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अखिलेश-योगी की सियासी चुनौती पर राजभर का वार, बोले- अखिलेश जी अयोध्या से चुनाव लड़कर दिखाइए, यूपी में बयानबाजी तेज
उत्तर प्रदेश। उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई है। सोमवार को सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के अध्यक्ष और प्रदेश सरकार में मंत्री ओमप्रकाश राजभर ने समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव पर निशाना साधा। राजभर ने कहा कि इतिहास गवाह है कि ललकारने के बाद पीछे हटने वाले को भगोड़ा कहा जाता है। उन्होंने अखिलेश यादव से अयोध्या से चुनाव लड़ने की चुनौती से पीछे नहीं हटने की बात कही। राजभर का यह बयान योगी आदित्यनाथ और अखिलेश यादव के बीच अयोध्या से चुनाव लड़ने को लेकर हुई बयानबाजी के बाद आया है।दरअसल अखिलेश यादव ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को अयोध्या से विधानसभा चुनाव लड़ने की चुनौती दी थी। इसके जवाब में योगी ने पलटवार करते हुए कहा था कि अखिलेश चाहें तो दोनों चुनाव लड़कर देख सकते हैं। इसके बाद अखिलेश ने अपने बयान में कहा कि इसके लिए उनका सिपाही ही काफी है। इसी घटनाक्रम को लेकर राजभर ने अखिलेश पर तंज कसते हुए उन्हें चुनौती स्वीकार करने की नसीहत दी। इस बयान के बाद प्रदेश की राजनीति में एक बार फिर सियासी आरोप-प्रत्यारोप चर्चा में आ गए हैं।दूसरी ओर लखनऊ में कांग्रेस प्रदेश मुख्यालय पर हुए हंगामे का मामला भी लगातार सुर्खियों में है। रविवार को पार्टी कार्यालय में पदभार ग्रहण समारोह के दौरान कार्यकर्ताओं के बीच विवाद हुआ था। इस घटना से जुड़े एक नए वीडियो में कांग्रेस की महिला नेता ममता चौधरी और पूर्व प्रदेश अध्यक्ष अजय राय के बीच तीखी बहस दिखाई देने की बात सामने आई है। वीडियो में ममता चौधरी को यह कहते हुए सुना जा सकता है कि वह अजय राय की शक्ल नहीं देखना चाहतीं। इसके जवाब में अजय राय नाराज होते हुए उन्हें औकात में रहने की बात कहते सुनाई देते हैं।इस विवाद के बाद उत्तर प्रदेश कांग्रेस के भीतर गुटबाजी और आपसी मतभेदों को लेकर सवाल उठ रहे हैं। ममता चौधरी ने आरोप लगाया है कि अजय राय ने उनके साथ अभद्र भाषा का इस्तेमाल किया। उनका कहना है कि उनकी ओर से कोई टिप्पणी नहीं की गई थी। वहीं घटना के वीडियो सामने आने के बाद पार्टी के भीतर अनुशासन और कार्यकर्ताओं के व्यवहार को लेकर चर्चा तेज हो गई है। कांग्रेस कार्यालय में हुए हंगामे के दौरान धक्का-मुक्की और जूते-चप्पल चलने की खबरें भी सामने आई थीं।इसी बीच अखिलेश यादव ने लखनऊ में समाजवादी नेता डॉ. राम मनोहर लोहिया को श्रद्धांजलि दी और निर्वाचन आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए। उन्होंने आरोप लगाया कि उत्तर प्रदेश में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर के बाद भी कुछ विधानसभा क्षेत्रों में डुप्लीकेट और ट्रिपल वोट मौजूद हैं। अखिलेश ने आजमगढ़ की सदर विधानसभा सीट का जिक्र करते हुए दावा किया कि एक व्यक्ति के नाम पर दस वोट दर्ज हैं। उन्होंने कहा कि समाजवादी पार्टी इस मुद्दे पर जल्द ही प्रेस कॉन्फ्रेंस करेगी।अखिलेश यादव ने भाजपा पर निशाना साधते हुए कहा कि उनकी पार्टी उत्तर प्रदेश की सभी 403 विधानसभा सीटों पर भाजपा की कथित गड़बड़ियों को उजागर करेगी। दूसरी ओर राजभर ने दावा किया कि जनता ने इंडिया गठबंधन को नकार दिया है। वहीं असदुद्दीन ओवैसी ने कहा कि उनका इंडिया गठबंधन से कोई लेना-देना नहीं है। इन बयानों से साफ है कि उत्तर प्रदेश में राजनीतिक दल आगामी चुनाव को लेकर अपनी रणनीति और विरोधियों पर हमले तेज कर रहे हैं। अयोध्या से चुनाव लड़ने की चुनौती और कांग्रेस कार्यालय का विवाद फिलहाल प्रदेश की सियासत के प्रमुख मुद्दों में शामिल हैं। -

BSP का सियासी आधार लगातार घटा अब संसद में भी नहीं रहेगा कोई सांसद राष्ट्रीय दर्जे पर भी सवाल BSP के सामने संसद से लेकर राष्ट्रीय दर्जे तक की चुनौती
नई दिल्ली । बहुजन समाज पार्टी यानी BSP के सामने उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक के बाद एक बड़ी चुनौतियां सामने आ रही हैं। पार्टी का लोकसभा में पहले से कोई सांसद नहीं है और उत्तर प्रदेश विधानसभा में भी अब उसका कोई विधायक नहीं बचा है। अगस्त 2026 में रसड़ा सीट से BSP के इकलौते विधायक उमाशंकर सिंह के निधन के बाद 403 सदस्यीय विधानसभा में पार्टी का प्रतिनिधित्व खत्म हो गया।अब राज्यसभा में भी BSP का प्रतिनिधित्व खत्म होने की स्थिति बन रही है। पार्टी के मौजूदा इकलौते राज्यसभा सांसद रामजी गौतम का कार्यकाल नवंबर में पूरा होना है। इसके बाद BSP के पास संसद के दोनों सदनों में कोई निर्वाचित सांसद नहीं रहेगा। उत्तर प्रदेश विधानसभा में पार्टी के पास राज्यसभा चुनाव के लिए पर्याप्त संख्या नहीं होने के कारण तत्काल वापसी की संभावना भी सीमित है।
यह स्थिति BSP के राजनीतिक सफर में महत्वपूर्ण बदलाव को दिखाती है। पार्टी की स्थापना 1984 में कांशीराम ने की थी और बाद में मायावती ने इसे उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक बड़े राजनीतिक संगठन के रूप में स्थापित किया। 2007 के विधानसभा चुनाव में BSP ने उत्तर प्रदेश की 403 सीटों में से 206 सीटें जीतकर पूर्ण बहुमत हासिल किया था। इसके बाद पार्टी का विधानसभा में प्रदर्शन लगातार कमजोर होता गया। 2012 में उसकी सीटें घटकर 80 रह गईं। 2017 में BSP 19 सीटों पर सिमट गई और 2022 में केवल एक सीट जीत सकी। वह एकमात्र सीट रसड़ा थी जहां से उमाशंकर सिंह निर्वाचित हुए थे। उनके निधन के बाद विधानसभा में BSP का खाता खाली हो गया।
