Tag: World

  • दुनिया में रहने लायक सबसे अच्छे शहरों की सूची में दिल्ली 120वें स्थान पर, मुम्बई उससे भी पीछे

    दुनिया में रहने लायक सबसे अच्छे शहरों की सूची में दिल्ली 120वें स्थान पर, मुम्बई उससे भी पीछे


    नई दिल्ली।
    दुनिया भर में रहने के लिहाज से सबसे अच्छे शहरों (Best Cities) की ताजा लिस्ट आ गई है। इस हफ्ते ‘द इकोनॉमिस्ट इंटेलिजेंस यूनिट’ ने अपनी नई ‘ग्लोबल लिवेबिलिटी इंडेक्स 2026’ (Global Liveability Index 2026) रिपोर्ट जारी की है। इस सूचकांक में कुल 173 शहरों को वहां मौजूद सुविधाओं और रहने की स्थितियों के अलग-अलग पैमानों पर परखा गया है। अगर भारतीय शहरों की बात करें तो नई दिल्ली (New Delhi) को 120वां स्थान मिला है। वहीं, डेनमार्क का शहर कोपेनहेगन (Copenhagen) दुनिया के सबसे बेहतरीन और रहने लायक शहरों की लिस्ट में नंबर वन पर बरकरार है। कोपेनहेगन ने ऑस्ट्रिया की राजधानी वियना को पीछे छोड़ते हुए अपना पहला स्थान बरकरार रखा है। द इकोनॉमिस्ट मैगजीन की सहयोगी संस्था ईआईयू ने दुनिया भर के 173 शहरों को शिक्षा, स्थिरता, हेल्थकेयर, इंफ्रास्ट्रक्चर और संस्कृति जैसे पैमानों पर परखा है।


    भारतीय शहरों की रैंकिंग

    रिपोर्ट के मुताबिक, भारत के प्रमुख शहरों की रैंकिंग कुछ इस प्रकार है:
    – नई दिल्ली: 120वें पायदान पर
    – मुंबई: 121वें पायदान पर
    – चेन्नई: 123वें पायदान पर
    – बेंगलुरु: 127वें पायदान पर

    गौर करने वाली बात यह है कि देश की राजधानी नई दिल्ली और आर्थिक राजधानी मुंबई की रैंकिंग में पिछले साल के मुकाबले कोई बदलाव नहीं आया है। ये दोनों शहर अपनी पुरानी स्थिति पर ही बने हुए हैं।


    दुनिया के 10 सबसे बेहतरीन शहर

    रहने के लिहाज से डेनमार्क के कोपेनहेगन ने ऑस्ट्रिया की राजधानी वियना और ऑस्ट्रेलिया के मेलबर्न को पछाड़ते हुए पहला स्थान हासिल किया है:


    कोपेनहेगन क्यों है नंबर वन?

    रिपोर्ट के मुताबिक, कोपेनहेगन को स्थिरता, इंफ्रास्ट्रक्चर और शिक्षा के मामले में “परफेक्ट” स्कोर मिला है। ईआईयू के एक प्रवक्ता ने बताया कि इस शहर की शानदार स्थिरता और बुनियादी ढांचे के साथ-साथ बेहतरीन संस्कृति, पर्यावरण और उच्च गुणवत्ता वाली सार्वजनिक सेवाओं के बेजोड़ तालमेल ने इसे शीर्ष पर बनाए रखा है।


    अमेरिका और कनाडा का क्या है हाल?

    टॉप-10 की ग्लोबल लिस्ट में उत्तरी अमेरिका का केवल एक शहर जगह बना पाया है, और वह है कनाडा का वैंकूवर (9वां स्थान)। अगर अमेरिकी शहरों की बात करें तो न्यूयॉर्क तीन पायदान की छलांग लगाकर 66वें नंबर पर आ गया है। अपराध दर में कमी और आतंकी घटनाओं के कम होते खतरे की वजह से इसके ‘स्टेबिलिटी स्कोर’ में काफी सुधार हुआ है। हालांकि, दो पायदान नीचे खिसकने के बावजूद होनोलूलू (25वां स्थान) अभी भी अमेरिका का सबसे ऊंची रैंकिंग वाला शहर बना हुआ है।


    एशिया के स्कोर में सुधार, यूरोप में ठहराव

    इंडेक्स के आंकड़ों के अनुसार, पश्चिमी यूरोप अभी भी रहने के लिहाज से दुनिया का सबसे शानदार क्षेत्र बना हुआ है, हालांकि अब इसके औसत स्कोर में एक ठहराव आ गया है। इसके उलट, एशिया के औसत स्कोर में बढ़ोतरी दर्ज की गई है। साल 2025 की तुलना में इस बार चीन के 10 शहरों ने अपनी रैंकिंग में सुधार किया है। इसके अलावा, रिपोर्ट में इस बात का भी जिक्र है कि ईरान युद्ध की वजह से पूरे खाड़ी क्षेत्र की स्थिरता प्रभावित हुई है।


    एशिया के हेल्थकेयर में सुधार से रैंकिंग उछली

    इस साल एशिया के औसत लिवेबिलिटी स्कोर में 0.3 अंकों की बढ़ोतरी दर्ज की गई है, जिससे यह 73.9 हो गया है। इसकी सबसे बड़ी वजह यहां की स्वास्थ्य सेवाओं (हेल्थकेयर) का मजबूत होना है। चीन के कई शहरों की रैंकिंग में भी उछाल आया है, जैसे फुझोऊ सात पायदान चढ़कर 93वें नंबर पर पहुंच गया है। ईआईयू की इंडस्ट्री डायरेक्टर एना निकोल्स के मुताबिक, एशिया के स्कोर में बढ़ोतरी का नतीजा यह है कि अब टॉप-20 में यूरोप के सात शहरों के साथ एशिया के नौ शहर शामिल हो गए हैं। वहीं, पश्चिमी यूरोप अभी भी रहने के लिहाज से सबसे मजबूत क्षेत्र बना हुआ है, हालांकि पिछले साल के मुकाबले इसका औसत स्कोर थोड़ा गिरकर 91.7 हो गया है।


