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  • भोपाल की झीलों से निकलेंगे देश-दुनिया के चैंपियन : मंत्री सारंग

    भोपाल की झीलों से निकलेंगे देश-दुनिया के चैंपियन : मंत्री सारंग


    भोपाल।
    मध्य प्रदेश के खेल एवं युवा कल्याण मंत्री विश्वास कैलाश सारंग ने कहा कि भोपाल की झीलें अब केवल पर्यटन और प्राकृतिक सौंदर्य का केंद्र नहीं हैं, बल्कि देश के भविष्य के चैंपियन तैयार करने की भूमि बन रही हैं। राजा भोज मल्टीक्लास नेशनल सेलिंग चैंपियनशिप खिलाड़ियों को अपनी प्रतिभा साबित करने और राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आगे बढ़ने का महत्वपूर्ण मंच प्रदान कर रही है।

    मंत्री सारंग मंगलवार को भोपाल के बोट क्लब में राजा भोज मल्टीक्लास नेशनल सेलिंग चैंपियनशिप (रैंकिंग) के तृतीय संस्करण के शुभारंभ कार्यक्रम को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि प्रतियोगिता में होने वाली प्रत्येक रेस केवल पदक के लिए मुकाबला नहीं है, बल्कि खिलाड़ियों के राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय खेल करियर की दिशा तय करने वाला महत्वपूर्ण अवसर है। प्रतियोगिता से निर्धारित होने वाली राष्ट्रीय रैंकिंग खिलाड़ियों के लिए आगे अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में भारत का प्रतिनिधित्व करने का मार्ग प्रशस्त करेगी।

    इससे पहले मंत्री सारंग ने चैंपियनशिप का शुभारंभ किया। रविवार 16 अगस्त तक होने वाली इस प्रतिष्ठित राष्ट्रीय प्रतियोगिता में देश के विभिन्न राज्यों से 100 से अधिक राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर के सेलिंग खिलाड़ी हिस्सा ले रहे हैं। प्रतियोगिता में खिलाड़ियों के प्रदर्शन के आधार पर उनकी राष्ट्रीय रैंकिंग निर्धारित होगी, जो आगे अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में भारत का प्रतिनिधित्व करने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।

    भोपाल बन रहा देश का प्रमुख वाटर स्पोर्ट्स केंद्र
    मंत्री सारंग ने कहा कि भोपाल का बड़ा तालाब और यहां की प्राकृतिक परिस्थितियां सेलिंग, रोइंग, कयाकिंग और केनोइंग जैसे खेलों के लिए बेहद अनुकूल हैं। मध्यप्रदेश राज्य जल क्रीड़ा अकादमी की स्थापना वर्ष 2007 में हुई थी और आज यह देश की प्रमुख वाटर स्पोर्ट्स प्रशिक्षण संस्थाओं में शामिल है। उन्होंने कहा कि अकादमी में सेलिंग, रोइंग, कयाकिंग, केनोइंग और स्लालम की सुविधाएं उपलब्ध हैं। यहां प्रशिक्षित खिलाड़ियों ने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मध्य प्रदेश तथा देश का नाम रोशन किया है।

    वाटर स्पोर्ट्स में मध्यप्रदेश की शानदार उपलब्धियां
    मंत्री सारंग ने बताया कि मध्य प्रदेश वाटर स्पोर्ट्स अकादमी के खिलाड़ियों ने अब तक 28 अंतर्राष्ट्रीय और 69 राष्ट्रीय पदक अर्जित किए हैं तथा खिलाड़ियों ने 37 अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में सहभागिता की है। उन्होंने कहा कि यह उपलब्धियां प्रदेश में वाटर स्पोर्ट्स के क्षेत्र में विकसित हो रहे मजबूत खेल इकोसिस्टम का प्रमाण हैं और भोपाल देश में वाटर स्पोर्ट्स की नई पहचान बनाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।

    सेलिंग में मध्य प्रदेश का दबदबा
    सारंग ने कहा कि वर्ष 2025 की राजा भोज मल्टीक्लास सेलिंग चैंपियनशिप में मध्यप्रदेश की टीम ने शानदार प्रदर्शन करते हुए कुल 16 पदक- 8 स्वर्ण, 5 रजत और 3 कांस्य हासिल किए थे। प्रतियोगिता की 12 में से 8 कैटेगरी में मध्य प्रदेश के खिलाड़ियों ने स्वर्ण पदक जीते थे। उन्होंने कहा कि यह उपलब्धियां साबित करती हैं कि भोपाल अब केवल प्रतियोगिताओं की मेजबानी करने वाला शहर नहीं, बल्कि राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर के चैंपियन तैयार करने वाला प्रमुख केंद्र बन रहा है।

    हर प्रतिभावान खिलाड़ी को मिलेगा आगे बढ़ने का अवसर
    सारंग ने कहा कि मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व में मध्य प्रदेश सरकार का लक्ष्य है कि प्रदेश के हर प्रतिभावान बच्चे को अपनी प्रतिभा दिखाने का अवसर मिले। इसी दिशा में प्रदेश की सभी 230 विधानसभा क्षेत्रों में खेल परिसरों के निर्माण की दिशा में कार्य किये जा रहे हैं तथा प्रत्येक जिले में फीडर सेंटर विकसित किए जा रहे हैं। मंत्री सारंग ने कहा कि मध्य प्रदेश पहले राष्ट्रीय खेलों में 17वें स्थान पर रहा करता था, लेकिन पिछले तीन वर्षों में प्रदेश लगातार तीसरे स्थान पर आ रहा है। प्रदेश में वर्तमान में 18 खेलों की 11 अकादमियां संचालित की जा रही हैं।

    भोपाल में अंतर्राष्ट्रीय खेल आयोजनों का नया मंच तैयार
    मंत्री सारंग ने कहा कि भोपाल में लगभग 1000 करोड़ रुपये की लागत से अंतरराष्ट्रीय खेल परिसर विकसित किया जा रहा है। इसके प्रथम चरण का लोकार्पण जल्द होने वाला है। इससे मध्य प्रदेश में अंतरराष्ट्रीय स्तर की खेल प्रतियोगिताओं के आयोजन को नई गति मिलेगी। मंत्री सारंग ने बताया कि नवंबर माह में अंतरराष्ट्रीय महिला हॉकी एशियन चैंपियनशिप का आयोजन भोपाल के अंतरराष्ट्रीय खेल परिसर में मध्य प्रदेश खेल एवं युवा कल्याण विभाग के माध्यम से किया जाएगा। इसके साथ ही अंतर्राष्ट्रीय एशियन रोइंग चैंपियनशिप भी भोपाल में होने वाली है।

