Tag: USA

  • तेलंगाना के 28 वर्षीय अंशुल कुंचा की अमेरिका में हत्या, परिवार मांग रहा शव का जल्द भारत भेजा जाना

    तेलंगाना के 28 वर्षीय अंशुल कुंचा की अमेरिका में हत्या, परिवार मांग रहा शव का जल्द भारत भेजा जाना

    नई दिल्ली। अमेरिका के फिलाडेल्फिया में तेलंगाना के 28 वर्षीय भारतीय युवक अंशुल कुंचा की हत्या कर दी गई। अंशुल अमेरिका में एक मल्टीनेशनल कंपनी में कार्यरत थे और अतिरिक्त आय के लिए वीकेंड पर पिज्जा डिलीवरी का पार्ट-टाइम काम भी करते थे।

    शनिवार रात को अंशुल को एक सुनसान इलाके में फर्जी पिज्जा ऑर्डर मिला। जब वह उस स्थान पर पिज्जा डिलीवरी देने गए, तो दो नकाबपोश हमलावरों ने उन पर हमला किया। हमलावरों ने अंशुल के सिर में कई गोलियां मारी और वहां से फरार हो गए। पुलिस के अनुसार जिस मकान में ऑर्डर दिया गया था वह खाली था।

    अंशुल की बहन तन्वी ने बताया कि यह कोई लूटपाट की घटना नहीं थी। हमलावरों ने उनसे न तो पैसे लिए और न ही कोई सामान छीना। यह पूरी घटना पूर्व नियोजित हत्या का संकेत देती है। अंशुल पहले भी लूटपाट का शिकार हो चुके थे, लेकिन इस बार का हमला सुनियोजित और घातक था।

    सीबीएस न्यूज की रिपोर्ट के अनुसार, फिलाडेल्फिया हाउसिंग अथॉरिटी के सीसीटीवी कैमरों में अंशुल को पिज्जा डिलीवरी करते हुए देखा गया, और उनके पीछे दो संदिग्धों को चलते हुए कैद किया गया। दोनों संदिग्ध गहरे रंग के कपड़े पहने थे और उनके पास बैकपैक था।

    परिवार ने अमेरिकी अधिकारियों और भारतीय वाणिज्य दूतावास से अंशुल का पार्थिव शरीर जल्द से जल्द भारत भेजने की अपील की है। न्यूयॉर्क स्थित भारतीय महावाण्यसदास ने सोशल मीडिया पर अंशुल की असामयिक मृत्यु पर शोक व्यक्त किया और बताया कि वे परिवार के संपर्क में हैं तथा हर संभव मदद प्रदान की जा रही है।

    अंशुल लगभग चार साल पहले नौकरी के सिलसिले में अमेरिका गए थे। परिवार के अनुसार, वे मेहनती और जिम्मेदार व्यक्ति थे, जो वीकेंड में अतिरिक्त आय के लिए पिज्जा डिलीवरी का काम करते थे। उनका परिवार इस घटना से गहरे सदमे में है।

    पुलिस ने कहा कि फिलहाल मामले की जांच जारी है और संदिग्धों की पहचान करने की कोशिश की जा रही है। प्रारंभिक जांच से यह संकेत मिल रहा है कि यह हत्या व्यक्तिगत रूप से अंशुल को निशाना बनाने के लिए की गई थी।

    अंशुल की बहन ने कहा, “भाई की हत्या केवल हमारी परिवारिक दुख की वजह नहीं है, बल्कि यह दिखाता है कि विदेश में भारतीय नागरिकों की सुरक्षा पर ध्यान देना कितना जरूरी है। हम चाहते हैं कि उनके हत्यारों को जल्द गिरफ्तार किया जाए और उनका शव भारत लाया जाए।”

    यह घटना फिलाडेल्फिया में भारतीय समुदाय और परिवार को हिला कर रख दी है। अधिकारियों का कहना है कि मामले की गंभीरता को देखते हुए अतिरिक्त सुरक्षा और जांच टीमों को तैनात किया गया है।

    अंशुल की असामयिक मौत से भारतीय समुदाय में चिंता और सुरक्षा को लेकर बहस छिड़ गई है। फिलहाल जांच जारी है, और परिवार तथा दूतावास दोनों यह सुनिश्चित करने में लगे हैं कि शव को भारत लाने की प्रक्रिया जल्द पूरी हो।

