफ प्रदर्शन और विरोध की स्थिति बनी थी। उनका दावा था कि अंडे फेंके जाने की आशंका के कारण उन्हें व्यक्तिगत रूप से थाने पहुंचने में खतरा महसूस हो रहा है। इसी आधार पर पुलिस के सामने वर्चुअल उपस्थिति की मांग की गई थी।

    इस दलील पर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया। अदालत ने सवाल किया कि वर्चुअल पेशी की मांग क्या इसलिए की जा रही है क्योंकि महुआ मोइत्रा संसद सदस्य हैं। पीठ ने यह भी टिप्पणी की कि राजनीति में आने के बाद सार्वजनिक विरोध जैसी परिस्थितियों का सामना करना पड़ सकता है। सुनवाई के दौरान स्वतंत्रता सेनानियों का उल्लेख करते हुए अदालत ने कहा कि इस तरह की याचिकाएं केवल राजनीतिक पद के आधार पर स्वीकार नहीं की जानी चाहिए।

    सुप्रीम कोर्ट ने यह भी ध्यान दिलाया कि कलकत्ता हाई कोर्ट पहले ही महुआ मोइत्रा को जांच एजेंसी के साथ सहयोग करने का निर्देश दे चुका है। अदालत ने हाई कोर्ट के आदेश के संबंधित हिस्से का पालन करने की बात कही और स्पष्ट किया कि यदि वह जांच अधिकारी के सामने पेश नहीं होती हैं, तो इसके परिणाम उन्हें हाई कोर्ट में भुगतने पड़ सकते हैं।

    आखिरकार सुप्रीम कोर्ट ने महुआ मोइत्रा की याचिका खारिज कर दी। इसका मतलब है कि उन्हें जांच प्रक्रिया में व्यक्तिगत रूप से शामिल होकर पुलिस के निर्देशों का पालन करना होगा। अदालत ने फिलहाल उनके लिए वर्चुअल पेशी की विशेष व्यवस्था को मंजूरी नहीं दी है।

    महुआ मोइत्रा के खिलाफ यह मामला पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के बाद सोशल मीडिया पर किए गए दो वीडियो पोस्ट से जुड़ा है। एक बीजेपी नेता की शिकायत के बाद पुलिस ने उनके खिलाफ मामला दर्ज किया था। यह विवाद उस समय और बढ़ा जब उनके संसदीय क्षेत्र कृष्णानगर में एक अदालत के बाहर उनके खिलाफ प्रदर्शन की स्थिति बनी और प्रदर्शनकारियों के पास अंडे और टमाटर होने की बात सामने आई।

    इस मामले में कलकत्ता हाई कोर्ट ने पिछले महीने महुआ मोइत्रा की एफआईआर रद्द करने की मांग पर उन्हें अंतरिम सुरक्षा दी थी, लेकिन साथ ही जांच में सहयोग करने का निर्देश भी दिया था। हाई कोर्ट के आदेश के मुताबिक उन्हें 14 अगस्त को जांच अधिकारी के सामने पेश होना है। सुप्रीम कोर्ट के ताजा आदेश के बाद अब जांच में उनकी व्यक्तिगत पेशी का रास्ता साफ हो गया है।

  • संजय कपूर संपत्ति विवाद में सुलह की उम्मीद बढ़ी, सुप्रीम कोर्ट ने 2 नवंबर तक बढ़ाई मध्यस्थता अवधि

    संजय कपूर संपत्ति विवाद में सुलह की उम्मीद बढ़ी, सुप्रीम कोर्ट ने 2 नवंबर तक बढ़ाई मध्यस्थता अवधि


    नई दिल्ली ।
    दिवंगत उद्योगपति संजय कपूर की संपत्ति और आरके फैमिली ट्रस्ट से जुड़े पारिवारिक विवाद में एक महत्वपूर्ण मोड़ आया है। सुप्रीम कोर्ट ने मामले में चल रही मध्यस्थता प्रक्रिया को आगे बढ़ाने की अनुमति देते हुए इसकी अवधि 2 नवंबर तक बढ़ा दी है। अदालत ने संकेत दिया कि दोनों पक्षों के बीच बातचीत सकारात्मक दिशा में आगे बढ़ रही है और यदि यह प्रक्रिया इसी तरह जारी रही तो लंबे समय से चला आ रहा विवाद आपसी सहमति से समाप्त हो सकता है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि न्यायिक प्रक्रिया के समानांतर बातचीत के माध्यम से समाधान निकालना सभी पक्षों के हित में होगा।

