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  • उज्जैन में 48 दिनों से टेंट में विराजमान खड़े हनुमान जी, 450 आवेदन मिलने के बाद अब 25 अक्टूबर की बैठक पर नजर

    उज्जैन में 48 दिनों से टेंट में विराजमान खड़े हनुमान जी, 450 आवेदन मिलने के बाद अब 25 अक्टूबर की बैठक पर नजर

    मध्य प्रदेश: के उज्जैन में खड़े हनुमान मंदिर का विवाद अब तक सुलझ नहीं पाया है। छत्री चौक क्षेत्र में सड़क चौड़ीकरण के दौरान प्राचीन मंदिर को हटाए जाने के बाद हनुमान जी की प्रतिमा पिछले 48 दिनों से टेंट में विराजमान है। श्रद्धालु लगातार मांग कर रहे हैं कि प्रतिमा को मंदिर में स्थापित किया जाए। इस मामले में विश्व हिंदू परिषद का कहना है कि प्रशासन की ओर से अब तक कोई प्रस्ताव नहीं आया है। अब 25 अक्टूबर के आसपास प्रशासन और संबंधित कमेटी के बीच संभावित बैठक पर सबकी नजरें टिकी हैं।

    उज्जैन में कंठल चौराहे से छत्री चौक तक सड़क चौड़ीकरण का काम चल रहा है। इसी दौरान खड़े हनुमान जी के प्राचीन मंदिर को हटाया गया था, लेकिन प्रतिमा अब भी उसी स्थान पर टेंट के नीचे रखी हुई है। रोजाना श्रद्धालु यहां दर्शन के लिए पहुंच रहे हैं। मंदिर को लेकर भक्तों की मांग है कि प्रतिमा को उचित स्थान और मंदिर में स्थापित किया जाए, ताकि पूजा-अर्चना पहले की तरह हो सके।

    इस मुद्दे को लेकर श्रद्धालुओं की धार्मिक भावनाएं भी जुड़ी हुई हैं। भक्तों का कहना है कि भगवान श्रीराम के भव्य मंदिर में विराजमान होने के बाद उनके परम भक्त हनुमान जी को भी मंदिर में स्थान मिलना चाहिए। उनका मानना है कि प्रतिमा का लंबे समय तक टेंट में रहना उनकी आस्था को प्रभावित कर रहा है। इसी मांग को लेकर क्षेत्र में हवन, यज्ञ और सुंदरकांड जैसे धार्मिक आयोजन भी किए गए। इनमें श्रद्धालुओं के साथ साधु-संत और जनप्रतिनिधि शामिल हुए। आयोजनों के दौरान प्रतिमा को मौजूदा स्थान पर ही बनाए रखने की मांग उठाई गई।

    विश्व हिंदू परिषद के उज्जैन जिलाध्यक्ष राजेश आंजना के मुताबिक, मामले की स्थिति अब भी पहले दिन जैसी बनी हुई है। उनका कहना है कि प्रशासन की तरफ से अब तक कोई प्रस्ताव नहीं मिला है। संगठन को इस मुद्दे पर अब तक 450 आवेदन प्राप्त हुए हैं। आंजना के अनुसार, इन आवेदनों के साथ करीब 45 हजार हस्ताक्षर होने की बात कही गई है। इसके अलावा 150 पंचायतों, व्यापारियों और 50 समाजों की ओर से भी प्रतिमा को उसी स्थान पर रखने की मांग की गई है। ये आंकड़े संगठन की ओर से बताए गए हैं।

    मंदिर के आकार और निर्माण को लेकर भी चर्चा हो रही है। आंजना ने कहा कि शासन-प्रशासन को मंदिर के लिए स्पष्ट मापदंड तय करने चाहिए। उन्होंने मंदिर के लिए उपलब्ध जगह और उसके निर्माण से जुड़े पहलुओं पर भी ध्यान देने की जरूरत बताई। हालांकि, अब तक प्रशासन की ओर से किसी प्रस्ताव या अंतिम निर्णय की जानकारी सामने नहीं आई है।

    इस बीच खड़े हनुमान जी के दर्शन के लिए श्रद्धालुओं का पहुंचना जारी है। पुजारी महेश बैरागी के अनुसार, रोजाना लगभग पांच से दस हजार लोग दर्शन करने आते हैं। उनके मुताबिक, इस सप्ताह झारखंड, बिहार, पश्चिम बंगाल, मिजोरम और पड़ोसी देश नेपाल से भी श्रद्धालु पहुंचे हैं। इस तरह मंदिर से जुड़ा मामला स्थानीय स्तर तक सीमित नहीं रहा और दूर-दराज से लोग दर्शन के लिए उज्जैन आ रहे हैं।

    अब 25 अक्टूबर के आसपास प्रशासन और कमेटी के बीच संभावित बैठक को अहम माना जा रहा है। विश्व हिंदू परिषद इस मामले में प्रशासन से बातचीत कर समाधान चाहता है। फिलहाल प्रतिमा टेंट में ही विराजमान है और श्रद्धालुओं की प्रमुख मांग यही है कि खड़े हनुमान जी को उनके स्थान पर मंदिर में स्थापित किया जाए। बैठक में कोई सहमति बनती है या नहीं, इस पर आगे की स्थिति निर्भर करेगी।

  • आंध्र प्रदेश के मंदिर में महालक्ष्मी का साढ़े चार करोड़ रुपये के नोटों से भव्य शृंगार

    आंध्र प्रदेश के मंदिर में महालक्ष्मी का साढ़े चार करोड़ रुपये के नोटों से भव्य शृंगार