लोकसभा चुनावों में भी पार्टी को लगातार चुनौती मिली है। 2009 के लोकसभा चुनाव में BSP ने 21 सीटें जीती थीं। लेकिन 2014 में पार्टी एक भी सीट नहीं जीत सकी। 2019 में समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय लोक दल के साथ गठबंधन में BSP ने 10 सीटें जीतीं। 2024 में पार्टी फिर कोई लोकसभा सीट नहीं जीत सकी। इस तरह राष्ट्रीय स्तर पर BSP का संसदीय प्रतिनिधित्व लगातार कमजोर हुआ है।
अब चर्चा पार्टी के राष्ट्रीय दर्जे को लेकर भी हो रही है। चुनाव आयोग के उपलब्ध रिकॉर्ड के अनुसार BSP अभी राष्ट्रीय पार्टी के रूप में मान्यता प्राप्त दलों में शामिल है। आयोग की मौजूदा सूची में BSP को राष्ट्रीय पार्टी के तौर पर दर्ज किया गया है। इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि उसका राष्ट्रीय दर्जा अभी खत्म हो गया है। हालांकि भविष्य में चुनावी प्रदर्शन के आधार पर मान्यता की समीक्षा महत्वपूर्ण हो सकती है।
चुनाव आयोग के नियमों के मुताबिक राष्ट्रीय पार्टी की मान्यता के लिए अलग अलग रास्ते तय हैं। इनमें किसी पार्टी का कम से कम चार राज्यों में लोकसभा या विधानसभा चुनाव में छह प्रतिशत वैध वोट हासिल करना और कम से कम चार लोकसभा सदस्य चुनकर लाना शामिल है। दूसरा रास्ता लोकसभा की कुल सीटों के कम से कम दो प्रतिशत पर जीत हासिल करना है और ये सांसद कम से कम तीन राज्यों से होने चाहिए। इसके अलावा किसी दल का कम से कम चार राज्यों में राज्य पार्टी के रूप में मान्यता प्राप्त होना भी राष्ट्रीय पार्टी की मान्यता का एक आधार है।
BSP के लिए आने वाला समय इसलिए अहम है क्योंकि उत्तर प्रदेश में 2027 का विधानसभा चुनाव सामने है। पार्टी को जहां अपने संगठन और चुनावी आधार को मजबूत करने की चुनौती है वहीं राष्ट्रीय स्तर पर अपनी राजनीतिक पहचान बनाए रखना भी उसके लिए महत्वपूर्ण होगा। फिलहाल राष्ट्रीय दर्जा खत्म होना कोई घोषित फैसला नहीं है लेकिन संसद और विधानसभा में प्रतिनिधित्व खत्म होने की स्थिति ने BSP की राजनीतिक स्थिति को लेकर चर्चा जरूर बढ़ा दी है।
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अखिलेश ने एक्सप्रेसवे का वीडियो दिखाकर भाजपा पर साधा निशाना, बोले- निर्माण पूरा होने से पहले ही टूटने लगते हैं
लखनऊ। समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने भाजपा सरकार में बने एक्सप्रेसवे की गुणवत्ता को लेकर सवाल उठाए हैं। सपा कार्यालय में मीडिया से बातचीत के दौरान उन्होंने लखनऊ-कानपुर एक्सप्रेसवे का वीडियो दिखाते हुए कहा कि भाजपा सरकार में किसी प्रोजेक्ट का निर्माण पूरा बाद में होता है, जबकि उसके टूटने की शुरुआत पहले ही हो जाती है। उन्होंने बुंदेलखंड एक्सप्रेसवे का जिक्र करते हुए कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसका उद्घाटन किया था और इसका मेंटीनेंस अभी भी जारी है। लखनऊ-कानपुर एक्सप्रेसवे में उद्घाटन के कुछ समय बाद क्षति की खबरें भी सामने आई हैं।रिवरफ्रंट और आगरा-लखनऊ एक्सप्रेसवे की गुणवत्ता का किया जिक्र
अखिलेश यादव ने लखनऊ-कानपुर एक्सप्रेसवे की स्थिति को लेकर वीडियो दिखाते हुए कहा कि ऐसा लगता है कि दिल्ली और लखनऊ वालों के बीच इस बात को लेकर मुकाबला चल रहा है कि किसके पास ज्यादा मुनाफा होगा। उन्होंने सपा सरकार के दौरान बने रिवरफ्रंट और अन्य निर्माण कार्यों की गुणवत्ता को बेहतर बताया।उन्होंने आगरा-लखनऊ एक्सप्रेसवे का भी जिक्र किया और कहा कि उसका डिजाइन सबसे अच्छा है, लेकिन भाजपा के लोग अब उसे खराब कर रहे हैं। उन्होंने रिवरफ्रंट पर लगे फव्वारों और सपा सरकार के दौरान बच्चों को दिए गए लैपटॉप का उल्लेख करते हुए कहा कि ये अभी भी वैसे ही हैं।
लखनऊ-कानपुर एक्सप्रेसवे को लेकर इससे पहले भी गुणवत्ता के सवाल उठते रहे हैं। अगस्त में सड़क के हिस्सों को लेकर मरम्मत और पंखों से सुखाने का वीडियो सामने आने के बाद भी अखिलेश यादव ने सरकार पर निशाना साधा था।
यूपीआई भुगतान पर टैक्स को लेकर भी हमला
अखिलेश यादव ने यूपीआई से भुगतान करने पर व्यापारियों पर लगाए गए टैक्स को लेकर भी सरकार पर निशाना साधा। उन्होंने यूपीआई को “रुपये ऐंठने वाली योजना” बताते हुए कहा कि चुंगीजीवी लोगों को रुपये ऐंठने वाली योजना बंद कर देनी चाहिए। उनका आरोप था कि ऐसी योजनाएं उद्योगपतियों की जेबें भरने के लिए बनाई जा रही हैं। इस मुद्दे को लेकर उनके बयान की हालिया रिपोर्टिंग भी सामने आई है।https://x.com/yadavakhilesh/status/2100210386243084303
200 करोड़ पौधे लगाने के दावे पर सवाल
सपा प्रमुख ने प्रदेश में 200 करोड़ पेड़ लगाए जाने के सरकारी दावे पर भी सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि सपा सरकार के दौरान एक हजार एकड़ जमीन पर एक लाख 34 हजार पेड़ लगवाए गए थे। अखिलेश ने सवाल किया कि यदि सरकार ने 200 करोड़ पौधे लगाए हैं तो वह यह भी बताए कि इतनी बड़ी संख्या में पौधे लगाने के लिए जमीन कहां है। यह दावा और उनका सवाल हालिया रिपोर्टिंग में भी दर्ज है।पूर्व मंत्री राम आश्रय कुशवाहा सपा में लौटे
