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  • अमेरिका में विदेशी छात्रों को बड़ा झटका…. पढ़ते हुए नौकरी करना पड़ेगा महंगा!

    अमेरिका में विदेशी छात्रों को बड़ा झटका…. पढ़ते हुए नौकरी करना पड़ेगा महंगा!


    वाशिंगटन।
    अमेरिका (America) में पढ़ाई कर रहे विदेशी छात्रों (Foreign Students) के लिए साथ में नौकरी करना अब महंगा हो सकता है. ट्रंप प्रशासन ने अंतरराष्ट्रीय छात्रों के लिए ऑप्शनल प्रैक्टिकल ट्रेनिंग (Optional Practical Training- OPT) कार्यक्रम में शामिल होने पर भारी भरकम फीस लगाने का प्रस्ताव दिया है। हालांकि, यह रकम छात्रों से सीधे नहीं, बल्कि संबंधित कॉलेज या यूनिवर्सिटी से ली जाएगी।

    दरअसल, होमलैंड सिक्योरिटी विभाग ने विदेशी छात्रों के लिए ऑप्शनल प्रैक्टिकल ट्रेनिंग (OPT) कार्यक्रम में शुरुआती आवेदन पर 70,000 डॉलर (भारतीय ₹67.72 लाख रुपये) की भारी भरकम फीस लगाने का प्रस्ताव दिया है. हर नए छात्र के OPT कार्यक्रम में शुरुआती आवेदन के लिए स्कूल को 70,000 डॉलर देने होंगे. वहीं, कार्यक्रम को आगे बढ़ाने या नवीनीकरण के लिए 30,000 डॉलर फीस प्रस्तावित है।


    क्या है OPT कार्यक्रम?

    OPT के तहत विदेशी छात्रों को अपनी पढ़ाई से जुड़े क्षेत्र में अमेरिका में काम करने का मौका मिलता है. आम तौर पर छात्र ग्रेजुएशन के बाद एक साल तक काम कर सकते हैं. वहीं, साइंस, टेक्नोलॉजी, इंजीनियरिंग और मैथ्स यानी STEM विषयों के छात्रों को अतिरिक्त दो साल तक काम करने का मौका मिल सकता है.

    इस प्रस्ताव से अमेरिकी कॉलेज और यूनिवर्सिटी प्रभावित हो सकते हैं, क्योंकि वे बड़ी संख्या में विदेशी छात्रों को दाखिला देते हैं. विदेशी छात्र इन संस्थानों के लिए फीस के एक महत्वपूर्ण स्रोत हैं. इसके अलावा टेक कंपनियों और उन दूसरे उद्योगों पर भी असर पड़ सकता है, जहां विदेशी छात्रों की बड़ी संख्या में भर्ती होती है।


    सरकार ने क्यों लिया यह फैसला?

    होमलैंड सिक्योरिटी विभाग ने इस शुल्क को वीजा कार्यक्रम में कथित धोखाधड़ी और दुरुपयोग रोकने की कोशिश बताया है. विभाग ने OPT को सस्ते विदेशी श्रम के लिए इस्तेमाल होने वाला माध्यम बताया है. वहीं, अंतरराष्ट्रीय शिक्षा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करने वाले संगठन NAFSA ने इस प्रस्ताव का विरोध किया है. संगठन की CEO फांटा अव ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय छात्रों को अमेरिका से दूर करने से अमेरिकी नवाचार, आर्थिक विकास, रोजगार और वैश्विक नेतृत्व पर असर पड़ सकता है।


    प्रस्ताव पर 60 दिन तक मांगी जाएगी राय

    यह अभी अंतिम फैसला नहीं है. प्रस्ताव पर जनता को 60 दिनों तक अपनी राय और आपत्तियां दर्ज कराने का मौका मिलेगा. इसके बाद DHS इसे अंतिम रूप देकर लागू कर सकता है. हालांकि, उच्च शिक्षा संस्थानों और कारोबारी संगठनों की ओर से इस प्रस्ताव को अदालत में चुनौती दिए जाने की संभावना भी है. ऐसी कानूनी कार्रवाई से इसके लागू होने में देरी हो सकती है।

  • होर्मुज स्‍ट्रेट में अमेरिका के पसीने छुड़ा रहा ईरान…. 72 घंटे में 5 जहाजों पर किया हमला

    होर्मुज स्‍ट्रेट में अमेरिका के पसीने छुड़ा रहा ईरान…. 72 घंटे में 5 जहाजों पर किया हमला


    तेहरान।
    लाल सागर (Red Sea) की तरफ से हूती (Houthis) और फारस की खाड़ी (Persian Gulf) से लेकर ओमान की खाड़ी तक ईरान (Iran) गदर मचाए हुए हैं. ताबड़तोड़ हमले से अमेरिका (America) और उसके सहयोगियों के माथे से पसीना निकल रहा है. ईरान ने खासकर होर्मुज स्‍ट्रेट (Strait of Hormuz) को श्‍मशान बना रखा है. दुनिया का एनर्जी कॉरिडोर कहे जाने वाला होर्मुज अमेरिका और ईरान की पंजे में फंसकर फड़फड़ा है. अब ईरान की तरफ से होर्मुज स्‍ट्रेट में एक बार फिर से हमला करने की खबर है।

    बताया जा रहा है कि ईरानी हमले का शिकार बने जहाज में आग लग गई है. पिछले 72 घंटे में 5 जहाजों पर अटैक किया गया है. पहले से ही वीरान हो चुके होर्मुज से अब हर कोई गुजरने से डर रहा है. अमेरिका ने इस समुद्री गलियारे में पूर्ण सुरक्षा देने का भरोसा दिलाया था, लेकिन तेल, गैस और अन्‍य जरूरी सामानों से लदे टैंकर्स को लगातार निशाना बनाया जा रहा है. ईरान जंग शुरू होने के बाद से होर्मुज स्‍ट्रेट से तेल और गैस लदे जहाजों की आवाजाही न के बराबर रह गई है।

