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  • बंगाल में अपने ही मंत्री पर भड़के BJP विधायक, बोले- हत्या के आरोपियों के साथ मंच साझा करना शर्मनाक

    बंगाल में अपने ही मंत्री पर भड़के BJP विधायक, बोले- हत्या के आरोपियों के साथ मंच साझा करना शर्मनाक


    कोलकाता। पश्चिम बंगाल में भाजपा के भीतर 2020 में हुई पार्टी नेता मनीष शुक्ला की हत्या का मामला एक बार फिर चर्चा में है। बैरकपुर से भाजपा विधायक कौस्तुव बागची ने अपनी ही पार्टी के श्रम एवं परिवहन मंत्री अर्जुन सिंह पर सवाल उठाए हैं। बागची ने कुछ तस्वीरों और वीडियो का हवाला देते हुए पूछा कि मनीष शुक्ला हत्याकांड में जिन लोगों के नाम सामने आए थे, उनके साथ पार्टी के वरिष्ठ नेता मंच कैसे साझा कर सकते हैं। उन्होंने इस मामले में कानूनी कार्रवाई की तैयारी की बात भी कही है।

    2020 में हुई थी मनीष शुक्ला की हत्या
    भाजपा नेता मनीष शुक्ला की 4 अक्टूबर 2020 को टीटागढ़ में भाजपा कार्यालय के बाहर गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। इस मामले की जांच सीआईडी ने की थी और कई लोगों को गिरफ्तार किया गया था। अब कौस्तुव बागची ने पूर्व तृणमूल कांग्रेस नेताओं उत्तम दास और प्रशांत चौधरी के साथ अर्जुन सिंह की मौजूदगी पर आपत्ति जताई है।

    बागची का दावा है कि मनीष शुक्ला के पिता ने हत्या के मामले में इन दोनों के नाम आरोपियों के तौर पर लिए थे। उनके मुताबिक, ऐसे लोगों के साथ पार्टी नेताओं की तस्वीरें सामने आने से उन्हें अपने विधानसभा क्षेत्र में लोगों के सवालों का सामना करना पड़ रहा है। हालांकि, किसी व्यक्ति का नाम मामले में आने और अदालत में दोष सिद्ध होने के बीच अंतर है।

    अर्जुन सिंह से निजी नाराजगी नहीं, लेकिन साथ मंच साझा करने पर आपत्ति
    कौस्तुव बागची ने कहा कि अर्जुन सिंह पार्टी के वरिष्ठ नेता हैं और उनसे उनकी कोई व्यक्तिगत नाराजगी नहीं है। उनकी आपत्ति उन लोगों के साथ मंच साझा करने को लेकर है, जिनके नाम मनीष शुक्ला हत्याकांड में सामने आने का दावा किया जा रहा है।

    बागची ने कहा कि वह इस मामले को आगे बढ़ाने के लिए कानूनी कदम उठाने की तैयारी कर रहे हैं। उन्होंने मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी, मुख्य सचिव, सीआईडी के महानिदेशक और बैरकपुर पुलिस कमिश्नर को पत्र लिखने की बात कही है।

    BJP में शामिल करने का भी कर रहे विरोध
    बागची ने उत्तम दास और प्रशांत चौधरी को भाजपा में शामिल किए जाने का भी विरोध किया। उन्होंने चेतावनी दी कि जरूरत पड़ने पर वह भाजपा के प्रदेश मुख्यालय के सामने खुद को आग लगा लेंगे। इससे पहले भी उन्होंने इस मुद्दे पर सिर मुंडवाकर विरोध जताने की बात कही थी।

    उनके बयान से पार्टी के भीतर इस मुद्दे पर मतभेद खुलकर सामने आए हैं। हालांकि, दोनों व्यक्तियों की भाजपा में औपचारिक सदस्यता को लेकर स्थिति स्पष्ट करने के लिए पार्टी की आधिकारिक प्रतिक्रिया जरूरी होगी।

    अर्जुन सिंह और उत्तम दास ने क्या कहा?
    अर्जुन सिंह ने बागची के आरोपों को ज्यादा महत्व नहीं दिया। उन्होंने कहा, “मुझे पता है कि राजनीति कैसे करनी है।” वहीं, उत्तम दास ने मंत्री के साथ अपनी मौजूदगी को निजी संबंधों से जुड़ा बताया। उन्होंने कहा कि वह काफी समय पहले तृणमूल कांग्रेस से अलग हो चुके हैं और उन्होंने भाजपा में शामिल होने की इच्छा नहीं जताई है।

    TMC ने भी BJP पर साधा निशाना
    इस विवाद पर तृणमूल कांग्रेस के नेता कुणाल घोष ने भी भाजपा पर हमला बोला। उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा सार्वजनिक रूप से तृणमूल कांग्रेस के नेताओं को पार्टी में शामिल नहीं करने की बात करती है, लेकिन व्यवहार में ऐसा नहीं करती।

    इस तरह मनीष शुक्ला हत्याकांड को लेकर भाजपा के भीतर उठे सवालों ने बंगाल की राजनीति में नया विवाद खड़ा कर दिया है। अब इस मामले में संबंधित नेताओं की आगे की प्रतिक्रिया और बागची की प्रस्तावित कानूनी कार्रवाई पर नजर रहेगी।

  • दुर्गा पूजा के बीच सिलीगुड़ी में लगे पोस्टर, मांस और बिरयानी हिंदू दुकानदारों से खरीदने की अपील पर विवाद

    दुर्गा पूजा के बीच सिलीगुड़ी में लगे पोस्टर, मांस और बिरयानी हिंदू दुकानदारों से खरीदने की अपील पर विवाद


    नई दिल्ली:
    पश्चिम बंगाल के सिलीगुड़ी में दुर्गा पूजा के बीच मांस, बिरयानी और पूजा से जुड़ी सामग्री हिंदू दुकानदारों से खरीदने की अपील वाले पोस्टर लगाए जाने के बाद विवाद खड़ा हो गया है। शहर के कई इलाकों में दिखाई दिए इन पोस्टरों में लोगों से कहा गया है कि बिरयानी खाने पर कोई रोक नहीं है, लेकिन इसे हिंदू दुकानदारों से ही खरीदा जाए। इसी तरह मांस और पूजा की सामग्री भी हिंदू व्यापारियों से खरीदने की अपील की गई है। इन संदेशों ने त्योहार के दौरान धार्मिक पहचान, कारोबार और सामाजिक सौहार्द को लेकर बहस तेज कर दी है।