    युद्ध की वजह से खाड़ी देशों को भारी नुकसान

    ईरान युद्ध के नतीजे खाड़ी (गल्फ) क्षेत्र के शहरों की रैंकिंग में साफ दिखाई दे रहे हैं, जहां स्थिरता स्कोर में भारी गिरावट दर्ज की गई है। मस्कट 14 पायदान गिरकर 123वें नंबर पर और कुवैत सिटी 12 स्थान खिसककर 105वें नंबर पर आ गया है। लिस्ट में सबसे नीचे सीरिया का दमिश्क शहर है, जो अभी भी दुनिया में रहने के लिहाज से सबसे खराब शहर माना गया है। इसके अलावा, युद्ध के कारण ईरान की राजधानी तेहरान खिसककर 164वें और यूक्रेन का कीव 166वें नंबर पर पहुंच गया है।

  • Report: दुनिया की 99% आबादी ले रही है प्रदूषित हवा में सांस…. WHO ने चेताया

    Report: दुनिया की 99% आबादी ले रही है प्रदूषित हवा में सांस…. WHO ने चेताया


    न्यूयार्क।
    विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) (World Health Organization – WHO) की वर्ल्ड हेल्थ स्टेटिस्टिक्स 2026 रिपोर्ट (World Health Statistics 2026 Report) हैरान करने वाली है। इसके मुताबिक, दुनिया की 99 प्रतिशत आबादी अब भी सुरक्षित सीमा से अधिक प्रदूषित हवा में सांस ले रही है। वर्ष 2021 में 66 लाख मौतें घरेलू और बाहरी वायु प्रदूषण से जुड़ी थीं।

    भारत जैसे देशों के लिए यह सार्वजनिक स्वास्थ्य की बड़ी चुनौती बनी हुई है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि भारत समेत दुनिया के कई देशों के लिए वर्ष 2030 तक हर व्यक्ति को बेहतर और सस्ती स्वास्थ्य सेवाएं (यूनिवर्सल हेल्थ कवरेज) उपलब्ध कराने का लक्ष्य हासिल करना मुश्किल होता जा रहा है। रिपोर्ट के मुताबिक, स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच बढ़ाने की रफ्तार पिछले कुछ वर्षों में काफी धीमी पड़ गई है।


    रिपोर्ट में किया गया क्या दावा?

    रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2015 से 2023 के बीच दुनिया का यूनिवर्सल हेल्थ कवरेज (यूएचसी) सर्विस कवरेज इंडेक्स केवल 68 से बढ़कर 71 तक पहुंचा। यह 2000 से 2015 के मुकाबले करीब एक-तिहाई गति से हुई प्रगति है। अगर यही रफ्तार जारी रही तो 2030 तक यह सूचकांक केवल 74 तक ही पहुंच पाएगा, जिससे सभी लोगों तक गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाने का वैश्विक लक्ष्य अधूरा रह सकता है।

    रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि दक्षिण-पूर्व एशिया क्षेत्र, जिसमें भारत भी शामिल है, ने स्वास्थ्य सेवाओं के कवरेज में अन्य क्षेत्रों की तुलना में बेहतर सुधार दर्ज किया है। 2015 के बाद इस क्षेत्र के यूएचसी इंडेक्स में 7 अंकों की बढ़ोतरी हुई है, लेकिन 2030 का लक्ष्य हासिल करने के लिए यह गति भी पर्याप्त नहीं मानी जा रही।


    स्वास्थ्य खर्च से 1.6 अरब लोग गरीबी की चपेट में

    रिपोर्ट के मुताबिक, दुनिया की करीब एक-चौथाई आबादी इलाज पर अपनी जेब से खर्च करने के कारण आर्थिक बोझ झेल रही है। वर्ष 2022 तक लगभग 1.6 अरब लोग स्वास्थ्य खर्च की वजह से गरीबी में जी रहे थे या गरीबी की ओर धकेले गए।

    कई देशों में खसरे के संक्रमण का खतरा
    डब्ल्यूएचओ ने बच्चों के नियमित टीकाकरण की रफ्तार को लेकर भी चेतावनी दी है। कई प्रमुख टीकों का कवरेज अभी भी 90 प्रतिशत के वैश्विक लक्ष्य से नीचे है। खासकर खसरे (मीजल्स) की दूसरी डोज का कवरेज 2024 में केवल 76 प्रतिशत रहा, जिससे कई देशों में संक्रमण फैलने का खतरा बना हुआ है।

    सरकारों को स्वास्थ्य क्षेत्र में बढ़ाना होगा निवेश
    डब्ल्यूएचओ का कहना है कि अगर 2030 तक सतत विकास लक्ष्यों को हासिल करना है तो सरकारों को स्वास्थ्य क्षेत्र में निवेश बढ़ाना होगा। प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करना होगा, टीकाकरण का दायरा बढ़ाना होगा और लोगों का इलाज पर होने वाला निजी खर्च कम करना होगा।

  • MP को मिली दो सोलर प्रोजेक्ट की सौगात…, नीमच में मिलेगी दुनिया की सबसे सस्ती ₹2.14 में बिजली

    MP को मिली दो सोलर प्रोजेक्ट की सौगात…, नीमच में मिलेगी दुनिया की सबसे सस्ती ₹2.14 में बिजली


