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  • US से ट्रेड डील से कश्मीर से हिमाचल तक टेंशन में किसान…. 10,000 CR की इंडस्ट्री पर संकट

    US से ट्रेड डील से कश्मीर से हिमाचल तक टेंशन में किसान…. 10,000 CR की इंडस्ट्री पर संकट


    नई दिल्ली।
    भारत-अमेरिका ट्रेड डील (India-US Trade Deal) को लेकर कश्मीर (Kashmir) से लेकर हिमाचल प्रदेश (Himachal Pradesh) तक के सेब किसानों में चिंता बढ़ गई है। किसानों को डर है कि अगर अमेरिकी सेब (American Apple) सस्ते दाम पर भारतीय बाजार में आने लगे, तो स्थानीय सेब की मांग और कीमत दोनों गिर सकती हैं। इस डील के तहत कई देशों से आने वाले सेब पर आयात शुल्क कम किया जा रहा है। पहले ज्यादा कीमत होने के कारण विदेशी सेब कम मात्रा में आते थे, लेकिन अब ड्यूटी कम होने से आयात बढ़ने का डर है।

    कश्मीर की अर्थव्यवस्था में सेब उद्योग बहुत अहम है। हजारों परिवार सीधे या परोक्ष रूप से इससे जुड़े हैं। ऐसे में अगर विदेशी सेब ज्यादा आए, तो ग्रामीण अर्थव्यवस्था और रोजगार पर असर पड़ सकता है। जम्मू-कश्मीर के नेताओं ने भी चिंता जताई है। उनका कहना है कि अगर बिना पर्याप्त सुरक्षा उपायों के आयात बढ़ा, तो स्थानीय बागवानी उद्योग को नुकसान हो सकता है।


    अगर आयात ज्यादा बढ़ता है, तो टेंशन बढ़ेगी

    हालांकि सरकार का कहना है कि अमेरिकी सेब के लिए केवल सीमित (कोटा आधारित) रियायत दी जा रही है और किसानों की सुरक्षा के लिए न्यूनतम आयात मूल्य (MIP) जैसी व्यवस्था रखी गई है, ताकि बहुत सस्ते सेब बाजार में न आ सकें। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर आयात ज्यादा बढ़ता है, तो घरेलू किसानों पर कीमत का दबाव बढ़ सकता है। वहीं कुछ लोग इसे अवसर भी मानते हैं—कहते हैं कि इससे भारतीय किसान गुणवत्ता सुधारने पर ध्यान दे सकते हैं।


    फल मंडी के नेता क्या कह रहे?

    घाटी के सबसे बड़े फल मार्केट, सोपोर फ्रूट मंडी के प्रेसिडेंट फैयाज अहमद मलिक ने बताया, “यह (इंडिया-US डील) हमारे लिए बहुत बुरा होगा।” वे कहते हैं, “हम US में फल उगाने वालों से मुकाबला नहीं कर सकते। उन्हें खेती के हर स्टेज पर सरकार से मदद मिलती है। उन्हें अच्छी-खासी सब्सिडी और कैश ट्रांसफर मिलते हैं, जबकि हमारे पास फसल बीमा तक नहीं है।” मलिक का कहना है कि इस ट्रेड डील का कश्मीर घाटी की इकॉनमी पर बड़ा असर पड़ेगा। वे कहते हैं, “जब हम अपने सेब बांग्लादेश भेजते हैं, तो हमें 100% से ज़्यादा टैक्स देना पड़ता है। सरकार अमेरिकन सेब पर टैक्स कैसे कम कर सकती है? इससे लोकल इंडस्ट्री और इकॉनमी बर्बाद हो जाएगी।”


    10,000 करोड़ रुपये की है सेब इंडस्ट्री

    बता दें कि सेब इंडस्ट्री जम्मू-कश्मीर (Jammu and Kashmir) की अर्थव्यवस्था, खासकर कश्मीर घाटी की इकॉनमी का आधार और रीढ़ है। घाटी देश के कुल सेब उत्पादन का 75% पैदा करती है। आधिकारिक आंकड़ों के के मुताबिक घाटी में करीब 20 लाख मीट्रिक टन सेब पैदा होते हैं और इस सेब इंडस्ट्री की कीमत 10,000 करोड़ रुपये है। अधिकारियों का कहना है कि इस इंडस्ट्री में सीधे या अप्रत्यक्ष करीब 50 लाख लोग जुड़े हुए हैं। फिलहाल किसान संगठन सरकार से सुरक्षा उपाय बढ़ाने की मांग कर रहे हैं। हिमाचल प्रदेश में सेब किसानों ने भारत-US डील में खेती की उपज, खासकर सेब को शामिल करने के खिलाफ 12 फरवरी को बंद और विरोध प्रदर्शन का आह्वान किया है। कश्मीर के किसान भी अब इसी तरह के प्रदर्शन का प्लान बना रहे हैं।