    ये पोस्टर सिलीगुड़ी के भारत नगर सहित कई स्थानों पर लगाए गए हैं। कुछ पोस्टर तरुण तीर्थ क्लब के दुर्गा पूजा आयोजन स्थल के आसपास की दीवारों पर भी दिखाई दिए। इन संदेशों में लोगों से हिंदू व्यापारियों का समर्थन करने और समुदाय के कारोबार को बढ़ावा देने की अपील की गई है। पोस्टर लगाने की जिम्मेदारी हिंदू जागरण मंच ने ली है। संगठन का कहना है कि इस अभियान का उद्देश्य हिंदुओं में एकता की भावना को मजबूत करना और त्योहार के दौरान हिंदू दुकानदारों को आर्थिक लाभ पहुंचाना है। संगठन के प्रतिनिधियों ने स्पष्ट किया है कि ये संदेश किसी तरह का आदेश नहीं, बल्कि लोगों से की गई अपील हैं।

    हिंदू जागरण मंच के प्रतिनिधि अभिषेक दास के अनुसार, पोस्टर केवल भारत नगर तक सीमित नहीं हैं, बल्कि शहर के विभिन्न दुर्गा पूजा पंडालों के आसपास भी लगाए गए हैं। संगठन इन संदेशों के जरिए हिंदू एकता का विचार सामने रखना चाहता है। मंच से जुड़े लोगों का तर्क है कि दुर्गा पूजा के दौरान बड़ी संख्या में लोग खरीदारी करते हैं और इस आर्थिक गतिविधि का लाभ हिंदू व्यापारियों को भी मिलना चाहिए। पोस्टरों में मांस और बिरयानी की दुकानों के अलावा पूजा सामग्री बेचने वाले कारोबारियों का भी उल्लेख किया गया है। इस तरह धार्मिक पहचान को खरीदारी के विकल्प से जोड़ने की कोशिश की गई है।

    हालांकि, इस अभियान को लेकर राजनीतिक विरोध भी सामने आया है। सिलीगुड़ी के पूर्व महापौर और वामपंथी नेता अशोक भट्टाचार्य ने पोस्टरों की आलोचना करते हुए आरोप लगाया कि इस तरह के संदेश समाज में धर्म के आधार पर विभाजन को बढ़ावा दे सकते हैं। उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भारतीय जनता पार्टी से जुड़े संगठनों पर धार्मिक पहचान के आधार पर लोगों के बीच दूरी पैदा करने का आरोप लगाया। उनके अनुसार, भारत जैसे धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक देश में इस प्रकार के अभियान पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए। विरोध करने वाले नेताओं का कहना है कि दुर्गा पूजा बंगाल की सांस्कृतिक परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा है और इस दौरान सामाजिक सद्भाव बनाए रखना जरूरी है।

    इस विवाद के बीच पश्चिम बंगाल के पर्यटन मंत्री और सिलीगुड़ी के विधायक शंकर घोष ने कहा कि उन्हें जानकारी नहीं है कि उनके आवास के पास पूजा स्थल के आसपास पोस्टर किसने लगाए हैं। उन्होंने कहा कि पोस्टर लगाने वाले ही उनके उद्देश्य के बारे में बता सकते हैं। इस बयान के बाद भी पोस्टर अभियान को लेकर चर्चा जारी है। एक ओर संगठन इसे हिंदू व्यापारियों को प्रोत्साहित करने और समुदाय के भीतर एकजुटता बढ़ाने का प्रयास बता रहा है, वहीं आलोचक इसे धार्मिक पहचान के आधार पर खरीदारी को प्रभावित करने वाला कदम मान रहे हैं। दुर्गा पूजा के दौरान सामने आया यह मामला अब व्यापारिक हितों, व्यक्तिगत पसंद और बंगाल की सामाजिक परंपराओं से जुड़ी बहस का विषय बन गया है।

  • पश्चिम बंगाल का नाम बदलने की तैयारी, सरकार विधानसभा में लाएगी बिल

    पश्चिम बंगाल का नाम बदलने की तैयारी, सरकार विधानसभा में लाएगी बिल


    नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल का नाम बदलकर ‘पश्चिम बंग’ करने की तैयारी फिर तेज हो गई है। प्रदेश भाजपा अध्यक्ष समिक भट्टाचार्य ने कहा है कि राज्य सरकार जल्द विधानसभा में नाम परिवर्तन से जुड़ा विधेयक पेश करेगी। उन्होंने संकेत दिया कि यह बिल अगले विधानसभा सत्र में लाया जा सकता है।

    समिक भट्टाचार्य ने सोमवार को प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि राज्य का नाम ‘बंगाल’ या ‘वेस्ट बंगाल’ रखने के बजाय ‘पश्चिम बंग’ किया जाएगा। उनके मुताबिक, इस नाम का उद्देश्य राज्य को उसके इतिहास और पहचान से जोड़ना है। उन्होंने कहा कि सरकार जल्द इस दिशा में विधायी प्रक्रिया शुरू करेगी।

    वाराणसी में बनेगा ‘पश्चिम बंग भवन’
    समिक भट्टाचार्य ने वाराणसी में ‘पश्चिम बंग भवन’ बनाने की योजना की भी जानकारी दी। उनके मुताबिक, यह भवन राज्य के संस्कृति और पर्यटन विभाग, केंद्र सरकार तथा कूचबिहार के पूर्व राजपरिवार के वंशजों के सहयोग से तैयार किया जाएगा।

    यह भवन केवल सांस्कृतिक केंद्र के तौर पर ही नहीं, बल्कि बंगाल से वाराणसी आने वाले पर्यटकों और श्रद्धालुओं के ठहरने के लिए भी उपयोग किया जाएगा। प्रस्ताव में सांस्कृतिक गतिविधियों के साथ अन्य सुविधाएं विकसित करने की बात कही गई है।

