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  • फ्रांस में शांतिपूर्ण प्रदर्शनों के बीच कौन फैला रहा हिंसा, नकाबपोश 'कैसर्स' की भूमिका से बढ़ी सुरक्षा एजेंसियों की चिंता

    फ्रांस में शांतिपूर्ण प्रदर्शनों के बीच कौन फैला रहा हिंसा, नकाबपोश 'कैसर्स' की भूमिका से बढ़ी सुरक्षा एजेंसियों की चिंता

    नई दिल्ली ।फ्रांस में महंगाई, आर्थिक असमानता और सरकारी नीतियों के खिलाफ जारी विरोध प्रदर्शन अब हिंसक घटनाओं के कारण चर्चा में हैं। लगातार तीसरे सप्ताहांत हजारों लोग सड़कों पर उतरे। देश के अधिकांश हिस्सों में प्रदर्शन शांतिपूर्ण रहे, लेकिन 31 अक्टूबर को रैलियां समाप्त होने के दौरान पेरिस सहित कई शहरों में नकाबपोश लोगों के समूहों की पुलिस से झड़प हो गई। इन घटनाओं के बाद सवाल उठने लगा है कि शांतिपूर्ण प्रदर्शनों के बीच हिंसा फैलाने वाले ये लोग कौन हैं और उनका विरोध करने का तरीका क्या है?

    फ्रांस में ऐसे उपद्रवियों के लिए ‘कैसर्स’ शब्द इस्तेमाल किया जाता है। फ्रांसीसी भाषा में इसका अर्थ तोड़फोड़ करने वाले होता है। ये किसी एक पंजीकृत संगठन या राजनीतिक दल के सदस्य नहीं हैं, बल्कि अलग-अलग छोटे समूहों में सक्रिय रहते हैं। प्रदर्शन के दौरान इनकी गतिविधियों में सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाना, पुलिस से भिड़ना और सरकारी व्यवस्था के खिलाफ हिंसक कार्रवाई करना शामिल बताया जाता है।

    इन समूहों में अक्सर युवा और कट्टर वामपंथी विचारधारा से जुड़े कार्यकर्ताओं की मौजूदगी बताई जाती है। इन्हें कई बार अल्ट्रा-लेफ्ट समूहों के रूप में भी पहचाना जाता है। हालांकि, इनका कोई केंद्रीय नेतृत्व या साझा सदस्यता व्यवस्था सामने नहीं आई है। अलग-अलग समूहों में सक्रिय रहने के कारण इनकी पहचान और संगठनात्मक ढांचे का पता लगाना सुरक्षा एजेंसियों के लिए चुनौती बना रहता है।

    कैसर्स आमतौर पर बड़े प्रदर्शनों के दौरान रैलियों के किनारे या उनके अंतिम पड़ाव पर सक्रिय होते हैं। शांतिपूर्ण तरीके से अपनी मांग रखने के बजाय ये पुलिस के साथ टकराव और तोड़फोड़ की घटनाओं में शामिल होते हैं। पहचान छिपाने के लिए नकाब, चश्मे और काले कपड़ों का इस्तेमाल करते हैं। कुछ घटनाओं में इनके पास हथौड़े और आतिशबाजी से जुड़ी सामग्री भी देखी गई है। बैंकों, रियल एस्टेट कार्यालयों और बड़े कारोबारी प्रतिष्ठानों को निशाना बनाने की घटनाएं भी इनके विरोध के तरीकों में शामिल बताई जाती हैं।

    31 अक्टूबर को फ्रांस के विभिन्न शहरों में करीब 3.20 लाख लोग प्रदर्शन में शामिल हुए। इनमें लगभग 70 हजार लोग अकेले पेरिस में सड़कों पर उतरे थे। अधिकांश रैलियां शांतिपूर्ण रहीं, लेकिन राजधानी में पोर्टे डी शारांटों के आसपास स्थिति बिगड़ गई। काले कपड़े पहने दर्जनों नकाबपोश लोगों ने हथौड़ों से सड़क के पत्थर उखाड़कर पुलिस पर फेंके। सुरक्षा बलों पर एक आग लगाने वाला उपकरण भी फेंका गया। जवाब में पुलिस ने आंसू गैस, स्टन ग्रेनेड और लाठीचार्ज का इस्तेमाल किया।

    पुलिस अधिकारियों के अनुसार, कुछ सौ उपद्रवियों का एक समूह लगातार सुरक्षा बलों पर हमले कर रहा था। पेरिस में 400 से 800 कट्टर वामपंथी कार्यकर्ताओं की मौजूदगी का अनुमान लगाया गया था। हालांकि, यह अनुमानित संख्या थी और इससे सभी उपद्रवियों की प्रमाणित पहचान नहीं होती।

    इस बार हैलोवीन के त्योहार ने भी सुरक्षा व्यवस्था को चुनौती दी। कई प्रदर्शनकारी स्पाइडरमैन और फ्रैंकेंस्टाइन जैसे किरदारों की पोशाक पहनकर पहुंचे। कुछ लोगों ने हैलोवीन के मुखौटों से चेहरे ढके। गृह मंत्री लॉरां नूनेज ने चेतावनी दी थी कि पहचान छिपाने के लिए चेहरा ढकने वालों पर जुर्माना लगाया जा सकता है। सोशल मीडिया पर हैलोवीन की रात क्रांति शुरू करने की अपील वाले संदेश भी सामने आए थे।

    इन घटनाओं के बीच कैसर्स को अप्रवासी समुदाय से जोड़ने की कोशिशों पर भी सवाल उठे हैं। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, इन हिंसक समूहों को सीधे अप्रवासी समुदाय से जोड़ने का कोई ठोस आधार नहीं है। इनमें फ्रांसीसी नागरिकों और कट्टर वामपंथी विचारधारा से जुड़े युवाओं की भी बड़ी संख्या बताई गई है।

    दरअसल, मौजूदा आंदोलन की शुरुआत महंगाई, बढ़ती जीवनयापन लागत, आर्थिक असमानता और सार्वजनिक सेवाओं की स्थिति के विरोध में हुई थी। इसमें छात्र, ट्रेड यूनियन और येलो वेस्ट आंदोलन से जुड़े लोग शामिल हैं। पुलिस कार्रवाई और प्रदर्शनकारियों के घायल होने के बाद नागरिक स्वतंत्रता तथा विरोध के अधिकार की मांग भी आंदोलन का हिस्सा बन गई।

    17 अक्टूबर को हुए शुरुआती बड़े प्रदर्शनों के दौरान कई शहरों में दुकानों में लूटपाट और सार्वजनिक इमारतों में आगजनी हुई थी। अब छात्र संगठनों ने नवंबर के पहले सप्ताह में स्कूलों और विश्वविद्यालयों को बंद कराने तथा 5 नवंबर को मजदूर संगठनों के साथ प्रदर्शन करने की घोषणा की है। ऐसे में फ्रांस में आने वाले दिनों में विरोध प्रदर्शनों और सुरक्षा व्यवस्था पर नजर बनी रहेगी।

  • शिवपुरी में रास्ते के पुराने विवाद ने लिया हिंसक रूप, मारपीट में 35 वर्षीय महिला की मौत..

