Tag: Uttar Pradesh politics

  • अखिलेश का योगी सरकार पर हमला, बोले- विपक्ष को बदनाम करने AI वीडियो बनाकर वायरल कर रही सरकार

    अखिलेश का योगी सरकार पर हमला, बोले- विपक्ष को बदनाम करने AI वीडियो बनाकर वायरल कर रही सरकार

    लखनऊ। सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने सोमवार को लखनऊ में मीडिया से बातचीत के दौरान योगी सरकार पर तीखा हमला बोला। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार विपक्षी नेताओं को बदनाम करने के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) से वीडियो तैयार कराकर वायरल कर रही है। अखिलेश ने कहा, ‘सरकार हमें बदनाम करने के लिए बच्चों के खेल न खेले। AI में हम उनसे काफी आगे हैं।’

    प्रेस कॉन्फ्रेंस में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को लेकर बनाया गया एक AI वीडियो भी दिखाया गया। इसमें प्रदेश की कानून-व्यवस्था समेत कई मुद्दों को लेकर सरकार पर सवाल उठाए गए। अखिलेश ने कहा कि सरकार अगर AI का इस्तेमाल विपक्ष को बदनाम करने के लिए करेगी तो वे भी इस तकनीक में उसे पीछे छोड़ देंगे। उन्होंने सरकार को ऐसी गतिविधियों से बचने की नसीहत दी।

    ‘यूपी में बड़े पैमाने पर लूट, सबसे ज्यादा भ्रष्ट सरकार’
    सपा प्रमुख ने प्रदेश सरकार पर भ्रष्टाचार के आरोप भी लगाए। उन्होंने कहा, ‘प्रदेश में इस समय बड़े पैमाने पर लूट हो रही है। यह अब तक यूपी की सबसे ज्यादा भ्रष्ट सरकार है।’ उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार स्कूल बंद करवा रही है। अखिलेश ने कहा कि सपा बंद किए गए स्कूलों में जाकर कार्यक्रम करेगी और लोगों को सरकार के कामकाज की जानकारी देगी।

    एक्सप्रेसवे में गड्ढों को लेकर सरकार पर सवाल
    अखिलेश ने कानपुर-लखनऊ एक्सप्रेसवे की गुणवत्ता पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि सरकार द्वारा बनाए गए एक्सप्रेसवे में गड्ढे हो गए हैं। अब इसके डिजाइन में गड़बड़ी की बात कही जा रही है। उन्होंने सवाल किया कि अगर डिजाइन में गलती हुई है तो इसके लिए जिम्मेदार कौन है।

    उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा उद्घाटित एक एक्सप्रेसवे की स्थिति पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि उसमें भी गड्ढे हो गए हैं। अखिलेश ने आरोप लगाया कि पीडब्ल्यूडी में बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार हो रहा है।

    ‘कुंभ से अब तक एक लाख करोड़ से ज्यादा खर्च, विकास कहां हुआ?’
    अखिलेश ने प्रयागराज में हुए खर्च को लेकर भी सरकार को घेरा। उन्होंने कहा कि कुंभ से लेकर अब तक प्रयागराज में एक लाख करोड़ रुपये से ज्यादा खर्च हो चुका है। इसके बावजूद सवाल यह है कि वास्तव में कितना विकास हुआ। उन्होंने आरोप लगाया कि प्रदेश में भ्रष्टाचार चरम पर है और पूरा राज्य भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गया है।

    जयंत चौधरी पर बोले अखिलेश- ‘भाजपा 61 सीटें दे तो सम्मान होगा’
    अखिलेश यादव ने केंद्रीय मंत्री जयंत चौधरी को लेकर भी भाजपा पर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि भाजपा अगर जयंत चौधरी को 61 सीटें देती है तो इसे उनका सम्मान माना जाएगा। इससे कम सीटें मिलने पर यह उनका अपमान होगा।

  • सपा के साथ आए तो चमकी सहयोगियों की किस्मत? कांग्रेस से बसपा और जयंत-राजभर तक, 4 चुनावों के आंकड़ों से समझिए समीकरण

    सपा के साथ आए तो चमकी सहयोगियों की किस्मत? कांग्रेस से बसपा और जयंत-राजभर तक, 4 चुनावों के आंकड़ों से समझिए समीकरण


    नई दिल्ली। समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव के चवन्नी को रुपया बनाने वाले बयान के बाद उत्तर प्रदेश की सियासत में गठबंधन की राजनीति को लेकर नई बहस छिड़ गई है। अखिलेश यादव ने 16 अगस्त को सहयोगी दलों पर तंज कसते हुए कहा था कि उनकी पार्टी ने कई ऐसे गठबंधन किए जिनमें छोटे दलों को साथ लेकर उन्हें राजनीतिक ताकत दी लेकिन बाद में वही सहयोगी उन्हें छोड़कर चले गए। उनके इस बयान पर राष्ट्रीय लोक दल प्रमुख जयंत चौधरी के समर्थकों और बसपा प्रमुख मायावती की ओर से तीखी प्रतिक्रिया सामने आई। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या चुनावी आंकड़े भी अखिलेश के दावे को मजबूती देते हैं और सपा के साथ गठबंधन करने वाले दलों को वास्तव में राजनीतिक फायदा मिला।