    भाजपा नेता ने वाराणसी और बंगाल के बीच पुराने सांस्कृतिक और आध्यात्मिक संबंधों का भी उल्लेख किया। उन्होंने कूचबिहार के राजपरिवार से जुड़े इतिहास का जिक्र करते हुए कहा कि राजपरिवार ने 1836 में बनारस कालीबाड़ी की आधारशिला रखी थी और इसके बाद वहां दो मंदिरों का निर्माण कराया गया था।

    पहले भी कई बार उठा है नाम बदलने का मुद्दा
    पश्चिम बंगाल का नाम बदलने का मुद्दा नया नहीं है। 1999 में ज्योति बसु के नेतृत्व वाली वाम मोर्चा सरकार ने राज्य का नाम ‘पश्चिम बंग’ करने का प्रस्ताव विधानसभा में रखा था। बाद में ‘बांग्ला’ नाम को लेकर भी चर्चा हुई और प्रस्ताव केंद्र को भेजा गया, लेकिन राजनीतिक सहमति और केंद्र की मंजूरी नहीं मिलने के कारण प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ सकी।

    2011 में तृणमूल कांग्रेस के सत्ता में आने के बाद यह मुद्दा दोबारा उठा। ममता बनर्जी सरकार ने भी ‘पश्चिम बंग’ नाम का प्रस्ताव रखा था। उस समय यह तर्क दिया गया था कि अंग्रेजी वर्णमाला के क्रम में राज्य का नाम काफी नीचे आने के कारण राष्ट्रीय बैठकों में पश्चिम बंगाल के प्रतिनिधियों को अपनी बारी के लिए लंबे समय तक इंतजार करना पड़ता है। सर्वदलीय बैठक में प्रस्ताव का समर्थन भी हुआ, लेकिन केंद्र की मंजूरी नहीं मिली।

    इसके बाद 2016 में नाम बदलने की प्रक्रिया फिर शुरू हुई। उस समय बंगाली में ‘बांग्ला’, अंग्रेजी में ‘बंगाल’ और हिंदी में ‘बंगाल’ नाम रखने का प्रस्ताव सामने आया। वर्ष 2018 में विधानसभा ने सर्वसम्मति से राज्य का नाम केवल ‘बांग्ला’ रखने का प्रस्ताव पारित किया था।

    हालांकि, केंद्र सरकार ने इस प्रस्ताव को मंजूरी नहीं दी। नाम परिवर्तन के लिए संवैधानिक प्रक्रिया का पालन जरूरी होने की बात सामने आई। साथ ही भाजपा के एक वर्ग ने ‘बांग्ला’ नाम की ‘बांग्लादेश’ से समानता को लेकर भी आपत्ति जताई थी।

    अब आगे क्या होगा?
    समिक भट्टाचार्य ने अब एक बार फिर ‘पश्चिम बंग’ नाम का प्रस्ताव सामने रखा है। हालांकि, केवल राज्य विधानसभा में विधेयक पेश और पारित होने से नाम तुरंत नहीं बदलेगा। राज्य का नाम बदलने के लिए संवैधानिक प्रक्रिया के तहत आगे केंद्र और संसद की भूमिका भी होगी। मौजूदा रिपोर्टों के अनुसार, प्रस्ताव को विधानसभा स्तर से आगे बढ़कर केंद्र की प्रक्रिया और संसद की मंजूरी से गुजरना होगा। इसलिए फिलहाल पश्चिम बंगाल का आधिकारिक नाम ‘पश्चिम बंग’ नहीं हुआ है; यह नाम बदलने की प्रस्तावित प्रक्रिया का हिस्सा है।

  • 2021 नंदीग्राम चुनाव में ममता बनर्जी की पैर की चोट पर फिर विवाद, सुवेंदु अधिकारी ने जांच कराने की बात कही

    2021 नंदीग्राम चुनाव में ममता बनर्जी की पैर की चोट पर फिर विवाद, सुवेंदु अधिकारी ने जांच कराने की बात कही

    नई दिल्ली: पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी ने आरोप लगाया है कि 2021 के विधानसभा चुनाव के दौरान नंदीग्राम में ममता बनर्जी ने पैर की चोट को लेकर गलत दावा किया था। अधिकारी ने कहा कि राज्य सरकार इस मामले की जांच शुरू करेगी। उन्होंने एक मेडिकल रिपोर्ट का हवाला देते हुए दावा किया कि उसमें पैर में फ्रैक्चर या हड्डी खिसकने का कोई सबूत नहीं मिला था। अधिकारी ने कहा कि आदर्श आचार संहिता लागू होने के कारण वह फिलहाल मामले से जुड़ी पूरी जानकारी साझा नहीं करेंगे और 9 अक्टूबर के बाद अपने आरोपों के बारे में विस्तार से बताएंगे। नंदीग्राम और रेजीनगर में उपचुनावों के चलते फिलहाल आदर्श आचार संहिता लागू है।

    अधिकारी के अनुसार, नंदीग्राम में 2021 के चुनाव प्रचार के दौरान ममता बनर्जी के पैर में चोट लगी थी और बाद में उन्हें व्हीलचेयर पर प्रचार करते हुए देखा गया था। उन्होंने कहा कि उनके पास उस समय की मेडिकल रिपोर्ट है, जिसमें फ्रैक्चर या हड्डी खिसकने का प्रमाण नहीं होने की बात दर्ज है। अधिकारी ने इसी रिपोर्ट को आधार बनाकर मामले की जांच कराने की बात कही है। उन्होंने कहा कि 9 अक्टूबर के बाद वह अपने आरोपों और मामले से जुड़ी अन्य जानकारी सामने रखेंगे।

    वहीं, तृणमूल कांग्रेस विधायक कुणाल घोष ने सुवेंदु अधिकारी के आरोपों को खारिज किया है। उन्होंने कहा कि चोट लगने की स्थिति में पट्टी या अन्य उपचार की जरूरत केवल फ्रैक्चर होने पर ही नहीं होती। उनके अनुसार, किसी गंभीर चोट या फ्रैक्चर जैसी चोट में भी पट्टी की जरूरत हो सकती है। उन्होंने अधिकारी के इस दावे पर भी सवाल उठाया कि उन्हें कैसे पता है कि उस समय फ्रैक्चर नहीं हुआ था। इस तरह 2021 में हुई चोट को लेकर मुख्यमंत्री के आरोप और तृणमूल कांग्रेस की प्रतिक्रिया सामने आई है।