    शिवपुरी में रास्ते के पुराने विवाद ने लिया हिंसक रूप, मारपीट में 35 वर्षीय महिला की मौत..

    शिवपुरी जिले: में रास्ते को लेकर लंबे समय से चले आ रहे विवाद ने शुक्रवार को हिंसक रूप ले लिया। बदरवास थाना क्षेत्र के ग्राम खजूरी में दो पक्षों के बीच हुए झगड़े और मारपीट में 35 वर्षीय महिला की मौत हो गई। घटना में महिला का बेटा और उसकी सास भी घायल हुए हैं। घायलों को उपचार के लिए अस्पताल पहुंचाया गया। घटना के बाद गांव में सनसनी फैल गई है। पुलिस मामले की जांच में जुटी हुई है।

    जानकारी के अनुसार, ग्राम खजूरी में रास्ते को लेकर दोनों पक्षों के बीच पिछले करीब 10 वर्षों से विवाद चला आ रहा था। लंबे समय से जारी इस विवाद को लेकर शुक्रवार को एक बार फिर दोनों पक्ष आमने-सामने आ गए। शुरुआत में उनके बीच कहासुनी हुई, लेकिन देखते ही देखते विवाद बढ़ गया और मामला मारपीट तक पहुंच गया। इस दौरान हुई हिंसा में भूरिया पत्नी फेरन जाटव, उम्र 35 वर्ष, गंभीर रूप से घायल हो गईं।

    मारपीट के दौरान भूरिया के सिर में चोट लगी। चोट इतनी गंभीर थी कि उनकी मौके पर ही मौत हो गई। घटना में उनके परिवार के दो अन्य सदस्य भी घायल हुए हैं। इनमें उनकी सास रामवती पत्नी गंगाराम जाटव और पुत्र राहुल, जो फेरन जाटव के बेटे हैं, शामिल हैं। दोनों को चोटें आने के बाद उपचार के लिए अस्पताल ले जाया गया। फिलहाल उपलब्ध जानकारी में घायलों की स्थिति के बारे में विस्तृत विवरण सामने नहीं आया है।

    घटना की सूचना मिलने के बाद पुलिस सक्रिय हुई और मामले की जांच शुरू कर दी। पुलिस यह पता लगाने में जुटी है कि रास्ते को लेकर चल रहा पुराना विवाद शुक्रवार को किस परिस्थिति में दोबारा भड़का और मारपीट की नौबत कैसे आई। साथ ही घटना में शामिल लोगों की भूमिका और विवाद के दौरान हुई घटनाओं के क्रम की भी जांच की जा रही है।

    ग्राम खजूरी में रास्ते को लेकर करीब एक दशक से विवाद चला आ रहा था। इतने लंबे समय से जारी विवाद का इस तरह हिंसक घटना में बदल जाना गंभीर मामला है। शुक्रवार को हुए झगड़े में एक महिला की जान चली गई, जबकि परिवार के दो अन्य सदस्य घायल हो गए। घटना के बाद गांव में चर्चा का माहौल है और लोग पूरे घटनाक्रम को लेकर जानकारी जुटा रहे हैं।

    फिलहाल पुलिस की जांच से ही स्पष्ट हो सकेगा कि विवाद के दौरान किन परिस्थितियों में मारपीट हुई और महिला के सिर में चोट कैसे लगी। मामले में आरोपियों की भूमिका तथा घटना से जुड़े अन्य पहलुओं की पड़ताल की जा रही है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, रास्ते के पुराने विवाद को ही इस झगड़े की वजह बताया गया है। जांच पूरी होने के बाद घटना से संबंधित विस्तृत तथ्य सामने आने की उम्मीद है।

    गांव में रास्ते जैसे स्थानीय विवादों को लेकर लंबे समय तक तनाव बने रहने से आपसी टकराव की आशंका बनी रहती है। खजूरी की इस घटना में विवाद का परिणाम एक महिला की मौत और दो लोगों के घायल होने के रूप में सामने आया है। हालांकि, घटना से जुड़े सभी तथ्यों की पुष्टि पुलिस जांच के बाद ही हो सकेगी। फिलहाल पुलिस मामले की पड़ताल कर रही है।

  • आर्मेनिया की संसद में बहस के दौरान भिड़े सत्ता पक्ष और विपक्षी सांसद, लात-घूंसे चले और कुर्सियां तक फेंकी गईं

    आर्मेनिया की संसद में बहस के दौरान भिड़े सत्ता पक्ष और विपक्षी सांसद, लात-घूंसे चले और कुर्सियां तक फेंकी गईं

    नई दिल्ली ।आर्मेनिया की संसद में 29 अक्टूबर को एक बहस के दौरान ऐसा हंगामा हुआ कि सदन की कार्यवाही हिंसक झड़प में बदल गई। सत्ताधारी सिविल कॉन्ट्रैक्ट पार्टी और विपक्षी स्ट्रॉन्ग आर्मेनिया गुट के सांसदों के बीच पहले तीखी बहस हुई और फिर मामला हाथापाई तक पहुंच गया। सदन के भीतर सांसद एक-दूसरे पर लात-घूंसे चलाते और धक्का-मुक्की करते नजर आए। स्थिति इतनी बिगड़ गई कि संसद का मुख्य हॉल ही नहीं, बल्कि गलियारा भी झगड़े का मैदान बन गया। इस पूरी घटना का सीधा प्रसारण हो रहा था, जिसके कारण देशभर के लोगों ने सांसदों के बीच हुई मारपीट के दृश्य देखे।

