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  • अहोई अष्टमी आज, संतान की लंबी उम्र के लिए माताएं रखेंगी व्रत, जानें पूजा का शुभ मुहूर्त, तारों के दर्शन और व्रत कथा

    अहोई अष्टमी आज, संतान की लंबी उम्र के लिए माताएं रखेंगी व्रत, जानें पूजा का शुभ मुहूर्त, तारों के दर्शन और व्रत कथा

    नई दिल्ली ।अहोई अष्टमी का व्रत आज 1 नवंबर 2026, रविवार को रखा जा रहा है। हिंदू धर्म में इस पर्व का विशेष धार्मिक महत्व है। यह व्रत मुख्य रूप से माताएं अपनी संतान की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य, तरक्की और सुखी जीवन की कामना के लिए करती हैं। इस दिन महिलाएं सुबह से निर्जला या अपनी पारिवारिक परंपरा के अनुसार व्रत रखती हैं और शाम को अहोई माता की विधि-विधान से पूजा करती हैं। धार्मिक मान्यता है कि सच्चे मन से अहोई माता की आराधना करने और व्रत कथा सुनने से संतान पर देवी की कृपा बनी रहती है।

    करवा चौथ के बाद आने वाला यह त्योहार उत्तर भारत में विशेष रूप से मनाया जाता है। इसे अहोई आठे के नाम से भी जाना जाता है। कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को यह व्रत रखा जाता है। इस दिन शाम को पूजा करने के बाद तारों को अर्घ्य देने की परंपरा है। कुछ परिवारों में चंद्रमा को अर्घ्य देकर व्रत खोलने की भी मान्यता है।

    पंचांग के अनुसार, इस वर्ष अष्टमी तिथि 1 नवंबर को दोपहर 2 बजकर 51 मिनट से शुरू होकर 2 नवंबर को दोपहर 1 बजकर 10 मिनट तक रहेगी। उदया तिथि और शाम की पूजा परंपरा को ध्यान में रखते हुए व्रत 1 नवंबर को रखा जा रहा है। पूजा का शुभ मुहूर्त शाम 5 बजकर 36 मिनट से 6 बजकर 54 मिनट तक रहेगा। तारों के दर्शन का समय शाम करीब 6 बजे बताया गया है, जबकि चंद्रोदय रात करीब 11 बजकर 40 मिनट पर होगा। ये समय दिल्ली के पंचांग के अनुसार हैं। अलग-अलग शहरों में सूर्यास्त और चंद्रोदय के समय में अंतर हो सकता है।

    अहोई अष्टमी के दिन पूजा के लिए अहोई माता का चित्र या पोस्टर, रोली, अक्षत, हल्दी, फूल, माला, दीपक, घी, अगरबत्ती, जल से भरा कलश, दूध, फल और मिठाई की व्यवस्था की जाती है। इसके अलावा हलवा, पूरी, पुए, गेहूं और सरई की सात सींकें भी पूजा सामग्री में शामिल की जाती हैं। पूजा के लिए चौकी और लाल कपड़े का इस्तेमाल किया जाता है।

    व्रत रखने वाली महिलाएं सुबह जल्दी उठकर स्नान करती हैं और स्वच्छ वस्त्र धारण करके संतान की खुशहाली के लिए व्रत का संकल्प लेती हैं। शाम को पूजा स्थल की सफाई करके चौकी पर लाल कपड़ा बिछाया जाता है और अहोई माता का चित्र स्थापित किया जाता है। कुछ घरों में दीवार पर भी माता का चित्र बनाने की परंपरा है। इसके बाद माता को रोली, अक्षत, हल्दी, फूल और माला अर्पित की जाती है। दीपक जलाकर धूप-अगरबत्ती दिखाई जाती है और फल-मिठाई का भोग लगाया जाता है।

    पूजा के दौरान अहोई अष्टमी की व्रत कथा पढ़ी या सुनी जाती है। इसके बाद माता की आरती करके संतान की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य और उज्ज्वल भविष्य की कामना की जाती है। शाम को तारे दिखाई देने पर उन्हें जल से अर्घ्य दिया जाता है। इसके बाद परिवार की परंपरा के अनुसार व्रत का पारण किया जाता है।

    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, अहोई माता को मां पार्वती का स्वरूप माना जाता है। उन्हें संतान की रक्षा और परिवार की खुशहाली करने वाली देवी के रूप में पूजा जाता है। पहले यह व्रत मुख्य रूप से पुत्र की लंबी उम्र के लिए रखा जाता था, लेकिन अब माताएं बेटे और बेटी दोनों के अच्छे स्वास्थ्य और सुखद भविष्य की कामना से यह व्रत करती हैं। इस पर्व का संबंध मथुरा के राधा कुंड से भी माना जाता है। संतान प्राप्ति की इच्छा रखने वाले कई दंपति इस दिन राधा कुंड में स्नान और पूजा करते हैं।

