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  • शेख हसीना की बेटी साइमा वाजेद ने WHO के क्षेत्रीय प्रमुख पद से दिया इस्तीफा, वित्तीय धोखाधड़ी के आरोपों के बीच बड़ा फैसला

    शेख हसीना की बेटी साइमा वाजेद ने WHO के क्षेत्रीय प्रमुख पद से दिया इस्तीफा, वित्तीय धोखाधड़ी के आरोपों के बीच बड़ा फैसला


    नई दिल्ली।
    बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना की बेटी साइमा वाजेद ने विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के दक्षिण-पूर्व एशिया क्षेत्र की क्षेत्रीय निदेशक के पद से इस्तीफा दे दिया है। उन्होंने बुधवार को अपना इस्तीफा सौंपा, जो तत्काल प्रभाव से लागू हो गया। वाजेद के खिलाफ वित्तीय धोखाधड़ी और फर्जीवाड़े से जुड़े आरोपों की जांच चल रही थी। उन्होंने अपने ऊपर लगे आरोपों से इनकार किया है।

    साइमा वाजेद ने वर्ष 2024 की शुरुआत में WHO के दक्षिण-पूर्व एशिया क्षेत्र की क्षेत्रीय निदेशक का पद संभाला था। उनका कार्यकाल पांच साल का निर्धारित था। हालांकि, आरोपों और जांच के बीच WHO ने उन्हें पिछले साल बिना वेतन प्रशासनिक छुट्टी पर भेज दिया था।

    बांग्लादेश की भ्रष्टाचार निरोधक एजेंसी ने भी लगाए थे आरोप

    साइमा वाजेद के खिलाफ बांग्लादेश की भ्रष्टाचार निरोधक एजेंसी ने भी कार्रवाई की थी। एजेंसी ने मार्च 2025 में उन पर फ्रॉड और फर्जीवाड़े के आरोप लगाए थे। इसके बाद जुलाई 2025 में WHO ने उन्हें प्रशासनिक छुट्टी पर भेज दिया।

    WHO की ओर से लगाए गए आरोपों में चीन की यात्रा से जुड़े खर्च में कथित वित्तीय अनियमितता भी शामिल थी। इसके अलावा संगठन ने उनकी शैक्षणिक योग्यता पर भी सवाल उठाए थे। हालांकि, वाजेद ने इन आरोपों को खारिज किया है।

    वकीलों ने WHO को भेजा जवाब

    साइमा वाजेद के वकीलों ने जुलाई 2026 में WHO को पत्र भेजकर उनके खिलाफ लगाए गए आरोपों का जवाब दिया था। पत्र में कहा गया था कि उनकी मुवक्किल ने किसी तरह की वित्तीय धोखाधड़ी नहीं की है। वकीलों ने उनकी शैक्षणिक योग्यता को लेकर लगाए गए आरोपों को भी गलत बताया था।

    जमीन हासिल करने के आरोप पर भी दी सफाई

    साइमा वाजेद पर बांग्लादेश में एक जमीन का प्लॉट कथित तौर पर गलत तरीके से हासिल करने का आरोप भी लगाया गया था। इस्तीफे में उन्होंने इस आरोप का भी जवाब दिया।

    वाजेद के मुताबिक, उन्होंने संबंधित जमीन WHO में शामिल होने से पहले हासिल की थी। उनका कहना है कि यह जमीन बांग्लादेश के उस कानून के तहत मिली थी, जो देश के स्वतंत्रता आंदोलन के नेता शेख मुजीबुर रहमान के परिवारों से जुड़ा था। शेख मुजीबुर रहमान, शेख हसीना के पिता हैं।

    शेख हसीना के सत्ता से हटने के बाद बढ़ा परिवार पर दबाव

    साइमा वाजेद का इस्तीफा ऐसे समय हुआ है जब बांग्लादेश में शेख हसीना और उनके परिवार से जुड़े लोगों पर राजनीतिक दबाव बढ़ा हुआ है। वर्ष 2024 में बांग्लादेश में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए थे, जिसके बाद शेख हसीना को प्रधानमंत्री पद छोड़ना पड़ा था।

    हसीना के कई करीबी नेताओं और सहयोगियों पर बांग्लादेश में अलग-अलग मामलों में आरोप लगाए गए हैं। इनमें भ्रष्टाचार से जुड़े मामले भी शामिल हैं। शेख हसीना देश छोड़ने के बाद भारत में रह रही हैं।

