Tag: SupremeCourt

  • जेल से बाहर निकला उम्रकैद का कैदी, बाद में खुला सच: जाली दस्तावेजों के इस खेल ने मचाया हड़कंप

    जेल से बाहर निकला उम्रकैद का कैदी, बाद में खुला सच: जाली दस्तावेजों के इस खेल ने मचाया हड़कंप

    नई दिल्ली। देश की न्याय और सुरक्षा व्यवस्था से जुड़ा एक बेहद चौंकाने वाला मामला सामने आया है, जिसने प्रशासनिक प्रक्रियाओं और दस्तावेज सत्यापन प्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरु स्थित एक केंद्रीय जेल में ऐसा घटनाक्रम सामने आया, जिसने हर किसी को हैरान कर दिया। बताया जा रहा है कि उम्रकैद की सजा काट रहे एक खतरनाक कैदी को जेल से बाहर निकालने के लिए कथित तौर पर उच्च न्यायिक आदेश का फर्जी इस्तेमाल किया गया। जब पूरे मामले की सच्चाई सामने आई तो जेल प्रशासन और जांच एजेंसियों में हड़कंप मच गया।

    मामले की जानकारी सामने आने के बाद यह स्पष्ट हुआ कि पूरा घटनाक्रम किसी सामान्य लापरवाही का नहीं बल्कि सुनियोजित साजिश का हिस्सा हो सकता है। आरोप है कि एक जाली दस्तावेज तैयार किया गया, जिसे आधिकारिक आदेश के रूप में प्रस्तुत किया गया। पहली नजर में दस्तावेज पूरी तरह वास्तविक दिखाई दिया, जिसके चलते प्रशासनिक स्तर पर उस पर भरोसा कर लिया गया। इसी आधार पर आगे की प्रक्रिया पूरी की गई और कैदी की रिहाई का रास्ता साफ हो गया।

    जानकारी के अनुसार संबंधित कैदी गंभीर आपराधिक मामलों में दोषी पाया गया था और वह उम्रकैद की सजा काट रहा था। उस पर अपहरण और आपराधिक साजिश जैसे गंभीर आरोप साबित हुए थे। अदालत द्वारा सुनाई गई सजा के तहत उसे लंबे समय तक जेल में रहना था। लेकिन कथित तौर पर फर्जी आदेश के आधार पर उसकी रिहाई संभव हो गई। यह मामला इसलिए और गंभीर माना जा रहा है क्योंकि इसमें दस्तावेजों की प्रामाणिकता की जांच करने वाली प्रक्रिया भी सवालों के घेरे में आ गई है।

    घटना के बाद प्रशासन ने पूरे मामले की जांच शुरू कर दी है। अधिकारियों का मानना है कि इस तरह की साजिश किसी एक व्यक्ति के स्तर पर संभव नहीं हो सकती। जांच एजेंसियां यह पता लगाने में जुटी हैं कि फर्जी दस्तावेज किसने तैयार किया, किन लोगों ने उसकी मदद की और क्या इस पूरे नेटवर्क में अंदरूनी सहयोग भी शामिल था। मामले में कई लोगों से पूछताछ की जा सकती है और तकनीकी पहलुओं की भी गहराई से जांच की जा रही है।

    यह घटना केवल एक कैदी की रिहाई तक सीमित नहीं मानी जा रही, बल्कि इससे पूरे सिस्टम की कार्यप्रणाली पर गंभीर बहस शुरू हो गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि न्यायिक आदेशों की सत्यता जांचने की प्रक्रिया में इतनी बड़ी चूक संभव है तो भविष्य में इससे और भी गंभीर सुरक्षा खतरे पैदा हो सकते हैं। ऐसे मामलों से निपटने के लिए डिजिटल सत्यापन और बहुस्तरीय जांच व्यवस्था को और मजबूत करने की आवश्यकता महसूस की जा रही है।

    फिलहाल यह मामला जांच के केंद्र में है और प्रशासन इस बात की तह तक पहुंचने की कोशिश कर रहा है कि आखिर इतनी बड़ी चूक कैसे हुई। इस घटना ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि तकनीक और दस्तावेज आधारित व्यवस्थाओं के दौर में भी सतर्कता और सत्यापन सबसे महत्वपूर्ण कड़ी है। आने वाले दिनों में जांच के बाद कई बड़े खुलासे सामने आने की संभावना जताई जा रही है।

  • सुप्रीम कोर्ट में इंसानियत और कानून का संगम, बुजुर्ग की अपील पर CJI सूर्यकांत का भावुक लेकिन स्पष्ट जवाब

    सुप्रीम कोर्ट में इंसानियत और कानून का संगम, बुजुर्ग की अपील पर CJI सूर्यकांत का भावुक लेकिन स्पष्ट जवाब

    नई दिल्ली । सुप्रीम कोर्ट में गुरुद्वारा कमेटियों के फंड से जुड़े कथित दुरुपयोग के मामले की सुनवाई के दौरान एक बेहद भावुक और मानवीय क्षण सामने आया, जिसने पूरे माहौल को गंभीरता और संवेदनशीलता से भर दिया। सुनवाई के दौरान जब एक बुजुर्ग याचिकाकर्ता ने अपनी बात रखते हुए भावुक होकर कहा कि वह न्याय की उम्मीद में अदालत के आगे नतमस्तक हैं, तो पूरा कोर्टरूम कुछ पल के लिए शांत हो गया।

