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  • रथ यात्रा के बीच नहीं होगी 'महाप्रभु जगन्नाथ' की रिलीज, सुप्रीम कोर्ट ने कहा- धार्मिक संवेदनशीलता को देखते हुए इंतजार जरूरी

    रथ यात्रा के बीच नहीं होगी 'महाप्रभु जगन्नाथ' की रिलीज, सुप्रीम कोर्ट ने कहा- धार्मिक संवेदनशीलता को देखते हुए इंतजार जरूरी

    नई दिल्ली ।भगवान जगन्नाथ के जीवन और उनसे जुड़ी धार्मिक परंपराओं पर आधारित एनिमेटेड फिल्म ‘महाप्रभु जगन्नाथ’ की रिलीज को लेकर जारी विवाद के बीच सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल फिल्म को तत्काल सिनेमाघरों में प्रदर्शित करने की अनुमति देने से इनकार कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि पुरी में चल रही भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा समाप्त होने के बाद ही फिल्म की रिलीज पर आगे विचार किया जा सकता है। इस फैसले के बाद फिल्म की निर्धारित रिलीज फिलहाल टल गई है।

    फिल्म के निर्माताओं ने ओडिशा हाईकोर्ट के उस अंतरिम आदेश को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था, जिसमें फिल्म की देशभर में रिलीज पर रोक लगाई गई थी। निर्माता पक्ष का कहना था कि फिल्म पूरी तरह तैयार है, सिनेमाघरों की बुकिंग हो चुकी है और इसे केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड से आवश्यक प्रमाणन भी प्राप्त हो चुका है। उनका तर्क था कि तय समय पर रिलीज न होने से आर्थिक नुकसान होने की आशंका है।

    सुनवाई के दौरान निर्माता पक्ष ने अदालत को बताया कि यह एक एनिमेटेड फिल्म है, जिसे विशेष रूप से बच्चों और नई पीढ़ी को भगवान जगन्नाथ की परंपराओं, संस्कृति और धार्मिक विरासत से परिचित कराने के उद्देश्य से तैयार किया गया है। उनका कहना था कि जिस प्रकार विभिन्न धार्मिक और पौराणिक विषयों पर पहले भी एनिमेशन फिल्में बनाई जाती रही हैं, उसी प्रकार यह फिल्म भी सांस्कृतिक और शैक्षणिक दृष्टि से तैयार की गई है।

    हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने तत्काल राहत देने से इनकार करते हुए कहा कि वर्तमान में भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा जारी है और इस दौरान धार्मिक भावनाओं से जुड़े विवादों को गंभीरता से देखा जाना चाहिए। अदालत ने संकेत दिया कि रथ यात्रा पूरी होने के बाद फिल्म की रिलीज पर आगे की प्रक्रिया अपनाई जा सकती है। न्यायालय के इस रुख के बाद फिलहाल फिल्म के प्रदर्शन पर लगी रोक प्रभावी बनी हुई है।

    फिल्म को लेकर विवाद की शुरुआत उसके टीजर जारी होने के बाद हुई थी। टीजर सामने आने के बाद कुछ धार्मिक संगठनों और श्रद्धालुओं ने आरोप लगाया कि फिल्म में भगवान जगन्नाथ के स्वरूप और उनसे जुड़ी कुछ परंपराओं को धार्मिक मान्यताओं के अनुरूप प्रस्तुत नहीं किया गया है। इसी आधार पर फिल्म के कुछ दृश्यों और संवादों पर आपत्ति दर्ज कराई गई।

    बाद में इस मामले में ओडिशा हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर की गई, जिसमें फिल्म की रिलीज पर रोक लगाने की मांग की गई। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि यदि विवादित अंशों के साथ फिल्म प्रदर्शित की गई तो इससे श्रद्धालुओं की धार्मिक भावनाएं प्रभावित हो सकती हैं। सुनवाई के बाद हाईकोर्ट ने अंतरिम आदेश जारी करते हुए फिल्म की रिलीज पर रोक लगा दी थी।

    विवाद के बीच फिल्म की विशेष स्क्रीनिंग पुरी के गजपति महाराजा और श्री जगन्नाथ मंदिर प्रशासन के प्रतिनिधियों के समक्ष भी कराई गई। बताया गया कि इस दौरान फिल्म में कुछ आवश्यक बदलावों को लेकर सुझाव दिए गए थे। हालांकि, याचिकाकर्ताओं का आरोप था कि सभी आवश्यक संशोधन किए बिना ही फिल्म को रिलीज करने की तैयारी की जा रही थी।

    सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसले के बाद अब फिल्म के निर्माता रथ यात्रा समाप्त होने के बाद आगे की कानूनी प्रक्रिया और संशोधनों के आधार पर अगला कदम उठाएंगे। फिलहाल फिल्म की रिलीज स्थगित रहने से यह मामला धार्मिक आस्था, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सांस्कृतिक प्रस्तुति के बीच संतुलन को लेकर चर्चा का विषय बना हुआ है।

  • सुप्रीम कोर्ट के कोर्ट रूम में हंगामा और मुख्य न्यायाधीश से अभद्रता करने वाले लॉ के दो छात्र गिरफ्तार, दिल्ली पुलिस ने दर्ज की प्राथमिकी

    सुप्रीम कोर्ट के कोर्ट रूम में हंगामा और मुख्य न्यायाधीश से अभद्रता करने वाले लॉ के दो छात्र गिरफ्तार, दिल्ली पुलिस ने दर्ज की प्राथमिकी

    नई दिल्ली । देश की सर्वोच्च अदालत के भीतर एक बेहद चौंकाने वाली घटना में न्यायिक कार्यवाही को बाधित करने, फाइलों को हवा में उछालने और देश के मुख्य न्यायाधीश के प्रति अत्यंत अभद्र व असंसदीय भाषा का प्रयोग करने वाले कानून के दो छात्रों को दिल्ली पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है। सुरक्षाकर्मियों के साथ हाथापाई और सरकारी काम में बाधा डालने के आरोप में इन छात्रों के खिलाफ राष्ट्रीय राजधानी के तिलक मार्ग थाने में एक आपराधिक प्राथमिकी दर्ज की गई है। पुलिस ने मामले की गंभीरता को देखते हुए दोनों आरोपियों को हिरासत में लेकर आगे की वैधानिक कानूनी कार्रवाई शुरू कर दी है।