    16 अगस्त को मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव करेंगे समापन एवं पुरस्कार वितरण
    राजा भोज मल्टीक्लास नेशनल सेलिंग चैंपियनशिप का आयोजन 11 से 16 अगस्त तक किया जाएगा। प्रतियोगिता का समापन एवं पुरस्कार वितरण समारोह 16 अगस्त को मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के मुख्य आतिथ्य में आयोजित होगा। इस अवसर पर विभिन्न वर्गों में उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले खिलाड़ियों को पुरस्कार वितरण कर उनका सम्मान किया जाएगा।

    भोपाल की झीलों से निकलेंगे भारत के भविष्य के चैंपियन
    मंत्री सारंग ने देशभर से आए खिलाड़ियों का स्वागत करते हुए कहा कि वे प्रतियोगिता में जीत और पदक के लिए पूरी ताकत से खेलें, लेकिन अपने मन में भारत के लिए खेलने का सपना भी लेकर आगे बढ़ें। उन्होंने कहा कि “भोपाल की इन झीलों में केवल नावें नहीं चल रही हैं, यहां भारत के भविष्य के चैंपियन अपने सपनों को गति दे रहे हैं। राजा भोज की इस धरती से हम संकल्प लें कि मध्य प्रदेश की झीलों से निकलने वाली प्रतिभाएं देश के तिरंगे को दुनिया के हर खेल मंच पर ऊंचा करेंगी।”

    सारंग ने कहा कि मध्य प्रदेश में खेल प्रतिभाओं को अवसर, आधुनिक प्रशिक्षण और बेहतर खेल अधोसंरचना उपलब्ध कराने के लिए लगातार प्रयास किए जा रहे हैं। लक्ष्य है कि मध्य प्रदेश के खिलाड़ी राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाएं और अंतरराष्ट्रीय मंच पर देश का तिरंगा गौरव के साथ फहराएं।

  • कभी एशिया का सबसे आधुनिक इलाका था उत्तर कोरिया, आज क्यों कहलाता है दुनिया का सबसे रहस्यमयी देश?

    कभी एशिया का सबसे आधुनिक इलाका था उत्तर कोरिया, आज क्यों कहलाता है दुनिया का सबसे रहस्यमयी देश?


    नई दिल्ली। आज उत्तर कोरिया का नाम आते ही दुनिया से कटे हुए एक ऐसे देश की तस्वीर सामने आती है, जहां कड़े सरकारी नियंत्रण, परमाणु हथियार, सीमित स्वतंत्रता और बाहरी दुनिया से लगभग पूरी तरह अलग-थलग व्यवस्था है। लेकिन करीब आठ-नौ दशक पहले तस्वीर बिल्कुल अलग थी। आज का उत्तर कोरिया कभी पूरे कोरियाई प्रायद्वीप का सबसे विकसित, औद्योगिक और आधुनिक क्षेत्र माना जाता था।

    इतिहास से जुड़े दस्तावेज बताते हैं कि 1948 में उत्तर कोरिया के गठन और किम इल सुंग के सत्ता में आने से पहले यह क्षेत्र एकीकृत कोरिया का हिस्सा था। उस समय राजधानी प्योंगयांग शिक्षा, संस्कृति और ईसाई धर्म का प्रमुख केंद्र थी। बड़ी संख्या में चर्च, मिशनरी स्कूल और आधुनिक शिक्षण संस्थान मौजूद थे। इसी वजह से प्योंगयांग को कभी “पूर्व का यरुशलम” भी कहा जाता था। यहां लोगों को धार्मिक आस्था और सामाजिक जीवन में अपेक्षाकृत अधिक स्वतंत्रता प्राप्त थी।

    औद्योगिक विकास में था सबसे आगे
    1910 से 1945 के बीच जापान के औपनिवेशिक शासन के दौरान कोरियाई प्रायद्वीप के उत्तरी हिस्से को औद्योगिक केंद्र के रूप में विकसित किया गया। यहां खनिज संपदा, कोयला और प्राकृतिक संसाधनों की प्रचुरता के कारण बड़े स्टील प्लांट, जलविद्युत परियोजनाएं, रासायनिक कारखाने और रेलवे नेटवर्क विकसित किए गए। उस समय दक्षिणी क्षेत्र मुख्य रूप से कृषि आधारित अर्थव्यवस्था पर निर्भर था, जबकि उत्तर तकनीकी और औद्योगिक रूप से अधिक मजबूत माना जाता था।

    विभाजन के बाद बदल गई तस्वीर
    द्वितीय विश्व युद्ध समाप्त होने के बाद 1945 में कोरिया को 38वीं समानांतर रेखा के आधार पर दो हिस्सों में बांट दिया गया। उत्तरी भाग सोवियत संघ के प्रभाव में आया और 1948 में किम इल सुंग के नेतृत्व में उत्तर कोरिया की स्थापना हुई। इसके बाद 1950 से 1953 तक चले कोरियाई युद्ध ने देश के बड़े हिस्से को तबाह कर दिया। भारी बमबारी में शहर, उद्योग और बुनियादी ढांचा नष्ट हो गया।

    युद्ध के बाद सोवियत संघ और चीन की आर्थिक सहायता से उत्तर कोरिया ने तेज़ी से पुनर्निर्माण किया और 1970 के दशक तक उसकी अर्थव्यवस्था कई मामलों में दक्षिण कोरिया के बराबर या उससे बेहतर मानी जाती थी।