    याचिकाकर्ता ने अपनी अपील में मामले की गंभीरता को विस्तार से रखते हुए कहा कि यह मुद्दा केवल एक व्यक्तिगत विवाद नहीं, बल्कि समाज, शिक्षा और सार्वजनिक हित से जुड़ा महत्वपूर्ण प्रश्न है। उन्होंने न्यायालय से अनुरोध किया कि इस मामले में तत्काल हस्तक्षेप करते हुए संबंधित पक्षों को नोटिस जारी किया जाए और किसी भी तरह के अपरिवर्तनीय निर्णय पर रोक लगाई जाए।

    इस भावुक अपील को सुनकर मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने बेहद संतुलित और विनम्र तरीके से जवाब दिया। उन्होंने कहा कि अदालत हमेशा नागरिकों के लिए उपलब्ध है और कोई भी व्यक्ति अपनी बात रखने के लिए स्वतंत्र है, लेकिन किसी भी नीति या कानून में बदलाव का अधिकार न्यायपालिका के बजाय विधायिका के पास होता है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में उचित मंच तक पहुंचना ही सही प्रक्रिया होती है।

    CJI ने आगे याचिकाकर्ता को सलाह दी कि वह संबंधित विषय को संसद की याचिका समिति के समक्ष भी रख सकते हैं, ताकि वहां से उचित प्रक्रिया के तहत विचार किया जा सके। उन्होंने यह भी कहा कि न्यायपालिका हर मामले में सीमित दायरे में ही हस्तक्षेप कर सकती है, खासकर जब मामला नीतिगत या विधायी क्षेत्र से जुड़ा हो।

    इस पूरी सुनवाई के दौरान कोर्ट में भावनाओं और कानून का संतुलन स्पष्ट रूप से देखने को मिला। एक तरफ बुजुर्ग की भावुक अपील थी, तो दूसरी तरफ न्यायिक प्रक्रिया की स्पष्ट सीमाएं, जिन्हें मुख्य न्यायाधीश ने बेहद सम्मानपूर्वक और सहज भाषा में समझाया।

    यह घटना न केवल न्याय व्यवस्था की गरिमा को दर्शाती है, बल्कि यह भी दिखाती है कि अदालतें भावनाओं को समझते हुए भी कानून की सीमाओं के भीतर ही निर्णय लेने के लिए बाध्य होती हैं।

  • हाईकोर्ट सुप्रीम कोर्ट के मामलों में मुख्य सचिव को पक्षकार बनाने पर ब्रेक अफसर करेंगे नाम विलोपन

    हाईकोर्ट सुप्रीम कोर्ट के मामलों में मुख्य सचिव को पक्षकार बनाने पर ब्रेक अफसर करेंगे नाम विलोपन


    भोपाल । मध्यप्रदेश में प्रशासनिक और कानूनी स्तर पर एक अहम बदलाव की तैयारी शुरू हो गई है जहां बीते तीन महीनों में लगातार बढ़ते मामलों ने सरकार को नई रणनीति अपनाने के लिए मजबूर कर दिया है दरअसल हाल के आंकड़ों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि विभिन्न निकायों से जुड़े मुकदमों में मुख्य सचिव को बार बार पक्षकार बनाया जा रहा है जिससे न केवल प्रशासनिक दबाव बढ़ रहा है बल्कि अनावश्यक कानूनी जटिलताएं भी उत्पन्न हो रही हैं

    इसी स्थिति को देखते हुए अब अफसरों ने तय किया है कि ऐसे मामलों में मुख्य सचिव का नाम हटाने की प्रक्रिया शुरू की जाएगी इसके तहत अपर मुख्य सचिव प्रमुख सचिव सचिव और कलेक्टर स्तर के अधिकारी संबंधित अदालतों में आवेदन प्रस्तुत कर मुख्य सचिव का नाम विलोपित कराने की पहल करेंगे इस कदम का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि मुख्य सचिव को सीधे तौर पर नोटिस जारी न हों और प्रशासनिक कार्यों पर अनावश्यक प्रभाव न पड़े

    जानकारी के अनुसार वर्तमान में मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय और सुप्रीम कोर्ट में निकायों से जुड़े कई मामले विचाराधीन हैं जिनमें याचिकाकर्ताओं द्वारा मुख्य सचिव को भी पक्षकार बनाया गया है जबकि प्रशासन का मानना है कि मुख्य सचिव किसी एक विभाग के प्रभारी नहीं होते इसलिए उन्हें ऐसे मामलों में शामिल करना उचित नहीं है

    सामान्य प्रशासन विभाग ने इस मुद्दे को गंभीरता से लेते हुए सभी विभागों को स्पष्ट निर्देश जारी किए हैं कि जहां भी मुख्य सचिव का नाम पक्षकार के रूप में जोड़ा गया है वहां उसे हटाने की कार्रवाई की जाए अधिकारियों का तर्क है कि इससे न केवल कानूनी प्रक्रिया अधिक स्पष्ट और सुव्यवस्थित होगी बल्कि जिम्मेदारी भी सीधे संबंधित विभागों तक सीमित रहेगी