    अगर 2024 के लोकसभा चुनाव से शुरुआत करें तो तस्वीर काफी दिलचस्प नजर आती है। समाजवादी पार्टी ने उत्तर प्रदेश की 62 लोकसभा सीटों पर चुनाव लड़ा और 37 सीटों पर जीत दर्ज की। यह उसके लिए बड़ी वापसी थी क्योंकि इससे पहले लगातार दो लोकसभा चुनाव में पार्टी महज पांच पांच सीटों पर सिमट गई थी। इसी चुनाव में कांग्रेस सपा के साथ गठबंधन में 17 सीटों पर मैदान में उतरी और छह सीटें जीतने में सफल रही। 2019 में कांग्रेस को उत्तर प्रदेश में सिर्फ एक सीट मिली थी। इस लिहाज से सपा के साथ गठबंधन के बाद उसके प्रदर्शन में बड़ा सुधार हुआ।

    2024 में जन अधिकार पार्टी को भी सपा के साथ गठबंधन का फायदा मिला। पार्टी के प्रमुख बाबू सिंह कुशवाहा को जौनपुर सीट से सपा के चुनाव चिह्न पर मैदान में उतारा गया और उन्होंने जीत दर्ज कर पहली बार लोकसभा का रास्ता तय किया। हालांकि तृणमूल कांग्रेस के प्रत्याशी ललितेश पति त्रिपाठी भदोही से चुनाव हार गए और पार्टी का खाता नहीं खुल सका।

    अब 2019 के लोकसभा चुनाव पर नजर डालें तो सपा और बसपा ने लंबे अंतराल के बाद साथ चुनाव लड़ा था। बसपा ने 38 और सपा ने 37 सीटों पर चुनाव लड़ा। बसपा ने 10 सीटें जीतीं जबकि सपा के खाते में सिर्फ पांच सीटें आईं। खास बात यह थी कि 2014 में बसपा एक भी लोकसभा सीट नहीं जीत पाई थी। इस लिहाज से 2019 में उसका प्रदर्शन बड़ी वापसी माना गया। हालांकि चुनाव परिणाम आने के बाद दोनों दलों का गठबंधन ज्यादा समय तक नहीं चला और बसपा ने सपा से दूरी बना ली।

    2022 के विधानसभा चुनाव में भी सपा ने कई छोटे दलों को अपने साथ जोड़ा। जयंत चौधरी की राष्ट्रीय लोक दल ने 33 सीटों पर चुनाव लड़कर आठ सीटें जीतीं। 2017 में रालोद के खाते में सिर्फ एक सीट आई थी। इसी तरह ओम प्रकाश राजभर की सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी ने 19 सीटों पर चुनाव लड़कर छह सीटें जीतीं। हालांकि अपना दल कमेरावादी की पल्लवी पटेल को सिराथू से बड़ी जीत मिली लेकिन पार्टी का प्रदर्शन सीमित रहा। दूसरी ओर महान दल और जनवादी पार्टी समाजवादी गठबंधन के बावजूद कोई सीट नहीं जीत सके।

    2017 में सपा ने कांग्रेस के साथ गठबंधन किया था लेकिन दोनों दलों को बड़ा फायदा नहीं मिला। सपा 298 सीटों पर चुनाव लड़कर सिर्फ 47 सीटें जीत सकी जबकि कांग्रेस 105 सीटों पर लड़कर सात सीटों पर सिमट गई। कांग्रेस को 2012 की तुलना में 21 सीटों का नुकसान हुआ था।

    इन आंकड़ों को देखें तो 2019 और 2024 के लोकसभा चुनाव तथा 2022 के विधानसभा चुनाव में सपा के साथ गठबंधन करने वाले कई बड़े दलों के प्रदर्शन में सुधार जरूर दिखाई देता है। हालांकि हर सहयोगी को समान सफलता नहीं मिली। कुछ दलों को सीटें मिलीं तो कुछ गठबंधन के बावजूद चुनावी जमीन मजबूत नहीं कर सके। यही वजह है कि अखिलेश के बयान को लेकर राजनीतिक बहस आंकड़ों के साथ साथ गठबंधन की रणनीति और सीट बंटवारे तक पहुंच गई है। आने वाले चुनावों में यह देखना दिलचस्प होगा कि सपा और उसके संभावित सहयोगियों के बीच यह सियासी रिश्ता किस दिशा में जाता है।

  • UP : मुरादाबाद मंडल में सियासी विरासत का दबदबा, 6 मौजूदा विधायकों के पिता भी रह चुके हैं MP-MLA

    UP : मुरादाबाद मंडल में सियासी विरासत का दबदबा, 6 मौजूदा विधायकों के पिता भी रह चुके हैं MP-MLA

    मुरादाबाद। उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद मंडल की राजनीति में सियासी विरासत का असर साफ दिखाई देता है। मंडल के मौजूदा छह विधायक ऐसे हैं, जिनके पिता भी राजनीति में सक्रिय रहे और विधायक या सांसद के रूप में सदन तक पहुंचे। इनमें संभल के दो, जबकि मुरादाबाद, रामपुर, अमरोहा और बिजनौर के एक-एक विधायक शामिल हैं। खास बात यह है कि इन छह विधायकों में तीन समाजवादी पार्टी और तीन भारतीय जनता पार्टी से हैं।

    मंडल के कई राजनीतिक परिवारों में पिता के बाद बेटों ने राजनीति की कमान संभाली। इनमें कुछ नेताओं ने अपनी अलग पहचान बना ली है और लगातार चुनाव जीतकर क्षेत्र का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं, जबकि कुछ की राजनीतिक पारी ज्यादा लंबी नहीं चल सकी।

    छह मौजूदा विधायकों की सियासी विरासत
    वर्तमान में भाजपा की ओर से सुशांत सिंह, आकाश सक्सेना और राजीव तरारा विधायक हैं। वहीं सपा से इकबाल महमूद, पिंकी यादव और मोहम्मद फहीम विधानसभा में क्षेत्र का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। इन सभी के पिता भी राजनीति में सक्रिय रहे और विधायक या सांसद रह चुके हैं।