    ‘जुचे’ नीति और अलगाव की शुरुआत
    बाद के वर्षों में किम इल सुंग ने ‘जुचे’ (आत्मनिर्भरता) की नीति अपनाई, जिसके तहत देश ने बाहरी दुनिया से लगभग पूरी तरह दूरी बना ली। 1990 के दशक में सोवियत संघ के विघटन के बाद आर्थिक सहायता और सस्ते तेल की आपूर्ति बंद हो गई, जिससे उत्तर कोरिया गंभीर आर्थिक संकट और अकाल की चपेट में आ गया। अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों के अनुसार, उस दौर में भुखमरी और कुपोषण से बड़ी संख्या में लोगों की मौत हुई।

    दक्षिण और उत्तर कोरिया की अलग राह
    जहां दक्षिण कोरिया ने लोकतांत्रिक व्यवस्था और खुली अर्थव्यवस्था को अपनाते हुए तकनीक और उद्योग के क्षेत्र में वैश्विक पहचान बनाई, वहीं उत्तर कोरिया ने सीमित संसाधनों का बड़ा हिस्सा रक्षा और परमाणु कार्यक्रमों पर केंद्रित किया। समय के साथ दोनों देशों के आर्थिक और सामाजिक विकास में बड़ा अंतर पैदा हो गया।

    सख्त नियंत्रण वाली व्यवस्था
    उत्तर कोरिया में नागरिकों के जीवन पर सरकारी नियंत्रण बेहद कड़ा माना जाता है। वहां सामाजिक स्थिति का निर्धारण कथित ‘सोंगबुन’ व्यवस्था के आधार पर किया जाता है, जिसमें परिवार की राजनीतिक पृष्ठभूमि और शासन के प्रति निष्ठा को महत्व दिया जाता है। शिक्षा व्यवस्था में भी शासन और नेतृत्व से जुड़े विषयों पर विशेष जोर दिया जाता है।

    देश के भीतर आवागमन, सूचना तक पहुंच और इंटरनेट जैसी सुविधाओं पर भी व्यापक नियंत्रण है। बाहरी दुनिया से सीमित संपर्क और बंद व्यवस्था के कारण उत्तर कोरिया आज भी दुनिया के सबसे रहस्यमयी देशों में गिना जाता है।

    कभी औद्योगिक प्रगति, आधुनिक शिक्षा और आर्थिक विकास का केंद्र रहा यह क्षेत्र आज अपनी राजनीतिक व्यवस्था, सीमित खुलापन और वैश्विक अलगाव के कारण पूरी दुनिया में अलग पहचान रखता है।

  • 15 महीने बाद Apple की धमाकेदार वापसी, Nvidia को पछाड़कर बनी दुनिया की सबसे मूल्यवान कंपनी

    15 महीने बाद Apple की धमाकेदार वापसी, Nvidia को पछाड़कर बनी दुनिया की सबसे मूल्यवान कंपनी


    नई दिल्ली। आईफोन बनाने वाली दिग्गज टेक कंपनी Apple ने करीब 15 महीने बाद एक बार फिर दुनिया की सबसे मूल्यवान कंपनी का खिताब हासिल कर लिया है। कंपनी ने मार्केट वैल्यूएशन के मामले में AI चिप निर्माता Nvidia को पीछे छोड़ते हुए शीर्ष स्थान पर कब्जा कर लिया।

    Apple की कुल वैल्यूएशन करीब 4.88 ट्रिलियन डॉलर पहुंच गई, जबकि Nvidia की वैल्यूएशन में 3.5 प्रतिशत की गिरावट के बाद यह लगभग 4.86 ट्रिलियन डॉलर रह गई। इस बदलाव के साथ टेक कंपनियों की वैश्विक रैंकिंग में भी बड़ा फेरबदल देखने को मिला और Apple फिर से नंबर-1 कंपनी बन गई।

    खास बात यह है कि Apple पिछले साल अप्रैल के बाद पहली बार इस मुकाम पर लौटी है। कंपनी की यह उपलब्धि ऐसे समय में आई है, जब सीईओ टिम कुक का कार्यकाल खत्म होने की चर्चाएं तेज हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक, कुक सितंबर में अपना पद हार्डवेयर विशेषज्ञ जॉन टर्नस को सौंपने की तैयारी कर रहे हैं।

    निवेशकों का भरोसा Apple पर क्यों बढ़ा?
    बाजार विशेषज्ञों का कहना है कि निवेशकों का नजरिया अब बदल रहा है। कुछ समय पहले तक आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की लहर में Nvidia को सबसे बड़ा फायदा उठाने वाली कंपनी माना जा रहा था, लेकिन अब Apple की मजबूत कमाई, विशाल इकोसिस्टम और सर्विस बिजनेस ने निवेशकों का ध्यान फिर अपनी ओर खींचा है।

    BRI वेल्थ मैनेजमेंट के इन्वेस्टमेंट हेड टोनी मीडोज के अनुसार, Apple को पहले इसलिए पीछे माना जा रहा था क्योंकि कंपनी AI मॉडल बनाने पर भारी खर्च नहीं कर रही थी। लेकिन अब बाजार की सोच बदल रही है।

    उनका कहना है कि Apple पर कैपिटल एक्सपेंडिचर का दबाव कम है और कंपनी अपनी सर्विसेज, मजबूत इकोसिस्टम और हार्डवेयर अपग्रेड के जरिए AI से कमाई करने की बेहतर स्थिति में है। यह बदलाव AI से जुड़े संभावित फायदों के बजाय कंपनी की स्थिर कमाई पर निवेशकों के भरोसे को दर्शाता है।

    Siri में बदलाव से Apple को उम्मीद
    Apple ने हाल ही में अपने वर्चुअल असिस्टेंट Siri में लंबे समय से चल रहे बदलावों को लागू किया है। विशेषज्ञों को उम्मीद है कि नया और बेहतर Siri सिस्टम AI के क्षेत्र में Apple को बड़ी टेक कंपनियों और नए स्टार्टअप्स के करीब लाने में मदद करेगा।

    कुछ विश्लेषकों का मानना है कि Apple के पास हर iPhone में मौजूद यूजर डेटा के रूप में AI के लिए बड़ा आधार है। यह डेटा Siri को अधिक उपयोगी और स्मार्ट बनाने में मदद कर सकता है। हालांकि, कंपनी के सामने चुनौती यह है कि यूजर प्राइवेसी को ध्यान में रखते हुए इस डेटा की क्षमता का सही इस्तेमाल कैसे किया जाए।