    आंकड़ों पर नजर डालें तो वर्ष 2026 में अब तक 38 मामलों में से 9 में मुख्य सचिव को रिसपोंडेंट बनाया गया है जबकि दो मामलों में उनके नाम से अवमानना के प्रकरण भी दर्ज हैं वहीं वर्ष 2025 में कुल 88 मामलों में से 15 में मुख्य सचिव को पक्षकार बनाया गया था ये आंकड़े इस बात की ओर इशारा करते हैं कि समय के साथ यह प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है

    इस पूरी कवायद को प्रशासनिक सुधार और जिम्मेदारियों के स्पष्ट निर्धारण के रूप में देखा जा रहा है माना जा रहा है कि यदि यह रणनीति सफल होती है तो भविष्य में उच्च स्तर के अधिकारियों को अनावश्यक कानूनी उलझनों से राहत मिलेगी और शासन व्यवस्था अधिक प्रभावी ढंग से काम कर सकेगी

  • NCERT किताब विवाद: सुप्रीम कोर्ट में न्यायपालिका पर अध्याय पर गुस्सा, सीजेआई सूर्यकांत ने डायरेक्टर को नोटिस जारी किया

    NCERT किताब विवाद: सुप्रीम कोर्ट में न्यायपालिका पर अध्याय पर गुस्सा, सीजेआई सूर्यकांत ने डायरेक्टर को नोटिस जारी किया


    नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट में नेशनल काउंसिल ऑफ एजुकेशनल रिसर्च एंड ट्रेनिंग NCERT की कक्षा 8 की किताब में न्यायपालिका पर जोड़ दिए गए अध्याय के विवाद पर सुनवाई गुरुवार को जारी रही। इस मामले में सीजेआई D.Y. Chandrachud / Surya Kant की बेंच के सामने एसजी Tushar Mehta ने बिना शर्त माफी मांगी।

    सुप्रीम कोर्ट ने इस विवादित अध्याय को “कैलकुलेटेड मूव” बताते हुए कहा कि इससे भारतीय न्यायपालिका की प्रतिष्ठा पर गंभीर चोट लगी है। सीजेआई सूर्यकांत ने टिप्पणी की, आज न्यायपालिका लहूलुहान है। उन्होंने यह भी कहा कि यदि इसे ऐसे ही छोड़ दिया गया तो आम जनता और युवाओं के मन में न्यायपालिका की पवित्रता प्रभावित होगी।

    तुषार मेहता ने अदालत को बताया कि किताब की 32 प्रतियां बाजार में चली गई थीं, जिन्हें वापस लिया जा रहा है। उन्होंने भरोसा दिलाया कि पूरे अध्याय की टीम दोबारा समीक्षा करेगी। सीजेआई ने कहा कि यह मामूली मामला नहीं है, बल्कि न्यायपालिका की संस्थागत स्थिति को चुनौती देने वाला कदम है।

    सुप्रीम कोर्ट ने NCERT के डायरेक्टर को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया। अदालत ने कहा कि यह स्पष्ट नहीं कि क्या यह सोची-समझी चाल थी या संयोग, लेकिन न्यायपालिका पर भ्रष्टाचार का चित्रण संवैधानिक रूप से अनुचित है। जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने डिजिटल युग में हजारों प्रतियों के प्रसार को ध्यान में रखते हुए जांच की आवश्यकता बताई।

    सुनवाई के दौरान सीजेआई सूर्यकांत ने संविधान निर्माताओं की मेहनत का उल्लेख किया और कहा कि तीनों स्तंभों की स्वायत्तता सुनिश्चित करने में गहरी सजगता बरती गई थी। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि इस तरह की सामग्री युवाओं तक पहुंचती रही तो न्यायिक पद की पवित्रता खतरे में पड़ जाएगी।

    सीनियर एडवोकेट विकास सिंह ने कहा कि पूरे तंत्र की व्यापक समस्याओं का कोई जिक्र नहीं था, केवल एक व्यक्ति को चुन लिया गया। वहीं कपिल सिब्बल ने पूछा कि राजनेताओं और नौकरशाही का क्या जिक्र है। न्यायपालिका की प्रतिष्ठा को सुरक्षित रखने और पाठ्यपुस्तक में सुधार के लिए सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट रूप से NCERT पर गहन समीक्षा और जवाब देने का निर्देश दिया।

    इस सुनवाई में यह भी तय किया गया कि भविष्य में इस तरह की गलतियों से बचने के लिए जिम्मेदार व्यक्तियों की जवाबदेही सुनिश्चित की जाएगी। SC ने कहा कि कार्रवाई सिर्फ पब्लिक रिप्रेसेंटेशन के लिए नहीं बल्कि न्यायपालिका की प्रतिष्ठा और संस्थागत मूल्य के लिए भी जरूरी है।

  • आई-पैक मामले में सुप्रीम कोर्ट सख्त ममता सरकार को नोटिस;सीसीटीवी फुटेज सुरक्षित रखने का निर्देश

    आई-पैक मामले में सुप्रीम कोर्ट सख्त ममता सरकार को नोटिस;सीसीटीवी फुटेज सुरक्षित रखने का निर्देश