    नई दिल्ली । 
    आंध्र प्रदेश के कोनासीमा जिले के अमलापुरम स्थित श्री वासवी कन्यका परमेश्वरी मंदिर में शारदीय नवरात्र के अवसर पर देवी महालक्ष्मी का अनोखा शृंगार किया गया। करीब साढ़े चार करोड़ रुपये के करेंसी नोटों से की गई इस विशेष सजावट ने श्रद्धालुओं का ध्यान आकर्षित किया है। मंदिर में देवी की प्रतिमा को अलग-अलग रंगों के नोटों से बनी आकर्षक मालाओं से सजाया गया। इसके अलावा मंदिर के आसपास के हिस्सों में भी करेंसी नोटों का इस्तेमाल करके विशेष सजावट की गई है। इस अनूठे शृंगार को देखने और देवी के दर्शन करने के लिए दूर-दूर से श्रद्धालु पहुंच रहे हैं।

    मंदिर में नवरात्र के दौरान की गई यह सजावट अपनी भव्यता और इसे तैयार करने में लगी मेहनत के कारण चर्चा में है। करेंसी नोटों को व्यवस्थित तरीके से सजाकर मालाओं का रूप दिया गया, जिन्हें देवी के शृंगार में शामिल किया गया। अलग-अलग रंगों के नोटों को बारीकी से जोड़कर तैयार की गई इन मालाओं ने मंदिर की सजावट को विशिष्ट रूप दिया। इस आयोजन में श्रद्धालुओं की भागीदारी भी अहम रही, क्योंकि सजावट के लिए इस्तेमाल किए गए नोट भक्तों की ओर से उपलब्ध कराए गए थे।

    मंदिर समिति के सदस्यों के अनुसार, करेंसी नोटों से बनी विशेष मालाओं को तैयार करने में लगभग 15 दिन का समय लगा। इस दौरान नोटों को सावधानीपूर्वक व्यवस्थित करके मालाएं बनाई गईं और फिर उनका इस्तेमाल देवी के शृंगार तथा मंदिर परिसर की सजावट के लिए किया गया। इस पूरी प्रक्रिया में समय और मेहनत लगी। नवरात्र के दौरान मंदिर में होने वाले धार्मिक आयोजनों के बीच नोटों से किया गया यह विशेष शृंगार आकर्षण का प्रमुख केंद्र बना हुआ है।

    इस आयोजन की एक खास बात यह है कि सजावट पूरी होने के बाद करेंसी नोटों को मंदिर में स्थायी रूप से नहीं रखा जाएगा। मंदिर समिति के सदस्यों के मुताबिक, जिन श्रद्धालुओं ने सजावट के लिए नोट दिए हैं, उन्हें नवरात्र के बाद उनकी राशि वापस लौटा दी जाएगी। इस तरह नोटों का इस्तेमाल देवी के विशेष शृंगार के लिए किया गया है और बाद में उन्हें संबंधित श्रद्धालुओं तक पहुंचाया जाएगा।

    कुछ श्रद्धालुओं के बीच यह मान्यता भी प्रचलित है कि मंदिर में देवी के शृंगार में इस्तेमाल किए गए नोटों को घर या व्यावसायिक प्रतिष्ठान में रखने से सौभाग्य और समृद्धि प्राप्त होती है। उनका विश्वास है कि ऐसे नोट कारोबार में खुशहाली की कामना से जुड़े होते हैं। इसी कारण नोटों से किए गए इस शृंगार को धार्मिक आस्था के साथ आर्थिक समृद्धि की इच्छा से भी जोड़कर देखा जा रहा है। हालांकि, यह श्रद्धालुओं की धार्मिक मान्यता है।

    श्री वासवी कन्यका परमेश्वरी मंदिर में नवरात्र के दौरान हर साल विशेष पूजा-अर्चना और धार्मिक अनुष्ठान किए जाते हैं। इस अवसर पर देवी को विशेष भोग अर्पित किया जाता है, जिसे बाद में श्रद्धालुओं में वितरित किया जाता है। मंदिर परिसर में उत्सव के अनुरूप सजावट और तैयारियां भी की जाती हैं। इस बार करीब साढ़े चार करोड़ रुपये के नोटों से किया गया महालक्ष्मी का शृंगार इन आयोजनों का प्रमुख आकर्षण बना है। श्रद्धालुओं के लिए यह आयोजन देवी के दर्शन, धार्मिक परंपरा और सामूहिक सहभागिता का विशेष अवसर है।

  • बैतूल के मां चंडी दरबार पर बढ़ा विवाद, आदिवासी संगठनों ने मंदिर और जमीन का प्रबंधन ग्राम सभा को सौंपने की मांग उठाई

    बैतूल के मां चंडी दरबार पर बढ़ा विवाद, आदिवासी संगठनों ने मंदिर और जमीन का प्रबंधन ग्राम सभा को सौंपने की मांग उठाई


    मध्य प्रदेश ।
    के बैतूल जिले की चिचोली तहसील के गोधना गांव में स्थित मां चंडी दरबार को लेकर विवाद बढ़ गया है। रविवार को जिले के अलग-अलग इलाकों से आदिवासी समुदाय और सामाजिक संगठनों के लोग मंदिर परिसर पहुंचे और प्रदर्शन किया। प्रदर्शनकारियों ने गर्भगृह के पास बलि देकर अपना विरोध दर्ज कराया। उनकी प्रमुख मांग है कि मंदिर और उससे जुड़ी जमीन का प्रबंधन ग्राम सभा को सौंपा जाए, ताकि धार्मिक परंपराओं और स्थानीय मान्यताओं से जुड़े फैसलों में समुदाय की भागीदारी बनी रहे।

    आदिवासी समाज का कहना है कि मां चंडी दरबार सैकड़ों साल पुराना धार्मिक स्थल है और उसका गहरा संबंध उनकी आस्था तथा परंपराओं से है। समुदाय के लोगों के मुताबिक, मां चंडी को कली कंकाली दाई के नाम से भी जाना जाता है और गोंडवाना शासन के समय से ही उन्हें आदिवासी समाज की आराध्य माना जाता रहा है। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि मंदिर का संचालन निजी हाथों में जाने के बाद से उनकी नाराजगी बढ़ी है। उनका आरोप है कि नई व्यवस्था के कारण पूजा-पाठ और मंदिर प्रबंधन से जुड़ी पुरानी परंपराओं में बदलाव किए गए हैं।