    हालांकि, साइमा वाजेद के खिलाफ लगे आरोपों को उनके द्वारा लगातार खारिज किया गया है। उनके इस्तीफे को शेख हसीना के परिवार पर बढ़ते राजनीतिक और कानूनी दबाव के व्यापक घटनाक्रम से जोड़कर देखा जा रहा है।

    WHO शुरू करेगा नए क्षेत्रीय प्रमुख के चुनाव की प्रक्रिया

    साइमा वाजेद के इस्तीफे के बाद WHO अब दक्षिण-पूर्व एशिया क्षेत्र के लिए नए क्षेत्रीय प्रमुख के चुनाव की प्रक्रिया शुरू करेगा। एक सूत्र के मुताबिक, यह प्रक्रिया अगले महीने शुरू होने की उम्मीद है।

    WHO का दक्षिण-पूर्व एशिया क्षेत्रीय कार्यालय सदस्य देशों में स्वास्थ्य संबंधी कार्यक्रमों और नीतियों के समन्वय में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। ऐसे में नए क्षेत्रीय निदेशक का चुनाव संगठन के लिए अहम माना जा रहा है।

  • डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो में इबोला संक्रमण तेजी से फैला, WHO ने वैश्विक सतर्कता और तत्काल कार्रवाई की अपील

    डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो में इबोला संक्रमण तेजी से फैला, WHO ने वैश्विक सतर्कता और तत्काल कार्रवाई की अपील

    नई दिल्ली । डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो में इबोला वायरस का मौजूदा प्रकोप लगातार गंभीर होता जा रहा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने चेतावनी दी है कि यदि संक्रमण की रफ्तार पर समय रहते प्रभावी नियंत्रण नहीं किया गया तो आने वाले दिनों में यह और अधिक व्यापक तबाही का कारण बन सकता है। मई 2026 में घोषित इस प्रकोप ने अब तक हजारों लोगों को संक्रमित किया है और बड़ी संख्या में मौतें दर्ज की गई हैं। बढ़ते मामलों के कारण यह दुनिया के इतिहास की दूसरी सबसे बड़ी इबोला महामारी बन चुकी है।

    स्वास्थ्य अधिकारियों के अनुसार यह प्रकोप बुंडीबुग्यो स्ट्रेन के कारण फैल रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि इस वायरस के लिए अभी तक कोई स्वीकृत टीका या विशेष उपचार उपलब्ध नहीं है। यही कारण है कि संक्रमण की रोकथाम के लिए संक्रमित व्यक्ति की शीघ्र पहचान, संपर्क में आए लोगों की निगरानी, संक्रमण नियंत्रण और समुदाय स्तर पर जागरूकता सबसे महत्वपूर्ण उपाय माने जा रहे हैं। स्वास्थ्य एजेंसियां लगातार स्थानीय प्रशासन के साथ मिलकर संक्रमण की श्रृंखला तोड़ने का प्रयास कर रही हैं।

    विश्व स्वास्थ्य संगठन के ताजा आकलन के अनुसार जुलाई के अंत तक इबोला संक्रमण के मामलों की संख्या 3,600 से अधिक पहुंच चुकी है, जबकि लगभग 1,600 लोगों की मौत हो चुकी है। मृत्यु दर भी काफी अधिक बनी हुई है, जिससे स्थिति की गंभीरता और बढ़ गई है। संगठन का कहना है कि कई क्षेत्रों में संक्रमण की नई कड़ियां लगातार सामने आ रही हैं, जिससे प्रकोप पर पूरी तरह नियंत्रण स्थापित करना चुनौतीपूर्ण बना हुआ है।

    कांगो का उत्तर-पूर्वी इतुरी प्रांत इस महामारी से सबसे अधिक प्रभावित क्षेत्रों में शामिल है। यह इलाका लंबे समय से संघर्ष, विस्थापन और मानवीय संकट जैसी समस्याओं का सामना कर रहा है। बड़ी संख्या में लोगों का लगातार एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाना, सीमित स्वास्थ्य सुविधाएं, स्वच्छ पानी और पर्याप्त चिकित्सा संसाधनों की कमी संक्रमण को नियंत्रित करने के प्रयासों को और कठिन बना रही है। पड़ोसी देशों की सीमाओं से लोगों की आवाजाही भी स्वास्थ्य एजेंसियों की चिंता बढ़ा रही है।

