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  • ढाका में US डिफेंस डील पर मंथन, ACSA और GSOMIA समझौते फिर सुर्खियों में

    ढाका में US डिफेंस डील पर मंथन, ACSA और GSOMIA समझौते फिर सुर्खियों में




    नई दिल्ली(New Delhi)।
    बांग्लादेश में अमेरिका के साथ दो अहम रक्षा समझौतों को लेकर राजनीतिक और रणनीतिक हलकों में बड़ी चर्चा तेज हो गई है। ये दोनों समझौते ACSA (Acquisition and Cross-Servicing Agreement) और GSOMIA (General Security of Military Information Agreement) कई वर्षों से लंबित हैं, जिन्हें लेकर अब एक बार फिर ढाका में गंभीर मंथन शुरू हो गया है।

    रिपोर्ट्स के अनुसार, पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना की सरकार ने अमेरिका के साथ इन डिफेंस डील्स को आगे बढ़ाने से परहेज किया था। माना जाता है कि उस समय सरकार ने भारत और चीन के साथ संतुलन बनाए रखने की नीति अपनाई थी, जिसके चलते इन समझौतों पर अंतिम सहमति नहीं बन सकी। हालांकि, अब राजनीतिक बदलाव और नई परिस्थितियों के बीच इन समझौतों के फिर से सक्रिय होने की संभावना जताई जा रही है।

    ACSA समझौता के तहत अमेरिका और बांग्लादेश के बीच सैन्य लॉजिस्टिक्स सहयोग को मजबूत किया जाता है, जिसमें ईंधन आपूर्ति, उपकरणों की मरम्मत और सैन्य सहायता जैसी सुविधाएं शामिल होती हैं। वहीं GSOMIA के तहत दोनों देशों के बीच संवेदनशील सैन्य सूचनाओं के सुरक्षित आदान-प्रदान की व्यवस्था बनाई जाती है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि यदि ये दोनों समझौते लागू होते हैं, तो इससे अमेरिका की बांग्लादेश में सैन्य और रणनीतिक पहुंच और मजबूत हो सकती है। यह कदम बंगाल की खाड़ी क्षेत्र में अमेरिकी उपस्थिति को बढ़ाने के रूप में भी देखा जा रहा है, जिससे पूरे इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में शक्ति संतुलन पर असर पड़ सकता है।

    हालांकि, यह स्पष्ट किया जा रहा है कि इन समझौतों का अर्थ किसी सैन्य बेस की स्थापना नहीं है, बल्कि यह मुख्य रूप से सहयोग, लॉजिस्टिक्स और सूचना साझाकरण तक सीमित ढांचा है। फिर भी, इस पहल को लेकर क्षेत्रीय भू-राजनीति में नई हलचल देखी जा रही है।

  • पाकिस्तान-ईरान का सीक्रेट डील दावा: क्या है पूरा मामला?

    पाकिस्तान-ईरान का सीक्रेट डील दावा: क्या है पूरा मामला?



    नई दिल्ली। हाल में कुछ अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट्स और इज़रायली मीडिया दावों में यह कहा गया है कि पाकिस्तान और ईरान कथित तौर पर एक “सीक्रेट डील” पर काम कर रहे हैं, जिसमें अमेरिका से चल रही ईरान की बातचीत में पाकिस्तान मध्यस्थ की भूमिका निभा रहा है।इस पूरे विवाद को लेकर अभी तक किसी भी सरकार ने आधिकारिक तौर पर इन दावों की पुष्टि नहीं की है, इसलिए इन्हें फिलहाल अनकन्फर्म्ड मीडिया रिपोर्ट्स के रूप में ही देखा जा रहा है।

    क्या दावा किया जा रहा है?
    रिपोर्ट्स के मुताबिक आरोप यह हैं कि:

    पाकिस्तान ईरान और अमेरिका के बीच मध्यस्थता कर रहा है

    बदले में आर्थिक मदद या वित्तीय लाभ मिलने की बात कही जा रही है

    ईरान को अमेरिका के साथ “बेहतर डील” दिलाने में मदद का दावा

    इस प्रक्रिया में पाकिस्तान की “निष्पक्षता” पर सवाल उठाए जा रहे हैं



    पाकिस्तान की भूमिका पर चर्चा
    इन दावों के बीच पाकिस्तान के कई शीर्ष नेताओं और अधिकारियों के तेहरान दौरे को भी जोड़ा जा रहा है। इसमें शामिल हैं:

    गृह मंत्री के स्तर की यात्राएं

    विदेश नीति से जुड़े प्रतिनिधिमंडल

    सैन्य और कूटनीतिक संपर्क

    इन यात्राओं को कुछ रिपोर्ट्स में ईरान-अमेरिका बातचीत में सक्रिय कूटनीतिक भूमिका के रूप में देखा जा रहा है।

    ईरान–अमेरिका तनाव की पृष्ठभूमि
    यह पूरा मामला उस बड़े भू-राजनीतिक तनाव से जुड़ा है जिसमें शामिल हैं:

    ईरान का परमाणु कार्यक्रम

    अमेरिका और इज़रायल की सुरक्षा चिंताएं

    पश्चिम एशिया में लगातार सैन्य तनाव

    समय-समय पर हमलों और जवाबी कार्रवाइयों का दौर

    इस स्थिति में कई देशों द्वारा मध्यस्थता के प्रयास किए जा रहे हैं, जिनमें पाकिस्तान का नाम भी सामने आता रहा है।

    इज़रायल की आपत्ति
    इज़रायली पक्ष की मीडिया रिपोर्ट्स और राजनीतिक बयानों में:

    ईरान पर सख्त रुख की मांग

    अमेरिका की बातचीत नीति की आलोचना

    पाकिस्तान की भूमिका पर सवाल

    हालांकि ये बयान राजनीतिक दृष्टिकोण से जुड़े हैं और इन्हें स्वतंत्र रूप से सत्यापित नहीं माना जा सकता।

  • नई वैश्विक राजनीति पर बहस तेज: RIC थ्योरी फिर चर्चा में, भारत की भूमिका पर टिकी नजरें

    नई वैश्विक राजनीति पर बहस तेज: RIC थ्योरी फिर चर्चा में, भारत की भूमिका पर टिकी नजरें



    नई दिल्ली। रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के करीबी विचारक माने जाने वाले Alexander Dugin के हालिया बयानों के बाद एक बार फिर “RIC (Russia–India–China)” और बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था की चर्चा तेज हो गई है। डुगिन का दावा है कि पश्चिमी देशों का वैश्विक दबदबा घट रहा है और रूस व चीन इसके विकल्प के रूप में उभर रहे हैं, जबकि भारत की भूमिका भविष्य की वैश्विक संरचना में निर्णायक हो सकती है।

    हालांकि अंतरराष्ट्रीय संबंध विशेषज्ञों का मानना है कि यह विचार अभी एक रणनीतिक सिद्धांत और राजनीतिक बहस तक ही सीमित है, न कि कोई औपचारिक गठबंधन या तय वैश्विक व्यवस्था।

    विशेषज्ञों के अनुसार, पिछले दो दशकों में वैश्विक शक्ति संतुलन में बड़ा बदलाव देखने को मिला है। एक तरफ United States अब भी सैन्य, तकनीकी और वित्तीय स्तर पर सबसे प्रभावशाली शक्ति बनी हुई है, वहीं दूसरी ओर China आर्थिक और तकनीकी क्षेत्र में तेजी से अपना प्रभाव बढ़ा रही है। वहीं Russia पश्चिमी देशों के साथ टकराव के बीच अपने रणनीतिक हितों को मजबूत करने की कोशिश कर रहा है।