    ओमान के पास रणनीतिक रूप से महत्‍वपूर्ण होर्मुज जलडमरूमध्य में एक और टैंकर पर हमला किए जाने की खबर है, जिसके बाद जहाज में आग लग गई. ब्रिटेन की समुद्री सुरक्षा एजेंसी UKMTO ने घटना की पुष्टि करते हुए बताया कि चालक दल सुरक्षित है, जबकि जहाज को हुए नुकसान का तत्काल पता नहीं चल सका है. ईरान की अर्ध-सरकारी समाचार एजेंसी फार्स ने स्थानीय सूत्रों के हवाले से बताया कि करीब 25 लाख बैरल क्षमता वाला सुपरटैंकर ओमान के तट से लगभग 8 किलोमीटर दूर प्रभावित हुआ है. हालांकि, हमले के लिए जिम्मेदारी की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है. यह घटना ऐसे समय हुई है जब 29 सितंबर को तीन टैंकरों को निशाना बनाए जाने की रिपोर्ट सामने आई थी. इससे क्षेत्र में कमर्शियल जहाजों की सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ गई है।


    ईरान में एंटी टेररिस्‍ट ऑपरेशन

    ईरान के दक्षिण-पूर्वी शहर जाहेदान में इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) ने एक अभियान चलाकर 6 आतंकवादियों को मार गिराने का दावा किया है. अभियान के दौरान कई विस्फोटक उपकरण भी बरामद किए गए. ईरानी सुरक्षा सूत्रों के अनुसार, क्षेत्र में हाल के हफ्तों में सुरक्षा बलों पर हमलों में वृद्धि हुई है, जिसके बाद आतंकवादी गतिविधियों के खिलाफ अभियान तेज किया गया है. IRGC के करीबी एक ईरानी सूत्र ने अभियान की जानकारी साझा की. हालांकि, मारे गए लोगों की पहचान और उनके किसी संगठन से जुड़े होने के संबंध में तत्काल विस्तृत जानकारी सामने नहीं आई है. जाहेदान और ईरान के सिस्तान-बलूचिस्तान प्रांत के कुछ हिस्सों में सुरक्षा स्थिति लंबे समय से संवेदनशील रही है. अधिकारियों ने क्षेत्र में सुरक्षा अभियानों और निगरानी को बढ़ाया है।

    अमेरिका ने ईरान के खिलाफ सैन्य दबाव बढ़ाते हुए मध्य पूर्व में अपनी सैन्य मौजूदगी मजबूत करनी शुरू कर दी है. अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार, यूएसएस मेकिन आइलैंड एम्फीबियस रेडी ग्रुप करीब 2,000 मरीन के साथ क्षेत्र की ओर रवाना हुआ है. इस बल में उभयचर अभियानों के लिए प्रशिक्षित 13वीं मरीन एक्सपेडिशनरी यूनिट शामिल है. इसके अलावा यूएसएस थियोडोर रूजवेल्ट कैरियर स्ट्राइक ग्रुप भी मध्य पूर्व की ओर बढ़ रहा है. इससे क्षेत्र में अमेरिकी एयरक्राफ्ट कैरियर की संख्या तीन तक पहुंच सकती है. कुल अमेरिकी सैन्य मौजूदगी में करीब 9,000 अतिरिक्त सैनिक शामिल हो सकते हैं. इसी बीच सऊदी अरब और कतर में ऊर्जा प्रतिष्ठानों की सुरक्षा के लिए दो अतिरिक्त पैट्रियट मिसाइल बैटरियां तैनात की गई हैं. यह कदम ईरान की संभावित जवाबी कार्रवाई की आशंका के बीच उठाया गया है।

  • नॉर ईस्टर तूफान ने अमेरिका में मचाई तबाही…. तेज हवा-बारिश से जनजीवन बेहाल, 425 उड़ानें रद्द

    नॉर ईस्टर तूफान ने अमेरिका में मचाई तबाही…. तेज हवा-बारिश से जनजीवन बेहाल, 425 उड़ानें रद्द


    वॉशिंगटन।
    अमेरिका (America) के पूर्वी तट पर इस वीकेंड शक्तिशाली नॉर ईस्टर तूफान (Powerful Nor’easter storm) का असर देखने को मिला. वॉशिंगटन डीसी (Washington D.C.) से लेकर अमेरिका के उत्तर-पूर्वी राज्य मेन तक तेज हवाओं, भारी बारिश के साथ तटीय इलाकों में बाढ़ का खतरा बना हुआ है. शनिवार को अमेरिका से जुड़ी करीब 425 फ्लाइट्स कैंसिल हुईं, जबकि 1,338 उड़ानों में देरी हुई।

    तूफान का असर सिर्फ उड़ानों पर नहीं पड़ा, बिजली सप्लाई भी प्रभावित हुई. न्यू जर्सी, कनेक्टिकट, न्यूयॉर्क और पेंसिल्वेनिया में हजारों घरों और कारोबारों की बिजली चली गई. शनिवार दोपहर 1:07 बजे तक इन चार राज्यों में 88 हजार से ज्यादा घरों, दुकानों और दफ्तरों की बिजली गुल थी. इससे पहले यह संख्या 1.19 लाख से ज्यादा थी।


    हजारों घरों में अब भी बिजली गुल

    कनेक्टिकट, न्यू जर्सी और न्यूयॉर्क में दोपहर करीब 1 बजे तक हर राज्य में 25 हजार से ज्यादा बिजली कनेक्शन प्रभावित थे. लॉन्ग आइलैंड में भी करीब 13,300 ग्राहक बिना बिजली के थे. तूफान में पेड़, शाखाएं और बिजली के तार गिरने से कई जगह सप्लाई बंद हो गई. बिजली कंपनी PSEG Long Island के मुताबिक, शुक्रवार सुबह से अब तक 34,600 से ज्यादा प्रभावित ग्राहकों की बिजली बहाल की जा चुकी है।