    नीमच/शाजापुर।
    केंद्रीय मंत्री प्रह्लाद जोशी (Union Minister Pralhad Joshi) ने मध्य प्रदेश (Madhya Pradesh) में कुल 950 मेगावाट क्षमता वाली दो सोलर पावर परियोजनाओं (Two Solar Power Projects) का उद्घाटन किया. उन्होंने कहा कि नीमच सोलर पार्क का टैरिफ 2.14 रुपये प्रति यूनिट है, जो शायद दुनिया में किसी ‘वैनिला सोलर’ प्रोजेक्ट के लिए सबसे कम है।

    एनर्जी सेक्टर में ‘वैनिला सोलर’ शब्द का इस्तेमाल आमतौर पर उन सोलर पावर प्रोजेक्ट्स के लिए किया जाता है जो सिर्फ सोलर पैनल से बिजली बनाते हैं और जिनमें बैटरी स्टोरेज जैसी अतिरिक्त सुविधाएं नहीं होती हैं।

    जोशी ने एक भव्य समारोह में रिन्यूएबल एनर्जी प्रोजेक्ट्स नीमच में 500 मेगावाट का सोलर पार्क और शाजापुर में 450 मेगावाट का सोलर पार्क का उद्घाटन किया. इस मौके पर राज्य के मुख्यमंत्री मोहन यादव भी मौजूद थे।

    नीमच सोलर पार्क में बनने वाली बिजली का टैरिफ 2.14 रुपये, 2.149 रुपये और 2.15 रुपये प्रति यूनिट है. यह पार्क तीन यूनिट में फैला है और कुल 2500 एकड़ जमीन पर बना है. उन्होंने कहा कि यह प्रोजेक्ट भारतीय रेलवे और राज्य ग्रिड को साफ-सुथरी बिजली सप्लाई करेगा।

    उद्घाटन समारोह में बोलते हुए नए और रिन्यूएबल एनर्जी मंत्री जोशी ने कहा, “नीमच सोलर पार्क में बहुत अच्छा काम हुआ है. जहां तक मुझे पता है, 2.14 रुपये प्रति यूनिट का टैरिफ शायद वैनिला सोलर प्रोजेक्ट से बनने वाली बिजली के लिए सबसे कम है – न सिर्फ देश में, बल्कि पूरी दुनिया में.” उन्होंने रिन्यूएबल एनर्जी के क्षेत्र में राज्य सरकार की कोशिशों की तारीफ़ की और कहा कि मध्य प्रदेश एक ‘ग्रीन एनर्जी पावरहाउस’ बन रहा है।

    जोशी ने कहा कि राज्य की कुल 38 गीगावाट बिजली उत्पादन क्षमता में से लगभग 12 गीगावाट क्षमता रिन्यूएबल एनर्जी स्रोतों पर आधारित है. उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उम्मीदों के अनुसार, राज्य की कुल बिजली उत्पादन क्षमता में रिन्यूएबल एनर्जी की हिस्सेदारी कम से कम 50 प्रतिशत होनी चाहिए. केंद्र सरकार की स्टडीज़ के अनुसार, राज्य में लगभग 55 गीगावाट विंड एनर्जी पैदा करने की क्षमता है।

    उन्होंने कहा कि अभी राज्य में 3.7 गीगावाट विंड एनर्जी क्षमता लगी हुई है और 1.3 गीगावाट क्षमता वाले प्रोजेक्ट्स पर काम चल रहा है. जोशी ने कहा, “अगर अगले दो सालों के लिए लक्ष्य तय करके राज्य में पवन ऊर्जा उत्पादन को कम से कम 10 गीगावाट तक बढ़ाया जाता है, तो बिजली की लागत काफी कम हो जाएगी. इससे राज्य के किसानों और उद्योगों को फायदा होगा और नए औद्योगिक निवेश को बढ़ावा मिलेगा.”

    केंद्रीय मंत्री ने इस बात पर जोर दिया कि राज्य की हर सरकारी इमारत में सोलर पावर प्रोजेक्ट होना चाहिए. इस कार्यक्रम में जोशी और मुख्यमंत्री यादव ने लगभग 1554 करोड़ रुपये के प्रस्तावित निवेश वाले 38 औद्योगिक प्रोजेक्ट्स का शिलान्यास और उद्घाटन भी किया. अधिकारियों ने बताया कि इन प्रोजेक्ट्स से 3200 से ज्यादा लोगों को सीधे रोजगार मिलेगा।

  • ईरान युद्ध से भड़के तेल के दाम… जानें दुनिया में कहां मिल रहा सबसे सस्ता पेट्रोल-डीजल?

    ईरान युद्ध से भड़के तेल के दाम… जानें दुनिया में कहां मिल रहा सबसे सस्ता पेट्रोल-डीजल?


    नई दिल्ली।
    ईरान युद्ध (Iran war) से दुनिया भर में तेल के दाम (Oil prices) में उछाल देखने को मिल है। इस बीच पूरी दुनिया में 1 लीटर पेट्रोल की कीमत कहीं 2.25 रुपये है तो कहीं 394.95 रुपये। यानी पेट्रोल की कीमत कही भारत से 44 गुना सस्ता है तो कहीं करीब चार गुना महंगा। आइए जानें दुनिया में सबसे सस्ता और महंगा पेट्रोल और डीजल (Petrol Diesel Prices) कहां मिलता है?