    मंदिर के संचालन को लेकर मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के आदेश के बाद व्यवस्था में बदलाव हुआ है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, अदालत के आदेश के बाद मंदिर का संचालन स्थानीय यादव परिवार को सौंपा गया। आदिवासी समुदाय का आरोप है कि इसके बाद पहले से चली आ रही पूजा-पाठ की व्यवस्था में परिवर्तन किया गया और पुरानी संचालन समिति को हटा दिया गया। इसके साथ ही पुराने मंदिर के ढांचे को हटाकर नया निर्माण कराया जा रहा है। समुदाय के लोगों का कहना है कि इन बदलावों से उनकी धार्मिक मान्यताओं और परंपराओं पर असर पड़ रहा है।

    प्रदर्शनकारियों ने मांग की है कि मंदिर और जमीन के प्रबंधन से संबंधित निर्णय ग्राम सभा की भागीदारी से लिए जाएं। उनका कहना है कि स्थानीय लोगों की आस्था से जुड़े विषयों में समुदाय की राय को महत्व दिया जाना चाहिए। आदिवासी समाज के मुताबिक, हर रविवार और बुधवार को मां चंडी दरबार में बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। ऐसे में मंदिर की पूजा व्यवस्था और परंपराओं को लेकर होने वाले फैसलों में स्थानीय समुदाय की भूमिका महत्वपूर्ण है।

    आदिवासी संगठनों ने अपनी मांग के समर्थन में पेसा कानून और वनाधिकार कानून का भी उल्लेख किया है। उनका कहना है कि इन कानूनों में आदिवासी परंपराओं और अधिकारों की रक्षा से संबंधित प्रावधान हैं। समुदाय के लोग हाईकोर्ट के फैसले का सम्मान करने की बात कह रहे हैं, लेकिन उनका आरोप है कि मामले की सुनवाई के दौरान जिला प्रशासन की ओर से जरूरी तथ्य अदालत के सामने नहीं रखे गए। यह आरोप आदिवासी समाज की ओर से लगाया गया है।

    दूसरी ओर, मंदिर के संचालन से जुड़े विवाद में यादव परिवार की जमीन होने की बात भी सामने आई है। विवाद बढ़ने के बाद परिवार ने सहयोग करने की बात कही है। हालांकि, उपलब्ध जानकारी में परिवार की ओर से सहयोग के स्वरूप या प्रबंधन को ग्राम सभा को सौंपने की मांग पर किसी विस्तृत निर्णय का उल्लेख नहीं है।

    मां चंडी दरबार को लेकर विवाद का मुख्य केंद्र मंदिर की संचालन व्यवस्था, जमीन के प्रबंधन और पारंपरिक पूजा-पद्धति में बदलाव का मुद्दा है। आदिवासी और सामाजिक संगठनों ने स्पष्ट किया है कि वे मंदिर और जमीन के प्रबंधन में ग्राम सभा की भागीदारी चाहते हैं। फिलहाल, इस मांग और उससे जुड़े आरोपों के बीच मंदिर के संचालन को लेकर विवाद बना हुआ है।

  • देवास की माता टेकरी की अनोखी कथा, रूठकर पाताल में समाने लगीं बड़ी माता तो छोटी माता ने छोड़ी टेकरी

    देवास की माता टेकरी की अनोखी कथा, रूठकर पाताल में समाने लगीं बड़ी माता तो छोटी माता ने छोड़ी टेकरी

    मध्य प्रदेश: के देवास शहर की ऐतिहासिक माता टेकरी धार्मिक आस्था और प्राचीन मान्यताओं के लिए विशेष पहचान रखती है। यहां स्थित मां तुलजा भवानी और मां चामुंडा के मंदिरों में सालभर श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं। नवरात्रि के दौरान दोनों मंदिरों में विशेष उत्साह दिखाई देता है। इस अवसर पर मंदिरों को आकर्षक रोशनी से सजाया गया है और बड़ी संख्या में श्रद्धालु पूजा-अर्चना कर रहे हैं। मान्यता है कि दोनों देवियों के यहां विराजमान होने के कारण ही इस स्थान का नाम देवास पड़ा। माता टेकरी से जुड़ी कई लोककथाएं प्रचलित हैं, जिनमें दो रूठी हुई बहनों की कहानी विशेष रूप से प्रसिद्ध है।

    लोकमान्यता के अनुसार, माता टेकरी पर विराजित मां तुलजा भवानी को बड़ी माता और मां चामुंडा को छोटी माता कहा जाता है। प्रचलित कथा के मुताबिक, एक बार किसी बात को लेकर दोनों बहनों के बीच विवाद हो गया। इससे नाराज होकर दोनों ने टेकरी छोड़ने का फैसला कर लिया। बड़ी माता क्रोधित होकर पाताल में समाने लगीं, जबकि छोटी माता टेकरी से नीचे उतरने लगीं। जब इस घटना की जानकारी भैरवजी और हनुमानजी को मिली तो वे दोनों देवियों को मनाने पहुंचे। उस समय तक बड़ी माता का आधा शरीर पाताल में समा चुका था और छोटी माता टेकरी से काफी नीचे उतर आई थीं। देवताओं ने दोनों से रुकने और वापस लौटने की विनती की। उनकी प्रार्थना स्वीकार करते हुए दोनों देवियां उसी अवस्था में रुक गईं। लोकविश्वास के अनुसार, इसी वजह से बड़ी माता के आधे स्वरूप को पाताल में माना जाता है। यह कथा आज भी माता टेकरी की धार्मिक परंपराओं का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

