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  • करवा चौथ से पहले शुक्र अस्त, फिर भी महिलाएं खरीद सकेंगी सुहाग का सामान, जानें कब करें ?

    करवा चौथ से पहले शुक्र अस्त, फिर भी महिलाएं खरीद सकेंगी सुहाग का सामान, जानें कब करें ?


    नई दिल्ली। करवा चौथ का व्रत इस साल 29 अक्टूबर 2026, गुरुवार को रखा जाएगा। पति की लंबी उम्र और सुखी वैवाहिक जीवन की कामना के साथ महिलाएं इस व्रत की तैयारियों में जुटी हैं। हालांकि, शुक्र ग्रह के अस्त होने और पंचक की समाप्ति को लेकर सुहाग सामग्री की खरीदारी के शुभ समय पर सवाल उठ रहे हैं। ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार, शुक्र अस्त होने से करवा चौथ का व्रत रखने या पूजा की सामग्री और सुहाग का सामान खरीदने पर रोक नहीं है।

    26 से 28 अक्टूबर तक कर सकती हैं खरीदारी

    ज्योतिषविदों के अनुसार, इस साल पंचक 25 अक्टूबर को शाम करीब 7 बजकर 22 मिनट पर समाप्त हो जाएगा। इसके बाद महिलाएं 26, 27 और 28 अक्टूबर को करवा चौथ की तैयारियों के लिए खरीदारी कर सकती हैं। सोमवार से ही त्योहार की तैयारी शुरू की जा सकती है।

    इन दिनों महिलाएं पूजा के लिए करवा, पूजा की थाली, दीपक और छलनी खरीद सकती हैं। इसके अलावा चूड़ियां, बिंदी, सिंदूर, मेहंदी, साड़ी और अन्य सुहाग सामग्री भी अपनी जरूरत और पसंद के अनुसार ली जा सकती है।

    क्या शुक्र अस्त होने पर सुहाग सामग्री खरीदना अशुभ है?

    ज्योतिष शास्त्र में शुक्र ग्रह को प्रेम, सौंदर्य, विवाह और वैवाहिक सुख का कारक माना जाता है। शुक्र के अस्त होने की अवधि में विवाह जैसे कुछ मांगलिक कार्यों के मुहूर्त को लेकर सावधानी बरती जाती है। इसी वजह से करवा चौथ की खरीदारी को लेकर भी महिलाओं के मन में असमंजस है।

    ज्योतिषाचार्यों के अनुसार, शुक्र अस्त होने का मतलब यह नहीं है कि करवा चौथ का व्रत नहीं रखा जा सकता या सुहाग का सामान खरीदना वर्जित है। महिलाएं चूड़ियां, सिंदूर, बिंदी, मेहंदी, नई साड़ी और पूजा सामग्री खरीद सकती हैं। सोशल मीडिया पर खरीदारी को लेकर फैल रही भ्रामक जानकारियों के बीच जरूरी है कि व्रत और विवाह जैसे अलग-अलग धार्मिक आयोजनों के नियमों को एक जैसा न समझें।

    29 अक्टूबर को शुक्र का उदय होने की जानकारी

    द्रिक पंचांग के अनुसार, शुक्र 12 अक्टूबर को शाम 6 बजकर 19 मिनट पर अस्त हुए थे। पंचांग में 29 अक्टूबर को शाम 6 बजे शुक्र के उदय होने का समय बताया गया है। ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार, शुक्र के उदय होने के बाद कुछ शुभ कार्यों के लिए अनुकूल समय माना जाता है।

    हालांकि, विवाह और अन्य मांगलिक कार्यों के मुहूर्त की शुरुआत को लेकर अलग-अलग पंचांगों और स्थानीय परंपराओं में अंतर हो सकता है। इसलिए विवाह की तारीख तय करने से पहले संबंधित पंचांग या योग्य ज्योतिषाचार्य से जानकारी लेना उचित रहेगा।

    करवा चौथ की पूजा के लिए पहले जुटा लें ये सामग्री

    करवा चौथ के दिन पूजा के समय किसी जरूरी वस्तु की कमी न हो, इसके लिए सामग्री पहले से खरीदकर रख लेना सुविधाजनक रहता है। पूजा के लिए करवा, छलनी, पूजा की थाली, दीपक, रोली, अक्षत, कलावा, फल और मिठाई जैसी चीजें जुटा लें।

    इसके साथ ही महिलाएं अपनी पसंद के अनुसार चूड़ियां, सिंदूर, बिंदी, मेहंदी, साड़ी या सूट भी खरीद सकती हैं। समय रहते तैयारी करने से व्रत के दिन की भागदौड़ कम होगी और पूजा की व्यवस्था आसानी से की जा सकेगी।

  • यूपी में विद्युत सखियों ने जमा कराए 3,720 करोड़ रुपये के बिजली बिल, कमीशन से कमाए 47 करोड़ रुपये

    यूपी में विद्युत सखियों ने जमा कराए 3,720 करोड़ रुपये के बिजली बिल, कमीशन से कमाए 47 करोड़ रुपये

    नई दिल्ली । उत्तर प्रदेश में विद्युत सखी योजना ग्रामीण महिलाओं के लिए रोजगार और आर्थिक आत्मनिर्भरता का माध्यम बन रही है। इस योजना के तहत स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी महिलाओं ने अब तक 3,720 करोड़ रुपये से अधिक के बिजली बिल जमा कराए हैं। इसके बदले उन्हें 47 करोड़ रुपये से ज्यादा कमीशन मिला है। इन महिलाओं ने करीब 1.80 करोड़ उपभोक्ताओं के बिजली बिलों के भुगतान में भूमिका निभाई है।

    उत्तर प्रदेश राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन और उत्तर प्रदेश पावर कॉरपोरेशन के समन्वय से संचालित इस योजना में अब तक 31 हजार से अधिक महिलाओं का पंजीकरण किया जा चुका है। इनमें 16 हजार से ज्यादा महिलाएं सक्रिय रूप से बिजली बिल जमा कराने का काम कर रही हैं। इस पहल का उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं को आय अर्जित करने का अवसर उपलब्ध कराने के साथ उपभोक्ताओं के लिए बिजली बिल भुगतान की सुविधा बढ़ाना है।