    सबसे महंगा पेट्रोल बेचने वाले देश

    सबसे पहले बात दुनिया में सबसे महंगे पेट्रोल बेचने वाले टॉप-10 देशों की। इस लिस्ट में सबसे ऊपर हांगकांग का नाम है। यहां एक लीटर पेट्रोल की कीमत करीब 400 रुपये है। इसके बाद मलावी का नाम आता है। यहां पेट्रोल का रेट 364.27 रुपये प्रति लीटर है।

    इजरायल में पेट्रोल जहां, 269.19 रुपये लीटर है वहीं, डेनमार्क में 265.74 रुपये। नीदरलैंड में एक लीटर पेट्रोल की कीमत 260.15 रुपये है। ग्रीस में 231.57 और अल्बानिया में 231.49 रुपये लीटर है। स्विट्जरलैंड में पेट्रोल की कीमत 231.12 और सिंगापुर में 230.02 रुपये लीटर है।


    दुनिया में सबसे सस्ता पेट्रोल बेचने वाले टॉप-10 देश

    दुनिया में सबसे सस्ता पेट्रोल लीबिया में है। यहां एक लीटर पेट्रोल की कीमत 2.25 रुपये है। इसके बाद ईरान का नंबर है। यहां एक लीटर पेट्रोल की कीमत 3.32 रुपये है। इसके बाद अंगोला में 31.08, कुवैत में 32.41, अल्जीरिया में 33.75 और तुर्कमेनिस्तान में 40.78 रुपये लीटर है।

    आठवें नंबर इजिप्ट है। यहां पेट्रोल की कीमत 42.78 रुपये है। नौवें पर कतर है, जहां पेट्रोल की कीमत 54.62 रुपये लीटर है। 10वें नंबर पर सऊदी अरब है। यहां एक लीटर पेट्रोल की कीमत 59.62 रुपये है।


    किस देश में सबसे सस्ता डीजल

    सबसे सस्ता डीजल वेनेजुएला में मिलता है। यहां 1 लीटर डीजल की कीमत महज 39 पैसे है। इसके बाद ईरान में 54 पैसे और लीबिया में 2.25 रुपये लीटर। अल्जीरिया में एक लीटर डीजल की कीमत 22.26 रुपये है।

    तुर्कमेनिस्तान में डीजल 27.19 रुपये प्रति लीटर है तो कुवैत में 35.50 रुपये। इजिप्ट में डीजल का रेट 36.36 रुपये लीटर है तो अंगोला में 41.44 रुपये लीटर। सऊदी अरब में एक लीटर डीजल की कीमत 45.37 रुपये और कतर में 53.32 रुपये।


    हांगकांग में 446 रुपये लीटर है डीजल

    दुनिया में सबसे महंगा डीजल हांगकांग में 446 रुपये लीटर है। एक लीटर डीजल की कीमत मलावी में 365, सिंगापुर में 310.49, डेनमार्क में 273.16, स्विट्जरलैंड में 262.09, नीदरलैंड में 257 रुपये लीटर है। इजरायल में जहां एक लीटर डीजल 255.60 रुपये है तो फिनलैंड में 255.59 रुपये।

  • दुनिया में भारत का जलवा: विदेशों से आया रिकॉर्ड पैसा, रेमिटेंस में फिर नंबर-1

    दुनिया में भारत का जलवा: विदेशों से आया रिकॉर्ड पैसा, रेमिटेंस में फिर नंबर-1

    नई दिल्‍ली। वैश्विक स्तर पर भारतीयों की मेहनत और कौशल का असर एक बार फिर दिखा है। संयुक्त राष्ट्र से जुड़ी ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, विदेशों में काम कर रहे भारतीयों ने अपने देश को रिकॉर्ड स्तर पर पैसा भेजकर नया इतिहास रच दिया है।
    इंटरनेशनल ऑर्गेनाइजेशन फॉर माइग्रेशन की ‘वर्ल्ड माइग्रेशन रिपोर्ट 2026’ के अनुसार, साल 2024 में भारत को करीब 137 बिलियन डॉलर (लगभग 11.4 लाख करोड़ रुपये) का रेमिटेंस मिला। यह अब तक का सबसे बड़ा आंकड़ा है और भारत लगातार एक दशक से इस सूची में शीर्ष पर बना हुआ है।
    00 बिलियन डॉलर पार करने वाला इकलौता देश
    रिपोर्ट के अनुसार, भारत दुनिया का पहला और इकलौता देश बन गया है जिसने रेमिटेंस में 100 बिलियन डॉलर का आंकड़ा पार किया है। इससे साफ है कि वैश्विक स्तर पर भारतीयों की आर्थिक भागीदारी लगातार मजबूत हो रही है।
    दूसरे देशों से काफी आगे भारत
    रेमिटेंस के मामले में भारत के बाद मेक्सिको दूसरे, फिलीपींस तीसरे और फ्रांस चौथे स्थान पर हैं। हालांकि इनमें से कोई भी देश अभी तक 100 बिलियन डॉलर के आंकड़े तक नहीं पहुंच पाया है।
    लगातार बढ़ता ग्राफ
    अगर पिछले वर्षों के आंकड़ों पर नजर डालें तो 2010 में भारत को करीब 53.48 बिलियन डॉलर, 2015 में 68.91 बिलियन डॉलर और 2020 में 83.15 बिलियन डॉलर का रेमिटेंस मिला था।
    पिछले चार वर्षों में इसमें तेज उछाल दर्ज किया गया है।
    किन देशों से आता है ज्यादा पैसा?
    रेमिटेंस भेजने वाले देशों में अमेरिका सबसे आगे है, जहां से 100 बिलियन डॉलर से ज्यादा का आउटफ्लो दर्ज किया गया। इसके अलावा सऊदी अरब, स्विट्जरलैंड और जर्मनी भी प्रमुख स्रोतों में शामिल हैं।
    छात्रों की भी मजबूत मौजूदगी
    आर्थिक योगदान के साथ-साथ भारतीय छात्र भी वैश्विक स्तर पर अपनी पहचान बना रहे हैं।
    आंकड़ों के मुताबिक, विदेशों में पढ़ाई करने वाले छात्रों में चीन पहले और भारत दूसरे स्थान पर है। 2022 तक 6.20 लाख से अधिक भारतीय छात्र विदेशों में उच्च शिक्षा ले रहे थे।
    रेमिटेंस के क्षेत्र में भारत की यह उपलब्धि न सिर्फ अर्थव्यवस्था को मजबूती देती है, बल्कि यह भी दिखाती है कि दुनियाभर में भारतीयों की भूमिका कितनी अहम हो चुकी है। लगातार बढ़ता यह आंकड़ा आने वाले समय में भारत की आर्थिक ताकत को और मजबूत कर सकता है।
  • गंभीर जलवायु संकट की तरफ बढ़ रही दुनिया…. 20290 तक भीषण गर्मी और सूखे की चपेट में होंगे 260 करोड़ लोग