    विशेषज्ञों के अनुसार वर्तमान प्रकोप ने वर्ष 2018 से 2020 के बीच कांगो में फैली पिछली बड़ी इबोला महामारी के मामलों का आंकड़ा भी पीछे छोड़ दिया है। अब यह पश्चिम अफ्रीका में वर्ष 2014 से 2016 के बीच फैली ऐतिहासिक महामारी के बाद दूसरी सबसे बड़ी इबोला महामारी के रूप में दर्ज हो चुका है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि यदि मौजूदा स्थिति पर प्रभावी नियंत्रण नहीं हुआ तो संक्रमण का दायरा और बढ़ सकता है।

    विश्व स्वास्थ्य संगठन और अन्य अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य संस्थाएं प्रभावित क्षेत्रों में निगरानी, जांच, उपचार सुविधाओं के विस्तार और सामुदायिक जागरूकता कार्यक्रमों को मजबूत करने पर जोर दे रही हैं। साथ ही सीमावर्ती क्षेत्रों में निगरानी बढ़ाने और संक्रमण के संभावित प्रसार को रोकने के लिए क्षेत्रीय सहयोग की आवश्यकता भी बताई गई है। विशेषज्ञों का कहना है कि समय पर पहचान, संक्रमित मरीजों का पृथक्करण और स्वास्थ्य सुरक्षा उपायों का कड़ाई से पालन ही इस महामारी के प्रभाव को सीमित करने का सबसे प्रभावी तरीका है। वैश्विक स्वास्थ्य समुदाय की नजर अब कांगो की स्थिति पर बनी हुई है, क्योंकि यह प्रकोप केवल एक देश ही नहीं बल्कि पूरे क्षेत्र के लिए सार्वजनिक स्वास्थ्य की गंभीर चुनौती बन चुका है।

  • यूरोप झुलसा रिकॉर्ड गर्मी से, WHO ने दी गंभीर चेतावनी; कई देशों में जनजीवन प्रभावित, स्वास्थ्य और बिजली व्यवस्था पर बढ़ा संकट

    यूरोप झुलसा रिकॉर्ड गर्मी से, WHO ने दी गंभीर चेतावनी; कई देशों में जनजीवन प्रभावित, स्वास्थ्य और बिजली व्यवस्था पर बढ़ा संकट

    नई दिल्ली । यूरोप इस समय भीषण हीटवेव की चपेट में है, जहां कई देशों में रिकॉर्ड स्तर का तापमान दर्ज किया जा रहा है। लगातार बढ़ती गर्मी ने स्वास्थ्य सेवाओं, बिजली व्यवस्था और सार्वजनिक बुनियादी ढांचे पर गंभीर दबाव पैदा कर दिया है। अस्पतालों में मरीजों की संख्या बढ़ रही है, जबकि कई स्थानों पर अत्यधिक तापमान के कारण सामान्य जनजीवन भी प्रभावित हुआ है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह स्थिति जलवायु परिवर्तन के बढ़ते प्रभावों का स्पष्ट संकेत है।

    विश्व स्वास्थ्य संगठन ने चेतावनी दी है कि यूरोप दुनिया का सबसे तेजी से गर्म होने वाला महाद्वीप बन चुका है। संगठन के अनुसार महाद्वीप का तापमान वैश्विक औसत की तुलना में लगभग दोगुनी गति से बढ़ रहा है। वर्तमान हीटवेव से लगभग 15 करोड़ लोग प्रभावित बताए जा रहे हैं। कई देशों में स्कूलों के संचालन पर असर पड़ा है और बिजली की मांग अचानक बढ़ने से ऊर्जा प्रणालियों पर अतिरिक्त दबाव देखा जा रहा है।

    जर्मनी में अत्यधिक गर्मी का असर परिवहन व्यवस्था पर भी दिखाई दिया। लीपज़िग में तेज तापमान के कारण ट्राम की पटरियों को नुकसान पहुंचने की खबरें सामने आईं, जिससे सेवाएं प्रभावित हुईं। वहीं राजधानी बर्लिन में लोगों को राहत पहुंचाने के लिए सार्वजनिक स्थानों पर पानी का छिड़काव किया गया। कई शहरों में प्रशासन ने लोगों से दोपहर के समय घरों में रहने और अनावश्यक यात्रा से बचने की अपील की है।

    फ्रांस में स्वास्थ्य विभाग के अनुसार जून के अंतिम सप्ताह के दौरान सामान्य से अधिक मौतें दर्ज की गई हैं। अंतिम संस्कार से जुड़े संस्थानों पर भी काम का दबाव बढ़ा है। पेरिस सहित कई क्षेत्रों में श्मशान और कब्रिस्तानों की क्षमता पर अतिरिक्त बोझ पड़ने की बात सामने आई है। स्थानीय प्रशासन स्थिति पर लगातार निगरानी रखे हुए है और आवश्यकता के अनुसार अतिरिक्त व्यवस्थाएं की जा रही हैं।