    दरअसल, 10 मार्च 2021 को नंदीग्राम के बिरुलिया इलाके के रेयापारा में चुनाव प्रचार के दौरान ममता बनर्जी के बाएं पैर में चोट लगी थी। उस समय उन्होंने शुरुआत में दावा किया था कि कुछ अज्ञात लोगों ने उन्हें धक्का दिया, जिससे वह अपनी कार के खुले दरवाजे से टकरा गईं और उनके बाएं पैर में चोट लगी। बाद में उन्होंने एक वीडियो जारी कर कहा था कि चुनाव प्रचार के दौरान भारी भीड़ ने उन्हें धक्का दिया था। उन्हें इलाज के लिए एसएसकेएम अस्पताल में भर्ती कराया गया था। वहां जांच के बाद उनके बाएं टखने और पैर की हड्डी तथा लिगामेंट में गंभीर चोटें होने की जानकारी सामने आई थी।

    घटना के बाद ममता बनर्जी को व्हीलचेयर पर चुनाव प्रचार करते देखा गया था। 2021 के विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस ने 210 से अधिक सीटें जीती थीं, जबकि भारतीय जनता पार्टी को 77 सीटों पर जीत मिली थी। अब सुवेंदु अधिकारी ने उस समय पैर में लगी चोट से जुड़े मामले की जांच कराने की बात कही है। उन्होंने कहा है कि 9 अक्टूबर के बाद वह इस मामले से संबंधित और जानकारी सामने रखेंगे। वहीं, तृणमूल कांग्रेस की ओर से अधिकारी के आरोपों को खारिज किया गया है।

  • पश्चिम बंगाल में एक साल के दौरान जारी OBC सर्टिफिकेट होंगे अमान्य? सुप्रीम कोर्ट करेगा फैसला

    पश्चिम बंगाल में एक साल के दौरान जारी OBC सर्टिफिकेट होंगे अमान्य? सुप्रीम कोर्ट करेगा फैसला


    नई दिल्ली।
    पश्चिम बंगाल में अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) प्रमाणपत्रों की वैधता से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को सुनवाई करने की बात कही। मामला कलकत्ता हाईकोर्ट के उस आदेश को चुनौती देने वाली याचिका से संबंधित है, जिसमें 8 मई 2025 से 18 मई 2026 के बीच राज्य सरकार द्वारा जारी किए गए सभी ओबीसी प्रमाणपत्रों को अमान्य करार दिया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल सरकार समेत अन्य संबंधित पक्षों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।

    जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने याचिका को इसी तरह के मुद्दे से संबंधित एक अन्य लंबित याचिका के साथ जोड़ दिया। सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के वकील ने अदालत से आग्रह किया कि मामले का अंतिम फैसला आने तक कुछ रिक्त पदों पर नियुक्तियां नहीं की जाएं।

    इस पर पीठ ने कहा कि सरकारी पदों को खाली नहीं रखा जा सकता। अदालत ने निर्देश दिया कि इस दौरान की जाने वाली नियुक्तियां विशेष अनुमति याचिका (एसएलपी) के अंतिम परिणाम के अधीन रहेंगी। राज्य सरकार को सफल उम्मीदवारों को जारी किए जाने वाले नियुक्ति पत्रों में भी इस शर्त का उल्लेख करना होगा।

    मई 2024 के फैसले से शुरू हुआ विवाद

    ओबीसी आरक्षण को लेकर विवाद मई 2024 में कलकत्ता हाईकोर्ट के एक फैसले के बाद शुरू हुआ था। अदालत ने तत्कालीन मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली सरकार द्वारा 2010 से 2012 के बीच जारी कार्यकारी आदेशों के तहत ओबीसी सूची में शामिल की गई कई श्रेणियों को रद्द कर दिया था। इसके साथ ही ओबीसी-ए और ओबीसी-बी में उप-वर्गीकरण तथा दोनों श्रेणियों के बीच 17 प्रतिशत आरक्षण के वितरण से संबंधित प्रावधान भी निरस्त कर दिए गए थे।

    इसके बाद राज्य सरकार ने मई और जून 2025 में नई अधिसूचनाएं जारी कर संशोधित ओबीसी आरक्षण नीति लागू करने की कोशिश की। हालांकि, कलकत्ता हाईकोर्ट ने 17 जून 2025 को इन अधिसूचनाओं पर रोक लगा दी। अदालत का कहना था कि राज्य सरकार कार्यकारी आदेश जारी करके न्यायालय के फैसले को निष्प्रभावी नहीं कर सकती।

    ओबीसी-ए प्रमाणपत्र को लेकर भी पहुंचा मामला

    बाद में पश्चिम बंगाल में सत्ता परिवर्तन हुआ और शुभेंदु अधिकारी के नेतृत्व में भाजपा की सरकार बनी। इसके बाद राज्य सरकार ने हाईकोर्ट में दायर अपनी अपीलें वापस ले लीं।

    वर्तमान याचिकाएं कलकत्ता हाईकोर्ट के 12 अगस्त के आदेश के बाद दायर की गई हैं। उस आदेश में अदालत ने एक ऐसे उम्मीदवार की याचिका खारिज कर दी थी, जिसने 2025 की अधिसूचना के तहत अप्रैल 2026 में जारी ओबीसी-ए प्रमाणपत्र के आधार पर राहत मांगी थी।

    अब सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की सुनवाई के दौरान ओबीसी प्रमाणपत्रों की वैधता और उनसे जुड़े नियुक्ति मामलों पर आगे की स्थिति स्पष्ट होने की उम्मीद है।