    Nvidia की वापसी की संभावना भी बरकरार
    हालांकि बाजार की स्थिति बदलने पर Nvidia फिर से शीर्ष स्थान हासिल कर सकती है। Nvidia अब भी AI इंफ्रास्ट्रक्चर की सबसे बड़ी लाभार्थी कंपनियों में शामिल है। कंपनी के ग्राफिक्स प्रोसेसर (GPU) दुनिया भर में इस्तेमाल होने वाले अधिकांश जनरेटिव AI मॉडल को चलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। यही वजह है कि AI सेक्टर में Nvidia की मजबूत पकड़ अभी भी बनी हुई है।

  • दुनिया में रहने लायक सबसे अच्छे शहरों की सूची में दिल्ली 120वें स्थान पर, मुम्बई उससे भी पीछे

    दुनिया में रहने लायक सबसे अच्छे शहरों की सूची में दिल्ली 120वें स्थान पर, मुम्बई उससे भी पीछे


    नई दिल्ली।
    दुनिया भर में रहने के लिहाज से सबसे अच्छे शहरों (Best Cities) की ताजा लिस्ट आ गई है। इस हफ्ते ‘द इकोनॉमिस्ट इंटेलिजेंस यूनिट’ ने अपनी नई ‘ग्लोबल लिवेबिलिटी इंडेक्स 2026’ (Global Liveability Index 2026) रिपोर्ट जारी की है। इस सूचकांक में कुल 173 शहरों को वहां मौजूद सुविधाओं और रहने की स्थितियों के अलग-अलग पैमानों पर परखा गया है। अगर भारतीय शहरों की बात करें तो नई दिल्ली (New Delhi) को 120वां स्थान मिला है। वहीं, डेनमार्क का शहर कोपेनहेगन (Copenhagen) दुनिया के सबसे बेहतरीन और रहने लायक शहरों की लिस्ट में नंबर वन पर बरकरार है। कोपेनहेगन ने ऑस्ट्रिया की राजधानी वियना को पीछे छोड़ते हुए अपना पहला स्थान बरकरार रखा है। द इकोनॉमिस्ट मैगजीन की सहयोगी संस्था ईआईयू ने दुनिया भर के 173 शहरों को शिक्षा, स्थिरता, हेल्थकेयर, इंफ्रास्ट्रक्चर और संस्कृति जैसे पैमानों पर परखा है।


    भारतीय शहरों की रैंकिंग

    रिपोर्ट के मुताबिक, भारत के प्रमुख शहरों की रैंकिंग कुछ इस प्रकार है:
    – नई दिल्ली: 120वें पायदान पर
    – मुंबई: 121वें पायदान पर
    – चेन्नई: 123वें पायदान पर
    – बेंगलुरु: 127वें पायदान पर

    गौर करने वाली बात यह है कि देश की राजधानी नई दिल्ली और आर्थिक राजधानी मुंबई की रैंकिंग में पिछले साल के मुकाबले कोई बदलाव नहीं आया है। ये दोनों शहर अपनी पुरानी स्थिति पर ही बने हुए हैं।


    दुनिया के 10 सबसे बेहतरीन शहर

    रहने के लिहाज से डेनमार्क के कोपेनहेगन ने ऑस्ट्रिया की राजधानी वियना और ऑस्ट्रेलिया के मेलबर्न को पछाड़ते हुए पहला स्थान हासिल किया है:


    कोपेनहेगन क्यों है नंबर वन?

    रिपोर्ट के मुताबिक, कोपेनहेगन को स्थिरता, इंफ्रास्ट्रक्चर और शिक्षा के मामले में “परफेक्ट” स्कोर मिला है। ईआईयू के एक प्रवक्ता ने बताया कि इस शहर की शानदार स्थिरता और बुनियादी ढांचे के साथ-साथ बेहतरीन संस्कृति, पर्यावरण और उच्च गुणवत्ता वाली सार्वजनिक सेवाओं के बेजोड़ तालमेल ने इसे शीर्ष पर बनाए रखा है।


    अमेरिका और कनाडा का क्या है हाल?

    टॉप-10 की ग्लोबल लिस्ट में उत्तरी अमेरिका का केवल एक शहर जगह बना पाया है, और वह है कनाडा का वैंकूवर (9वां स्थान)। अगर अमेरिकी शहरों की बात करें तो न्यूयॉर्क तीन पायदान की छलांग लगाकर 66वें नंबर पर आ गया है। अपराध दर में कमी और आतंकी घटनाओं के कम होते खतरे की वजह से इसके ‘स्टेबिलिटी स्कोर’ में काफी सुधार हुआ है। हालांकि, दो पायदान नीचे खिसकने के बावजूद होनोलूलू (25वां स्थान) अभी भी अमेरिका का सबसे ऊंची रैंकिंग वाला शहर बना हुआ है।


    एशिया के स्कोर में सुधार, यूरोप में ठहराव

    इंडेक्स के आंकड़ों के अनुसार, पश्चिमी यूरोप अभी भी रहने के लिहाज से दुनिया का सबसे शानदार क्षेत्र बना हुआ है, हालांकि अब इसके औसत स्कोर में एक ठहराव आ गया है। इसके उलट, एशिया के औसत स्कोर में बढ़ोतरी दर्ज की गई है। साल 2025 की तुलना में इस बार चीन के 10 शहरों ने अपनी रैंकिंग में सुधार किया है। इसके अलावा, रिपोर्ट में इस बात का भी जिक्र है कि ईरान युद्ध की वजह से पूरे खाड़ी क्षेत्र की स्थिरता प्रभावित हुई है।


