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  • कानपुर देहात की 360 महिलाएं बना रहीं करीब तीन लाख तिरंगे, ‘हर घर तिरंगा’ अभियान से बढ़ा रोजगार और आत्मनिर्भरता

    कानपुर देहात की 360 महिलाएं बना रहीं करीब तीन लाख तिरंगे, ‘हर घर तिरंगा’ अभियान से बढ़ा रोजगार और आत्मनिर्भरता

    नई दिल्ली । कानपुर देहात में इस बार ‘हर घर तिरंगा’ अभियान को सफल बनाने में ग्रामीण महिलाओं की महत्वपूर्ण भूमिका सामने आई है। राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन से जुड़े 96 स्वयं सहायता समूहों की करीब 360 महिलाएं दिन-रात मेहनत कर लगभग तीन लाख तिरंगे तैयार करने में जुटी हैं। इन महिलाओं के लिए तिरंगा बनाना केवल देशभक्ति से जुड़ा अभियान नहीं है, बल्कि रोजगार, आर्थिक मजबूती और आत्मनिर्भरता का भी माध्यम बन गया है। खास तौर पर गरीब, विधवा, दिव्यांग और कम पढ़ी-लिखी महिलाओं को इससे सम्मान के साथ काम करने का अवसर मिला है।

    कानपुर देहात में ‘हर घर तिरंगा’ अभियान को लेकर तैयारियां तेज हैं। महिला स्वयं सहायता समूहों को जिले में करीब तीन लाख तिरंगे तैयार करने का लक्ष्य दिया गया है। महिलाएं निर्धारित समय के भीतर इस लक्ष्य को पूरा करने के लिए लगातार काम कर रही हैं। तैयार किए जा रहे प्रत्येक तिरंगे की लंबाई 30 इंच और चौड़ाई 20 इंच रखी गई है। इसकी निर्धारित कीमत 20 रुपये तय की गई है। तैयार होने के बाद इन तिरंगों का इस्तेमाल जिले के स्कूलों, सरकारी कार्यालयों और अन्य सरकारी भवनों पर किया जाएगा।

    महिला स्वयं सहायता समूहों की भागीदारी ने इस अभियान को ग्रामीण अर्थव्यवस्था से भी जोड़ दिया है। उमंग स्वयं सहायता समूह की अध्यक्ष प्रतिमा सिंह के अनुसार, ज्यादा से ज्यादा महिलाओं को रोजगार से जोड़ना और उन्हें आर्थिक रूप से मजबूत बनाना इस पहल का महत्वपूर्ण उद्देश्य है। उनका कहना है कि आत्मनिर्भर भारत के साथ आत्मनिर्भर महिलाओं का निर्माण भी जरूरी है। स्वयं सहायता समूहों से जुड़ने के बाद ग्रामीण महिलाएं अपने हुनर का इस्तेमाल कर आय अर्जित कर रही हैं और साथ ही परिवार की जिम्मेदारियों में भी योगदान दे रही हैं।

    इस पहल का सबसे बड़ा प्रभाव उन महिलाओं पर दिखाई दे रहा है, जिनके लिए गांव में रोजगार के अवसर सीमित रहे हैं। गरीब, विधवा, दिव्यांग और कम शिक्षित महिलाओं को घर के आसपास काम मिलने से उनकी आर्थिक स्थिति मजबूत होने के साथ आत्मविश्वास भी बढ़ा है। महिलाओं का कहना है कि उन्हें काम के जरिए सम्मान और अपनी मेहनत की कमाई हासिल करने का अवसर मिल रहा है।

    कानपुर देहात की महिला स्वयं सहायता समूहों ने इससे पहले भी अपनी क्षमता दिखाई थी। पिछले वर्ष समूहों से जुड़ी महिलाओं ने करीब 200 मीटर लंबा तिरंगा तैयार किया था। उस दौरान तैयार किए गए झंडों पर महिलाओं को लागत निकालने के बाद करीब छह रुपये तक का मुनाफा मिला था। इस बार भी तिरंगे तैयार करने में आने वाली लागत स्वयं सहायता समूहों की महिलाएं वहन करेंगी और बिक्री से होने वाला मुनाफा सीधे समूह की महिलाओं को मिलेगा।

    राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन के उपायुक्त अशोक कुमार ने कहा कि ‘हर घर तिरंगा’ अभियान के माध्यम से कानपुर देहात की महिलाएं सिर्फ राष्ट्रीय ध्वज तैयार नहीं कर रही हैं, बल्कि आत्मनिर्भरता, सम्मान और महिला सशक्तीकरण की नई मिसाल भी पेश कर रही हैं। तीन लाख तिरंगे तैयार करने का यह अभियान ग्रामीण महिलाओं के हुनर को पहचान देने के साथ उनके लिए स्थायी आर्थिक अवसरों की दिशा में भी महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

  • Women T-20 Asia Cup 2026 का शेड्यूल जारी…. 5 सितंबर को होगी भारत-पाकिस्तान की भिड़ंत

    Women T-20 Asia Cup 2026 का शेड्यूल जारी…. 5 सितंबर को होगी भारत-पाकिस्तान की भिड़ंत


    दुबई।
    महिला टी20 एशिया कप 2026 (Women Asia Cup 2026) का आयोजन 28 अगस्त से 13 सितंबर तक दुबई में होगा। भारतीय महिला टीम (Indian Women’s Team) अपने अभियान की सबसे बड़ी चुनौती 5 सितंबर को पाकिस्तान (Pakistan) के खिलाफ खेलेगी. टूर्नामेंट में आठ टीमें हिस्सा लेंगी. ग्रुप राउंड के बाद शीर्ष दो टीमें सेमीफाइनल में पहुंचेंगी, जबकि फाइनल मुकाबला 13 सितंबर को खेला जाएगा।

    एशियन क्रिकेट काउंसिल (ACC) ने गुरुवार (6 अगस्त) को टूर्नामेंट का शेड्यूल जारी किया. इस बार क्रिकेट प्रेमियों की सबसे ज्यादा नजर 5 सितंबर पर रहेगी, जब भारत और पाकिस्तान की महिला टीमें दुबई इंटरनेशनल क्रिकेट स्टेडियम में आमने-सामने होंगी।