    योजना के माध्यम से महिलाएं अपने गांव और आसपास के इलाकों में रहकर ही काम कर सकती हैं। उन्हें रोजगार के लिए शहरों की ओर जाने की आवश्यकता नहीं होती। घरेलू जिम्मेदारियों के साथ आर्थिक गतिविधियों में भागीदारी का अवसर मिलने से महिलाएं परिवार की आमदनी में योगदान दे पा रही हैं। यह व्यवस्था ग्रामीण क्षेत्रों में स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर बढ़ाने की दिशा में भी महत्वपूर्ण है।

    विद्युत सखियों के काम से बिजली उपभोक्ताओं को भी सुविधा मिल रही है। ग्रामीणों को बिल जमा कराने के लिए दूर स्थित बिजली कार्यालयों या भुगतान केंद्रों तक जाने की जरूरत कम होती है। गांव में ही भुगतान की सुविधा मिलने से उनके समय और आने-जाने के खर्च की बचत हो सकती है। इस तरह योजना महिलाओं की आमदनी बढ़ाने के साथ ग्रामीण उपभोक्ताओं के लिए सेवा को अधिक सुलभ बनाने का प्रयास करती है।

    विद्युत सखियों को काम शुरू करने से पहले प्रशिक्षण दिया जाता है और डिजिटल भुगतान प्रणाली से जोड़ा जाता है। वे ई-वॉलेट के माध्यम से उपभोक्ताओं के बिजली बिल जमा करती हैं। इस काम के बदले उन्हें निर्धारित दर के अनुसार कमीशन मिलता है। योजना के तहत 2,000 रुपये तक का बिजली बिल जमा कराने पर 20 रुपये तक कमीशन दिया जाता है।

    डिजिटल भुगतान व्यवस्था से ग्रामीण क्षेत्रों में इलेक्ट्रॉनिक लेनदेन को बढ़ावा देने में भी मदद मिल रही है। विद्युत सखियां उपभोक्ताओं और बिजली विभाग के बीच एक संपर्क माध्यम के रूप में काम करती हैं। इससे ग्रामीणों को स्थानीय स्तर पर बिल भुगतान की सुविधा मिलती है, जबकि बिजली विभाग को राजस्व संग्रह के लिए अतिरिक्त माध्यम उपलब्ध होता है।

    राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन के मिशन निदेशक अरुण कुमार के मुताबिक, प्रदेश में 16 हजार से अधिक सक्रिय विद्युत सखियां ग्रामीण उपभोक्ताओं तक बिजली बिल भुगतान की सुविधा पहुंचा रही हैं। इस पहल से महिलाओं की आर्थिक स्थिति मजबूत करने और समाज में उनकी भागीदारी बढ़ाने का प्रयास किया जा रहा है।

    विद्युत सखी योजना महिला सशक्तीकरण, ग्रामीण रोजगार और जनसेवा को एक साथ जोड़ती है। अब तक 3,720 करोड़ रुपये से अधिक के बिजली बिल जमा कराने और 47 करोड़ रुपये से ज्यादा कमीशन अर्जित करने के आंकड़े इस योजना के दायरे को दर्शाते हैं। पंजीकृत महिलाओं में से 16 हजार से अधिक के सक्रिय होने के साथ यह पहल ग्रामीण क्षेत्रों में बिल भुगतान की सुविधा और महिलाओं के लिए आय के अवसर उपलब्ध करा रही है।

  • शिवपुरी में नारी इन साड़ी प्रतियोगिता का आयोजन, रैंप वॉक में महिलाओं ने पारंपरिक परिधानों से बिखेरा आकर्षण

    शिवपुरी में नारी इन साड़ी प्रतियोगिता का आयोजन, रैंप वॉक में महिलाओं ने पारंपरिक परिधानों से बिखेरा आकर्षण

    शिवपुरी में करवाचौथ के अवसर पर भारतीय परंपरा, पारंपरिक परिधानों और महिलाओं की प्रतिभा को समर्पित कार्यक्रम आयोजित किया गया। गुरुवार को कमलागंज स्थित होटल शगुन वाटिका में करवाचौथ मेले के साथ ‘नारी इन साड़ी’ सौंदर्य प्रतियोगिता संपन्न हुई। ‘नारी की शान है साड़ी’ थीम पर आयोजित इस कार्यक्रम में महिलाओं ने साड़ी पहनकर रैंप वॉक की और अपने आत्मविश्वास, व्यक्तित्व तथा भारतीय संस्कृति के प्रति लगाव का प्रदर्शन किया। आयोजन महिला समन्वय एवं विश्व मांगल्य सभा के संयुक्त तत्वावधान में किया गया।

    कार्यक्रम में प्रतियोगिता के साथ खरीदारी और उत्सव से जुड़ी गतिविधियां भी आकर्षण का केंद्र रहीं। मेले में आर्टिफिशियल ज्वेलरी, फैशनेबल एवं डिजाइनर सूट, साड़ियां, करवाचौथ की पूजन सामग्री और घर की सजावट से संबंधित सामान के स्टॉल लगाए गए। इसके अलावा नमकीन, पापड़ तथा खानपान से जुड़े विभिन्न उत्पाद भी उपलब्ध रहे। जलपान के लिए छोटे-छोटे स्टॉल लगाए गए थे, जहां लोगों को खरीदारी के साथ खानपान के विकल्प मिले।

    इस मेले में शिवपुरी के दुकानदारों के अलावा करेरा, झांसी, ग्वालियर और इंदौर से भी व्यापारी पहुंचे। विभिन्न शहरों से आए दुकानदारों की भागीदारी के कारण मेले में अलग-अलग तरह के उत्पाद देखने और खरीदने का अवसर मिला। आयोजन में करवाचौथ की तैयारियों से जुड़ी सामग्री के साथ महिलाओं की रुचि के अनुरूप परिधान और सजावटी वस्तुएं भी प्रदर्शित की गईं।