    अहोई अष्टमी की प्रचलित कथा के अनुसार, एक साहूकार के सात बेटे, सात बहुएं और एक बेटी थी। दीपावली से पहले घर की साफ-सफाई के लिए उसकी बहुएं और बेटी जंगल में मिट्टी लेने गईं। मिट्टी खोदते समय साहूकार की बेटी की कुदाल से अनजाने में एक सेह के बच्चे की मृत्यु हो गई। अपने बच्चे को खोने से दुखी सेह ने साहूकार की बेटी को श्राप देने का निश्चय किया। छोटी बहू ने अपनी ननद को बचाने के लिए श्राप स्वयं लेने की बात कही। इसके बाद उसे संतान से जुड़ी परेशानियों का सामना करना पड़ा।

    कथा के अनुसार, छोटी बहू ने एक पंडित की सलाह पर गौ माता की सेवा शुरू की। उसकी श्रद्धा और भक्ति से प्रसन्न होकर गौ माता ने उसकी सहायता की। बाद में सेह भी उसकी भक्ति से प्रसन्न हुई और उसने श्राप वापस ले लिया। इसके बाद छोटी बहू के जीवन में खुशियां लौट आईं। मान्यता है कि इसी घटना के बाद संतान की लंबी उम्र और खुशहाली के लिए अहोई माता का व्रत रखने की परंपरा शुरू हुई।

  • आज शरद पूर्णिमा पर बरसेगी मां लक्ष्मी की कृपा…. चांदनी रात में इस समय रखें खीर…. जानें पूजन विधि

    आज शरद पूर्णिमा पर बरसेगी मां लक्ष्मी की कृपा…. चांदनी रात में इस समय रखें खीर…. जानें पूजन विधि


    नई दिल्ली।
    आज 25 अक्टूबर, रविवार को शरद पूर्णिमा (Sharad Purnima) का पर्व मनाया जा रहा है. हिंदू धर्म में इस पूर्णिमा का विशेष महत्व है. इसे कोजागरी पूर्णिमा (Kojagiri Purnima), रास पूर्णिमा और कौमुदी व्रत (Kaumudi Vrat) के नाम से भी जाना जाता है. इस दिन मां लक्ष्मी (Goddess Lakshmi) और चंद्र देव (Moon God) की पूजा करने की परंपरा है. मान्यता है कि शरद पूर्णिमा की रात चंद्रमा अपनी 16 कलाओं से परिपूर्ण होता है, उसकी चांदनी को अमृत के समान माना जाता है. यही वजह है कि इस रात दूध और चावल से बनी खीर को खुले आसमान के नीचे रखने की परंपरा है।

    पूर्णिमा तिथि 25 अक्टूबर को सुबह 11 बजकर 55 मिनट पर शुरू हो चुकी है, यह 26 अक्टूबर को सुबह 9 बजकर 41 मिनट तक रहेगी. चूंकि पूर्णिमा की रात 25 अक्टूबर को पड़ रही है, इसलिए शरद पूर्णिमा का मुख्य पर्व आज ही मनाया जा रहा है. आइए जानते हैं पूजा का शुभ मुहूर्त, चंद्रोदय का समय, पूजा विधि और खीर रखने की परंपरा।


    शरद पूर्णिमा 2026: पूजा का शुभ मुहूर्त

    शरद पूर्णिमा पर मां लक्ष्मी की पूजा और चंद्र दर्शन का विशेष महत्व माना जाता है. इस साल पूजा के लिए ये समय ध्यान में रखें.
    – शरद पूर्णिमा: 25 अक्टूबर 2026, रविवार
    – पूर्णिमा तिथि शुरू: 25 अक्टूबर, सुबह 11:55 बजे
    – पूर्णिमा तिथि समाप्त: 26 अक्टूबर, सुबह 9:41 बजे
    – चंद्रोदय: दिल्ली में शाम करीब 5 बजे
    – लक्ष्मी पूजा का निशीथ मुहूर्त: रात 11:40 बजे से 26 अक्टूबर को रात 12:31 बजे तक.


    शरद पूर्णिमा पर कैसे करें मां लक्ष्मी की पूजा?