    बताया गया कि विवाद की शुरुआत ऑडिट चैंबर के एक सदस्य की नियुक्ति को लेकर हो रही चर्चा के दौरान हुई। उस समय सत्ताधारी दल के सांसद तारोन चाखोयान अपनी बात रख रहे थे। अपने संबोधन के दौरान उन्होंने विपक्षी नेता नारेक करापेत्यान के एक रिश्तेदार से जुड़ी पुरानी विवादित टिप्पणी का उल्लेख किया। चाखोयान के अनुसार, करापेत्यान के चचेरे भाई ने पहले विपक्ष के सत्ता में आने की स्थिति में महिलाओं को संतुष्ट करने के लिए अलग मंत्रालय बनाने का प्रस्ताव दिया था। उन्होंने यह भी कहा कि संबंधित व्यक्ति ने इस बयान के लिए अब तक माफी नहीं मांगी है।

    चाखोयान की इस टिप्पणी पर नारेक करापेत्यान ने अपनी सीट से ही विरोध जताना शुरू कर दिया। उन्होंने बयान को आपत्तिजनक बताया। कुछ ही देर में दोनों पक्षों के बीच बहस और तेज हो गई। इसके बाद करापेत्यान अपनी सीट से उठकर मंच की ओर बढ़ने लगे। इसी दौरान सत्ता पक्ष और विपक्ष के कई सांसद भी अपनी जगह से उठकर एक-दूसरे की तरफ बढ़े और देखते ही देखते हाथापाई शुरू हो गई।

    शुरुआत में सांसदों के बीच धक्का-मुक्की हुई, लेकिन जल्द ही स्थिति नियंत्रण से बाहर हो गई। दोनों पक्षों के सदस्य एक-दूसरे को पकड़कर नीचे गिराने लगे। इस दौरान लात और घूंसे भी चले। संसद के उपाध्यक्ष वहागन अलेक्सान्यान को भी विपक्षी सांसदों की तरफ कुर्सी फेंकते हुए देखा गया। घटनास्थल के वीडियो में कई सांसदों को कुर्सियां उठाते और एक-दूसरे पर हमला करते देखा जा सकता है।

    सदन के भीतर शुरू हुआ विवाद कुछ समय बाद संसद भवन के गलियारे तक पहुंच गया। वहां भी दोनों पक्षों के सांसदों के बीच धक्का-मुक्की और कहासुनी जारी रही। सुरक्षाकर्मियों तथा अन्य सदस्यों ने कई बार हस्तक्षेप कर दोनों गुटों को अलग करने की कोशिश की, लेकिन तनाव कम नहीं हुआ। इस दौरान कुछ सांसदों के कपड़े फट गए और कई लोगों को चोटें आईं।

    घटना के बाद संसद भवन में एम्बुलेंस बुलाई गई। विपक्षी गुट स्ट्रॉन्ग आर्मेनिया के सांसद एंड्रानिक गेवोरग्यान की नाक से खून बहता दिखाई दिया, जबकि उनके साथी सांसद रूबेन मखितारयान के कपड़े फटे हुए थे। अन्य कुछ सांसदों को भी मामूली चोटें आने की जानकारी सामने आई। दोबारा टकराव की आशंका को देखते हुए सुरक्षाकर्मियों ने संसद के गलियारे में दोनों पक्षों के बीच अवरोध लगाया, ताकि सदस्य फिर आमने-सामने न आ सकें।

    संसद के स्पीकर रूबेन रुबिनयान ने घटना के बाद नारेक करापेत्यान को झड़प के लिए जिम्मेदार ठहराया। उन्होंने कहा कि उन्होंने ब्रेक के दौरान हुई बातचीत का वीडियो देखा था और उनके अनुसार तारोन चाखोयान के भाषण में ऐसी कोई बात नहीं थी, जिसे आपत्तिजनक माना जाए। स्पीकर ने आरोप लगाया कि करापेत्यान ने अपनी भावनाओं पर नियंत्रण नहीं रखा और सीट से विरोध जताने के बाद उठकर चाखोयान पर हमला करने की कोशिश की। उन्होंने यह भी कहा कि विपक्षी सांसद गार्निक दावत्यान ने भी चाखोयान पर हमला किया था।

    रुबिनयान ने स्पष्ट किया कि उन्होंने जानबूझकर संसद की लाइव स्ट्रीमिंग बंद नहीं कराई, ताकि आम लोग सदन के भीतर चल रही घटनाओं को देख सकें। इससे पहले अक्टूबर महीने में भी सिविल कॉन्ट्रैक्ट और विपक्षी सांसदों के बीच विवाद हो चुका था। उस समय स्ट्रॉन्ग आर्मेनिया के सांसद एडगर गाजरियन ने स्पीकर पर सांसदों को बोनस देने के लिए सरकारी धन के दुरुपयोग का आरोप लगाया था। उस मामले में भी दोनों पक्षों के बीच तीखी बहस और तनाव देखने को मिला था।

  • शिवपुरी के भदैया कुंड पर महिला और उसके दोस्त की बेल्ट से पिटाई, पति पर मामला दर्ज..

    शिवपुरी के भदैया कुंड पर महिला और उसके दोस्त की बेल्ट से पिटाई, पति पर मामला दर्ज..


    शिवपुरी जिले: में प्रसिद्ध पर्यटन स्थल भदैया कुंड पर एक महिला और उसके दोस्त के साथ मारपीट का मामला सामने आया है। आरोप है कि महिला के पति गोविंद ने अपने चचेरे भाई के साथ मिलकर दोनों की बेल्ट से पिटाई की। घटना का वीडियो भी सामने आया है, जिसके बाद मामला चर्चा में आ गया। महिला की शिकायत पर पुलिस ने उसके पति के खिलाफ मारपीट की धाराओं में प्रकरण दर्ज किया है।

    जानकारी के अनुसार, महिला मंगलवार दोपहर अपने दोस्त के साथ भदैया कुंड घूमने पहुंची थी। इसी दौरान उसका पति गोविंद भी वहां पहुंच गया। पत्नी को दूसरे युवक के साथ देखकर वह नाराज हो गया। इसके बाद दोनों पक्षों के बीच विवाद शुरू हो गया। आरोप है कि विवाद बढ़ने पर गोविंद ने अपने चचेरे भाई के साथ मिलकर महिला और उसके दोस्त पर बेल्ट से हमला कर दिया।