    आठ टीमों वाला यह टूर्नामेंट 28 अगस्त से शुरू होगा और 13 सितंबर तक चलेगा. उद्घाटन मुकाबला ग्रुप-A में हॉन्गकॉन्ग और थाईलैंड के बीच खेला जाएगा।

    भारत को ग्रुप-A में पाकिस्तान, थाईलैंड, हॉन्गकॉन्ग और चीन के साथ रखा गया है. दूसरी ओर ग्रुप-B में मौजूदा चैम्प‍ियन श्रीलंका के साथ बांग्लादेश, मेजबान यूएई और इंडोनेशिया शामिल हैं।

    टूर्नामेंट टी20 फॉर्मेट में खेला जाएगा. दोनों ग्रुप की सभी टीमें एक-दूसरे के खिलाफ एक-एक मैच खेलेंगी. इसके बाद दोनों ग्रुप की टॉप दो-दो टीमें सेमीफाइनल में जगह बनाएंगी।

    पहला सेमीफाइनल 10 सितंबर को ग्रुप-A की शीर्ष टीम और ग्रुप-B की दूसरे स्थान की टीम के बीच होगा. दूसरा सेमीफाइनल 11 सितंबर को ग्रुप-A की दूसरे स्थान की टीम और ग्रुप-B की शीर्ष टीम के बीच खेला जाएगा. फाइनल मुकाबला 13 सितंबर को आयोजित होगा।

    ग्रुप-B का सबसे बड़ा मुकाबला 6 सितंबर को श्रीलंका और बांग्लादेश के बीच खेला जाएगा. वहीं यूएई और इंडोनेशिया भी इसी ग्रुप का हिस्सा हैं. श्रीलंका इस टूर्नामेंट में डिफेंडिंग चैंपियन के तौर पर उतरेगा, जबकि बांग्लादेश ने 2018 में महिला एशिया कप का खिताब जीता था।

    भारत महिला एशिया कप के इतिहास की सबसे सफल टीम है. भारतीय टीम अब तक सात बार चैम्प‍ियन बन चुकी है. इनमें 2004, 2005, 2006 और 2008 में वनडे फॉर्मेट में जीते गए चार खिताब शामिल हैं, जबकि 2012, 2016 और 2022 में भारत ने टी20 फॉर्मेट में ट्रॉफी अपने नाम की थी।

  • यूसीसी महिलाओं और बेटियों को समाज में सुरक्षा और बराबरी का अधिकार दिलाएगा ; हेमंत खण्डेलवाल

    यूसीसी महिलाओं और बेटियों को समाज में सुरक्षा और बराबरी का अधिकार दिलाएगा ; हेमंत खण्डेलवाल


    भोपाल। भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष व विधायक हेमंत खण्डेलवाल ने मध्यप्रदेश विधानसभा में समान नागरिक संहिता (यूसीसी) विधेयक पारित होने पर मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव को बधाई देते हुए कहा कि मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व में मध्यप्रदेश ने यूसीसी लागू कर इतिहास रचा दिया है। भाजपा सरकार का यह निर्णय मध्यप्रदेश के इतिहास में सामाजिक न्याय, समानता और संवैधानिक मूल्यों को सशक्त बनाने वाला ऐतिहासिक अध्याय है। यूसीसी महिलाओं और बेटियों को समाज में सुरक्षा और बराबरी का अधिकार दिलाएगा। इस कानून से सामाजिक समरसता, महिला सशक्तिरण के साथ संवैधानिक मूल्यों को नई मजबूती मिलेगी।

    मध्यप्रदेश ने समान न्याय, समान अधिकारों की भावना को साकार किया
    भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष व विधायक श्री हेमंत खण्डेलवाल ने कहा कि विधानसभा द्वारा यूसीसी विधेयक पारित कर मध्यप्रदेश ने समान न्याय, समान अधिकारों की भावना को साकार किया है। प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी के समान न्याय और समान अधिकारों की भावना को साकार करने की दिशा में मध्यप्रदेश ने महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। लिव-इन रिलेशनशिप का 1 महीने में रजिस्ट्रेशन कराना अनिवार्य होगा। नियमों का उल्लंघन करना दण्डनीय अपराध है। हमारी सरकार ने जनजातीय समाज को यूसीसी कानून के दायरे से पूरी तरह बाहर रखा है। जनजातीय समुदाय की संस्कृति से कोई छेड़छाड़ नहीं की गई है। मध्यप्रदेश में अब एक ही कानून चलेगा। उन्होंने कहा कि महिलाओं के अधिकारों की रक्षा, सामाजिक समरसता तथा पारदर्शी कानूनी व्यवस्था स्थापित करने की दिशा में यह एक दूरगामी और प्रभावी निर्णय सिद्ध होगा।

    विधानसभा की स्वीकृति से संविधान की मूल भावना को मिली मजबूती
    भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष व विधायक श्री हेमंत खण्डेलवाल ने कहा कि समान नागरिक संहिता विधेयक का विधानसभा से पारित होना संविधान के नीति-निर्देशक तत्वों में निहित उस भावना को साकार करने वाला कदम है, जिसमें सभी नागरिकों के लिए समान नागरिक कानून की परिकल्पना की गई है। समान नागरिक संहिता समाज के सभी वर्गों के लिए समान कानूनी व्यवस्था सुनिश्चित करेगी, जिससे नागरिकों के अधिकार एवं कर्तव्य किसी पंथ अथवा व्यक्तिगत परंपराओं के आधार पर अलग-अलग न होकर संविधान की भावना के अनुरूप समान रूप से लागू होंगे। यह निर्णय न्यायिक समानता, सामाजिक समरसता और सुशासन को नई मजबूती प्रदान करेगा। उन्होंने कहा कि लंबे समय से विभिन्न व्यक्तिगत कानूनों के कारण विशेषकर महिलाओं को न्याय प्राप्त करने में अनेक व्यावहारिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता था। समान नागरिक संहिता इन चुनौतियों का समाधान प्रस्तुत करते हुए महिलाओं को अधिक अधिकार-संपन्न बनाने तथा उनके हितों की प्रभावी सुरक्षा सुनिश्चित करने का मार्ग प्रशस्त करेगी। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि समान नागरिक संहिता मध्यप्रदेश को अधिक समरस, न्यायपूर्ण और प्रगतिशील राज्य बनाने में मील का पत्थर सिद्ध होगी।
  • Pak: आतंकी संगठनों में अब महिलाओं की हो रही भर्ती… हनी ट्रैप की भी दी जा रही ट्रेनिंग