    सुनवाई के दौरान अदालत ने मध्यस्थता से संबंधित रिपोर्ट का अवलोकन करने के बाद कहा कि अब तक की प्रगति संतोषजनक रही है। न्यायालय ने विश्वास व्यक्त किया कि संबंधित पक्ष समाधान के काफी करीब पहुंच चुके हैं। इसी आधार पर मध्यस्थता को अतिरिक्त समय देने का निर्णय लिया गया। साथ ही अदालत ने निर्देश दिया कि मध्यस्थ की फीस का भुगतान आरके फैमिली ट्रस्ट की ओर से किया जाएगा। यदि निर्धारित अवधि में सहमति नहीं बनती है तो सभी पक्ष कानून के अनुसार आगे की न्यायिक कार्यवाही करने के लिए स्वतंत्र होंगे।

    यह विवाद उद्योगपति संजय कपूर के निधन के बाद उनकी विशाल संपत्ति और व्यावसायिक हिस्सेदारी के अधिकारों को लेकर शुरू हुआ था। जून 2025 में उनके निधन के बाद परिवार के विभिन्न सदस्यों के बीच उत्तराधिकार और ट्रस्ट के संचालन को लेकर मतभेद सामने आए। मामले में संजय कपूर की मां रानी कपूर, पत्नी प्रिया कपूर तथा उनकी पहली पत्नी करिश्मा कपूर से हुए बच्चों समायरा और कियान कपूर के हितों और अधिकारों को लेकर भी कई कानूनी प्रश्न उठे। इसी कारण यह मामला पहले निचली अदालतों और बाद में सर्वोच्च न्यायालय तक पहुंचा।

    संजय कपूर और करिश्मा कपूर का विवाह वर्ष 2003 में हुआ था, जबकि दोनों वर्ष 2016 में अलग हो गए थे। उनके दो बच्चे हैं, जिनके भविष्य के लिए संजय कपूर ने विभिन्न आर्थिक प्रबंध किए थे। बाद में उन्होंने प्रिया कपूर से विवाह किया। उनके निधन के बाद परिवार के भीतर संपत्ति के प्रबंधन और लाभार्थियों के अधिकारों को लेकर विवाद गहराता चला गया। इसी पृष्ठभूमि में आरके फैमिली ट्रस्ट की भूमिका भी विवाद का प्रमुख कारण बनी।

    विवाद का केंद्र वर्ष 2017 में गठित आरके फैमिली ट्रस्ट है। रानी कपूर का आरोप है कि इस ट्रस्ट का गठन उनकी जानकारी और सहमति के बिना किया गया तथा परिवार की संपत्तियों को इसमें शामिल कर दिया गया। उनका कहना है कि ट्रस्ट की वैधता पर गंभीर सवाल हैं और इसे समाप्त किया जाना चाहिए। दूसरी ओर प्रिया कपूर का पक्ष है कि ट्रस्ट सभी कानूनी प्रक्रियाओं का पालन करते हुए स्थापित किया गया था तथा इसका उद्देश्य लाभार्थियों के हितों की रक्षा करना है। उनका यह भी कहना है कि ट्रस्ट के कामकाज में अनावश्यक हस्तक्षेप से उसके संचालन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।

    दोनों पक्षों के बीच बढ़ते विवाद को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने पहले ही मध्यस्थता का रास्ता अपनाने का निर्णय लिया था। अदालत ने इस प्रक्रिया की निगरानी के लिए पूर्व मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ को मध्यस्थ नियुक्त किया था। अब मध्यस्थता की अवधि बढ़ाए जाने से यह संकेत मिला है कि अदालत कानूनी संघर्ष के बजाय सहमति आधारित समाधान को प्राथमिकता देना चाहती है। यदि आने वाले महीनों में बातचीत सफल रहती है तो यह मामला लंबी न्यायिक प्रक्रिया से बचते हुए शांतिपूर्ण तरीके से समाप्त हो सकता है।

  • नीट-यूजी के परीक्षा पैटर्न में बदलाव की तैयारी, कंप्यूटर आधारित परीक्षा और दो फेज मॉडल पर सरकार कर रही विचार