    सुरक्षा अधिकारियों द्वारा दी गई आधिकारिक जानकारी के अनुसार, गिरफ्तार किए गए दोनों आरोपियों की पहचान लखनऊ विश्वविद्यालय में विधि संकाय के छात्रों के रूप में की गई है। इनमें से एक आरोपी का नाम प्रबल प्रताप सिंह है, जो कानून के तीसरे वर्ष का छात्र है और मूल रूप से उत्तर प्रदेश के इटावा का निवासी है। वहीं, दूसरे आरोपी की पहचान चंद्र भान के रूप में हुई है, जो इसी विश्वविद्यालय में विधि द्वितीय वर्ष का छात्र है। दिल्ली पुलिस ने बताया कि यह पूरी कानूनी कार्रवाई सुप्रीम कोर्ट परिसर की सुरक्षा में तैनात सुरक्षा स्टाफ के लिखित बयान और शिकायत के आधार पर अमल में लाई गई है।

    यह अभूतपूर्व घटना सुप्रीम कोर्ट के कोर्ट नंबर 13 के भीतर घटित हुई, जब अदालत में एक विशेष अनुमति याचिका पर नियमित सुनवाई चल रही थी। अदालत के आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार, इस याचिका का शीर्षक ‘प्रबल प्रताप व अन्य बनाम उत्तर प्रदेश सरकार’ था। इस संवेदनशील मामले की सुनवाई के दौरान मुख्य आरोपी प्रबल प्रताप सिंह किसी अधिवक्ता के माध्यम से पेश होने के बजाय खुद ही याचिकाकर्ता-इन-पर्सन के रूप में न्यायाधीशों के समक्ष उपस्थित होकर अपनी दलीलें रख रहा था।

    दर्ज की गई प्राथमिकी के विवरण के मुताबिक, न्यायिक कार्यवाही के दौरान दलीलें खारिज होने या किसी अन्य कारण से आरोपी प्रबल प्रताप सिंह अचानक उग्र हो गया और उसने पूरी तरह से सोची-समझी रणनीति के तहत अदालत की गरिमा को ठेस पहुंचाना शुरू कर दिया। उसने जजों के सामने बेहद अमर्यादित, अपमानजनक और आपत्तिजनक भाषा का इस्तेमाल किया। अपना आपा खोते हुए उसने कोर्ट रूम के भीतर मौजूद महत्वपूर्ण अदालती कागजात और कानूनी फाइलों को हवा में उछाल दिया, जिससे वे पूरे कोर्ट रूम में बिखर गईं। इस हिंसक आचरण से अदालत कक्ष के भीतर पूरी तरह से अव्यवस्था और अशांति का माहौल पैदा हो गया।

    घटना के वक्त कोर्ट रूम में मौजूद प्रत्यक्षदर्शियों और सुरक्षाकर्मियों के अनुसार, आरोपी छात्र यहीं नहीं रुका, बल्कि उसने देश के मुख्य न्यायाधीश के प्रति भी सीधे तौर पर अमर्यादित शब्दों और गालियों का प्रयोग किया। जब कोर्ट रूम की सुरक्षा में तैनात ऑन-ड्यूटी सुरक्षाकर्मियों और प्रशासनिक स्टाफ ने कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए उसे पकड़ने तथा शांत करने का प्रयास किया, तो दोनों आरोपी छात्र और अधिक हिंसक हो गए। उन्होंने सुरक्षा स्टाफ के साथ धक्का-मुक्की और हाथापाई शुरू कर दी, जिससे ऑन-ड्यूटी कर्मचारियों को अपने आधिकारिक कर्तव्यों का निर्वहन करने में गंभीर बाधा का सामना करना पड़ा।

    न्यायालय परिसर के भीतर इस प्रकार के अप्रत्याशित हंगामे को देखते हुए अतिरिक्त सुरक्षा बल को तुरंत मौके पर बुलाया गया, जिन्होंने कड़ी मशक्कत के बाद दोनों उपद्रवी छात्रों को काबू में किया। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट प्रशासन की लिखित शिकायत पर तिलक मार्ग थाना पुलिस ने विभिन्न गंभीर धाराओं के तहत मामला दर्ज कर दोनों को विधिवत गिरफ्तार कर लिया। इस घटना ने देश की सबसे बड़ी अदालत की सुरक्षा व्यवस्था और कोर्ट रूम के भीतर वकीलों व याचिकाकर्ताओं के आचरण को लेकर एक नई बहस छेड़ दी है, जिस पर आने वाले दिनों में और सख्त रुख अपनाए जाने की संभावना है।

  • क्या अंग्रेजी को माना जा सकता है भारतीय भाषा? सीबीएसई की त्रिभाषा नीति पर अंतरिम रोक लगाने से सुप्रीम कोर्ट का साफ इनकार

    क्या अंग्रेजी को माना जा सकता है भारतीय भाषा? सीबीएसई की त्रिभाषा नीति पर अंतरिम रोक लगाने से सुप्रीम कोर्ट का साफ इनकार

    नई दिल्ली । देश की सर्वोच्च अदालत ने केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड द्वारा आगामी शैक्षणिक सत्र 2026-27 से लागू की जा रही तीन-भाषा नीति पर अंतरिम रोक लगाने से साफ इनकार कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले पर महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि किसी भी नई भाषा को सीखना कभी भी व्यर्थ नहीं जाता है। शीर्ष अदालत ने इसके साथ ही एक बड़ा संवैधानिक और व्यावहारिक सवाल भी उठाया कि क्या अंग्रेजी को एक भारतीय भाषा के रूप में स्वीकार किया जा सकता है। इस नीति के खिलाफ याचिकाकर्ताओं ने दलील दी थी कि नए नियमों के तहत अंग्रेजी को गैर-मूल भाषा की श्रेणी में रखा गया है, जिससे छात्रों के सामने भाषाई चयन का संकट खड़ा हो गया है।

    मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और वी. मोहना की पीठ ने इस मामले में दायर नई याचिकाओं पर केंद्र सरकार और सीबीएसई को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। अदालत ने इस मामले की विस्तृत सुनवाई के लिए आगामी 22 जुलाई की तारीख तय की है। केंद्र सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ने इस विषय पर अपना आधिकारिक पक्ष रखने के लिए दस दिनों का समय मांगा है। अदालत ने स्पष्ट किया कि यह नीति हिंदी और अन्य क्षेत्रीय भारतीय भाषाओं को बढ़ावा देने के संवैधानिक उद्देश्यों को आगे बढ़ाती है, हालांकि स्थानीय भाषाओं की परिभाषा और उनके वर्गीकरण पर नए सिरे से विचार करने की आवश्यकता हो सकती है।

    याचिकाकर्ताओं की ओर से अदालत में दलील दी गई कि सीबीएसई का यह सर्कुलर बिना उचित कानूनी अधिकार के जारी किया गया है, जो छात्रों पर जबरन भाषा थोपने जैसा है। नई नीति के अनुसार, कक्षा नौ के छात्रों के लिए तीन भाषाओं का अध्ययन अनिवार्य किया गया है, जिनमें से कम से कम दो भाषाएं भारत की मूल भाषाएं होनी चाहिए। इसका सीधा असर उन छात्रों पर पड़ेगा जो कक्षा पांच से निरंतर एक निश्चित भाषाई पैटर्न का पालन कर रहे हैं। वकीलों ने चिंता जताई कि यदि कोई छात्र संस्कृत के स्थान पर पंजाबी या कोई अन्य क्षेत्रीय भाषा चुनना चाहता है, तो स्कूलों के पास न तो पर्याप्त योग्य शिक्षक उपलब्ध हैं और न ही आवश्यक पाठ्यपुस्तकें।

    अदालत को यह भी अवगत कराया गया कि भले ही बोर्ड ने छात्रों को संविधान की 22 आधिकारिक भाषाओं में से चयन करने का विकल्प दिया है, लेकिन देश के सभी स्कूलों के लिए इतने बड़े पैमाने पर भाषाई शिक्षकों की नियुक्ति करना और आवश्यक इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार करना व्यावहारिक रूप से असंभव है। इसके अतिरिक्त, नेशनल काउंसिल ऑफ एजुकेशनल रिसर्च एंड ट्रेनिंग की वेबसाइट पर निर्धारित समय सीमा के बाद भी केवल तीन भाषाओं की ही पुस्तकें उपलब्ध कराई जा सकी हैं, जिससे छात्रों की पढ़ाई बाधित होने की पूरी आशंका बनी हुई है।

    राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के तहत तैयार की गई इस त्रिभाषा नीति का मुख्य उद्देश्य स्कूली स्तर पर बच्चों को बहुभाषी बनाना और राष्ट्रीय एकता को सुदृढ़ करना है। ऐतिहासिक रूप से इस फॉर्मूले को पहली बार वर्ष 1964-66 में शिक्षा आयोग द्वारा प्रस्तुत किया गया था, जिसे बाद में राष्ट्रीय शिक्षा नीति में शामिल किया गया। नई व्यवस्था के तहत भाषाई चुनाव की प्रक्रिया को इस तरह तैयार किया गया है कि यदि कोई छात्र पहली दो भाषाओं के रूप में हिंदी और तमिल पढ़ रहा है, तो उसे तीसरी भाषा के रूप में एक और भारतीय भाषा या फिर अंग्रेजी अथवा किसी अन्य विदेशी भाषा का चयन करना होगा।

    प्रशासनिक स्पष्टीकरण के अनुसार, यह नई त्रिभाषा व्यवस्था शैक्षणिक सत्र 2026-27 में केवल नौवीं कक्षा के छात्रों पर ही पूरी तरह लागू होगी। वर्तमान में दसवीं कक्षा में पढ़ रहे छात्र पुरानी द्विभाषी व्यवस्था के तहत ही अपनी बोर्ड परीक्षाएं देंगे। नए नियमों के मुताबिक, यदि कोई छात्र अंग्रेजी विषय का चयन करता है, तो वह अन्य किसी विदेशी भाषा जैसे कोरियन, जापानी, फ्रेंच या जर्मन का चुनाव नहीं कर सकेगा। बोर्ड ने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि स्कूल असेसमेंट के दौरान तीसरी भाषा में उत्तीर्ण हुए बिना छात्रों को दसवीं कक्षा का उत्तीर्ण प्रमाण पत्र जारी नहीं किया जाएगा।

  • सुप्रीम कोर्ट ने खारिज की रेनोवेशन के खिलाफ याचिका, 'मन्नत' में प्रस्तावित बदलावों को मिली कानूनी मंजूरी; नियमों के तहत निर्माण पर लगी मुहर

    सुप्रीम कोर्ट ने खारिज की रेनोवेशन के खिलाफ याचिका, 'मन्नत' में प्रस्तावित बदलावों को मिली कानूनी मंजूरी; नियमों के तहत निर्माण पर लगी मुहर

    नई दिल्ली । बॉलीवुड अभिनेता शाहरुख खान और उनकी पत्नी गौरी खान को उनके मुंबई स्थित प्रतिष्ठित बंगले ‘मन्नत’ के रेनोवेशन मामले में महत्वपूर्ण कानूनी राहत मिली है। सुप्रीम कोर्ट ने उस याचिका को खारिज कर दिया है जिसमें बंगले के प्रस्तावित पुनर्विकास और अतिरिक्त निर्माण को चुनौती दी गई थी। शीर्ष अदालत के इस फैसले के बाद अब रेनोवेशन योजना के तहत प्रस्तावित बदलावों और दो नई मंजिलों के निर्माण का मार्ग पूरी तरह साफ हो गया है। यह फैसला लंबे समय से चल रही कानूनी प्रक्रिया का महत्वपूर्ण पड़ाव माना जा रहा है।

    मामला मुंबई के बांद्रा स्थित शाहरुख खान के बंगले ‘मन्नत’ में प्रस्तावित निर्माण से जुड़ा था। योजना के अनुसार इमारत में सातवीं और आठवीं मंजिल जोड़ने का प्रस्ताव रखा गया था। इसके लिए संबंधित वैधानिक प्राधिकरण से आवश्यक अनुमति भी प्राप्त की गई थी। हालांकि, इस मंजूरी को चुनौती देते हुए एक याचिका दायर की गई थी, जिसमें निर्माण को तटीय क्षेत्र से जुड़े नियमों के विरुद्ध बताया गया था। याचिकाकर्ता का तर्क था कि प्रस्तावित निर्माण पर्यावरणीय मानकों और नियामकीय प्रक्रियाओं के अनुरूप नहीं है।