    Pak: आतंकी संगठनों में अब महिलाओं की हो रही भर्ती… हनी ट्रैप की भी दी जा रही ट्रेनिंग


    नई दिल्ली।
    भारत (India) की केंद्रीय खुफिया एजेंसियों (Intelligence agencies) के ताजा आकलन में पाकिस्तान (Pakistan) स्थित आतंकी संगठनों (Terrorist organizations) की रणनीति में बड़ा बदलाव सामने आया है। खुफिया इनपुट के अनुसार, आतंकी संगठन अब महिलाओं की सुनियोजित तरीके से भर्ती के लिए गुप्त प्रशिक्षण कार्यक्रम चला रहे हैं। इन प्रशिक्षण मॉड्यूल का उद्देश्य महिलाओं को आतंकवादी नेटवर्क में अलग-अलग भूमिकाओं के लिए तैयार करना है।

    ये प्रशिक्षण कार्यक्रम 2 से 4 सप्ताह तक चलते हैं और इन्हें व्यावसायिक प्रशिक्षण तथा जीवन कौशल सिखाने के नाम पर आयोजित किया जाता है। हालांकि, वास्तविक मकसद महिलाओं को आतंकी संगठनों के लिए तैयार करना है। एजेंसियों के अनुसार, इन कार्यक्रमों के लिए बैच बनाए जाते हैं। कुछ चुनिंदा मदरसों को भी इस अभियान का हिस्सा बनाया जाता है।

    इन स्थानों पर आने वाली महिला परिजनों के जरिए भर्ती और प्रशिक्षण की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया जा रहा है। प्रशिक्षण कार्यक्रम का प्रचार ऐसे किया जाता है कि यह मजबूत आस्था और उद्देश्यपूर्ण जीवन जीने की इच्छा रखने वाली महिलाओं के लिए है। इसके जरिए धार्मिक प्रतिबद्धता व व्यक्तिगत विकास को प्रमुख उद्देश्य बताकर महिलाओं को आकर्षित किया जाता है।


    ड्रोन संचालन की ट्रेनिंग

    प्रशिक्षण में महिलाओं को विभिन्न भूमिकाओं के लिए तैयार किया जा रहा है। इनमें शामिल हैं बैक-एंड लॉजिस्टिक और ऑपरेशनल सपोर्ट, तकनीकी सहायता, ड्रोन संचालन, खुफिया जानकारी जुटाना, हनी-ट्रैप के जरिए लक्ष्यों को फंसाना और समझौता कराने जैसी गतिविधियां। यह व्यवस्था आतंकियों को जमीनी स्तर पर मजबूत बैक-एंड सपोर्ट उपलब्ध कराने के उद्देश्य से तैयार की जा रही है।


    कई ठिकाने चिन्हित

    खुफिया एजेंसियों ने बहावलपुर, फैसलाबाद सहित आधा दर्जन से अधिक ऐसे स्थानों की पहचान की है, जहां महिलाओं को प्रशिक्षण दिया जा रहा है। ये इलाके पिछले दो दशकों से विभिन्न आतंकी संगठनों के प्रशिक्षण और लॉजिस्टिक केंद्र माने जाते रहे हैं।


    ऑपरेशन सिंदूर के बाद रणनीति में बदलाव

    खुफिया अधिकारियों का कहना है ऑपरेशन सिंदूर के बाद आतंकियों की भर्ती रणनीति में यह बड़ा बदलाव देखा गया है। महिलाओं की पहचान उनकी क्षमता और भूमिका के आधार पर की जा रही है और उन्हें विशेष कार्यों के लिए प्रशिक्षित किया जा रहा है।

  • मोदी 3.0 के पहले कैबिनेट विस्तार की चर्चा तेज, क्या युवाओं, महिलाओं और OBC को मिलेगा बड़ा प्रतिनिधित्व?

    मोदी 3.0 के पहले कैबिनेट विस्तार की चर्चा तेज, क्या युवाओं, महिलाओं और OBC को मिलेगा बड़ा प्रतिनिधित्व?


    नई दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के तीसरे कार्यकाल के पहले संभावित मंत्रिमंडल विस्तार को लेकर राजनीतिक हलकों में चर्चाएं तेज हो गई हैं। सूत्रों के मुताबिक, कैबिनेट विस्तार 5 जुलाई या 11 जुलाई के बाद कभी भी हो सकता है। हालांकि, सरकार की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि नई टीम में किन चेहरों को जगह मिलेगी और किन मंत्रियों की जिम्मेदारियों में बदलाव हो सकता है।

    नई सोशल इंजीनियरिंग पर हो सकता है जोर
    राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि इस बार मंत्रिमंडल विस्तार के जरिए युवाओं, महिलाओं और अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) को अधिक प्रतिनिधित्व देने की रणनीति अपनाई जा सकती है। माना जा रहा है कि इसके जरिए सरकार विकसित भारत-2047 के विजन, महिला सशक्तिकरण और आगामी विधानसभा चुनावों को ध्यान में रखते हुए व्यापक राजनीतिक संदेश देना चाहती है।

    युवा नेतृत्व को मिल सकता है अवसर
    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लगातार युवाओं को देश की सबसे बड़ी ताकत बताते रहे हैं। मौजूदा लोकसभा में 30 वर्ष से कम आयु का एक सांसद, 31 से 40 वर्ष के बीच 15 सांसद और 41 से 50 वर्ष आयु वर्ग के 39 सांसद हैं।