    नीट-यूजी के परीक्षा पैटर्न में बदलाव की तैयारी, कंप्यूटर आधारित परीक्षा और दो फेज मॉडल पर सरकार कर रही विचार

    नई दिल्ली । देश की सबसे बड़ी मेडिकल प्रवेश परीक्षा NEET-UG के स्वरूप में आने वाले समय में महत्वपूर्ण बदलाव देखने को मिल सकते हैं। केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में दाखिल अपने हलफनामे में बताया है कि परीक्षा को अधिक सुरक्षित, पारदर्शी और आधुनिक बनाने के लिए विभिन्न विकल्पों पर विचार किया जा रहा है। इनमें कंप्यूटर आधारित परीक्षा प्रणाली और संयुक्त प्रवेश परीक्षा (JEE) की तर्ज पर दो चरणों में परीक्षा आयोजित करने का प्रस्ताव भी शामिल है। हालांकि सरकार ने स्पष्ट किया है कि इस संबंध में अभी कोई अंतिम निर्णय नहीं लिया गया है।

    सरकार के अनुसार वर्तमान में NEET-UG पारंपरिक पेन और पेपर मोड में आयोजित की जाती है, लेकिन भविष्य में इसे कंप्यूटर आधारित परीक्षा यानी CBT मोड में कराने की संभावना पर विचार किया जा रहा है। इसके साथ ही परीक्षा को दो चरणों में आयोजित करने के विकल्प का भी अध्ययन किया जा रहा है। सरकार का मानना है कि इन बदलावों से परीक्षा प्रक्रिया को अधिक व्यवस्थित, सुरक्षित और तकनीकी रूप से मजबूत बनाया जा सकता है।

    हलफनामे में यह भी कहा गया है कि परीक्षा प्रणाली में किसी भी प्रकार का बदलाव व्यापक विचार-विमर्श और विशेषज्ञों की सिफारिशों के आधार पर ही लागू किया जाएगा। इस उद्देश्य से गठित टास्क फोर्स अपनी रिपोर्ट तैयार कर रही है। रिपोर्ट प्राप्त होने के बाद संबंधित मंत्रालयों, परीक्षा एजेंसियों और अन्य हितधारकों से चर्चा की जाएगी। इसके बाद ही किसी नए प्रारूप पर अंतिम निर्णय लिया जाएगा।

    सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को यह भी आश्वस्त किया है कि यदि परीक्षा पैटर्न में कोई बदलाव किया जाता है तो उसे अचानक लागू नहीं किया जाएगा। छात्रों को पर्याप्त समय पहले नई व्यवस्था की जानकारी उपलब्ध कराई जाएगी ताकि वे उसी के अनुरूप अपनी तैयारी कर सकें। इससे अभ्यर्थियों को नए प्रारूप को समझने और उसके अनुसार अभ्यास करने का पर्याप्त अवसर मिलेगा।

    परीक्षा की सुरक्षा को और मजबूत बनाने के लिए भी कई उपायों पर विचार किया जा रहा है। इनमें बायोमेट्रिक सत्यापन, सुरक्षित प्रश्नपत्र वितरण प्रणाली, डिजिटल निगरानी और अन्य तकनीकी सुरक्षा उपाय शामिल हो सकते हैं। हाल के वर्षों में परीक्षा प्रक्रिया को लेकर उठे विभिन्न प्रश्नों और पारदर्शिता संबंधी चिंताओं को देखते हुए सरकार परीक्षा संचालन को अधिक विश्वसनीय बनाने की दिशा में काम कर रही है।

    शिक्षा क्षेत्र के विशेषज्ञों का मानना है कि यदि भविष्य में कंप्यूटर आधारित परीक्षा और बहु-चरणीय प्रणाली लागू होती है तो इससे परीक्षा संचालन अधिक सुव्यवस्थित हो सकता है। हालांकि इसके लिए देशभर में तकनीकी ढांचे, परीक्षा केंद्रों की क्षमता और सभी अभ्यर्थियों के लिए समान अवसर सुनिश्चित करना भी आवश्यक होगा। फिलहाल सरकार ने स्पष्ट किया है कि सभी पहलुओं पर विचार करने और आवश्यक तैयारियां पूरी होने के बाद ही अंतिम निर्णय लिया जाएगा।