  • ममता बनर्जी के सामने एक साथ तीन बड़े संकट, अब सुप्रीम कोर्ट से लगाई आस

    ममता बनर्जी के सामने एक साथ तीन बड़े संकट, अब सुप्रीम कोर्ट से लगाई आस


    नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के भीतर चल रहा विवाद शुक्रवार को कई नए मोड़ से गुजरा। चुनाव आयोग ने ‘ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस’ नाम और ‘फूल-घास’ वाले पारंपरिक चुनाव चिह्न को फिलहाल फ्रीज कर दोनों गुटों को नए नाम और प्रतीक आवंटित किए। इसके कुछ ही समय बाद नंदीग्राम उपचुनाव में ममता बनर्जी गुट की प्रत्याशी संचिता प्रधान डे ने नामांकन वापस ले लिया। ममता ने इसके बाद कांग्रेस प्रत्याशी मिलन प्रधान को समर्थन देने का ऐलान किया, लेकिन कुछ घंटे बाद ही पुलिस ने मिलन प्रधान को एक पुराने हत्या मामले में गिरफ्तार कर लिया।

    घटनाक्रम के बीच ममता बनर्जी गुट ने चुनाव आयोग के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। पार्टी नाम और चुनाव चिह्न से जुड़े मामले के अलावा 10 बागी विधायकों की अयोग्यता पर विधानसभा अध्यक्ष की ओर से निर्णय में देरी को लेकर भी अलग याचिका दायर की गई है। रिपोर्टों के मुताबिक पहली याचिका में आयोग के अंतरिम आदेश को चुनौती दी गई है, जबकि दूसरी में अयोग्यता की प्रक्रिया लंबित रहने के दौरान पार्टी के नाम और प्रतीक को लेकर किए गए इंतजाम पर सवाल उठाया गया है। इन मामलों पर 21 सितंबर को सुनवाई संभावित बताई जा रही है।

    ममता गुट को मिला नया नाम और चुनाव चिह्न

    चुनाव आयोग के अंतरिम इंतजाम के तहत ममता बनर्जी के गुट को ‘ममता ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस’ नाम और ‘फुटबॉल खिलाड़ी’ चुनाव चिह्न दिया गया है। वहीं प्रतिद्वंद्वी गुट को ‘डेमोक्रेटिक तृणमूल कांग्रेस’ नाम और ‘लिफाफा’ चुनाव चिह्न आवंटित किया गया है। मूल ‘ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस’ नाम और ‘फूल-घास’ वाला प्रतीक फिलहाल दोनों गुटों के इस्तेमाल के लिए रोक दिया गया है। यह व्यवस्था अक्टूबर में होने वाले उपचुनावों के मद्देनजर अंतरिम तौर पर की गई है।

    ममता गुट ने अपनी याचिका में आरोप लगाया है कि चुनाव आयोग ने पार्टी के बहुसंख्यक कैडर और मूल संगठनात्मक ढांचे को पर्याप्त महत्व दिए बिना बागी गुट के दावों को प्राथमिकता दी। गुट का कहना है कि पार्टी के नाम और पारंपरिक चिह्न पर अंतिम फैसला करने से पहले विधायकों की सदस्यता से जुड़े विवाद का निपटारा होना चाहिए।

    10 बागी विधायकों की सदस्यता पर भी विवाद

    ममता गुट के वरिष्ठ नेता शोभनदेव चट्टोपाध्याय ने विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष ऋतब्रत बनर्जी समेत 10 बागी विधायकों को दल-बदल कानून के तहत अयोग्य ठहराने की मांग की है। इस मामले में विधानसभा सचिवालय की ओर से संबंधित विधायकों को नोटिस जारी कर एक सप्ताह में जवाब मांगा गया है।

    सूची में ऋतब्रत बनर्जी के अलावा अरूप राय, फिरहाद हकीम, संदीपन साहा, अखरुज्जमान अंसारी, शिउली साहा, सबीना यास्मिन, बिप्लब मित्रा, जावेद खान और रथिन घोष शामिल हैं।

    विवाद केवल विधायकों की सदस्यता तक सीमित नहीं है। विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष के पद को लेकर भी दोनों खेमों के बीच कानूनी लड़ाई चल रही है। ममता गुट ने शोभनदेव चट्टोपाध्याय को इस पद के लिए अपना उम्मीदवार बनाया था, जबकि विधानसभा अध्यक्ष ने ऋतब्रत बनर्जी को नेता प्रतिपक्ष के रूप में मान्यता दी। ममता गुट ने इस फैसले को कलकत्ता हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। अगस्त में हाईकोर्ट ने तत्काल राहत देने से इनकार करते हुए ऋतब्रत को फिलहाल सीमित अवधि के लिए पद पर बने रहने की अनुमति दी थी।

    एक दिन में बदली नंदीग्राम की तस्वीर

    6 अक्टूबर को प्रस्तावित नंदीग्राम विधानसभा उपचुनाव में शुक्रवार को घटनाक्रम तेजी से बदला। ममता गुट की प्रत्याशी संचिता प्रधान डे ने अचानक अपना नामांकन वापस ले लिया। इससे पहले वह अपने पति सत्यजीत के साथ राज्य सचिवालय नबन्ना पहुंचीं और मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी से मुलाकात की थी। नामांकन वापस लेने की वजह तत्काल स्पष्ट नहीं हो सकी। ममता बनर्जी ने बाद में कहा कि उनकी प्रत्याशी पर दबाव बनाया गया था।

    इसके बाद ममता बनर्जी ने कांग्रेस प्रत्याशी मिलन प्रधान को समर्थन देने की घोषणा की। उन्होंने कांग्रेस को ‘सिस्टर पार्टी’ बताते हुए इसे INDIA ब्लॉक को मजबूत करने की दिशा में कदम बताया। हालांकि कांग्रेस नेता अधीर रंजन चौधरी ने कहा कि उनकी पार्टी ने TMC से समर्थन नहीं मांगा था।

    समर्थन के कुछ घंटे बाद मिलन प्रधान गिरफ्तार

    ममता के समर्थन की घोषणा के कुछ ही घंटे बाद कांग्रेस के नंदीग्राम प्रत्याशी मिलन प्रधान को पश्चिम बंगाल पुलिस ने एक पुराने हत्या मामले में गिरफ्तार कर लिया। रिपोर्टों के अनुसार मामला 2007 के नंदीग्राम भूमि आंदोलन से जुड़ा है और उनके खिलाफ पहले से गिरफ्तारी वारंट लंबित था। उन्हें अदालत में पेश किए जाने की बात कही गई है।