    प्रतियोगिता में लगभग 15 महिलाओं ने हिस्सा लिया। सभी प्रतिभागियों ने साड़ी पहनकर रैंप वॉक की और अपनी प्रस्तुति के माध्यम से व्यक्तित्व तथा आत्मविश्वास का परिचय दिया। प्रतियोगिता में नवनीता जैन ने प्रथम स्थान प्राप्त किया। कुमारी ऋतु दूसरे स्थान पर रहीं, जबकि ग्वालियर की विनीता ने तीसरा स्थान हासिल किया। अपनी प्रस्तुति से अलग पहचान बनाने वाली रुपाली सोनी को विशेष पुरस्कार प्रदान किया गया।

    प्रतियोगिता में विजेताओं के लिए नकद पुरस्कार भी निर्धारित किए गए थे। प्रथम स्थान प्राप्त करने वाली नवनीता जैन को 5,100 रुपये, द्वितीय स्थान पर रहीं ऋतु को 3,100 रुपये और तृतीय स्थान प्राप्त करने वाली विनीता को 2,100 रुपये दिए गए। विशेष पुरस्कार के रूप में रुपाली सोनी को 1,100 रुपये की राशि प्रदान की गई। पुरस्कार महिला समन्वय की अध्यक्ष डॉ. सुषमा पांडेय और विश्व मांगल्य सभा की अध्यक्ष विभा रघुवंशी ने वितरित किए।

    कार्यक्रम का एक विशेष आकर्षण साक्षी अग्रवाल की प्रस्तुति रही। वह अपने दोनों बच्चों के साथ रैंप वॉक करती नजर आईं। उनकी इस प्रस्तुति ने दर्शकों का ध्यान आकर्षित किया। इसके अलावा कार्यक्रम के दौरान दर्शकों से तेजी से सवाल पूछने की गतिविधि भी आयोजित की गई। सही जवाब देने वाले प्रतिभागियों को उपहार देकर प्रोत्साहित किया गया।

    कार्यक्रम की शुरुआत विश्व मांगल्य सभा के छायाचित्र पर माल्यार्पण और दीप प्रज्वलन के साथ हुई। शांति गीत सुमन तिवारी और राधा सूर्यवंशी ने प्रस्तुत किया। प्रतियोगिता के निर्णायक मंडल में डॉ. आकांक्षा गौड़, दीपा शर्मा और दिव्या व्यास शामिल रहीं। मंच संचालन मणिका शर्मा ने किया। समापन पर निर्णायकों को स्मृति चिह्न स्वरूप उपहार भेंट किए गए, जबकि प्रतियोगिता में शामिल सभी प्रतिभागियों को प्रमाण-पत्र देकर सम्मानित किया गया।

  • दुनिया के लिए नजीर बना ताइवान… आरक्षण ने बदली संसद की तस्वीर…. 42% सीटों पर महिलाएं काबिज

    दुनिया के लिए नजीर बना ताइवान… आरक्षण ने बदली संसद की तस्वीर…. 42% सीटों पर महिलाएं काबिज


    ली युआन।
    भारत (India) में संसद से लेकर विधानसभाओं तक महिलाओं के उचित प्रतिनिधित्व के लिए चल रही सियासत के बीच ताइवान (Taiwan) दुनियाभर के लिए नजीर बनकर सामने आया है। जिस ताइवान (Taiwan) को दुनिया अत्याधुनिक सेमीकंडक्टर चिप (State-art Semiconductor Chip) के सबसे बड़े निर्माता के नजरिये से देखती है, उसी 2.3 करोड़ की आबादी वाले द्वीप ने लोकतंत्र में महिलाओं की भागीदारी के लिए और लैंगिक भेदभाव खत्म करने के लिए दुनिया का सबसे लंबा अभियान चलाया है।

    करीब 80 साल पहले शुरू की गई आरक्षण व्यवस्था का नतीजा यह निकला कि आज ताइवान की संसद में 42% सीटों पर महिलाएं काबिज हैं। यह पूरे एशिया में सबसे अधिक है और यूरोपीय देशों के बराबर है। यही नहीं, ताइवान 2016 में त्साइ इंग-वेन के रूप में अपनी पहली महिला राष्ट्रपति चुन चुका है और दो बार महिलाओं को उप-राष्ट्रपति भी बना चुका है। इस उपाय ने ऐसा रास्ता तैयार किया कि आज बड़ी संख्या में महिलाएं सामान्य चुनावी मुकाबलों में भी अपनी जगह बना रही हैं।

    खास बात यह है कि ताइवान ने 2008 में एकल-सदस्यीय निर्वाचन क्षेत्रों में लैंगिक कोटा समाप्त कर दिया। इसके बाद भी संसद में महिलाओं का प्रतिनिधित्व बढ़ता रहा। ताइवान का यह प्रयोग साबित करता है कि जब महिलाओं को कानूनी सुरक्षा (कोटा) के जरिए शुरुआती मंच दिया जाता है, तो समय के साथ वे अपनी काबिलियत के दम पर उस बैसाखी को बेअसर कर देती हैं और बराबरी के मैदान में अपनी योग्यता का परचम लहराती हैं।


    1946 से बदलाव की नींव, 5-10% आरक्षण से शुरू हुआ सफर

    ताइवान ने महिलाओं के राजनीतिक प्रतिनिधित्व को बढ़ाने के लिए आरक्षित सीटों और चुनावी कोटा का इस्तेमाल दूसरे कई देशों से पहले शुरू किया था। जरूरत पड़ने पर समय-समय पर इसमें बदलाव भी करता रहा।

    चीन गणराज्य ने 1946 के संविधान में महिलाओं के लिए सीटें आरक्षित की थीं। 1949 में जब नेशनलिस्ट सरकार ताइवान स्थानांतरित हुई, तो तानाशाही दौर के बावजूद स्थानीय चुनावों में 5 से 10% कोटा लागू रखा गया।