इस दौरान पूर्व मंत्री राम आश्रय कुशवाहा भाजपा छोड़कर समाजवादी पार्टी में शामिल हो गए। सपा की सदस्यता लेने के बाद उन्होंने कहा कि उन्हें आज भी नेताजी यानी मुलायम सिंह यादव अपने बीच महसूस होते हैं। उन्होंने कहा कि जब तक अखिलेश यादव को मुख्यमंत्री नहीं बना देते, तब तक वह घर नहीं बैठेंगे।राजनीतिक रूप से अखिलेश यादव के इस कार्यक्रम में सरकार पर कई मुद्दों को लेकर निशाना साधने के साथ पार्टी में पूर्व मंत्री की वापसी को भी महत्वपूर्ण घटनाक्रम के तौर पर देखा गया।
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यूपी में भाजपा की कमजोर सीटों पर सहयोगियों की नजर, लगातार हार वाली सीटों पर बढ़ाई सक्रियता
मुरादाबाद। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 से पहले भाजपा के सहयोगी दल उन सीटों पर अपनी राजनीतिक सक्रियता बढ़ा रहे हैं, जहां भाजपा लंबे समय से जीत के लिए संघर्ष करती रही है या उसका प्रदर्शन कमजोर रहा है। सीटों के बंटवारे की तस्वीर साफ होने से पहले राष्ट्रीय लोक दल (रालोद), रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया (आठवले), अपना दल (एस), निषाद पार्टी और सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (सुभासपा) ने ऐसे क्षेत्रों में सम्मेलन और दूसरे कार्यक्रम शुरू कर दिए हैं। मुरादाबाद समेत मंडल की उन सीटों पर भी सहयोगी दलों की नजर है, जहां भाजपा को लगातार हार का सामना करना पड़ा है या जीत का अंतर बेहद कम रहा है।मुरादाबाद में भाजपा का रिकॉर्ड कमजोर
मुरादाबाद जिले की छह विधानसभा सीटों में 2022 के चुनाव में भाजपा को केवल मुरादाबाद नगर सीट पर जीत मिली थी। इससे पहले 2017 में पार्टी मुरादाबाद नगर और कांठ सीट जीतने में कामयाब रही थी। 2012 के चुनाव में भाजपा के खाते में सिर्फ ठाकुरद्वारा सीट आई थी।उपचुनावों को अलग रखकर देखें तो मुरादाबाद देहात और बिलारी ऐसी सीटें हैं, जहां भाजपा को इन तीन विधानसभा चुनावों में जीत नहीं मिली। वहीं 2014 में हुए उपचुनाव के बाद ठाकुरद्वारा सीट भी भाजपा के हाथ से निकल गई।
सहयोगी दलों ने शुरू की चुनावी तैयारियां
उत्तर प्रदेश में एनडीए गठबंधन में राष्ट्रीय लोक दल, सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी, अपना दल (एस) और निषाद पार्टी प्रमुख सहयोगी दल हैं। रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया (आठवले) केंद्र में भाजपा की सहयोगी है। 2027 के विधानसभा चुनाव को देखते हुए ये दल सीटों में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने की तैयारी में सक्रिय हो गए हैं।मंडल की उन सीटों पर खास फोकस किया जा रहा है, जहां भाजपा लंबे समय से जीत हासिल नहीं कर सकी है। सहयोगी दलों ने मुरादाबाद जिले में अलग-अलग कार्यक्रमों के जरिए संगठन और कार्यकर्ताओं को सक्रिय करना शुरू कर दिया है। कार्यकर्ता सम्मेलन, क्षेत्रीय सम्मेलन और अति पिछड़ा सम्मेलन के जरिए ये दल अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने में जुटे हैं। कुछ सहयोगी दल इन सीटों पर अपनी दावेदारी भी जता रहे हैं।
मंडल की उन सीटों पर खास फोकस किया जा रहा है, जहां भाजपा लंबे समय से जीत हासिल नहीं कर सकी है। सहयोगी दलों ने मुरादाबाद जिले में अलग-अलग कार्यक्रमों के जरिए संगठन और कार्यकर्ताओं को सक्रिय करना शुरू कर दिया है। कार्यकर्ता सम्मेलन, क्षेत्रीय सम्मेलन और अति पिछड़ा सम्मेलन के जरिए ये दल अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने में जुटे हैं। कुछ सहयोगी दल इन सीटों पर अपनी दावेदारी भी जता रहे हैं।भाजपा महानगर अध्यक्ष गिरीश भंडूला ने कहा, “सहयोगी दलों की सक्रियता बढ़ी है। इसमें कुछ दल सीटों पर दावेदारी भी कर रहे हैं। सीटों का बंटवारा भाजपा और सहयोगी दलों के राष्ट्रीय स्तर के नेता मिलकर तय करेंगे। फिलहाल सभी सीटों पर पार्टी की तैयारी है।”
मुरादाबाद में सहयोगी दलों के कार्यक्रम
13 सितंबर: मुरादाबाद में रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया (आठवले) का सम्मेलन।
8 सितंबर: मुरादाबाद में निषाद पार्टी का मंडलीय कार्यकर्ता सम्मेलन।
2 अगस्त: मुरादाबाद में अपना दल (एस) का क्षेत्रीय सम्मेलन।
4 जून: ठाकुरद्वारा में रालोद की विजय संकल्प महारैली।
29 अप्रैल: कैलासा बाईपास पर सुभासपा का अति पिछड़ा सम्मेलन।इन विधानसभा सीटों पर लंबे समय से भाजपा को जीत का इंतजार
विधानसभा सीट – भाजपा की आखिरी जीत
मुरादाबाद देहात – 1993
बिलारी – जीत ही नहीं मिली
ठाकुरद्वारा – 2012
कुंदरकी – 1993मंडल की इन सीटों पर भी भाजपा को संघर्ष
मुरादाबाद के अलावा मंडल के दूसरे जिलों में भी भाजपा को कुछ विधानसभा सीटों पर लंबे समय से जीत का इंतजार है। इनमें अमरोहा, संभल, नगीना, नजीबाबाद और रामपुर विधानसभा सीट शामिल हैं। अमरोहा में भाजपा को आखिरी बार 1996 में जीत मिली थी, जबकि संभल में 1993, नगीना में 1991 और नजीबाबाद में 1991 में पार्टी विजयी रही थी। रामपुर विधानसभा सीट पर 2022 में हुए उपचुनाव में भाजपा ने पहली बार जीत दर्ज की थी।रामपुर में स्थापना दिवस पर अपना दल (एस) का बड़ा कार्यक्रम
