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  • 148 लोगों की मौत वाली रेल दुर्घटना में आरोपियों को नहीं मिलेगी जमानत, SC का कड़ा फैसला

    148 लोगों की मौत वाली रेल दुर्घटना में आरोपियों को नहीं मिलेगी जमानत, SC का कड़ा फैसला


    नई दिल्‍ली । सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court)ने ‘जेल नहीं, जमानत'(Bail) के सिद्धांत में अपवाद को जोड़ते हुए एक अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी आरोपी के जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता(Personal freedom) का अधिकार संरक्षित तो है, लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा और देश की संप्रभुता से जुड़े मामलों में केवल इसी आधार पर जमानत नहीं दी जा सकती। विशेषकर गैरकानूनी(illegal) गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम यानी UAPA जैसे कानूनों के तहत दर्ज मामलों में अदालत को व्यापक राष्ट्रीय हित को ध्यान में रखना होगा।

    जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. के. सिंह की पीठ ने यह टिप्पणी सीबीआई की उस अपील पर सुनवाई करते हुए की, जिसमें कलकत्ता हाईकोर्ट द्वारा दिए गए जमानत आदेश को चुनौती दी गई थी। यह मामला 9 जून 2010 को पश्चिम बंगाल में हुई भीषण रेल दुर्घटना से जुड़ा है, जब रेलवे ट्रैक से छेड़छाड़ किए जाने के कारण ज्ञानेश्वरी एक्सप्रेस पटरी से उतर गई और एक मालगाड़ी से टकरा गई। इस हादसे में 148 लोगों की मौत हुई थी और 170 से अधिक यात्री घायल हुए थे। पश्चिम बंगाल के पश्चिम मिदनापुर जिले में माओवादियों द्वारा रेलवे ट्रैक उखाड़ने से ज्ञानेश्वरी एक्सप्रेस पटरी से उतर गई थी और एक मालगाड़ी से टकरा गई थी। निर्दोष लोगों की मौतों के अलावा, सरकार को सार्वजनिक संपत्ति के नुकसान से करीब 25 करोड़ रुपये का घाटा हुआ था।

    राष्ट्रीय हित सर्वोपरि
    पीठ ने कहा कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता निरपेक्ष नहीं है। यह राष्ट्रीय हित, संप्रभुता और देश की अखंडता जैसे उच्चतर उद्देश्यों के अधीन है। अदालत ने कहा कि न्याय की तराजू को एक ओर संविधान द्वारा प्रदत्त अनुच्छेद 21 के अधिकार और दूसरी ओर राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे ‘न्यायसंगत अपवादों’ के बीच संतुलन बनाना होता है।

    फैसले को लिखते हुए जस्टिस संजय करोल ने कहा कि कुछ मामले अपनी प्रकृति और प्रभाव के कारण व्यापक दृष्टिकोण की मांग करते हैं, जहां मुद्दा केवल किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता का नहीं बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा का होता है।

    माओवादी साजिश और भारी नुकसान
    अदालत के अनुसार, यह रेल हादसा माओवादी कैडरों द्वारा अंजाम दी गई साजिश का नतीजा था। इसका उद्देश्य झारग्राम क्षेत्र में राज्य पुलिस और केंद्रीय अर्धसैनिक बलों की संयुक्त तैनाती को वापस लेने के लिए सरकार पर दबाव बनाना था। इस घटना में न केवल बड़ी संख्या में निर्दोष यात्रियों की जान गई और लोग घायल हुए, बल्कि सार्वजनिक संपत्ति को भी करीब 25 करोड़ रुपये का नुकसान पहुंचा।

    विरोध का अधिकार, लेकिन हिंसा नहीं
    सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि हर नागरिक को सरकार की नीतियों के खिलाफ कानून के दायरे में रहकर विरोध करने का संवैधानिक अधिकार है। लेकिन निर्दोष लोगों की जान लेने वाली बर्बर और अमानवीय हरकतों को किसी भी तरह से उचित नहीं ठहराया जा सकता। अदालत ने कहा कि ट्रेन पटरियों से छेड़छाड़ कर लगभग 150 यात्रियों की मौत का कारण बनने वाले कृत्य को किसी भी लोकतांत्रिक अधिकार के तहत संरक्षण नहीं दिया जा सकता।

    12 साल की कैद पर भी जमानत नहीं
    आरोपियों की ओर से यह दलील भी दी गई थी कि वे 12 साल से अधिक समय से जेल में हैं, इसलिए दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 436A के तहत उन्हें जमानत मिलनी चाहिए। इस धारा के अनुसार, यदि कोई अंडरट्रायल आरोपी किसी अपराध की अधिकतम सजा के आधे से अधिक समय तक जेल में रह चुका हो, तो उसे जमानत दी जा सकती है।

    हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को खारिज करते हुए कहा कि आतंकवादी कृत्यों जैसे अपराधों में संभावित सजा मृत्युदंड तक हो सकती है। ऐसे में 12 साल की कैद को धारा 436A के तहत जमानत का आधार नहीं बनाया जा सकता।

    UAPA में उलटा बोझ और निष्पक्ष सुनवाई
    अदालत ने UAPA के तहत आरोपियों पर डाले गए ‘रिवर्स बर्डन’ (उलटे बोझ) का भी उल्लेख किया, जिसमें आरोपी को खुद अपनी बेगुनाही साबित करनी होती है। सुप्रीम कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट्स को निर्देश दिया कि ऐसे मामलों में आरोपियों को उनके खिलाफ इस्तेमाल होने वाले सभी दस्तावेज समय पर उपलब्ध कराए जाएं, ताकि वे अपनी रक्षा की तैयारी कर सकें और निष्पक्ष सुनवाई सुनिश्चित हो सके।