    नई दिल्ली: पॉलिटिकल कंसल्टेंसी फर्म आई-पैक I-PAC से जुड़े छापेमारी मामले में सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल सरकार को कड़ा संदेश दिया है। शीर्ष अदालत ने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और राज्य के पुलिस महानिदेशक डीजीपी राजीव कुमार को नोटिस जारी करते हुए उनसे दो हफ्तों के भीतर जवाब मांगा है। साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया है कि छापेमारी से संबंधित सभी सीसीटीवी फुटेज और अन्य डिजिटल स्टोरेज को अगली सुनवाई तक सुरक्षित रखा जाए।

    यह मामला प्रवर्तन निदेशालय ईडी द्वारा आई-पैक के कार्यालय और सह-संस्थापक प्रतीक जैन के आवास पर की गई छापेमारी से जुड़ा है। ईडी का आरोप है कि इस दौरान राज्य प्रशासन और पुलिस ने केंद्रीय एजेंसी के काम में बाधा डाली। ईडी की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एस.वी. राजू ने अदालत में गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि इस प्रकरण में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी स्वयं आरोपी हैं। उन्होंने दावा किया कि डीजीपी राजीव कुमार की मौजूदगी में मुख्यमंत्री ने व्यक्तिगत रूप से हस्तक्षेप किया और पुलिस की भूमिका सहयोगी की रही।मामले की सुनवाई जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस विपुल पंचोली की पीठ ने की। दलीलें सुनने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल पुलिस द्वारा ईडी अधिकारियों के खिलाफ दर्ज एफआईआर पर फिलहाल रोक लगा दी। कोर्ट ने कहा कि ईडी की याचिकाओं में गंभीर संवैधानिक और कानूनी सवाल उठाए गए हैं जिन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

    पीठ ने टिप्पणी की कि यदि ऐसे मामलों को अनसुलझा छोड़ दिया गया तो इससे एक या एक से अधिक राज्यों में अराजकता की स्थिति पैदा हो सकती है। इसी को ध्यान में रखते हुए अदालत ने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी डीजीपी राजीव कुमार कोलकाता पुलिस कमिश्नर और अन्य संबंधित अधिकारियों को नोटिस जारी किया। सभी प्रतिवादियों को दो सप्ताह के भीतर अपना जवाबी हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया गया है। मामले की अगली सुनवाई 3 फरवरी को तय की गई है।अपने अंतरिम आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि तलाशी वाले परिसरों के अंदर और आसपास लगे सीसीटीवी कैमरों की रिकॉर्डिंग डीवीआर और अन्य स्टोरेज डिवाइस को किसी भी हाल में नष्ट या छेड़छाड़ नहीं की जानी चाहिए। यह निर्देश अगली सुनवाई तक प्रभावी रहेगा।

    वहीं पश्चिम बंगाल सरकार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल और अभिषेक मनु सिंघवी ने ईडी की याचिकाओं की वैधता पर सवाल उठाए। उन्होंने तर्क दिया कि इस तरह की कार्रवाइयां अक्सर चुनावों से पहले देखने को मिलती हैं और जब मामला पहले से हाईकोर्ट में लंबित है तब सुप्रीम कोर्ट को इस पर विचार नहीं करना चाहिए।इसी बीच ईडी ने एक नई अर्जी दाखिल कर डीजीपी राजीव कुमार समेत पश्चिम बंगाल पुलिस के शीर्ष अधिकारियों को निलंबित किए जाने की मांग भी की है। इस पर भी सुप्रीम कोर्ट ने ममता सरकार से जवाब तलब किया है। यह मामला अब राजनीतिक और संवैधानिक दोनों दृष्टियों से बेहद अहम बन गया है।

  • पटना  झारखंड और अन्य हाईकोर्ट को मिलेंगे नए चीफ जस्टिस  SC कॉलेजियम ने की सिफारिश

    पटना झारखंड और अन्य हाईकोर्ट को मिलेंगे नए चीफ जस्टिस SC कॉलेजियम ने की सिफारिश


    नई दिल्ली । सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने गुरुवार को हुई बैठक में 5 प्रमुख हाईकोर्ट के लिए नए मुख्य न्यायाधीशों की नियुक्ति को लेकर अपनी सिफारिशें की हैं। ये रिक्तियां रिटायरमेंट और ट्रांसफर के चलते उत्पन्न हो रही हैं और कॉलेजियम ने विभिन्न हाईकोर्ट में इन पदों को भरने के लिए न्यायाधीशों के नामों की सिफारिश की है। हालांकि इन सिफारिशों को केंद्र सरकार की मंजूरी मिलनी बाकी है।
    कॉलेजियम की सिफारिशों के अनुसार इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस मनोज कुमार गुप्ता को उत्तराखंड हाईकोर्ट का नया मुख्य न्यायाधीश नियुक्त करने की सिफारिश की गई है। यह पद उत्तराखंड हाईकोर्ट के मौजूदा मुख्य न्यायाधीश के 9 जनवरी 2026 को रिटायर होने के बाद रिक्त होगा।