  • भारत से व्यापार समझौते को अंतिम रूप देने में जुटा अमेरिका…डील में रूस से तेल खरीदी बंद करने का जिक्र

    भारत से व्यापार समझौते को अंतिम रूप देने में जुटा अमेरिका…डील में रूस से तेल खरीदी बंद करने का जिक्र


    वाशिंगटन।
    अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (American President Donald Trump) के आधिकारिक आवास एवं कार्यालय ‘व्हाइट हाउस’ (White House) ने कहा है कि आने वाले हफ्तों में अमेरिका और भारत व्यापार (USA-India Trade) पर अंतरिम समझौते को अंतिम रूप देने की दिशा में काम करेंगे। ‘व्हाइट हाउस’ ने एक दस्तावेज (फैक्ट शीट) में कहा कि दोनों देश सेवाओं एवं निवेश, श्रम तथा सरकारी खरीद सहित शेष मुद्दों को सुलझाने के लिए बातचीत जारी रखेंगे।

    फैक्टशीट में लिखा है कि व्यापार समझौता भारत के 140 करोड़ से अधिक लोगों के बाजार को अमेरिकी उत्पादों के लिए खोल देगा। राष्ट्रपति ट्रंप भारत द्वारा रूसी तेल खरीदना बंद करने की प्रतिबद्धता को देखते हुए, भारतीय आयात पर अतिरिक्त 25 प्रतिशत टैरिफ हटाने पर सहमत हैं और राष्ट्रपति ने शुक्रवार को कार्यकारी आदेश पर हस्ताक्षर कर उसे हटा भी दिया है। साथ ही, अमेरिका पारस्परिक टैरिफ को 25 से घटाकर 18 प्रतिशत करेगा।


    अमेरिका के कृषि उत्पादों पर जीरो टैरिफ

    फैक्टशीट के मुताबिक, भारत अमेरिका के सभी औद्योगिक सामानों, सूखे अनाज, लाल ज्वार, मेवे, ताजे-प्रसंस्कृत फल, कुछ दालें, सोयाबीन तेल, शराब, स्पिरिट अन्य उत्पादों सहित अमेरिकी खाद्य एवं कृषि उत्पादों की एक विस्तृत श्रृंखला पर टैरिफ को समाप्त या कम करेगा।


    भारत डिजिटल सेवा कर हटाएगा:

    भारत प्राथमिकता वाले क्षेत्रों में द्विपक्षीय व्यापार को प्रभावित करने वाली गैर-टैरिफ बाधाओं को दूर करेगा। साथ ही, भारत अपने डिजिटल सेवा करों को हटाएगा।


    बाधाएं हटाने को जारी रखेगा बातचीत

    अमेरिका और भारत द्विपक्षीय व्यापार समझौते के संदर्भ की शर्तों में निर्धारित रोडमैप के अनुरूप कई मुद्दों पर बातचीत जारी रखेंगे। इसमें शेष टैरिफ बाधाओं, अतिरिक्त गैर-टैरिफ बाधाओं, व्यापार में तकनीकी बाधाओं, सीमा शुल्क और व्यापार सुविधा, अच्छी नियामक प्रथाओं, व्यापार उपचारों, सेवाओं और निवेश, बौद्धिक संपदा, श्रम, पर्यावरण, सरकारी खरीद और राज्य के स्वामित्व वाले उद्यमों की व्यापार-विकृत या अनुचित प्रथाओं को संबोधित करना शामिल होगा।

  • अमेरिकी राजदूत ने की भारत-US के बीच बढ़ती साझेदारी की जमकर तारीफ, ट्रेड डील को लेकर कही ये बात

    अमेरिकी राजदूत ने की भारत-US के बीच बढ़ती साझेदारी की जमकर तारीफ, ट्रेड डील को लेकर कही ये बात