    2002 का क्रांतिकारी नियम :

    यदि किसी जिला परिषद सीट से 4 या उससे अधिक सदस्य चुने जाते हैं, तो कम से कम 1 सीट महिला उम्मीदवार को मिलेगी। इससे राजनीतिक दलों में महिला उम्मीदवारों को टिकट देने की होड़ मच गई। ताइवान की 113 सदस्यीय संसद में 47 महिलाएं हैं। वर्ष 1992 के आसपास संसद में महिलाओं की हिस्सेदारी करीब 10 फीसदी थी। इसके बाद इसमें लगातार वृद्धि हुई।


    जीत के लिए आरक्षित सीटों की जरूरत खत्म

    नेशनल ताइवान यूनिवर्सिटी की प्रो. चांग-लिंग हुआंग कहती हैं, लोग तर्क देते हैं कि चुनाव का मकसद केवल सबसे बेहतर और सबसे सक्षम व्यक्ति को चुनना होना चाहिए। ताइवान का अनुभव बताता है कि लैंगिक आरक्षण ही वह माध्यम है, जो किसी समाज को वास्तव में सबसे बेहतर और सबसे सक्षम लोगों को चुनने का मौका देता है। 2002 में 31 जिलों में कोटे का इस्तेमाल करना पड़ा था, वहीं 2022 में केवल 4 जिलों में ही इसकी जरूरत पड़ी, यानी महिलाएं आसानी से पुरुषों को हरा रही हैं।

  • अमेरिका के जंगलों में महिलाओं के लिए खास गुस्सा शिविर, चीखने-चिल्लाने से भावनाएं जाहिर करने का मौका, फीस 51 हजार रुपये से शुरू

    अमेरिका के जंगलों में महिलाओं के लिए खास गुस्सा शिविर, चीखने-चिल्लाने से भावनाएं जाहिर करने का मौका, फीस 51 हजार रुपये से शुरू

    नई दिल्ली । रिश्तों में तनाव, निजी जीवन की परेशानियों और दुनिया की घटनाओं से पैदा होने वाला गुस्सा कई बार लोगों के लिए संभालना मुश्किल हो जाता है। ऐसे में अमेरिका में महिलाओं के लिए विशेष शिविर आयोजित किए जा रहे हैं, जहां उन्हें बिना किसी डर या आलोचना के अपनी भावनाएं व्यक्त करने का अवसर मिलता है। इन शिविरों में महिलाएं जंगल के बीच एकत्र होती हैं और आवाज निकालने, चीखने-चिल्लाने तथा शारीरिक गतिविधियों के माध्यम से अपना गुस्सा जाहिर करती हैं। आयोजकों का कहना है कि इन कार्यक्रमों का उद्देश्य ऐसी जगह उपलब्ध कराना है, जहां महिलाएं अपनी भावनाओं को लेकर असहज महसूस न करें।

    पोर्टलैंड के पास ओरेगन के जंगलों में एमी आर्मस्ट्रांग के ‘होली रेज रिट्रीट’ में महिलाओं के छोटे समूह हिस्सा लेते हैं। यहां एक समूह में अधिकतम 10 महिलाओं को शामिल किया जाता है। कार्यक्रम के दौरान एक महिला को जोर से चीखते देखकर दूसरी महिलाओं को भी अपनी आवाज के जरिए भावनाएं व्यक्त करने का अवसर मिलता है। इसके बाद सामूहिक चर्चा होती है, जिसमें प्रतिभागी अपने अनुभव साझा करती हैं। शिविर के एक चरण में लिखे गए पत्रों को जलाया जाता है और अंत में गीत के साथ कार्यक्रम पूरा किया जाता है।

    आर्मस्ट्रांग ने अगस्त 2025 में इन शिविरों की शुरुआत की थी। आधे दिन के कार्यक्रम की शुरुआत ध्यान अभ्यास से होती है। वह इस अभ्यास को शरीर को कविता के रूप में महसूस करने की प्रक्रिया बताती हैं। इसके बाद प्रतिभागियों को आवाज निकालने और शारीरिक गतिविधियों के जरिए अपनी भावनाएं जाहिर करने का अवसर दिया जाता है। इसमें इच्छानुसार चीखना या गुर्राना भी शामिल है। आयोजक समूह का आकार छोटा रखती हैं, ताकि प्रत्येक महिला को पर्याप्त सहयोग मिल सके।

    इन शिविरों में भाग लेने के लिए अलग-अलग शुल्क निर्धारित हैं। आर्मस्ट्रांग साढ़े तीन घंटे के सत्र के लिए करीब 51 हजार रुपये लेती हैं। वहीं, बे एरिया सीबीटी सेंटर कई दिनों के कार्यक्रम आयोजित करता है। इसके पांच दिन के शिविर का शुल्क करीब 2 लाख 97 हजार 500 रुपये और सात दिन के कार्यक्रम का शुल्क लगभग 3 लाख 82 हजार 500 रुपये है। इन पैकेज में रहने, भोजन और थेरेपी सत्र शामिल हैं। लंबे कार्यक्रम में अतिरिक्त गतिविधियां और बाद में सहायता भी दी जाती है।

    एक अन्य विकल्प के तहत लेव की वेबसाइट पर एक से तीन दिन के शिविर के लिए करीब 2 लाख 12 हजार 500 रुपये का शुल्क बताया गया है। इसमें शामिल होने से पहले प्रतिभागियों को एक प्रश्नावली भरनी होती है। इसके जरिए उनकी पसंद, कार्यक्रम की अवधि, अनुभव की तीव्रता और उन विषयों के बारे में जानकारी ली जाती है, जिन पर वे काम करना चाहती हैं। लेव के अनुसार, केंद्र ने मई में 16 प्रतिभागियों के साथ अपना पहला गुस्सा शिविर आयोजित किया था। दूसरा शिविर अक्टूबर के अंत में आयोजित करने की योजना है। उन्होंने बताया कि इस तरह के कार्यक्रमों में महिलाओं की रुचि अधिक रही है और भविष्य में इन्हें विस्तार देने की उम्मीद है।