    425 फ्लाइट्स कैंसिल, 1,338 में देरी

    नॉर ईस्टर का असर अमेरिकी एयरपोर्ट्स पर भी साफ दिखा. फ्लाइटअवेयर के मुताबिक, शनिवार को अमेरिका से जुड़ी करीब 425 फ्लाइट्स रद्द हुईं. 1,338 उड़ानों में देरी दर्ज की गई. इससे वीकेंड पर सफर करने वाले यात्रियों की मुश्किल बढ़ गई. कई लोगों को अपनी उड़ान रद्द होने या लंबे इंतजार का सामना करना पड़ा।

    अमेरिका की नेशनल वेदर सर्विस ने सोमवार तक मिड-अटलांटिक तथा न्यू इंग्लैंड में मौसम खराब रहने की चेतावनी दी है. इस दौरान तटीय बाढ़, समुद्र में खतरनाक धाराएं, तेज हवाओं के झोंके और भारी बारिश का खतरा बताया गया है. हालात को देखते हुए न्यूयॉर्क तथा न्यू जर्सी के उन इलाकों में इमरजेंसी घोषित की गई, जहां तूफान का असर ज्यादा होने की आशंका थी. इसमें न्यूयॉर्क सिटी भी शामिल है. कनेक्टिकट ने भी राज्य का इमरजेंसी ऑपरेशन सेंटर सक्रिय कर दिया है।

  • ईरान को ट्रंप का सख्त संदेश…., बोले- अमेरिका की उम्मीदों के मुताबिक होगा समझौता…!

    ईरान को ट्रंप का सख्त संदेश…., बोले- अमेरिका की उम्मीदों के मुताबिक होगा समझौता…!


    वाशिंगटन।
    अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (American President Donald Trump) ने कहा कि ईरान (Iran) वाशिंगटन (Washington) के साथ समझौता करना चाहता है। लेकिन उनकी राय में ईरान अभी इसके लिए तैयार नहीं है। ट्रंप ने संकेत दिया कि कोई भी समझौता अमेरिका की उम्मीदों के मुताबिक होना चाहिए। यह बयान ऐसे समय आया है, जब अगले हफ्ते न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र महासभा के दौरान ट्रंप की खाड़ी सहयोग परिषद यानी जीसीसी (Gulf Cooperation Council- GCC) के सदस्य देशों के नेताओं और विदेश मंत्रियों से मुलाकात होने की उम्मीद है।


    राष्ट्रपति ट्रंप ने क्या कहा?

    ट्रंप ने ‘एबीसी 11’ से बातचीत में कहा, ईरान समझौता करना चाहता है। मेरी राय में, वे तैयार नहीं हैं। हम या तो ऐसा समझौता करेंगे जो अच्छा हो या फिर कोई समझौता नहीं करेंगे। ट्रंप का यह बयान ऐसे समय आया है, जब उनका प्रशासन ईरान के साथ जारी संघर्ष के अगले चरण का आकलन कर रहा है। प्रशासन युद्ध के बाद की रणनीति भी तैयार कर रहा है।

    एक्सिओस ने तीन सूत्रों के हवाले से बताा कि ट्रंप की छह जीसीसी देशों के प्रतिनिधियों से मुलाकात होने की उम्मीद है। इन छह देशों में सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात (यूएई), कतर, बहरीन, कुवैत और ओमान शामिल हैं। प्रस्तावित बैठक में युद्ध के बाद की रणनीति को लेकर वाशिंगटन के विचारों पर चर्चा हो सकती है। संघर्ष में अगले कदमों पर भी बात हो सकती है।

    अमेरिकी विदेश मंत्रालय ने बुधवार को शुरुआती निमंत्रण भेजे थे। इस बैठक में दूसरे अरब और इस्लामी देशों के नेताओं को भी शामिल किया जा सकता है। ट्रंप ने बुधवार को कहा था कि उन्हें उम्मीद है कि वाशिंगटन ‘युद्ध के अंत की ओर’ बढ़ रहा है। उन्होंने यह भी दावा किया था कि अमेरिका को ईरान की ओर से सीधे संदेश मिला है कि तेहरान समझौता करना चाहता है।

    खाड़ी देशों में अमेरिका के कई सैन्य अड्डे हैं। संघर्ष के दौरान इन देशों पर ईरान की ओर से हमले हुए हैं। तेल और प्राकृतिक गैस के निर्यात में रुकावटों का असर क्षेत्र की अर्थव्यवस्थाओं पर भी पड़ा है।


    ट्रंप ने किन सरकारी आदेशों पर हस्ताक्षर किए?

    ट्रंप ने गुरुवार शाम (स्थानीय समय) व्हाइट हाउस में 100 से ज्यादा शिकार करने वालों, मछली पकड़ने वालों और बाहरी गतिविधियों से जुड़े उद्योग (आउटडोर) के प्रतिनिधियों की मेजबानी की। इस दौरान उन्होंने कार्यकारी आदेशों पर हस्ताक्षर किए। इन आदेशों का मकसद शिकार और मछली पकड़ने के अवसरों को बढ़ाना है। कुछ संघीय नियमों में बदलाव करना भी इसका हिस्सा है।

    मछली पकड़ने के नियमों पर बात करते हुए ट्रंप ने राष्ट्रपति के अधिकारों के दायरे का जिक्र किया। ट्रंप ने कहा, इस पद की ताकत बहुत ज्यादा है। मैं मछली पकड़ने पर प्रतिबंध लगा सकता था और जॉनी का कारोबार पूरी तरह बंद कर सकता था। मुझे लगता है कि मैं ऐसा सिर्फ एक या दो दिन के लिए करने जा रहा हूं। जब तक वह मुझे फोन करके नहीं कहता- राष्ट्रपति जी, आप मेरा कारोबार बंद कर रहे हैं।

    ट्रंप ने यह भी कहा कि उन्होंने एक कार्यकारी आदेश पर हस्ताक्षर किया है। इसके तहत लाखों एकड़ संघीय जमीन शिकारियों और मछली पकड़ने वालों के लिए खोली जाएगी। उन्होंने एक और आदेश पर भी हस्ताक्षर किए। इसका उद्देश्य समुद्री मछली पकड़ने वालों, नाव चलाने वालों, चार्टर कैप्टनों और तटीय समुदायों पर लागू संघीय नियमों को कम करना है।