    मारपीट के दौरान महिला के दोस्त के पैर बांधने का भी आरोप लगाया गया है। बताया गया है कि युवक के पैर बांधने के बाद दोनों की बेल्टों से पिटाई की गई। घटना से जुड़ा वीडियो सामने आने के बाद यह मामला लोगों के बीच चर्चा का विषय बन गया। हालांकि, घटना के सभी पहलुओं और आरोपों की पुष्टि पुलिस जांच के आधार पर ही हो सकेगी।

    घटना की सूचना मिलने पर डायल 112 पुलिस मौके पर पहुंची। पुलिस संबंधित लोगों को थाने ले गई, जहां मामले से जुड़ी कार्रवाई की गई। महिला की शिकायत के आधार पर उसके पति गोविंद के खिलाफ मारपीट की धाराओं में मामला दर्ज किया गया है। उपलब्ध जानकारी में पति के चचेरे भाई के खिलाफ दर्ज कार्रवाई का स्पष्ट विवरण नहीं दिया गया है।

    बताया गया है कि महिला और उसके पति के बीच पहले से विवाद चल रहा था। इसी कारण महिला पिछले कुछ दिनों से अपने मायके में रह रही थी। मंगलवार को भदैया कुंड पर दोनों का आमना-सामना हुआ। इसके बाद विवाद बढ़ा और कथित तौर पर महिला तथा उसके दोस्त के साथ मारपीट हुई। पुलिस इस मामले में सामने आए आरोपों की जांच कर रही है।

    भदैया कुंड शिवपुरी का प्रसिद्ध पर्यटन स्थल है, जहां लोग घूमने और समय बिताने के लिए पहुंचते हैं। ऐसे स्थान पर महिला और उसके दोस्त के साथ कथित मारपीट की घटना सामने आने से मामला सुर्खियों में है। घटना के वीडियो के प्रसार के बाद पुलिस की कार्रवाई और जांच पर ध्यान केंद्रित है।

    फिलहाल, उपलब्ध जानकारी के अनुसार महिला की शिकायत पर उसके पति के खिलाफ मामला दर्ज किया गया है। मारपीट की परिस्थितियों, इसमें शामिल लोगों की भूमिका और घटना से जुड़े अन्य पहलुओं की पुष्टि जांच के बाद ही हो सकेगी। आरोपों को अंतिम निष्कर्ष मानने के बजाय पुलिस की जांच और सामने आने वाले तथ्यों के आधार पर ही मामले की स्थिति स्पष्ट होगी।

  • मिलान में हिंसा की आशंका से लग्जरी स्टोर बंद, सुरक्षा के लिए 500 अतिरिक्त सैनिक तैनात करने की तैयारी

    मिलान में हिंसा की आशंका से लग्जरी स्टोर बंद, सुरक्षा के लिए 500 अतिरिक्त सैनिक तैनात करने की तैयारी

    नई दिल्ली । इटली के प्रमुख शहर मिलान में सप्ताहांत के दौरान हुए हिंसक प्रदर्शनों के बाद सुरक्षा व्यवस्था कड़ी करने की तैयारी की गई है। उप प्रधानमंत्री मातेओ साल्विनी ने शहर में कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए 500 अतिरिक्त सैनिक तैनात करने की घोषणा की है। हिंसा दोबारा भड़कने की आशंका के बीच शहर के प्रमुख लग्जरी शॉपिंग क्षेत्रों में कई दुकानदारों ने अपने प्रतिष्ठान समय से पहले बंद कर दिए। कुछ दुकानों ने शोकेस से महंगे उत्पाद भी हटा लिए हैं।

    मिलान में शनिवार को शुरू हुआ प्रदर्शन शुरुआती दौर में शांतिपूर्ण था, लेकिन बाद में कई इलाकों में स्थिति बिगड़ गई। प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच झड़पें हुईं। कुछ लोगों ने कूड़ेदानों में आग लगाई और पुलिसकर्मियों पर पथराव किया। इस दौरान दुकानों में लूटपाट और सार्वजनिक तथा निजी संपत्तियों को नुकसान पहुंचाने की घटनाएं भी सामने आईं। इसके बाद प्रशासन ने संवेदनशील इलाकों में निगरानी और सुरक्षा बढ़ाने की दिशा में कदम उठाए।

    साल्विनी ने सोमवार को अतिरिक्त सैनिकों की तैनाती की जानकारी देते हुए कहा कि मिलान में सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए यह कदम उठाया जाएगा। मंगलवार को होने वाली कैबिनेट बैठक में सुरक्षा उपायों के व्यापक पैकेज के तहत इस प्रस्ताव को शामिल किए जाने की उम्मीद है। सरकार का उद्देश्य शहर में शांति बहाल करना और संभावित हिंसक घटनाओं को रोकना है।

    मिलान इटली का प्रमुख वित्तीय और फैशन केंद्र है। यहां के प्रसिद्ध वाया मोंटेनापोलियोने क्षेत्र में शैनल, टिफनी और दिओर जैसे अंतरराष्ट्रीय लग्जरी ब्रांडों के स्टोर स्थित हैं। सप्ताहांत की घटनाओं के बाद कारोबारियों में सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ गई है। सोमवार को कई दुकानों ने सामान्य समय से पहले शटर गिरा दिए। कुछ प्रतिष्ठानों ने अपनी खिड़कियों को लकड़ी और गत्ते से ढक दिया, जबकि अन्य दुकानदारों ने महंगे सामान को शोकेस से निकालकर सुरक्षित स्थानों पर रख दिया।

    हिंसा के बाद पुलिस ने शहर के प्रमुख हिस्सों में गश्त बढ़ा दी है। रविवार को हुई कार्रवाई के दौरान 271 युवाओं को हिरासत में लिए जाने की जानकारी सामने आई। इनमें से 32 लोगों को गिरफ्तार किया गया। उपलब्ध विवरण के अनुसार, गिरफ्तार लोगों में 23 नाबालिग और 13 विदेशी नागरिक शामिल थे। इसके अतिरिक्त 28 लोगों के खिलाफ न्यायिक कार्रवाई के लिए रिपोर्ट दर्ज की गई। इन आंकड़ों के बीच गिरफ्तार लोगों की श्रेणियों में संभावित ओवरलैप को लेकर अलग-अलग संख्या को जोड़कर कुल संख्या निर्धारित नहीं की जा सकती।