    माता टेकरी को लेकर एक अन्य धार्मिक मान्यता भी प्रचलित है। इसे रक्तपीठ के रूप में मान्यता प्राप्त है। धार्मिक विश्वास के अनुसार, यहां माता सती के हृदय से रक्त की बूंदें गिरी थीं। इसी पवित्र स्थान पर पहाड़ों के बीच से मां चामुंडा के प्रकट होने की मान्यता है, जबकि मां तुलजा भवानी को स्वयंभू माना जाता है। इन मान्यताओं के कारण माता टेकरी का धार्मिक महत्व और बढ़ जाता है। नवरात्रि के दौरान यहां पहुंचने वाले श्रद्धालु दोनों देवियों के दर्शन कर पूजा-अर्चना करते हैं और अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए प्रार्थना करते हैं।

    देवास के इतिहास में भी दोनों मंदिरों का विशेष स्थान रहा है। यहां कभी पवार राजवंश की दो रियासतें थीं, जिन्हें सीनियर और जूनियर रियासत के नाम से जाना जाता था। मान्यता के अनुसार, मां तुलजा भवानी जूनियर रियासत की कुलदेवी थीं, जबकि मां चामुंडा सीनियर रियासत की कुलदेवी मानी जाती थीं। इसी परंपरा के चलते दोनों देवियों के मंदिरों का राजपरिवार और स्थानीय धार्मिक संस्कृति से गहरा संबंध रहा है। आज भी श्रद्धालु इन मंदिरों को आस्था के प्रमुख केंद्र के रूप में देखते हैं।

    माता टेकरी को नाथ संप्रदाय की साधना स्थली के रूप में भी जाना जाता है। इस स्थान की परंपराएं गुरु गोरक्षनाथ, राजा भर्तृहरि और शीलनाथ महाराज जैसे योगियों से जुड़ी हुई हैं। लोककथाओं में टेकरी से उज्जैन तक लगभग 45 किलोमीटर लंबी गुप्त सुरंग होने का उल्लेख भी मिलता है। मान्यता है कि राजा भर्तृहरि इस सुरंग के रास्ते यहां आते थे, हालांकि इस दावे की ऐतिहासिक पुष्टि आवश्यक है।

    नवरात्रि के अवसर पर माता टेकरी के दोनों मंदिरों को आकर्षक विद्युत रोशनी से सजाया गया है। श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए पेयजल की व्यवस्था की गई है और गर्मी से राहत देने के लिए कारपेट बिछाए गए हैं। नौ दिनों तक मंदिरों में चौबीस घंटे दर्शन की व्यवस्था रहती है। कई श्रद्धालु घुटनों के बल तो कुछ व्हीलचेयर के सहारे माता के दरबार तक पहुंच रहे हैं। शहर के विभिन्न स्थानों पर भंडारे आयोजित किए जा रहे हैं, जहां इंदौर, उज्जैन और आसपास के क्षेत्रों से आने वाले श्रद्धालु प्रसादी ग्रहण कर रहे हैं। रसूलपुर चौराहे से इंदिरा गांधी चौराहे तक विद्युत सजावट और विभिन्न स्थानों पर भगवा ध्वजों के साथ देवास में नवरात्रि का धार्मिक उत्साह दिखाई दे रहा है।

  • चामुंडा मंदिर में गुप्त दानदाता ने दिए 3 किलो सोना और 6 क्विंटल चांदी, गर्भगृह का बदलेगा स्वरूप

    चामुंडा मंदिर में गुप्त दानदाता ने दिए 3 किलो सोना और 6 क्विंटल चांदी, गर्भगृह का बदलेगा स्वरूप


    नई दिल्ली । हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले में स्थित प्रसिद्ध श्री चामुंडा नंदकेश्वर धाम के नवीनीकरण का काम तेजी से चल रहा है। करीब 400 साल पुराने इस धार्मिक स्थल को नए स्वरूप में सजाने के लिए एक गुमनाम दानदाता ने बड़ी मात्रा में सोना और चांदी देने का निर्णय लिया है। पंजाब से जुड़े इस दानदाता की ओर से देवी चामुंडा के सिंहासन के लिए 3 किलो सोना और गर्भगृह की सजावट के लिए 6 क्विंटल चांदी देने की बात सामने आई है।

    मंदिर प्रशासन के मुताबिक, दानदाता ने अपनी पहचान सार्वजनिक नहीं करने का अनुरोध किया है। पहले से मंदिर में मौजूद करीब 2.85 क्विंटल चांदी को भी नए दान के साथ मिलाकर गर्भगृह की सजावट में इस्तेमाल किया जाएगा। इस तरह मंदिर के गर्भगृह को सजाने के लिए उपलब्ध चांदी की कुल मात्रा काफी अधिक हो जाएगी।

    श्री चामुंडा नंदकेश्वर धाम देवी चामुंडा को समर्पित है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार देवी ने चंड और मुंड नाम के राक्षसों का वध किया था। इसी प्रसंग से देवी के चामुंडा स्वरूप का संबंध बताया जाता है। मंदिर परिसर में देवी के मुख्य मंदिर के साथ भगवान शिव का स्वयंभू शिवलिंग भी स्थित है। इसी वजह से यह स्थान चामुंडा नंदकेश्वर धाम के नाम से भी जाना जाता है।

    नवीनीकरण के तहत गर्भगृह में विशेष मार्बल लगाया जा रहा है। इसके लिए वियतनाम से मार्बल मंगाया जा रहा है, जबकि मंदिर के अन्य हिस्सों में राजस्थान के मकराना का मार्बल इस्तेमाल किया जा रहा है। मंदिर में पत्थर और मार्बल से जुड़े काम को तेजी से पूरा किया जा रहा है। उम्मीद है कि नवीनीकरण का यह चरण इस साल के अंत तक पूरा हो जाएगा।

    मंदिर के नंदकेश्वर हिस्से को सुंदर बनाने का काम पहले ही पूरा किया जा चुका है। यहां एक स्वयंभू शिवलिंग स्थित है, जिसके ऊपर एक बड़ा पत्थर मौजूद है। इसके अलावा यज्ञशाला का काम भी पूरा हो चुका है। मंदिर परिसर में किए जा रहे कई अन्य कार्यों में भी दानदाताओं का सहयोग लिया जा रहा है। इनमें से कुछ दानदाताओं ने अपनी पहचान सार्वजनिक नहीं करने की इच्छा जताई है।