    नई दिल्ली।
    भारत और अमेरिका (India and America) के बीच ट्रेड डील (Trade Deal) को लेकर अंतरिम समझौते पर सहमति बनने के बाद अमेरिका (America) की ओर से बड़ा बयान आया है। भारत में अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर (US Ambassador Sergio Gor) ने सोमवार को भारत और अमेरिका के बीच बढ़ती साझेदारी की जमकर तारीफ की। इस दौरान गोर की तरफ से इस ट्रेड डील का क्रेडिट प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Prime Minister Narendra Modi) और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ((American President Donald Trump) ) के अच्छे संबंधों को दिया गया। अमेरिकी राजदूत ने कहा है कि पिछले हफ्ते घोषित भारत-अमेरिका अंतरिम व्यापार समझौते के फ्रेमवर्क के पूरा होने का श्रेय प्रधानमंत्री मोदी और ट्रंप की दोस्ती को जाता है।

    अमेरिकी राजदूत नेवयहां नई दिल्ली में उनके आवास पर आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान यह बातें कही हैं। कार्यक्रम में विदेश मंत्री एस जयशंकर भी शामिल हुए। रिसेप्शन के दौरान गोर ने कहा कि वाइट हाउस में ट्रंप प्रशासन भारत को ध्यान में रख रहा है। गोर ने कहा, “मुझे यहां आए हुए अभी एक महीने से थोड़ा ज्यादा हुआ है, और हमने आते ही काम शुरू कर दिया। वाइट हाउस भारत को ध्यान में रख रहा है।” ट्रंप के दूत ने आगे कहा, “हमारे राष्ट्रपति भारत को तवज्जो दे रहे हैं। और राष्ट्रपति ट्रंप की प्रधानमंत्री मोदी के साथ दोस्ती की वजह से, हम आखिरकार एक व्यापार समझौता कर पाए।” बता दें कि गोर ने बीते 14 जनवरी को अपना पदभार संभाला था, जिसके बाद वह भारत में अमेरिका के 27वें राजदूत बन गए।


    अंतरिम व्यापार समझौते में क्या-क्या?

    इससे पहले भारत और अमेरिका ने बीते शनिवार को अंतरिम व्यापार समझौते के लिए एक रूपरेखा पर पहुंचने की घोषणा की थी जिसके तहत दोनों देश द्विपक्षीय व्यापार को बढ़ावा देने के लिए कई वस्तुओं पर आयात शुल्क कम करेंगे। अमेरिका, भारतीय वस्तुओं पर शुल्क को मौजूदा 50 प्रतिशत से घटाकर 18 प्रतिशत करेगा। वहीं भारत सभी अमेरिकी औद्योगिक वस्तुओं और अमेरिकी खाद्य एवं कृषि उत्पादों की एक विस्तृत शृंखला पर आयात शुल्क समाप्त या कम करेगा। इनमें सूखे अनाज, पशु आहार के लिए लाल ज्वार, मेवे, ताजे और प्रसंस्कृत फल, सोयाबीन तेल, शराब और स्पिरिट शामिल हैं।


    अमेरिका ने हटाया अतिरिक्त आयात शुल्क

    दोनों देशों के एक संयुक्त बयान के मुताबिक, भारत ने अगले पांच साल में 500 अरब डॉलर के अमेरिकी ऊर्जा उत्पाद, विमान और विमान कलपुर्जे, कीमती धातु, प्रौद्योगिकी उत्पाद और कोकिंग कोयला खरीदने का इरादा जताया है। बयान के मुताबिक, ”अमेरिका और भारत को पारस्परिक और द्विपक्षीय रूप से लाभकारी व्यापार से संबंधित एक अंतरिम समझौते के लिए रूपरेखा तैयार करने की घोषणा करते हुए खुशी हो रही है।” इसके अलावा अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक कार्यकारी आदेश के माध्यम से रूसी तेल की खरीद पर पिछले वर्ष अगस्त में भारत पर लगाए गए 25 प्रतिशत अतिरिक्त आयात शुल्क को हटा दिया है।

    निर्यात को मिलेगा बढ़ावा
    वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने कहा कि अंतरिम समझौते से भारतीय निर्यातकों, विशेषकर सूक्ष्म, लघु एवं मझोले उद्यमों (एमएसएमई), किसानों और मछुआरों के लिए 30,000 अरब अमेरिकी डॉलर का बाजार खुलेगा। शुल्क में कमी से वस्त्र और परिधान, चमड़ा और जूते, प्लास्टिक और रबर, जैविक रसायन, गृह सज्जा, हस्तशिल्प उत्पाद जैसे भारत के श्रम-प्रधान क्षेत्रों और कुछ मशीनरी के निर्यात को बढ़ावा मिलेगा। इसके अतिरिक्त, जेनेरिक दवाइयों, रत्नों और हीरों, तथा विमान के कल-पुर्जों सहित कई प्रकार की वस्तुओं पर शुल्क शून्य हो जाएगा, जिससे भारत की निर्यात प्रतिस्पर्धी क्षमता और ‘मेक इन इंडिया’ को और बढ़ावा मिलेगा।

  • Trade Deal: अगले 5 साल में 500 अरब डॉलर का सामान खरीदेगा भारत… क्या US कंपनियां पूरी कर पाएंगी डिमांड?