    प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी ने हिंसा की निंदा की है। उन्होंने सोमवार को मंत्रियों और सुरक्षा अधिकारियों के साथ बैठक कर स्थिति पर चर्चा की। सरकार विशेष रूप से नाबालिगों से जुड़ी हिंसक गतिविधियों और युवा गिरोहों पर नियंत्रण के उपायों पर विचार कर रही है। मीडिया में सामने आई जानकारी के अनुसार, नाबालिगों को एहतियातन हिरासत में रखने की अवधि बढ़ाने के विकल्प पर भी चर्चा हो रही है। हालांकि, इन प्रस्तावों पर अंतिम निर्णय की जानकारी उपलब्ध नहीं है।

    मिलान के अलावा उत्तरी इटली के बोलोन्या, ब्रेसिया, बर्गामो और ट्यूरिन जैसे शहरों में भी प्रदर्शनों के दौरान झड़पें हुईं। शनिवार को हुई घटनाओं के सिलसिले में इन इलाकों में 28 प्रदर्शनकारियों की गिरफ्तारी की जानकारी भी सामने आई थी। लगातार सामने आ रही घटनाओं के बाद सरकार सार्वजनिक सुरक्षा बनाए रखने और हिंसा पर अंकुश लगाने के लिए अतिरिक्त कदम उठाने की तैयारी कर रही है।

  • Pakistan: ईशनिंदा के आरोप के बाद भड़की हिंसा… डर के मारे 35 से ज्यादा ईसाई परिवारों ने छोड़ा गांव

    Pakistan: ईशनिंदा के आरोप के बाद भड़की हिंसा… डर के मारे 35 से ज्यादा ईसाई परिवारों ने छोड़ा गांव


    इस्लामाबाद।
    पाकिस्तान (Pakistan) के पंजाब प्रांत (Punjab Province) में एक ईसाई व्यक्ति पर ईशनिंदा का आरोप लगने के बाद मुस्लिम भीड़ ने उसके घर और दुकान में आग लगा दी. घटना के बाद हिंसा (Violence) की आशंका से 35 से ज्यादा ईसाई परिवारों (Christian families) को अपना घर छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा. इस्लामाबाद में 16 अक्टूबर को एक रिपोर्ट के मुताबिक, यह घटना पंजाब के घड़ियाल कलां गांव की है, जहां 40 वर्षीय ईसाई व्यक्ति कामरान मसीह एक छोटी फार्मेसी चलाते हैं।

    रिपोर्ट के अनुसार, घटना से एक दिन पहले पुलिस ने कामरान मसीह को गिरफ्तार किया था. स्थानीय मुसलमानों ने उन पर व्हाट्सऐप ग्रुप में ईशनिंदा से जुड़ा वीडियो साझा करने का आरोप लगाया था. ‘क्रिश्चियन डेली इंटरनेशनल-मॉर्निंग स्टार न्यूज’ ने एक सूत्र के हवाले से बताया कि मसीह की गिरफ्तारी की खबर फैलते ही उनके परिवार और गांव के अन्य ईसाई परिवार भीड़ के हमले के डर से घर छोड़कर भागने लगे. सूत्र के मुताबिक, कई मुसलमान मसीह की दुकान और घर के पास इकट्ठा हुए, विरोध प्रदर्शन किया और दोनों इमारतों में आग लगा दी।


    पाकिस्तान के ईशनिंदा कानूनों पर उठे सवाल

    ‘क्रिश्चियन डेली इंटरनेशनल’ की रिपोर्ट के मुताबिक, मानवाधिकार संगठनों और कानूनी विशेषज्ञों ने पाकिस्तान के ईशनिंदा कानूनों की आलोचना की है. उनका कहना है कि इन कानूनों का इस्तेमाल निजी विवादों और दूसरे झगड़ों में किया जा सकता है, जिसका सबसे बुरा असर धार्मिक अल्पसंख्यकों पर पड़ता है. 22 जुलाई को एक प्रमुख अल्पसंख्यक समूह ने पाकिस्तान पर इन कानूनों के दुरुपयोग को रोकने में विफल रहने का आरोप लगाया था. समूह ने झूठे आरोपों, आरोपियों के खिलाफ भीड़ की हिंसा और अल्पसंख्यकों को ऐसी घटनाओं के नतीजों से बचाने में नाकामी का मुद्दा उठाया।


    मानवाधिकार संगठन ने न्याय व्यवस्था पर उठाए सवाल

    ‘वॉयस ऑफ पाकिस्तान माइनॉरिटी’ (वीओपीएम) के अनुसार, पाकिस्तान में ईशनिंदा कानून सबसे विवादास्पद मुद्दों में से एक हैं. संगठन का कहना है कि इनका धार्मिक अल्पसंख्यकों पर गहरा असर पड़ता है और सरकारी संस्थाएं इनके दुरुपयोग को रोकने में लगातार विफल रही हैं. वीओपीएम ने कहा कि पाकिस्तान की न्याय व्यवस्था की सबसे बड़ी विफलताओं में से एक यह है कि वह निर्दोष लोगों को झूठे आरोपों से बचाने में सक्षम नहीं रही है. संगठन ने यह भी आरोप लगाया कि न्यायपालिका और कानून लागू करने वाली एजेंसियां ईशनिंदा के आरोपों का दुरुपयोग करने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने में विफल रही हैं. उसके मुताबिक, झूठे आरोप लगाने वालों को जवाबदेह नहीं ठहराए जाने से ऐसा संदेश जाता है कि इस तरह की हरकतें बिना किसी परिणाम के जारी रह सकती हैं. इससे कानूनी व्यवस्था में जनता का भरोसा कमजोर होता है।


    रिमशा मसीह का मामला भी उठाया

    वीओपीएम ने डाउन सिंड्रोम से पीड़ित पाकिस्तानी ईसाई लड़की रिमशा मसीह के मामले का भी जिक्र किया. उस पर कुरान के अपमान का आरोप लगाया गया था, लेकिन बाद में सामने आए सबूतों से आरोप गढ़े जाने की बात सामने आई. रिमशा को बाद में रिहा कर दिया गया, लेकिन मानवाधिकार संगठन के मुताबिक, तब तक उसके परिवार को भारी दबाव का सामना करना पड़ा था. संगठन का कहना है कि यह मामला दिखाता है कि अदालत में तथ्यों की जांच होने से पहले ही कोई व्यक्ति ईशनिंदा जैसे गंभीर आरोपों का शिकार बन सकता है।