    भारत की स्थिति इस पूरे परिदृश्य में सबसे अलग मानी जा रही है। India लगातार “रणनीतिक स्वायत्तता” की नीति पर चलते हुए किसी एक गुट में पूरी तरह शामिल होने से बचता रहा है। भारत एक तरफ अमेरिका और पश्चिमी देशों के साथ आर्थिक व तकनीकी सहयोग बढ़ा रहा है, तो दूसरी तरफ रूस के साथ ऐतिहासिक रक्षा संबंध भी बनाए हुए है।

    इसी बीच चीन-रूस-भारत को मिलाकर RIC समूह की चर्चा जरूर समय-समय पर उठती रही है, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि तीनों देशों के बीच मौजूद सीमा विवाद, भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा और अलग-अलग राष्ट्रीय हित इसे एक स्थायी गठबंधन बनने से रोकते हैं।

    विदेश नीति विश्लेषकों के मुताबिक, आने वाले समय में दुनिया किसी एक ध्रुव के बजाय “बहु-ध्रुवीय शक्ति संतुलन” की ओर बढ़ सकती है, लेकिन यह संतुलन किसी औपचारिक RIC ब्लॉक के रूप में नहीं बल्कि अलग-अलग वैश्विक साझेदारियों के जाल के रूप में सामने आएगा।

    कुल मिलाकर, डुगिन का यह विचार वैश्विक राजनीति में एक बहस जरूर पैदा करता है, लेकिन वास्तविक अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था अभी भी जटिल और बदलते शक्ति संतुलन पर आधारित है, जिसमें किसी एक गुट का पूर्ण वर्चस्व या RIC जैसा एकीकृत ब्लॉक फिलहाल व्यवहारिक रूप से संभव नहीं दिखता।

  • ईरान- अमेरिका तनाव फिर चरम पर, ट्रम्प-नेतन्याहू पर इनाम वाले बिल की चर्चा; पश्चिम एशिया में बढ़ा कूटनीतिक और सैन्य संकट

    ईरान- अमेरिका तनाव फिर चरम पर, ट्रम्प-नेतन्याहू पर इनाम वाले बिल की चर्चा; पश्चिम एशिया में बढ़ा कूटनीतिक और सैन्य संकट



    नई दिल्ली। ईरान और अमेरिका के बीच तनाव एक बार फिर गंभीर स्तर पर पहुंच गया है। अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक ईरान की संसद में एक ऐसे बिल पर चर्चा चल रही है, जिसमें अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प और इजराइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के खिलाफ कार्रवाई करने वालों को भारी इनाम देने का प्रावधान हो सकता है। हालांकि यह अभी प्रारंभिक प्रस्ताव स्तर पर है और इस पर अंतिम वोटिंग बाकी है। इस कदम को पश्चिम एशिया में पहले से जारी तनाव का और बड़ा संकेत माना जा रहा है।

    ईरानी संसद की राष्ट्रीय सुरक्षा समिति के हवाले से सामने आई जानकारी में कहा गया है कि यह प्रस्ताव हाल के सैन्य और राजनीतिक तनावों के जवाब में तैयार किया जा रहा है। कुछ सांसदों ने यह भी संकेत दिया है कि इस पर जल्द ही संसद में मतदान हो सकता है। इसी बीच ईरान के शीर्ष नेतृत्व और सैन्य ढांचे में हालिया घटनाओं को लेकर भी नाराजगी बढ़ी हुई बताई जा रही है, जिससे क्षेत्रीय हालात और संवेदनशील हो गए हैं।

    दूसरी ओर, अमेरिका की ओर से भी सख्त रुख देखने को मिल रहा है। पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने दावा किया है कि ईरान पर संभावित सैन्य कार्रवाई को फिलहाल टाल दिया गया है। ट्रम्प के मुताबिक कतर, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात जैसे खाड़ी देशों के नेताओं ने बातचीत के लिए कुछ समय देने की अपील की थी, जिसके बाद यह निर्णय लिया गया। हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि अगर कोई समझौता नहीं होता है तो अमेरिका कार्रवाई के लिए तैयार रहेगा।