  • अमेरिका के ग्रीन कार्ड नियमों में बदलाव पर सस्पेंस खत्म: DHS का स्पष्ट संदेश, प्रवासियों को नहीं छोड़ना होगा देश

    अमेरिका के ग्रीन कार्ड नियमों में बदलाव पर सस्पेंस खत्म: DHS का स्पष्ट संदेश, प्रवासियों को नहीं छोड़ना होगा देश

    नई दिल्ली । अमेरिका में ग्रीन कार्ड नियमों को लेकर हाल ही में फैली असमंजस की स्थिति पर अब अमेरिकी प्रशासन ने स्पष्टता देते हुए बड़ा बयान जारी किया है, जिससे वहां रह रहे लाखों प्रवासियों, विशेषकर भारतीय समुदाय को बड़ी राहत मिली है। पिछले कुछ दिनों में जारी एक प्रशासनिक घोषणा के बाद यह धारणा बन गई थी कि ग्रीन कार्ड के लिए आवेदन करने वाले अधिकांश लोगों को प्रक्रिया पूरी होने तक अमेरिका छोड़कर अपने देश लौटना पड़ सकता है, लेकिन अब अमेरिकी गृह सुरक्षा विभाग ने स्पष्ट कर दिया है कि यह कोई नया या व्यापक नीति परिवर्तन नहीं है, बल्कि मौजूदा प्रक्रियाओं की सामान्य व्याख्या है। इस स्पष्टीकरण के बाद स्थिति काफी हद तक साफ हो गई है और प्रवासियों के बीच बनी अनिश्चितता समाप्त होती दिख रही है।

    दरअसल विवाद तब शुरू हुआ जब अमेरिकी नागरिकता एवं आव्रजन सेवाओं से जुड़ी एक हालिया जानकारी के बाद यह आशंका फैल गई कि ग्रीन कार्ड आवेदकों को अमेरिका में रहकर प्रक्रिया पूरी करने की अनुमति नहीं मिलेगी और उन्हें अपने देश लौटकर इंतजार करना होगा। इस खबर ने प्रवासी समुदायों में चिंता बढ़ा दी थी, खासकर उन लोगों के बीच जो लंबे समय से अमेरिका में नौकरी और परिवार के साथ स्थायी निवास की प्रक्रिया का इंतजार कर रहे हैं। कई आव्रजन विशेषज्ञों ने भी इस सूचना को लेकर सवाल उठाए और अधिक स्पष्ट दिशा-निर्देश की मांग की।

    अब अमेरिकी गृह सुरक्षा विभाग ने अपने बयान में कहा है कि अधिकारियों के पास पहले से ही यह अधिकार मौजूद है कि वे प्रत्येक मामले का अलग-अलग मूल्यांकन करें और परिस्थितियों के आधार पर निर्णय लें। विभाग के अनुसार हालिया निर्देश केवल मौजूदा अधिकारों की याद दिलाने के लिए जारी किए गए थे, न कि किसी नए नियम को लागू करने के लिए। सरकार ने यह भी स्पष्ट किया कि अधिकांश ग्रीन कार्ड आवेदकों को पहले की तरह ही अमेरिका में रहकर प्रक्रिया पूरी करने की अनुमति मिलती रहेगी और इसमें कोई व्यापक बदलाव नहीं किया गया है।

    व्हाइट हाउस के एक वरिष्ठ अधिकारी ने भी इस पूरे मामले को सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया बताते हुए कहा कि इसे किसी बड़े नीतिगत बदलाव के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह कदम केवल पहले से मौजूद नियमों और प्रक्रियाओं की पुनः पुष्टि है, ताकि आवेदन प्रक्रिया में पारदर्शिता बनी रहे और अधिकारियों को अपने विवेकाधिकार के उपयोग में मदद मिल सके।

    हालांकि विभाग ने यह भी संकेत दिया है कि कुछ विशेष परिस्थितियों में, जैसे वीजा शर्तों का उल्लंघन या आव्रजन नियमों का पालन न करना, अलग निर्णय लिया जा सकता है, लेकिन यह हर मामले पर लागू होने वाला कोई सार्वभौमिक नियम नहीं होगा। इसी वजह से विशेषज्ञ अब भी कुछ अतिरिक्त स्पष्टता की आवश्यकता बता रहे हैं।

    इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा सकारात्मक प्रभाव भारतीय प्रवासियों पर देखने को मिल रहा है, जो अमेरिका में बड़ी संख्या में ग्रीन कार्ड प्रक्रिया का हिस्सा हैं। इस स्पष्टता के बाद उन्हें राहत मिली है कि उन्हें आवेदन के दौरान देश छोड़ने की आवश्यकता नहीं होगी और वे अपने काम, परिवार और जीवन को बिना बाधा जारी रख सकेंगे। लंबे समय से चली आ रही प्रतीक्षा अवधि को देखते हुए यह निर्णय उनके लिए स्थिरता और सुरक्षा का संकेत माना जा रहा है।

  • ईरान–अमेरिका तनाव फिर बढ़ा: MQ-9 ड्रोन गिराने का दावा, सीजफायर उल्लंघन पर दी कड़ी चेतावनी

    ईरान–अमेरिका तनाव फिर बढ़ा: MQ-9 ड्रोन गिराने का दावा, सीजफायर उल्लंघन पर दी कड़ी चेतावनी




    नई दिल्ली। पश्चिम एशिया में ईरान और अमेरिका के बीच तनाव एक बार फिर बढ़ता नजर आ रहा है। ईरान के रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) ने दावा किया है कि उसने अमेरिकी सेना के एक MQ-9 रीपर ड्रोन को मार गिराया है। ईरान का कहना है कि यह ड्रोन उसके हवाई क्षेत्र में घुस आया था।

    यह घटनाक्रम उस समय सामने आया जब क्षेत्र में अस्थायी संघर्ष विराम (सीजफायर) लागू बताया जा रहा है और इसी दौरान होर्मुज जलडमरूमध्य (Hormuz Strait) के पास सैन्य गतिविधियां तेज हो गई हैं।

    ईरान का दावा और कड़ी चेतावनी
    ईरान की मीडिया एजेंसी मेहर न्यूज के अनुसार, IRGC ने कहा कि अमेरिकी ड्रोन उसकी सीमा में प्रवेश कर रहा था, जिसके बाद उसे निशाना बनाकर मार गिराया गया। साथ ही ईरान ने अमेरिका को चेतावनी दी है कि यदि सीजफायर का उल्लंघन दोबारा किया गया तो इसका “कड़ा और निर्णायक जवाब” दिया जाएगा।ईरान ने यह भी कहा कि उसकी सुरक्षा और संप्रभुता का उल्लंघन किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

    अमेरिकी कार्रवाई का दावा
    दूसरी ओर, अमेरिकी सेंट्रल कमांड (CENTCOM) ने कहा है कि उसने आत्मरक्षा में कार्रवाई की है। अमेरिकी प्रवक्ता के मुताबिक, क्षेत्र में मौजूद अमेरिकी सैनिकों और युद्धपोतों को खतरा पैदा करने वाली गतिविधियों को रोकने के लिए यह कदम उठाया गया।

    रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका ने होर्मुज स्ट्रेट के पास संदिग्ध बोट्स पर भी कार्रवाई की, जिन पर कथित तौर पर बारूदी सुरंगें बिछाने की कोशिश का आरोप था। इसके अलावा बंदर अब्बास के पास एक सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइल साइट पर भी हमले की बात सामने आई है।

    चार ईरानी सैनिकों की मौत का दावा
    ईरानी मीडिया का दावा है कि अमेरिकी हमलों में रिवोल्यूशनरी गार्ड के चार सैनिकों की मौत हुई है। हालांकि इस पर स्वतंत्र रूप से आधिकारिक पुष्टि नहीं हो सकी है।

    क्षेत्र में बढ़ता तनाव
    होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल परिवहन मार्गों में से एक माना जाता है। ऐसे में यहां किसी भी तरह की सैन्य गतिविधि वैश्विक ऊर्जा बाजार पर भी असर डाल सकती है।

    ईरान और अमेरिका के बीच पहले से ही परमाणु कार्यक्रम और क्षेत्रीय प्रभाव को लेकर तनाव बना हुआ है। इस ताजा घटनाक्रम ने दोनों देशों के बीच हालात को और अधिक संवेदनशील बना दिया है।