    एशिया के हेल्थकेयर में सुधार से रैंकिंग उछली

    इस साल एशिया के औसत लिवेबिलिटी स्कोर में 0.3 अंकों की बढ़ोतरी दर्ज की गई है, जिससे यह 73.9 हो गया है। इसकी सबसे बड़ी वजह यहां की स्वास्थ्य सेवाओं (हेल्थकेयर) का मजबूत होना है। चीन के कई शहरों की रैंकिंग में भी उछाल आया है, जैसे फुझोऊ सात पायदान चढ़कर 93वें नंबर पर पहुंच गया है। ईआईयू की इंडस्ट्री डायरेक्टर एना निकोल्स के मुताबिक, एशिया के स्कोर में बढ़ोतरी का नतीजा यह है कि अब टॉप-20 में यूरोप के सात शहरों के साथ एशिया के नौ शहर शामिल हो गए हैं। वहीं, पश्चिमी यूरोप अभी भी रहने के लिहाज से सबसे मजबूत क्षेत्र बना हुआ है, हालांकि पिछले साल के मुकाबले इसका औसत स्कोर थोड़ा गिरकर 91.7 हो गया है।


    युद्ध की वजह से खाड़ी देशों को भारी नुकसान

    ईरान युद्ध के नतीजे खाड़ी (गल्फ) क्षेत्र के शहरों की रैंकिंग में साफ दिखाई दे रहे हैं, जहां स्थिरता स्कोर में भारी गिरावट दर्ज की गई है। मस्कट 14 पायदान गिरकर 123वें नंबर पर और कुवैत सिटी 12 स्थान खिसककर 105वें नंबर पर आ गया है। लिस्ट में सबसे नीचे सीरिया का दमिश्क शहर है, जो अभी भी दुनिया में रहने के लिहाज से सबसे खराब शहर माना गया है। इसके अलावा, युद्ध के कारण ईरान की राजधानी तेहरान खिसककर 164वें और यूक्रेन का कीव 166वें नंबर पर पहुंच गया है।

  • Report: दुनिया की 99% आबादी ले रही है प्रदूषित हवा में सांस…. WHO ने चेताया

    Report: दुनिया की 99% आबादी ले रही है प्रदूषित हवा में सांस…. WHO ने चेताया


    न्यूयार्क।
    विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) (World Health Organization – WHO) की वर्ल्ड हेल्थ स्टेटिस्टिक्स 2026 रिपोर्ट (World Health Statistics 2026 Report) हैरान करने वाली है। इसके मुताबिक, दुनिया की 99 प्रतिशत आबादी अब भी सुरक्षित सीमा से अधिक प्रदूषित हवा में सांस ले रही है। वर्ष 2021 में 66 लाख मौतें घरेलू और बाहरी वायु प्रदूषण से जुड़ी थीं।

    भारत जैसे देशों के लिए यह सार्वजनिक स्वास्थ्य की बड़ी चुनौती बनी हुई है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि भारत समेत दुनिया के कई देशों के लिए वर्ष 2030 तक हर व्यक्ति को बेहतर और सस्ती स्वास्थ्य सेवाएं (यूनिवर्सल हेल्थ कवरेज) उपलब्ध कराने का लक्ष्य हासिल करना मुश्किल होता जा रहा है। रिपोर्ट के मुताबिक, स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच बढ़ाने की रफ्तार पिछले कुछ वर्षों में काफी धीमी पड़ गई है।


    रिपोर्ट में किया गया क्या दावा?

    रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2015 से 2023 के बीच दुनिया का यूनिवर्सल हेल्थ कवरेज (यूएचसी) सर्विस कवरेज इंडेक्स केवल 68 से बढ़कर 71 तक पहुंचा। यह 2000 से 2015 के मुकाबले करीब एक-तिहाई गति से हुई प्रगति है। अगर यही रफ्तार जारी रही तो 2030 तक यह सूचकांक केवल 74 तक ही पहुंच पाएगा, जिससे सभी लोगों तक गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाने का वैश्विक लक्ष्य अधूरा रह सकता है।

    रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि दक्षिण-पूर्व एशिया क्षेत्र, जिसमें भारत भी शामिल है, ने स्वास्थ्य सेवाओं के कवरेज में अन्य क्षेत्रों की तुलना में बेहतर सुधार दर्ज किया है। 2015 के बाद इस क्षेत्र के यूएचसी इंडेक्स में 7 अंकों की बढ़ोतरी हुई है, लेकिन 2030 का लक्ष्य हासिल करने के लिए यह गति भी पर्याप्त नहीं मानी जा रही।


    स्वास्थ्य खर्च से 1.6 अरब लोग गरीबी की चपेट में

    रिपोर्ट के मुताबिक, दुनिया की करीब एक-चौथाई आबादी इलाज पर अपनी जेब से खर्च करने के कारण आर्थिक बोझ झेल रही है। वर्ष 2022 तक लगभग 1.6 अरब लोग स्वास्थ्य खर्च की वजह से गरीबी में जी रहे थे या गरीबी की ओर धकेले गए।

    कई देशों में खसरे के संक्रमण का खतरा
    डब्ल्यूएचओ ने बच्चों के नियमित टीकाकरण की रफ्तार को लेकर भी चेतावनी दी है। कई प्रमुख टीकों का कवरेज अभी भी 90 प्रतिशत के वैश्विक लक्ष्य से नीचे है। खासकर खसरे (मीजल्स) की दूसरी डोज का कवरेज 2024 में केवल 76 प्रतिशत रहा, जिससे कई देशों में संक्रमण फैलने का खतरा बना हुआ है।

    सरकारों को स्वास्थ्य क्षेत्र में बढ़ाना होगा निवेश
    डब्ल्यूएचओ का कहना है कि अगर 2030 तक सतत विकास लक्ष्यों को हासिल करना है तो सरकारों को स्वास्थ्य क्षेत्र में निवेश बढ़ाना होगा। प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करना होगा, टीकाकरण का दायरा बढ़ाना होगा और लोगों का इलाज पर होने वाला निजी खर्च कम करना होगा।

  • MP को मिली दो सोलर प्रोजेक्ट की सौगात…, नीमच में मिलेगी दुनिया की सबसे सस्ती ₹2.14 में बिजली

    MP को मिली दो सोलर प्रोजेक्ट की सौगात…, नीमच में मिलेगी दुनिया की सबसे सस्ती ₹2.14 में बिजली