अपना दल (एस) ने भी रामपुर में अपनी गतिविधियां बढ़ाने की तैयारी कर ली है। पार्टी के राष्ट्रीय सचिव संजीव यादव के मुताबिक, 4 नवंबर को पार्टी का स्थापना दिवस है। इस मौके पर रामपुर में बड़ा कार्यक्रम आयोजित किया जाएगा। इसमें पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष अनुप्रिया पटेल शामिल होंगी। -

मिशन-2027: भाजपा ने यूपी में बूथवार माइक्रोमैनेजमेंट का खाका खींचा, तावड़े के मंत्र पर बनेगी रणनीति
लखनऊ। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 को लेकर भाजपा ने जमीनी स्तर पर अपनी तैयारियां तेज कर दी हैं। पार्टी का फोकस अब बूथवार संगठन को मजबूत करने के साथ मतदाताओं तक सीधी पहुंच बनाने पर है। दो दिवसीय यूपी दौरे पर आए भाजपा के प्रदेश प्रभारी विनोद तावड़े ने पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं को बूथ स्तर पर संगठन और जनसंपर्क मजबूत करने का जो मंत्र दिया, उसी के आधार पर माइक्रोमैनेजमेंट की रणनीति तैयार की जाएगी।पार्टी हर बूथ का अलग सामाजिक प्रोफाइल तैयार करने की योजना पर काम कर रही है। इसमें बूथ पर अलग-अलग जातियों और सामाजिक समूहों की हिस्सेदारी, पार्टी के मजबूत आधार वाले वर्ग और उन समुदायों की पहचान की जाएगी, जहां संगठन को अपनी पहुंच बढ़ाने की जरूरत है। इस आकलन के बाद संबंधित जातियों और सामाजिक समूहों के बीच संपर्क के लिए अलग-अलग टीमें बनाई जाएंगी।
जिस समाज की जिम्मेदारी, उसी के कार्यकर्ता करेंगे संपर्क
भाजपा की रणनीति में सबसे अहम पहलू यह है कि किसी समुदाय तक पहुंच बनाने के लिए उसी समाज के पार्टी कार्यकर्ताओं को आगे किया जाएगा। ये कार्यकर्ता अपने-अपने सामाजिक समूह के लोगों से घर-घर जाकर संवाद करेंगे। संपर्क के दौरान केंद्र और राज्य सरकार की योजनाओं का लाभ, स्थानीय विकास कार्य और सरकार की उपलब्धियां बताई जाएंगी। इसके साथ ही विपक्ष की ओर से किए जा रहे कथित भ्रामक प्रचार का जवाब भी लोगों के बीच देने की तैयारी है।सिर्फ प्रचार नहीं, लोगों की राय भी संगठन तक पहुंचेगी
भाजपा के बूथ अभियान में फीडबैक को भी महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया गया है। कार्यकर्ता घर-घर संपर्क के दौरान केवल सरकार की उपलब्धियां बताने तक सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि स्थानीय समस्याओं, जनता के मुद्दों और सरकार को लेकर लोगों की राय भी जानेंगे। यह जानकारी संगठन के वरिष्ठ पदाधिकारियों तक पहुंचाई जाएगी।इस फीडबैक के आधार पर बूथ स्तर पर पार्टी की स्थिति का आकलन किया जाएगा। जहां संगठन कमजोर दिखाई देगा, वहां समय रहते सुधारात्मक कदम उठाने और अतिरिक्त जनसंपर्क गतिविधियां चलाने की योजना है।
विपक्ष के नैरेटिव का जवाब बूथ से देने की तैयारी
पार्टी का जोर चुनावी नैरेटिव को केवल सोशल मीडिया या बड़े राजनीतिक मंचों तक सीमित रखने के बजाय सीधे मतदाताओं तक पहुंचाने पर है। बूथ स्तर के कार्यकर्ताओं को सरकार की योजनाओं और उपलब्धियों से जुड़े तथ्य उपलब्ध कराए जाएंगे, ताकि स्थानीय स्तर पर विपक्ष की ओर से उठाए जाने वाले सवालों का जवाब दिया जा सके।प्रदेश संगठन रखेगा हर बूथ की निगरानी
पूरे अभियान की मॉनिटरिंग प्रदेश संगठन करेगा। बूथवार टीमों की सक्रियता, घर-घर संपर्क और जनता से मिले फीडबैक की रिपोर्ट तैयार की जाएगी। जिन इलाकों में संगठन की गतिविधियां कमजोर मिलेंगी, वहां अतिरिक्त संपर्क अभियान चलाए जाएंगे। इस तरह भाजपा मिशन-2027 के लिए अपनी पुरानी ‘बूथ जीतो, चुनाव जीतो’ रणनीति को सामाजिक संपर्क और फीडबैक सिस्टम के साथ जोड़कर जमीनी स्तर पर मजबूत करने की तैयारी में है। -

सड़क-लाइट के फंड पर कमीशन की मांग? भास्कर के स्टिंग में कैश लेनदेन और विधायक निधि की डील का दावा
उत्तर प्रदेश । उत्तर प्रदेश में विधायक निधि से विकास कार्य कराने की व्यवस्था को लेकर दैनिक भास्कर की इन्वेस्टिगेशन रिपोर्ट ने गंभीर सवाल खड़े किए हैं। रिपोर्ट के मुताबिक सड़क नाली स्ट्रीट लाइट और दूसरे विकास कार्यों के लिए विधायक निधि जारी कराने के बदले कमीशन मांगने के आरोप सामने आए हैं। दैनिक भास्कर ने दो विधायकों पर स्टिंग ऑपरेशन के जरिए कमीशन की डील करने और कैश लेने के बाद अनुशंसा-पत्र जारी करने का दावा किया है। इन विधायकों में एक भाजपा और एक समाजवादी पार्टी से जुड़े हैं। हालांकि इन आरोपों पर संबंधित पक्षों का जवाब सामने आना महत्वपूर्ण होगा।रिपोर्ट के मुताबिक भास्कर की टीम ने NGO मैनेजर बनकर पहले भाजपा विधायक जय मंगल कन्नौजिया से संपर्क किया। सोलर लाइट लगाने के लिए विधायक निधि से राशि स्वीकृत कराने की बात हुई। इसके बाद कई दौर की बातचीत के बाद कथित तौर पर 35 प्रतिशत कमीशन पर सहमति बनने का दावा किया गया। रिपोर्ट में बातचीत का हवाला देते हुए बताया गया कि 10.50 लाख रुपए के प्रस्ताव पर कमीशन की रकम को लेकर चर्चा हुई और बाद में कैश लेनदेन भी हुआ।
इन्वेस्टिगेशन के अनुसार पहले 50 हजार रुपए दिए गए और इसके बाद बाकी रकम को लेकर बातचीत हुई। रिपोर्ट में दावा है कि बाद की मुलाकात में अतिरिक्त रकम भी दी गई। कुल मिलाकर 83 हजार 500 रुपए लिए जाने का दावा किया गया है। इसके अगले दिन विधायक की ओर से 10.50 लाख रुपए की सोलर लाइट के काम के लिए अनुशंसा-पत्र दिए जाने की बात रिपोर्ट में कही गई है। इस पूरे मामले ने विधायक निधि से जुड़े कामों में पारदर्शिता और निगरानी व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