    गिरफ्तारी के समय को लेकर कांग्रेस और ममता गुट ने सवाल उठाए। ममता बनर्जी ने कार्रवाई को राजनीतिक प्रतिशोध से जोड़ा, जबकि कांग्रेस नेताओं ने भी गिरफ्तारी की टाइमिंग पर आपत्ति जताई। दूसरी ओर, पुलिस और भाजपा की ओर से इसे कानून के तहत कार्रवाई बताया गया और राजनीतिक आरोपों को खारिज किया गया। इसलिए गिरफ्तारी के पीछे राजनीतिक मंशा होने का दावा फिलहाल संबंधित पक्षों के आरोप के रूप में ही सामने आया है।

    28 साल पुरानी पार्टी पहचान पर कानूनी लड़ाई

    ममता बनर्जी ने 1998 में कांग्रेस से अलग होकर तृणमूल कांग्रेस बनाई थी। ‘फूल-घास’ वाला पारंपरिक चुनाव चिह्न लंबे समय से पार्टी की पहचान रहा है। मौजूदा विवाद में पहली बार दोनों गुट इस नाम और प्रतीक पर अपना दावा कर रहे हैं। चुनाव आयोग ने फिलहाल दोनों को अलग-अलग नाम और चिह्न देकर उपचुनाव की प्रक्रिया आगे बढ़ाने का अंतरिम इंतजाम किया है।

    नंदीग्राम और रेजीनगर में उपचुनाव 6 अक्टूबर को और मतगणना 9 अक्टूबर को प्रस्तावित है। ऐसे में ममता गुट के लिए एक ओर मूल पार्टी नाम और प्रतीक को लेकर कानूनी लड़ाई अहम है, वहीं दूसरी ओर बागी विधायकों की अयोग्यता का मामला भी इससे जुड़ा हुआ है।

    राहुल गांधी का भाजपा पर आरोप, भाजपा ने पलटवार किया

    कांग्रेस प्रत्याशी मिलन प्रधान की गिरफ्तारी पर राहुल गांधी ने भाजपा पर निशाना साधा। उन्होंने एक्स पर पोस्ट कर आरोप लगाया कि गिरफ्तारी राजनीतिक प्रतिशोध का हिस्सा है और भाजपा निष्पक्ष चुनाव में भरोसा नहीं करती। राहुल गांधी ने यह भी आरोप लगाया कि भाजपा विपक्षी दलों और चुनावी मुकाबले को कमजोर करने की कोशिश कर रही है।

    भाजपा ने इन आरोपों को विपक्ष की प्रतिक्रिया बताते हुए पलटवार किया। भाजपा नेताओं ने कांग्रेस के राजनीतिक इतिहास का हवाला देते हुए कहा कि चुनाव आयोग स्वतंत्र संवैधानिक संस्था है और पार्टी के नाम तथा चुनाव चिह्न से जुड़े विवाद में आयोग अपने नियमों के तहत निर्णय लेता है। इस पूरे घटनाक्रम में दोनों पक्षों के आरोप-प्रत्यारोप के बीच अब निगाहें सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई और नंदीग्राम उपचुनाव की आगे की प्रक्रिया पर हैं।

  • पश्चिम बंगाल में भूकंप…. अलीपुरद्वार में सुबह-सुबह महसूस किए गए झटके, 3.0 रही तीव्रता

    पश्चिम बंगाल में भूकंप…. अलीपुरद्वार में सुबह-सुबह महसूस किए गए झटके, 3.0 रही तीव्रता


    कोलकाता।
    पश्चिम बंगाल (West Bengal) के अलीपुरद्वार (Alipurduar) में आज सुबह हल्के भूकंप (Earthquake) के झटके महसूस किए गए. राष्ट्रीय भूकंप विज्ञान केंद्र (National Center for Seismology-NCS) के मुताबिक यह भूकंप सुबह 6 बजकर 56 मिनट पर आया. भूकंप की तीव्रता (Earthquake intensity) रिक्टर पैमाने पर 3.0 मापी गई, जिसे मामूली श्रेणी में रखा जाता है. फिलहाल किसी तरह के जान माल के नुकसान की खबर नहीं है।

    नेशनल सेंटर फॉर सीस्मोलॉजी ने अपने आधिकारिक हैंडल से इस भूकंप की जानकारी साझा की. एजेंसी के अनुसार भूकंप का केंद्र अक्षांश 26.445 उत्तर और देशांतर 89.560 पूर्व पर स्थित था. भूकंप की गहराई जमीन से करीब 9 किलोमीटर नीचे बताई गई है. भूकंप का केंद्र अलीपुरद्वार जिले में ही रहा, जो पश्चिम बंगाल के उत्तरी हिस्से में स्थित है और भूटान तथा असम की सीमा के करीब पड़ता है।

    विशेषज्ञों के मुताबिक 3.0 तीव्रता का भूकंप हल्का माना जाता है और इससे आमतौर पर किसी बड़े नुकसान की आशंका नहीं होती. ऐसे झटके अक्सर सिर्फ हल्की कंपन के रूप में महसूस होते हैं और कई बार लोगों को इनका एहसास भी नहीं होता. कम गहराई वाले भूकंप जमीन के करीब होने की वजह से थोड़ा ज्यादा महसूस हो सकते हैं, भले ही उनकी तीव्रता कम हो. अलीपुरद्वार और आसपास का इलाका हिमालय की तलहटी में आता है, जहां भूगर्भीय हलचल की वजह से समय समय पर हल्के भूकंप आते रहते हैं।

    फिलहाल प्रशासन की तरफ से किसी नुकसान या एहतियाती कदम को लेकर कोई अलग बयान नहीं आया है. मौसम और भूकंप एजेंसियां इलाके की निगरानी करती रहती हैं ताकि किसी भी आगे की गतिविधि पर नजर रखी जा सके।

  • ‘आप लड़िए, हम उम्मीदवार नहीं उतारेंगे’: नंदीग्राम से ममता बनर्जी को TMC के बागी गुट की खुली चुनौती

    ‘आप लड़िए, हम उम्मीदवार नहीं उतारेंगे’: नंदीग्राम से ममता बनर्जी को TMC के बागी गुट की खुली चुनौती


    नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के नाम और चुनाव चिन्ह को लेकर चल रही सियासी लड़ाई अब नंदीग्राम उपचुनाव तक पहुंच गई है। टीएमसी के बागी खेमे ने बुधवार को पार्टी प्रमुख ममता बनर्जी को नंदीग्राम से चुनाव लड़ने की खुली चुनौती दी। बागी गुट का कहना है कि यदि ममता बनर्जी इस सीट से मैदान में उतरती हैं तो वह उनके खिलाफ अपना कोई उम्मीदवार नहीं उतारेगा।

    पश्चिम बंगाल विधानसभा के बाहर बागी टीएमसी के प्रवक्ता रिजु दत्ता ने कहा कि उनका गुट चाहता है कि ममता बनर्जी नंदीग्राम से चुनाव लड़ें, जीतें और विधानसभा में वापस लौटें। उन्होंने स्पष्ट किया कि ममता के सामने उनका गुट प्रत्याशी नहीं उतारेगा।

    ‘भाजपा विरोधी वोट नहीं बंटने देंगे’

    बागी टीएमसी विधायक मदन मित्रा ने कहा कि ममता बनर्जी के खिलाफ उम्मीदवार नहीं उतारने का फैसला भाजपा विरोधी वोटों को विभाजित होने से रोकने के लिए लिया गया है।

    मदन मित्रा ने कहा कि अगर उनका गुट भाजपा की ‘बी टीम’ होता तो विपक्षी वोटों को बांटने के लिए दो के बजाय तीन या चार उम्मीदवार मैदान में उतार सकता था। उनके मुताबिक नंदीग्राम में ममता को वॉकओवर देने का फैसला यह दिखाएगा कि उनका गुट भाजपा के इशारे पर काम नहीं कर रहा है।

    नंदीग्राम में पहले हार चुकी हैं ममता

    नंदीग्राम ममता बनर्जी के राजनीतिक सफर में बेहद महत्वपूर्ण सीट रही है। 2021 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने अपने तत्कालीन करीबी सहयोगी और भाजपा उम्मीदवार शुभेंदु अधिकारी के खिलाफ यहां से चुनाव लड़ा था। हालांकि, उन्हें हार का सामना करना पड़ा था।

    2026 के विधानसभा चुनाव में भी शुभेंदु अधिकारी ने नंदीग्राम से जीत हासिल की। उन्होंने ममता बनर्जी को उनके गृह क्षेत्र भवानीपुर में भी हराया। इस चुनाव के बाद शुभेंदु अधिकारी ने भवानीपुर सीट अपने पास रखी और नंदीग्राम विधानसभा सीट खाली कर दी। इसी वजह से अब नंदीग्राम में उपचुनाव कराया जा रहा है।

    पार्टी के नाम और चुनाव चिन्ह पर भी घमासान

    बागी गुट का यह ऐलान ऐसे समय हुआ है, जब टीएमसी के दोनों धड़ों के बीच पार्टी के नाम और चुनाव चिन्ह पर अधिकार को लेकर विवाद चल रहा है। चुनाव आयोग ने अभी फैसला नहीं किया है कि आधिकारिक नाम और चुनाव चिन्ह किस गुट को मिलेगा।

    रितब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाला बागी गुट पार्टी के नाम और चुनाव चिन्ह पर अपना दावा कर रहा है। उसका कहना है कि अगर नामांकन की अंतिम तारीख से पहले चुनाव आयोग उसके पक्ष में फैसला नहीं करता है तो वह निर्दलीय उम्मीदवारों के तौर पर चुनाव लड़ने की तैयारी भी कर रहा है।

    6 अक्टूबर को नंदीग्राम में वोटिंग

    नंदीग्राम और रेजीनगर विधानसभा सीटों पर 6 अक्टूबर को उपचुनाव होना है। बुधवार से नामांकन प्रक्रिया शुरू हो गई है। नामांकन दाखिल करने की अंतिम तारीख 16 सितंबर है। 17 सितंबर को नामांकन पत्रों की जांच होगी, जबकि 19 सितंबर तक उम्मीदवार नाम वापस ले सकेंगे। मतगणना 9 अक्टूबर को होगी।

  • TMC छोड़ने के बाद BJP से भी दूरी, बंगाल के 3 सांसदों ने बदला रास्ता, जानिए क्या है वजह ?

    TMC छोड़ने के बाद BJP से भी दूरी, बंगाल के 3 सांसदों ने बदला रास्ता, जानिए क्या है वजह ?


    कोलकाता। पश्चिम बंगाल की राजनीति में विधानसभा चुनाव के बाद भी नए समीकरण बनते दिखाई दे रहे हैं। मुर्शिदाबाद की तीन लोकसभा सीटों से जुड़े सांसद अबू ताहिर खान, खलीलुर रहमान और यूसुफ पठान इन दिनों अपने राजनीतिक रुख को लेकर चर्चा में हैं।

    तीनों सांसद पहले मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की पार्टी TMC से अलग होकर नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया (NCPI) में शामिल हुए। अब उन्होंने BJP के नेतृत्व वाले केंद्रीय गठबंधन के साथ औपचारिक तौर पर जुड़ने से भी दूरी बना ली है। हालांकि, केंद्र और राज्य सरकार के साथ प्रशासनिक तथा क्षेत्रीय मुद्दों पर उनका संवाद जारी है।

    NDA बैठकों से बनाई दूरी
    तीनों सांसद नई दिल्ली में होने वाली NDA की प्रमुख संसदीय बैठकों से दूरी बनाए हुए हैं। वहीं, राज्य और केंद्र के नेताओं से उनकी बातचीत मुख्य रूप से विकास और प्रशासन से जुड़े विषयों तक सीमित है।

    जंगीपुर से सांसद खलीलुर रहमान ने अपने राजनीतिक भविष्य को लेकर सवाल पूछे जाने पर कहा, “हमें गृह मंत्री के साथ दो विषयों पर चर्चा करनी थी, हम किसी अन्य मुद्दे पर कुछ नहीं कह सकते।”

    तीनों सांसदों ने पश्चिम बंगाल की मस्जिदों से लाउडस्पीकर हटाने के मुद्दे पर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात की थी। इससे संकेत मिलता है कि वे फिलहाल किसी गठबंधन में शामिल होने के बजाय मुद्दा आधारित राजनीति पर जोर दे रहे हैं।