    बॉम्बे हाईकोर्ट की न्यायाधीश जस्टिस रेवती पी. मोहिते डेरे को मेघालय हाईकोर्ट का मुख्य न्यायाधीश बनाए जाने की सिफारिश की गई है। यह सिफारिश मेघालय हाईकोर्ट के मौजूदा मुख्य न्यायाधीश के प्रस्तावित ट्रांसफर के मद्देनजर की गई है। बॉम्बे हाईकोर्ट के ही एक अन्य न्यायाधीश जस्टिस एम.एस. सोनक को झारखंड हाईकोर्ट का मुख्य न्यायाधीश नियुक्त करने की सिफारिश की गई है। झारखंड हाईकोर्ट में यह पद 8 जनवरी 2026 को वर्तमान मुख्य न्यायाधीश के रिटायर होने के बाद रिक्त होगा।

    इसके अलावा केरल हाईकोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस ए. मुहम्मद मुस्ताक को सिक्किम हाईकोर्ट का मुख्य न्यायाधीश नियुक्त करने की सिफारिश की गई है जबकि उड़ीसा हाईकोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस संगम कुमार साहू को पटना हाईकोर्ट का मुख्य न्यायाधीश बनाए जाने का प्रस्ताव किया गया है। कॉलेजियम ने मेघालय हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सौमेन सेन को केरल हाईकोर्ट का मुख्य न्यायाधीश नियुक्त करने की भी सिफारिश की है। यह ट्रांसफर केरल हाईकोर्ट के मौजूदा मुख्य न्यायाधीश के 9 जनवरी 2026 को रिटायर होने के बाद प्रभावी होगा।

  • सुप्रीम कोर्ट का सख्त संदेश: याचिकाकर्ताओं और वकीलों को न्यायपालिका को बदनाम न करने की चेतावनी

    सुप्रीम कोर्ट का सख्त संदेश: याचिकाकर्ताओं और वकीलों को न्यायपालिका को बदनाम न करने की चेतावनी


    नई दिल्‍ली । सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court)ने शुक्रवार को एक अर्जी पर नाराजगी जताते हुए याचिकाकर्ता (Petitioner)को फटकार लगाई और एक लाख रुपये का जुर्माना भी ठोक दिया। यह याचिका अल्पसंख्यक स्कूलों को शिक्षा के अधिकार अधिनियम के प्रावधानों (Provisions)के तहत छूट देने के सुप्रीम कोर्ट के पुराने आदेश के खिलाफ दायर की गई थी। कोर्ट ने कहा कि इस तरह की याचिका दायर करके न्यायपालिका को बदनाम न करें।

    जस्टिस बीवी नागरत्ना और आर महादेवन की पीठ यूनाइटेड वॉयस फॉर एजुकेशन फोरम एनजीओ द्वारा दायर एक याचिका पर सुनवाई कर रही थी। याचिका में कहा गया था कि अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों को दी गई छूट असंवैधानिक है, क्योंकि यह उन्हें आरटीई दायित्वों से पूरी तरह से छूट देती है। पीठ ने कहा कि अगर वकील इस तरह की सलाह दे रहे हैं तो उन्हें भी दंडित करना होगा। कोर्ट ने जुर्माना लगाते हुए कहा कि सख्त संदेश देना जरूरी है। आप कानून के जानकार और पेशेवर हैं और आप अनुच्छेद 32 के तहत इस न्यायालय के फैसले को चुनौती देते हुए रिट याचिका दायर करते हैं? आप कोर्ट के महत्व को समझते नहीं हैं। 2014 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले में आरटीई एक्ट को आर्टिकल 30(1) के तहत अल्पसंख्यक स्कूलों पर लागू नहीं माना था।

    इसके अलावा सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को उस याचिका पर सुनवाई से इनकार कर दिया, जिसमें दावा किया गया था कि ‘म्यूचुअल फंड सही है’ जैसे लोकप्रिय विज्ञापन अभियान निवेशकों को गुमराह करते हैं। जस्टिस विक्रम नाथ और संदीप मेहता की पीठ इस साल सितंबर में बॉम्बे हाई कोर्ट के एक आदेश को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई कर रही थी। हाईकोर्ट ने उस जनहित याचिका को खारिज कर दिया था, जिसमें एसोसिएशन ऑफ म्यूचुअल फंड्स इन इंडिया को निवेशक शिक्षा और जागरूकता कार्यक्रम चलाने के लिए दी गई छूट को रद्द करने का निर्देश देने की मांग की गई थी।

    साथ ही, देश में सभी इमारतों को भूकंप रोधी बनाने और भूकंप की स्थिति से निपटने के लिए समाधान की मांग करने वाली याचिका शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दी है। याचिकाकर्ता ने पीठ को बताया कि पहले यह माना जाता था कि दिल्ली सबसे ज्यादा भूकंप संभावित क्षेत्र है, लेकिन नई रिपोर्ट में पता चला है कि देश का 75 प्रतिशत क्षेत्र भूकंप संभावित है। इस पर जज ने कहा तो क्या सभी लोगों को चांद पर रहने भेज दिया जाए? इस पर याचिकाकर्ता ने कहा कि वह भूकंप से कम नुकसान के उपाय अपनाने की बात लेकर कोर्ट पहुंचे हैं। देश में भूकंप के खतरे को ध्यान में रखते हुए भवन और दूसरे निर्माण होने चाहिए।