    Trade Deal: अगले 5 साल में 500 अरब डॉलर का सामान खरीदेगा भारत… क्या US कंपनियां पूरी कर पाएंगी डिमांड?


    नई दिल्ली।
    भारत और अमेरिका (India and America) के बीच हाल ही में हुए ऐतिहासिक व्यापार समझौते (Historic Trade Agreements) के तहत भारत (India) ने अगले पांच वर्षों में अमेरिका से 500 अरब डॉलर लगभग 41 लाख करोड़ रुपये के मूल्य के सामान आयात करने की जो प्रतिबद्धता जताई है वह वैश्विक व्यापार की दिशा बदल सकती है। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि इस लक्ष्य की सफलता केवल भारतीय कंपनियों (Indian Companies) के ऑर्डर देने पर नहीं, बल्कि अमेरिकी सप्लायर्स की सप्लाई क्षमता पर भी निर्भर करेगी। शनिवार को जारी संयुक्त बयान के बाद अब इस बात पर चर्चा तेज हो गई है कि आखिर किन क्षेत्रों में भारत अपनी खरीदारी बढ़ाएगा और अमेरिका के सामने क्या चुनौतियां होंगी।

    आयात के इस लक्ष्य को हासिल करने में ऊर्जा क्षेत्र सबसे बड़ी भूमिका निभाएगा। आंकड़ों के अनुसार, मौजूदा वित्त वर्ष के पहले नौ महीनों में भारत ने अमेरिका से करीब 40 अरब डॉलर का आयात किया, जिसमें से 11 अरब डॉलर केवल कच्चा तेल और पेट्रोलियम उत्पाद थे। यह पिछले साल की तुलना में 35% अधिक है।

    भारत अब अपनी तेल जरूरतों के लिए रूस के बजाय अमेरिकी तेल को प्राथमिकता देने की ओर बढ़ रहा है। भारत अब इंडोनेशिया से आने वाले ‘कोकिंग कोल’ की जगह अमेरिकी कोयले को तरजीह दे सकता है। अधिकारियों के अनुसार, अमेरिकी कोयला न केवल गुणवत्ता में बेहतर है, बल्कि कीमत में भी प्रतिस्पर्धी है। भारतीय तेल कंपनियों ने पहले ही अधिक तरल प्राकृतिक गैस (LNG) की खरीद के लिए समझौतों पर हस्ताक्षर कर दिए हैं।


    हाई-टेक और विमानन

    वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल के अनुसार, चिप्स, सेमीकंडक्टर और हवाई जहाज जैसे हाई-टेक उत्पाद इस 500 अरब डॉलर के लक्ष्य तक पहुंचने की कुंजी होंगे। भारत अकेले बोइंग को 70 से 80 अरब डॉलर के नए ऑर्डर देने की तैयारी में है। डेटा सेंटर्स और AI के लिए आवश्यक ग्राफिक्स प्रोसेसिंग यूनिट्स और हाई-एंड चिप्स की खरीद में भारी बढ़ोतरी की उम्मीद है।


    सप्लाई चेन और पेंडिंग ऑर्डर्स जैसी अड़चनें

    इस भव्य योजना की राह में कुछ तकनीकी अड़चनें भी हैं। उदाहरण के तौर पर, बोइंग जैसी कंपनियों के पास पहले से ही भारी ऑर्डर का बैकलॉग है। ऐसे में सवाल यह है कि क्या अमेरिकी कंपनियां समय पर डिलीवरी दे पाएंगी? इसी तरह, वैश्विक बाजार में सेमीकंडक्टर चिप्स की भारी मांग है। भारतीय खरीदारों को इन उत्पादों को हासिल करने के लिए वैश्विक कतार में लगना होगा। गोयल ने कहा, “यह अमेरिकी विक्रेताओं पर निर्भर करता है कि वे भारतीय खरीदारों को ऐसा प्रस्ताव दें जिसे वे ठुकरा न सकें। 100 अरब डॉलर प्रति वर्ष का लक्ष्य पहले ही साल में शायद पूरा न हो, लेकिन हम उसी दिशा में बढ़ रहे हैं।”