    इस घटनाक्रम के बीच पश्चिम एशिया में तनाव कई मोर्चों पर बढ़ता दिख रहा है। होर्मुज जलडमरूमध्य में व्यापारिक जहाजों की आवाजाही को लेकर चिंता बनी हुई है, जहां हजारों नाविकों के साथ बड़ी संख्या में जहाज फंसे होने की रिपोर्ट सामने आई है। विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी तरह की सैन्य गतिविधि या टकराव से वैश्विक तेल आपूर्ति पर असर पड़ सकता है।

    इसी दौरान क्षेत्र में ड्रोन गतिविधियों और सुरक्षा घटनाओं की खबरों ने भी स्थिति को और जटिल बना दिया है। सऊदी अरब और अन्य खाड़ी देशों ने अपनी सुरक्षा व्यवस्था और हवाई रक्षा को और मजबूत किया है। वहीं ईरान ने भी अपने भीतर सुरक्षा और खुफिया गतिविधियों पर निगरानी बढ़ा दी है।

    अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संयुक्त राष्ट्र ने स्पष्ट किया है कि होर्मुज स्ट्रेट में नौवहन की स्वतंत्रता किसी भी स्थिति में बाधित नहीं होनी चाहिए। UN ने सभी पक्षों से संयम बरतने और क्षेत्रीय स्थिरता बनाए रखने की अपील की है।

    इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर ईरान-अमेरिका संबंधों को तनावपूर्ण मोड़ पर ला दिया है, जहां एक ओर कूटनीतिक बातचीत जारी है, वहीं दूसरी ओर सैन्य और रणनीतिक तैयारी भी तेज होती दिख रही है।

  • ईरान का सख़्त संदेश: सरेंडर नहीं करेंगे, ट्रंप की धमकी पर राष्ट्रपति पेजेश्कियान का पलटवार

    ईरान का सख़्त संदेश: सरेंडर नहीं करेंगे, ट्रंप की धमकी पर राष्ट्रपति पेजेश्कियान का पलटवार



    नई दिल्ली। ईरान और अमेरिका के बीच तनाव के बीच ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान ने स्पष्ट कहा है कि उनका देश किसी भी हालत में सरेंडर नहीं करेगा। उन्होंने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बयानों का जवाब देते हुए कहा कि बातचीत का मतलब झुकना नहीं होता, बल्कि अपने अधिकारों और गरिमा के साथ चर्चा करना होता है।

    राष्ट्रपति पेजेश्कियान ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर लिखा कि ईरान अपनी संप्रभुता और कानूनी अधिकारों से किसी भी कीमत पर समझौता नहीं करेगा। उन्होंने कहा कि देश पूरी मजबूती और सम्मान के साथ बातचीत की प्रक्रिया में शामिल है, लेकिन दबाव या धमकी के आगे नहीं झुकेगा।

    इससे पहले डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया था कि खाड़ी देशों—कतर, सऊदी अरब और यूएई—के नेताओं के अनुरोध पर ईरान पर प्रस्तावित सैन्य कार्रवाई को फिलहाल रोक दिया गया है। ट्रंप के अनुसार, इस समय क्षेत्र में शांति समझौते को लेकर गंभीर बातचीत चल रही है, लेकिन अगर डील नहीं होती है तो अमेरिका सैन्य विकल्पों के लिए तैयार है।

    ट्रंप ने यह भी कहा कि किसी भी समझौते में सबसे अहम शर्त यह होगी कि ईरान परमाणु हथियार विकसित न कर सके। उन्होंने अमेरिकी सेना को भी निर्देश दिया है कि जरूरत पड़ने पर कार्रवाई के लिए पूरी तरह तैयार रहें।

    इस बीच ट्रंप ने ईरान को चेतावनी देते हुए कहा था कि समय तेजी से खत्म हो रहा है और अगर जल्द समझौता नहीं हुआ तो परिणाम गंभीर होंगे। वहीं, दोनों देशों के बीच बढ़ते तनाव के बावजूद कूटनीतिक बातचीत की संभावना अभी भी बनी हुई है।