    इनमें इकबाल महमूद सबसे अनुभवी हैं और सातवीं बार विधानसभा पहुंचकर संभल सीट का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। वहीं रामपुर के विधायक आकाश सक्सेना पहली बार विधानसभा पहुंचे हैं। पिंकी यादव और मोहम्मद फहीम तीसरी बार, जबकि सुशांत सिंह और राजीव तरारा दूसरी बार विधायक बने हैं।

    इकबाल महमूद: पिता भी तीन बार रहे विधायक
    संभल विधानसभा सीट से सपा विधायक इकबाल महमूद सातवीं बार सदन में पहुंचे हैं। मंडल के प्रमुख सपा नेताओं में उनकी गिनती होती है। उनके पिता महमूद हसन खान भी संभल सीट से तीन बार विधायक रह चुके थे। इकबाल महमूद ने पिता की राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाते हुए अपनी मजबूत पहचान बनाई है।

    मोहम्मद फहीम: पिता के निधन के बाद उपचुनाव से शुरुआत
    मुरादाबाद की बिलारी सीट से सपा विधायक मोहम्मद फहीम तीसरी बार विधानसभा पहुंचे हैं। उनके पिता हाजी इरफान 2012 में बिलारी से विधायक चुने गए थे। सड़क हादसे में उनकी मौत के बाद मोहम्मद फहीम ने उपचुनाव जीतकर पहली बार विधानसभा में कदम रखा था। इसके बाद उन्होंने लगातार अपनी राजनीतिक पकड़ मजबूत की।

    सुशांत सिंह: पिता पांच बार विधायक, एक बार सांसद
    बिजनौर की बढ़ापुर विधानसभा सीट से भाजपा विधायक सुशांत सिंह लगातार दूसरी बार चुनाव जीत चुके हैं। वह पूर्व सांसद सर्वेश सिंह के बेटे हैं। सर्वेश सिंह ठाकुरद्वारा विधानसभा सीट से पांच बार विधायक और मुरादाबाद लोकसभा सीट से एक बार सांसद रहे थे। सुशांत अब अपने पिता की राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं।

    राजीव तरारा: पिता भी रह चुके विधायक
    अमरोहा जिले की मंडी धनौरा सीट से भाजपा विधायक राजीव तरारा भी लगातार दूसरी बार विधानसभा पहुंचे हैं। उनके पिता तोताराम वर्ष 1996 में गंगेश्वरी विधानसभा सीट से विधायक चुने गए थे। राजीव ने भी पिता के बाद राजनीति में अपनी जगह बनाई और लगातार दूसरी बार चुनाव जीतने में सफल रहे।

    पिंकी यादव: पिता सांसद और तीन बार विधायक
    असमोली सीट से सपा विधायक पिंकी यादव लगातार तीसरी बार विधानसभा पहुंची हैं। उनके पिता बिजेंद्र पाल सिंह यादव तीन बार विधायक और एक बार सांसद रह चुके हैं। पिंकी यादव ने अपने पिता की राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाते हुए असमोली में अपनी पकड़ कायम रखी है।

    आकाश सक्सेना: आजम खां की सीट से पहुंचे विधानसभा
    रामपुर विधानसभा सीट से भाजपा विधायक आकाश सक्सेना ने उपचुनाव में जीत दर्ज की थी। यह वही सीट है, जहां लंबे समय तक आजम खां का राजनीतिक प्रभाव रहा। आकाश सक्सेना के पिता शिव बहादुर सक्सेना रामपुर की स्वार सीट से चार बार विधायक रह चुके हैं। इस तरह आकाश भी राजनीतिक परिवार की दूसरी पीढ़ी के प्रतिनिधि हैं।

    इन नेताओं के बेटे भी रह चुके विधायक
    मुरादाबाद मंडल में राजनीतिक परिवारों की सूची सिर्फ मौजूदा छह विधायकों तक सीमित नहीं है। कई अन्य नेताओं की संतानों ने भी चुनावी राजनीति में कदम रखा है।

    – पूर्व विधायक चौधरी नौनिहाल सिंह के बेटे राजेश सिंह चुन्नू कांठ से विधायक रह चुके हैं।
    – पूर्व विधायक रिजवानुल हक के बेटे मोहम्मद उस्मान मुरादाबाद देहात से विधायक रह चुके हैं।
    – आजम खां के बेटे अब्दुल्ला आजम रामपुर की स्वार सीट से विधायक रह चुके हैं।
    – पूर्व विधायक रियासत हुसैन के बेटे सौलत अली मुरादाबाद देहात से विधायक रह चुके हैं।
    – अमरोहा विधायक महबूब अली के बेटे परवेज अली पूर्व एमएलसी रह चुके हैं।
    – अमरोहा सांसद कंवर सिंह तंवर के बेटे ललित तंवर वर्तमान में अमरोहा के जिला पंचायत अध्यक्ष हैं।

    2027 में भी दिखेगा राजनीतिक परिवारों का असर
    2027 के विधानसभा चुनाव से पहले मुरादाबाद मंडल में कुछ और राजनीतिक परिवार अपने अगली पीढ़ी के नेताओं को चुनावी मैदान में उतारने की तैयारी में हैं। एक सांसद अपने बेटे को कुंदरकी विधानसभा सीट से चुनाव लड़ाने की तैयारी में बताए जा रहे हैं। वहीं मुरादाबाद देहात सीट से एक पूर्व विधायक के बेटे के भी चुनाव मैदान में उतरने की चर्चा है। ऐसे में 2027 के विधानसभा चुनाव में मुरादाबाद मंडल की सियासत में राजनीतिक विरासत बनाम नई नेतृत्वकारी पीढ़ी का मुकाबला भी देखने को मिल सकता है।

  • यूपी में ब्राह्मण वोट पर सियासी घमासान, अखिलेश-मायावती की नजर, क्या भाजपा का समीकरण बिगड़ेगा?