  • ढाका में US डिफेंस डील पर मंथन, ACSA और GSOMIA समझौते फिर सुर्खियों में

    ढाका में US डिफेंस डील पर मंथन, ACSA और GSOMIA समझौते फिर सुर्खियों में




    नई दिल्ली(New Delhi)।
    बांग्लादेश में अमेरिका के साथ दो अहम रक्षा समझौतों को लेकर राजनीतिक और रणनीतिक हलकों में बड़ी चर्चा तेज हो गई है। ये दोनों समझौते ACSA (Acquisition and Cross-Servicing Agreement) और GSOMIA (General Security of Military Information Agreement) कई वर्षों से लंबित हैं, जिन्हें लेकर अब एक बार फिर ढाका में गंभीर मंथन शुरू हो गया है।

    रिपोर्ट्स के अनुसार, पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना की सरकार ने अमेरिका के साथ इन डिफेंस डील्स को आगे बढ़ाने से परहेज किया था। माना जाता है कि उस समय सरकार ने भारत और चीन के साथ संतुलन बनाए रखने की नीति अपनाई थी, जिसके चलते इन समझौतों पर अंतिम सहमति नहीं बन सकी। हालांकि, अब राजनीतिक बदलाव और नई परिस्थितियों के बीच इन समझौतों के फिर से सक्रिय होने की संभावना जताई जा रही है।

    ACSA समझौता के तहत अमेरिका और बांग्लादेश के बीच सैन्य लॉजिस्टिक्स सहयोग को मजबूत किया जाता है, जिसमें ईंधन आपूर्ति, उपकरणों की मरम्मत और सैन्य सहायता जैसी सुविधाएं शामिल होती हैं। वहीं GSOMIA के तहत दोनों देशों के बीच संवेदनशील सैन्य सूचनाओं के सुरक्षित आदान-प्रदान की व्यवस्था बनाई जाती है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि यदि ये दोनों समझौते लागू होते हैं, तो इससे अमेरिका की बांग्लादेश में सैन्य और रणनीतिक पहुंच और मजबूत हो सकती है। यह कदम बंगाल की खाड़ी क्षेत्र में अमेरिकी उपस्थिति को बढ़ाने के रूप में भी देखा जा रहा है, जिससे पूरे इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में शक्ति संतुलन पर असर पड़ सकता है।

    हालांकि, यह स्पष्ट किया जा रहा है कि इन समझौतों का अर्थ किसी सैन्य बेस की स्थापना नहीं है, बल्कि यह मुख्य रूप से सहयोग, लॉजिस्टिक्स और सूचना साझाकरण तक सीमित ढांचा है। फिर भी, इस पहल को लेकर क्षेत्रीय भू-राजनीति में नई हलचल देखी जा रही है।

  • पाकिस्तान-ईरान का सीक्रेट डील दावा: क्या है पूरा मामला?

    पाकिस्तान-ईरान का सीक्रेट डील दावा: क्या है पूरा मामला?



    नई दिल्ली। हाल में कुछ अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट्स और इज़रायली मीडिया दावों में यह कहा गया है कि पाकिस्तान और ईरान कथित तौर पर एक “सीक्रेट डील” पर काम कर रहे हैं, जिसमें अमेरिका से चल रही ईरान की बातचीत में पाकिस्तान मध्यस्थ की भूमिका निभा रहा है।इस पूरे विवाद को लेकर अभी तक किसी भी सरकार ने आधिकारिक तौर पर इन दावों की पुष्टि नहीं की है, इसलिए इन्हें फिलहाल अनकन्फर्म्ड मीडिया रिपोर्ट्स के रूप में ही देखा जा रहा है।

    क्या दावा किया जा रहा है?
    रिपोर्ट्स के मुताबिक आरोप यह हैं कि:

    पाकिस्तान ईरान और अमेरिका के बीच मध्यस्थता कर रहा है

    बदले में आर्थिक मदद या वित्तीय लाभ मिलने की बात कही जा रही है

    ईरान को अमेरिका के साथ “बेहतर डील” दिलाने में मदद का दावा

    इस प्रक्रिया में पाकिस्तान की “निष्पक्षता” पर सवाल उठाए जा रहे हैं



    पाकिस्तान की भूमिका पर चर्चा
    इन दावों के बीच पाकिस्तान के कई शीर्ष नेताओं और अधिकारियों के तेहरान दौरे को भी जोड़ा जा रहा है। इसमें शामिल हैं:

    गृह मंत्री के स्तर की यात्राएं

    विदेश नीति से जुड़े प्रतिनिधिमंडल

    सैन्य और कूटनीतिक संपर्क

    इन यात्राओं को कुछ रिपोर्ट्स में ईरान-अमेरिका बातचीत में सक्रिय कूटनीतिक भूमिका के रूप में देखा जा रहा है।

    ईरान–अमेरिका तनाव की पृष्ठभूमि
    यह पूरा मामला उस बड़े भू-राजनीतिक तनाव से जुड़ा है जिसमें शामिल हैं:

    ईरान का परमाणु कार्यक्रम

    अमेरिका और इज़रायल की सुरक्षा चिंताएं

    पश्चिम एशिया में लगातार सैन्य तनाव

    समय-समय पर हमलों और जवाबी कार्रवाइयों का दौर

    इस स्थिति में कई देशों द्वारा मध्यस्थता के प्रयास किए जा रहे हैं, जिनमें पाकिस्तान का नाम भी सामने आता रहा है।

    इज़रायल की आपत्ति
    इज़रायली पक्ष की मीडिया रिपोर्ट्स और राजनीतिक बयानों में:

    ईरान पर सख्त रुख की मांग

    अमेरिका की बातचीत नीति की आलोचना

    पाकिस्तान की भूमिका पर सवाल

    हालांकि ये बयान राजनीतिक दृष्टिकोण से जुड़े हैं और इन्हें स्वतंत्र रूप से सत्यापित नहीं माना जा सकता।

  • नई वैश्विक राजनीति पर बहस तेज: RIC थ्योरी फिर चर्चा में, भारत की भूमिका पर टिकी नजरें

    नई वैश्विक राजनीति पर बहस तेज: RIC थ्योरी फिर चर्चा में, भारत की भूमिका पर टिकी नजरें



    नई दिल्ली। रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के करीबी विचारक माने जाने वाले Alexander Dugin के हालिया बयानों के बाद एक बार फिर “RIC (Russia–India–China)” और बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था की चर्चा तेज हो गई है। डुगिन का दावा है कि पश्चिमी देशों का वैश्विक दबदबा घट रहा है और रूस व चीन इसके विकल्प के रूप में उभर रहे हैं, जबकि भारत की भूमिका भविष्य की वैश्विक संरचना में निर्णायक हो सकती है।

    हालांकि अंतरराष्ट्रीय संबंध विशेषज्ञों का मानना है कि यह विचार अभी एक रणनीतिक सिद्धांत और राजनीतिक बहस तक ही सीमित है, न कि कोई औपचारिक गठबंधन या तय वैश्विक व्यवस्था।

    विशेषज्ञों के अनुसार, पिछले दो दशकों में वैश्विक शक्ति संतुलन में बड़ा बदलाव देखने को मिला है। एक तरफ United States अब भी सैन्य, तकनीकी और वित्तीय स्तर पर सबसे प्रभावशाली शक्ति बनी हुई है, वहीं दूसरी ओर China आर्थिक और तकनीकी क्षेत्र में तेजी से अपना प्रभाव बढ़ा रही है। वहीं Russia पश्चिमी देशों के साथ टकराव के बीच अपने रणनीतिक हितों को मजबूत करने की कोशिश कर रहा है।

    भारत की स्थिति इस पूरे परिदृश्य में सबसे अलग मानी जा रही है। India लगातार “रणनीतिक स्वायत्तता” की नीति पर चलते हुए किसी एक गुट में पूरी तरह शामिल होने से बचता रहा है। भारत एक तरफ अमेरिका और पश्चिमी देशों के साथ आर्थिक व तकनीकी सहयोग बढ़ा रहा है, तो दूसरी तरफ रूस के साथ ऐतिहासिक रक्षा संबंध भी बनाए हुए है।

    इसी बीच चीन-रूस-भारत को मिलाकर RIC समूह की चर्चा जरूर समय-समय पर उठती रही है, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि तीनों देशों के बीच मौजूद सीमा विवाद, भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा और अलग-अलग राष्ट्रीय हित इसे एक स्थायी गठबंधन बनने से रोकते हैं।

    विदेश नीति विश्लेषकों के मुताबिक, आने वाले समय में दुनिया किसी एक ध्रुव के बजाय “बहु-ध्रुवीय शक्ति संतुलन” की ओर बढ़ सकती है, लेकिन यह संतुलन किसी औपचारिक RIC ब्लॉक के रूप में नहीं बल्कि अलग-अलग वैश्विक साझेदारियों के जाल के रूप में सामने आएगा।