    चामुंडा धाम धार्मिक आस्था के साथ अपनी परंपराओं के लिए भी जाना जाता है। विवाह के बाद नए शादीशुदा जोड़े यहां दर्शन और पूजा-अर्चना के लिए पहुंचते हैं। इसके अलावा देश के अलग-अलग हिस्सों से श्रद्धालु पूरे वर्ष मंदिर में आते हैं। मंदिर बानेर नदी के किनारे स्थित है और हर साल बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां दर्शन के लिए पहुंचते हैं।

    मंदिर से जुड़ी स्थानीय धार्मिक मान्यता के अनुसार, कई सदियों पहले एक स्थानीय राजा और पुजारी ने देवी से प्रार्थना की थी कि उनका पवित्र स्थान पहाड़ी की दुर्गम चोटी से हटाकर ऐसी जगह स्थापित किया जाए, जहां श्रद्धालुओं के लिए पहुंचना आसान हो। मान्यता है कि देवी ने पुजारी के सपने में आकर बानेर नदी के किनारे एक स्थान पर खुदाई करने को कहा था।

    कहा जाता है कि खुदाई के दौरान वहां पत्थर की एक प्राचीन मूर्ति मिली। शुरुआत में लोगों ने उसे सामान्य चट्टान समझा और कई लोगों ने उसे उठाने का प्रयास किया, लेकिन वे सफल नहीं हुए। बाद में पुजारी ने स्नान कर श्रद्धापूर्वक वहां पहुंचकर मूर्ति को आसानी से उठा लिया और उसे वर्तमान स्थान पर स्थापित किया। इसी घटना को मंदिर की स्थापना से जुड़ी प्रमुख धार्मिक मान्यताओं में गिना जाता है।

  • जमशेदपुर के 300 साल पुराने हाथी खेदा मंदिर के अनोखे नियम, महिलाओं को नहीं मिलता प्रसाद


    रांची।
    झारखंड के जमशेदपुर के पास दलमा की पहाड़ियों और घने जंगलों के बीच स्थित हाथी खेदा ठाकुर मंदिर अपनी अनूठी परंपराओं और मान्यताओं के लिए जाना जाता है। करीब 300 साल पुराने इस मंदिर में किसी देवी-देवता की पारंपरिक प्रतिमा नहीं है। यहां मिट्टी से बने हाथियों की पूजा की जाती है। स्थानीय लोगों के बीच यह परंपरा पीढ़ियों से चली आ रही है।

    हाथियों के आतंक से जुड़ी है मंदिर की कहानी

    स्थानीय ग्रामीणों के अनुसार, सैकड़ों साल पहले दलमा के जंगलों में जंगली हाथियों का आतंक था। हाथियों के झुंड रात के समय गांवों में घुसकर फसलों को नुकसान पहुंचाते थे। ग्रामीण ढोल बजाकर और मशालें जलाकर हाथियों को दूर रखने की कोशिश करते थे, लेकिन समस्या बनी रही।

    बताया जाता है कि इसके बाद गांव के बुजुर्गों की सलाह पर लोगों ने मिट्टी के हाथी बनाकर उनकी पूजा शुरू की। स्थानीय मान्यता के अनुसार, इसके बाद हाथियों के गांवों में आने की घटनाएं कम होने लगीं। स्थानीय भाषा में ‘खेदा’ का अर्थ भगाना या दूर रखना बताया जाता है। इसी वजह से मंदिर का नाम हाथी खेदा पड़ा।

    मंदिर में सिर्फ मिट्टी के हाथियों की पूजा

    हाथी खेदा मंदिर की सबसे खास बात यहां मौजूद मिट्टी के हाथी हैं। मंदिर परिसर में संगमरमर या धातु से बनी किसी पारंपरिक देवी-देवता की प्रतिमा के बजाय अलग-अलग आकार के मिट्टी के हाथी दिखाई देते हैं।

    मान्यता के अनुसार, श्रद्धालु अपनी मन्नत पूरी होने की कामना से यहां मिट्टी का हाथी चढ़ाते हैं। इसके अलावा नारियल, धूप, दीप और चुनरी चढ़ाने की परंपरा भी है।

    मन्नत पूरी होने पर बलि की परंपरा

    मंदिर से कई स्थानीय और आदिवासी रीति-रिवाज भी जुड़े हुए हैं। श्रद्धालुओं की ओर से मन्नत पूरी होने पर बकरे या भेड़ की बलि देने की परंपरा का भी उल्लेख मिलता है। स्थानीय लोगों के लिए यह सदियों पुरानी आस्था और परंपरा का हिस्सा है।

    प्रसाद को लेकर सख्त मान्यता

    हाथी खेदा मंदिर में प्रसाद को लेकर भी एक अनोखी परंपरा बताई जाती है। स्थानीय मान्यता के मुताबिक, मंदिर में चढ़ाया गया प्रसाद महिलाओं को नहीं दिया जाता। इसके अलावा श्रद्धालुओं को प्रसाद मंदिर परिसर में ही ग्रहण करना होता है और उसे घर ले जाने की अनुमति नहीं है। मंदिर आने वाले श्रद्धालु इन परंपराओं का पालन करते हैं और इन्हें स्थानीय धार्मिक आस्था का हिस्सा मानते हैं।

    त्योहारों पर लगता है मेला

    मकर संक्रांति, चैत्र महीने और स्थानीय आदिवासी त्योहारों के दौरान हाथी खेदा मंदिर में बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। मंगलवार और रविवार को भी यहां विशेष भीड़ रहती है।

    आज भी दलमा के जंगलों में जंगली हाथियों की मौजूदगी रहती है। ऐसे में हाथी खेदा मंदिर स्थानीय लोगों की धार्मिक आस्था के साथ-साथ जंगल और वहां रहने वाले वन्यजीवों के साथ उनके ऐतिहासिक संबंध की एक अलग तस्वीर पेश करता है।