    फिलहाल हालात यह हैं कि एक तरफ अमेरिका दबाव और चेतावनी की रणनीति अपना रहा है, तो दूसरी तरफ ईरान अपने रुख पर अडिग रहते हुए बातचीत को “सरेंडर नहीं” मानने की बात दोहरा रहा है।

  • ट्रंप की धमकी के बीच ईरान की बड़ी तैयारी, आम नागरिकों को दी जा रही हथियार चलाने की ट्रेनिंग

    ट्रंप की धमकी के बीच ईरान की बड़ी तैयारी, आम नागरिकों को दी जा रही हथियार चलाने की ट्रेनिंग



    नई दिल्ली(New Delhi)। 
    अमेरिका और ईरान के बीच जारी तनावपूर्ण हालात के बीच ईरान की सैन्य तैयारियों को लेकर बड़े दावे सामने आए हैं। रिपोर्ट्स के अनुसार ईरान की इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (Islamic Revolutionary Guard Corps) द्वारा देशभर में आम नागरिकों को हथियार चलाने और सैन्य प्रशिक्षण दिए जाने की बातें सामने आ रही हैं।

    तेहरान सहित कई शहरों में कथित तौर पर सार्वजनिक स्थानों पर प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं, जहां महिलाओं, पुरुषों और युवाओं को हथियारों के उपयोग की जानकारी दी जा रही है। कुछ रिपोर्ट्स में यह भी दावा किया गया है कि छोटी उम्र के बच्चों को भी प्रतीकात्मक रूप से हथियार चलाने का अभ्यास कराया गया।

    इसके साथ ही ईरानी सरकारी मीडिया से जुड़े कुछ वायरल वीडियो में एंकरों को हथियारों के साथ अभ्यास करते हुए दिखाया गया है, जिससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चिंता बढ़ी है।

    विशेषज्ञों के अनुसार यह घटनाक्रम उस व्यापक भू-राजनीतिक तनाव का हिस्सा है, जिसमें अमेरिका और ईरान दोनों एक-दूसरे पर दबाव बनाए रखने की कोशिश कर रहे हैं। रिपोर्ट्स में यह भी कहा गया है कि दोनों देशों के बीच कूटनीतिक समाधान अभी भी अनिश्चित स्थिति में है।

    हालांकि इन सभी दावों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और सैन्य गतिविधियों के संकेतों ने वैश्विक स्तर पर चिंता जरूर बढ़ा दी है।

  • अमेरिका का बड़ा एंटी-ISIS ऑपरेशन: अफ्रीका में छिपा नंबर-2 कमांडर ढेर, ट्रम्प का दावा,संगठन की कमर टूटी

    अमेरिका का बड़ा एंटी-ISIS ऑपरेशन: अफ्रीका में छिपा नंबर-2 कमांडर ढेर, ट्रम्प का दावा,संगठन की कमर टूटी



    नई दिल्ली। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने दावा किया है कि अफ्रीका में एक बड़े सैन्य ऑपरेशन के दौरान आतंकी संगठन ISIS का दूसरा सबसे बड़ा कमांडर अबू बिलाल अल मिनुकी मारा गया है। यह कार्रवाई अमेरिकी सेना और नाइजीरियाई सुरक्षा बलों के संयुक्त ऑपरेशन के तहत की गई, जिसमें लंबे समय से उसकी गतिविधियों पर नजर रखी जा रही थी।

    ट्रम्प के अनुसार, यह आतंकी संगठन के सबसे सक्रिय और रणनीतिक दिमागों में से एक था, जो फंडिंग नेटवर्क और हमलों की योजना बनाने में अहम भूमिका निभाता था। उसके मारे जाने से ISIS के कमांड स्ट्रक्चर और वित्तीय नेटवर्क को बड़ा नुकसान पहुंचा है। हालांकि इस ऑपरेशन की सटीक जगह और समय को लेकर आधिकारिक जानकारी साझा नहीं की गई है।