इसके बाद भास्कर की टीम ने आजमगढ़ जिले की मेंहनगर सीट से सपा विधायक पूजा सरोज से जुड़े मामले की पड़ताल की। रिपोर्ट के मुताबिक सोलर लाइट और वाटर कूलर लगाने का प्रस्ताव लेकर विधायक से संपर्क किया गया। कई दौर की बातचीत के बाद कथित तौर पर कमीशन को लेकर चर्चा हुई। रिपोर्ट में विधायक के हवाले से 50 प्रतिशत कमीशन एडवांस लेने की मांग किए जाने का दावा किया गया है। प्रस्तावित कामों का कुल बजट करीब 31 लाख रुपए बताया गया और 35 प्रतिशत कमीशन के हिसाब से रकम का हिसाब लगाया गया।
रिपोर्ट के अनुसार विधायक की ओर से पहले करीब पांच लाख रुपए देने की मांग की गई। बातचीत के दौरान एक लाख रुपए दिए जाने का भी दावा किया गया है लेकिन कथित तौर पर पूरी रकम एक साथ देने की बात कहते हुए वह पैसा वापस कर दिया गया। बाद में विधायक के प्रतिनिधि की ओर से चार अनुशंसा-पत्र भेजे जाने का दावा किया गया। रिपोर्ट में इन पत्रों में कुल 81 लाख रुपए के कामों की विधायक निधि से स्वीकृति का उल्लेख किया गया है। हालांकि भास्कर टीम का दावा है कि स्टिंग के बाद इन अनुशंसा-पत्रों की हार्ड कॉपी लेने के लिए वह वापस नहीं गई।
इन दोनों मामलों में सिर्फ विधायकों पर ही नहीं बल्कि उनके करीबी लोगों पर भी कथित रूप से पैसे लेने के आरोप लगाए गए हैं। रिपोर्ट के मुताबिक एक विधायक के प्रतिनिधि ने अलग-अलग मौकों पर रकम ली जबकि दूसरे मामले में विधायक के करीबी व्यक्ति पर भी पैसे लेने का आरोप है। इससे यह सवाल और गंभीर हो जाता है कि अगर विधायक निधि के कामों में इस तरह का कथित कमीशन तंत्र मौजूद है तो विकास कार्यों की गुणवत्ता और वास्तविक लागत पर इसका क्या असर पड़ सकता है।
उत्तर प्रदेश में प्रत्येक विधायक को हर साल विधायक निधि के तौर पर पांच करोड़ रुपए उपलब्ध होने की बात रिपोर्ट में कही गई है। इस राशि का इस्तेमाल सड़क नाली पेयजल स्ट्रीट लाइट सामुदायिक भवन और अन्य स्थानीय विकास कार्यों में किया जा सकता है। ऐसे में इस फंड से जुड़ी किसी भी कथित अनियमितता का असर सीधे जनता के विकास कार्यों पर पड़ता है।
कानूनी जानकारों के मुताबिक सरकारी काम के बदले रिश्वत या कमीशन लेना गंभीर अपराध की श्रेणी में आ सकता है और भ्रष्टाचार निवारण कानून के तहत कार्रवाई संभव है। अब इस पूरे मामले में सबसे अहम सवाल यही है कि स्टिंग में सामने आए कथित लेनदेन की आधिकारिक जांच होती है या नहीं और संबंधित विधायकों पर क्या कार्रवाई की जाती है। दैनिक भास्कर ने इस इन्वेस्टिगेशन के अगले हिस्से में CDO कार्यालय में कथित कमीशन व्यवस्था से जुड़े और खुलासे करने की बात कही है। ऐसे में इस मामले की अगली कड़ी पर भी नजर रहेगी।
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अखिलेश का योगी सरकार पर हमला, बोले- विपक्ष को बदनाम करने AI वीडियो बनाकर वायरल कर रही सरकार
लखनऊ। सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने सोमवार को लखनऊ में मीडिया से बातचीत के दौरान योगी सरकार पर तीखा हमला बोला। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार विपक्षी नेताओं को बदनाम करने के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) से वीडियो तैयार कराकर वायरल कर रही है। अखिलेश ने कहा, ‘सरकार हमें बदनाम करने के लिए बच्चों के खेल न खेले। AI में हम उनसे काफी आगे हैं।’प्रेस कॉन्फ्रेंस में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को लेकर बनाया गया एक AI वीडियो भी दिखाया गया। इसमें प्रदेश की कानून-व्यवस्था समेत कई मुद्दों को लेकर सरकार पर सवाल उठाए गए। अखिलेश ने कहा कि सरकार अगर AI का इस्तेमाल विपक्ष को बदनाम करने के लिए करेगी तो वे भी इस तकनीक में उसे पीछे छोड़ देंगे। उन्होंने सरकार को ऐसी गतिविधियों से बचने की नसीहत दी।
‘यूपी में बड़े पैमाने पर लूट, सबसे ज्यादा भ्रष्ट सरकार’
सपा प्रमुख ने प्रदेश सरकार पर भ्रष्टाचार के आरोप भी लगाए। उन्होंने कहा, ‘प्रदेश में इस समय बड़े पैमाने पर लूट हो रही है। यह अब तक यूपी की सबसे ज्यादा भ्रष्ट सरकार है।’ उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार स्कूल बंद करवा रही है। अखिलेश ने कहा कि सपा बंद किए गए स्कूलों में जाकर कार्यक्रम करेगी और लोगों को सरकार के कामकाज की जानकारी देगी।एक्सप्रेसवे में गड्ढों को लेकर सरकार पर सवाल
अखिलेश ने कानपुर-लखनऊ एक्सप्रेसवे की गुणवत्ता पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि सरकार द्वारा बनाए गए एक्सप्रेसवे में गड्ढे हो गए हैं। अब इसके डिजाइन में गड़बड़ी की बात कही जा रही है। उन्होंने सवाल किया कि अगर डिजाइन में गलती हुई है तो इसके लिए जिम्मेदार कौन है।उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा उद्घाटित एक एक्सप्रेसवे की स्थिति पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि उसमें भी गड्ढे हो गए हैं। अखिलेश ने आरोप लगाया कि पीडब्ल्यूडी में बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार हो रहा है।
‘कुंभ से अब तक एक लाख करोड़ से ज्यादा खर्च, विकास कहां हुआ?’