    गंभीर जलवायु संकट की तरफ बढ़ रही दुनिया…. 20290 तक भीषण गर्मी और सूखे की चपेट में होंगे 260 करोड़ लोग


    नई दिल्ली।
    दुनिया (World) तेजी से एक ऐसे जलवायु संकट (Climate Crisis) की ओर बढ़ रही है, जहां भीषण गर्मी और सूखा (Extreme heat and Drought)मिलकर अभूतपूर्व खतरा पैदा कर रहे हैं। जियोफिजिकल रिसर्च लेटर्स में प्रकाशित एक नई स्टडी के अनुसार अगर मौजूदा जलवायु नीतियों में ठोस बदलाव नहीं हुआ, तो सदी के अंत तक वैश्विक आबादी का करीब 28 फीसदी यानी लगभग 260 करोड़ लोग इस दोहरे संकट की चपेट में होंगे।

    अध्ययन के अनुसार इसका असर आज की तुलना में करीब पांच गुना तक बढ़ सकता है। अध्ययन के अनुसार 2001 से 2020 के बीच हर साल औसतन चार बार ऐसे हालात बने, जब भीषण गर्मी और सूखा एक साथ पड़े। यह आंकड़ा औद्योगिक काल 1850 से 1900 की तुलना में दोगुना है। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि 2090 तक ऐसी घटनाएं साल में करीब 10 बार तक हो सकती हैं और हर घटना करीब दो हफ्ते तक असर डाल सकती है।


    इसे कहते हैं कंपाउंड एक्सट्रीम

    जब कई चरम मौसम घटनाएं एक साथ मिलकर प्रभाव को कई गुना बढ़ा देती हैं तब इसे वैज्ञानिक भाषा में कंपाउंड एक्सट्रीम कहा जाता है। इससे फसलें तेजी से सूखती हैं, जल स्रोत सिकुड़ते हैं और जंगलों में आग लगने का खतरा बढ़ जाता है। इसके साथ खाद्य कीमतों में उछाल और लू से मौतों का जोखिम भी बढ़ता है। यह स्थिति वैश्विक खाद्य सुरक्षा पर भी सीधा दबाव डाल सकती है। इसका सबसे ज्यादा असर उन लोगों पर पड़ेगा जो खुले में काम करते हैं।


    सही नीतियों से कम हो सकता है खतरा

    अगर देश पेरिस समझौते के तहत अपने जलवायु वादों को प्रभावी ढंग से लागू करें तो इस खतरे को काफी हद तक कम किया जा सकता है। यह अंतर इस बात को रेखांकित करता है कि आने वाले दशकों में अरबों लोगों के जीवन को सुरक्षित या असुरक्षित बना सकते हैं।


    अध्ययन का आधार और वैज्ञानिक निष्कर्ष

    अध्ययन के अनुसार 8 जलवायु मॉडलों पर आधारित 152 सिमुलेशन का विश्लेषण किया गया, जिसमें जनसंख्या वृद्धि और ग्लोबल वार्मिंग के विभिन्न परिदृश्यों को शामिल किया गया। ये परिदृश्य इंटरगवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज,संयुक्त राष्ट्र की जलवायु संबंधी वैज्ञानिक संस्था (आईपीसीसी) की छठी आकलन रिपोर्ट पर आधारित हैं। इसके लिए 1961 से 1990 की अवधि को आधार बनाया गया।

  • फारस की खाड़ी से वापस लौटा दुनिया का सबसे बड़ा विमानवाहक पोत….

    फारस की खाड़ी से वापस लौटा दुनिया का सबसे बड़ा विमानवाहक पोत….


    वाशिंगटन।
    अमेरिका और ईरान (America and Iran) के बीच जारी तनाव के बीच नया घटनाक्रम सामने आया है। दुनिया का सबसे बड़ा विमानवाहक पोत (World’s largest Aircraft Carrier) USS जेराल्ड आर. फोर्ड (USS Gerald R. Ford) अब फारस की खाड़ी से वापस लौट रहा है। यह कदम ऐसे समय उठाया गया है जब दोनों देशों के बीच बातचीत ठप पड़ गई है और किसी ठोस समझौते की संभावना फिलहाल नजर नहीं आ रही है। यह युद्धपोत पिछले 10 महीनों से अधिक समय से समुद्र में तैनात था और इस दौरान उसने ईरान के खिलाफ अमेरिकी सैन्य अभियानों में अहम भूमिका निभाई।

    इस विमानवाहक पोत की वापसी को अमेरिका की सैन्य रणनीति में बदलाव के संकेत के तौर पर देखा जा रहा है। हालांकि, इसे पूरी तरह से पीछे हटना नहीं कहा जा सकता, क्योंकि क्षेत्र में अभी भी अन्य अमेरिकी युद्धपोत मौजूद हैं। फोर्ड की वापसी से यह तो साफ है कि अमेरिका अब लंबे समय तक भारी सैन्य तैनाती बनाए रखने के बजाय दूसरी नीति पर काम कर रहा है।