    युद्धग्रस्त यूक्रेन में यह हीटवेव नई चुनौती बनकर उभरी है। पहले से क्षतिग्रस्त ऊर्जा ढांचे पर बढ़ती बिजली मांग का दबाव बढ़ गया है। कई इलाकों में बिजली आपूर्ति को संतुलित रखने के लिए आपातकालीन कटौती लागू की गई है। ऊर्जा विशेषज्ञों का कहना है कि युद्ध और भीषण गर्मी का संयुक्त प्रभाव देश की बिजली व्यवस्था के लिए गंभीर परीक्षा साबित हो रहा है।

    यूरोप के कई हिस्सों में तापमान 40 डिग्री सेल्सियस से ऊपर पहुंच चुका है। कई स्थानों पर सड़कें, रेल ढांचा और अन्य सार्वजनिक सुविधाएं भीषण गर्मी से प्रभावित हुई हैं। सोशल मीडिया पर अत्यधिक तापमान से जुड़ी अनेक तस्वीरें और वीडियो सामने आए हैं, हालांकि प्रशासन लोगों से अपुष्ट सूचनाओं पर भरोसा न करने और केवल आधिकारिक सलाह का पालन करने की अपील कर रहा है।

    विशेषज्ञों का कहना है कि लगातार बढ़ती हीटवेव केवल मौसमी घटना नहीं, बल्कि बदलती जलवायु का गंभीर संकेत है। अत्यधिक गर्मी का प्रभाव केवल स्वास्थ्य तक सीमित नहीं रहता, बल्कि कृषि, ऊर्जा, परिवहन और अर्थव्यवस्था पर भी पड़ता है। इसलिए दीर्घकालिक स्तर पर जलवायु अनुकूल नीतियों, हरित ऊर्जा के विस्तार और शहरी ढांचे को अत्यधिक तापमान के अनुरूप विकसित करने की आवश्यकता पहले से अधिक महसूस की जा रही है। वर्तमान हालात यह संकेत देते हैं कि यदि वैश्विक स्तर पर उत्सर्जन में कमी और पर्यावरण संरक्षण के प्रभावी उपाय नहीं किए गए, तो भविष्य में इस तरह की चरम मौसमी घटनाएं और अधिक गंभीर रूप ले सकती हैं।

  • इबोला वायरस का कहर: 900 से ज्यादा संदिग्ध केस, WHO ने घोषित किया Global Health Emergency; भारत में अलर्ट

    इबोला वायरस का कहर: 900 से ज्यादा संदिग्ध केस, WHO ने घोषित किया Global Health Emergency; भारत में अलर्ट



    नई दिल्ली। अफ्रीकी देशों डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो और युगांडा में इबोला वायरस का प्रकोप तेजी से बढ़ता जा रहा है। हालात की गंभीरता को देखते हुए वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन (WHO) ने इसे अंतरराष्ट्रीय सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातकाल घोषित कर दिया है। इस बार संक्रमण दुर्लभ बुंडीबुग्यो स्ट्रेन से फैल रहा है, जिसके लिए फिलहाल कोई स्वीकृत वैक्सीन या विशेष इलाज उपलब्ध नहीं है।

    WHO की रिपोर्ट के मुताबिक अब तक 900 से ज्यादा संदिग्ध मामले सामने आ चुके हैं, जिनमें 101 मामलों की पुष्टि हुई है। कांगो के इटुरी प्रांत को इसका केंद्र बताया जा रहा है, जहां लाखों लोग संघर्ष और अस्थिरता के बीच रह रहे हैं।

    यूएस CDC के अनुसार कांगो में अब तक 119 संदिग्ध मौतें और 10 पुष्ट मौतें दर्ज की गई हैं, जबकि युगांडा में भी नए मामले सामने आने के बाद स्थिति गंभीर बनी हुई है। वायरस अब स्थानीय समुदायों में फैलता जा रहा है, जिससे नियंत्रण और मुश्किल हो गया है।

    इसी बीच भारत सरकार ने भी एहतियात के तौर पर एडवाइजरी जारी की है। कांगो, युगांडा और दक्षिण सूडान से आने वाले यात्रियों की स्क्रीनिंग बढ़ा दी गई है और एयरपोर्ट्स पर निगरानी कड़ी कर दी गई है। हालांकि भारत में अभी तक इबोला का कोई पुष्ट मामला सामने नहीं आया है, लेकिन स्वास्थ्य मंत्रालय ने लोगों को गैर-जरूरी यात्रा से बचने की सलाह दी है।