अखिलेश ने प्रयागराज में हुए खर्च को लेकर भी सरकार को घेरा। उन्होंने कहा कि कुंभ से लेकर अब तक प्रयागराज में एक लाख करोड़ रुपये से ज्यादा खर्च हो चुका है। इसके बावजूद सवाल यह है कि वास्तव में कितना विकास हुआ। उन्होंने आरोप लगाया कि प्रदेश में भ्रष्टाचार चरम पर है और पूरा राज्य भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गया है।जयंत चौधरी पर बोले अखिलेश- ‘भाजपा 61 सीटें दे तो सम्मान होगा’
अखिलेश यादव ने केंद्रीय मंत्री जयंत चौधरी को लेकर भी भाजपा पर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि भाजपा अगर जयंत चौधरी को 61 सीटें देती है तो इसे उनका सम्मान माना जाएगा। इससे कम सीटें मिलने पर यह उनका अपमान होगा। -

पहली बार यूपी में नेताओं को दी गई बुलेट प्रूफ जैकेट, 11 मंत्रियों समेत 52 नाम शामिल; जानिए किसे मिली कौन सी सुरक्षा
उत्तर प्रदेश। उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव 2027 से पहले नेताओं की सुरक्षा व्यवस्था को लेकर सरकार ने बड़ा कदम उठाया है। योगी सरकार ने समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव और बहुजन समाज पार्टी की प्रमुख मायावती समेत 52 नेताओं को बुलेट प्रूफ जैकेट उपलब्ध कराई है। खास बात यह है कि उत्तर प्रदेश में पहली बार इतनी बड़ी संख्या में राजनीतिक नेताओं को इस तरह की सुरक्षा व्यवस्था का हिस्सा बनाया गया है। सूची में सत्ता पक्ष के नेताओं के साथ विपक्ष के प्रमुख चेहरे और अलग-अलग दलों से जुड़े कई नेता भी शामिल हैं।जानकारी के मुताबिक सुरक्षा मुख्यालय की ओर से इन बुलेट प्रूफ जैकेट की खरीद की गई है। एक जैकेट की कीमत करीब डेढ़ लाख रुपये बताई जा रही है। पहले चरण में आठ नेताओं को जैकेट दी गई थी जबकि दूसरे चरण में 44 और नेताओं को यह सुरक्षा उपकरण उपलब्ध कराया गया है। इस तरह कुल 52 नेता अब बुलेट प्रूफ जैकेट पाने वालों की सूची में शामिल हो गए हैं। इनमें प्रदेश सरकार के 11 कैबिनेट मंत्री भी बताए जा रहे हैं।
जिन प्रमुख नामों को जैकेट दी गई है उनमें मंत्री संजय निषाद नंद गोपाल गुप्ता नंदी ओम प्रकाश राजभर और अपर्णा यादव शामिल हैं। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के चर्चित भाजपा नेताओं संगीत सोम और सुरेश राणा का नाम भी सूची में बताया गया है। हालांकि सरकार ने आधिकारिक तौर पर यह स्पष्ट नहीं किया है कि किन विशेष परिस्थितियों को देखते हुए नेताओं को बुलेट प्रूफ जैकेट देने का फैसला किया गया। सुरक्षा मुख्यालय के एक अधिकारी के मुताबिक पहले बुलेट प्रूफ जैकेट सुरक्षा मानकों में शामिल नहीं थी लेकिन अब इसे सुरक्षा व्यवस्था का हिस्सा बनाया गया है।
इस फैसले को 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले सुरक्षा तैयारियों से जोड़कर देखा जा रहा है। प्रदेश में कई नेताओं को पहले से ही अलग-अलग श्रेणियों की सुरक्षा उपलब्ध है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार उत्तर प्रदेश में कुल 98 नेताओं और अन्य महत्वपूर्ण लोगों को विभिन्न सुरक्षा श्रेणियां मिली हुई हैं। इनमें सबसे अधिक लोगों को Y श्रेणी की सुरक्षा हासिल है जबकि कुछ लोगों को Y प्लस और एस्कॉर्ट के साथ अतिरिक्त सुरक्षा प्रदान की गई है।
राज्य की सबसे ऊंची सुरक्षा श्रेणियों में शामिल Z प्लस सुरक्षा पाने वालों में राज्यपाल आनंदीबेन पटेल मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के अलावा अखिलेश यादव और मायावती भी शामिल बताए गए हैं। केंद्रीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह पूर्व सांसद मुरली मनोहर जोशी और विनय कटियार समेत कई अन्य प्रमुख नेताओं को भी इस श्रेणी में सुरक्षा दी गई है। भाजपा के वरिष्ठ नेता सुरेश राणा उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य पूर्व उपमुख्यमंत्री दिनेश शर्मा और हाईकोर्ट के एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश का नाम भी Z प्लस सुरक्षा सूची में बताया गया है।
वहीं उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक और बसपा नेता सतीश चंद्र मिश्रा को Z श्रेणी की सुरक्षा मिली हुई है। भाजपा के पूर्व विधायक संगीत सोम पूर्व सांसद बृजभूषण शरण सिंह और प्रदेश सरकार के मंत्री नंद गोपाल नंदी समेत कई नेताओं को भी इसी स्तर की सुरक्षा हासिल है। दूसरी ओर ओम प्रकाश राजभर बेबी रानी मौर्य लक्ष्मी नारायण चौधरी और बलदेव सिंह औलख समेत कई नेताओं को Y प्लस श्रेणी की सुरक्षा दी गई है।
मंत्री संजय निषाद को Y श्रेणी की सुरक्षा एस्कॉर्ट के साथ मिली हुई है। उनके अलावा कई सांसद विधायक पूर्व राज्यपाल और अन्य राजनीतिक हस्तियों को भी अलग-अलग श्रेणियों में सुरक्षा उपलब्ध कराई गई है। बुलेट प्रूफ जैकेट के मामले में मंत्री संजय निषाद ने बताया कि उन्हें अभी इसे पहनने का प्रशिक्षण नहीं मिला है।
कुल मिलाकर चुनावी वर्ष से पहले उत्तर प्रदेश में नेताओं की सुरक्षा को लेकर सरकार की तैयारियां तेज होती दिखाई दे रही हैं। हालांकि बुलेट प्रूफ जैकेट बांटने के फैसले की विस्तृत वजह सरकार की ओर से सार्वजनिक नहीं की गई है। ऐसे में यह कदम सुरक्षा समीक्षा का हिस्सा है या चुनाव से पहले संभावित खतरे को देखते हुए एहतियाती व्यवस्था इसका स्पष्ट जवाब आने वाले समय में ही सामने आएगा।
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UP : मुरादाबाद मंडल में सियासी विरासत का दबदबा, 6 मौजूदा विधायकों के पिता भी रह चुके हैं MP-MLA