    100 अरब डॉलर प्रति वर्ष का रोडमैप

    विशेषज्ञों का कहना है कि अगर भारत सालाना 100 अरब डॉलर का आयात अमेरिका से करता है तो अमेरिका भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार होने के साथ-साथ सबसे बड़ा ऊर्जा आपूर्तिकर्ता भी बन सकता है। इससे भारत की रूस पर निर्भरता कम होगी और अमेरिका के साथ उसके रणनीतिक संबंध और गहरे होंगे। यह समझौता केवल व्यापारिक नहीं, बल्कि एक बड़ा कूटनीतिक दांव है। जहां भारत को 18% कम टैरिफ का लाभ मिल रहा है, वहीं अमेरिका को 500 अरब डॉलर का सुनिश्चित बाजार मिल गया है। अब सफलता इस बात पर टिकी है कि अमेरिकी फैक्ट्रियां और तेल के कुएं भारत की इस विशाल मांग को कितनी तेजी से पूरा करते हैं।

  • ट्रेड डील पर नया खुलासा…. डोभाल ने US से दो टूक कहा था- ट्रंप के दबाव में नहीं आएगा भारत

    ट्रेड डील पर नया खुलासा…. डोभाल ने US से दो टूक कहा था- ट्रंप के दबाव में नहीं आएगा भारत


    नई दिल्ली।
    भारत और अमेरिका (India and America) के बीच रिश्तों में फिर से सुधार की प्रक्रिया शुरू हो गई है। दो दिन पहले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (American President Donald Trump) ने दोनों देशों के बीच ट्रेड डील पर सहमति और भारत द्वारा टैरिफ में कमी करने की जानकारी दी। अब यह खुलासा हुआ है कि सितंबर में भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (National Security Advisor of India-NSA) अजीत डोभाल (Ajit Doval) ने अमेरिकी विदेश मंत्री मार्क रुबियो को स्पष्ट रूप से समझाते हुए कहा था कि भारत अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप और उनके अधिकारियों के दबाव में नहीं आएगा।

    भारत और चीन के बीच एससीओ बैठक में पीएम मोदी की मुलाकात के बाद अजीत डोभाल ने अमेरिका यात्रा की थी। ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के अनुसार, डोभाल ने इस बैठक में अमेरिकी विदेश मंत्री को एक अहम संदेश दिया – भारत अमेरिका के साथ रिश्तों में तनाव को पीछे छोड़ते हुए फिर से व्यापारिक बातचीत शुरू करना चाहता है। हालांकि, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि भारत अमेरिकी दबाव के सामने नहीं झुकेगा और ट्रंप के कार्यकाल के अंत तक इंतजार करने को तैयार है, जैसा कि भारत ने पहले भी अमेरिकी विरोधी सरकारों का सामना किया था।

    डोभाल ने बैठक में यह भी कहा कि भारत चाहता है कि ट्रंप और उनके सलाहकार भारत की सार्वजनिक आलोचना कम करें, ताकि दोनों देशों के रिश्ते और भी मजबूत हो सकें।


    तनाव घटने के संकेत

    इस बैठक के तुरंत बाद दोनों देशों के बीच तनाव में कमी के संकेत मिलना शुरू हो गए। 16 सितंबर को, ट्रंप ने मोदी को उनके जन्मदिन पर फोन किया और उनकी सराहना की। इसके बाद, दोनों नेताओं ने फोन पर चार बार बातचीत की और व्यापारिक सौदे को लेकर सहमति बनाने की दिशा में कदम बढ़ाए।

    ट्रंप ने घोषणा की कि दोनों देशों के बीच एक व्यापार समझौता हुआ है, जिसके तहत भारत के सामानों पर टैरिफ घटाकर 18 फीसदी कर दिया जाएगा, जो एशिया के अधिकांश देशों से कम है। इसके अलावा, रूसी तेल खरीदने पर लगाए गए 25 फीसदी टैरिफ को भी हटा दिया गया है। बदले में, भारत ने 500 बिलियन डॉलर का अमेरिकी सामान खरीदने, वेनेजुएला का तेल न खरीदने और अमेरिकी आयात पर टैरिफ को शून्य करने पर सहमति जताई है।

  • US-भारत ट्रेड डील पर रोड़ा बन सकती है दाल… इंपोर्ट ड्यूटी लगाने से अमेरिका को लगी मिर्ची