  • हंता वायरस का बढ़ता खतरा: कैसे फैलता है संक्रमण, किन देशों में पहुंचा और कितना जानलेवा है यह वायरस

    हंता वायरस का बढ़ता खतरा: कैसे फैलता है संक्रमण, किन देशों में पहुंचा और कितना जानलेवा है यह वायरस



    नई दिल्ली। दुनिया एक बार फिर एक नए स्वास्थ्य संकट की आशंका से जूझ रही है। हंता वायरस के ताज़ा मामलों ने वैश्विक स्वास्थ्य एजेंसियों की चिंता बढ़ा दी है। हाल ही में अटलांटिक महासागर में यात्रा कर रहे एक क्रूज शिप में संक्रमण और मौतों की पुष्टि के बाद यह वायरस फिर सुर्खियों में आ गया है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) भी इस स्थिति पर लगातार नजर बनाए हुए है।

    WHO की विशेषज्ञ डॉ. मारिया वान केरकोव ने स्पष्ट किया है कि हंता वायरस न तो कोविड-19 जैसा है और न ही सामान्य इन्फ्लूएंजा। यह वायरस अलग तरीके से फैलता है और इसकी प्रकृति भी अलग है। अच्छी बात यह है कि यह व्यक्ति से व्यक्ति में आसानी से नहीं फैलता, जिससे इसका व्यापक प्रसार सीमित रहता है।

    कैसे शुरू हुआ संक्रमण
    ताजा मामला एक डच झंडे वाले क्रूज शिप MV Hondius से जुड़ा है, जो अटलांटिक और दक्षिणी महासागर के मार्ग से गुजर रहा था। रिपोर्ट्स के मुताबिक, यात्रा के दौरान 70 वर्षीय एक यात्री में शुरुआती लक्षण दिखे, जिनमें बुखार, सिरदर्द और कमजोरी शामिल थे। बाद में उनकी मौत हो गई। इसके बाद दो और मौतों की पुष्टि हुई, जिनमें एक दक्षिण अफ्रीका और दूसरी जर्मनी की महिला यात्री शामिल थी।

    जहाज पर लगभग 150 लोग सवार थे, जो अर्जेंटीना से यात्रा पर निकले थे। यात्रा के दौरान सेंट हेलेना और अन्य द्वीपों पर कुछ यात्रियों ने उतरकर संपर्क किया, जिससे संक्रमण के फैलाव की आशंका और जांच तेज कर दी गई।

    किन देशों तक पहुंचा मामला
    WHO और संबंधित स्वास्थ्य एजेंसियों ने कई देशों को अलर्ट किया है, जिनमें शामिल हैं:

    अर्जेंटीना (जहां से यात्रा शुरू हुई)

    सेंट हेलेना

    दक्षिण अफ्रीका

    नीदरलैंड

    ब्रिटेन

    केप वर्डे

    इसके अलावा कनाडा, अमेरिका, जर्मनी, डेनमार्क, स्वीडन, स्विट्जरलैंड, तुर्की, सिंगापुर और न्यूजीलैंड जैसे देशों को भी जानकारी दी गई है क्योंकि इनके नागरिक इस यात्रा से जुड़े हुए थे या संपर्क में आए थे।

    हंता वायरस कितना खतरनाक है
    हंता वायरस को दो मुख्य श्रेणियों में बांटा जाता है।
    पहला “ओल्ड वर्ल्ड हंता वायरस” जो यूरोप और एशिया में पाया जाता है और मुख्य रूप से किडनी पर असर डालता है। इसकी मृत्यु दर अपेक्षाकृत कम होती है, लगभग 1% से 15% के बीच।

    दूसरा और अधिक खतरनाक “न्यू वर्ल्ड हंता वायरस” है, जो अमेरिका में पाया जाता है। यह हंता वायरस कार्डियोपल्मोनरी सिंड्रोम का कारण बनता है, जिसमें फेफड़ों में तेजी से तरल भर जाता है और सांस लेने में गंभीर दिक्कत होती है। इसकी मृत्यु दर 35% से 50% तक हो सकती है, जिससे यह बेहद घातक संक्रमणों में शामिल है।