    इससे पहले यह विवाद राष्ट्रीय हरित अधिकरण तक भी पहुंचा था। वहां याचिका पर विस्तृत सुनवाई के बाद अधिकरण ने संबंधित प्राधिकरणों द्वारा दी गई अनुमति को वैध मानते हुए चुनौती को खारिज कर दिया था। इसके बाद इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की गई, जहां मामले की दोबारा सुनवाई हुई। शीर्ष अदालत ने उपलब्ध रिकॉर्ड, अनुमति प्रक्रिया और संबंधित नियमों का परीक्षण करने के बाद हस्तक्षेप से इनकार कर दिया।

    सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने स्पष्ट किया कि जब सक्षम प्राधिकरण निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के तहत अनुमति दे चुके हैं और रिकॉर्ड में किसी स्पष्ट कानूनी त्रुटि का आधार नहीं है, तब न्यायालय के हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं बनती। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति की लोकप्रियता या सार्वजनिक पहचान न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित नहीं करती। न्यायालय का निर्णय केवल उपलब्ध तथ्यों, कानून और नियमों के आधार पर लिया गया है।

    इस फैसले के साथ अब ‘मन्नत’ के रेनोवेशन की प्रक्रिया आगे बढ़ सकेगी। प्रस्तावित बदलावों का उद्देश्य भवन की संरचना और उपयोगिता को आधुनिक आवश्यकताओं के अनुरूप विकसित करना बताया गया है। आवश्यक अनुमतियों के अनुरूप निर्माण कार्य किए जाने की संभावना है। हालांकि, संबंधित सभी गतिविधियां निर्धारित नियमों और स्वीकृत शर्तों के अनुसार ही पूरी की जाएंगी।

    मुंबई के प्रमुख स्थलों में शामिल ‘मन्नत’ केवल एक निजी आवास नहीं, बल्कि शाहरुख खान के प्रशंसकों के लिए भी विशेष आकर्षण का केंद्र है। अभिनेता के जन्मदिन सहित कई अवसरों पर देश और विदेश से बड़ी संख्या में प्रशंसक उनके निवास के बाहर पहुंचते हैं। वर्षों से यह बंगला मुंबई के सबसे चर्चित और पहचान वाले स्थलों में शामिल रहा है और फिल्म प्रेमियों के बीच इसकी अलग पहचान बनी हुई है।

    इस बीच शाहरुख खान अपने आगामी फिल्मी प्रोजेक्ट्स को लेकर भी चर्चा में हैं। अभिनेता जल्द ही निर्देशक सिद्धार्थ आनंद की फिल्म ‘किंग’ में नजर आएंगे। ऐसे समय में ‘मन्नत’ से जुड़े मामले में मिला यह कानूनी फैसला उनके लिए बड़ी राहत माना जा रहा है। अदालत के निर्णय के बाद अब रेनोवेशन परियोजना को लेकर बनी अनिश्चितता समाप्त हो गई है और निर्धारित योजना के अनुरूप आगे की प्रक्रिया पूरी किए जाने का मार्ग प्रशस्त हो गया है।

  • सोनम रघुवंशी की जमानत पर बढ़ा इंतजार, मेघालय सरकार की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में अगली सुनवाई 21 जुलाई को

    सोनम रघुवंशी की जमानत पर बढ़ा इंतजार, मेघालय सरकार की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में अगली सुनवाई 21 जुलाई को

    इंदौर के चर्चित राजा रघुवंशी हत्याकांड में एक बार फिर कानूनी प्रक्रिया आगे बढ़ने से पहले इंतजार बढ़ गया है। सोनम रघुवंशी को मिली जमानत के खिलाफ मेघालय सरकार द्वारा दायर याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में प्रस्तावित सुनवाई फिलहाल टल गई है। अब इस मामले की अगली सुनवाई 21 जुलाई को होगी। इस कारण मामले से जुड़े सभी पक्षों की निगाहें अब अगली निर्धारित तारीख पर टिक गई हैं।

    मेघालय सरकार ने अपनी याचिका में मेघालय हाईकोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी है, जिसके तहत सोनम रघुवंशी को जमानत प्रदान की गई थी। सरकार का पक्ष है कि मामले की गंभीरता और जांच से जुड़े तथ्यों को देखते हुए जमानत आदेश पर पुनर्विचार किया जाना आवश्यक है। इसी आधार पर सुप्रीम कोर्ट से जमानत रद्द करने की मांग की गई है।

    सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की सुनवाई पहले भी कई बार सूचीबद्ध हो चुकी है, लेकिन विभिन्न कारणों से अंतिम निर्णय नहीं हो सका। अब सुनवाई आगे बढ़ने के बाद 21 जुलाई की तारीख तय की गई है। इस बीच, हाईकोर्ट द्वारा दी गई जमानत से संबंधित कानूनी स्थिति यथावत बनी हुई है। अंतिम निर्णय सुप्रीम कोर्ट की आगामी सुनवाई के बाद ही सामने आएगा।

    राजा रघुवंशी हत्याकांड देशभर में उस समय चर्चा का विषय बना था, जब इंदौर निवासी राजा रघुवंशी की शादी के कुछ समय बाद मेघालय यात्रा के दौरान संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई थी। बाद में उनका शव बरामद हुआ और जांच एजेंसियों ने इसे सुनियोजित हत्या का मामला बताया। जांच के दौरान पुलिस ने उनकी पत्नी सोनम रघुवंशी सहित कई अन्य लोगों को आरोपी बनाया और विभिन्न आपराधिक धाराओं के तहत मामला दर्ज किया।