    नीमच/शाजापुर।
    केंद्रीय मंत्री प्रह्लाद जोशी (Union Minister Pralhad Joshi) ने मध्य प्रदेश (Madhya Pradesh) में कुल 950 मेगावाट क्षमता वाली दो सोलर पावर परियोजनाओं (Two Solar Power Projects) का उद्घाटन किया. उन्होंने कहा कि नीमच सोलर पार्क का टैरिफ 2.14 रुपये प्रति यूनिट है, जो शायद दुनिया में किसी ‘वैनिला सोलर’ प्रोजेक्ट के लिए सबसे कम है।

    एनर्जी सेक्टर में ‘वैनिला सोलर’ शब्द का इस्तेमाल आमतौर पर उन सोलर पावर प्रोजेक्ट्स के लिए किया जाता है जो सिर्फ सोलर पैनल से बिजली बनाते हैं और जिनमें बैटरी स्टोरेज जैसी अतिरिक्त सुविधाएं नहीं होती हैं।

    जोशी ने एक भव्य समारोह में रिन्यूएबल एनर्जी प्रोजेक्ट्स नीमच में 500 मेगावाट का सोलर पार्क और शाजापुर में 450 मेगावाट का सोलर पार्क का उद्घाटन किया. इस मौके पर राज्य के मुख्यमंत्री मोहन यादव भी मौजूद थे।

    नीमच सोलर पार्क में बनने वाली बिजली का टैरिफ 2.14 रुपये, 2.149 रुपये और 2.15 रुपये प्रति यूनिट है. यह पार्क तीन यूनिट में फैला है और कुल 2500 एकड़ जमीन पर बना है. उन्होंने कहा कि यह प्रोजेक्ट भारतीय रेलवे और राज्य ग्रिड को साफ-सुथरी बिजली सप्लाई करेगा।

    उद्घाटन समारोह में बोलते हुए नए और रिन्यूएबल एनर्जी मंत्री जोशी ने कहा, “नीमच सोलर पार्क में बहुत अच्छा काम हुआ है. जहां तक मुझे पता है, 2.14 रुपये प्रति यूनिट का टैरिफ शायद वैनिला सोलर प्रोजेक्ट से बनने वाली बिजली के लिए सबसे कम है – न सिर्फ देश में, बल्कि पूरी दुनिया में.” उन्होंने रिन्यूएबल एनर्जी के क्षेत्र में राज्य सरकार की कोशिशों की तारीफ़ की और कहा कि मध्य प्रदेश एक ‘ग्रीन एनर्जी पावरहाउस’ बन रहा है।

    जोशी ने कहा कि राज्य की कुल 38 गीगावाट बिजली उत्पादन क्षमता में से लगभग 12 गीगावाट क्षमता रिन्यूएबल एनर्जी स्रोतों पर आधारित है. उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उम्मीदों के अनुसार, राज्य की कुल बिजली उत्पादन क्षमता में रिन्यूएबल एनर्जी की हिस्सेदारी कम से कम 50 प्रतिशत होनी चाहिए. केंद्र सरकार की स्टडीज़ के अनुसार, राज्य में लगभग 55 गीगावाट विंड एनर्जी पैदा करने की क्षमता है।

    उन्होंने कहा कि अभी राज्य में 3.7 गीगावाट विंड एनर्जी क्षमता लगी हुई है और 1.3 गीगावाट क्षमता वाले प्रोजेक्ट्स पर काम चल रहा है. जोशी ने कहा, “अगर अगले दो सालों के लिए लक्ष्य तय करके राज्य में पवन ऊर्जा उत्पादन को कम से कम 10 गीगावाट तक बढ़ाया जाता है, तो बिजली की लागत काफी कम हो जाएगी. इससे राज्य के किसानों और उद्योगों को फायदा होगा और नए औद्योगिक निवेश को बढ़ावा मिलेगा.”

    केंद्रीय मंत्री ने इस बात पर जोर दिया कि राज्य की हर सरकारी इमारत में सोलर पावर प्रोजेक्ट होना चाहिए. इस कार्यक्रम में जोशी और मुख्यमंत्री यादव ने लगभग 1554 करोड़ रुपये के प्रस्तावित निवेश वाले 38 औद्योगिक प्रोजेक्ट्स का शिलान्यास और उद्घाटन भी किया. अधिकारियों ने बताया कि इन प्रोजेक्ट्स से 3200 से ज्यादा लोगों को सीधे रोजगार मिलेगा।

  • ईरान युद्ध से भड़के तेल के दाम… जानें दुनिया में कहां मिल रहा सबसे सस्ता पेट्रोल-डीजल?

    ईरान युद्ध से भड़के तेल के दाम… जानें दुनिया में कहां मिल रहा सबसे सस्ता पेट्रोल-डीजल?


    नई दिल्ली।
    ईरान युद्ध (Iran war) से दुनिया भर में तेल के दाम (Oil prices) में उछाल देखने को मिल है। इस बीच पूरी दुनिया में 1 लीटर पेट्रोल की कीमत कहीं 2.25 रुपये है तो कहीं 394.95 रुपये। यानी पेट्रोल की कीमत कही भारत से 44 गुना सस्ता है तो कहीं करीब चार गुना महंगा। आइए जानें दुनिया में सबसे सस्ता और महंगा पेट्रोल और डीजल (Petrol Diesel Prices) कहां मिलता है?


    सबसे महंगा पेट्रोल बेचने वाले देश

    सबसे पहले बात दुनिया में सबसे महंगे पेट्रोल बेचने वाले टॉप-10 देशों की। इस लिस्ट में सबसे ऊपर हांगकांग का नाम है। यहां एक लीटर पेट्रोल की कीमत करीब 400 रुपये है। इसके बाद मलावी का नाम आता है। यहां पेट्रोल का रेट 364.27 रुपये प्रति लीटर है।

    इजरायल में पेट्रोल जहां, 269.19 रुपये लीटर है वहीं, डेनमार्क में 265.74 रुपये। नीदरलैंड में एक लीटर पेट्रोल की कीमत 260.15 रुपये है। ग्रीस में 231.57 और अल्बानिया में 231.49 रुपये लीटर है। स्विट्जरलैंड में पेट्रोल की कीमत 231.12 और सिंगापुर में 230.02 रुपये लीटर है।