    रिपोर्ट में मानवाधिकार संगठनों ने पाकिस्तान में ईशनिंदा के आरोपों से जुड़े मामलों में निष्पक्ष जांच, झूठे आरोप लगाने वालों की जवाबदेही और धार्मिक अल्पसंख्यकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की जरूरत पर जोर दिया है।

  • लद्दाख हिंसा की बरसी पर सोनम वांगचुक ने जताया एनकाउंटर का डर, मांगा अमित शाह का इस्तीफा

    लद्दाख हिंसा की बरसी पर सोनम वांगचुक ने जताया एनकाउंटर का डर, मांगा अमित शाह का इस्तीफा

    नई दिल्ली । लद्दाख में पिछले साल हुई लेह हिंसा की पहली बरसी पर जलवायु कार्यकर्ता सोनम वांगचुक ने अपनी सुरक्षा को लेकर गंभीर आशंका जताई। उन्होंने कहा कि सरकार के खिलाफ आवाज उठाने के कारण उन्हें मुठभेड़ में मारे जाने का डर है। वांगचुक ने इस दौरान केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के इस्तीफे की मांग करते हुए 24 सितंबर 2025 की हिंसा के लिए जवाबदेही तय करने पर जोर दिया।

    लेह में हिंसा की पहली बरसी के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम में वांगचुक ने कहा कि उन्हें अपनी जान को लेकर चेतावनियां मिली हैं। उनका कहना था कि यदि देश और समाज को किसी मुद्दे पर जागरूक करने के लिए उन्हें किसी भी तरह के परिणाम का सामना करना पड़े, तो वह उसके लिए तैयार हैं। उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें जेल भेजे जाने के बाद अब उनके साथ मुठभेड़ होने की आशंका भी जताई जा रही है।

    वांगचुक ने पिछले साल की घटना की न्यायिक जांच रिपोर्ट सार्वजनिक करने की मांग की। उन्होंने कहा कि यदि रिपोर्ट सामने नहीं लाई जाती है तो पुलिस कार्रवाई और गोलीबारी की परिस्थितियों की जांच के लिए स्वतंत्र जन न्यायाधिकरण गठित करने की दिशा में कदम उठाया जाएगा। उनका कहना था कि घटना में हुई मौतों के लिए जिम्मेदारी तय होना जरूरी है।

    24 सितंबर 2025 को लेह में गंभीर कानून-व्यवस्था की स्थिति के बाद पुलिस कार्रवाई में चार लोगों की मौत हुई थी। केंद्र सरकार ने घटना की परिस्थितियों, पुलिस कार्रवाई और चार लोगों की मौत के कारणों की जांच के लिए पूर्व सुप्रीम कोर्ट न्यायाधीश न्यायमूर्ति बीएस चौहान की अध्यक्षता में न्यायिक जांच गठित की थी। वांगचुक ने जांच रिपोर्ट को सार्वजनिक करने और घटना के लिए जवाबदेही तय करने की मांग दोहराई।

    वांगचुक ने कार्यक्रम के दौरान गृह मंत्री अमित शाह के इस्तीफे की मांग दोहराई। उन्होंने आरोप लगाया कि पिछले साल के प्रदर्शन के दौरान सुरक्षा बलों ने स्थानीय युवाओं पर स्वचालित हथियारों का इस्तेमाल किया और बाद में प्रदर्शनकारियों को राष्ट्रविरोधी बताया गया। उन्होंने कहा कि घटना में मारे गए लोगों को गोली लगी थी और इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच जरूरी है। ये आरोप वांगचुक द्वारा लगाए गए हैं।

    उन्होंने दिल्ली में छात्रों के खिलाफ पुलिस कार्रवाई के मुद्दे पर कांग्रेस नेता राहुल गांधी द्वारा गृह मंत्री के इस्तीफे की मांग का भी उल्लेख किया। वांगचुक ने उस मांग का समर्थन करते हुए सवाल उठाया कि लद्दाख में हुई हिंसा और चार लोगों की मौत के मामले में भी समान रूप से जवाबदेही की मांग क्यों नहीं की गई।

    हिंसा की पहली बरसी पर लेह और लद्दाख के कई हिस्सों में बंद का असर दिखाई दिया। लेह और कारगिल में दुकानें तथा कारोबारी प्रतिष्ठान बंद रहे और सड़कों पर सामान्य दिनों की तुलना में कम आवाजाही रही। कुछ लोगों ने 24 सितंबर को मृतकों की याद में शहीद दिवस के रूप में मनाया।

    वांगचुक ने यह भी कहा कि बरसी के कार्यक्रम में अपेक्षाकृत कम लोगों की मौजूदगी को आंदोलन की हार नहीं माना जाना चाहिए। उनके मुताबिक सुरक्षा व्यवस्था और प्रतिबंधों के बीच भी लोगों ने पिछले साल की घटना में मारे गए चार लोगों को याद किया और न्याय तथा जवाबदेही की मांग को सामने रखा। लद्दाख में राज्य का दर्जा और संविधान की छठी अनुसूची के तहत सुरक्षा की मांग को लेकर आंदोलन का मुद्दा भी इस पूरे घटनाक्रम के केंद्र में बना हुआ है।

  • CID पूछताछ के बाद TMC विधायक परेश राम दास की तबीयत बिगड़ी, सीने में दर्द के बाद अस्पताल में भर्ती

    CID पूछताछ के बाद TMC विधायक परेश राम दास की तबीयत बिगड़ी, सीने में दर्द के बाद अस्पताल में भर्ती

    नई दिल्ली ।पश्चिम बंगाल में 2023 के पंचायत चुनाव के दौरान हुई हिंसा से जुड़े एक मामले में पूछताछ के लिए पहुंचे तृणमूल कांग्रेस विधायक परेश राम दास की सोमवार को अचानक तबीयत बिगड़ गई। करीब पांच घंटे तक चली पूछताछ के दौरान उन्होंने सीने में दर्द और सांस लेने में परेशानी की शिकायत की। इसके बाद उन्हें कोलकाता के एसएसकेएम अस्पताल में भर्ती कराया गया।

    परेश राम दास दक्षिण 24 परगना जिले की कैनिंग पश्चिम विधानसभा सीट से विधायक हैं। उन्हें पंचायत चुनाव के दौरान हुई हिंसा से संबंधित मामले की जांच के सिलसिले में पूछताछ के लिए बुलाया गया था। विधायक सोमवार सुबह करीब 11 बजे भवानी भवन स्थित जांच कार्यालय पहुंचे थे।