    ट्रंप की शक्ति सीमित करने वाला प्रस्ताव

    इस बीच, अमेरिकी प्रतिनिधि सभा ने मंगलवार को एक प्रस्ताव पर मतदान किया। प्रस्ताव के पक्ष में 220 और विरोध में 204 वोट पड़े। इस प्रस्ताव का उद्देश्य ईरान के खिलाफ सैन्य अभियान जारी रखने के ट्रंप के अधिकार को सीमित करना है। यह प्रस्ताव डेमोक्रेटिक पार्टी के सांसद सेठ मौल्टन ने पेश किया था। इसमें प्रशासन से कहा गया है कि वह ईरान के साथ संघर्ष से अमेरिकी सैनिकों को वापस बुलाए। हालांकि, इसमें कुछ खास रक्षात्मक परिस्थितियों को अपवाद रखा गया है। प्रस्ताव के समर्थन में सात रिपब्लिकन सांसदों ने डेमोक्रेट सांसदों के साथ वोट किया।

    अलग से, प्रतिनिधि सभा ने 2026 का लिंडसे ओ. ग्राहम रूस और ईरान पर प्रतिबंध कानून भी पारित कर दिया। इस कानून के तहत राष्ट्रपति को कुछ शर्तों के आधार पर उन देशों पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने का अधिकार मिल सकता है, जो रूस से तेल और गैस खरीदना जारी रखते हैं।

  • अमेरिकी चुनावों पर विदेशी दखल का दावा तेज, व्हाइट हाउस ने चीन पर वोटर डेटा चोरी का लगाया गंभीर आरोप

    अमेरिकी चुनावों पर विदेशी दखल का दावा तेज, व्हाइट हाउस ने चीन पर वोटर डेटा चोरी का लगाया गंभीर आरोप

    नई दिल्ली । अमेरिकी चुनावी सुरक्षा को लेकर एक बार फिर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। व्हाइट हाउस ने दावा किया है कि चीन और उससे जुड़े साइबर नेटवर्क ने अमेरिका के करीब 22 करोड़ मतदाताओं का पंजीकरण डेटा हासिल किया है। अमेरिकी प्रशासन के अनुसार, यह मामला विदेशी हस्तक्षेप और साइबर सुरक्षा से जुड़ा है, जिसने चुनावी प्रक्रिया की सुरक्षा को लेकर नई चिंताएं पैदा कर दी हैं।

    व्हाइट हाउस की ओर से जारी एक दस्तावेज में दावा किया गया कि अमेरिकी खुफिया एजेंसियों की रिपोर्ट में ऐसे संकेत मिले हैं कि चीन से जुड़े साइबर समूहों ने वोटर रजिस्ट्रेशन से जुड़ी ऐसी जानकारियां हासिल कीं, जो पूरी तरह सार्वजनिक नहीं थीं। अमेरिकी प्रशासन का कहना है कि विदेशी ताकतें चुनावी प्रक्रिया को प्रभावित करने के लिए डिजिटल माध्यमों का इस्तेमाल कर सकती हैं।

    अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार, विदेशी हस्तक्षेप केवल चुनाव के दिन मतदान प्रक्रिया को प्रभावित करने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें उम्मीदवारों, राजनीतिक दलों, मतदाताओं और चुनावी ढांचे से जुड़ी सूचनाओं को निशाना बनाना भी शामिल हो सकता है। प्रशासन ने कहा कि वोटर रजिस्ट्रेशन सिस्टम और उससे जुड़े डेटा पर हमला चुनावी प्रक्रिया में बाधा पैदा करने का एक तरीका हो सकता है।

    व्हाइट हाउस के दस्तावेज में बताया गया कि वर्ष 2022 की खुफिया रिपोर्ट में एक चीनी साइबर नेटवर्क से जुड़े समूह की पहचान की गई थी, जिसने व्यावसायिक वेबसाइटों पर मौजूद मतदाता पंजीकरण डेटा तक पहुंच बनाई थी। अमेरिकी प्रशासन का आरोप है कि ऐसे साइबर समूह अक्सर ऐसी सूचनाएं जुटाने की कोशिश करते हैं, जो सामान्य रूप से उपलब्ध नहीं होती हैं।

    अमेरिकी सरकार ने साइबर हमलों से जुड़े संभावित खतरों का भी उल्लेख किया है। प्रशासन के अनुसार, यदि किसी विदेशी ताकत को मतदाता डेटा तक पहुंच मिल जाती है, तो वह उसमें बदलाव करने, मतदाताओं को मतदान में परेशानी पहुंचाने या चुनावी प्रक्रिया को बाधित करने जैसी गतिविधियों की कोशिश कर सकती है। हालांकि, अमेरिकी अधिकारियों ने यह स्पष्ट नहीं किया कि कथित डेटा हासिल करने की घटना से किसी चुनाव परिणाम पर कोई सीधा प्रभाव पड़ा है।

    यह मामला अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा विदेशी चुनावी गतिविधियों से जुड़े कुछ खुफिया दस्तावेजों को सार्वजनिक करने के फैसले के बाद सामने आया है। अमेरिकी प्रशासन का कहना है कि दस्तावेजों को सार्वजनिक करने का उद्देश्य चुनावी सुरक्षा से जुड़े आकलनों में पारदर्शिता बढ़ाना और विदेशी साइबर गतिविधियों के प्रति लोगों को जागरूक करना है।

    व्हाइट हाउस ने बताया कि कई प्रमुख अमेरिकी सुरक्षा एजेंसियों के प्रतिनिधियों ने राष्ट्रपति के बयान और इससे जुड़े दस्तावेज तैयार करने की प्रक्रिया में सहयोग किया। प्रशासन के अनुसार, इन एजेंसियों ने उपलब्ध खुफिया जानकारी के आधार पर तथ्यों की समीक्षा की।