    अमेरिका-ईरान के बीच बातचीत में गतिरोध

    जानकारों का मानना है कि यह कदम सैनिकों को राहत देने और जहाज की मरम्मत जैसी जरूरतों को ध्यान में रखते हुए भी लिया गया होगा। मालूम हो कि अमेरिका और ईरान के बीच चल रही बातचीत में गतिरोध बना हुआ है। दोनों पक्ष कई अहम मुद्दों पर सहमत नहीं हो पाए हैं, जिसमें सुरक्षा, तेल आपूर्ति और क्षेत्रीय नियंत्रण जैसे विषय शामिल हैं। बातचीत के ठप पड़ने से तनाव और बढ़ गया है और क्षेत्र में अनिश्चितता का माहौल बना हुआ है।

    स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को लेकर स्थिति और संवेदनशील हो गई है, जहां से दुनिया का बड़ा हिस्सा तेल आपूर्ति करता है। फिलहाल, विमानवाहक पोत की वापसी एक बड़े भू-राजनीतिक संकेत के रूप में देखी जा रही है। यह न केवल अमेरिका की रणनीति में बदलाव को दर्शाता है, बल्कि यह भी बताता है कि कूटनीतिक समाधान अभी दूर है। अगर बातचीत जल्द शुरू नहीं होती तो स्थिति और गंभीर हो सकती है, जिसका असर वैश्विक ऊर्जा बाजार और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा पर भी पड़ सकता है।

  • अपनी सेना में सबसे ज्यादा खर्च करने वाले देशों में भारत दुनिया में 5वें स्थान पर….

    अपनी सेना में सबसे ज्यादा खर्च करने वाले देशों में भारत दुनिया में 5वें स्थान पर….


    नई दिल्ली।
    साल 2025 में दुनिया भर में अपनी सेनाओं पर सबसे ज्यादा खर्च करने वाले देशों (Countries Spend Most Military) की सूची में भारत (India) पांचवें स्थान पर रहा है। भारत से आगे केवल चार देश हैं। वहीं पाकिस्तान (Pakistan) इस मामले में भारत के आसपास भी नहीं ठहरता है। पिछले साल दुनिया भर में हुए कुल सैन्य खर्च में भारत की हिस्सेदारी 3.2% रही है। आइए इस खबर को विस्तार से समझते हैं।


    भारत का रक्षा खर्च और ‘ऑपरेशन सिंदूर’

    स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (सिपरी) द्वारा सोमवार को जारी की गई एक नई रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका (USA), चीन, रूस और जर्मनी इस लिस्ट में सबसे आगे यानी टॉप 4 देश हैं। इसके बाद भारत नंबर 5 पर है। 2025 में भारत का सैन्य खर्च 92.1 अरब डॉलर रहा, जो कि पिछले वर्ष की तुलना में 8.9% अधिक है।

    बढ़ोतरी का कारण: इस वृद्धि का एक बड़ा कारण पिछले साल पाकिस्तान के खिलाफ चलाया गया ‘ऑपरेशन सिंदूर’ था। इस सैन्य अभियान के दौरान सेना को युद्ध के लिए पूरी तरह तैयार रखने हेतु सशस्त्र बलों ने आपातकालीन आधार पर हथियारों और साजो-सामान की कई महत्वपूर्ण खरीदारियां कीं।


    पड़ोसी देशों (चीन और पाकिस्तान) की क्या स्थिति है?

    सिपरी के आंकड़े बताते हैं कि भारत के पड़ोसियों ने भी अपनी सेना पर खर्च बढ़ाया है।

    चीन: दुनिया में दूसरा सबसे बड़ा सैन्य खर्च करने वाला देश चीन है। उसने अपने रक्षा बजट में 7.4% की वृद्धि की है, जिससे उसका कुल खर्च 336 अरब डॉलर हो गया है।

    पाकिस्तान: आर्थिक चुनौतियों के बावजूद पाकिस्तान के सैन्य खर्च में 11% की वृद्धि देखी गई है। 11.9 अरब डॉलर के खर्च के साथ पाकिस्तान इस सूची के 40 देशों में 31वें स्थान पर है।


    वैश्विक परिदृश्य: दुनिया भर में रक्षा खर्च रिकॉर्ड स्तर पर

    शीर्ष तीन देश: अमेरिका, चीन और रूस मिलकर वैश्विक सैन्य खर्च का 51% हिस्सा कवर करते हैं। इन तीनों देशों ने कुल मिलाकर 1,480 अरब डॉलर खर्च किए। साल 2025 में पूरी दुनिया का सैन्य खर्च बढ़कर 2,887 अरब डॉलर के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया।


    यूरोप में भारी वृद्धि

    वैश्विक स्तर पर खर्च बढ़ने का सबसे बड़ा कारण यूरोप रहा, जहां सैन्य खर्च में 14% की वृद्धि (कुल 864 अरब डॉलर) हुई। रूस-यूक्रेन युद्ध के चौथे साल में प्रवेश करने और यूरोपीय नाटो देशों द्वारा खुद को फिर से हथियारों से लैस करने की कोशिशों के कारण शीत युद्ध के बाद से मध्य और पश्चिमी यूरोप में यह सबसे तेज वार्षिक वृद्धि है।