    पूछताछ के दौरान शाम करीब चार बजे उन्होंने अपनी तबीयत खराब होने की जानकारी दी। सीने में दर्द और सांस लेने में परेशानी की शिकायत के बाद उन्हें अस्पताल ले जाने की व्यवस्था की गई। अस्पताल पहुंचने पर उनका इलाज शुरू किया गया और डॉक्टरों ने उन्हें निगरानी में रखा।

    इस मामले में विधायक को इससे पहले भी पूछताछ के लिए तलब किया जा चुका है। जांच 2023 के पंचायत चुनाव के दौरान कैनिंग इलाके में हुई हिंसा और उससे जुड़े आरोपों पर केंद्रित है। इसी सिलसिले में विधायक से मामले से संबंधित जानकारी और घटनाक्रम को लेकर सवाल किए जा रहे थे।

    पूछताछ के लिए पहुंचने से पहले विधायक ने सोशल मीडिया पर एक संदेश भी पोस्ट किया था। इसमें उन्होंने कैनिंग को अलविदा कहने और दोबारा मिलने तथा बातचीत करने की बात कही थी। उनके इस संदेश को लेकर समर्थकों के बीच भी चर्चा हुई।

    परेश राम दास के करीबी लोगों के अनुसार, वह पहले स्वास्थ्य संबंधी परेशानी के कारण इलाज करा चुके हैं। हाल ही में वह इलाज के लिए चेन्नई भी गए थे। सोमवार को जांच के लिए पहुंचते समय उनके पास इनहेलर भी मौजूद था।

    पंचायत चुनाव के दौरान पश्चिम बंगाल के कई इलाकों में हिंसा की घटनाएं सामने आई थीं। कैनिंग क्षेत्र से जुड़े मामले की जांच के दौरान कई लोगों से पूछताछ की गई है। विधायक से भी इसी जांच के तहत पूछताछ की जा रही थी।

    करीब पांच घंटे तक चली पूछताछ के बाद अचानक तबीयत बिगड़ने से जांच की प्रक्रिया प्रभावित हुई। अब आगे की पूछताछ और जांच से संबंधित कार्रवाई विधायक की स्वास्थ्य स्थिति को देखते हुए तय की जा सकती है।

    फिलहाल परेश राम दास अस्पताल में चिकित्सकीय निगरानी में हैं। उनकी तबीयत को लेकर डॉक्टरों की निगरानी जारी है। मामले में जांच एजेंसी की ओर से आगे की कार्रवाई स्वास्थ्य स्थिति और जांच की जरूरत के अनुसार की जाएगी।

  • महिला समानता दिवस पर सोमी अली ने कहा, सिर्फ चर्चा से नहीं सिस्टम और सोच बदलने से महिलाओं को वास्तविक बराबरी मिलेगी

    महिला समानता दिवस पर सोमी अली ने कहा, सिर्फ चर्चा से नहीं सिस्टम और सोच बदलने से महिलाओं को वास्तविक बराबरी मिलेगी

    नई दिल्ली । महिला समानता दिवस के अवसर पर अभिनेत्री और सामाजिक कार्यकर्ता सोमी अली ने महिलाओं की वास्तविक स्थिति और समानता को लेकर अपने विचार साझा किए। करीब दो दशक से महिलाओं के साथ काम करने के दौरान हिंसा और असुरक्षा झेल रही महिलाओं के अनुभवों को करीब से देखने वाली सोमी अली का कहना है कि केवल बराबरी की बातें करने से बदलाव नहीं आएगा। इसके लिए व्यवस्था, सामाजिक सोच और संस्थागत प्रतिक्रिया में ठोस परिवर्तन जरूरी है।

    सोमी अली के अनुसार महिलाओं के मुद्दों पर पहले की तुलना में अधिक बातचीत हो रही है और यह सकारात्मक बदलाव है। लंबे समय तक महिलाओं का चुप रहना सामान्य माना जाता था, जबकि कई मामलों में यही चुप्पी अत्याचार करने वालों को बचाती रही। हालांकि, उनका मानना है कि आवाज उठाने के बाद वास्तविक बदलाव तभी माना जाएगा जब अदालतों, पुलिस, परिवारों और सामाजिक व्यवस्था की प्रतिक्रिया भी बदले।

    उन्होंने विशेष रूप से उन महिलाओं की स्थिति पर चिंता जताई जो तत्काल खतरे में होती हैं। उनके मुताबिक ऐसी महिलाओं को सहायता मिलने में अक्सर समय लग जाता है। सुरक्षा आदेश, आश्रय और कानूनी प्रक्रिया जैसी व्यवस्थाओं के बीच महिला को कई बार उसी परिस्थिति में रहना पड़ता है जहां उसकी सुरक्षा को खतरा बना रहता है। सोमी अली का कहना है कि सबसे जरूरी व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए जिससे गंभीर खतरे में मौजूद महिला को जल्द सुरक्षित स्थान मिल सके।

    महिला सशक्तीकरण के लिए आर्थिक स्वतंत्रता, शिक्षा और कानूनी सहायता को भी उन्होंने महत्वपूर्ण माना। लेकिन उनके मुताबिक इन सुविधाओं के साथ आत्मविश्वास भी जरूरी है। कई महिलाएं संसाधन उपलब्ध होने के बावजूद डर, सामाजिक दबाव या दूसरों की स्वीकृति की आवश्यकता के कारण अपने फैसले लेने में कठिनाई महसूस करती हैं। इसके विपरीत कुछ महिलाओं ने सीमित संसाधनों के बावजूद अपने लिए सुरक्षित और स्वतंत्र जीवन का रास्ता चुना है।

    सोमी अली ने समानता की बहस में संतुलित दृष्टिकोण की आवश्यकता पर भी जोर दिया। उनका कहना है कि महिला समानता का अर्थ हर परिस्थिति में महिला को सही और पुरुष को गलत मान लेना नहीं है। उनके अनुभव में महिलाओं के साथ गंभीर अत्याचार के मामले वास्तविक हैं, लेकिन किसी भी पक्ष को बिना तथ्य के हमेशा सही मान लेना न्याय की भावना के अनुरूप नहीं है।