    चीन की ओर से इस आरोप पर तत्काल कोई विस्तृत प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। हालांकि, अमेरिका और चीन के बीच पहले भी साइबर सुरक्षा, तकनीकी प्रतिस्पर्धा और डेटा सुरक्षा को लेकर तनाव रहा है। दोनों देशों के बीच डिजिटल क्षेत्र में बढ़ती प्रतिस्पर्धा अब अंतरराष्ट्रीय राजनीति का महत्वपूर्ण मुद्दा बन चुकी है।

    अमेरिका में चुनावी सुरक्षा को लेकर यह बहस ऐसे समय में तेज हुई है, जब दुनिया भर में साइबर हमलों और डिजिटल हस्तक्षेप के खतरे बढ़ रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि आधुनिक चुनाव प्रणालियों की सुरक्षा के लिए मजबूत साइबर सुरक्षा ढांचे और लगातार निगरानी की आवश्यकता है।

  • ट्रंप का बड़ा फैसला…. जेनेरिक दवाओं पर 200% तक टैरिफ लगाएगा अमेरिका

    ट्रंप का बड़ा फैसला…. जेनेरिक दवाओं पर 200% तक टैरिफ लगाएगा अमेरिका


    वाशिंगटन।
    अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (American President Donald Trump) ने बुधवार को घोषणा की कि अमेरिका (America) अगस्त 2028 से विदेश से आयात होने वाली जेनेरिक दवाओं (Generic medicines) पर भारी आयात शुल्क (टैरिफ) (Hefty Import Duties- Tariffs) लगाएगा। उन्होंने कहा कि इस कदम का मकसद जेनेरिक दवाओं का उत्पादन अमेरिका के भीतर कराना है। इस फैसले का असर भारत पर पड़ सकता है, क्योंकि भारत अमेरिका को जेनेरिक दवाओं का सबसे बड़ा निर्यातक है।

    ट्रंप ने ट्रथु सोशल प्लेटफॉर्म पर कहा कि 1 अगस्त 2026 से अमेरिका में आने वाली सभी जेनेरिक दवाओं पर अगले दो साल तक टैरिफ शून्य फीसदी रहेगा। इसके बाद एक साल के लिए इसे 100 फीसदी कर दिया जाएगा। उसके बाद यह बढ़ाकर 200 फीसदी कर दिया जाएगा।


    ट्रंप ने क्या कहा?

    अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (American President Donald Trump) ने कहा कि 1 अगस्त 2026 से अमेरिका में लाई जाने वाली सभी जेनेरिक दवाओं पर अगले दो साल तक शून्य फीसदी आयात शुल्क रहेगा। इसके बाद एक साल के लिए यह 100 फीसदी होगा और उसके बाद 200 फीसदी कर दिया जाएगा।

    उन्होंने कहा कि यह फैसला इसलिए लिया गया है, ताकि जेनेरिक दवाओं का उत्पादन फिर से अमेरिका में शुरू हो। उन्होंने कहा कि जो कंपनियां तय समय के भीतर अमेरिका में कारखाने और जरूरी उपकरण नहीं लगाएंगे, उन्हें इस नीति के तहत दंड का सामना करना पड़ेगा।


    नई नीति में क्या बदलेगा?

    राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा कि इस नीति का मकसद अमेरिका के लोगों के हितों की रक्षा करना है। उन्होंने यह भी कहा कि पेटेंट वाली, ब्रांडेड और नई दवाओं से जुड़ी मौजूदा नीति में कोई बदलाव नहीं किया जाएगा और वह पहले की तरह जारी रहेगी।

    भारत का अमेरिका को दवाओं का कितना निर्यात है?
    ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (जीटीआरआई) की एक रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2025 में भारत ने अमेरिका को 9.7 अरब अमेरिकी डॉलर की दवाओं का निर्यात किया। यह भारत के कुल वैश्विक दवा निर्यात 25.8 अरब अमेरिकी डॉलर का 36 प्रतिशत था।


    जेनेरिक दवाओं का इस्तेमाल कहां होता है?

    भारत में बनी जेनेरिक दवाएं उच्च रक्तचाप, मधुमेह, कैंसर, संक्रामक रोगों और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी बीमारियों के इलाज में बड़े पैमाने पर इस्तेमाल की जाती हैं।

  • अमेरिका में हरी मिर्च के दाम सुनकर चौंके भारतीय एक छोटे पैकेट की कीमत ने सोशल मीडिया पर मचा दी बहस

    अमेरिका में हरी मिर्च के दाम सुनकर चौंके भारतीय एक छोटे पैकेट की कीमत ने सोशल मीडिया पर मचा दी बहस


    नई दिल्ली। भारतीय रसोई में हरी मिर्च का महत्व किसी से छिपा नहीं है। दाल सब्जी चटनी सलाद या पराठा लगभग हर व्यंजन में इसका इस्तेमाल आम बात है। देश के कई हिस्सों में तो सब्जी खरीदते समय दुकानदार कुछ हरी मिर्च बिना अतिरिक्त पैसे लिए ही थैले में रख देता है। लेकिन सोशल मीडिया पर वायरल एक वीडियो ने इसी हरी मिर्च को चर्चा का विषय बना दिया है। वीडियो में अमेरिका में रहने वाली एक भारतीय महिला वहां बिकने वाली हरी मिर्च की कीमत दिखाती है जिसे देखकर बड़ी संख्या में भारतीय हैरान रह गए।

    वीडियो में महिला एक छोटा पैकेट दिखाती है जिसमें लगभग 114 ग्राम हरी मिर्च है। उसके अनुसार इस पैकेट में करीब 12 से 13 मिर्च हैं और इसकी कीमत भारतीय मुद्रा में लगभग 400 रुपये के बराबर पड़ती है। महिला का दावा है कि यदि इसी अनुपात से एक किलोग्राम की कीमत निकाली जाए तो यह करीब 3500 रुपये तक पहुंच सकती है। वीडियो में वह हल्के फुल्के अंदाज में कहती है कि भारत में इतनी मिर्च तो कई बार सब्जी वाला मुफ्त में दे देता है। यही तुलना सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो गई और लोगों के बीच चर्चा का विषय बन गई।