    वर्तमान केंद्रीय मंत्रिपरिषद में 50 वर्ष या उससे कम आयु के मंत्रियों की हिस्सेदारी लगभग 24 प्रतिशत है। आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2014 में पहली मोदी सरकार के मंत्रिमंडल की औसत आयु 62 वर्ष थी, जो 2019 में घटकर 60 वर्ष और 2021 के पुनर्गठन के बाद 58 वर्ष रह गई। वर्ष 2024 में भी मंत्रिपरिषद की औसत आयु 58 वर्ष है। ऐसे में माना जा रहा है कि इस बार और अधिक युवा सांसदों को मंत्रिमंडल में शामिल किया जा सकता है।

    क्या महिलाओं की बढ़ेगी भागीदारी?
    प्रधानमंत्री मोदी कई मंचों से महिलाओं को देश की प्रमुख शक्ति बताते रहे हैं। वर्तमान में संसद में एनडीए के 58 महिला सांसद हैं, जबकि केंद्रीय मंत्रिमंडल में केवल सात महिला मंत्री हैं। इनमें दो कैबिनेट मंत्री और पांच राज्य मंत्री शामिल हैं, जो कुल मंत्रियों का लगभग 10 प्रतिशत हैं।

    फिलहाल वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण, महिला एवं बाल विकास मंत्री अन्नपूर्णा देवी, रक्षा खडसे, शोभा करंदलाजे, अनुप्रिया पटेल, सावित्री ठाकुर और निमूबेन बंभानिया मंत्रिपरिषद का हिस्सा हैं। वर्ष 2021 के मंत्रिमंडल विस्तार में महिला मंत्रियों की संख्या 11 तक पहुंची थी, जो अब तक का सर्वाधिक आंकड़ा रहा है।

    राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि महिला आरक्षण से जुड़े मुद्दों और आगामी राजनीतिक समीकरणों को देखते हुए इस बार मंत्रिमंडल में नए महिला चेहरों को शामिल किया जा सकता है।

    OBC और SC वर्ग पर भी रह सकती है नजर
    मंत्रिमंडल विस्तार में ओबीसी प्रतिनिधित्व भी प्रमुख मुद्दा माना जा रहा है। विपक्ष लगातार जातिगत जनगणना और सामाजिक न्याय के मुद्दे पर सरकार को घेरता रहा है। 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद पिछड़े वर्ग के एक हिस्से में बदले राजनीतिक समीकरणों को भी सरकार ध्यान में रख सकती है।

    वर्तमान मंत्रिपरिषद में 27 मंत्री ओबीसी समुदाय से हैं, जो कुल मंत्रियों का लगभग 38 प्रतिशत हैं। इसके अलावा 10 मंत्री अनुसूचित जाति (एससी), पांच अनुसूचित जनजाति (एसटी) और पांच मंत्री अल्पसंख्यक समुदाय से आते हैं।

    विश्लेषकों का मानना है कि उत्तर प्रदेश और पंजाब सहित आगामी विधानसभा चुनावों को देखते हुए ओबीसी, एससी और महिला नेताओं को अधिक प्रतिनिधित्व मिल सकता है। ऐसे नेताओं को प्राथमिकता दिए जाने की भी संभावना जताई जा रही है, जो युवा होने के साथ-साथ सामाजिक प्रतिनिधित्व के लिहाज से भी महत्वपूर्ण हों।

    आधिकारिक घोषणा का इंतजार
    हालांकि मंत्रिमंडल विस्तार को लेकर अभी तक सरकार की ओर से कोई आधिकारिक जानकारी साझा नहीं की गई है। लेकिन राजनीतिक हलकों में यह चर्चा तेज है कि प्रदर्शन के आधार पर कुछ मंत्रियों के विभागों में फेरबदल हो सकता है, कुछ नए चेहरों को मंत्रिमंडल में शामिल किया जा सकता है और कुछ मौजूदा मंत्रियों की जिम्मेदारियों में बदलाव संभव है। अब सभी की नजर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अगले फैसले पर टिकी हुई है।

  • SC की बड़ी टिप्पणी, कहा- आज्ञाकारी पत्नी बनने के लिए महिलाएं क्यों दे अपने करियर की बलि?

    SC की बड़ी टिप्पणी, कहा- आज्ञाकारी पत्नी बनने के लिए महिलाएं क्यों दे अपने करियर की बलि?


    नई दिल्ली।
    सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने हाल ही में एक मामले की सुनवाई के दौरान शादी के बाद महिलाओं (Women) के अधिकारों को लेकर कुछ अहम टिप्पणियां की हैं। SC ने इस बात पर जोर दिया है कि एक पढ़ी-लिखी और कामकाजी महिला (Working Woman) से यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि वह शादी (Marriage) के बाद अपनी पहचान और करियर की बलि दे दे। उच्चतम न्यायालय ने यह भी कहा कि अगर कोई महिला अपने करियर के लिए पति से अलग रह रही है, तो उसे क्रूरता नहीं माना जा सकता।

    SC में एक डेंटिस्ट पत्नी और एक आर्मी ऑफिसर के बीच चल रहे विवाद पर सुनवाई चल रही थी। इस दौरान जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने सिर्फ महिला से त्याग माने जाने की सोच को दकियानूसी बताया। पीठ ने कहा, “यह उम्मीद करना कि महिला हमेशा अपने करियर का त्याग करे और एक ‘आज्ञाकारी पत्नी’ की पारंपरिक छवि में सिमट कर रहे, यह एक पुरानी और दकियानूसी सोच है।” पीठ ने कहा कि महिला अपने पति के घर का महज एक हिस्सा नहीं है। उसकी अपनी बौद्धिक और पेशेवर आकांक्षाएं हैं, जिनका सम्मान होना चाहिए।

    क्या है पूरा मामला?
    बार एंड बेंच की एक रिपोर्ट के मुताबिक इस जोड़े की शादी 2009 में हुई थी। पति सेना में अधिकारी था। वहीं पत्नी ने अहमदाबाद में अपना डेंटल क्लिनिक शुरू किया था। शादी के बाद पति और ससुराल वालों ने आरोप लगाए कि महिला ने अपने परिवार के बजाय करियर को चुना और पति के साथ रहने से इनकार कर दिया। अर्जी के बाद फैमिली कोर्ट ने पत्नी के इस फैसले को ‘क्रूरता’ माना था।