    कुल मिलाकर, डुगिन का यह विचार वैश्विक राजनीति में एक बहस जरूर पैदा करता है, लेकिन वास्तविक अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था अभी भी जटिल और बदलते शक्ति संतुलन पर आधारित है, जिसमें किसी एक गुट का पूर्ण वर्चस्व या RIC जैसा एकीकृत ब्लॉक फिलहाल व्यवहारिक रूप से संभव नहीं दिखता।

  • ईरान- अमेरिका तनाव फिर चरम पर, ट्रम्प-नेतन्याहू पर इनाम वाले बिल की चर्चा; पश्चिम एशिया में बढ़ा कूटनीतिक और सैन्य संकट

    ईरान- अमेरिका तनाव फिर चरम पर, ट्रम्प-नेतन्याहू पर इनाम वाले बिल की चर्चा; पश्चिम एशिया में बढ़ा कूटनीतिक और सैन्य संकट



    नई दिल्ली। ईरान और अमेरिका के बीच तनाव एक बार फिर गंभीर स्तर पर पहुंच गया है। अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक ईरान की संसद में एक ऐसे बिल पर चर्चा चल रही है, जिसमें अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प और इजराइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के खिलाफ कार्रवाई करने वालों को भारी इनाम देने का प्रावधान हो सकता है। हालांकि यह अभी प्रारंभिक प्रस्ताव स्तर पर है और इस पर अंतिम वोटिंग बाकी है। इस कदम को पश्चिम एशिया में पहले से जारी तनाव का और बड़ा संकेत माना जा रहा है।

    ईरानी संसद की राष्ट्रीय सुरक्षा समिति के हवाले से सामने आई जानकारी में कहा गया है कि यह प्रस्ताव हाल के सैन्य और राजनीतिक तनावों के जवाब में तैयार किया जा रहा है। कुछ सांसदों ने यह भी संकेत दिया है कि इस पर जल्द ही संसद में मतदान हो सकता है। इसी बीच ईरान के शीर्ष नेतृत्व और सैन्य ढांचे में हालिया घटनाओं को लेकर भी नाराजगी बढ़ी हुई बताई जा रही है, जिससे क्षेत्रीय हालात और संवेदनशील हो गए हैं।

    दूसरी ओर, अमेरिका की ओर से भी सख्त रुख देखने को मिल रहा है। पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने दावा किया है कि ईरान पर संभावित सैन्य कार्रवाई को फिलहाल टाल दिया गया है। ट्रम्प के मुताबिक कतर, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात जैसे खाड़ी देशों के नेताओं ने बातचीत के लिए कुछ समय देने की अपील की थी, जिसके बाद यह निर्णय लिया गया। हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि अगर कोई समझौता नहीं होता है तो अमेरिका कार्रवाई के लिए तैयार रहेगा।

    इस घटनाक्रम के बीच पश्चिम एशिया में तनाव कई मोर्चों पर बढ़ता दिख रहा है। होर्मुज जलडमरूमध्य में व्यापारिक जहाजों की आवाजाही को लेकर चिंता बनी हुई है, जहां हजारों नाविकों के साथ बड़ी संख्या में जहाज फंसे होने की रिपोर्ट सामने आई है। विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी तरह की सैन्य गतिविधि या टकराव से वैश्विक तेल आपूर्ति पर असर पड़ सकता है।

    इसी दौरान क्षेत्र में ड्रोन गतिविधियों और सुरक्षा घटनाओं की खबरों ने भी स्थिति को और जटिल बना दिया है। सऊदी अरब और अन्य खाड़ी देशों ने अपनी सुरक्षा व्यवस्था और हवाई रक्षा को और मजबूत किया है। वहीं ईरान ने भी अपने भीतर सुरक्षा और खुफिया गतिविधियों पर निगरानी बढ़ा दी है।

    अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संयुक्त राष्ट्र ने स्पष्ट किया है कि होर्मुज स्ट्रेट में नौवहन की स्वतंत्रता किसी भी स्थिति में बाधित नहीं होनी चाहिए। UN ने सभी पक्षों से संयम बरतने और क्षेत्रीय स्थिरता बनाए रखने की अपील की है।

    इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर ईरान-अमेरिका संबंधों को तनावपूर्ण मोड़ पर ला दिया है, जहां एक ओर कूटनीतिक बातचीत जारी है, वहीं दूसरी ओर सैन्य और रणनीतिक तैयारी भी तेज होती दिख रही है।

  • ईरान का सख़्त संदेश: सरेंडर नहीं करेंगे, ट्रंप की धमकी पर राष्ट्रपति पेजेश्कियान का पलटवार

    ईरान का सख़्त संदेश: सरेंडर नहीं करेंगे, ट्रंप की धमकी पर राष्ट्रपति पेजेश्कियान का पलटवार



    नई दिल्ली। ईरान और अमेरिका के बीच तनाव के बीच ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान ने स्पष्ट कहा है कि उनका देश किसी भी हालत में सरेंडर नहीं करेगा। उन्होंने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बयानों का जवाब देते हुए कहा कि बातचीत का मतलब झुकना नहीं होता, बल्कि अपने अधिकारों और गरिमा के साथ चर्चा करना होता है।

    राष्ट्रपति पेजेश्कियान ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर लिखा कि ईरान अपनी संप्रभुता और कानूनी अधिकारों से किसी भी कीमत पर समझौता नहीं करेगा। उन्होंने कहा कि देश पूरी मजबूती और सम्मान के साथ बातचीत की प्रक्रिया में शामिल है, लेकिन दबाव या धमकी के आगे नहीं झुकेगा।

    इससे पहले डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया था कि खाड़ी देशों—कतर, सऊदी अरब और यूएई—के नेताओं के अनुरोध पर ईरान पर प्रस्तावित सैन्य कार्रवाई को फिलहाल रोक दिया गया है। ट्रंप के अनुसार, इस समय क्षेत्र में शांति समझौते को लेकर गंभीर बातचीत चल रही है, लेकिन अगर डील नहीं होती है तो अमेरिका सैन्य विकल्पों के लिए तैयार है।

    ट्रंप ने यह भी कहा कि किसी भी समझौते में सबसे अहम शर्त यह होगी कि ईरान परमाणु हथियार विकसित न कर सके। उन्होंने अमेरिकी सेना को भी निर्देश दिया है कि जरूरत पड़ने पर कार्रवाई के लिए पूरी तरह तैयार रहें।

    इस बीच ट्रंप ने ईरान को चेतावनी देते हुए कहा था कि समय तेजी से खत्म हो रहा है और अगर जल्द समझौता नहीं हुआ तो परिणाम गंभीर होंगे। वहीं, दोनों देशों के बीच बढ़ते तनाव के बावजूद कूटनीतिक बातचीत की संभावना अभी भी बनी हुई है।

    फिलहाल हालात यह हैं कि एक तरफ अमेरिका दबाव और चेतावनी की रणनीति अपना रहा है, तो दूसरी तरफ ईरान अपने रुख पर अडिग रहते हुए बातचीत को “सरेंडर नहीं” मानने की बात दोहरा रहा है।

  • ट्रंप की धमकी के बीच ईरान की बड़ी तैयारी, आम नागरिकों को दी जा रही हथियार चलाने की ट्रेनिंग

    ट्रंप की धमकी के बीच ईरान की बड़ी तैयारी, आम नागरिकों को दी जा रही हथियार चलाने की ट्रेनिंग



    नई दिल्ली(New Delhi)। 
    अमेरिका और ईरान के बीच जारी तनावपूर्ण हालात के बीच ईरान की सैन्य तैयारियों को लेकर बड़े दावे सामने आए हैं। रिपोर्ट्स के अनुसार ईरान की इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (Islamic Revolutionary Guard Corps) द्वारा देशभर में आम नागरिकों को हथियार चलाने और सैन्य प्रशिक्षण दिए जाने की बातें सामने आ रही हैं।

    तेहरान सहित कई शहरों में कथित तौर पर सार्वजनिक स्थानों पर प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं, जहां महिलाओं, पुरुषों और युवाओं को हथियारों के उपयोग की जानकारी दी जा रही है। कुछ रिपोर्ट्स में यह भी दावा किया गया है कि छोटी उम्र के बच्चों को भी प्रतीकात्मक रूप से हथियार चलाने का अभ्यास कराया गया।

    इसके साथ ही ईरानी सरकारी मीडिया से जुड़े कुछ वायरल वीडियो में एंकरों को हथियारों के साथ अभ्यास करते हुए दिखाया गया है, जिससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चिंता बढ़ी है।