    वीडियो सामने आने के बाद भारतीय यूजर्स ने अलग अलग प्रतिक्रियाएं दीं। कई लोगों ने लिखा कि भारत के अधिकांश शहरों में 20 से 30 रुपये में अच्छी मात्रा में हरी मिर्च मिल जाती है। कुछ ने मजाक करते हुए कहा कि इतने पैसों में भारत में पूरे परिवार के लिए सब्जियां खरीदी जा सकती हैं। वहीं कुछ लोगों ने सलाह दी कि विदेश जाने वाले भारतीय अपने साथ हरी मिर्च ले जाया करें।

    हालांकि कई यूजर्स ने इस तुलना को अधूरा भी बताया। उनका कहना था कि केवल डॉलर को रुपये में बदलकर किसी वस्तु की कीमत की तुलना करना सही तस्वीर पेश नहीं करता। अमेरिका में औसत आय भारत की तुलना में कहीं अधिक है और वहां की क्रय शक्ति भी अलग है। इसलिए किसी भी वस्तु की वास्तविक लागत को समझने के लिए वहां की आय जीवनयापन का खर्च कर व्यवस्था और स्थानीय बाजार की स्थिति को भी ध्यान में रखना जरूरी होता है।

    विशेषज्ञों का कहना है कि अमेरिका में भारतीय भोजन में इस्तेमाल होने वाली कुछ विशेष किस्म की हरी मिर्च हर जगह आसानी से उपलब्ध नहीं होती। कई बार इन्हें दूसरे क्षेत्रों या देशों से आयात किया जाता है। इसके अलावा पैकिंग परिवहन कोल्ड स्टोरेज और श्रम लागत जैसी कई वजहें भी कीमत बढ़ा देती हैं। यही कारण है कि कुछ भारतीय खाद्य सामग्री वहां अपेक्षाकृत महंगी दिखाई देती है।

    यह भी ध्यान देने योग्य है कि अमेरिका के अलग अलग शहरों और स्टोर्स में कीमतें अलग हो सकती हैं। भारतीय ग्रॉसरी स्टोर एशियन मार्केट और बड़े सुपरमार्केट में एक ही वस्तु अलग कीमत पर मिल सकती है। इसी तरह मौसम और उपलब्धता के अनुसार दाम बदलते रहते हैं। इसलिए किसी एक वीडियो में दिखाई गई कीमत को पूरे अमेरिका का मानक नहीं माना जा सकता।

    भारत में भी हरी मिर्च की कीमत पूरे साल एक जैसी नहीं रहती। मौसम फसल और आपूर्ति के अनुसार इसके दाम बदलते रहते हैं। कई बार यह बेहद सस्ती होती है तो कई बार कीमत काफी बढ़ जाती है। यह वायरल वीडियो केवल हरी मिर्च की कीमत का नहीं बल्कि भारत और विदेश की जीवनशैली तथा खर्च के अंतर पर भी चर्चा छेड़ रहा है। यही वजह है कि यह वीडियो लोगों के बीच तेजी से लोकप्रिय हो गया है।

  • ईरान के विदेश मंत्री अराघची का अमेरिका और इजरायल पर तीखा आरोप, बोले- आलोचकों की आवाज दबाने में हो रहा टैक्सदाताओं के धन का इस्तेमाल

    ईरान के विदेश मंत्री अराघची का अमेरिका और इजरायल पर तीखा आरोप, बोले- आलोचकों की आवाज दबाने में हो रहा टैक्सदाताओं के धन का इस्तेमाल

    नई दिल्ली । पश्चिम एशिया में जारी तनाव के बीच ईरान के विदेश मंत्री सैयद अब्बास अराघची ने अमेरिका और इजरायल को लेकर तीखी टिप्पणी की है। उन्होंने आरोप लगाया कि अमेरिकी करदाताओं के धन का उपयोग इजरायल की आलोचना करने वाली आवाजों को दबाने के लिए किया जा रहा है। अराघची का यह बयान ऐसे समय आया है, जब क्षेत्र में सैन्य गतिविधियां तेज हैं और अमेरिका तथा ईरान के बीच तनाव लगातार बढ़ता दिखाई दे रहा है।

    विदेश मंत्री ने सोशल मीडिया पर एक अंतरराष्ट्रीय पत्रिका की रिपोर्ट साझा करते हुए कहा कि अमेरिका में विदेशी प्रभाव को लेकर लगातार चर्चा होती है, लेकिन इजरायल से जुड़े कथित प्रभाव अभियानों पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जाता। उनके अनुसार यह गंभीर विषय है और इससे अमेरिकी लोकतांत्रिक व्यवस्था तथा सार्वजनिक विमर्श पर असर पड़ सकता है। उन्होंने दावा किया कि इस पूरे मामले से जुड़े तथ्यों को समय के साथ सार्वजनिक किया जाएगा।

    अराघची ने अपने बयान में यह भी कहा कि अमेरिका को ऐसे संघर्षों में शामिल करने की कोशिश की जा रही है, जो उसकी प्राथमिकताओं का हिस्सा नहीं रहे हैं। उनका कहना था कि पश्चिम एशिया की मौजूदा परिस्थितियों में सभी पक्षों को संयम और कूटनीतिक समाधान की दिशा में प्रयास करना चाहिए। हालांकि उनके आरोपों पर अमेरिका या इजरायल की ओर से तत्काल कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई।

    इस बीच क्षेत्रीय तनाव को लेकर ईरान के शीर्ष सैन्य नेतृत्व की ओर से भी कड़े बयान सामने आए हैं। ईरान के सर्वोच्च नेतृत्व से जुड़े एक वरिष्ठ सैन्य सलाहकार ने चेतावनी दी कि यदि अमेरिकी सैन्य कार्रवाई जारी रहती है तो संघर्ष का दायरा और व्यापक हो सकता है। उन्होंने कहा कि अब तक ईरान ने स्थिति को बड़े क्षेत्रीय संकट में बदलने से रोकने के लिए संयम बरता है, लेकिन लगातार हमलों की स्थिति में उसकी प्रतिक्रिया अधिक व्यापक हो सकती है।