    शीघ्र सुनवाई के निर्देश
    15 साल से अधिक पुराने इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने ट्रायल को तेजी से पूरा करने का आदेश दिया है, ताकि न्याय में और देरी न हो। इस फैसले को राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मामलों में जमानत के सिद्धांतों को स्पष्ट करने और ‘बेल, नॉट जेल’ के व्यापक सिद्धांत पर एक महत्वपूर्ण अपवाद के रूप में देखा जा रहा है।

  • पुस्तक में सिगरेट दिखाने को नहीं माना तंबाकू उत्पाद का प्रचार

    पुस्तक में सिगरेट दिखाने को नहीं माना तंबाकू उत्पाद का प्रचार


    नई दिल्ली। सुप्रीम न्यायालय ने शुक्रवार को अरुंधति रॉय की पुस्तक ‘मदर मैरी कम्स टू मी’ के संबंध में दायर याचिका खारिज कर दी। याचिका में पुस्तक की बिक्री, वितरण और प्रदर्शन पर रोक लगाने का अनुरोध किया गया था। याचिकाकर्ता का तर्क था कि पुस्तक के आवरण पर रॉय को सिगरेट पीते हुए दिखाया गया है, जो कानून का उल्लंघन है।

    केरल के उच्च न्यायालय द्वारा जनहित याचिका खारिज होने के बाद याचिकाकर्ता राजसिम्हन ने उच्चतम न्यायालय में अपील की थी। इस मामले की सुनवाई प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने की। पीठ ने याचिका खारिज करते हुए कहा कि पुस्तक में किसी प्रकार का सिगरेट या तंबाकू उत्पाद का प्रचार नहीं किया गया है और न ही लेखक ने ऐसा करने की कोशिश की है।

    प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि रॉय एक प्रसिद्ध लेखिका हैं और उन्होंने पुस्तक में कोई ऐसा संदेश नहीं दिया है जो तंबाकू उत्पादों के प्रचार के रूप में देखा जा सके। उन्होंने कहा कि पुस्तक में चेतावनी भी दी गई है और इसे केवल पाठकों के लिए प्रकाशित किया गया है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि शहर में किसी प्रकार की किताब की होर्डिंग नहीं लगाई गई है और यह मामला केवल पुस्तक के पाठक वर्ग तक सीमित है।

    पीठ ने यह भी कहा कि लेखक और प्रकाशक ने तंबाकू उत्पाद अधिनियम, 2003 की धारा पांच का उल्लंघन नहीं किया है। इस धारा के तहत सिगरेट और अन्य तंबाकू उत्पादों के विज्ञापन, प्रचार और प्रायोजन पर प्रतिबंध है। प्रधान न्यायाधीश ने कहा, “हमें उच्च न्यायालय के आदेश में हस्तक्षेप करने का कोई कारण नहीं दिखता।”

    याचिकाकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि पुस्तक में सिगरेट के रूप में दिखाए गए चित्र के साथ पर्याप्त चेतावनी नहीं है और डिस्क्लेमर भी बहुत छोटा है। उन्होंने कहा कि स्पष्ट नहीं है कि यह सामान्य बीड़ी है या किसी अन्य प्रकार का तंबाकू उत्पाद।

    प्रधान न्यायाधीश ने याचिकाकर्ता के तर्कों को खारिज करते हुए कहा कि पुस्तक, लेखक या प्रकाशक का किसी भी प्रकार के तंबाकू उत्पादों के प्रचार से कोई संबंध नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि पाठक लेखक के विचारों से असहमत हो सकते हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि इस आधार पर मुकदमा दायर किया जाए।

    अदालत ने यह स्पष्ट किया कि पुस्तक केवल लेखक के अनुभव और संस्मरण पर आधारित है और इसमें किसी प्रकार का विज्ञापन या प्रचार शामिल नहीं है। पुस्तक में दिखाई गई तस्वीरें लेखक के निजी अनुभव को दर्शाती हैं, न कि किसी उत्पाद के प्रचार के लिए बनाई गई हैं।

    इस मामले में उच्च न्यायालय और सुप्रीम कोर्ट दोनों ने यह मान्यता दी कि लेखक और प्रकाशक ने किसी भी कानून का उल्लंघन नहीं किया है। अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि पुस्तक पाठकों तक अपनी कहानियों और विचारों के माध्यम से पहुँचना चाहती है, न कि किसी तंबाकू उत्पाद के प्रचार के लिए।

    अदालत का यह निर्णय लेखक की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और कला की स्वतंत्रता के दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि किसी को लेखक के विचार पसंद नहीं आते, तो उसके खिलाफ कानून द्वारा सीधे कार्रवाई नहीं की जा सकती।

    इस प्रकार, सुप्रीम न्यायालय ने अरुंधति रॉय की पुस्तक पर किसी भी प्रकार के प्रतिबंध को नकारते हुए याचिका खारिज कर दी। अदालत ने यह संदेश भी दिया कि पुस्तक, लेखक और प्रकाशक की जिम्मेदारी केवल पाठकों तक साहित्यिक सामग्री पहुँचाने तक सीमित है, और इसमें किसी तंबाकू उत्पाद के प्रचार का कोई तत्व नहीं है।