    जांच एजेंसियों के अनुसार, मामले में हत्या और आपराधिक साजिश सहित कई गंभीर आरोप लगाए गए हैं। जांच पूरी होने के बाद आरोपियों के खिलाफ न्यायालय में आरोपपत्र भी प्रस्तुत किया गया। इसी दौरान सोनम रघुवंशी ने जमानत के लिए आवेदन किया था, जिसे मेघालय हाईकोर्ट ने स्वीकार कर लिया। इसके बाद राज्य सरकार ने इस आदेश को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी।

    मामले में लगातार हो रही न्यायिक कार्यवाही पर पीड़ित परिवार की भी नजर बनी हुई है। परिवार का कहना है कि उन्हें न्यायिक प्रक्रिया पर भरोसा है और वे चाहते हैं कि सभी तथ्यों के आधार पर उचित निर्णय लिया जाए। दूसरी ओर, कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट की आगामी सुनवाई इस मामले की आगे की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण साबित हो सकती है।

    फिलहाल इस चर्चित मामले में अंतिम निर्णय आना बाकी है। 21 जुलाई को होने वाली अगली सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट मेघालय सरकार की याचिका पर दोनों पक्षों की दलीलें सुन सकता है। इसके बाद ही यह स्पष्ट होगा कि हाईकोर्ट द्वारा दी गई जमानत बरकरार रहेगी या उस पर कोई नया आदेश जारी किया जाएगा। तब तक मामले की न्यायिक प्रक्रिया पूर्व निर्धारित कानूनी व्यवस्था के अनुसार जारी रहेगी।

  • भोजशाला विवाद पर सुप्रीम कोर्ट की अहम पहल, मध्य प्रदेश सरकार को अंतरिम व्यवस्था बनाने का निर्देश, सभी पक्षों के अधिकारों के संतुलन पर जोर

    भोजशाला विवाद पर सुप्रीम कोर्ट की अहम पहल, मध्य प्रदेश सरकार को अंतरिम व्यवस्था बनाने का निर्देश, सभी पक्षों के अधिकारों के संतुलन पर जोर

    नई दिल्ली । मध्य प्रदेश के धार स्थित भोजशाला परिसर से जुड़े लंबे समय से चल रहे विवाद में सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण अंतरिम निर्देश जारी किए हैं। अदालत ने राज्य सरकार से ऐसी व्यवस्था सुनिश्चित करने को कहा है, जिससे अंतिम निर्णय आने तक किसी भी पक्ष को असुविधा न हो और धार्मिक गतिविधियां शांतिपूर्ण ढंग से संचालित हो सकें। अदालत ने स्पष्ट किया कि यह व्यवस्था केवल अंतरिम प्रकृति की होगी और इससे किसी भी पक्ष के कानूनी अधिकारों या दावों पर कोई अंतिम प्रभाव नहीं पड़ेगा।

    सुनवाई के दौरान सर्वोच्च अदालत ने कहा कि संवेदनशील मामलों में शांति, सामाजिक सौहार्द और कानून-व्यवस्था बनाए रखना सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए। इसी उद्देश्य से राज्य सरकार को निर्देश दिया गया कि वह ऐसी व्यावहारिक व्यवस्था तैयार करे, जिससे सभी संबंधित पक्षों की आवश्यकताओं का संतुलित समाधान हो सके। अदालत ने यह भी कहा कि अंतरिम व्यवस्था को अंतिम निर्णय के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

    भोजशाला परिसर को लेकर लंबे समय से दोनों पक्षों के अलग-अलग दावे हैं। एक पक्ष इसे मां सरस्वती का प्राचीन मंदिर मानता है, जबकि दूसरा पक्ष इसे कमाल मौला मस्जिद के रूप में मान्यता देने की मांग करता है। इसी विवाद से संबंधित विभिन्न याचिकाओं पर न्यायिक प्रक्रिया जारी है और मामला अभी अंतिम निर्णय की प्रतीक्षा में है।

    सुनवाई के दौरान मुस्लिम पक्ष की ओर से यह दलील दी गई कि पूर्व की व्यवस्था में बदलाव के कारण धार्मिक गतिविधियों पर प्रभाव पड़ा है। वहीं दूसरे पक्ष ने अपने ऐतिहासिक और धार्मिक दावों को दोहराते हुए संबंधित दस्तावेजों और तथ्यों के आधार पर अपना पक्ष अदालत के समक्ष रखा। दोनों पक्षों ने विस्तृत कानूनी तर्क प्रस्तुत किए, जिन पर अदालत ने गंभीरता से विचार किया।

    कार्यवाही के दौरान सर्वोच्च अदालत ने सभी पक्षों के वरिष्ठ अधिवक्ताओं को भी संयम बरतने की सलाह दी। अदालत ने कहा कि यह अत्यंत संवेदनशील विषय है और बहस के दौरान प्रयुक्त भाषा तथा शब्दों का चयन अत्यधिक सावधानी के साथ किया जाना चाहिए, ताकि किसी भी प्रकार की अनावश्यक विवाद की स्थिति उत्पन्न न हो।

    अदालत ने संकेत दिया कि इस मामले की अंतिम सुनवाई विस्तृत रूप से की जाएगी। इसके लिए दोनों पक्षों के वरिष्ठ अधिवक्ताओं की उपलब्धता को ध्यान में रखते हुए उपयुक्त तिथि निर्धारित की जाएगी। आवश्यकता पड़ने पर पूरे दिन सुनवाई कर सभी पक्षों के तर्कों और उपलब्ध साक्ष्यों पर विस्तार से विचार किया जाएगा।

    इस बीच मध्य प्रदेश सरकार पर अंतरिम व्यवस्था को प्रभावी ढंग से लागू करने की जिम्मेदारी रहेगी। अदालत का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि अंतिम न्यायिक निर्णय आने तक परिसर में शांति, कानून-व्यवस्था और सामाजिक सौहार्द बना रहे तथा किसी भी समुदाय के अधिकारों पर अनावश्यक प्रभाव न पड़े।

    भोजशाला विवाद देश के प्रमुख धार्मिक और ऐतिहासिक मामलों में शामिल रहा है। सर्वोच्च अदालत के ताजा निर्देशों के बाद अब सभी की निगाहें राज्य सरकार द्वारा बनाई जाने वाली अंतरिम व्यवस्था और आगामी विस्तृत सुनवाई पर टिकी हैं। अंतिम फैसला आने तक न्यायिक प्रक्रिया के अनुसार सभी पक्षों के दावों और अधिकारों पर विधिक परीक्षण जारी रहेगा।