    कोर्ट ने कहा था कि पत्नी ने पति को बिना बताए अपना क्लिनिक शुरू किया और अहमदाबाद में रहने के दौरान ससुराल के बजाय अपने मायके में रुकना पसंद किया, जो सही नहीं है। वहीं गुजरात हाईकोर्ट ने भी 2024 में फैमिली कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा था।

    तलाक को दे दी मंजूरी
    सुप्रीम कोर्ट ने निचली अदालतों के नजरिए को रूढ़िवादी बताया। SC ने तीखे शब्दों में कहा, “आज की दुनिया में जहां महिलाएं लंबी छलांगे लगा रही हैं। सिर्फ इसलिए कि पति एक आर्मी ऑफिसर है, यह उम्मीद करना कि पत्नी अपने करियर के बारे में सोच भी नहीं सकती, एक सामंती मानसिकता को दर्शाता है।” फैसला सुनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने महिला के खिलाफ लगाए गए सभी आरोपों को रिकॉर्ड से हटा दिया। हालांकि, पति ने दूसरी शादी कर ली है और दोनों के बीच रिश्ते सुधरने की गुंजाइश नहीं थी, इसलिए कोर्ट ने तलाक को मंजूरी दे दी।

  • मणिपुर में महिलाओं का विशाल आंदोलन, सड़कें बनीं विरोध का केंद्र..

    मणिपुर में महिलाओं का विशाल आंदोलन, सड़कें बनीं विरोध का केंद्र..

    नई दिल्ली।मणिपुर में हालात लगातार तनावपूर्ण बने हुए हैं, जहां रॉकेट हमले में दो बच्चों समेत तीन लोगों की मौत के बाद व्यापक स्तर पर विरोध-प्रदर्शन जारी है। इस घटना के बाद से राज्य में जनाक्रोश बढ़ता जा रहा है और कई इलाकों में बंद और प्रदर्शन की स्थिति बनी हुई है। आम जनजीवन प्रभावित है और सड़कों पर सामान्य गतिविधियां काफी हद तक ठप हो गई हैं।

    इस आंदोलन में सबसे आगे मणिपुर की महिलाएं दिखाई दे रही हैं, जो हजारों की संख्या में सड़कों पर उतरकर विरोध दर्ज करा रही हैं। ये महिलाएं दिन के समय रास्तों को रोककर धरना दे रही हैं और आवाजाही को नियंत्रित कर रही हैं। कई इलाकों में स्थिति ऐसी है कि वहां न तो आम नागरिकों को आने-जाने की अनुमति है और न ही सुरक्षा बलों की सामान्य आवाजाही हो पा रही है। रात के समय ये महिलाएं मशाल रैलियों के जरिए इलाकों में गश्त कर रही हैं, जिससे आंदोलन और अधिक संगठित और प्रभावी दिखाई दे रहा है।

    प्रदर्शन में शामिल महिलाओं का कहना है कि वे घर की जिम्मेदारियों के साथ-साथ आंदोलन में भी सक्रिय भूमिका निभा रही हैं। उनके अनुसार यह केवल भावनात्मक नहीं बल्कि नैतिक जिम्मेदारी का हिस्सा है, जिसे वे संतुलित तरीके से निभा रही हैं। इस आंदोलन के चलते स्थानीय बाजारों और आर्थिक गतिविधियों पर भी असर पड़ा है, जिससे कई परिवारों पर आर्थिक दबाव बढ़ गया है। इसके बावजूद कुछ महिलाएं अपने काम के साथ-साथ आंदोलन में भागीदारी भी जारी रखे हुए हैं।

    इस आंदोलन का नेतृत्व करने वाली सामुदायिक संरचनाएं लंबे समय से शांति और सामाजिक संतुलन की मांग करती रही हैं। यह संगठन संघर्ष प्रभावित क्षेत्रों में सामाजिक व्यवस्था बनाए रखने और मानवाधिकारों की रक्षा के लिए सक्रिय भूमिका निभाता रहा है। इतिहास में भी इस तरह के आंदोलन सामाजिक मुद्दों और कानून-व्यवस्था से जुड़े सवालों को लेकर सामने आते रहे हैं, जिन्होंने व्यापक जनसमर्थन हासिल किया है।

    यह पूरा विवाद एक रॉकेट हमले से शुरू हुआ था, जिसमें एक घर को निशाना बनाया गया था। इस हमले में एक छोटे बच्चे, एक बच्ची और उनकी मां की मौत हो गई थी। घटना के बाद पूरे क्षेत्र में गुस्सा फैल गया और धीरे-धीरे यह विरोध बड़े आंदोलन में बदल गया।

    फिलहाल राज्य में तनावपूर्ण स्थिति बनी हुई है और लोग शांति बहाली की मांग कर रहे हैं। महिलाओं के इस व्यापक आंदोलन ने स्थिति को और अधिक गंभीर बना दिया है, जिससे प्रशासन और समाज दोनों के सामने शांति बहाली की बड़ी चुनौती खड़ी हो गई है।

  • महिला आरक्षण बिल का विरोध…. अमित शाह के राजनीतिक दांव में उलझी अखिलेश की रणनीति!

    महिला आरक्षण बिल का विरोध…. अमित शाह के राजनीतिक दांव में उलझी अखिलेश की रणनीति!


    नई दिल्ली।
    शतरंज हो या राजनीति, चाल संभलकर खेलनी होती है. अमित शाह (Amit Shah) को भारतीय जनता पार्टी (Bharatiya Janata Party) का ‘चाणक्य’ माना जाता है, वहीं अखिलेश यादव (Akhilesh Yadav) ने लोकसभा चुनाव 2024 में उत्तर प्रदेश में मजबूत प्रदर्शन करके दिखा दिया कि वह राजनीति के कच्चे खिलाड़ी नहीं हैं. यह बात भी दीगर है कि उत्तर प्रदेश के चुनाव में इंडिया गठबंधन ने संविधान बदलने और आरक्षण खत्म करने के नैरेटिव के जरिए जीत हासिल की थी, लेकिन राजनीति में काठ की हांडी बार-बार नहीं चढ़ती है. अब बारी थी अमित शाह की. सरकार ने लोकसभा में नारी शक्ति वंदन अधिनियम (Women Empowerment Act) से जुड़े तीन बिल पेश किए. मकसद था कि महिलाओं को लोकसभा और विधानसभा में 33 फीसदी आरक्षण दिया जाए, लेकिन सारे विपक्षी दलों ने विरोध कर दिया और आखिरकार बिल लोकसभा में गिर गया।


    लोकसभा में गिरा बिल, अब क्या करेगी सरकार?