    यूपी में ब्राह्मण वोट पर सियासी घमासान, अखिलेश-मायावती की नजर, क्या भाजपा का समीकरण बिगड़ेगा?


    लखनऊ।
    उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 की तैयारियों के बीच ब्राह्मण मतदाता एक बार फिर सियासी दलों के केंद्र में आते दिख रहे हैं। पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक वर्ग के गठजोड़ यानी पीडीए की राजनीति करने वाले समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव अब ब्राह्मणों को साधने की कोशिश में जुटे हैं। पूर्व केंद्रीय मंत्री और सपा के संस्थापक सदस्यों में शामिल जनेश्वर मिश्र की जयंती पर आयोजित प्रबुद्ध सम्मेलन में अखिलेश ने पीडीए के ‘पीडी’ का अर्थ ‘पंडित’ बताया।

    अखिलेश ने विकास दुबे एनकाउंटर और पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के विजन व उनकी स्मृतियों की कथित उपेक्षा जैसे मुद्दों के जरिए भाजपा पर निशाना साधा। सियासी जानकारों की नजर में यह कोशिश इसलिए अहम है, क्योंकि उत्तर प्रदेश में ब्राह्मणों की आबादी करीब 12 से 14 प्रतिशत मानी जाती है और करीब 115 से 120 विधानसभा सीटों पर उनका प्रभाव माना जाता है। पूर्वांचल के कुछ क्षेत्रों में यह हिस्सेदारी 20 प्रतिशत तक बताई जाती है।

    राम मंदिर आंदोलन के बाद बदला ब्राह्मणों का रुख
    90 के दशक में राम जन्मभूमि आंदोलन को लेकर कांग्रेस की नीतियों से नाराज ब्राह्मणों का बड़ा हिस्सा भाजपा की ओर चला गया। इसके पीछे सांस्कृतिक और धार्मिक मुद्दों के प्रति समुदाय का झुकाव भी एक प्रमुख कारण माना गया। इसी दौर में मुस्लिम मतदाता भी कांग्रेस से दूर हुए।

    1990 में अयोध्या जा रहे कारसेवकों की गिरफ्तारी और पुलिस कार्रवाई के बाद तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव को मुस्लिम समुदाय का मजबूत समर्थन मिला। यादव और मुस्लिम मतों के समीकरण ने मुलायम की राजनीतिक जमीन को मजबूती दी। वहीं, ब्राह्मणों के भाजपा के साथ आने से 1991 में भाजपा ने उत्तर प्रदेश में पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई।

    1993 में सपा और बसपा के गठबंधन ने पिछड़ा, दलित और मुस्लिम समीकरण के सहारे सत्ता हासिल की। हालांकि यह गठबंधन ज्यादा समय तक नहीं चला और बाद में भाजपा और सपा के बीच मुख्य राजनीतिक मुकाबला बन गया।

    मायावती ने भी आजमाया था ब्राह्मण कार्ड
    2003 में भाजपा से गठबंधन टूटने के बाद बसपा प्रमुख मायावती ने ब्राह्मणों को अपने साथ जोड़ने की रणनीति अपनाई। उन्होंने दलित और ब्राह्मणों के बीच राजनीतिक समीकरण बनाने के लिए अभियान चलाया। 2007 के विधानसभा चुनाव में बसपा ने 86 ब्राह्मण उम्मीदवारों को टिकट दिया, जिनमें 41 चुनाव जीते। इसके बाद मायावती पूर्ण बहुमत के साथ सरकार बनाने में सफल रहीं।

    इस दौरान बसपा के नारे भी बदले और पार्टी ने ‘सर्वजन हिताय-सर्वजन सुखाय’ की राजनीति को आगे बढ़ाया। सतीश मिश्र और रामवीर उपाध्याय जैसे ब्राह्मण नेताओं को पार्टी में प्रमुख भूमिका मिली। हालांकि सरकार बनने के कुछ समय बाद दलित और ब्राह्मण कैडर के बीच मतभेद की खबरें सामने आने लगीं।

    2012 में सपा ने भी साधे ब्राह्मण
    2012 के विधानसभा चुनाव से पहले समाजवादी पार्टी ने भी ब्राह्मणों को साधने की कोशिश की। मुलायम सिंह यादव ने 45 ब्राह्मण उम्मीदवारों को टिकट दिया, जिनमें 21 चुनाव जीतने में सफल रहे। इसके बाद अखिलेश यादव के नेतृत्व में सपा की पूर्ण बहुमत की सरकार बनी।

    हालांकि सरकार के कार्यकाल के दौरान कानून-व्यवस्था, सांप्रदायिक घटनाओं और हिंदू धार्मिक आयोजनों को लेकर उठे सवालों ने ब्राह्मणों के एक वर्ग को सपा से दूर कर दिया। इसके बाद 2017 में भाजपा की प्रचंड जीत के साथ ब्राह्मण मतदाताओं का बड़ा हिस्सा फिर भाजपा के साथ दिखाई दिया।

    भाजपा के साथ क्यों जुड़ा ब्राह्मण वोट?
    2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 68 ब्राह्मण उम्मीदवारों को टिकट दिया था, जिनमें 46 जीतकर विधानसभा पहुंचे। 2022 के चुनाव में भी भाजपा के 46 ब्राह्मण विधायक निर्वाचित हुए।