    US-भारत ट्रेड डील पर रोड़ा बन सकती है दाल… इंपोर्ट ड्यूटी लगाने से अमेरिका को लगी मिर्ची


    वाशिंगटन।
    अमेरिका और भारत (America and India) के बीच ट्रेड डील (Trade deal) एक बार फिर अटकती नजर आ रही है। इस बार इस डील के रास्ते में रोड़ा बनी है दाल। दो अमेरिकी सांसदों ने इसको लेकर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (President Donald Trump) को पत्र लिखा है। इसमें ट्रंप से कहा गया है कि वो भारत पर दबाव बनाएं कि अमेरिकी दालों (American pulses) के आयात से 30 फीसदी इंपोर्ट ड्यूटी (30 Percent Import Duty) हटाई जाए। अमेरिकी सांसदों ने भारत द्वारा लगाई गई इंपोर्ट ड्यूटी को गैर-जरूरी बताया गया है। साथ ही इनका यह भी कहना है कि इसकी वजह से अमेरिकी उत्पादकों को काफी नुकसान हो रहा है। बता दें कि भारत ने यह आयात शुल्क अमेरिका द्वारा भारत पर 50 फीसदी टैरिफ लगाने के बाद लगाया है। आशंका है कि इसके चलते अमेरिका-भारत के बीच चल रही ट्रेड डील फिर पटरी से उतर सकती है।


    सांसदों के लेटर में क्या कहा गया

    अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को यह पत्र रिपब्लिकन सीनेटरों ने लिखे हैं। इनमें से एक हैं मोंटाना से स्टीव डेन्स और दूसरे हैं उत्तरी डकोटा से केविन क्रेमर। पत्र में कहा गया है कि उनके राज्य दो बड़े दाल उत्पादकों में से हैं, जिसमें मटर भी शामिल है। भारत इनका सबसे बड़ा उपभोक्ता है, जो विश्व का 27 फीसदी है। इसके मुताबिक भारत में लेंटिल्स, चिकपीज, सूखी दालों और मटर की सबसे ज्यादा खपत है। लेकिन भारत ने इन श्रेणियों में अमेरिकी निर्यात पर टैरिफ लगा रखा है। अमेरिकी सांसदों ने कहा कि भारत ने पिछले साल 30 अक्टूबर को पीली दाल पर भी 30 फीसदी टैरिफ लगा दिया।


    पीएम मोदी से बात करने की सलाह

    अमेरिकी सांसदों ने भारत द्वारा लगाए गए टैरिफ को अनफेयर बताते हुए अमेरिकी दाल उत्पादकों को नुकसान होने की बात कही है। साथ ही अमेरिकी सांसदों ने राष्ट्रपति ट्रंप को सलाह दी है कि वह दाल पर भारत द्वारा लगाए गए टैरिफ को लेकर पीएम मोदी से बात करें। ताकि दोनों देशों के बीच एक सहयोग बने, जिससे अमेरिकी उत्पादकों और भारतीय उपभोक्ताओं दोनों को फायदा मिल सके। दोनों सीनेटरों ने अपने राज्यों में बेहतर कृषि उत्पादों के लिए अमेरिकी राष्ट्रपति का शुक्रिया भी अदा किया।


    लंबे समय से तनाव

    बता दें कि टैरिफ के मुद्दे पर भारत और अमेरिका के बीच लंबे समय से तनाव कायम है। इसकी शुरुआत अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा भारत पर 50 प्रतिशत शुल्क (टैरिफ) लगाने के बाद हुई। इस टैरिफ में रूसी कच्चे तेल की खरीद पर 25 प्रतिशत का अतिरिक्त शुल्क भी शामिल है। इन तनावों के बीच अमेरिकी अधिकारियों द्वारा भारत के प्रति गलत टिप्पणियां माहौल को और खराब कर रही हैं। कुछ दिन पहले ही वाइट हाउस के व्यापार सलाहकार पीटर नवारो ने एक बार फिर भारत की आलोचना करते हुए सवाल उठाया कि अमेरिका के नागरिक भारत में कृत्रिम मेधा (एआई) के लिए भुगतान क्यों कर रहे हैं?