    सैन्य सलाहकार ने यह भी संकेत दिया कि यदि हालात नहीं बदले तो ईरान अपनी अतिरिक्त सैन्य क्षमताओं को सक्रिय कर सकता है। उनके अनुसार भविष्य की रणनीति परिस्थितियों के अनुसार तय की जाएगी। इन बयानों ने पहले से ही संवेदनशील पश्चिम एशियाई स्थिति को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई चिंताएं पैदा कर दी हैं।

    विश्लेषकों का मानना है कि मौजूदा समय में पश्चिम एशिया की स्थिति अत्यंत संवेदनशील बनी हुई है। एक ओर राजनीतिक बयानबाजी लगातार तेज हो रही है, वहीं दूसरी ओर सैन्य गतिविधियों और कूटनीतिक प्रयासों के बीच संतुलन बनाए रखने की चुनौती भी बढ़ती जा रही है। ऐसे हालात में किसी भी पक्ष की ओर से उठाया गया बड़ा कदम क्षेत्रीय स्थिरता को प्रभावित कर सकता है।

    अंतरराष्ट्रीय समुदाय की नजर अब अमेरिका, ईरान और इजरायल के बीच आगे होने वाले घटनाक्रम पर टिकी हुई है। विशेषज्ञों का मानना है कि तनाव कम करने के लिए संवाद और कूटनीतिक पहल सबसे प्रभावी विकल्प हो सकते हैं। फिलहाल सभी पक्षों के बयानों और संभावित कदमों पर वैश्विक स्तर पर करीबी नजर रखी जा रही है, क्योंकि इनका प्रभाव केवल पश्चिम एशिया ही नहीं बल्कि वैश्विक सुरक्षा और आर्थिक परिस्थितियों पर भी पड़ सकता है।

  • ट्रंप के चुनावी दावों पर व्हाइट हाउस में बढ़ी सियासी हलचल, पीटर नवारो बोले- अमेरिकी चुनावी व्यवस्था की कमजोरियां सामने आईं

    ट्रंप के चुनावी दावों पर व्हाइट हाउस में बढ़ी सियासी हलचल, पीटर नवारो बोले- अमेरिकी चुनावी व्यवस्था की कमजोरियां सामने आईं


    नई दिल्ली ।
    अमेरिका में चुनावी सुरक्षा और लोकतांत्रिक प्रक्रिया को लेकर एक बार फिर राजनीतिक बहस तेज हो गई है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा चुनावी सुरक्षा से जुड़े दस्तावेज सार्वजनिक करने और वर्ष 2020 के चुनाव को लेकर गंभीर आरोप लगाए जाने के बाद व्हाइट हाउस और अमेरिकी राजनीतिक गलियारों में प्रतिक्रियाओं का दौर जारी है। इस बीच राष्ट्रपति के काउंसलर पीटर नवारो ने ट्रंप के दावों का समर्थन करते हुए कहा कि यह मुद्दा किसी विदेशी देश से अधिक अमेरिकी चुनावी व्यवस्था की कमजोरियों और उसे सुरक्षित बनाने की आवश्यकता से जुड़ा है।

    पीटर नवारो ने कहा कि यदि ‘सेव अमेरिका एक्ट’ लागू होता है तो चुनाव प्रक्रिया अधिक सुरक्षित और पारदर्शी बन सकती है। उनके अनुसार प्रस्तावित कानून में मतदाता पहचान पत्र, नागरिकता का प्रमाण और अनुपस्थित मतदान की प्रक्रिया को अधिक सख्त बनाने जैसे प्रावधान शामिल हैं। उनका कहना है कि ऐसे कदमों से चुनावी प्रणाली में जनता का विश्वास बढ़ेगा और लोकतांत्रिक प्रक्रिया की विश्वसनीयता मजबूत होगी।

    नवारो ने यह भी कहा कि हाल में सार्वजनिक की गई जानकारी का उद्देश्य उन तथ्यों को सामने लाना था, जिन्हें पहले गोपनीय रखा गया था। उनके अनुसार अमेरिकी नागरिकों को चुनावी प्रणाली की कमजोरियों के बारे में जानकारी होना आवश्यक है, ताकि भविष्य में ऐसी खामियों को दूर करने के लिए प्रभावी कदम उठाए जा सकें। उन्होंने इसे चुनाव सुधार की दिशा में महत्वपूर्ण पहल बताया।

    राष्ट्रपति ट्रंप ने अपने संबोधन में दावा किया कि चुनावी सुरक्षा से जुड़े दस्तावेजों में चीन द्वारा अमेरिकी मतदाता डेटा तक कथित पहुंच और चुनावी व्यवस्था को प्रभावित करने के प्रयासों का उल्लेख है। उन्होंने आरोप लगाया कि बड़ी संख्या में मतदाताओं का व्यक्तिगत डेटा अवैध रूप से प्राप्त किया गया और संबंधित सूचनाएं समय रहते राष्ट्रपति तथा कांग्रेस के साथ साझा नहीं की गईं। ट्रंप ने कहा कि इन तथ्यों के सार्वजनिक होने के बाद चुनावी सुरक्षा कानूनों को और मजबूत करना आवश्यक हो गया है।

    दूसरी ओर, ट्रंप के इन दावों को लेकर डेमोक्रेटिक नेताओं ने कड़ी आपत्ति जताई है और आरोपों पर सवाल उठाए हैं। अमेरिकी राजनीति में चुनावी सुरक्षा पहले से ही संवेदनशील मुद्दा रही है और वर्ष 2020 के चुनाव को लेकर दोनों प्रमुख दलों के बीच लंबे समय से मतभेद बने हुए हैं। ऐसे में हालिया बयानबाजी ने इस बहस को फिर से केंद्र में ला दिया है।