    कैसे फैलता है वायरस
    यह वायरस मुख्य रूप से चूहों और अन्य कृंतकों के मूत्र, मल या लार के संपर्क से फैलता है। संक्रमित धूल या सतहों को सांस के जरिए शरीर में लेने से संक्रमण हो सकता है। हालांकि, एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में इसका संक्रमण दुर्लभ माना जाता है।

    क्या कहती हैं स्वास्थ्य एजेंसियां
    WHO का कहना है कि फिलहाल घबराने की जरूरत नहीं है, लेकिन सतर्कता बेहद जरूरी है। प्रभावित क्षेत्रों में निगरानी बढ़ा दी गई है और यात्रियों की ट्रैकिंग की जा रही है। वैज्ञानिकों का मानना है कि समय पर पहचान और सावधानी से इसके फैलाव को नियंत्रित किया जा सकता है।

  • पाकिस्तान में फिर मंडराया पोलियो का खतरा, पांच नए मामलों से मचा हड़कंप; WHO समेत दुनिया अलर्ट

    पाकिस्तान में फिर मंडराया पोलियो का खतरा, पांच नए मामलों से मचा हड़कंप; WHO समेत दुनिया अलर्ट



    नई दिल्ली। पाकिस्तान में पोलियो वायरस एक बार फिर गंभीर चिंता का कारण बनता जा रहा है। स्थानीय मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक कराची समेत कई इलाकों से लिए गए पांच नए नमूनों में पोलियो वायरस की पुष्टि हुई है। इसके बाद स्वास्थ्य अधिकारियों और अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों की चिंता बढ़ गई है।

    रिपोर्ट्स के अनुसार सिंध में आयोजित एक उच्चस्तरीय बैठक के दौरान अधिकारियों ने बताया कि कम संक्रमण वाले मौसम में भी वायरस का सक्रिय रहना बेहद चिंताजनक संकेत है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह संक्रमण के लगातार फैलने का संकेत देता है और इसे रोकने के लिए तुरंत सख्त कदम उठाने होंगे।

    WHO और यूनिसेफ भी अलर्ट
    बैठक में विश्व स्वास्थ्य संगठन, यूनिसेफ़, बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन और पाकिस्तान मेडिकल एसोसिएशन समेत कई संस्थाओं के प्रतिनिधि शामिल हुए।डब्ल्यूएचओ के प्रतिनिधियों ने कहा कि अफ्रीका में सफल रही रणनीतियों को अब पाकिस्तान में भी लागू किया जा रहा है ताकि वायरस के फैलाव को रोका जा सके।

    इस साल सामने आए कई मामले
    रिपोर्ट्स के मुताबिक हाल ही में खैबर पख्तूनख्वा प्रांत के बन्नू और उत्तरी वजीरिस्तान से पोलियो के नए मामले सामने आए थे। इस साल अब तक पाकिस्तान में पोलियो के कई मामलों की पुष्टि हो चुकी है।विशेषज्ञों का कहना है कि अफ़ग़ानिस्तान और पाकिस्तान दुनिया के ऐसे देश हैं जहां अब भी पोलियो वायरस पूरी तरह खत्म नहीं हो पाया है।

    टीकाकरण अभियान के सामने बड़ी चुनौती
    पोलियो उन्मूलन अभियान को सुरक्षा और जागरूकता दोनों स्तर पर मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। खैबर पख्तूनख्वा और बलूचिस्तान में टीकाकरण टीमों पर हमलों की घटनाएं भी सामने आई हैं।

    इसके अलावा टीकों को लेकर फैली गलत जानकारी और अभिभावकों द्वारा पोलियो ड्रॉप्स से इनकार भी बड़ी समस्या बन चुका है। केवल कराची में ही हजारों परिवारों ने बच्चों को पोलियो ड्रॉप्स पिलाने से मना कर दिया है, जिससे वायरस के खतरे को लेकर चिंता और बढ़ गई है।

  • Type-2 Diabetes से बचाव है संभव: अपनाएं ये 4 आसान आदतें और रहें स्वस्थ

    Type-2 Diabetes से बचाव है संभव: अपनाएं ये 4 आसान आदतें और रहें स्वस्थ


    नई दिल्ली। आज के समय में तेजी से बढ़ती लाइफस्टाइल बीमारियों में Type 2 Diabetes एक बड़ी चुनौती बन चुकी है। खराब खानपान, शारीरिक गतिविधियों की कमी और बढ़ता तनाव इस बीमारी के प्रमुख कारण माने जाते हैं। हालांकि, अच्छी बात यह है कि World Health Organization (WHO) का मानना है कि कुछ आसान और नियमित आदतों को अपनाकर इस बीमारी से बचाव संभव है।