    सदन में संविधान (131वां) संशोधन विधेयक, 2026 पर मतदान हुआ. मतदान में बिल के समर्थन में 298 और विरोध में 230 वोट पड़े. लोकसभा में किसी भी संविधान संशोधन विधेयक को पास कराने के लिए दो-तिहाई बहुमत की जरूरत होती है. जब महिला आरक्षण बिल लोकसभा में गिर गया, तो परिसीमन विधेयक, 2026 और संघ राज्य विधि (संशोधन) विधेयक, 2026 को सरकार ने आगे नहीं बढ़ाया. अब सवाल है कि क्या सरकार लोकसभा और राज्यसभा दोनों का संयुक्त सत्र बुलाकर बिल पास कराएगी, हालांकि सरकार ने यह साफ नहीं किया है।


    महिला आरक्षण बिल के विरोध में सपा

    महिला आरक्षण बिल पर सपा के मुखिया अखिलेश यादव अपने पिता स्वर्गीय मुलायम सिंह यादव के पदचिन्हों पर चल रहे हैं. चाहे सत्ता में रहे हों या बाहर, वे महिला आरक्षण बिल में भी आरक्षण की मांग करते रहे, लेकिन कोई भी सरकार आरक्षण में आरक्षण देने को तैयार नहीं थी. 1996 में एच. डी. देवगौड़ा की सरकार में यह बिल पेश किया गया, लेकिन सरकारें आती-जाती रहीं और बिल पास नहीं हुआ. यह बिल इंद्र कुमार गुजराल की सरकार से होते हुए अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार तक पहुंचा, लेकिन बात सदन में मारपीट तक पहुंच गई. वाजपेयी सरकार के दौरान समाजवादी पार्टी के सांसदों ने इसे सदन में फाड़ डाला. बिल पेश करने पर कानून मंत्री थंबी दोरई की कमीज भी फाड़ दी गई थी. फिर यह बिल मनमोहन सिंह की सरकार में आया। उस समय आरजेडी सरकार का हिस्सा थी, तो समाजवादी पार्टी बाहर से समर्थन कर रही थी, लेकिन बिल का विरोध जारी रहा. हालांकि यह बिल राज्यसभा में पास हुआ, लेकिन लोकसभा में फंस गया।


    अखिलेश यादव क्यों करते हैं विरोध

    सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने इस बिल पर चर्चा करते हुए कहा कि बीजेपी ‘नारी’ को नारा बनाने की कोशिश कर रही है. उन्होंने यह भी कहा कि वे बिल के समर्थन में हैं, लेकिन सरकार की इस जल्दबाजी के पीछे छिपी साजिश का विरोध करते हैं. अखिलेश की मांग थी कि ओबीसी और अल्पसंख्यक महिलाओं को इस बिल में आरक्षण दिया जाए, जबकि अमित शाह ने जवाब दिया कि संविधान में मुस्लिमों के लिए कोई आरक्षण का प्रावधान नहीं है. वहीं अखिलेश का आरोप था कि सरकार जाति जनगणना से बचना चाहती है, तो अमित शाह ने जवाब दिया कि इस जनगणना में जाति जनगणना भी होगी. इस पर सपा के धर्मेंद्र यादव ने कहा कि जनगणना में जाति का कॉलम नहीं है. अमित शाह ने जवाब दिया कि आदमी की जाति होती है, घर की जाति नहीं होती है. अभी घरों की गणना हो रही है, उसके बाद लोगों की गणना होगी, जिसमें जाति भी शामिल रहेगी।


    आगे कुआं, पीछे खाई

    देश बदल रहा है, लोगों की आकांक्षाएं बदल रही हैं. खासकर महिलाएं शिक्षा से लेकर हर क्षेत्र में बेहतर कर रही हैं. इसकी भनक अखिलेश यादव को है. उनके शासनकाल में जो कानून-व्यवस्था का हाल हुआ था, उसका खामियाजा वे करीब 10 साल से भुगत रहे हैं. योगी आदित्यनाथ के शासनकाल में हत्याएं, बलात्कार, दहेज के मामले और एसिड अटैक के मामलों में कमी आई है. नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (NCRB) के आंकड़ों के मुताबिक, 2016 में यूपी में हत्याएं 4889 थीं, जो 2023 में घटकर 3307 हो गईं. 2016 में बलात्कार की घटनाएं 4816 थीं, जो 2023 में घटकर 3556 हो गई हैं. 2016 में दहेज हत्याएं 2473 थीं, जो 2023 में घटकर 2141 हो गई हैं. महिलाओं पर एसिड फेंकने के मामले 57 थे, जो 2023 में 31 हो गए हैं. 2016 में महिलाओं के शील भंग (लज्जा भंग की कोशिश) के मामले 11335 थे, जो 2023 में घटकर 9549 हो गए हैं.

    एक तरफ अखिलेश के शासनकाल के आंकड़े हैं, तो दूसरी तरफ योगी आदित्यनाथ के कानून-व्यवस्था का इकबाल है कि जनसंख्या बढ़ने के बावजूद अपराध घट रहे हैं. इस बात का अहसास अखिलेश को है, लेकिन अगर वे इस बिल का समर्थन करते, तो पीडीए (पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक) के वोटर नाराज हो सकते थे. वहीं अब बिल का विरोध करने पर 2027 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी उन्हें “महिला विरोधी” बताकर घेर सकती है.