    याचिकाकर्ता ने जापान में हाल ही में आए भूकंप का जिक्र किया। उन्होंने ऐसी स्थिति से निपटने के लिए वहां पर होने वाले विशेष किस्म के भवन निर्माण पर चर्चा करनी चाही, लेकिन पीठ ने उन्हें रोका। कोर्ट ने कहा कि मीडिया में कौन सी रिपोर्ट प्रकाशित हो रही है, उसके आधार पर कोर्ट में सुनवाई नहीं होती। यह विषय नीतिगत है।

  • अल्पसंख्यकों से जुड़े मामले पर भड़कीं जस्टिस नागरत्ना, याचिकाकर्ता पर लगाया 1 लाख का जुर्माना

    अल्पसंख्यकों से जुड़े मामले पर भड़कीं जस्टिस नागरत्ना, याचिकाकर्ता पर लगाया 1 लाख का जुर्माना


    नई दिल्‍ली । सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court)ने शुक्रवार (12 दिसंबर) को उस रिट याचिकाकर्ता(Petitioner) को कड़़ी फटकार लगाई, जिसने अल्पसंख्यक(minority) विद्यालयों को शिक्षा के अधिकार अधिनियम के प्रावधानों के तहत छूट देने के शीर्ष न्यायालय के पूर्व के आदेश को चुनौती दी थी। जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस आर महादेवन की बेंच ने इस रिट पिटीशन को देश की न्यायपालिका को नीचा दिखाने और उसे ध्वस्त करे की एक कोशिश करार दिया और याचिकाकर्ता पर एक लाख रुपये का जुर्माना लगा दिया।

    जस्टिस नागरत्ना ने सुनवाई के दौरान सख्त टिप्पणी की, “आप सुप्रीम कोर्ट के साथ ऐसा नहीं कर सकते। हम गुस्से में हैं। अगर आप ऐसे मामले दायर करना शुरू कर देंगे तो यह इस देश की पूरी न्याय प्रणाली के खिलाफ होगा। आपको अपने मामले की गंभीरता का पता नहीं है। हम खुद को 1 लाख रुपये के जुर्माने तक ही सीमित रख रहे हैं। ऐसे मामले दायर करके इस देश की न्यायपालिका को नीचा न दिखाएं।”

    न्यायपालिका को बदनाम मत कीजिए
    कोर्ट ने यह भी सवाल उठाया कि वकील सुप्रीम कोर्ट के अपने ही फैसलों के खिलाफ ऐसी याचिकाएं दायर करने की सलाह कैसे दे रहे हैं? याचिका दायर करने के लिए वकील को फटकार लगाते हुए पीठ ने कहा, ‘‘इस तरह के मामले दायर करके देश की न्यायपालिका को बदनाम मत कीजिए। यहां क्या हो रहा है? क्या वकील इस तरह की सलाह दे रहे हैं? हमें वकीलों को दंडित करना होगा।’’ पीठ ने कहा, “हम केवल एक लाख रुपये का जुर्माना ही लगा रहे हैं।’’

    आप देश की न्यायपालिका को ध्वस्त करना चाहते हैं
    न्यायालय ने कहा, ‘‘आप कानून के जानकार लोग और पेशेवर हैं और आप अनुच्छेद 32 के तहत इस न्यायालय के फैसले को चुनौती देते हुए रिट याचिका दायर करते हैं? घोर दुरुपयोग। हम संयम बरत रहे हैं। हम अवमानना ​​का आदेश जारी नहीं कर रहे हैं। आप इस देश की न्यायपालिका को ध्वस्त करना चाहते हैं।’’

    किस NGO ने दायर की थी याचिका?
    उच्चतम न्यायालय गैर-सरकारी संगठन ‘यूनाइटेड वॉइस फॉर एजुकेशन फोरम’ द्वारा दायर एक याचिका पर सुनवाई कर रहा था, जिसमें यह निर्देश देने का अनुरोध किया गया था कि अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थानों को दी गई छूट असंवैधानिक है क्योंकि यह उन्हें शिक्षा का अधिकार (आरटीई) अधिनियम के दायित्वों से पूर्ण रूप से छूट प्रदान करती है। न्यायालय ने 2014 में दिए फैसले में कहा था कि आरटीई अधिनियम अनुच्छेद 30(1) के तहत अल्पसंख्यक विद्यालयों पर लागू नहीं होता है, जो धार्मिक और भाषाई अल्पसंख्यकों को शैक्षणिक संस्थानों की स्थापना और शासन का अधिकार प्रदान करता है।

  • 148 लोगों की मौत वाली रेल दुर्घटना में आरोपियों को नहीं मिलेगी जमानत, SC का कड़ा फैसला

    148 लोगों की मौत वाली रेल दुर्घटना में आरोपियों को नहीं मिलेगी जमानत, SC का कड़ा फैसला