    योगी आदित्यनाथ की हिंदुत्ववादी राजनीति, कानून-व्यवस्था पर सख्त रुख और सनातन से जुड़े मुद्दों को प्राथमिकता देने की नीति को भाजपा के साथ ब्राह्मणों के जुड़ाव की वजहों में गिना जाता है। हालांकि, पिछले कुछ समय से यूजीसी गाइडलाइन, ट्रांसफर-पोस्टिंग और संगठन में प्रतिनिधित्व जैसे मुद्दों पर ब्राह्मणों की कथित नाराजगी की चर्चाएं भी सामने आती रही हैं।

    पिछले वर्ष दिसंबर में भाजपा विधायक पीएन पाठक के घर ब्राह्मण विधायकों की बैठक और इस पर पार्टी अध्यक्ष पंकज चौधरी की सार्वजनिक नाराजगी के बाद यह मुद्दा और चर्चा में आया।

    अखिलेश के सामने बड़ी चुनौती
    अखिलेश यादव अब इन्हीं संभावित असंतोष के बीच भाजपा के ब्राह्मण वोट बैंक में सेंध लगाने की कोशिश कर रहे हैं। जनेश्वर मिश्र की जयंती पर प्रबुद्ध सम्मेलन और अयोध्या से पूर्व मंत्री पवन पांडेय को पहला प्रत्याशी घोषित करना इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।

    हालांकि, राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक अखिलेश के लिए यह राह आसान नहीं होगी। 2022 से पहले भी सपा ने परशुराम और विष्णु मंदिर बनाने तथा ब्राह्मणों को सम्मान देने जैसे वादों के जरिए इसी तरह की कोशिश की थी, लेकिन उसका चुनावी असर सीमित रहा।

    इसके अलावा सपा का पारंपरिक यादव वोट बैंक और ब्राह्मण मतदाताओं के बीच राजनीतिक तालमेल बनाना भी चुनौतीपूर्ण माना जा रहा है। वहीं, अखिलेश के सामने मुस्लिम मतदाताओं को अपने साथ बनाए रखने और ब्राह्मणों को आकर्षित करने के बीच संतुलन साधने की चुनौती भी होगी।

    मायावती भी पीछे नहीं
    ब्राह्मण वोटों को लेकर बसपा प्रमुख मायावती भी सक्रिय हैं। उन्होंने अपने घोषित उम्मीदवारों में ब्राह्मणों को अच्छी संख्या में जगह दी है। जालौन के माधौगढ़ से आशीष पांडेय को उम्मीदवार घोषित कर उन्होंने ब्राह्मण समुदाय को संदेश देने की कोशिश की है। मायावती पहले भी ब्राह्मण-दलित समीकरण के जरिए सत्ता हासिल कर चुकी हैं। 2007 में उनका प्रयोग सफल रहा था। इस बार भी वह दलित, ब्राह्मण, मुस्लिम और पिछड़े वर्गों के बीच सामाजिक समीकरण बनाने की कोशिश कर रही हैं।

    किसके पाले में जाएगा ब्राह्मण वोट?
    2027 के चुनाव में सपा और बसपा दोनों ब्राह्मण मतदाताओं को अपने पाले में लाने की कोशिश कर रहे हैं, जबकि भाजपा के सामने अपने पुराने सामाजिक समीकरण को मजबूत बनाए रखने की चुनौती है। अखिलेश के लिए सबसे बड़ा सवाल यह है कि वह ब्राह्मणों को आकर्षित करते हुए अपने पारंपरिक यादव-मुस्लिम आधार को किस तरह साथ रख पाएंगे। वहीं मायावती के सामने 2007 वाला सामाजिक समीकरण दोहराने की चुनौती है। ऐसे में यूपी की सियासत में ब्राह्मण वोट किस दल के पक्ष में कितना झुकता है, इसका असर 2027 के विधानसभा चुनाव के कई सीटों के समीकरण पर पड़ सकता है।

  • आज प्रयागराज से राहुल गांधी का यूपी में चुनावी शंखनाद, 2 लाख छात्रों से करेंगे संवाद

    आज प्रयागराज से राहुल गांधी का यूपी में चुनावी शंखनाद, 2 लाख छात्रों से करेंगे संवाद

    प्रयागराज। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी शनिवार को प्रयागराज से उत्तर प्रदेश में चुनावी अभियान का आगाज करेंगे। वह केपी इंटर कॉलेज मैदान में करीब दो घंटे तक छात्रों से सीधा संवाद करेंगे। कांग्रेस ने इस कार्यक्रम के जरिए पूर्वांचल के युवाओं तक पहुंच बनाने की रणनीति तैयार की है। कार्यक्रम में प्रदेश के करीब 25 जिलों के शहर और जिला अध्यक्षों के साथ कांग्रेस के सभी छह सांसद और कई वरिष्ठ नेता भी मौजूद रहेंगे।

    राहुल गांधी शाम 6:30 बजे से रात 8:30 बजे तक छात्रों से संवाद करेंगे। इस दौरान नीट, आरओ/आरआरओ समेत अन्य भर्ती परीक्षाओं में पेपर लीक, परीक्षाओं में देरी, भर्ती प्रक्रिया में भ्रष्टाचार और बेरोजगारी जैसे मुद्दे प्रमुख रहेंगे। कांग्रेस के मुताबिक कार्यक्रम में शामिल होने के लिए करीब दो लाख छात्रों ने रजिस्ट्रेशन कराया है।

    स्वराज भवन में नेताओं के साथ करेंगे मंथन
    छात्र संवाद कार्यक्रम से पहले राहुल गांधी अपने पैतृक आवास स्वराज भवन पहुंचेंगे। यहां वह करीब ढाई घंटे रुकेंगे। इस दौरान पार्टी के सांसदों, विधायकों, प्रदेश प्रभारी, सहप्रभारियों और वरिष्ठ नेताओं के साथ आगामी विधानसभा चुनाव की तैयारियों को लेकर चर्चा करेंगे। कांग्रेस ने प्रयागराज को चुनने के पीछे यहां मौजूद बड़ी छात्र आबादी को भी अहम वजह माना है। राजस्थान और उत्तराखंड के बाद राहुल गांधी के ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम के तहत प्रयागराज में यह आयोजन किया जा रहा है।