    महिलाओं पर मुलायम की बातों की गूंज

    भले मुलायम सिंह यादव नहीं रहे, लेकिन महिलाओं पर उनके बयान अभी तक प्रदेश की जनता भूली नहीं है. लोकसभा 2014 के दौरान अप्रैल में मुरादाबाद की एक रैली में उन्होंने कहा था, ‘क्या बलात्कार के मामले में फांसी की सजा दी जानी चाहिए? वे लड़के हैं, उनसे गलतियां हो जाती हैं.’ इसी बिल की चर्चा के दौरान बीजेपी सांसद कंगना रनौत ने भी मुलायम सिंह के पुराने बयान का जिक्र करते हुए सपा के धर्मेंद्र यादव को जवाब दिया. कंगना का कहना था कि मुलायम सिंह ने कहा था कि यह कानून नौजवानों को संसद में सीटी बजाने के लिए उकसाएगा. मुलायम सिंह ने ये भी कहा था कि महिला आरक्षण बिल के मौजूदा स्वरूप से सिर्फ बड़े घरों और शहरों की लड़कियों को फायदा मिलेगा. हमारे गांव की गरीब महिलाएं ज्यादा आकर्षक नहीं होतीं. ये सारी बातें जनता के संज्ञान में हैं.


    अखिलेश की चुनौतियां

    अखिलेश यादव को यह भी डर सता रहा है कि परिसीमन से उत्तर प्रदेश की राजनीति का गणित और केमिस्ट्री बदल सकती है. परिसीमन से यूपी में 120 से ज्यादा सीटें हो सकती हैं. इससे कहीं बीजेपी को फायदा न हो जाए. हालांकि, अखिलेश यादव बड़ी चालाकी से राजनीति कर रहे हैं. पीडीए का फॉर्मूला लोकसभा चुनाव में चल गया. इंडिया गठबंधन ने 80 में से 43 सीटें जीतकर यह बता दिया कि लोकतंत्र में कोई भी सत्ता स्थायी नहीं होती और जनमत जब करवट लेता है, तो मजबूत से मजबूत राजनीतिक दीवारें ढह जाती हैं. यह भी ध्यान देने वाली बात है कि मुलायम सिंह यादव अपने राजनीतिक जीवन में कभी भी अपने बलबूते पर 36 सीटें नहीं जीत पाए थे, जो अखिलेश ने जीतकर दिखा दिया. हालांकि, लोकसभा चुनाव के बाद हुए विधानसभा उपचुनाव में सपा को करारी हार का सामना करना पड़ा. लोकसभा चुनाव के बाद बीजेपी लगातार झारखंड को छोड़कर महाराष्ट्र, हरियाणा, दिल्ली और बिहार के चुनाव जीत चुकी है. मतलब संविधान खत्म करने और आरक्षण खत्म करने का मुद्दा फिलहाल ठंडा पड़ चुका है जो कि सिर्फ यूपी में ही चल पाया.


    अखिलेश की अग्नि परीक्षा

    भले ही अखिलेश और विपक्ष के विरोध से बिल संसद में गिर गया है, लेकिन इसका एक जोखिम भी है. शहरी और महिला वोटर्स के एक हिस्से में नकारात्मक संदेश गया है. सत्ता पक्ष अब उन्हें “महिला विरोधी” बताकर हमला करेगा. वहीं अखिलेश यह बताने की कोशिश करेंगे कि उन्होंने पीडीए के हक के लिए बिल का विरोध किया. मतलब महिला आरक्षण बिल की दोधारी तलवार पर अखिलेश चल रहे हैं. जरा सी चूक हुई, तो इसका खामियाजा भुगतना पड़ सकता है. लेकिन अगर चालाकी से चले, तो फायदा भी हो सकता है. वहीं महिलाओं के लिए नरेंद्र मोदी और योगी आदित्यनाथ सरकार के कामों को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. जनधन योजना, शौचालय, मुफ्त सिलेंडर, किसान सम्मान निधि और प्रदेश में अपराध को लेकर जीरो टॉलरेंस, खासकर एंटी रोमियो स्क्वॉड. अब समय ही तय करेगा कि महिला आरक्षण बिल का विरोध अखिलेश के लिए राजनीतिक जोखिम साबित होता है या रणनीतिक बढ़त।

  • 2029 में लागू हो सकता है महिला आरक्षण बिल…. जानें कानूनी विकल्प

    2029 में लागू हो सकता है महिला आरक्षण बिल…. जानें कानूनी विकल्प


    नई दिल्ली।
    संसद में शुक्रवार को 131वां संविधान संशोधन विधेयक (131st Constitutional Amendment Bill) भले ही दो-तिहाई बहुमत न मिलने के कारण गिर गया हो, लेकिन इससे महिला आरक्षण (Women’s reservation.) की मूल योजना खत्म नहीं हुई है। 2023 में पारित मूल कानून (नारी शक्ति वंदन अधिनियम-Women’s Empowerment Worship Act) अभी भी प्रभावी है और 2029 में इसके लागू होने की संभावनाएं बरकरार हैं।

    आपको बता दें कि सरकार ने 131वां संशोधन विधेयक मुख्य रूप से आरक्षण को आसान बनाने के लिए पेश किया था। इसका उद्देश्य 2011 की जनगणना के आधार पर लोकसभा की सीटों को बढ़ाकर 816 करना था। इसके विफल होने का मतलब केवल यह है कि फिलहाल सीटों की संख्या बढ़ाने का सरकारी फॉर्मूला रुक गया है, लेकिन महिला कोटा का मुख्य जनादेश अभी भी सुरक्षित है।

    कैसे लागू होगा 2029 में आरक्षण?
    मूल कानून (अनुच्छेद 334A) के तहत आरक्षण लागू करने के लिए दो शर्तें पूरी होनी जरूरी हैं। 2023 में कानून बनने के बाद एक नई जनगणना होनी चाहिए, जो अभी प्रगति पर है। जनगणना के आंकड़ों के आधार पर निर्वाचन क्षेत्रों का पुनर्निर्धारण किया जाना चाहिए। यदि जनगणना और परिसीमन की प्रक्रिया 2029 के आम चुनाव से पहले पूरी हो जाती है, तो आरक्षण को लागू करने में कोई कानूनी बाधा नहीं आएगी।

    विकल्प क्या हैं?
    सरकार के पास अब भी दो वैकल्पिक रास्ते मौजूद हैं। सरकार अनुच्छेद 334A में संशोधन कर आरक्षण को ‘परिसीमन’ की शर्त से अलग कर सकती है। इससे मौजूदा 543 सीटों पर ही 33% कोटा लागू किया जा सकेगा। अनुच्छेद 82 का उपयोग करते हुए 2026 के बाद परिसीमन पर लगा संवैधानिक प्रतिबंध हट जाएगा, जिससे सीटों के समायोजन का रास्ता साफ हो सकता है।