  • अयोध्या राम मंदिर चढ़ावा प्रकरण पर सुप्रीम कोर्ट सख्त कोर्ट की निगरानी में जांच की मांग पर ट्रस्ट और सरकारों को नोटिस

    अयोध्या राम मंदिर चढ़ावा प्रकरण पर सुप्रीम कोर्ट सख्त कोर्ट की निगरानी में जांच की मांग पर ट्रस्ट और सरकारों को नोटिस


    नई दिल्ली । अयोध्या स्थित श्री राम जन्मभूमि मंदिर में श्रद्धालुओं के दान और चढ़ावे के कथित दुरुपयोग से जुड़े मामले ने अब देश की सबसे बड़ी अदालत का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। सुप्रीम कोर्ट ने मामले की गंभीरता को देखते हुए श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट केंद्र सरकार और उत्तर प्रदेश सरकार को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। इसके साथ ही अदालत ने उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से गठित विशेष जांच दल यानी एसआईटी को अब तक की जांच की विस्तृत स्टेटस रिपोर्ट पेश करने का निर्देश दिया है। अदालत का यह कदम इस मामले में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने की दिशा में बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    सुप्रीम कोर्ट में दायर कई जनहित याचिकाओं में आरोप लगाया गया है कि राम मंदिर में श्रद्धालुओं द्वारा दिए गए नकद दान और बहुमूल्य चढ़ावे के प्रबंधन में वित्तीय अनियमितताएं हुई हैं। याचिकाओं में मांग की गई है कि पूरे मामले की जांच अदालत की निगरानी में कराई जाए ताकि करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था से जुड़े इस संवेदनशील विषय में किसी तरह का संदेह न रहे। इन याचिकाओं को राष्ट्रीय जनता दल के सांसद सुधाकर सिंह अधिवक्ता नरेंद्र कुमार गोस्वामी अधिवक्ता अजय कुमार राय अधिवक्ता दिनेश कुमार यादव तथा हिन्दू धर्म परिषद की ओर से दायर किया गया है।

    मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ जिसमें न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी मोहना भी शामिल हैं इस मामले की सुनवाई कर रही है। सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से अदालत को बताया गया कि राम मंदिर निर्माण के लिए देश ने 123 वर्षों का लंबा संघर्ष देखा लेकिन अब मंदिर में आए दान और चढ़ावे को लेकर नए विवाद खड़े हो गए हैं। अदालत को यह भी बताया गया कि जांच के लिए गठित एसआईटी के पास मौजूद इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों को सुरक्षित रखना बेहद जरूरी है ताकि किसी भी तरह के प्रमाण नष्ट न हो सकें।

    सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत में पक्ष रखा। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार उत्तर प्रदेश सरकार और श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट को नोटिस जारी करते हुए जवाब तलब किया। अदालत ने एसआईटी को निर्देश दिया कि वह जांच की प्रगति से संबंधित स्टेटस रिपोर्ट दाखिल करे। इस पर सॉलिसिटर जनरल ने अदालत को बताया कि रिपोर्ट सीलबंद लिफाफे में प्रस्तुत की जाएगी। अदालत ने मामले की अगली सुनवाई अगले सोमवार को तय कर दी है।

    यह पूरा मामला राम मंदिर में श्रद्धालुओं द्वारा दिए गए दान और बहुमूल्य चढ़ावे के कथित दुरुपयोग से जुड़ा है। आरोप सामने आने के बाद उत्तर प्रदेश सरकार ने 13 जून को विशेष जांच दल का गठन किया था। अब तक इस मामले में आठ लोगों की गिरफ्तारी हो चुकी है। वहीं जांच के बीच ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय और ट्रस्टी अनिल मिश्रा अपने पदों से इस्तीफा दे चुके हैं।

    सुप्रीम कोर्ट की सक्रियता के बाद इस मामले पर पूरे देश की नजरें टिक गई हैं। अब जांच रिपोर्ट और अगली सुनवाई यह तय करेगी कि आरोपों में कितना दम है और आगे कानूनी प्रक्रिया किस दिशा में बढ़ेगी। करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था से जुड़े इस मामले में अदालत का हर कदम बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

  • पैतृक संपत्ति विवाद में सर्वोच्च अदालत ने स्पष्ट की परंपरागत उत्तराधिकार व्यवस्था, ‘घर दामाद’ को नहीं मिला कानूनी अधिकार

    पैतृक संपत्ति विवाद में सर्वोच्च अदालत ने स्पष्ट की परंपरागत उत्तराधिकार व्यवस्था, ‘घर दामाद’ को नहीं मिला कानूनी अधिकार

    नई दिल्ली । सुप्रीम कोर्ट ने झारखंड से जुड़े उरांव आदिवासी समुदाय के एक पैतृक संपत्ति विवाद में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए उत्तराधिकार संबंधी पारंपरिक व्यवस्था की कानूनी व्याख्या स्पष्ट की है। अदालत ने कहा कि केवल किसी व्यक्ति को ‘घर दामाद’ के रूप में स्वीकार कर लेने से उसे पैतृक संपत्ति पर उत्तराधिकार का अधिकार नहीं मिल जाता, जब तक संबंधित समुदाय की स्थापित परंपरा में ऐसी व्यवस्था का स्पष्ट आधार मौजूद न हो। इस निर्णय के साथ सर्वोच्च अदालत ने निचली अदालतों और उच्च न्यायालय के फैसलों को निरस्त कर दिया।

    मामला झारखंड के उरांव आदिवासी समुदाय की एक पुश्तैनी संपत्ति से जुड़ा था। विवाद उस समय उत्पन्न हुआ जब परिवार के एक सदस्य की संतान नहीं थी और उनकी संपत्ति के उत्तराधिकार को लेकर अलग-अलग दावे सामने आए। एक पक्ष का कहना था कि मृतक ने अपनी भतीजी के पति को ‘घर दामाद’ के रूप में स्वीकार किया था, इसलिए वही संपत्ति का वैध उत्तराधिकारी है। वहीं दूसरे पक्ष ने दावा किया कि उरांव समुदाय की पारंपरिक व्यवस्था में ऐसी कोई मान्यता नहीं है और संपत्ति का अधिकार निकटतम पुरुष गोत्रीय रिश्तेदार को मिलना चाहिए।