    मुर्शिदाबाद का समीकरण क्यों अहम?
    तीनों सांसद मुर्शिदाबाद जिले की महत्वपूर्ण सीटों का प्रतिनिधित्व करते हैं। खलीलुर रहमान जंगीपुर, यूसुफ पठान बहरामपुर और अबू ताहिर खान मुर्शिदाबाद से सांसद हैं।

    मुर्शिदाबाद को पश्चिम बंगाल के संवेदनशील और अल्पसंख्यक बहुल इलाकों में गिना जाता है। ऐसे में BJP के साथ खुलकर खड़ा होना इन सांसदों के लिए अपने पारंपरिक मतदाताओं के बीच राजनीतिक जोखिम पैदा कर सकता है। यही वजह मानी जा रही है कि वे केंद्र के साथ संवाद तो बनाए रखना चाहते हैं, लेकिन किसी बड़े राजनीतिक गठबंधन का हिस्सा बनने से फिलहाल बच रहे हैं।

    NCPI के लिए भी बढ़ी चुनौती
    तीनों सांसदों का अलग रुख उनकी नई पार्टी NCPI के लिए भी चुनौती पैदा कर सकता है। करीब 20 सदस्यों वाले इस समूह में यदि अलग-अलग सांसद अपनी स्वतंत्र राजनीतिक रणनीति अपनाते हैं तो संगठन के भीतर मतभेद की स्थिति बन सकती है।

    दूसरी ओर, BJP के लिए भी इन सांसदों को अपने पाले में लाना आसान नहीं होगा। राष्ट्रीय दलों की कोशिश आमतौर पर अलग हुए नेताओं या गुटों को एक साझा राजनीतिक आधार में बदलने की होती है, लेकिन ये सांसद फिलहाल पार्टी लाइन के बजाय अपने-अपने निर्वाचन क्षेत्रों में पकड़ मजबूत रखने पर ज्यादा ध्यान देते दिखाई दे रहे हैं।

    स्थानीय समीकरण बनाम बड़े गठबंधन
    पश्चिम बंगाल में अगले चुनावों की तैयारियों के बीच मुर्शिदाबाद की तीनों सीटों का घटनाक्रम अहम माना जा रहा है। इससे संकेत मिलता है कि जिन इलाकों में स्थानीय मुद्दे, मतदाताओं का सामाजिक समीकरण और क्षेत्रीय पकड़ ज्यादा प्रभावी होते हैं, वहां केवल बड़े राजनीतिक गठबंधन के सहारे चुनावी सफलता हासिल करना आसान नहीं होता।

  • 19 साल बाद कोलकाता लौटीं तसलीमा नसरीन, बोलीं- अन्याय लंबा चल सकता है, लेकिन हमेशा नहीं रहता

    19 साल बाद कोलकाता लौटीं तसलीमा नसरीन, बोलीं- अन्याय लंबा चल सकता है, लेकिन हमेशा नहीं रहता


    कोलकाता। करीब 19 वर्ष बाद पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता पहुंचीं निर्वासित बांग्लादेशी लेखिका तसलीमा नसरीन ने कहा कि उनकी वापसी इस बात का प्रतीक है कि अन्याय लंबे समय तक चल सकता है, लेकिन हमेशा के लिए नहीं रहता। उन्होंने उम्मीद जताई कि भविष्य में किसी लेखक को अपने विचारों के कारण अपना देश छोड़ने के लिए मजबूर नहीं होना पड़े।

    रवींद्र सदन में आयोजित एक सांस्कृतिक कार्यक्रम में तसलीमा ने कहा कि कोलकाता लौटकर उन्हें ऐसा महसूस हो रहा है, जैसे वह अपने जीवन के उसी हिस्से में वापस आ गई हैं, जिसे वर्षों पहले यहीं छोड़ना पड़ा था। कार्यक्रम के दौरान मंच पर पश्चिम बंगाल की सत्तारूढ़ पार्टी से जुड़े एक नेता को आमंत्रित किए जाने को लेकर कुछ देर विवाद और हंगामे की स्थिति भी बनी।

    ‘मैं राजनीति नहीं, महिलाओं के अधिकारों की बात करने आई हूं’
    तसलीमा नसरीन ने स्पष्ट किया कि उनका उद्देश्य किसी राजनीतिक दल के समर्थन या विरोध में बोलना नहीं है। उन्होंने कहा कि वह केवल महिलाओं के अधिकारों और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के पक्ष में अपनी बात रखने आई हैं।

    उन्होंने कहा कि यूरोप ने उन्हें नागरिकता और रहने का स्थान दिया, लेकिन बांग्लादेश और पश्चिम बंगाल में उन्हें स्थायी ठिकाना नहीं मिल सका। तसलीमा ने यह भी कहा कि किसी अदालत ने उन्हें कभी दोषी नहीं ठहराया, लेकिन कट्टरपंथी ताकतों के विरोध के कारण उन्हें निर्वासन का जीवन जीना पड़ा।

    सुरक्षा का मिला आश्वासन
    कार्यक्रम में मौजूद पश्चिम बंगाल विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष शुभेंदु अधिकारी ने तसलीमा नसरीन का स्वागत करते हुए कहा कि जब भी वह राज्य आएंगी, उनकी सुरक्षा सुनिश्चित की जाएगी। उन्होंने कहा कि पश्चिम बंगाल आने पर उन्हें किसी तरह की असुरक्षा महसूस नहीं होने दी जाएगी।

    2007 में छोड़ना पड़ा था कोलकाता
    तसलीमा नसरीन वर्ष 2004 से 2007 के बीच कोलकाता में रही थीं। उनकी आत्मकथा ‘द्विखंडितो’ के कुछ अंशों को लेकर विरोध प्रदर्शन हुए थे, जिसके बाद तत्कालीन वाम मोर्चा सरकार ने पुस्तक पर प्रतिबंध लगा दिया था। कानून-व्यवस्था की स्थिति का हवाला देते हुए नवंबर 2007 में उन्हें कोलकाता छोड़ना पड़ा।

    इससे पहले वर्ष 1994 में बांग्लादेश में अपनी लेखनी को लेकर इस्लामी कट्टरपंथियों की धमकियों के बाद उन्होंने अपना देश छोड़ दिया था। तब से वह निर्वासन का जीवन जी रही हैं।