    आर्मस्ट्रांग के मुताबिक, शिविर में आने वाली महिलाओं की उम्र लगभग 20 से 50 वर्ष के बीच होती है। इनमें कई महिलाएं तलाक, बीमारी, रिश्ते टूटने या अपने धार्मिक विश्वासों पर दोबारा विचार करने जैसे जीवन के बदलावों से गुजर रही होती हैं। उन्होंने कहा कि लोग ऐसी जगह चाहते हैं, जहां उन्हें अपमानित महसूस किए बिना अपनी भावनाएं व्यक्त करने की आजादी मिले। प्रतिभागियों की पहले जांच भी की जाती है, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि भावनात्मक परेशानियों से निपटने के लिए उनके पास उचित सहायता उपलब्ध है। कार्यक्रम में फोटोग्राफी भी की जाती है, जिसे महिलाएं खुद को सामान्य सामाजिक छवि से अलग नजरिए से देखने के अवसर के रूप में अनुभव कर सकती हैं।

  • क्या जोखिम भरे काम महिलाओं के लिए नहीं? सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी के बाद फिर छिड़ी लैंगिक समानता पर बहस

    क्या जोखिम भरे काम महिलाओं के लिए नहीं? सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी के बाद फिर छिड़ी लैंगिक समानता पर बहस


    नई दिल्ली।
    रोजगार के क्षेत्र में महिलाओं के साथ होने वाले भेदभाव को लेकर सुप्रीम कोर्ट की हालिया टिप्पणी ने एक पुरानी लेकिन महत्वपूर्ण बहस को फिर सामने ला दिया है। सवाल यह है कि क्या किसी काम में जोखिम होने मात्र से महिलाओं को उससे दूर रखा जा सकता है? अदालत के सामने करीब चार दशक पुराना मामला आया, जिसमें एक महिला को केवल इसलिए नौकरी नहीं दी गई क्योंकि काम में गैस सिलेंडर उठाना शामिल था।

    मामला हरियाणा की सुमित्रा का है। उन्होंने 1988 में इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन के करनाल स्थित एलपीजी बॉटलिंग प्लांट में हेल्पर के पद के लिए आवेदन किया था। वह निर्धारित योग्यता पूरी करती थीं और 49 उम्मीदवारों की सूची में शामिल थीं। इनमें से 43 उम्मीदवारों को नियुक्ति दे दी गई, लेकिन सुमित्रा को नौकरी नहीं मिली। बाद में सामने आया कि महिला होने के कारण उन्हें सिलेंडर उठाने जैसे काम के लिए अनुपयुक्त माना गया था।

    घर में सिलेंडर उठाने वाली महिला नौकरी के लिए अयोग्य कैसे?

    सुप्रीम कोर्ट ने इसी सोच पर सवाल उठाया। अदालत ने कहा कि जब घरों में महिलाएं खुद गैस सिलेंडर उठाती और बदलती हैं, तो केवल महिला होने के आधार पर किसी उम्मीदवार को ऐसे काम के लिए अयोग्य मानना उचित नहीं कहा जा सकता।

    लंबी कानूनी लड़ाई के कारण अब सुमित्रा की नियुक्ति की उम्र निकल चुकी थी। ऐसे में अदालत ने इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन को उन्हें 12 लाख रुपये का एकमुश्त मुआवजा देने का निर्देश दिया।

    यह फैसला सिर्फ एक महिला को मुआवजा देने तक सीमित नहीं है। इसके जरिए उस मानसिकता पर भी सवाल खड़ा हुआ है, जिसमें किसी व्यक्ति की क्षमता का आकलन उसके कौशल, प्रशिक्षण और वास्तविक शारीरिक योग्यता के बजाय उसके महिला या पुरुष होने के आधार पर किया जाता है।

    जोखिम से बचाना और अवसर से वंचित करना अलग बात

    आज महिलाएं उन क्षेत्रों में भी अपनी क्षमता साबित कर रही हैं, जिन्हें लंबे समय तक पुरुषों के लिए आरक्षित माना जाता था। वे लड़ाकू विमान उड़ा रही हैं और सेना में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभाल रही हैं। ऐसे में किसी महिला को सिर्फ इसलिए किसी काम के लिए अनुपयुक्त मान लेना कि उसमें जोखिम है, पुराने लैंगिक पूर्वाग्रह को मजबूत करता है।

    हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि जोखिम वाले कामों में सुरक्षा मानकों को नजरअंदाज किया जाए। किसी भी खतरनाक काम के लिए जरूरी सुरक्षा व्यवस्था, प्रशिक्षण और स्वास्थ्य मानकों का पालन कर्मचारी की लैंगिक पहचान से अलग होना चाहिए।

    दरअसल, महिलाओं को जोखिम से बचाने और जोखिम का हवाला देकर महिलाओं को अवसर से वंचित करने में बड़ा अंतर है। सुरक्षा के नाम पर महिलाओं को किसी पूरे कार्यक्षेत्र से बाहर कर देना समान अवसर की भावना के अनुरूप नहीं कहा जा सकता।

    योग्यता हो कसौटी, लिंग नहीं

    सही तरीका यह है कि किसी काम की वास्तविक जरूरतों और उससे जुड़े जोखिमों का वैज्ञानिक आकलन किया जाए। उसके बाद कर्मचारियों को जरूरी प्रशिक्षण और सुरक्षा उपकरण उपलब्ध कराए जाएं तथा चयन योग्यता के आधार पर हो।

    इस संदर्भ में रिव्यू ऑफ इकनॉमिक स्टडीज में प्रकाशित डेनमार्क के एक अध्ययन का भी उल्लेख किया जा सकता है। अध्ययन में पाया गया कि छोटे व्यवसायों में पुरुष प्रबंधक की पहली संतान बेटी होने के बाद महिलाओं की सापेक्ष रोजगार स्थिति और कमाई में वृद्धि हुई। महिलाओं की सापेक्ष कमाई में 4.4 प्रतिशत और रोजगार में 2.9 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई।