    WHO के अनुसार, सबसे जरूरी है अपने शरीर के वजन को संतुलित रखना। बढ़ता हुआ वजन डायबिटीज के खतरे को कई गुना बढ़ा देता है। ऐसे में नियमित रूप से वजन पर नजर रखना और जरूरत पड़ने पर उसे नियंत्रित करना बेहद जरूरी है। संतुलित वजन न सिर्फ डायबिटीज बल्कि कई अन्य बीमारियों से भी बचाता है।

    दूसरा महत्वपूर्ण उपाय है शारीरिक रूप से सक्रिय रहना। विशेषज्ञों की सलाह है कि रोजाना कम से कम 20 से 30 मिनट तक व्यायाम जरूर करना चाहिए। इसमें तेज चलना, साइकिल चलाना या हल्का-फुल्का खेलकूद शामिल हो सकता है। नियमित शारीरिक गतिविधि शरीर में इंसुलिन के प्रभाव को बेहतर बनाती है और ब्लड शुगर को नियंत्रण में रखने में मदद करती है।

    तीसरा अहम पहलू है संतुलित और पौष्टिक आहार। WHO के अनुसार, अपनी डाइट में फल, हरी सब्जियां, साबुत अनाज और प्रोटीन से भरपूर खाद्य पदार्थों को शामिल करना चाहिए। वहीं, ज्यादा चीनी, प्रोसेस्ड फूड और सैचुरेटेड फैट से दूरी बनाना बेहद जरूरी है। सही खानपान न केवल डायबिटीज के खतरे को कम करता है, बल्कि शरीर को ऊर्जा और पोषण भी देता है।

    चौथा और बेहद जरूरी उपाय है तंबाकू से दूरी बनाना। तंबाकू का सेवन न केवल डायबिटीज बल्कि दिल और फेफड़ों से जुड़ी कई गंभीर बीमारियों का खतरा बढ़ाता है। WHO का स्पष्ट कहना है कि तंबाकू छोड़ने से शरीर की ओवरऑल हेल्थ बेहतर होती है और कई बीमारियों से बचाव संभव होता है।

    आज के व्यस्त जीवन में छोटी-छोटी आदतों में बदलाव करना ही सबसे बड़ा उपाय है। नियमित व्यायाम, संतुलित आहार, वजन नियंत्रण और तंबाकू से दूरी बनाकर न केवल Type 2 Diabetes बल्कि कई अन्य गंभीर बीमारियों से भी बचा जा सकता है।

    कुल मिलाकर, अगर समय रहते जागरूकता दिखाई जाए और सही जीवनशैली अपनाई जाए, तो डायबिटीज जैसी बीमारी को काफी हद तक रोका जा सकता है।

  • लेटेंट टीबी को न करें नजरअंदाज वरना बन सकती है एक्टिव टीबी का बड़ा खतरा

    लेटेंट टीबी को न करें नजरअंदाज वरना बन सकती है एक्टिव टीबी का बड़ा खतरा


    नई दिल्ली:टीबी यानी ट्यूबरकुलोसिस एक संक्रामक बीमारी है, जो Mycobacterium tuberculosis नामक बैक्टीरिया के कारण होती है और मुख्य रूप से फेफड़ों को प्रभावित करती है। हालांकि यह दिमाग, हड्डियों, किडनी और शरीर के अन्य हिस्सों को भी नुकसान पहुंचा सकती है। यह बीमारी हवा के जरिए फैलती है और समय पर इलाज न मिलने पर गंभीर रूप ले सकती है

    लेकिन टीबी की एक स्थिति ऐसी भी होती है, जिसे लेटेंट टीबी कहा जाता है। इस स्थिति में टीबी के बैक्टीरिया शरीर में मौजूद तो रहते हैं, लेकिन निष्क्रिय अवस्था में होते हैं। इसका मतलब यह है कि संक्रमित व्यक्ति को कोई लक्षण महसूस नहीं होते और न ही वह दूसरों में संक्रमण फैलाता है

    हर साल विश्व टीबी दिवस 24 मार्च को मनाया जाता है, जिसका उद्देश्य इस बीमारी के प्रति जागरूकता फैलाना है। विशेषज्ञों के अनुसार लेटेंट टीबी को समझना बेहद जरूरी है, क्योंकि यह छुपी हुई स्थिति कभी भी सक्रिय टीबी में बदल सकती हैजब लेटेंट टीबी सक्रिय हो जाती है, तब इसके लक्षण सामने आने लगते हैं। इनमें लगातार खांसी, बुखार, वजन कम होना, रात में पसीना आना और थकान जैसे संकेत शामिल हैं। इसलिए अगर इन लक्षणों को नजरअंदाज किया जाए, तो यह बीमारी गंभीर रूप ले सकती है