    सरकार के पास अब भी है मौका
    संसद में परिसीमन और केंद्र शासित प्रदेशों से जुड़े दो अन्य बिल अभी भी लंबित हैं। सरकार ने इन्हें वापस नहीं लिया है, जिसका मतलब है कि इस लोकसभा के कार्यकाल के दौरान किसी भी समय इन्हें दोबारा चर्चा के लिए लाया जा सकता है। इससे परिसीमन आयोग के गठन का विकल्प खुला हुआ है।

    तकनीकी चुनौतियां
    भले ही तकनीकी रूप से रास्ता खुला हो, लेकिन राह इतनी आसान नहीं है। लोकसभा की 550 सीटों की वर्तमान सीमा को बढ़ाने के लिए सरकार को फिर से संसद में दो-तिहाई बहुमत जुटाना होगा, जो एक बड़ी चुनौती है। जनसंख्या के आधार पर सीटों का पुनर्गठन राजनीतिक रूप से संवेदनशील मुद्दा है। उत्तर और दक्षिण भारत के राज्यों के बीच प्रतिनिधित्व को लेकर विवाद बढ़ सकता है। यदि सरकार सीटों की संख्या बढ़ाए बिना केवल निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाएं दोबारा तय करती है तो विपक्षी दलों के साथ आम सहमति बनने की उम्मीद ज्यादा है।

  • महिलाओं को 33% आरक्षण… आज संसद में पेश होंगे 3 बिल… सत्तापक्ष के पास LS में 67 और RS में 21 सीट कम

    महिलाओं को 33% आरक्षण… आज संसद में पेश होंगे 3 बिल… सत्तापक्ष के पास LS में 67 और RS में 21 सीट कम


    नई दिल्ली।
    संसद (Parliament) में आज एकसाथ तीन-तीन विधेयक पेश किए जाने वाले हैं। सरकार का लक्ष्य है कि 2029 के लोकसभा चुनावों (Lok Sabha elections) से पहले महिलाओं के लिए 33% आरक्षण और परिसीमन की प्रक्रिया को अमली जामा पहना दिया जाए। लोकसभा और राज्य की विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण को मूर्त रूप देने के लिए आज से संसद का विशेष सत्र रखा गया है। इसमें लोकसभा में सदस्यों की मौजूदा संख्या 543 से बढ़ाकर 850 करने के लिए बिल लाया जाएगा। इसके साथ ही, सरकार परिसीमन आयोग के गठन के लिए भी एक विधेयक तथा इन्हीं से संबंधित केंद्र शासित प्रदेश कानून (संशोधन विधेयक), 2026 लाने की तैयारी में है।

    ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ (‘Women’s Empowerment Act’) के तहत महिलाओं को मिलने वाला कोटा परिसीमन और जनगणना से जुड़ा है। केंद्र सरकार 2011 की जनगणना के आंकड़ों के आधार पर परिसीमन करने और महिला आरक्षण लागू करने की योजना बना रही है।


    सरकार कैसे पास कराएगी विधेयक? जानें नंबर गेम

    परिसीमन विधेयक को छोड़कर, अन्य दो विधेयक संविधान संशोधन विधेयक हैं। इन्हें पारित करने के लिए संसद में उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता होगी। विपक्ष का वॉकआउट बहुमत के आंकड़े को कम कर सकता है। लोकसभा दो-तिहाई बहुमत का आंकड़ा 360 है। सत्ताधारी NDA के पास 293 सदस्य हैं। यानी उसे अभी भी 67 अतिरिक्त वोटों की जरूरत है। राज्यसभा में बहुमत के लिए जादुई आंकड़ा 163 है। NDA की वर्तमान ताकत 142 के आसपास है, जो उसे बहुमत के आंकड़े से 21 सीट दूर रखती है।

    विपक्ष का कहना है कि वे महिला आरक्षण के समर्थक हैं, लेकिन सरकार द्वारा इसे परिसीमन और 2029 के चुनावों से जोड़ने के कारण वे इन विधेयकों का विरोध करने को मजबूर हैं।


    क्षेत्रीय संतुलन का डर

    विपक्ष का तर्क है कि 2011 की जनगणना के आधार पर सीटों का पुनर्निर्धारण केवल NDA को लाभ पहुंचाएगा। इसके अलावा, यह दक्षिण भारतीय राज्यों की संसदीय शक्ति को कम कर सकता है और उन्हें हाशिए पर धकेल सकता है।


    राहुल गांधी का आरोप

    कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने सोशल मीडिया (X) पर आरोप लगाया कि सरकार की योजना 2029 के लिए सीटों का अपनी सुविधानुसार सीमाओं में बदलाव करने की है। उन्होंने कहा कि यह विधेयक संवैधानिक सुरक्षा उपायों को हटाकर पूरी शक्ति सरकार द्वारा नियुक्त आयोग को देता है।


    लोकसभा की सीटों में भारी वृद्धि

    प्रस्तावित विधेयकों के तहत परिसीमन के बाद लोकसभा सीटों की संख्या बढ़कर 815 तक हो सकती है। केंद्र शासित प्रदेशों (UTs) के लिए यह संख्या 35 हो सकती है। वर्तमान में राज्यों से 530 और केंद्र शासित प्रदेशों से 20 सदस्य चुनकर आते हैं।


    क्षेत्रीय दलों का बदलता रुख

    BJD और BRS जैसे दल अक्सर मुद्दों के आधार पर सरकार का समर्थन करते रहे हैं> उन्होंने परिसीमन के मुद्दे पर अपना रुख कड़ा कर लिया है। इससे सरकार की मुश्किलें और बढ़ सकती हैं।


    सरकार का भरोसा- सब साथ हैं

    तमाम विरोधों के बावजूद सरकार का दावा है कि उनके पास पर्याप्त आंकड़े हैं। केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने कहा कि कोई भी दल सिद्धांत रूप में महिला आरक्षण का विरोध नहीं कर रहा है और इस भावना के साथ सभी एक साथ हैं।