मुरादाबाद। उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद मंडल की राजनीति में सियासी विरासत का असर साफ दिखाई देता है। मंडल के मौजूदा छह विधायक ऐसे हैं, जिनके पिता भी राजनीति में सक्रिय रहे और विधायक या सांसद के रूप में सदन तक पहुंचे। इनमें संभल के दो, जबकि मुरादाबाद, रामपुर, अमरोहा और बिजनौर के एक-एक विधायक शामिल हैं। खास बात यह है कि इन छह विधायकों में तीन समाजवादी पार्टी और तीन भारतीय जनता पार्टी से हैं।मंडल के कई राजनीतिक परिवारों में पिता के बाद बेटों ने राजनीति की कमान संभाली। इनमें कुछ नेताओं ने अपनी अलग पहचान बना ली है और लगातार चुनाव जीतकर क्षेत्र का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं, जबकि कुछ की राजनीतिक पारी ज्यादा लंबी नहीं चल सकी।
छह मौजूदा विधायकों की सियासी विरासत
वर्तमान में भाजपा की ओर से सुशांत सिंह, आकाश सक्सेना और राजीव तरारा विधायक हैं। वहीं सपा से इकबाल महमूद, पिंकी यादव और मोहम्मद फहीम विधानसभा में क्षेत्र का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। इन सभी के पिता भी राजनीति में सक्रिय रहे और विधायक या सांसद रह चुके हैं।इनमें इकबाल महमूद सबसे अनुभवी हैं और सातवीं बार विधानसभा पहुंचकर संभल सीट का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। वहीं रामपुर के विधायक आकाश सक्सेना पहली बार विधानसभा पहुंचे हैं। पिंकी यादव और मोहम्मद फहीम तीसरी बार, जबकि सुशांत सिंह और राजीव तरारा दूसरी बार विधायक बने हैं।
इकबाल महमूद: पिता भी तीन बार रहे विधायक
संभल विधानसभा सीट से सपा विधायक इकबाल महमूद सातवीं बार सदन में पहुंचे हैं। मंडल के प्रमुख सपा नेताओं में उनकी गिनती होती है। उनके पिता महमूद हसन खान भी संभल सीट से तीन बार विधायक रह चुके थे। इकबाल महमूद ने पिता की राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाते हुए अपनी मजबूत पहचान बनाई है।मोहम्मद फहीम: पिता के निधन के बाद उपचुनाव से शुरुआत
मुरादाबाद की बिलारी सीट से सपा विधायक मोहम्मद फहीम तीसरी बार विधानसभा पहुंचे हैं। उनके पिता हाजी इरफान 2012 में बिलारी से विधायक चुने गए थे। सड़क हादसे में उनकी मौत के बाद मोहम्मद फहीम ने उपचुनाव जीतकर पहली बार विधानसभा में कदम रखा था। इसके बाद उन्होंने लगातार अपनी राजनीतिक पकड़ मजबूत की।सुशांत सिंह: पिता पांच बार विधायक, एक बार सांसद
बिजनौर की बढ़ापुर विधानसभा सीट से भाजपा विधायक सुशांत सिंह लगातार दूसरी बार चुनाव जीत चुके हैं। वह पूर्व सांसद सर्वेश सिंह के बेटे हैं। सर्वेश सिंह ठाकुरद्वारा विधानसभा सीट से पांच बार विधायक और मुरादाबाद लोकसभा सीट से एक बार सांसद रहे थे। सुशांत अब अपने पिता की राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं।राजीव तरारा: पिता भी रह चुके विधायक
अमरोहा जिले की मंडी धनौरा सीट से भाजपा विधायक राजीव तरारा भी लगातार दूसरी बार विधानसभा पहुंचे हैं। उनके पिता तोताराम वर्ष 1996 में गंगेश्वरी विधानसभा सीट से विधायक चुने गए थे। राजीव ने भी पिता के बाद राजनीति में अपनी जगह बनाई और लगातार दूसरी बार चुनाव जीतने में सफल रहे।पिंकी यादव: पिता सांसद और तीन बार विधायक
असमोली सीट से सपा विधायक पिंकी यादव लगातार तीसरी बार विधानसभा पहुंची हैं। उनके पिता बिजेंद्र पाल सिंह यादव तीन बार विधायक और एक बार सांसद रह चुके हैं। पिंकी यादव ने अपने पिता की राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाते हुए असमोली में अपनी पकड़ कायम रखी है।आकाश सक्सेना: आजम खां की सीट से पहुंचे विधानसभा
रामपुर विधानसभा सीट से भाजपा विधायक आकाश सक्सेना ने उपचुनाव में जीत दर्ज की थी। यह वही सीट है, जहां लंबे समय तक आजम खां का राजनीतिक प्रभाव रहा। आकाश सक्सेना के पिता शिव बहादुर सक्सेना रामपुर की स्वार सीट से चार बार विधायक रह चुके हैं। इस तरह आकाश भी राजनीतिक परिवार की दूसरी पीढ़ी के प्रतिनिधि हैं।इन नेताओं के बेटे भी रह चुके विधायक
मुरादाबाद मंडल में राजनीतिक परिवारों की सूची सिर्फ मौजूदा छह विधायकों तक सीमित नहीं है। कई अन्य नेताओं की संतानों ने भी चुनावी राजनीति में कदम रखा है।– पूर्व विधायक चौधरी नौनिहाल सिंह के बेटे राजेश सिंह चुन्नू कांठ से विधायक रह चुके हैं।
– पूर्व विधायक रिजवानुल हक के बेटे मोहम्मद उस्मान मुरादाबाद देहात से विधायक रह चुके हैं।
– आजम खां के बेटे अब्दुल्ला आजम रामपुर की स्वार सीट से विधायक रह चुके हैं।
– पूर्व विधायक रियासत हुसैन के बेटे सौलत अली मुरादाबाद देहात से विधायक रह चुके हैं।
– अमरोहा विधायक महबूब अली के बेटे परवेज अली पूर्व एमएलसी रह चुके हैं।
– अमरोहा सांसद कंवर सिंह तंवर के बेटे ललित तंवर वर्तमान में अमरोहा के जिला पंचायत अध्यक्ष हैं।2027 में भी दिखेगा राजनीतिक परिवारों का असर
2027 के विधानसभा चुनाव से पहले मुरादाबाद मंडल में कुछ और राजनीतिक परिवार अपने अगली पीढ़ी के नेताओं को चुनावी मैदान में उतारने की तैयारी में हैं। एक सांसद अपने बेटे को कुंदरकी विधानसभा सीट से चुनाव लड़ाने की तैयारी में बताए जा रहे हैं। वहीं मुरादाबाद देहात सीट से एक पूर्व विधायक के बेटे के भी चुनाव मैदान में उतरने की चर्चा है। ऐसे में 2027 के विधानसभा चुनाव में मुरादाबाद मंडल की सियासत में राजनीतिक विरासत बनाम नई नेतृत्वकारी पीढ़ी का मुकाबला भी देखने को मिल सकता है। -

यूपी में ब्राह्मण वोट पर सियासी घमासान, अखिलेश-मायावती की नजर, क्या भाजपा का समीकरण बिगड़ेगा?