    लेटेंट टीबी का खतरा उन लोगों में ज्यादा होता है जिनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होती है। इसमें एचआईवी संक्रमित, डायबिटीज के मरीज, कैंसर से पीड़ित लोग या लंबे समय से स्टेरॉयड दवाएं लेने वाले लोग शामिल हैं। इसके अलावा छोटे बच्चों और बुजुर्गों में भी इसका जोखिम अधिक होता हैविश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार दुनिया की बड़ी आबादी लेटेंट टीबी से प्रभावित है और भारत जैसे देशों में इसका खतरा और अधिक है। इसलिए समय रहते इसकी जांच और इलाज बेहद जरूरी है

    लेटेंट टीबी की पहचान के लिए ब्लड टेस्ट या ट्यूबरकुलिन स्किन टेस्ट किया जाता है। अगर रिपोर्ट पॉजिटिव आती है, तो डॉक्टर आमतौर पर 3 से 9 महीने तक दवाएं देते हैं, जिससे यह संक्रमण सक्रिय टीबी में बदलने से रोका जा सके

    बचाव के लिए जरूरी है कि अगर परिवार में किसी को लंबे समय तक खांसी, बुखार या अचानक वजन कम होने जैसी समस्या हो, तो तुरंत जांच कराई जाए। सही समय पर पहचान और इलाज से इस बीमारी को पूरी तरह नियंत्रित किया जा सकता हैलेटेंट टीबी एक छिपा हुआ खतरा है, जिसे नजरअंदाज करना भारी पड़ सकता है। समय पर जांच और उपचार ही इससे बचने का सबसे प्रभावी तरीका है

    Tags
    Tuberculosis, LatentTB, HealthAwareness, WHO, DiseasePrevention

  • परमाणु ठिकानों पर हमलों से बढ़ा खतरा, डब्ल्यूएचओ ने दी गंभीर चेतावनी

    परमाणु ठिकानों पर हमलों से बढ़ा खतरा, डब्ल्यूएचओ ने दी गंभीर चेतावनी


    जिनेवा।
    अमेरिका-इजराइल द्वारा ईरान पर किए हमले से पश्चिम एशिया में संकट की स्थिति बनी हुई है। इस बीच ईरान के परमाणु ठिकानों पर हो रहे हमलों को लेकर विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने गंभीर चिंता जताई है। संगठन ने चेतावनी दी है कि ऐसे हमले सार्वजनिक स्वास्थ्य और पर्यावरण के लिए बड़ा खतरा बन सकते हैं।

    डब्ल्यूएचओ के महानिदेशक डॉ टेड्रोस एडनॉम घेब्रेयसस ने बताया कि नतांज एनरिचमेंट कॉम्प्लेक्स और डिमोना जैसे संवेदनशील परमाणु स्थलों पर हमलों की खबरें सामने आई हैं। उन्होंने कहा कि इंटरनेशनल एटॉमिक एनर्जी एजेंसी इन घटनाओं की जांच कर रही है। फिलहाल किसी तरह के रेडिएशन स्तर में वृद्धि के संकेत नहीं मिले हैं, लेकिन स्थिति पर लगातार नजर रखी जा रही है।

    टेड्रोस ने चेतावनी दी कि परमाणु ठिकानों को निशाना बनाना बेहद खतरनाक है, क्योंकि इससे बड़े पैमाने पर जनस्वास्थ्य संकट और पर्यावरणीय नुकसान हो सकता है। अगर ऐसे हमले जारी रहते हैं, तो हालात और गंभीर हो सकते हैं।

    डब्ल्यूएचओ ने बताया कि युद्ध शुरू होने के बाद से 13 देशों में अपने स्टाफ और संयुक्त राष्ट्र के कर्मियों को संभावित न्यूक्लियर आपात स्थितियों से निपटने के लिए विशेष प्रशिक्षण दिया गया है।

    डब्ल्यूएचओ प्रमुख ने सभी पक्षों से सैन्य कार्रवाई में संयम बरतने और तनाव कम करने की अपील की। उन्होंने कहा कि आम नागरिकों की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए और मौजूदा संकट का समाधान केवल शांति और संवाद के जरिए ही संभव है।