    सर्वोच्च अदालत की पीठ ने मामले में उपलब्ध साक्ष्यों और समुदाय की प्रचलित परंपराओं का परीक्षण करने के बाद कहा कि प्रतिवादी यह साबित नहीं कर सके कि उरांव समाज में चाचा अपनी भतीजी के पति को ‘घर दामाद’ बनाकर उत्तराधिकारी नियुक्त करने की कोई स्थापित और मान्य परंपरा मौजूद है। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी प्रथा या रिवाज को कानूनी मान्यता तभी मिल सकती है, जब उसके अस्तित्व और निरंतर पालन के पर्याप्त प्रमाण प्रस्तुत किए जाएं।

    अदालत ने अपने निर्णय में कहा कि यदि संपत्ति के स्वामी का कोई प्रत्यक्ष पुरुष उत्तराधिकारी उपलब्ध नहीं है, तो ऐसी स्थिति में समुदाय की पारंपरिक उत्तराधिकार व्यवस्था के अनुसार निकटतम पुरुष गोत्रीय रिश्तेदार को संपत्ति पर अधिकार प्राप्त होगा। इसी आधार पर अदालत ने वादी के पक्ष में फैसला सुनाते हुए निचली अदालतों के पूर्व आदेशों को निरस्त कर दिया।

    यह मामला पहले ट्रायल कोर्ट, फिर प्रथम अपीलीय अदालत और उसके बाद झारखंड हाई कोर्ट तक पहुंचा था। इन सभी अदालतों ने ‘घर दामाद’ के पक्ष में दिए गए तर्कों को स्वीकार किया था। हालांकि सर्वोच्च अदालत ने कहा कि इन निर्णयों में संबंधित समुदाय की वास्तविक परंपराओं का पर्याप्त परीक्षण नहीं किया गया और स्थापित प्रथाओं के समर्थन में ठोस साक्ष्य भी प्रस्तुत नहीं किए गए।

    कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला आदिवासी समुदायों में प्रचलित पारंपरिक उत्तराधिकार कानूनों की व्याख्या के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना जाएगा। अदालत ने यह भी संकेत दिया कि किसी भी समुदाय की परंपराओं को मान्यता देने के लिए उनके ऐतिहासिक, सामाजिक और कानूनी आधार का स्पष्ट प्रमाण होना आवश्यक है। केवल पारिवारिक व्यवस्था या व्यक्तिगत सहमति के आधार पर उत्तराधिकार संबंधी अधिकार स्वतः स्थापित नहीं किए जा सकते।

    इस निर्णय को भविष्य में आदिवासी समुदायों से जुड़े संपत्ति विवादों में एक महत्वपूर्ण न्यायिक संदर्भ के रूप में देखा जा रहा है। साथ ही यह फैसला इस सिद्धांत को भी मजबूत करता है कि पारंपरिक कानूनों की व्याख्या साक्ष्यों और स्थापित रिवाजों के आधार पर ही की जाएगी, न कि केवल मौखिक दावों या व्यक्तिगत व्यवस्थाओं के आधार पर।

  • राष्ट्रीय पुरुष आयोग की मांग फिर चर्चा में, कानूनी अड़चनें, सामाजिक बहस और राजनीतिक सहमति की चुनौती बरकरार

    राष्ट्रीय पुरुष आयोग की मांग फिर चर्चा में, कानूनी अड़चनें, सामाजिक बहस और राजनीतिक सहमति की चुनौती बरकरार

    नई दिल्ली । देश में राष्ट्रीय पुरुष आयोग के गठन की मांग एक बार फिर सार्वजनिक और राजनीतिक चर्चा का विषय बन गई है। महिला आयोग, बाल अधिकार आयोग, अल्पसंख्यक आयोग और अन्य वैधानिक संस्थाओं की तरह पुरुषों के लिए भी एक अलग राष्ट्रीय आयोग बनाए जाने की मांग पिछले कई वर्षों से उठती रही है। हालांकि यह मुद्दा समय-समय पर चर्चा में आने के बावजूद अब तक किसी ठोस कानूनी रूप में सामने नहीं आ सका है। इसके पीछे कानूनी, राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर कई तरह की चुनौतियां बताई जाती हैं।

    हाल के वर्षों में पुरुषों के मानसिक स्वास्थ्य, पारिवारिक विवाद, आत्महत्या के मामलों और कुछ कानूनों के कथित दुरुपयोग को लेकर कई संगठनों ने अलग आयोग की आवश्यकता पर जोर दिया है। समर्थकों का कहना है कि पुरुषों से जुड़े ऐसे मामलों की सुनवाई और अध्ययन के लिए एक समर्पित संस्थागत व्यवस्था होनी चाहिए, जिससे उनकी शिकायतों को व्यवस्थित तरीके से सुना जा सके और आवश्यक सुझाव सरकार तक पहुंच सकें।

    राष्ट्रीय पुरुष आयोग की मांग को लेकर न्यायपालिका और संसद दोनों स्तरों पर प्रयास किए गए हैं। इस विषय पर जनहित याचिकाएं दायर हुईं और एक निजी सदस्य विधेयक भी प्रस्तुत किया गया। हालांकि अब तक यह पहल कानून का रूप नहीं ले सकी है। संसदीय प्रक्रिया में निजी सदस्य विधेयकों का कानून बनना अत्यंत दुर्लभ माना जाता है और इस विषय पर सरकार की ओर से भी अब तक कोई आधिकारिक विधेयक पेश नहीं किया गया है।

    इस मुद्दे पर सबसे बड़ी बहस यह है कि क्या पुरुष आयोग की स्थापना से मौजूदा महिला आयोग या महिलाओं की सुरक्षा के लिए बने कानूनों पर कोई प्रभाव पड़ेगा। आयोग के समर्थकों का कहना है कि उनका उद्देश्य महिला आयोग का विकल्प तैयार करना नहीं, बल्कि पुरुषों से जुड़े मामलों के लिए एक अतिरिक्त संस्थागत व्यवस्था बनाना है। उनका तर्क है कि दोनों आयोग समानांतर रूप से काम कर सकते हैं और किसी भी वर्ग के अधिकारों को कमजोर किए बिना न्याय व्यवस्था को अधिक संतुलित बनाया जा सकता है।