    नई दिल्‍ली । सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court)ने ‘जेल नहीं, जमानत'(Bail) के सिद्धांत में अपवाद को जोड़ते हुए एक अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी आरोपी के जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता(Personal freedom) का अधिकार संरक्षित तो है, लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा और देश की संप्रभुता से जुड़े मामलों में केवल इसी आधार पर जमानत नहीं दी जा सकती। विशेषकर गैरकानूनी(illegal) गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम यानी UAPA जैसे कानूनों के तहत दर्ज मामलों में अदालत को व्यापक राष्ट्रीय हित को ध्यान में रखना होगा।

    जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. के. सिंह की पीठ ने यह टिप्पणी सीबीआई की उस अपील पर सुनवाई करते हुए की, जिसमें कलकत्ता हाईकोर्ट द्वारा दिए गए जमानत आदेश को चुनौती दी गई थी। यह मामला 9 जून 2010 को पश्चिम बंगाल में हुई भीषण रेल दुर्घटना से जुड़ा है, जब रेलवे ट्रैक से छेड़छाड़ किए जाने के कारण ज्ञानेश्वरी एक्सप्रेस पटरी से उतर गई और एक मालगाड़ी से टकरा गई। इस हादसे में 148 लोगों की मौत हुई थी और 170 से अधिक यात्री घायल हुए थे। पश्चिम बंगाल के पश्चिम मिदनापुर जिले में माओवादियों द्वारा रेलवे ट्रैक उखाड़ने से ज्ञानेश्वरी एक्सप्रेस पटरी से उतर गई थी और एक मालगाड़ी से टकरा गई थी। निर्दोष लोगों की मौतों के अलावा, सरकार को सार्वजनिक संपत्ति के नुकसान से करीब 25 करोड़ रुपये का घाटा हुआ था।

    राष्ट्रीय हित सर्वोपरि
    पीठ ने कहा कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता निरपेक्ष नहीं है। यह राष्ट्रीय हित, संप्रभुता और देश की अखंडता जैसे उच्चतर उद्देश्यों के अधीन है। अदालत ने कहा कि न्याय की तराजू को एक ओर संविधान द्वारा प्रदत्त अनुच्छेद 21 के अधिकार और दूसरी ओर राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे ‘न्यायसंगत अपवादों’ के बीच संतुलन बनाना होता है।

    फैसले को लिखते हुए जस्टिस संजय करोल ने कहा कि कुछ मामले अपनी प्रकृति और प्रभाव के कारण व्यापक दृष्टिकोण की मांग करते हैं, जहां मुद्दा केवल किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता का नहीं बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा का होता है।

    माओवादी साजिश और भारी नुकसान
    अदालत के अनुसार, यह रेल हादसा माओवादी कैडरों द्वारा अंजाम दी गई साजिश का नतीजा था। इसका उद्देश्य झारग्राम क्षेत्र में राज्य पुलिस और केंद्रीय अर्धसैनिक बलों की संयुक्त तैनाती को वापस लेने के लिए सरकार पर दबाव बनाना था। इस घटना में न केवल बड़ी संख्या में निर्दोष यात्रियों की जान गई और लोग घायल हुए, बल्कि सार्वजनिक संपत्ति को भी करीब 25 करोड़ रुपये का नुकसान पहुंचा।

    विरोध का अधिकार, लेकिन हिंसा नहीं
    सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि हर नागरिक को सरकार की नीतियों के खिलाफ कानून के दायरे में रहकर विरोध करने का संवैधानिक अधिकार है। लेकिन निर्दोष लोगों की जान लेने वाली बर्बर और अमानवीय हरकतों को किसी भी तरह से उचित नहीं ठहराया जा सकता। अदालत ने कहा कि ट्रेन पटरियों से छेड़छाड़ कर लगभग 150 यात्रियों की मौत का कारण बनने वाले कृत्य को किसी भी लोकतांत्रिक अधिकार के तहत संरक्षण नहीं दिया जा सकता।

    12 साल की कैद पर भी जमानत नहीं
    आरोपियों की ओर से यह दलील भी दी गई थी कि वे 12 साल से अधिक समय से जेल में हैं, इसलिए दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 436A के तहत उन्हें जमानत मिलनी चाहिए। इस धारा के अनुसार, यदि कोई अंडरट्रायल आरोपी किसी अपराध की अधिकतम सजा के आधे से अधिक समय तक जेल में रह चुका हो, तो उसे जमानत दी जा सकती है।

    हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को खारिज करते हुए कहा कि आतंकवादी कृत्यों जैसे अपराधों में संभावित सजा मृत्युदंड तक हो सकती है। ऐसे में 12 साल की कैद को धारा 436A के तहत जमानत का आधार नहीं बनाया जा सकता।

    UAPA में उलटा बोझ और निष्पक्ष सुनवाई
    अदालत ने UAPA के तहत आरोपियों पर डाले गए ‘रिवर्स बर्डन’ (उलटे बोझ) का भी उल्लेख किया, जिसमें आरोपी को खुद अपनी बेगुनाही साबित करनी होती है। सुप्रीम कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट्स को निर्देश दिया कि ऐसे मामलों में आरोपियों को उनके खिलाफ इस्तेमाल होने वाले सभी दस्तावेज समय पर उपलब्ध कराए जाएं, ताकि वे अपनी रक्षा की तैयारी कर सकें और निष्पक्ष सुनवाई सुनिश्चित हो सके।