    प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी का बड़ा केंद्र है प्रयागराज
    प्रयागराज में करीब दो लाख छात्र अलग-अलग डेलीगेसियों और हॉस्टलों में रहकर प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करते हैं। इनमें आधे से ज्यादा युवा पूर्वांचल के विभिन्न जिलों से आते हैं। ऐसे में कांग्रेस की नजर इस बड़े युवा वर्ग पर है। इलाहाबाद विश्वविद्यालय लंबे समय से देश की राजनीति का महत्वपूर्ण केंद्र रहा है। इसके अलावा मोती लाल नेहरू राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान और भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी संस्थान जैसे प्रमुख संस्थानों में भी देशभर से छात्र पढ़ने आते हैं।

    पॉप सिंगर लश्करी और MC अल्ताफ देंगे प्रस्तुति
    कार्यक्रम की शुरुआत सांस्कृतिक और सांगीतिक प्रस्तुतियों से होगी। जेन-जी की पसंद को ध्यान में रखते हुए पॉप सिंगर लश्करी और एमसी अल्ताफ को प्रस्तुति के लिए बुलाया गया है। आयोजकों के मुताबिक कार्यक्रम में किसी तरह का राजनीतिक भाषण नहीं होगा। राहुल गांधी सीधे छात्रों से संवाद करेंगे और उनके सामने रोजगार, भर्ती परीक्षाओं और युवाओं से जुड़े मुद्दों पर चर्चा करेंगे।

  • UP बीजेपी में संगठनात्मक फेरबदल, क्षेत्रीय और मोर्चा प्रभारियों की नियुक्ति

    UP बीजेपी में संगठनात्मक फेरबदल, क्षेत्रीय और मोर्चा प्रभारियों की नियुक्ति

    लखनऊ। उत्तर प्रदेश में संगठन को और सक्रिय करने के लिए भारतीय जनता पार्टी ने क्षेत्र और विभिन्न मोर्चों के प्रभारियों की नियुक्ति कर दी है। पार्टी की ओर से जारी सूची में छह नेताओं को प्रदेश के अलग-अलग क्षेत्रों की जिम्मेदारी सौंपी गई है। दिलीप पटेल को अवध क्षेत्र का प्रभारी बनाया गया है।

    पार्टी के फैसले के मुताबिक रामप्रताप सिंह चौहान को पश्चिम, गीता शाक्य को ब्रज, शंकर लोधी को कानपुर, दिलीप पटेल को अवध, रमेश सिंह को काशी और अभिजात मिश्रा को गोरखपुर क्षेत्र का प्रभारी नियुक्त किया गया है।

    मोर्चों की जिम्मेदारी भी तय
    भाजपा ने अलग-अलग मोर्चों के लिए भी प्रभारियों के नाम घोषित किए हैं। सूची के अनुसार राजेश चौधरी को युवा मोर्चा प्रभारी, संजय राय को पिछड़ा मोर्चा प्रभारी, डॉ. धर्मेंद्र सिंह को अनुसूचित मोर्चा प्रभारी, कामेश्वर सिंह को महिला मोर्चा प्रभारी, डॉ. प्रियंका रावत को अनुसूचित जनजाति मोर्चा प्रभारी, देवेश कोरी को अल्पसंख्यक मोर्चा प्रभारी, शंकर गिरी को किसान मोर्चा प्रभारी बनाया है।

    संगठन के अन्य पदों पर भी नियुक्तियां
    पार्टी ने संगठन से जुड़े कुछ अन्य महत्वपूर्ण दायित्व भी तय किए हैं। गोविंद नारायण शुक्ला को मुख्यालय प्रभारी बनाया गया है। वहीं प्रदेश मंत्री नरेंद्र शर्मा को मीडिया प्रभारी की जिम्मेदारी मिली है।

    इसके अलावा प्रदेश उपाध्यक्ष ब्रज बहादुर को विस्तारक योजना का संयोजक बनाया गया है। अर्चना मिश्रा को ‘मन की बात’ का संयोजक और राहुल वाल्मीकि को सह-संयोजक नियुक्त किया गया है। भाजपा की इन नियुक्तियों को प्रदेश में संगठनात्मक गतिविधियों को तेज करने और अलग-अलग क्षेत्रों व मोर्चों के बीच समन्वय मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

  • यूपी विधानसभा में भावुक हुए सतीश महाना, बोले- राजनीति अंतिम पड़ाव पर, तय करूंगा इस कुर्सी के योग्य हूं या नहीं

    यूपी विधानसभा में भावुक हुए सतीश महाना, बोले- राजनीति अंतिम पड़ाव पर, तय करूंगा इस कुर्सी के योग्य हूं या नहीं

    लखनऊ। उत्तर प्रदेश विधानसभा के मानसून सत्र के तीसरे दिन विधानसभा अध्यक्ष सतीश महाना सदन में भावुक हो गए। मंगलवार को हुई तीखी नोकझोंक और हंगामे का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि उनका राजनीतिक जीवन अंतिम चरण में है और अब उन्हें गंभीरता से विचार करना होगा कि वे विधानसभा अध्यक्ष के पद के योग्य हैं या नहीं।