  • अमेरिका में सत्यनारायण पूजा करवाना क्यों पड़ता है महंगा, पंडित की फीस से लेकर मंदिर और पूजा सामग्री तक जानें पूरा खर्च

    अमेरिका में सत्यनारायण पूजा करवाना क्यों पड़ता है महंगा, पंडित की फीस से लेकर मंदिर और पूजा सामग्री तक जानें पूरा खर्च

    नई दिल्ली । भारत में सत्यनारायण भगवान की कथा या पूजा करवाना आम बात है। खास मौकों, गृह प्रवेश, शादी के बाद, नामकरण या नए कारोबार की शुरुआत जैसे अवसरों पर लोग अपने घर में पंडित को बुलाकर पूजा करवाते हैं। पूजा की सामग्री जुटाने से लेकर पंडित की व्यवस्था तक ज्यादातर काम आसानी से हो जाता है। लेकिन अमेरिका में यही पूजा करवाना काफी महंगा और मेहनत वाला काम हो सकता है।

    भारत में सत्यनारायण पूजा सामान्य तौर पर कुछ हजार रुपये में हो जाती है। छोटे शहरों और गांवों में इसका खर्च करीब दो से पांच हजार रुपये तक हो सकता है, जबकि दिल्ली, मुंबई और बेंगलुरु जैसे बड़े शहरों में भी करीब 15 से 20 हजार रुपये में पूजा करवाई जा सकती है। इसके मुकाबले अमेरिका में इसी पूजा का खर्च काफी ज्यादा हो सकता है।

    अमेरिका में सत्यनारायण पूजा के लिए पंडित की फीस 300 डॉलर या उससे अधिक हो सकती है। भारत की तरह वहां हर शहर, कस्बे या इलाके में आसानी से पंडित उपलब्ध नहीं होते। ऐसे में कई दिन पहले बुकिंग करानी पड़ सकती है। पंडित अगर किसी दूसरे शहर या दूर की जगह से आ रहे हैं तो उनके आने-जाने का खर्च भी यजमान को उठाना पड़ सकता है।

    दूरी के हिसाब से पंडित के आने-जाने का खर्च करीब 50 डॉलर से लेकर 100 या 150 डॉलर तक हो सकता है। यानी पूजा के शुरुआती खर्च में ही पंडित की फीस के साथ यात्रा का खर्च जुड़ जाता है।

    अगर कोई व्यक्ति अपने घर या ऑफिस की जगह मंदिर में सत्यनारायण पूजा करवाना चाहता है, तो वहां भी पहले से बुकिंग करानी पड़ सकती है। मंदिर में पूजा करवाने के लिए अलग से शुल्क देना पड़ सकता है, जो करीब 100 से 150 डॉलर तक बताया गया है। इसके बाद पूजा सामग्री का खर्च सामने आता है।

    अमेरिका में भारत की तुलना में पूजा सामग्री हर जगह आसानी से उपलब्ध नहीं होती। फल, फूल, प्रसाद, कलश, पान, सुपारी और पूजा में इस्तेमाल होने वाली अन्य जरूरी चीजों के लिए कई किलोमीटर की यात्रा करनी पड़ सकती है। कुछ सामग्री की कीमत भी भारत के मुकाबले अधिक हो सकती है। केले का पत्ता तक वहां महंगा मिल सकता है।

    प्रसाद की व्यवस्था भी खर्च बढ़ा सकती है। यदि घर पर प्रसाद बनाया जाए तो अलग बात है, लेकिन बाहर से ऑर्डर करने पर अतिरिक्त पैसा खर्च होता है। इन सभी खर्चों को जोड़ने के बाद अमेरिका में सत्यनारायण पूजा का कुल खर्च 1000 डॉलर यानी करीब एक लाख रुपये या उससे अधिक तक पहुंच सकता है।

    भारत में पूजा के खर्च में पंडित की फीस करीब 1100 से 5100 रुपये, पूजा सामग्री 500 से 2000 रुपये, ताजे फल 500 से 2000 रुपये, पंचामृत और प्रसाद 500 से 1000 रुपये तथा मुख्य प्रसाद के लिए करीब 300 से 1500 रुपये तक खर्च हो सकता है। हालांकि, जगह और आयोजन के स्तर के अनुसार यह रकम कम या ज्यादा हो सकती है।

    अमेरिका हो या भारत, यदि पूजा बड़े स्तर पर आयोजित की जाए तो सजावट, मेहमानों की संख्या और भोजन जैसी व्यवस्थाओं से खर्च कई गुना बढ़ सकता है। अमेरिका में भारतीय त्योहारों के दौरान पंडितों की मांग बढ़ने से फीस भी अधिक हो सकती है। नवरात्र, दिवाली, गणेश चतुर्थी, जन्माष्टमी और महाशिवरात्रि जैसे अवसरों पर मांग बढ़ने के कारण पूजा से जुड़ा कुल खर्च और बढ़ सकता है।

  • मुरैना में जन्माष्टमी पर मातम: मंदिर से लौट रही तीन महिलाओं को कंटेनर ने रौंदा, सास-बहू सहित एक अन्य की मौत

    मुरैना में जन्माष्टमी पर मातम: मंदिर से लौट रही तीन महिलाओं को कंटेनर ने रौंदा, सास-बहू सहित एक अन्य की मौत