    सूत्रों के मुताबिक, अबू बिलाल अल मिनुकी का जन्म 1982 में नाइजीरिया के बोर्नो राज्य में हुआ था और वह लंबे समय से अफ्रीका में छिपकर ISIS की गतिविधियों को संचालित कर रहा था। उसे 2023 में अमेरिका ने “ग्लोबल टेररिस्ट” घोषित किया था, जिसके बाद उसकी संपत्तियां फ्रीज कर दी गई थीं और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उसकी गतिविधियों पर रोक लगा दी गई थी।

    ISIS के इस नंबर-2 कमांडर को संगठन के भीतर “शैडो ऑपरेटर” माना जाता था, क्योंकि वह सीधे सामने नहीं आता था और नेटवर्क व फंडिंग को नियंत्रित करता था। उसके कई नाम भी बताए जाते थे, लेकिन उसकी कोई आधिकारिक तस्वीर सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं थी।

    नाइजीरिया और आसपास के पश्चिमी अफ्रीकी देशों में ISIS और उससे जुड़े संगठनों की गतिविधियां लंबे समय से चिंता का विषय बनी हुई हैं। बोको हराम और इस्लामिक स्टेट वेस्ट अफ्रीका प्रोविंस जैसे संगठन इस क्षेत्र में लगातार हिंसा फैला रहे हैं, जिसमें हजारों लोगों की जान जा चुकी है और लाखों लोग विस्थापित हुए हैं।

    विशेषज्ञों के अनुसार, इस ऑपरेशन को ISIS के खिलाफ एक बड़ी रणनीतिक सफलता माना जा रहा है, लेकिन संगठन के पूरी तरह खत्म होने की संभावना अभी भी नहीं है क्योंकि इसके नेटवर्क कई देशों में फैले हुए हैं और यह समय-समय पर नए नेतृत्व के साथ सक्रिय हो जाता है।

    कुल मिलाकर, यह कार्रवाई अफ्रीका में आतंकवाद के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय सहयोग का एक अहम उदाहरण मानी जा रही है, जिससे क्षेत्रीय सुरक्षा पर सकारात्मक असर पड़ने की उम्मीद जताई जा रही है।

  • ब्रिक्स बैठक में पश्चिम एशिया पर फूटा मतभेद, संयुक्त बयान अटका; 63 बिंदुओं का अलग दस्तावेज जारी

    ब्रिक्स बैठक में पश्चिम एशिया पर फूटा मतभेद, संयुक्त बयान अटका; 63 बिंदुओं का अलग दस्तावेज जारी



    नई दिल्ली। भारत की अध्यक्षता में हुई ब्रिक्स (BRICS) विदेश मंत्रियों की बैठक में पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष को लेकर गंभीर मतभेद सामने आए, जिसके चलते इस बार कोई संयुक्त बयान जारी नहीं किया जा सका। बैठक में ईरान, इजरायल और अमेरिका से जुड़े मुद्दों पर सदस्य देशों के बीच अलग-अलग राय देखने को मिली, जिससे साझा सहमति बनाना मुश्किल हो गया। इसके बाद अध्यक्ष की ओर से एक विस्तृत बयान जारी किया गया, जिसमें 63 बिंदुओं के जरिए सभी देशों के विचारों को शामिल किया गया।

    सूत्रों के अनुसार, बैठक में ईरान ने मांग रखी थी कि इजरायल और अमेरिका द्वारा किए गए हमलों की निंदा ब्रिक्स मंच से की जाए, लेकिन इस पर सभी सदस्य देश सहमत नहीं हो सके। कुछ देशों ने कहा कि किसी एक पक्ष को सीधे तौर पर निशाना बनाना कूटनीतिक संतुलन के खिलाफ होगा, जबकि अन्य देशों ने क्षेत्रीय तनाव को देखते हुए सख्त रुख अपनाने की वकालत की।