    हालांकि डेनमार्क के इस अध्ययन के निष्कर्षों को सीधे भारत पर लागू करना उचित नहीं होगा, क्योंकि दोनों देशों की सामाजिक परिस्थितियां और श्रम बाजार की संरचना अलग हैं। फिर भी यह शोध इस ओर संकेत करता है कि कार्यस्थल पर महिलाओं को लेकर बनी धारणाएं स्थायी नहीं होतीं और व्यक्तिगत व सामाजिक अनुभवों के साथ उनमें बदलाव संभव है।

    सुरक्षा जरूरी, लेकिन अवसर की कीमत पर नहीं

    भारत में चुनौती यह होनी चाहिए कि हर काम के लिए समान अवसर और समान मूल्यांकन सुनिश्चित किया जाए। गर्भावस्था, मातृत्व और कार्यस्थल की सुरक्षा जैसी परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए भेदभाव रहित व्यवस्था बनाना जरूरी है। संरक्षण का उद्देश्य महिलाओं से अवसर छीनना नहीं, बल्कि उनके लिए सुरक्षित कार्य वातावरण तैयार करना होना चाहिए।

    इसलिए महिलाओं को जोखिम वाले काम से दूर रखने का सवाल उठाने से पहले यह देखना जरूरी है कि क्या उस काम को सुरक्षित बनाया जा सकता है और क्या संबंधित महिला उसके लिए आवश्यक योग्यता रखती है। अगर दोनों सवालों का जवाब हां है, तो केवल महिला होने के कारण उसके लिए अवसर का दरवाजा बंद करने का तार्किक आधार नहीं बचता।

    सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी का व्यापक संदेश भी यही है कि रोजगार में समानता केवल नियुक्ति पत्र हासिल करने का अधिकार नहीं है। यह उस सोच को बदलने का सवाल भी है, जो पहले ही तय कर लेती है कि कौन व्यक्ति कौन-सा काम कर सकता है और कौन नहीं।

    समाज को महिलाओं के लिए न तो कृत्रिम विशेषाधिकार चाहिए और न ही कृत्रिम सीमाएं। जरूरत समान अवसर, समान कसौटी और सुरक्षित कार्यस्थल की है। आखिर किसी काम की कठिनाई या जोखिम के आधार पर यह तय नहीं होना चाहिए कि उसे महिला कर सकती है या पुरुष। काम की जरूरतें यह तय करें कि कर्मचारी में कौन-सी योग्यता होनी चाहिए और उस कसौटी पर हर व्यक्ति को समान अवसर मिलना चाहिए।

  • ईरान में महिलाओं का साहसिक कदम…. बिना हिजाब पहने 10 किमी दौड़ में लिया हिस्सा

    ईरान में महिलाओं का साहसिक कदम…. बिना हिजाब पहने 10 किमी दौड़ में लिया हिस्सा


    तेहरान।
    ईरान (Iran) की राजधानी तेहरान में महिलाओं के एक समूह ने देश के अनिवार्य हिजाब कानून का खुलेआम उल्लंघन करते हुए बिना हिजाब (Without Hijab) पहने 10 किलोमीटर की दौड़ (10 Kilometer Race) प्रतियोगिता में भाग लिया। यह साहसिक कदम ऐसे समय उठाया गया है जब ईरानी अधिकारी पहले भी इसी तरह बिना हिजाब के दौड़ के आयोजन पर सख्त कार्रवाई कर चुके थे। यह प्रतियोगिता वेलायात पार्क में आयोजित की गई थी, जिसमें पुरुषों और महिलाओं के लिए अलग-अलग दौड़ की व्यवस्था थी।


    10 किमी की दौड़ प्रतियोगिता में भाग लिया

    सोशल मीडिया पर बिना हिजाब के दौड़ती महिलाओं के वीडियो वायरल हो रहे हैं। इस घटना ने ईरान के सख्त हिजाब कानून की ओर दुनिया का ध्यान खींचा है।


    युद्ध के बीच ईरान का शक्ति प्रदर्शन 3,13,000 लोगों ने दिखाई ताकत

    तेहरान। ईरान में शुक्रवार को सरकार के आह्वान पर बड़ी संख्या में लोग सड़कों पर उतरे। सरकारी मीडिया के अनुसार, तेहरान में 3.13 लाख लोगों ने मार्च में हिस्सा लिया, जबकि रिवोल्यूशनरी गार्ड्स के कमांडर जनरल हसन हसांजादेह ने दावा किया कि छह लाख से अधिक लोग सीमित सैन्य प्रशिक्षण के लिए पंजीकरण करा चुके हैं और प्रशिक्षण में 10 लाख से अधिक लोगों के शामिल होने की उम्मीद है। तेहरान में प्रदर्शनकारियों ने ईरानी झंडे लेकर मार्च किया और देश की रक्षा के लिए हथियार उठाने की तैयारी जताई। सरकार ने इस अभियान को ‘जांफदाये ईरान’ यानी ‘ईरान के लिए जान कुर्बान करने वाले’ नाम दिया है। राज्य मीडिया कई दिनों से लोगों से इसमें शामिल होने की अपील कर रहा था।

  • पीएम मोदी के जन्मदिन पर अन्नपूर्णा दिवस, बंगाल में महिलाओं के खातों में पहुंच रही 3000 रुपये की वित्तीय सहायता

    पीएम मोदी के जन्मदिन पर अन्नपूर्णा दिवस, बंगाल में महिलाओं के खातों में पहुंच रही 3000 रुपये की वित्तीय सहायता

    नई दिल्ली ।पश्चिम बंगाल में 17 सितंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिन के अवसर पर अन्नपूर्णा दिवस मनाया जा रहा है। इस मौके पर अन्नपूर्णा योजना के तहत राज्य की पात्र महिलाओं के बैंक खातों में 3000 रुपये की वित्तीय सहायता भेजी जा रही है। इस महीने करीब 1.58 करोड़ महिलाओं को योजना का लाभ मिलने की जानकारी दी गई है।