    उन्होंने कहा कि समाज में महिलाओं और पुरुषों दोनों को इंसान के रूप में देखा जाना चाहिए, जिनके व्यवहार और परिस्थितियां अलग-अलग हो सकती हैं। उनके अनुसार वास्तविक समानता का आधार किसी एक पक्ष का समर्थन करना नहीं, बल्कि तथ्य और सच के आधार पर न्याय सुनिश्चित करना होना चाहिए।

    सोमी अली ने यह भी कहा कि झूठे आरोपों की स्थिति उन महिलाओं के लिए भी नुकसानदेह हो सकती है जो वास्तव में हिंसा का सामना कर रही हैं। इससे वास्तविक पीड़ितों की शिकायतों पर संदेह बढ़ सकता है और न्याय पाने की प्रक्रिया कठिन हो सकती है। इसलिए उनका जोर इस बात पर है कि कमजोर और जरूरतमंद व्यक्ति की सुरक्षा हो, लेकिन गलत को केवल किसी पक्ष के आधार पर सही न ठहराया जाए।

    महिला समानता दिवस पर उनका संदेश महिलाओं की सुरक्षा और अधिकारों के साथ जिम्मेदारी तथा निष्पक्षता को जोड़ता है। उनके मुताबिक बदलाव तभी सार्थक होगा जब महिलाओं को अपनी बात कहने का भरोसा मिले, खतरे के समय व्यवस्था तेजी से काम करे और समाज समानता को केवल चर्चा का विषय न रखकर व्यवहार और संस्थागत व्यवस्था का हिस्सा बनाए।

  • Thailand के 3 प्रांतों में अलग शासन की मांग…. रातभर हुई हिंसा…. PM ने बुलाई आपात बैठक

    Thailand के 3 प्रांतों में अलग शासन की मांग…. रातभर हुई हिंसा…. PM ने बुलाई आपात बैठक


    बैंकाक।
    थाईलैंड (Thailand) के प्रधानमंत्री अनुतिन चार्नविराकुल (Prime Minister Anutin Charnvirakul) ने रविवार को वरिष्ठ सुरक्षा अधिकारियों के साथ आपात बैठक की। देश के उत्तर में पहले से ही बाढ़ का संकट बना हुआ है। इसी बीच, दक्षिण के तीन प्रांतों में रातभर एक साथ हिंसा हुई। इन इलाकों में कुछ मुस्लिम विद्रोही संगठन (Muslim Insurgent Organization) सरकार के खिलाफ लड़ रहे हैं और अपने इलाके के लिए अलग शासन की मांग कर रहे हैं।


    पीएम अनुतिन ने क्यों बुलाई गई बैठक?

    अनुतिन के उत्तर की ओर रवाना होने से कुछ समय पहले यह बैठक हुई। उन्हें बुरी तरह बाढ़ प्रभावित नान प्रांत का जायजा लेना था। बैठक शनिवार रात दक्षिण के सबसे आखिरी तीन प्रांतों में हुई 51 घटनाओं के बाद बुलाई गई। इनमें नाराथिवाट, पट्टानी और याला शामिल हैं।

    हमलावरों का सेना या पुलिस से कोई सामना नहीं हुआ। अब तक सिर्फ तीन नागरिकों के घायल होने की जानकारी है। रविवार को बताया गया कि तीनों की हालत में सुधार हो रहा है।

    हिंसा में मुख्य रूप से छोटे बमों का इस्तेमाल हुआ। आगजनी की गई। संपत्तियों को भी नुकसान पहुंचाया गया। सबसे बड़ा निशाना पट्टानी का 7-इलेवन स्टोर था। सोशल मीडिया पर चल रहे एक वीडियो में हथियारबंद लोग स्टोर के बाहर घूमते दिखे। ग्राहक और कर्मचारी वहां से भागते नजर आए। इसके बाद स्टोर में आग लगा दी गई।

    नाराथिवाट में एक बम से रेल की पटरियां क्षतिग्रस्त हो गईं। इसके कारण स्थानीय और लंबी दूरी की रेल सेवाएं रोकनी पड़ीं। सुरक्षा की स्थिति साफ नहीं होने के कारण यह पता नहीं चल पाया कि सेवाएं कब फिर शुरू होंगी। ऐसी घटनाओं में अक्सर तुरंत किसी संगठन पर सार्वजनिक रूप से आरोप नहीं लगाया जाता। इस बार भी किसी संगठन ने तुरंत हमलों की जिम्मेदारी नहीं ली।


    हमलों के पीछे बीआरएन को क्यों माना जा रहा है?

    हालांकि, आमतौर पर माना जाता है कि ऐसे हमले बारिसान रिवोलुसी नेशनल मेलायु पटानी यानी बीआरएन करता है। यह दक्षिण का प्रमुख विद्रोही संगठन है। उसके पास ऐसी कार्रवाई करने के लिए संगठन और समर्थन दोनों हैं। यही वह संगठन है, जिसके साथ थाई सरकार समय-समय पर शांति वार्ता करती रही है।

    थाईलैंड में ज्यादातर लोग बौद्ध हैं। लेकिन इसके तीन सबसे दक्षिणी प्रांतों में मुस्लिम आबादी बहुमत में है। बीआरएन ने कहा है कि वह इन प्रांतों के लिए खुद शासन की व्यवस्था चाहता है। मुस्लिम लोग लंबे समय से शिकायत करते रहे हैं कि थाईलैंड में उनके साथ दूसरे दर्जे के नागरिकों जैसा व्यवहार होता है। अलगाववादी आंदोलन भी कई दशकों से समय-समय पर सक्रिय रहे हैं।


    22 साल में 7,837 लोगों की मौत?

    2004 में विद्रोही हिंसा अचानक काफी बढ़ गई थी। इसके जवाब में सरकार ने सख्त कार्रवाई की। इससे लोगों में असंतोष और बढ़ गया। पट्टानी में प्रिंस ऑफ सोंगकला यूनिवर्सिटी के परिसर से जुड़े थिंक टैंक डीप साउथ वॉच के मुताबिक, पिछले 22 साल में इस हिंसा में 7,837 लोगों की मौत हुई है।

    इस हिंसा में पिछली बड़ी घटना जुलाई में हुई थी। उस समय करीब 10 हमलावरों ने नाराथिवाट में एक सुरक्षा चौकी पर सैनिकों पर गोलियां चलाईं। उन्होंने सैनिकों पर पाइप बम भी फेंके। इस हमले में अर्धसैनिक बल के पांच सैनिक मारे गए। छह नागरिक घायल हुए। इनमें 10 साल का एक लड़का भी शामिल था।