    हथियारों के आयात में भारत अभी भी आगे

    मार्च में प्रकाशित सिपरी की एक अन्य रिपोर्ट “ट्रेंड्स इन इंटरनेशनल आर्म्स ट्रांसफर्स” के अनुसार- 2016-20 और 2021-25 की अवधि के बीच भारत के हथियारों के आयात में 4% की गिरावट आई है। गिरावट के बावजूद, भारत अभी भी सैन्य हार्डवेयर का दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा आयातक (Importer) बना हुआ है, जिसकी वैश्विक हथियारों के आयात में 8.2% हिस्सेदारी है। इसका मुख्य कारण चीन और पाकिस्तान के साथ सीमा पर चल रहा तनाव है।


    रूस पर निर्भरता कम कर रहा है भारत

    पिछले एक दशक में भारत ने अपने हथियारों की खरीद नीति में बड़ा बदलाव किया है। भारत अब रूस के बजाय पश्चिमी देशों (खासकर फ्रांस, इजरायल और अमेरिका) की ओर रुख कर रहा है। 2011-15 के दौरान भारत के कुल हथियार आयात में रूस की हिस्सेदारी 70% थी, जो 2016-20 में घटकर 51% और 2021-25 में 40% रह गई है। इसके बावजूद, वर्तमान में भारत को सैन्य हार्डवेयर की आपूर्ति करने वाले शीर्ष तीन देश रूस, फ्रांस और इजरायल ही हैं।


    भविष्य की तैयारियां: रक्षा बजट 2026-27

    ‘ऑपरेशन सिंदूर’ की पृष्ठभूमि और मौजूदा चुनौतियों को देखते हुए, भारत सरकार ने 1 फरवरी को पेश किए गए 2026-27 के केंद्रीय बजट में रक्षा क्षेत्र के लिए भारी-भरकम राशि आवंटित की है: रक्षा बजट में 15% से अधिक की बढ़ोतरी की गई है।

    इस महत्वपूर्ण क्षेत्र के लिए कुल 7.85 लाख करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं।
    इसमें से ₹2.19 लाख करोड़ का ‘पूंजीगत परिव्यय’ रखा गया है। इस फंड का इस्तेमाल सीधे तौर पर सशस्त्र बलों की क्षमताओं को बढ़ाने के लिए किया जाएगा, जिसमें नए लड़ाकू विमान, ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट, हेलीकॉप्टर, युद्धपोत, पनडुब्बियां, आर्टिलरी गन, स्मार्ट हथियार, मिसाइलें, रॉकेट और कई तरह के मानव रहित (ड्रोन) सिस्टम खरीदना शामिल है।

  • ऊफ ये गर्मी ! दुनिया के सबसे गर्म 100 शहरों में 92 भारत के…. दिल्ली में पारा 44 डिग्री के पार

    ऊफ ये गर्मी ! दुनिया के सबसे गर्म 100 शहरों में 92 भारत के…. दिल्ली में पारा 44 डिग्री के पार


    नई दिल्ली।
    गर्मी (Heat) शुरुआत में ही रिकॉर्ड तोड़ रही है। वैश्विक तापमान आंकड़ों के अनुसार दुनिया के 100 सबसे गर्म शहरों (World 100 Hottest cities) में 92 भारत (India) के हैं। इसके अलावा 6 शहर थाईलैंड और दो शहर नेपाल के हैं। अप्रैल की शुरुआत में ही दिल्ली (Delhi), मुंबई, चेन्नई और बंगलूरू जैसे शहरों में पारा 42 डिग्री सेल्सियस से ऊपर पहुंच गया। दिल्ली में तापमान 44.5 डिग्री दर्ज किया गया। आने वाले दिनों में इसमें और वृदि्ध की आशंका जताई जा रही है।

    देश में शनिवार को सर्वाधिक तापमान 47.4 डिग्री सेल्सियस यूपी के बांदा का रहा। इसके बाद प्रयागराज में 45.5 डिग्री, वाराणसी में 45 डिग्री, झांसी में 44.8 डिग्री रहा। गाजियाबाद में अधिकतम तापमान 43 डिग्री रहा। कई इलाकों में तापमान सामान्य से 5 डिग्री या उससे ऊपर है, जिससे हीट स्ट्रेस की स्थिति बन रही है।

    मौसम विभाग ने चेतावनी दी है कि जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, चंडीगढ़, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, राजस्थान और मध्य भारत के कुछ हिस्सों में लू चलने (Scorching Heatwave) की संभावना है। उत्तर भारत में रातें भी गर्म रह सकती हैं। यह स्थिति हीट डोम जैसे हालात की ओर इशारा करती है, जिसमें गर्म हवा एक क्षेत्र में फंस जाती है और तापमान लगातार बढ़ता रहता है।


    गाजियाबाद 43 डिग्री में तपा, सबसे गर्म शहरों में यूपी के 37

    100 सबसे गर्म शहरों में यूपी के 37 शहर हैं। प. बंगाल के 18, पंजाब के सात, तेलंगाना और छत्तीसगढ़ के छह-छह, बिहार और ओडिशा के पांच-पांच, महाराष्ट्र के चार, उत्तराखंड और आंध्र प्रदेश के दो-दो शहर शामिल हैं। ज्यादातर शहरों में तापमान तापमान 42 से 45 डिग्री दर्ज किया गया।


    दिल्ली के राम मनोहर लोहिया अस्पताल में हीटस्ट्रोक यूनिट बनी

    दिल्ली में शनिवार को पारा 43 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया, जिसके चलते राममनोहर लोहिया हॉस्पिटल में हीटस्ट्रोक यूनिट बनाई गई है। इसमें कूलिंग टब, 200 किलो बर्फ बनाने की मशीनें और पोर्टेबल आइस पैक भी रखे गए हैं।