    नवारो ने कहा कि इस पूरे विवाद को केवल चीन के संदर्भ में नहीं देखा जाना चाहिए। उनके अनुसार मूल प्रश्न यह है कि अमेरिकी चुनावी व्यवस्था संभावित जोखिमों से खुद को किस हद तक सुरक्षित रख पाई। उन्होंने कहा कि यदि चुनाव प्रणाली में किसी प्रकार की कमजोरी मौजूद है तो उसे दूर करना लोकतांत्रिक संस्थाओं की प्राथमिक जिम्मेदारी होनी चाहिए।

    विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले दिनों में चुनावी सुरक्षा, मतदाता पहचान और मतदान प्रक्रिया से जुड़े प्रस्तावित सुधार अमेरिकी राजनीति के प्रमुख मुद्दों में शामिल रह सकते हैं। वहीं ट्रंप के दावों और उन पर उठे सवालों को लेकर राजनीतिक और कानूनी स्तर पर बहस जारी रहने की संभावना है। इस पूरे घटनाक्रम ने अमेरिका में चुनावी पारदर्शिता, संस्थागत जवाबदेही और लोकतांत्रिक प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर चर्चा को एक बार फिर तेज कर दिया है।

  • स्कूल बस के सामने नहीं चल सकती कोई गाड़ी, अमेरिका का सुरक्षा नियम बना मिसाल, उल्लंघन पर भारी जुर्माना और लाइसेंस तक रद्द

    स्कूल बस के सामने नहीं चल सकती कोई गाड़ी, अमेरिका का सुरक्षा नियम बना मिसाल, उल्लंघन पर भारी जुर्माना और लाइसेंस तक रद्द


    नई दिल्ली । अमेरिका में स्कूली बच्चों की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए सड़क परिवहन से जुड़े ऐसे सख्त नियम लागू किए गए हैं, जिन्हें दुनिया के सबसे प्रभावी सुरक्षा उपायों में गिना जाता है। इन्हीं नियमों में एक महत्वपूर्ण व्यवस्था यह है कि जैसे ही किसी स्कूल बस में बच्चों को चढ़ाने या उतारने के लिए बस रुकती है, सड़क पर दोनों दिशाओं का ट्रैफिक पूरी तरह रोक दिया जाता है। इस दौरान किसी भी वाहन को बस के पास से आगे बढ़ने की अनुमति नहीं होती और नियम का उल्लंघन करने वालों पर भारी आर्थिक दंड के साथ अन्य कानूनी कार्रवाई भी की जा सकती है।

    इस व्यवस्था का उद्देश्य बच्चों को सड़क पार करते समय अधिकतम सुरक्षा उपलब्ध कराना है। स्कूल बस के रुकने से पहले उस पर लगी पीली चेतावनी लाइटें जलने लगती हैं, जिससे आसपास के वाहन चालकों को गति कम करने का संकेत मिलता है। बस के पूरी तरह रुकते ही लाल चेतावनी लाइटें सक्रिय हो जाती हैं और बस के किनारे लगा ‘स्टॉप-आर्म’ बाहर निकल आता है। यह संकेत मिलते ही पीछे से आने वाले सभी वाहनों को तुरंत रुकना अनिवार्य होता है। यदि सड़क के बीच में डिवाइडर नहीं है तो सामने से आने वाले वाहनों को भी वहीं रुकना पड़ता है, जब तक सभी बच्चे सुरक्षित रूप से सड़क पार नहीं कर लेते।

    अमेरिका में यह नियम लंबे समय से लागू है और इसके पीछे दशकों के सड़क हादसों का अनुभव जुड़ा हुआ है। विभिन्न अध्ययन और सरकारी आंकड़ों में सामने आया कि स्कूल बसों में चढ़ते और उतरते समय कई बच्चों ने सड़क दुर्घटनाओं में अपनी जान गंवाई। इनमें बड़ी संख्या कम उम्र के बच्चों की थी। इन्हीं घटनाओं के बाद बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए नियमों को और अधिक सख्त बनाया गया तथा निगरानी व्यवस्था को आधुनिक तकनीक से जोड़ा गया।

    हालांकि नियम स्पष्ट होने के बावजूद हर वर्ष बड़ी संख्या में वाहन चालक इसका उल्लंघन करते हैं। कई मामलों में चालक जल्दबाजी, लापरवाही या नियमों की जानकारी के अभाव में स्कूल बस को ओवरटेक करने की कोशिश करते हैं। इस तरह की घटनाओं को रोकने के लिए प्रशासन ने केवल पुलिस निगरानी पर निर्भर रहने के बजाय तकनीकी समाधान अपनाया है।

    अब अमेरिका के कई राज्यों में स्कूल बसों पर उच्च गुणवत्ता वाले ऑटोमेटेड कैमरे लगाए जा चुके हैं। जैसे ही कोई वाहन स्टॉप-आर्म की अनदेखी कर बस के पास से गुजरता है, कैमरा उसकी तस्वीर और नंबर प्लेट रिकॉर्ड कर लेता है। इसके आधार पर संबंधित वाहन मालिक के खिलाफ स्वतः चालान जारी किया जाता है। कई राज्यों में नियम तोड़ने वालों पर भारी जुर्माना लगाया जाता है और गंभीर मामलों में ड्राइविंग लाइसेंस निलंबित या रद्द करने जैसी कार्रवाई भी संभव है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि सड़क सुरक्षा केवल कानून बनाने से नहीं बल्कि उनके प्रभावी पालन और जनजागरूकता से सुनिश्चित होती है। अमेरिका का यह मॉडल दिखाता है कि बच्चों की सुरक्षा के लिए सख्त नियम, आधुनिक तकनीक और कड़ी निगरानी मिलकर सड़क दुर्घटनाओं को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। यही कारण है कि यह व्यवस्था दुनिया के कई देशों के लिए सड़क सुरक्षा के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण उदाहरण मानी जाती है।