    सतीश महाना ने कहा कि पिछले साढ़े चार वर्षों से उन्होंने सदन को संवाद, मर्यादा और लोकतांत्रिक परंपराओं के साथ चलाने का प्रयास किया, लेकिन हाल की घटनाओं ने उन्हें आत्ममंथन के लिए मजबूर कर दिया है। उन्होंने कहा कि पहली बार ऐसा लगा कि या तो उनके प्रयासों में कहीं कमी रह गई या फिर डॉ. भीमराव आंबेडकर की वह बात सही साबित हो रही है कि कमी संविधान में नहीं, बल्कि उसे संचालित करने वालों में होती है। उन्होंने कहा कि वह जल्द ही इस पूरे घटनाक्रम पर गंभीरता से विचार करेंगे और यह तय करेंगे कि उनकी भूमिका और कार्यशैली उचित रही या नहीं।

    बिना चर्चा के पारित हुए कई विधेयक
    सदन में लगातार हंगामे के बीच कई महत्वपूर्ण विधेयक बिना विस्तृत चर्चा के पारित हो गए। इसके बाद संसदीय कार्य मंत्री सुरेश खन्ना ने विधानसभा की कार्यवाही अनिश्चितकाल के लिए स्थगित करने का प्रस्ताव रखा, जिसे सभापति ने स्वीकार कर लिया।

    केशव मौर्य ने साधा विपक्ष पर निशाना
    उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने समाजवादी पार्टी पर लोकतांत्रिक परंपराओं की अनदेखी करने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि विपक्ष ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को अपनी बात रखने का अवसर तक नहीं दिया, जिससे स्पष्ट है कि उसका उद्देश्य केवल सदन की कार्यवाही बाधित करना था। उन्होंने कहा कि राज्य की जनता के मुद्दों पर चर्चा करने के बजाय विपक्ष ने हंगामे का रास्ता चुना। साथ ही उन्होंने दावा किया कि 2027 के विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी को इसका राजनीतिक नुकसान उठाना पड़ेगा।

    हंगामे के बीच सपा विधायक निलंबित
    मंगलवार को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के वक्तव्य के दौरान विपक्ष के हंगामे के बीच समाजवादी पार्टी के विधायक सचिन यादव को निलंबित कर दिया गया। इसके बाद वह विधानसभा परिसर में चौधरी चरण सिंह की प्रतिमा के सामने धरने पर बैठ गए। बाद में अन्य विपक्षी विधायक भी उनके समर्थन में पहुंचे। विपक्ष का आरोप था कि वह राम मंदिर चढ़ावा मामले पर चर्चा कराना चाहता था, लेकिन सरकार इस मुद्दे पर सदन में बहस से बच रही है।

  • अखिलेश के CM बनने की कामना, 201 लीटर गंगाजल की कांवड़ लेकर पैदल निकले बॉबी यादव

    अखिलेश के CM बनने की कामना, 201 लीटर गंगाजल की कांवड़ लेकर पैदल निकले बॉबी यादव

    गाजियाबाद। समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव के मुख्यमंत्री बनने की मनोकामना को लेकर रेसलिंग खिलाड़ी बॉबी यादव हरिद्वार से 201 लीटर गंगाजल की कांवड़ लेकर पैदल यात्रा पर निकले हैं। शुक्रवार को वह अपने साथियों के साथ मुरादनगर पहुंचे, जहां कांवड़ियों ने स्थानीय थाने में विश्राम किया और उनका स्वागत किया गया।

    नोएडा के सर्फाबाद निवासी बॉबी यादव ने बताया कि उन्होंने एक जुलाई को अखिलेश यादव के जन्मदिन के अवसर पर हरिद्वार से गंगाजल उठाया था। उन्होंने विशेष संकल्प के साथ यह कांवड़ यात्रा शुरू की है और पैदल चलते हुए अपने गंतव्य की ओर बढ़ रहे हैं।

    साथियों के साथ जारी है यात्रा
    बॉबी यादव के साथ इस यात्रा में रिंकू, मोनू, हर्ष, राज, लविश समेत कई साथी भी शामिल हैं। यात्रा के दौरान यह दल विभिन्न स्थानों पर पड़ाव डालते हुए आगे बढ़ रहा है। रास्ते में स्थानीय लोगों और समर्थकों की ओर से उनका स्वागत और सत्कार भी किया जा रहा है।

    आस्था और संकल्प का प्रतीक
    बॉबी यादव का कहना है कि यह कांवड़ यात्रा उनकी धार्मिक आस्था और दृढ़ संकल्प का प्रतीक है। उनका विश्वास है कि भगवान शिव की कृपा से उनकी मनोकामना पूरी होगी और वे इसी भावना के साथ गंगाजल अर्पित करने की यात्रा पूरी कर रहे हैं।
  • केजरीवाल के अयोध्या दौरे पर कांग्रेस का हमला, अजय राय बोले- 'राम सबके हैं, VIP छूट क्यों?'

    केजरीवाल के अयोध्या दौरे पर कांग्रेस का हमला, अजय राय बोले- 'राम सबके हैं, VIP छूट क्यों?'


    लखनऊ। आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल के अयोध्या दौरे को लेकर उत्तर प्रदेश की राजनीति में बयानबाजी तेज हो गई है। उत्तर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय ने भाजपा सरकार पर निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि अयोध्या में दर्शन व्यवस्था को लेकर सरकार दोहरे मापदंड अपना रही है। उन्होंने सवाल किया कि जब भगवान राम सबके हैं, तो फिर अलग-अलग नेताओं और श्रद्धालुओं के लिए अलग नियम क्यों बनाए जा रहे हैं।

    अजय राय ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर पोस्ट करते हुए कहा कि अयोध्या में अरविंद केजरीवाल को कैमरों और विशेष सुविधाओं के साथ दर्शन की अनुमति दी गई, जबकि कांग्रेस नेताओं और आम श्रद्धालुओं के लिए कड़े नियम लागू किए जाते हैं। उन्होंने कहा कि कुछ समय पहले जब वह स्वयं रामलला के दर्शन के लिए अयोध्या गए थे, तब वहां की व्यवस्था अलग थी।