    शीघ्र सुनवाई के निर्देश
    15 साल से अधिक पुराने इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने ट्रायल को तेजी से पूरा करने का आदेश दिया है, ताकि न्याय में और देरी न हो। इस फैसले को राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मामलों में जमानत के सिद्धांतों को स्पष्ट करने और ‘बेल, नॉट जेल’ के व्यापक सिद्धांत पर एक महत्वपूर्ण अपवाद के रूप में देखा जा रहा है।

  • पुस्तक में सिगरेट दिखाने को नहीं माना तंबाकू उत्पाद का प्रचार

    पुस्तक में सिगरेट दिखाने को नहीं माना तंबाकू उत्पाद का प्रचार


    नई दिल्ली। सुप्रीम न्यायालय ने शुक्रवार को अरुंधति रॉय की पुस्तक ‘मदर मैरी कम्स टू मी’ के संबंध में दायर याचिका खारिज कर दी। याचिका में पुस्तक की बिक्री, वितरण और प्रदर्शन पर रोक लगाने का अनुरोध किया गया था। याचिकाकर्ता का तर्क था कि पुस्तक के आवरण पर रॉय को सिगरेट पीते हुए दिखाया गया है, जो कानून का उल्लंघन है।

    केरल के उच्च न्यायालय द्वारा जनहित याचिका खारिज होने के बाद याचिकाकर्ता राजसिम्हन ने उच्चतम न्यायालय में अपील की थी। इस मामले की सुनवाई प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने की। पीठ ने याचिका खारिज करते हुए कहा कि पुस्तक में किसी प्रकार का सिगरेट या तंबाकू उत्पाद का प्रचार नहीं किया गया है और न ही लेखक ने ऐसा करने की कोशिश की है।

    प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि रॉय एक प्रसिद्ध लेखिका हैं और उन्होंने पुस्तक में कोई ऐसा संदेश नहीं दिया है जो तंबाकू उत्पादों के प्रचार के रूप में देखा जा सके। उन्होंने कहा कि पुस्तक में चेतावनी भी दी गई है और इसे केवल पाठकों के लिए प्रकाशित किया गया है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि शहर में किसी प्रकार की किताब की होर्डिंग नहीं लगाई गई है और यह मामला केवल पुस्तक के पाठक वर्ग तक सीमित है।

    पीठ ने यह भी कहा कि लेखक और प्रकाशक ने तंबाकू उत्पाद अधिनियम, 2003 की धारा पांच का उल्लंघन नहीं किया है। इस धारा के तहत सिगरेट और अन्य तंबाकू उत्पादों के विज्ञापन, प्रचार और प्रायोजन पर प्रतिबंध है। प्रधान न्यायाधीश ने कहा, “हमें उच्च न्यायालय के आदेश में हस्तक्षेप करने का कोई कारण नहीं दिखता।”

    याचिकाकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि पुस्तक में सिगरेट के रूप में दिखाए गए चित्र के साथ पर्याप्त चेतावनी नहीं है और डिस्क्लेमर भी बहुत छोटा है। उन्होंने कहा कि स्पष्ट नहीं है कि यह सामान्य बीड़ी है या किसी अन्य प्रकार का तंबाकू उत्पाद।

    प्रधान न्यायाधीश ने याचिकाकर्ता के तर्कों को खारिज करते हुए कहा कि पुस्तक, लेखक या प्रकाशक का किसी भी प्रकार के तंबाकू उत्पादों के प्रचार से कोई संबंध नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि पाठक लेखक के विचारों से असहमत हो सकते हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि इस आधार पर मुकदमा दायर किया जाए।

    अदालत ने यह स्पष्ट किया कि पुस्तक केवल लेखक के अनुभव और संस्मरण पर आधारित है और इसमें किसी प्रकार का विज्ञापन या प्रचार शामिल नहीं है। पुस्तक में दिखाई गई तस्वीरें लेखक के निजी अनुभव को दर्शाती हैं, न कि किसी उत्पाद के प्रचार के लिए बनाई गई हैं।

    इस मामले में उच्च न्यायालय और सुप्रीम कोर्ट दोनों ने यह मान्यता दी कि लेखक और प्रकाशक ने किसी भी कानून का उल्लंघन नहीं किया है। अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि पुस्तक पाठकों तक अपनी कहानियों और विचारों के माध्यम से पहुँचना चाहती है, न कि किसी तंबाकू उत्पाद के प्रचार के लिए।

    अदालत का यह निर्णय लेखक की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और कला की स्वतंत्रता के दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि किसी को लेखक के विचार पसंद नहीं आते, तो उसके खिलाफ कानून द्वारा सीधे कार्रवाई नहीं की जा सकती।

    इस प्रकार, सुप्रीम न्यायालय ने अरुंधति रॉय की पुस्तक पर किसी भी प्रकार के प्रतिबंध को नकारते हुए याचिका खारिज कर दी। अदालत ने यह संदेश भी दिया कि पुस्तक, लेखक और प्रकाशक की जिम्मेदारी केवल पाठकों तक साहित्यिक सामग्री पहुँचाने तक सीमित है, और इसमें किसी तंबाकू उत्पाद के प्रचार का कोई तत्व नहीं है।