    विशेषज्ञों के अनुसार यह घटनाक्रम उस व्यापक भू-राजनीतिक तनाव का हिस्सा है, जिसमें अमेरिका और ईरान दोनों एक-दूसरे पर दबाव बनाए रखने की कोशिश कर रहे हैं। रिपोर्ट्स में यह भी कहा गया है कि दोनों देशों के बीच कूटनीतिक समाधान अभी भी अनिश्चित स्थिति में है।

    हालांकि इन सभी दावों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और सैन्य गतिविधियों के संकेतों ने वैश्विक स्तर पर चिंता जरूर बढ़ा दी है।

  • अमेरिका का बड़ा एंटी-ISIS ऑपरेशन: अफ्रीका में छिपा नंबर-2 कमांडर ढेर, ट्रम्प का दावा,संगठन की कमर टूटी

    अमेरिका का बड़ा एंटी-ISIS ऑपरेशन: अफ्रीका में छिपा नंबर-2 कमांडर ढेर, ट्रम्प का दावा,संगठन की कमर टूटी



    नई दिल्ली। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने दावा किया है कि अफ्रीका में एक बड़े सैन्य ऑपरेशन के दौरान आतंकी संगठन ISIS का दूसरा सबसे बड़ा कमांडर अबू बिलाल अल मिनुकी मारा गया है। यह कार्रवाई अमेरिकी सेना और नाइजीरियाई सुरक्षा बलों के संयुक्त ऑपरेशन के तहत की गई, जिसमें लंबे समय से उसकी गतिविधियों पर नजर रखी जा रही थी।

    ट्रम्प के अनुसार, यह आतंकी संगठन के सबसे सक्रिय और रणनीतिक दिमागों में से एक था, जो फंडिंग नेटवर्क और हमलों की योजना बनाने में अहम भूमिका निभाता था। उसके मारे जाने से ISIS के कमांड स्ट्रक्चर और वित्तीय नेटवर्क को बड़ा नुकसान पहुंचा है। हालांकि इस ऑपरेशन की सटीक जगह और समय को लेकर आधिकारिक जानकारी साझा नहीं की गई है।

    सूत्रों के मुताबिक, अबू बिलाल अल मिनुकी का जन्म 1982 में नाइजीरिया के बोर्नो राज्य में हुआ था और वह लंबे समय से अफ्रीका में छिपकर ISIS की गतिविधियों को संचालित कर रहा था। उसे 2023 में अमेरिका ने “ग्लोबल टेररिस्ट” घोषित किया था, जिसके बाद उसकी संपत्तियां फ्रीज कर दी गई थीं और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उसकी गतिविधियों पर रोक लगा दी गई थी।

    ISIS के इस नंबर-2 कमांडर को संगठन के भीतर “शैडो ऑपरेटर” माना जाता था, क्योंकि वह सीधे सामने नहीं आता था और नेटवर्क व फंडिंग को नियंत्रित करता था। उसके कई नाम भी बताए जाते थे, लेकिन उसकी कोई आधिकारिक तस्वीर सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं थी।

    नाइजीरिया और आसपास के पश्चिमी अफ्रीकी देशों में ISIS और उससे जुड़े संगठनों की गतिविधियां लंबे समय से चिंता का विषय बनी हुई हैं। बोको हराम और इस्लामिक स्टेट वेस्ट अफ्रीका प्रोविंस जैसे संगठन इस क्षेत्र में लगातार हिंसा फैला रहे हैं, जिसमें हजारों लोगों की जान जा चुकी है और लाखों लोग विस्थापित हुए हैं।

    विशेषज्ञों के अनुसार, इस ऑपरेशन को ISIS के खिलाफ एक बड़ी रणनीतिक सफलता माना जा रहा है, लेकिन संगठन के पूरी तरह खत्म होने की संभावना अभी भी नहीं है क्योंकि इसके नेटवर्क कई देशों में फैले हुए हैं और यह समय-समय पर नए नेतृत्व के साथ सक्रिय हो जाता है।

    कुल मिलाकर, यह कार्रवाई अफ्रीका में आतंकवाद के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय सहयोग का एक अहम उदाहरण मानी जा रही है, जिससे क्षेत्रीय सुरक्षा पर सकारात्मक असर पड़ने की उम्मीद जताई जा रही है।