    उन्होंने सरकार से सवाल करते हुए लिखा कि आखिर राजनीतिक सुविधा के अनुसार नियम बदलने का क्या औचित्य है। उन्होंने इसे आस्था के केंद्र पर वीआईपी संस्कृति और दोहरी राजनीति करार देते हुए कहा कि यह पूरी तरह निंदनीय है।

    दरअसल, अरविंद केजरीवाल शुक्रवार को अयोध्या पहुंचे थे, जहां उन्होंने रामलला के दर्शन किए। दर्शन के बाद मीडिया से बातचीत में उन्होंने श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट से जुड़े कथित चढ़ावा गबन मामले पर भी सवाल उठाए थे। उनके इस दौरे और बयान के बाद राजनीतिक प्रतिक्रियाओं का सिलसिला शुरू हो गया।

    इससे पहले मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी बिना नाम लिए केजरीवाल पर तीखा हमला बोला था। एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि दिल्ली की जनता ने उन्हें 15 वर्षों तक मौका दिया, लेकिन बदले में भ्रष्टाचार और अव्यवस्था मिली। मुख्यमंत्री ने कहा कि अयोध्या का विकास डबल इंजन सरकार की देन है और दिल्ली के नेताओं को यहां आकर विकास मॉडल देखना चाहिए।

    सीएम योगी ने कहा कि यदि दिल्ली में भी इसी तरह विकास कार्य किए गए होते, तो राजधानी की तस्वीर भी आज अलग होती। उन्होंने अयोध्या के कायाकल्प का उल्लेख करते हुए इसे भाजपा सरकार की उपलब्धि बताया।

    केजरीवाल के अयोध्या दौरे के बाद अब सियासी आरोप-प्रत्यारोप तेज हो गए हैं। एक ओर कांग्रेस सरकार पर वीआईपी संस्कृति और भेदभाव का आरोप लगा रही है, तो दूसरी ओर भाजपा विपक्षी नेताओं के शासनकाल और कार्यशैली पर सवाल उठा रही है। ऐसे में अयोध्या एक बार फिर राजनीतिक बहस का केंद्र बन गई है।

  • अखिलेश यादव का बीजेपी पर हमला, बोले- संवेदनहीनता का चेहरा सामने आया, जनता सब समझ चुकी है

    अखिलेश यादव का बीजेपी पर हमला, बोले- संवेदनहीनता का चेहरा सामने आया, जनता सब समझ चुकी है


    लखनऊ। समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने भारतीय जनता पार्टी पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने कहा कि प्रदेश और देश की जनता अब भाजपा नेताओं के भाषण सुनने के मूड में नहीं है, बल्कि जवाब चाहती है। अपने बयान में उन्होंने एक कथित वायरल वीडियो का जिक्र करते हुए कहा कि उससे भाजपा नेताओं की वास्तविक कार्यशैली और व्यवहार लोगों के सामने आ गया है।

    अखिलेश यादव ने कहा कि अहंकार इंसान का विवेक छीन लेता है। उन्होंने आरोप लगाया कि जिन लोगों ने किसी नेता को ईमानदारी, सादगी और जनसेवा का प्रतीक मान रखा था, उनका भ्रम अब टूट चुका है। उनके अनुसार हाल ही में सामने आए एक कथित वीडियो ने उस बनाई गई छवि को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया है।

    सपा प्रमुख ने कहा कि किसी परिवार पर दुख का पहाड़ टूटने के समय संवेदना और सहानुभूति दिखाने के बजाय यदि कोई सार्वजनिक रूप से कठोर भाषा और व्यवहार अपनाता है, तो यह उसकी संवेदनहीनता को दर्शाता है। उन्होंने कहा कि इस घटना के बाद लोगों के सामने उस नेता का वास्तविक चेहरा उजागर हो गया है और कथित नायकत्व का मायाजाल बिखर गया है।

    अखिलेश यादव ने दावा किया कि इस घटना से सबसे अधिक निराश वे समर्थक हुए हैं, जो अब तक संबंधित नेता की छवि का प्रचार करते रहे थे। उन्होंने कहा कि लोग अब यह सोचने को मजबूर हैं कि यदि ऐसी घटना उनके अपने परिवार के साथ होती, तो उनकी प्रतिक्रिया क्या होती। उनके अनुसार इस घटना ने समाज में व्यापक चर्चा को जन्म दिया है।

    उन्होंने यह भी कहा कि यह पहली बार नहीं है जब इस तरह के व्यवहार पर सवाल उठे हैं। अखिलेश ने आरोप लगाया कि इससे पहले भी पत्रकारों और अधिकारियों के साथ कथित रूप से अभद्र व्यवहार के मामले सामने आ चुके हैं। उनका कहना था कि जिसके सार्वजनिक व्यवहार में संयम नहीं होता, उसके नेतृत्व पर भी सवाल उठना स्वाभाविक है।

    सपा अध्यक्ष ने व्यंग्य करते हुए कहा कि अब यह भी कहा जा सकता है कि वायरल वीडियो कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी एआई से बनाया गया है, लेकिन जनता सब समझती है। उन्होंने दावा किया कि लोग वास्तविकता और दिखावे के बीच का अंतर पहचान चुके हैं।

    अपने बयान के अंत में अखिलेश यादव ने कहा कि महिलाओं के सम्मान से जुड़ी किसी भी घटना को समाज गंभीरता से लेता है। उन्होंने आरोप लगाया कि इस प्रकरण से भाजपा की छवि को नुकसान पहुंचा है और महिलाओं के बीच इसका व्यापक असर देखने को मिलेगा।