    मुरैना। जन्माष्टमी की खुशी मातम में बदल गई। राष्ट्रीय राजमार्ग 44 पर शनिवार तडक़े तेज रफ्तार कंटेनर ने तीन महिलाओं को कुचल दिया। तीनों महिलाएं घिरोना हनुमान मंदिर में श्रीकृष्ण जन्म के दर्शन कर घर लौट रही थीं। हादसे में तीनों की मौत हो गई। जानकारी के अनुसार हादसा तडक़े करीब 4 बजे का है। हरफूल का पुरा गांव की रहने वाली महिलाएं रात में घिरोना हनुमान मंदिर में आयोजित जन्मोत्सव कार्यक्रम में शामिल होने गई थीं। दर्शन के बाद तीनों पैदल ही हाईवे किनारे से अपने घर लौट रही थीं। तभी दिल्ली की ओर जा रहे तेज रफ्तार कंटेनर ने उन्हें पीछे से टक्कर मार दी। टक्कर इतनी जबरदस्त थी कि एक महिला की मौके पर ही मौत हो गई, जबकि सास-बहू गंभीर रूप से घायल हो गईं। चीख-पुकार सुनकर ग्रामीण मौके पर पहुंचे और पुलिस को सूचना दी।
    सिविल लाइन थाना पुलिस ने घायलों को तुरंत जिला अस्पताल पहुंचाया, लेकिन उपचार के दौरान दोनों ने दम तोड़ दिया।
    इन महिलाओं की हुई मौत –
    मृतकों की पहचान कमला कुशवाहा पत्नी फूल सिंह (50), कमला कुशवाहा पत्नी बालकिशन (50) और पूनम कुशवाहा पत्नी धर्मवीर (28) के रूप में हुई है। तीनों हरफूल का पुरा, थाना सिविल लाइन की निवासी थीं।
    बताया जा रहा है कि पूनम अपनी दो सास के साथ मंदिर गई थी। हादसे के बाद कंटेनर चालक नियंत्रण खो बैठा और सडक़ किनारे बनी कुछ दुकानों में जा घुसा। इससे दुकानों को भी नुकसान पहुंचा है।
    ग्रामीणों ने कंटेनर को घेर लिया और चालक को पकडक़र पुलिस के हवाले कर दिया। पुलिस ने कंटेनर को जब्त कर चालक को हिरासत में ले लिया है।
    तीनों शवों का पोस्टमार्टम कराकर परिजनों को सौंप दिया गया है। गांव में एक साथ तीन अर्थियां उठने से पूरे इलाके में शोक का माहौल है।
    सरपंच राजपाल सिंह कुशवाहा ने बताया कि तेज रफ्तार ट्रक की टक्कर से 3 महिलाओं की मौत हुई है। जिसमें सास-बहु है। यह बहुत ही दर्दनाक हादसा है। ग्रामीणों ने चालक को पकड़ लिया है। पुलिस को चाहिए कि वाहनों की रफ्तार को कंट्रोल मे करवाएं।
    नगर पुलिस अधीक्षक दीपाल चंदोरिया ने बताया कि थाना सिविल लाइन मे ट्रक की चपेट मे आने से तीन महिलाओं की मौत हो गई है। एक की मौके पर मौत हो गई थी। पुलिस ने ट्रक को जब्त कर लिया है और चालक को भी पकड़ लिया है। मामला दर्ज कर वैधानिक कार्रवाई की जा रही है।
  • रात में दिखें सांप, साफ पानी या तेज रोशनी तो क्या होता है मतलब, स्वप्न शास्त्र में बताए गए संकेत समझिए

    रात में दिखें सांप, साफ पानी या तेज रोशनी तो क्या होता है मतलब, स्वप्न शास्त्र में बताए गए संकेत समझिए


    नई दिल्ली ।
    रात में देखे गए कुछ सपने सुबह उठने के बाद भी लंबे समय तक याद रहते हैं। कभी मंदिर या भगवान के दर्शन होते हैं, कभी साफ पानी, सांप, आसमान में उड़ना, दिवंगत व्यक्ति या तेज रोशनी दिखाई देती है। भारतीय परंपरा में ऐसे सपनों के अलग-अलग अर्थ बताए गए हैं और स्वप्न शास्त्र में इन्हें कई तरह के संकेतों से जोड़ा जाता है।

    स्वप्न शास्त्र के अनुसार, सपनों को समझने के लिए केवल उसमें दिखाई देने वाली चीज को देखना पर्याप्त नहीं माना जाता। सपने के दौरान व्यक्ति कैसा महसूस कर रहा था, दृश्य शांत था या डरावना और वर्तमान जीवन में उसकी परिस्थितियां कैसी हैं, इन बातों का भी महत्व बताया जाता है।

    सपने में मंदिर या भगवान के दर्शन को सामान्य तौर पर सकारात्मक संकेत माना जाता है। अगर मंदिर साफ दिखाई दे, दीपक जल रहा हो या वातावरण शांत हो तो इसे मन की शांति, आध्यात्मिक जुड़ाव और सकारात्मक भावनाओं से जोड़कर देखा जाता है। भगवान शिव, विष्णु, श्रीकृष्ण या माता के दर्शन को भी अलग-अलग आध्यात्मिक भावनाओं का प्रतीक माना जाता है।

    सपने में साफ और शांत पानी दिखाई देना भी शुभ संकेतों में शामिल किया जाता है। निर्मल नदी, स्वच्छ तालाब या शांत जल मानसिक शांति, भावनात्मक संतुलन और नई शुरुआत की इच्छा को दर्शा सकता है। इसके विपरीत गंदा या अत्यधिक अशांत पानी तनाव, बेचैनी या किसी परेशानी की ओर संकेत कर सकता है।

    सांप का सपना अक्सर लोगों को डराता है, लेकिन इसे हर स्थिति में अशुभ नहीं माना जाता। स्वप्न परंपरा में सांप को शक्ति, परिवर्तन, रहस्य और आंतरिक ऊर्जा से जोड़ा गया है। अगर सांप नुकसान नहीं पहुंचाता तो इसे बदलाव या आंतरिक शक्ति का प्रतीक माना जा सकता है। वहीं सपने में अत्यधिक डर महसूस होना किसी चिंता या तनाव को दर्शा सकता है।

    खुद को आसमान में उड़ते हुए देखना आजादी और अपनी सीमाओं से आगे बढ़ने की इच्छा से जुड़ा हो सकता है। उड़ते समय खुशी और उत्साह महसूस होना सकारात्मक सोच तथा आगे बढ़ने की आकांक्षा का संकेत माना जाता है। दूसरी ओर ऊंचाई से गिरने का डर असुरक्षा या किसी परिस्थिति को लेकर चिंता को दिखा सकता है।