  • US का नया दावा… भारत-अमेरिका ट्रेड डील अटकने की वजह ऑपरेशन सिंदूर को बताया

    US का नया दावा… भारत-अमेरिका ट्रेड डील अटकने की वजह ऑपरेशन सिंदूर को बताया


    वाशिंगटन।
    अमेरिकी वाणिज्य सचिव हॉवर्ड लुटनिक (US Commerce Secretary Howard Lutnick) ने भारत-अमेरिका व्यापार समझौते (India-US trade agreement) के सिरे न चढ़ पाने के पीछे एक नया दावा पेश किया है। लुटनिक के अनुसार, यह समझौता मई और जुलाई 2025 के बीच हस्ताक्षर के लिए लगभग तैयार था, लेकिन यह इसलिए विफल रहा क्योंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Prime Minister Narendra Modi) ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (President Donald Trump) को व्यक्तिगत रूप से फोन कर सौदे को अंतिम रूप देने में असहजता दिखाई। हालांकि, इस घटनाक्रम के पीछे की असल वजह ऑपरेशन सिंदूर और उसके बाद पैदा हुई कूटनीतिक तल्खी बताई जा रही है।

    रिपोर्ट्स के अनुसार, जिस समय यह समझौता होना था, उसी दौरान भारत और पाकिस्तान के बीच भारी तनाव था। 7 मई को भारत ने पहलगाम हत्याओं के जवाब में पाकिस्तान में आतंकी ठिकानों को नष्ट करने के लिए ‘ऑपरेशन सिंदूर’ शुरू किया। 10 मई को दोनों देशों के बीच युद्ध विराम की घोषणा से ठीक पहले, राष्ट्रपति ट्रंप ने सोशल मीडिया पर दावा कर दिया कि उन्होंने इस युद्ध विराम में मध्यस्थता की है।

    भारत ने इस दावे को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि युद्ध विराम पाकिस्तान के अनुरोध पर द्विपक्षीय रूप से हुआ था। ट्रंप के बार-बार मध्यस्थता का श्रेय लेने की कोशिशों ने द्विपक्षीय संबंधों में तनाव पैदा कर दिया था। लुटनिक के अनुसार, इसी पृष्ठभूमि में अमेरिका उम्मीद कर रहा था कि पीएम मोदी ट्रंप को फोन करें, जिसके लिए भारत तैयार नहीं था।


    क्या भारत ने वाकई ‘ट्रेन मिस’ कर दी?

    लुटनिक ने दावा किया कि भारत ने समझौते पर हस्ताक्षर करने में तीन हफ्ते की देरी कर दी और तब तक वह “ट्रेन मिस” कर चुका था। उन्होंने ट्रंप की ‘सीढ़ी’ नीति का हवाला दिया, जिसके तहत पहले आने वाले देश को सबसे कम टैरिफ मिलता है और बाद में आने वालों के लिए यह बढ़ता जाता है। हालांकि, व्यापारिक आंकड़े लुटनिक के दावों के विपरीत हैं। अमेरिका ने ब्रिटेन के साथ 10% और वियतनाम के साथ 20% टैरिफ पर समझौता किया। लेकिन वियतनाम के बाद हुए कई समझौतों (दक्षिण कोरिया, जापान, यूरोपीय संघ) में वाशिंगटन ने कम टैरिफ लगाए, जबकि भारत पर 50% का सबसे ऊंचा टैरिफ बरकरार रखा गया।


    रूस के साथ संबंध बने ‘कांटा’
    भारत और अमेरिका के बीच व्यापार वार्ता में रूस के साथ भारत के ऊर्जा और रक्षा संबंध भी एक बड़ी बाधा बने। जुलाई 2025 तक भारत के कुल तेल आयात में रूस की हिस्सेदारी 37% थी। अगस्त की शुरुआत में, रूस से कच्चा तेल खरीदने के कारण ट्रंप ने भारत पर 25% अतिरिक्त दंडात्मक शुल्क लगा दिया। लुटनिक ने पहले भी कहा था कि भारत का रूस से सैन्य उपकरण खरीदना और BRICS के माध्यम से डॉलर पर निर्भरता कम करना अमेरिका को नागवार गुजरा है।


    फोन कॉल नहीं, नीतियां थीं वजह
    थिंक टैंक GTRI के प्रमुख अजय श्रीवास्तव ने लुटनिक के दावों पर सवाल उठाते हुए कहा, “इतने बड़े स्तर के व्यापारिक समझौते महज एक नेता के फोन कॉल न करने से नहीं रुकते। यह दावा वास्तविक कारण के बजाय एक ‘तर्क’ जैसा लगता है।” उन्होंने कहा कि टैरिफ, कृषि, डिजिटल व्यापार और नियामक स्वायत्तता जैसे अनसुलझे नीतिगत मतभेद ही इस सौदे के न हो पाने की असली वजह थे।