    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिन के अवसर पर पश्चिम बंगाल में इस दिन को अन्नपूर्णा दिवस के रूप में मनाया जा रहा है। योजना के तहत लाभार्थी महिलाओं को सीधे उनके बैंक खातों में राशि भेजी जा रही है। इस दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पश्चिम बंगाल की माताओं और बहनों के प्रति अपने लगाव का भी उल्लेख किया।

    प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि उन्हें हमेशा पश्चिम बंगाल की माताओं और बहनों से बहुत प्यार मिला है। उन्होंने विश्वकर्मा पूजा की शुभकामनाएं देते हुए अन्नपूर्णा योजना का भी जिक्र किया। उनके अनुसार, इस योजना के जरिए बंगाल की महिलाओं को नई ताकत मिली है। उन्होंने योजना का लाभ उठाने वाली प्रत्येक महिला को बधाई भी दी।

    प्रधानमंत्री ने बंगाल में हुए राजनीतिक बदलाव का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि इस साल 4 मई को बंगाल ने बदलाव का एक नया रास्ता चुना और उन्हें पता है कि इस बदलाव में बंगाल की माताओं और बहनों ने सबसे अहम भूमिका निभाई।

    अन्नपूर्णा योजना के तहत सितंबर महीने में करीब 1.58 करोड़ महिलाओं को सीधे उनके बैंक खातों में 3000 रुपये की राशि मिलने की जानकारी मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी की ओर से दी गई है। इस योजना के लाभार्थियों की संख्या पिछले कुछ महीनों के दौरान बढ़ी है।

    जानकारी के अनुसार जून महीने में अन्नपूर्णा योजना के तहत 28 लाख महिलाओं को राशि मिली थी। इसके बाद जुलाई में लाभार्थियों की संख्या बढ़कर 1.19 करोड़ हो गई। सितंबर महीने में करीब 1.58 करोड़ महिलाओं को सहायता पहुंचाने की बात कही गई है।

    इस भुगतान की खास बात यह बताई गई है कि राशि सीधे महिलाओं के बैंक खातों में भेजी जा रही है। इसके साथ ही किसी तरह के बिचौलिये या कट-मनी की व्यवस्था नहीं होने की बात भी कही गई है। योजना के माध्यम से पात्र महिलाओं तक वित्तीय सहायता सीधे पहुंचाने पर जोर दिया जा रहा है।

    प्रधानमंत्री के जन्मदिन के मौके पर राज्य में अन्नपूर्णा दिवस मनाए जाने के साथ महिलाओं के खातों में सहायता राशि भेजी जा रही है। इस अवसर पर प्रधानमंत्री मोदी को देशभर से जन्मदिन की शुभकामनाएं भी दी जा रही हैं।

    अन्नपूर्णा योजना से जुड़ी इस पहल के तहत सितंबर महीने की राशि बड़ी संख्या में महिलाओं तक पहुंचाई जा रही है। 1.58 करोड़ लाभार्थियों का आंकड़ा जून और जुलाई की तुलना में अधिक है। इस तरह 17 सितंबर का दिन योजना के लाभार्थियों के लिए वित्तीय सहायता मिलने के लिहाज से महत्वपूर्ण है।

    पश्चिम बंगाल में अन्नपूर्णा दिवस के रूप में मनाए जा रहे इस दिन के दौरान योजना के लाभार्थियों को 3000 रुपये की राशि सीधे बैंक खातों में भेजने की प्रक्रिया जारी है। योजना के तहत लाभ पाने वाली महिलाओं को इस वित्तीय सहायता का लाभ मिल रहा है।

  • मुरैना में जन्माष्टमी पर मातम: मंदिर से लौट रही तीन महिलाओं को कंटेनर ने रौंदा, सास-बहू सहित एक अन्य की मौत

    मुरैना में जन्माष्टमी पर मातम: मंदिर से लौट रही तीन महिलाओं को कंटेनर ने रौंदा, सास-बहू सहित एक अन्य की मौत


    मुरैना। जन्माष्टमी की खुशी मातम में बदल गई। राष्ट्रीय राजमार्ग 44 पर शनिवार तडक़े तेज रफ्तार कंटेनर ने तीन महिलाओं को कुचल दिया। तीनों महिलाएं घिरोना हनुमान मंदिर में श्रीकृष्ण जन्म के दर्शन कर घर लौट रही थीं। हादसे में तीनों की मौत हो गई। जानकारी के अनुसार हादसा तडक़े करीब 4 बजे का है। हरफूल का पुरा गांव की रहने वाली महिलाएं रात में घिरोना हनुमान मंदिर में आयोजित जन्मोत्सव कार्यक्रम में शामिल होने गई थीं। दर्शन के बाद तीनों पैदल ही हाईवे किनारे से अपने घर लौट रही थीं। तभी दिल्ली की ओर जा रहे तेज रफ्तार कंटेनर ने उन्हें पीछे से टक्कर मार दी। टक्कर इतनी जबरदस्त थी कि एक महिला की मौके पर ही मौत हो गई, जबकि सास-बहू गंभीर रूप से घायल हो गईं। चीख-पुकार सुनकर ग्रामीण मौके पर पहुंचे और पुलिस को सूचना दी।
    सिविल लाइन थाना पुलिस ने घायलों को तुरंत जिला अस्पताल पहुंचाया, लेकिन उपचार के दौरान दोनों ने दम तोड़ दिया।
    इन महिलाओं की हुई मौत –
    मृतकों की पहचान कमला कुशवाहा पत्नी फूल सिंह (50), कमला कुशवाहा पत्नी बालकिशन (50) और पूनम कुशवाहा पत्नी धर्मवीर (28) के रूप में हुई है। तीनों हरफूल का पुरा, थाना सिविल लाइन की निवासी थीं।
    बताया जा रहा है कि पूनम अपनी दो सास के साथ मंदिर गई थी। हादसे के बाद कंटेनर चालक नियंत्रण खो बैठा और सडक़ किनारे बनी कुछ दुकानों में जा घुसा। इससे दुकानों को भी नुकसान पहुंचा है।
    ग्रामीणों ने कंटेनर को घेर लिया और चालक को पकडक़र पुलिस के हवाले कर दिया। पुलिस ने कंटेनर को जब्त कर चालक को हिरासत में ले लिया है।
    तीनों शवों का पोस्टमार्टम कराकर परिजनों को सौंप दिया गया है। गांव में एक साथ तीन अर्थियां उठने से पूरे इलाके में शोक का माहौल है।
    सरपंच राजपाल सिंह कुशवाहा ने बताया कि तेज रफ्तार ट्रक की टक्कर से 3 महिलाओं की मौत हुई है। जिसमें सास-बहु है। यह बहुत ही दर्दनाक हादसा है। ग्रामीणों ने चालक को पकड़ लिया है। पुलिस को चाहिए कि वाहनों की रफ्तार को कंट्रोल मे करवाएं।
    नगर पुलिस अधीक्षक दीपाल चंदोरिया ने बताया कि थाना सिविल लाइन मे ट्रक की चपेट मे आने से तीन महिलाओं की मौत हो गई है। एक की मौके पर मौत हो गई थी। पुलिस ने ट्रक को जब्त कर लिया है और चालक को भी पकड़ लिया है। मामला दर्ज कर वैधानिक कार्रवाई की जा रही है।
  • चंडीगढ़-मोहाली सीमा पर बड़े किसान आंदोलन की तैयारी… महिलाएं भी ट्रैक्टर-ट्रॉलियों के साथ हो रही शामिल