लखनऊ। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 की तैयारियों के बीच ब्राह्मण मतदाता एक बार फिर सियासी दलों के केंद्र में आते दिख रहे हैं। पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक वर्ग के गठजोड़ यानी पीडीए की राजनीति करने वाले समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव अब ब्राह्मणों को साधने की कोशिश में जुटे हैं। पूर्व केंद्रीय मंत्री और सपा के संस्थापक सदस्यों में शामिल जनेश्वर मिश्र की जयंती पर आयोजित प्रबुद्ध सम्मेलन में अखिलेश ने पीडीए के ‘पीडी’ का अर्थ ‘पंडित’ बताया।अखिलेश ने विकास दुबे एनकाउंटर और पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के विजन व उनकी स्मृतियों की कथित उपेक्षा जैसे मुद्दों के जरिए भाजपा पर निशाना साधा। सियासी जानकारों की नजर में यह कोशिश इसलिए अहम है, क्योंकि उत्तर प्रदेश में ब्राह्मणों की आबादी करीब 12 से 14 प्रतिशत मानी जाती है और करीब 115 से 120 विधानसभा सीटों पर उनका प्रभाव माना जाता है। पूर्वांचल के कुछ क्षेत्रों में यह हिस्सेदारी 20 प्रतिशत तक बताई जाती है।
राम मंदिर आंदोलन के बाद बदला ब्राह्मणों का रुख
90 के दशक में राम जन्मभूमि आंदोलन को लेकर कांग्रेस की नीतियों से नाराज ब्राह्मणों का बड़ा हिस्सा भाजपा की ओर चला गया। इसके पीछे सांस्कृतिक और धार्मिक मुद्दों के प्रति समुदाय का झुकाव भी एक प्रमुख कारण माना गया। इसी दौर में मुस्लिम मतदाता भी कांग्रेस से दूर हुए।1990 में अयोध्या जा रहे कारसेवकों की गिरफ्तारी और पुलिस कार्रवाई के बाद तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव को मुस्लिम समुदाय का मजबूत समर्थन मिला। यादव और मुस्लिम मतों के समीकरण ने मुलायम की राजनीतिक जमीन को मजबूती दी। वहीं, ब्राह्मणों के भाजपा के साथ आने से 1991 में भाजपा ने उत्तर प्रदेश में पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई।
1993 में सपा और बसपा के गठबंधन ने पिछड़ा, दलित और मुस्लिम समीकरण के सहारे सत्ता हासिल की। हालांकि यह गठबंधन ज्यादा समय तक नहीं चला और बाद में भाजपा और सपा के बीच मुख्य राजनीतिक मुकाबला बन गया।
मायावती ने भी आजमाया था ब्राह्मण कार्ड
2003 में भाजपा से गठबंधन टूटने के बाद बसपा प्रमुख मायावती ने ब्राह्मणों को अपने साथ जोड़ने की रणनीति अपनाई। उन्होंने दलित और ब्राह्मणों के बीच राजनीतिक समीकरण बनाने के लिए अभियान चलाया। 2007 के विधानसभा चुनाव में बसपा ने 86 ब्राह्मण उम्मीदवारों को टिकट दिया, जिनमें 41 चुनाव जीते। इसके बाद मायावती पूर्ण बहुमत के साथ सरकार बनाने में सफल रहीं।इस दौरान बसपा के नारे भी बदले और पार्टी ने ‘सर्वजन हिताय-सर्वजन सुखाय’ की राजनीति को आगे बढ़ाया। सतीश मिश्र और रामवीर उपाध्याय जैसे ब्राह्मण नेताओं को पार्टी में प्रमुख भूमिका मिली। हालांकि सरकार बनने के कुछ समय बाद दलित और ब्राह्मण कैडर के बीच मतभेद की खबरें सामने आने लगीं।
2012 में सपा ने भी साधे ब्राह्मण
2012 के विधानसभा चुनाव से पहले समाजवादी पार्टी ने भी ब्राह्मणों को साधने की कोशिश की। मुलायम सिंह यादव ने 45 ब्राह्मण उम्मीदवारों को टिकट दिया, जिनमें 21 चुनाव जीतने में सफल रहे। इसके बाद अखिलेश यादव के नेतृत्व में सपा की पूर्ण बहुमत की सरकार बनी।हालांकि सरकार के कार्यकाल के दौरान कानून-व्यवस्था, सांप्रदायिक घटनाओं और हिंदू धार्मिक आयोजनों को लेकर उठे सवालों ने ब्राह्मणों के एक वर्ग को सपा से दूर कर दिया। इसके बाद 2017 में भाजपा की प्रचंड जीत के साथ ब्राह्मण मतदाताओं का बड़ा हिस्सा फिर भाजपा के साथ दिखाई दिया।
भाजपा के साथ क्यों जुड़ा ब्राह्मण वोट?
2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 68 ब्राह्मण उम्मीदवारों को टिकट दिया था, जिनमें 46 जीतकर विधानसभा पहुंचे। 2022 के चुनाव में भी भाजपा के 46 ब्राह्मण विधायक निर्वाचित हुए।योगी आदित्यनाथ की हिंदुत्ववादी राजनीति, कानून-व्यवस्था पर सख्त रुख और सनातन से जुड़े मुद्दों को प्राथमिकता देने की नीति को भाजपा के साथ ब्राह्मणों के जुड़ाव की वजहों में गिना जाता है। हालांकि, पिछले कुछ समय से यूजीसी गाइडलाइन, ट्रांसफर-पोस्टिंग और संगठन में प्रतिनिधित्व जैसे मुद्दों पर ब्राह्मणों की कथित नाराजगी की चर्चाएं भी सामने आती रही हैं।
पिछले वर्ष दिसंबर में भाजपा विधायक पीएन पाठक के घर ब्राह्मण विधायकों की बैठक और इस पर पार्टी अध्यक्ष पंकज चौधरी की सार्वजनिक नाराजगी के बाद यह मुद्दा और चर्चा में आया।
अखिलेश के सामने बड़ी चुनौती
अखिलेश यादव अब इन्हीं संभावित असंतोष के बीच भाजपा के ब्राह्मण वोट बैंक में सेंध लगाने की कोशिश कर रहे हैं। जनेश्वर मिश्र की जयंती पर प्रबुद्ध सम्मेलन और अयोध्या से पूर्व मंत्री पवन पांडेय को पहला प्रत्याशी घोषित करना इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।हालांकि, राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक अखिलेश के लिए यह राह आसान नहीं होगी। 2022 से पहले भी सपा ने परशुराम और विष्णु मंदिर बनाने तथा ब्राह्मणों को सम्मान देने जैसे वादों के जरिए इसी तरह की कोशिश की थी, लेकिन उसका चुनावी असर सीमित रहा।
इसके अलावा सपा का पारंपरिक यादव वोट बैंक और ब्राह्मण मतदाताओं के बीच राजनीतिक तालमेल बनाना भी चुनौतीपूर्ण माना जा रहा है। वहीं, अखिलेश के सामने मुस्लिम मतदाताओं को अपने साथ बनाए रखने और ब्राह्मणों को आकर्षित करने के बीच संतुलन साधने की चुनौती भी होगी।
मायावती भी पीछे नहीं
ब्राह्मण वोटों को लेकर बसपा प्रमुख मायावती भी सक्रिय हैं। उन्होंने अपने घोषित उम्मीदवारों में ब्राह्मणों को अच्छी संख्या में जगह दी है। जालौन के माधौगढ़ से आशीष पांडेय को उम्मीदवार घोषित कर उन्होंने ब्राह्मण समुदाय को संदेश देने की कोशिश की है। मायावती पहले भी ब्राह्मण-दलित समीकरण के जरिए सत्ता हासिल कर चुकी हैं। 2007 में उनका प्रयोग सफल रहा था। इस बार भी वह दलित, ब्राह्मण, मुस्लिम और पिछड़े वर्गों के बीच सामाजिक समीकरण बनाने की कोशिश कर रही हैं।किसके पाले में जाएगा ब्राह्मण वोट?
2027 के चुनाव में सपा और बसपा दोनों ब्राह्मण मतदाताओं को अपने पाले में लाने की कोशिश कर रहे हैं, जबकि भाजपा के सामने अपने पुराने सामाजिक समीकरण को मजबूत बनाए रखने की चुनौती है। अखिलेश के लिए सबसे बड़ा सवाल यह है कि वह ब्राह्मणों को आकर्षित करते हुए अपने पारंपरिक यादव-मुस्लिम आधार को किस तरह साथ रख पाएंगे। वहीं मायावती के सामने 2007 वाला सामाजिक समीकरण दोहराने की चुनौती है। ऐसे में यूपी की सियासत में ब्राह्मण वोट किस दल के पक्ष में कितना झुकता है, इसका असर 2027 के विधानसभा चुनाव के कई सीटों के समीकरण पर पड़ सकता है।