    दोपहर में काम नहीं कर सकेंगे मजदूर

    उत्तर प्रदेश : आगरा, मथुरा, फिरोजाबाद और मैनपुरी में दोपहर 12 से 4 बजे तक मजदूरों के काम पर रोक।
    ओडिशा : सोमवार से सभी सरकारी स्कूल बंद रहेंगे।
    केरल : लोगों से दिन में 11 से 3 बजे के बीच बाहर न निकलने की सलाह। सेल्फ लॉकडाउन अपनाने के लिए कहा।
    कर्नाटक : सभी अस्पतालों में हीट स्ट्रोक यूनिट बनाने का आदेश। ये सभी यूनिट 31 जुलाई तक चालू रखी जाएंगी।
    मध्य प्रदेश : नर्मदापुरम जिले में स्कूलों की छुट्टी कर दी गई है।


    धूप से बचने, पर्याप्त पानी पीने हल्के कपड़े पहनने की सलाह

    मौसम विभाग ने दोपहर में धूप से बचने, पर्याप्त पानी पीने, हल्के कपड़े पहनने और बच्चों, बुजुर्गों व बीमार लोगों का विशेष ध्यान रखने की सलाह दी है। सावधानी बरतने से हीट स्ट्रोक जैसी गंभीर समस्याओं से बचा जा सकता है।

    कश्मीर में बारिश और रोहतांग में बर्फबारी
    श्रीनगर समेत कश्मीर घाटी के मैदानी इलाकों में शनिवार को रुक-रुक कर हुई बारिश से गर्मी से राहत मिली है, जबकि जोजिला दर्रे पर हल्की बर्फबारी भी हुई। वहीं, हिमाचल में रोहतांग दर्रा, कुंजम दर्रा सहित ऊंची चोटियों पर बर्फबारी हुई।

  • होर्मुज को लेकर अमेरिका और दुनिया को ब्लैकमैल नहीं कर सकता ईरान… ट्रंप ने दी चेतावनी

    होर्मुज को लेकर अमेरिका और दुनिया को ब्लैकमैल नहीं कर सकता ईरान… ट्रंप ने दी चेतावनी


    वाशिंगटन।
    अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (American President Donald Trump) ने ईरान द्वारा होर्मुज स्ट्रेट (Strait of Hormuz) पर दोबारा प्रतिबंध लगाए जाने को लेकर अपनी प्रतिक्रिया दी है। ट्रंप ने ईरान (Iran) को चेतावनी दी है कि होर्मुज स्ट्रेट (Strait of Hormuz) को लेकर ईरान अमेरिका और दुनिया को ब्लैकमैल नहीं कर सकता। बता दें, शुक्रवार को लेबनान (Lebanon.) में हुए सीजफायर का स्वागत करते हुए ईरान (Iran) ने होर्मुज पर लगे प्रतिंबध को हटा दिया था। हालांकि, जब ट्रंप होर्मुज के पास लगे अमेरिकी ब्लाकेड को हटाने से इनकार कर दिया, तो शनिवार को ईरान ने फिर से होर्मुज के दरवाजे बंद कर दिए।

    होर्मुज पर बदलते हालात पर ट्रंप ने शनिवार को ओवेल ऑफिस में मीडिया से बात की। उन्होंने कहा, “हम उनसे बात कर रहे हैं। वे स्ट्रेट को फिर से बंद करना चाहते हैं। जैसा कि वे वर्षों से करते आ रहे हैं और वे हमें ब्लैकमेल नहीं कर सकते।”

    इससे पहले ईरानी सेना की कमांड ने एक होर्मुज पर अमेरिकी कमांड को वादाखिलाफी बताया। ईरान की तरफ से कहा गया कि ईरानी बंदरगाहों के खिलाफ लगाए गए अमेरिकी ब्लाकेड को न हटाकर अमेरिका ने अपना वादा तोड़ा है। बयान में आगे कहा गया, “जब तक अमेरिका ईरान आने वाले सभी जहाजों के लिए आवाजाही की स्वतंत्रता बहाल नहीं करता, होर्मुज स्ट्रेट में स्थिति सख्त नियंत्रण में रहेगी।”

    शनिवार सुबह होर्मुज स्ट्रेट की स्थिति को अपने देश और दुनिया के सामने रखते हुए ईरानी सरकारी टीवी ने बताया कि होर्मुज पर वापस नियंत्रण हासिल कर लिया गया है। ईरान की तरफ से होर्मुज पर नियंत्रण हासिल करने के प्रयास में ही दो भारतीय तेल टैंकरों के ऊपर गोलीबारी की खबर सामने आई है। इस घटना को लेकर सरकार ने ईरानी राजदूत को भी समन किया है।

    बता दें, 28 फरवरी को अमेरिकी और इजरायली हमले के बाद शुरू हुए पश्चिम एशिया संकट ने पूरे विश्व को ऊर्जा संकट में धकेल दिया है। हमले के कुछ दिन बाद ही ईरान ने होर्मुज के ऊपर प्रतिबंध लगा दिया, जिसकी वजह से कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गईं। पांच हफ्तों की लड़ाई के बाद अमेरिका और ईरान ने सीजफायर की घोषणा कर दी, लेकिन इजरायल ने लेबनान पर हमला करना जारी रखा। इसकी वजह से ईरान ने होर्मुज को खोलने से इनकार कर दिया। अमेरिकी और ईरान के बीच हुई वार्ता के बाद इजरायल ने भी लेबनान के साथ सीजफायर का ऐलान कर दिया। इसके बाद ईरान ने शुक्रवार को सीजफायर की अवधि तक होर्मुज के रास्ते व्यापारिक जहाजों के लिए खोल दिए। लेकिन फिर ट्रंप के बायन के बाद व्यवस्था बिगड़ गई।