    दुनिया में सबसे सस्ता पेट्रोल बेचने वाले टॉप-10 देश

    दुनिया में सबसे सस्ता पेट्रोल लीबिया में है। यहां एक लीटर पेट्रोल की कीमत 2.25 रुपये है। इसके बाद ईरान का नंबर है। यहां एक लीटर पेट्रोल की कीमत 3.32 रुपये है। इसके बाद अंगोला में 31.08, कुवैत में 32.41, अल्जीरिया में 33.75 और तुर्कमेनिस्तान में 40.78 रुपये लीटर है।

    आठवें नंबर इजिप्ट है। यहां पेट्रोल की कीमत 42.78 रुपये है। नौवें पर कतर है, जहां पेट्रोल की कीमत 54.62 रुपये लीटर है। 10वें नंबर पर सऊदी अरब है। यहां एक लीटर पेट्रोल की कीमत 59.62 रुपये है।


    किस देश में सबसे सस्ता डीजल

    सबसे सस्ता डीजल वेनेजुएला में मिलता है। यहां 1 लीटर डीजल की कीमत महज 39 पैसे है। इसके बाद ईरान में 54 पैसे और लीबिया में 2.25 रुपये लीटर। अल्जीरिया में एक लीटर डीजल की कीमत 22.26 रुपये है।

    तुर्कमेनिस्तान में डीजल 27.19 रुपये प्रति लीटर है तो कुवैत में 35.50 रुपये। इजिप्ट में डीजल का रेट 36.36 रुपये लीटर है तो अंगोला में 41.44 रुपये लीटर। सऊदी अरब में एक लीटर डीजल की कीमत 45.37 रुपये और कतर में 53.32 रुपये।


    हांगकांग में 446 रुपये लीटर है डीजल

    दुनिया में सबसे महंगा डीजल हांगकांग में 446 रुपये लीटर है। एक लीटर डीजल की कीमत मलावी में 365, सिंगापुर में 310.49, डेनमार्क में 273.16, स्विट्जरलैंड में 262.09, नीदरलैंड में 257 रुपये लीटर है। इजरायल में जहां एक लीटर डीजल 255.60 रुपये है तो फिनलैंड में 255.59 रुपये।

  • दुनिया में भारत का जलवा: विदेशों से आया रिकॉर्ड पैसा, रेमिटेंस में फिर नंबर-1

    दुनिया में भारत का जलवा: विदेशों से आया रिकॉर्ड पैसा, रेमिटेंस में फिर नंबर-1

    नई दिल्‍ली। वैश्विक स्तर पर भारतीयों की मेहनत और कौशल का असर एक बार फिर दिखा है। संयुक्त राष्ट्र से जुड़ी ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, विदेशों में काम कर रहे भारतीयों ने अपने देश को रिकॉर्ड स्तर पर पैसा भेजकर नया इतिहास रच दिया है।
    इंटरनेशनल ऑर्गेनाइजेशन फॉर माइग्रेशन की ‘वर्ल्ड माइग्रेशन रिपोर्ट 2026’ के अनुसार, साल 2024 में भारत को करीब 137 बिलियन डॉलर (लगभग 11.4 लाख करोड़ रुपये) का रेमिटेंस मिला। यह अब तक का सबसे बड़ा आंकड़ा है और भारत लगातार एक दशक से इस सूची में शीर्ष पर बना हुआ है।
    00 बिलियन डॉलर पार करने वाला इकलौता देश
    रिपोर्ट के अनुसार, भारत दुनिया का पहला और इकलौता देश बन गया है जिसने रेमिटेंस में 100 बिलियन डॉलर का आंकड़ा पार किया है। इससे साफ है कि वैश्विक स्तर पर भारतीयों की आर्थिक भागीदारी लगातार मजबूत हो रही है।
    दूसरे देशों से काफी आगे भारत
    रेमिटेंस के मामले में भारत के बाद मेक्सिको दूसरे, फिलीपींस तीसरे और फ्रांस चौथे स्थान पर हैं। हालांकि इनमें से कोई भी देश अभी तक 100 बिलियन डॉलर के आंकड़े तक नहीं पहुंच पाया है।
    लगातार बढ़ता ग्राफ
    अगर पिछले वर्षों के आंकड़ों पर नजर डालें तो 2010 में भारत को करीब 53.48 बिलियन डॉलर, 2015 में 68.91 बिलियन डॉलर और 2020 में 83.15 बिलियन डॉलर का रेमिटेंस मिला था।
    पिछले चार वर्षों में इसमें तेज उछाल दर्ज किया गया है।
    किन देशों से आता है ज्यादा पैसा?
    रेमिटेंस भेजने वाले देशों में अमेरिका सबसे आगे है, जहां से 100 बिलियन डॉलर से ज्यादा का आउटफ्लो दर्ज किया गया। इसके अलावा सऊदी अरब, स्विट्जरलैंड और जर्मनी भी प्रमुख स्रोतों में शामिल हैं।
    छात्रों की भी मजबूत मौजूदगी
    आर्थिक योगदान के साथ-साथ भारतीय छात्र भी वैश्विक स्तर पर अपनी पहचान बना रहे हैं।
    आंकड़ों के मुताबिक, विदेशों में पढ़ाई करने वाले छात्रों में चीन पहले और भारत दूसरे स्थान पर है। 2022 तक 6.20 लाख से अधिक भारतीय छात्र विदेशों में उच्च शिक्षा ले रहे थे।
    रेमिटेंस के क्षेत्र में भारत की यह उपलब्धि न सिर्फ अर्थव्यवस्था को मजबूती देती है, बल्कि यह भी दिखाती है कि दुनियाभर में भारतीयों की भूमिका कितनी अहम हो चुकी है। लगातार बढ़ता यह आंकड़ा आने वाले समय में भारत की आर्थिक ताकत को और मजबूत कर सकता है।
  • गंभीर जलवायु संकट की तरफ बढ़ रही दुनिया…. 20290 तक भीषण गर्मी और सूखे की चपेट में होंगे 260 करोड़ लोग

    गंभीर जलवायु संकट की तरफ बढ़ रही दुनिया…. 20290 तक भीषण गर्मी और सूखे की चपेट में होंगे 260 करोड़ लोग