    इसी असहमति के कारण संयुक्त बयान पर सहमति नहीं बन सकी। बाद में जारी अध्यक्षीय बयान में कहा गया कि पश्चिम एशिया की स्थिति पर सदस्य देशों के विचार अलग-अलग हैं, लेकिन सभी देशों ने इस बात पर सहमति जताई कि संकट का समाधान संवाद और कूटनीति के जरिए ही संभव है। बयान में अंतरराष्ट्रीय कानून, संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता के सम्मान पर भी जोर दिया गया।

    बयान में यह भी कहा गया कि ब्रिक्स देशों ने एकतरफा प्रतिबंधों और अंतरराष्ट्रीय कानून के विपरीत दंडात्मक उपायों की आलोचना की है। साथ ही मानवीय संकटों से निपटने के लिए वैश्विक सहयोग को मजबूत करने की आवश्यकता पर बल दिया गया। बैठक में फलस्तीन के मुद्दे पर भी चर्चा हुई, जिसमें 1967 की सीमाओं के आधार पर स्वतंत्र फलस्तीन राज्य के समर्थन की बात दोहराई गई।

    इस तरह पश्चिम एशिया के संवेदनशील मुद्दों पर अलग-अलग दृष्टिकोण के कारण ब्रिक्स बैठक में एकजुटता की कमी दिखी, हालांकि संवाद और शांति की आवश्यकता पर सभी देशों ने सहमति व्यक्त की।

  • हंता वायरस से दहशत: क्रूज पर संक्रमण की पुष्टि, 17 अमेरिकी यात्रियों को इमरजेंसी फ्लाइट से अमेरिका शिफ्ट

    हंता वायरस से दहशत: क्रूज पर संक्रमण की पुष्टि, 17 अमेरिकी यात्रियों को इमरजेंसी फ्लाइट से अमेरिका शिफ्ट



    नई दिल्ली। अमेरिका में हंता वायरस को लेकर चिंता एक बार फिर बढ़ गई है, जब डच क्रूज जहाज एमवी होंडियस पर सवार एक अमेरिकी यात्री में संक्रमण की पुष्टि हुई। एक अन्य यात्री में हल्के लक्षण पाए गए हैं। अमेरिकी स्वास्थ्य एवं मानव सेवा विभाग के अनुसार स्थिति को देखते हुए जहाज पर मौजूद 17 अमेरिकी नागरिकों को तुरंत विशेष विमान के जरिए अमेरिका वापस लाया जा रहा है।

    सभी यात्रियों को बायोकंटेनमेंट यूनिट में रखा गया है ताकि संक्रमण के फैलाव को रोका जा सके। प्रोटोकॉल के तहत इन यात्रियों को पहले नेब्रास्का के ओमाहा स्थित यूनिवर्सिटी ऑफ नेब्रास्का मेडिकल सेंटर के विशेष उपचार केंद्र में ले जाया जाएगा, जहां सभी की विस्तृत जांच होगी। इसके बाद जरूरत के अनुसार उन्हें दूसरे केंद्रों में शिफ्ट किया जाएगा और उपचार दिया जाएगा।

    जानकारी के मुताबिक शनिवार तक इस प्रकोप से जुड़े 8 संदिग्ध मामले और 3 मौतें भी दर्ज की जा चुकी हैं, जिससे स्थिति की गंभीरता और बढ़ गई है।

    अमेरिकी रोग नियंत्रण एवं रोकथाम केंद्र (CDC) के अनुसार हंता वायरस का इनक्यूबेशन पीरियड 1 से 8 सप्ताह तक हो सकता है। यह वायरस मुख्य रूप से चूहों जैसे रोडेंट्स से फैलता है, हालांकि दुर्लभ मामलों में मानव से मानव संक्रमण भी संभव है। विशेषज्ञों के मुताबिक संक्रमित मामलों में मृत्यु दर एक-तिहाई से भी अधिक हो सकती है।