  • PM मोदी ने ट्रंप को नहीं किया फोन, अमेरिकी राष्ट्रपति का अहंकार हुआ आहत, अब नहीं होगी पुरानी डील

    PM मोदी ने ट्रंप को नहीं किया फोन, अमेरिकी राष्ट्रपति का अहंकार हुआ आहत, अब नहीं होगी पुरानी डील


    नई दिल्ली । अमेरिका के वाणिज्य सचिव हॉवर्ड लटनिक ने भारत-अमेरिका व्यापार समझौते के अटके होने की एक चौंकाने वाली वजह का खुलासा किया है। उनके मुताबिक दोनों देशों के बीच यह व्यापार डील किसी नीतिगत मतभेद की वजह से नहीं रुकी बल्कि इसका कारण प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को फोन न करना था। लटनिक ने कहा कि पूरी डील तैयार थी, लेकिन यह सिर्फ एक फोन कॉल की वजह से रुक गई। अब अमेरिका उस पुराने समझौते पर आगे नहीं बढ़ने का फैसला कर चुका है।

    क्या हुआ था

    लटनिक के अनुसार भारत और अमेरिका के बीच व्यापार समझौता लगभग तैयार था लेकिन भारत ने तय समय पर ट्रंप को फोन नहीं किया। यह फोन कॉल प्रधानमंत्री मोदी की तरफ से ट्रंप को किया जाना था, जो अंततः नहीं हुआ । ट्रंप का अहंकार इस बात से आहत हुआ और उन्होंने इस समझौते को आगे बढ़ाने का विचार बदल दिया। लटनिक ने साफ कहा कि अब वह समझौता लागू नहीं होगा और भारत को मिलने वाला लाभ अब नहीं मिलेगा।

    अमेरिका का निर्णय

    लटनिक ने आगे कहा कि अमेरिका ने उस व्यापार समझौते से खुद को पीछे खींच लिया है, जिस पर पहले सहमति बन चुकी थी। अमेरिका ने अब इंडोनेशिया, फिलीपींस, और वियतनाम के साथ डील कर ली है, जबकि भारत से उस समझौते पर उम्मीद थी कि वह पहले होगा। अब ट्रंप प्रशासन मान चुका है कि भारत से डील पहले होती, लेकिन देरी के कारण अमेरिका ने अन्य देशों से समझौते कर लिए।

    भारत को भुगतनी पड़ी कीमत

    लटनिक ने स्पष्ट रूप से कहा कि भारत को 50 प्रतिशत तक टैरिफ की भारी-भरकम कीमत चुकानी पड़ी क्योंकि डील नहीं हो पाई। ट्रंप अब भारत के खिलाफ टैरिफ बढ़ाने की बात भी कह चुके हैं। इससे यह साफ हो जाता है कि यह मामला अब सिर्फ व्यापार का नहीं बल्कि ट्रंप के अहंकार और विदेशी नीति से जुड़ा हुआ है।

    क्या था मामला

    ट्रंप और मोदी के बीच व्यापार समझौते को लेकर कई बार बातचीत हुई थी। दोनों देशों के बीच यह डील कई मामलों में लगभग तय हो चुकी थी लेकिन मोदी सरकार ने उस निर्णायक पल में ट्रंप को फोन नहीं किया। लटनिक ने कहा यह ट्रंप की डील थी, और उसे पूरी तरह से ट्रंप ही अंजाम तक पहुँचाते। बस मोदी को ट्रंप को कॉल करना था। वे इसके लिए असहज थे और कॉल नहीं किया।

    अमेरिकी नीति में बदलाव

    भारत और अमेरिका के बीच व्यापार समझौता अब ठंडे बस्ते में चला गया है। ट्रंप प्रशासन ने स्पष्ट कर दिया है कि अब वह इस पर आगे विचार नहीं करेगा। इसके साथ ही ट्रंप ने हाल ही में संकेत दिए थे कि वे भारत के खिलाफ अपने टैरिफ बढ़ा सकते हैं और भारत को इस मामले में नुकसान उठाना पड़ेगा।

    भारत की प्रतिक्रिया

    इस मामले पर भारत सरकार की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है। हालांकि भारत और अमेरिका के बीच व्यापार संबंध हमेशा ही रणनीतिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण रहे हैं, और यह कदम निश्चित रूप से दोनों देशों के बीच रिश्तों में एक नया मोड़ ला सकता है।