    नई दिल्ली।
    दुनिया (World) तेजी से एक ऐसे जलवायु संकट (Climate Crisis) की ओर बढ़ रही है, जहां भीषण गर्मी और सूखा (Extreme heat and Drought)मिलकर अभूतपूर्व खतरा पैदा कर रहे हैं। जियोफिजिकल रिसर्च लेटर्स में प्रकाशित एक नई स्टडी के अनुसार अगर मौजूदा जलवायु नीतियों में ठोस बदलाव नहीं हुआ, तो सदी के अंत तक वैश्विक आबादी का करीब 28 फीसदी यानी लगभग 260 करोड़ लोग इस दोहरे संकट की चपेट में होंगे।

    अध्ययन के अनुसार इसका असर आज की तुलना में करीब पांच गुना तक बढ़ सकता है। अध्ययन के अनुसार 2001 से 2020 के बीच हर साल औसतन चार बार ऐसे हालात बने, जब भीषण गर्मी और सूखा एक साथ पड़े। यह आंकड़ा औद्योगिक काल 1850 से 1900 की तुलना में दोगुना है। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि 2090 तक ऐसी घटनाएं साल में करीब 10 बार तक हो सकती हैं और हर घटना करीब दो हफ्ते तक असर डाल सकती है।


    इसे कहते हैं कंपाउंड एक्सट्रीम

    जब कई चरम मौसम घटनाएं एक साथ मिलकर प्रभाव को कई गुना बढ़ा देती हैं तब इसे वैज्ञानिक भाषा में कंपाउंड एक्सट्रीम कहा जाता है। इससे फसलें तेजी से सूखती हैं, जल स्रोत सिकुड़ते हैं और जंगलों में आग लगने का खतरा बढ़ जाता है। इसके साथ खाद्य कीमतों में उछाल और लू से मौतों का जोखिम भी बढ़ता है। यह स्थिति वैश्विक खाद्य सुरक्षा पर भी सीधा दबाव डाल सकती है। इसका सबसे ज्यादा असर उन लोगों पर पड़ेगा जो खुले में काम करते हैं।


    सही नीतियों से कम हो सकता है खतरा

    अगर देश पेरिस समझौते के तहत अपने जलवायु वादों को प्रभावी ढंग से लागू करें तो इस खतरे को काफी हद तक कम किया जा सकता है। यह अंतर इस बात को रेखांकित करता है कि आने वाले दशकों में अरबों लोगों के जीवन को सुरक्षित या असुरक्षित बना सकते हैं।


    अध्ययन का आधार और वैज्ञानिक निष्कर्ष

    अध्ययन के अनुसार 8 जलवायु मॉडलों पर आधारित 152 सिमुलेशन का विश्लेषण किया गया, जिसमें जनसंख्या वृद्धि और ग्लोबल वार्मिंग के विभिन्न परिदृश्यों को शामिल किया गया। ये परिदृश्य इंटरगवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज,संयुक्त राष्ट्र की जलवायु संबंधी वैज्ञानिक संस्था (आईपीसीसी) की छठी आकलन रिपोर्ट पर आधारित हैं। इसके लिए 1961 से 1990 की अवधि को आधार बनाया गया।

  • फारस की खाड़ी से वापस लौटा दुनिया का सबसे बड़ा विमानवाहक पोत….

    फारस की खाड़ी से वापस लौटा दुनिया का सबसे बड़ा विमानवाहक पोत….


    वाशिंगटन।
    अमेरिका और ईरान (America and Iran) के बीच जारी तनाव के बीच नया घटनाक्रम सामने आया है। दुनिया का सबसे बड़ा विमानवाहक पोत (World’s largest Aircraft Carrier) USS जेराल्ड आर. फोर्ड (USS Gerald R. Ford) अब फारस की खाड़ी से वापस लौट रहा है। यह कदम ऐसे समय उठाया गया है जब दोनों देशों के बीच बातचीत ठप पड़ गई है और किसी ठोस समझौते की संभावना फिलहाल नजर नहीं आ रही है। यह युद्धपोत पिछले 10 महीनों से अधिक समय से समुद्र में तैनात था और इस दौरान उसने ईरान के खिलाफ अमेरिकी सैन्य अभियानों में अहम भूमिका निभाई।

    इस विमानवाहक पोत की वापसी को अमेरिका की सैन्य रणनीति में बदलाव के संकेत के तौर पर देखा जा रहा है। हालांकि, इसे पूरी तरह से पीछे हटना नहीं कहा जा सकता, क्योंकि क्षेत्र में अभी भी अन्य अमेरिकी युद्धपोत मौजूद हैं। फोर्ड की वापसी से यह तो साफ है कि अमेरिका अब लंबे समय तक भारी सैन्य तैनाती बनाए रखने के बजाय दूसरी नीति पर काम कर रहा है।


    अमेरिका-ईरान के बीच बातचीत में गतिरोध

    जानकारों का मानना है कि यह कदम सैनिकों को राहत देने और जहाज की मरम्मत जैसी जरूरतों को ध्यान में रखते हुए भी लिया गया होगा। मालूम हो कि अमेरिका और ईरान के बीच चल रही बातचीत में गतिरोध बना हुआ है। दोनों पक्ष कई अहम मुद्दों पर सहमत नहीं हो पाए हैं, जिसमें सुरक्षा, तेल आपूर्ति और क्षेत्रीय नियंत्रण जैसे विषय शामिल हैं। बातचीत के ठप पड़ने से तनाव और बढ़ गया है और क्षेत्र में अनिश्चितता का माहौल बना हुआ है।

    स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को लेकर स्थिति और संवेदनशील हो गई है, जहां से दुनिया का बड़ा हिस्सा तेल आपूर्ति करता है। फिलहाल, विमानवाहक पोत की वापसी एक बड़े भू-राजनीतिक संकेत के रूप में देखी जा रही है। यह न केवल अमेरिका की रणनीति में बदलाव को दर्शाता है, बल्कि यह भी बताता है कि कूटनीतिक समाधान अभी दूर है। अगर बातचीत जल्द शुरू नहीं होती तो स्थिति और गंभीर हो सकती है, जिसका असर वैश्विक ऊर्जा बाजार और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा पर भी पड़ सकता है।