    इसी बीच ब्रिटेन में भी इसी जहाज से निकाले गए 20 यात्रियों को आइसोलेशन में रखा गया है। उन्हें मैनचेस्टर से अस्पताल ले जाकर 72 घंटे की निगरानी में रखा गया है। यदि लक्षण नहीं दिखते हैं तो उन्हें घर भेजा जाएगा, लेकिन 42 दिन तक सेल्फ-आइसोलेशन अनिवार्य रहेगा।

    ब्रिटिश सरकार ने अपने दूरस्थ क्षेत्र ट्रिस्टन दा कुन्हा में भी मेडिकल और सैन्य टीम भेजी है, जहां एक व्यक्ति में संक्रमण की पुष्टि हुई है। यह पहली बार है जब ब्रिटेन ने ऐसे मानवीय मिशन के लिए पैराशूट के जरिए डॉक्टरों को भेजा है।

    हालांकि स्वास्थ्य एजेंसियों ने साफ किया है कि आम जनता के लिए इस वायरस का खतरा बेहद कम है, लेकिन क्रूज और अंतरराष्ट्रीय यात्रा से जुड़े मामलों ने वैश्विक स्वास्थ्य सतर्कता को फिर से बढ़ा दिया है।

  • अमेरिका–कनाडा हथियार तस्करी रैकेट का भंडाफोड़: 89 हथियारों के साथ 3 गिरफ्तार, पाकिस्तानी नागरिक भी शामिल

    अमेरिका–कनाडा हथियार तस्करी रैकेट का भंडाफोड़: 89 हथियारों के साथ 3 गिरफ्तार, पाकिस्तानी नागरिक भी शामिल



    नई दिल्ली। अमेरिका में सुरक्षा एजेंसियों ने हथियार तस्करी के एक बड़े नेटवर्क का भंडाफोड़ किया है। न्यूयॉर्क स्टेट पुलिस ने 89 हथियारों की अवैध खेप के साथ तीन लोगों को गिरफ्तार किया है, जो इन्हें अमेरिका से कनाडा भेजने की फिराक में थे। पकड़े गए आरोपियों में एक पाकिस्तानी नागरिक भी शामिल है।

    जानकारी के मुताबिक, यह कार्रवाई स्टेट रूट-90 पर उस समय हुई जब पुलिस ने एक संदिग्ध वाहन को रोका। शुरुआती पूछताछ में जवाब असंगत पाए जाने पर जब तलाशी ली गई तो कार के भीतर भारी मात्रा में हथियार बरामद हुए। कुछ हथियार पीछे की सीट पर खुले तौर पर रखे हुए थे।

    गिरफ्तार आरोपियों की पहचान 22 वर्षीय मलिक ब्रॉमफील्ड (कनाडा नागरिक), 25 वर्षीय फैजान अली (पाकिस्तानी नागरिक) और 22 वर्षीय कमाल सलमान (कनाडा-अमेरिका-जॉर्डन की नागरिकता) के रूप में हुई है।

    जांच एजेंसियों के अनुसार, फैजान अली के पास एक एक्सपायर्ड पाकिस्तानी नेशनल ड्राइविंग परमिट भी मिला है, जो किसी अन्य व्यक्ति के नाम पर जारी था। बरामद हथियारों में कम से कम 17 चोरी की बंदूकें भी शामिल हैं।

    अधिकारियों का कहना है कि आरोपी 80 से अधिक हथियार कनाडा पहुंचाने की योजना में थे। इस पूरे ऑपरेशन में न्यूयॉर्क स्टेट पुलिस, एफबीआई और एटीएफ की संयुक्त टीम शामिल रही।

    यूएस अटॉर्नी ऑफिस ने बताया कि सभी आरोपियों पर अवैध हथियार तस्करी, बिना लाइसेंस हथियार कारोबार और चोरी के हथियार रखने सहित गंभीर धाराएं लगाई गई हैं। दोष सिद्ध होने पर आरोपियों को 5 से 15 साल तक की सजा हो सकती है, जबकि अंतिम निर्णय अदालत करेगी।

    अमेरिकी जांच एजेंसियों ने इस नेटवर्क को कनाडा और अमेरिका दोनों की सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा बताया है।