    चंडीगढ़-मोहाली सीमा पर बड़े किसान आंदोलन की तैयारी… महिलाएं भी ट्रैक्टर-ट्रॉलियों के साथ हो रही शामिल


    चंडीगढ़।
    संयुक्त किसान मोर्चा (Samyukt Kisan Morcha) का चंडीगढ़-मोहाली सीमा (Chandigarh-Mohali border) पर सात दिवसीय पक्का मोर्चा (Solid Front) जारी है। बृहस्पतिवार को प्रदेश के विभिन्न गांवों से किसान और महिलाएं ट्रैक्टर-ट्रॉलियों के साथ मोर्चा स्थल पर पहुंचीं। उन्होंने पानी संकट, कृषि मांगों, गन्ना मूल्य और लैंड पूलिंग नीति को लेकर सरकारों पर हमला बोला।

    मोर्चे में पंजाबी गायक भी समर्थन देने आए। बृहस्पतिवार को किसानों ने बैठक कर मोर्चे को आगे बढ़ाने की रणनीति तय की और नारेबाजी भी की। मोर्चे की अध्यक्षता कर रहे मनजीत सिंह धनेर (Manjit Singh Dhaner) और बलबीर सिंह राजेवाल (Balbir Singh Rajewal) ने पंजाब में गहराते जल संकट को गंभीर बताया। उन्होंने कहा कि भूजल और नदियों के प्रदूषण से खेती, पशुधन व आम लोगों का स्वास्थ्य प्रभावित हो रहा है। किसान नेता हरिंदर सिंह लख्खोवाल ने कहा, यदि सरकारें बातचीत के लिए आगे नहीं बढ़ीं, तो किसान देशभर में आंदोलन करेंगे।


    राजेवाल कहेंगे एक साल यहीं रुको तो डेरा डाल देंगे

    रात के करीब तीन बज रहे हैं। हल्की बारिश के बाद मोहाली-चंडीगढ़ सीमा पर ठंडी हवा चल रही है। सड़क किनारे कतार में खड़ी ट्रैक्टर-ट्रॉलियों में अधिकांश किसान नींद ले रहे हैं जबकि कुछ जागकर साथियों और सामान की पहरेदारी कर रहे हैं। कहीं धीमी आवाज में आगे की रणनीति पर चर्चा चल रही है तो कुछ लोग सुबह शुरू होने वाले लंगर की तैयारी में जुटे हैं। पक्के मोर्चे के बीच आधी रात के बाद का यह दृश्य बता रहा है कि किसान केवल सात दिन के प्रदर्शन के लिए नहीं, जरूरत पड़ी तो लंबी लड़ाई के लिए भी तैयारी करके आए हैं।

    माछीवाड़ा से आए किसान हरवंत सिंह ने कहा कि हम राजेवाल की सुनेंगे। वह कहेंगे कि सात सितंबर को वापस घर चलो तो चले जाएंगे। अगर कहेंगे कि छह महीने या एक साल यहीं रुकना है तो हम यहीं डेरा डाल देंगे। हरवंत सिंह जथेदार राजा बलवीर सिंह के नेतृत्व में 32 ट्रॉलियों के साथ मोर्चे में पहुंचे हैं। उनका कहना है कि जब तक किसान नेतृत्व वापस जाने का फैसला नहीं करता, वे धरनास्थल से नहीं हटेंगे।

    एक सितंबर से शुरू हुए मोर्चे में पंजाब के अलग-अलग हिस्सों से किसानों के पहुंचने का सिलसिला लगातार बढ़ रहा है। पहले दिन करीब एक हजार ट्रैक्टर-ट्रॉलियां पहुंचने का दावा किया गया था। दूसरे दिन यह संख्या बढ़कर तीन हजार से अधिक होने की बात किसान संगठनों ने कही। आंदोलन में करीब 32 किसान जत्थेबंदियां शामिल हैं।


    आगामी रणनीति व मांगें

    किसान नेताओं ने शुक्रवार को मोर्चे की अहम बैठक बुलाई है जिसमें अगले संघर्ष का एलान किया जाएगा। उन्होंने पंजाब सरकार से विधानसभा का विशेष सत्र बुलाने की मांग की। किसानों ने पानी के पुराने समझौते और लैंड पूलिंग नीति रद्द करने की भी मांग की है। बासमती, मूंग, मक्का, आलू, मटर और गोभी जैसी फसलों की न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीद की गारंटी देने की भी मांग की गई है।