    वहीं दूसरी ओर कई सामाजिक संगठनों और महिला अधिकार कार्यकर्ताओं का मानना है कि भारत में महिलाओं के खिलाफ हिंसा, भेदभाव और असमानता अब भी गंभीर चुनौती बनी हुई है। उनका कहना है कि मौजूदा परिस्थितियों में महिलाओं की सुरक्षा और अधिकारों को मजबूत करना प्राथमिकता होनी चाहिए। कुछ विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि यदि पुरुष आयोग का गठन किया जाता है तो उसकी भूमिका, अधिकार और दायरे को स्पष्ट रूप से परिभाषित करना आवश्यक होगा, ताकि किसी प्रकार का कानूनी टकराव उत्पन्न न हो।

    विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि पुरुषों से जुड़े मानसिक स्वास्थ्य, पारिवारिक विवाद, सामाजिक दबाव और आत्महत्या जैसे विषयों पर अधिक शोध और विश्वसनीय आंकड़ों की आवश्यकता है। यदि भविष्य में इस दिशा में कोई संस्थागत व्यवस्था बनती है तो वह नीति निर्माण, शोध, परामर्श सेवाओं और जागरूकता कार्यक्रमों के माध्यम से उपयोगी भूमिका निभा सकती है। साथ ही यह सुनिश्चित करना भी आवश्यक होगा कि सभी नागरिकों के अधिकारों की रक्षा समान रूप से हो और किसी भी वर्ग के हित प्रभावित न हों।

    फिलहाल राष्ट्रीय पुरुष आयोग का गठन केवल प्रस्ताव और बहस के स्तर पर है। इसके कानून बनने के लिए सरकार की पहल, व्यापक राजनीतिक सहमति और संसद की मंजूरी आवश्यक होगी। ऐसे में आने वाले समय में यह मुद्दा किस दिशा में आगे बढ़ता है, यह सरकार के रुख, संसदीय प्रक्रिया और समाज में बनने वाली व्यापक सहमति पर निर्भर करेगा।

  • राम मंदिर चढ़ावा चोरी मामला गरमाया, कर्मचारियों ने छोड़ी नौकरी; CBI जांच की मांग पर सुप्रीम कोर्ट करेगा सुनवाई

    राम मंदिर चढ़ावा चोरी मामला गरमाया, कर्मचारियों ने छोड़ी नौकरी; CBI जांच की मांग पर सुप्रीम कोर्ट करेगा सुनवाई

    अयोध्या । अयोध्या स्थित श्रीराम जन्मभूमि मंदिर में चढ़ावे से जुड़ी कथित अनियमितताओं का मामला अब सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। शीर्ष अदालत 13 जुलाई को इस प्रकरण से संबंधित तीन याचिकाओं पर सुनवाई करेगी। इन याचिकाओं में मामले की जांच केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) को सौंपने, विशेष जांच दल (SIT) गठित करने और मंदिर में दान प्रबंधन की समीक्षा के लिए विशेषज्ञ समिति बनाने की मांग की गई है।

    इस बीच चढ़ावा गिनने वाले 23 कर्मचारियों ने सामूहिक रूप से इस्तीफा देकर नया विवाद खड़ा कर दिया है। कर्मचारियों का कहना है कि पहले जहां चढ़ावे में बड़ी संख्या में 500 रुपये के नोट आते थे, वहीं अब 10 और 20 रुपये के नोटों की संख्या काफी बढ़ गई है। इससे नकदी की गिनती में अधिक समय लग रहा है और कार्यभार कई गुना बढ़ गया है।

    कर्मचारियों के मुताबिक पहले 500 रुपये के नोटों की 70 से 80 गड्डियां तैयार हो जाती थीं, जबकि अब मुश्किल से 15 गड्डियां बन पाती हैं। इसके अलावा पहले दो शिफ्टों में होने वाला काम अब सुबह 9 बजे से शाम 6 बजे तक एक ही शिफ्ट में कराया जा रहा है, जबकि वेतन में कोई बढ़ोतरी नहीं हुई। इस्तीफों के बाद बैंक के पास अब केवल 13 गणना कर्मी ही बचे हैं।

    चढ़ावा विवाद का असर अयोध्या से बाहर भी देखने को मिला है। नेपाल के जनकपुर स्थित जानकी मंदिर के महंत रोशन दास ने इस घटना पर गहरा दुख व्यक्त करते हुए कहा कि भगवान श्रीराम के किसी मंदिर में इस तरह की घटना न पहले कभी सुनी और न देखी। उन्होंने दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग की है। महंत ने बताया कि सावन माह में जनकपुर से 5 से 7 श्रद्धालुओं का प्रतिनिधिमंडल अयोध्या पहुंचकर दर्शन करेगा और अपनी संवेदना प्रकट करेगा।

    इधर, विवाद के बीच श्रीराम जन्मभूमि मंदिर निर्माण समिति के अध्यक्ष नृपेंद्र मिश्र अयोध्या पहुंचे। उन्होंने हनुमानगढ़ी में पूजा-अर्चना करने के बाद मंदिर निर्माण कार्यों की समीक्षा की और इंजीनियरों व ट्रस्ट से जुड़े अधिकारियों के साथ बैठक कर निर्माण की प्रगति की जानकारी ली।

    मामले को लेकर राजनीतिक बयानबाजी भी तेज हो गई है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने विपक्ष पर निशाना साधते हुए कहा कि रामभक्तों पर गोली चलाने वाले आज आस्था की बात कर रहे हैं। वहीं कांग्रेस नेताओं ने निष्पक्ष जांच की मांग करते हुए सरकार पर सवाल उठाए हैं। विपक्षी नेताओं का कहना है कि पूरे मामले की स्वतंत्र एजेंसी से जांच होनी चाहिए ताकि सच्चाई सामने आ सके।

    अब इस बहुचर्चित मामले पर सभी की निगाहें 13 जुलाई को होने वाली सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई पर टिकी हैं, जहां जांच की दिशा और आगे की प्रक्रिया को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सामने आ सकता है।