    किसी दिवंगत व्यक्ति का सपने में दिखाई देना भी जरूरी नहीं कि अशुभ हो। प्रिय व्यक्ति की यादें और उनसे जुड़ी भावनाएं लंबे समय तक मन में रहती हैं। इसलिए ऐसे सपने भावनात्मक जुड़ाव, स्मृति या अधूरी भावनाओं का प्रतिबिंब हो सकते हैं। सपना शांत हो तो मन में सुकून की भावना और परेशान करने वाला हो तो भीतर के दुख से इसका संबंध हो सकता है।

    सपने में सोना, पैसा या दूसरी कीमती चीजें दिखाई देना समृद्धि, अवसर और महत्वाकांक्षा से जोड़ा जाता है। हालांकि इसका सीधा अर्थ भविष्य में धन मिलने की गारंटी नहीं है। कीमती वस्तु खोने का सपना आर्थिक चिंता या किसी महत्वपूर्ण चीज को खोने के डर से भी जुड़ा हो सकता है।

    सातवां प्रमुख सपना तेज रोशनी, दीपक या सूर्योदय का है। अंधेरे के बाद प्रकाश दिखाई देना आशा, ज्ञान, स्पष्टता और सकारात्मक बदलाव का प्रतीक माना जाता है। कठिन दौर से गुजर रहे व्यक्ति के लिए ऐसा सपना मानसिक रूप से बेहतर स्थिति की इच्छा को भी दर्शा सकता है।

    हालांकि हर सपना भविष्य की घटना का संकेत नहीं होता। दिनभर के विचार, तनाव, डर, इच्छाएं और पुरानी यादें भी सपनों का रूप ले सकती हैं। इसलिए किसी सपने के आधार पर आर्थिक, वैवाहिक या जीवन से जुड़ा बड़ा फैसला नहीं लेना चाहिए। सपनों को अपनी भावनाओं और मानसिक स्थिति को समझने का एक माध्यम मानना अधिक उचित है।

  • राम मंदिर चढ़ावा मामले में एसआईटी ने शासन को सौंपी अंतिम रिपोर्ट, अग्रिम कार्रवाई के लिए ट्रस्ट को भेजी गई

    राम मंदिर चढ़ावा मामले में एसआईटी ने शासन को सौंपी अंतिम रिपोर्ट, अग्रिम कार्रवाई के लिए ट्रस्ट को भेजी गई

    नई दिल्ली ।अयोध्या स्थित राम जन्मभूमि मंदिर के चढ़ावे से जुड़े बहुचर्चित मामले में विशेष जांच टीम (एसआईटी) ने अपनी अंतिम जांच रिपोर्ट शासन को सौंप दी है। गृह विभाग द्वारा इस रिपोर्ट का गहन परीक्षण किए जाने के बाद इसे आवश्यक अग्रिम कार्रवाई के लिए श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट को उपलब्ध करा दिया गया है। इस कदम के साथ ही मामले की प्रशासनिक और कानूनी प्रक्रिया अगले चरण में प्रवेश कर गई है।

    उल्लेखनीय है कि मंदिर ट्रस्ट के विशेष अनुरोध पर शासन द्वारा 13 जून को तीन सदस्यीय विशेष जांच टीम का गठन किया गया था। इस उच्चस्तरीय जांच समिति की अध्यक्षता लखनऊ के मंडलायुक्त विजय विश्वास पंत कर रहे थे, जबकि आईजी रेंज किरण एस और वित्त विभाग के विशेष सचिव नील रतन कुमार को इसमें सदस्य के रूप में शामिल किया गया था। समिति को मामले के सभी पहलुओं की निष्पक्ष और पारदर्शी जांच का जिम्मा सौंपा गया था।

    जांच टीम ने काफी कम समय में गहन पड़ताल करते हुए 23 जून को अपनी प्रारंभिक रिपोर्ट शासन के समक्ष प्रस्तुत की थी। प्रारंभिक रिपोर्ट में मामले की गंभीरता को देखते हुए संबंधित तत्वों के खिलाफ कठोर कानूनी कार्रवाई करने की स्पष्ट संस्तुति की गई थी। शासन द्वारा इस रिपोर्ट को स्वीकार करते हुए तत्काल वैधानिक कदम उठाने के निर्देश जारी किए गए थे।

    प्रारंभिक रिपोर्ट की सिफारिशों के आधार पर 25 जून को राम जन्मभूमि थाने में औपचारिक रूप से मुकदमा दर्ज किया गया था। ट्रस्ट के प्रतिनिधि की ओर से दर्ज कराई गई शिकायत में कई लोगों को नामजद करते हुए अन्य अज्ञात व्यक्तियों को भी आरोपी बनाया गया था। मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की सुसंगत धाराओं और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत प्रकरण पंजीकृत किया गया था।

    मुकदमा दर्ज होने के बाद पुलिस और जांच एजेंसियों ने त्वरित कार्रवाई करते हुए नामजद आरोपियों की गिरफ्तारी समेत अन्य आवश्यक कानूनी प्रक्रियाएं पूरी की थीं। जांच के दौरान वित्तीय लेन-देन, संबंधित दस्तावेजों और अन्य साक्ष्यों का बारीक अध्ययन किया गया था, जिसके बाद अब अंतिम रिपोर्ट तैयार कर शासन को भेजी गई है।

    मध्य प्रदेश सहित देशभर के श्रद्धालुओं की आस्था के केंद्र राम मंदिर में व्यवस्थाओं की शुचिता बनाए रखने के लिए ट्रस्ट अब इस अंतिम रिपोर्ट के सुझावों के आधार पर आगामी कदम उठाएगा। शासन से रिपोर्ट प्राप्त होने के बाद ट्रस्ट स्तर पर आवश्यक प्रशासनिक सुधारों और कानूनी कदमों को लागू करने की तैयारी की जा रही है।