    शरद पूर्णिमा के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करें, साफ कपड़े पहनें. इसके बाद घर के मंदिर की सफाई करके मां लक्ष्मी और भगवान विष्णु की पूजा करें. पूजा में फूल, फल, मिठाई और दीपक अर्पित कर सकते हैं।

    शाम को चंद्रमा निकलने के बाद चंद्र देव को जल अर्पित करें. इसके बाद मां लक्ष्मी की पूजा करें, सुख-समृद्धि की कामना करें. इस रात कई घरों में भजन-कीर्तन और जागरण भी किया जाता है. धार्मिक मान्यता है कि शरद पूर्णिमा की रात मां लक्ष्मी पृथ्वी पर भ्रमण करती हैं, मां जागकर उनकी आराधना करने वाले भक्तों पर कृपा करती हैं।


    शरद पूर्णिमा की रात खीर क्यों रखी जाती है?

    शरद पूर्णिमा की सबसे खास परंपराओं में से एक है चांदनी में खीर रखना. इस दिन दूध, चावल और चीनी से खीर बनाई जाती है. फिर इसे साफ बर्तन में रखकर चंद्रमा की रोशनी में रखा जाता है. कई परिवार अगले दिन खीर को भगवान को भोग लगाने के बाद प्रसाद के रूप में ग्रहण करते हैं।

    धार्मिक मान्यता है कि शरद पूर्णिमा की रात चंद्रमा की किरणों से अमृत बरसता है. इसी विश्वास के कारण चांदनी में रखी खीर को विशेष माना जाता है. खीर को खुले में रखते समय साफ-सफाई का ध्यान रखें , उसे ढककर रखें, ताकि धूल और कीड़े उसमें न गिरें।


    कोजागरी पूर्णिमा क्यों कहते हैं?

    शरद पूर्णिमा को कोजागरी पूर्णिमा भी कहा जाता है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, कोजागरी शब्द का संबंध संस्कृत के ‘को जागर्ति’ यानी ‘कौन जाग रहा है’ से है. माना जाता है कि इस रात मां लक्ष्मी पृथ्वी पर भ्रमण करती हैं, जागकर पूजा करने वाले भक्तों को आशीर्वाद देती हैं. इसी वजह से कई जगहों पर लोग रात में जागरण करते हैं और मां लक्ष्मी की आराधना करते हैं।

  • भोपाल पुलिस लाइन में मंत्री विश्वास सारंग ने किया शस्त्र पूजन, विजयादशमी पर दी शुभकामनाएं

    भोपाल पुलिस लाइन में मंत्री विश्वास सारंग ने किया शस्त्र पूजन, विजयादशमी पर दी शुभकामनाएं

    मध्य प्रदेश: की राजधानी भोपाल में विजयादशमी के अवसर पर शस्त्र पूजन का आयोजन किया गया। प्रदेश सरकार में मंत्री विश्वास सारंग ने नेहरू नगर स्थित पुलिस लाइन के मैदान में आयोजित कार्यक्रम में भाग लिया। इस दौरान उन्होंने विधि-विधान के साथ शस्त्रों का पूजन किया और प्रदेशवासियों को दशहरे की शुभकामनाएं दीं। कार्यक्रम में विजयादशमी की परंपरा और शस्त्र पूजन के महत्व को रेखांकित किया गया।

    मंत्री विश्वास सारंग ने कहा कि विजयादशमी का पर्व पूरी दुनिया में बुराई पर अच्छाई की जीत के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है। उन्होंने इस अवसर पर सभी लोगों को दशहरे की बहुत-बहुत शुभकामनाएं दीं। उनके संदेश में पर्व की परंपरा, उसके सांस्कृतिक महत्व और शुभ अवसर पर लोगों को बधाई देने की भावना प्रमुख रही।

    विजयादशमी के अवसर पर मध्य प्रदेश के विभिन्न क्षेत्रों में शस्त्र पूजन के आयोजन किए गए। इस परंपरा के तहत शस्त्रों की पूजा कर उनके महत्व को सम्मान दिया जाता है। भोपाल की पुलिस लाइन में आयोजित कार्यक्रम भी इसी परंपरा का हिस्सा रहा, जिसमें मंत्री सारंग ने स्वयं पूजन की विधि पूरी की।

    शस्त्र पूजन भारतीय परंपरा में शक्ति और सामर्थ्य के प्रतीक के रूप में देखा जाता है। विजयादशमी के दिन इस अनुष्ठान के आयोजन का उद्देश्य परंपरागत मान्यताओं के प्रति सम्मान व्यक्त करना है। इस अवसर पर शस्त्रों की पूजा के माध्यम से शक्ति के महत्व को दर्शाया जाता है। मध्य प्रदेश में भी दशहरे के मौके पर इस परंपरा का पालन किया गया।

    मंत्री सारंग ने अपने संदेश में कहा कि शस्त्र शक्ति का प्रतीक हैं। उन्होंने देश और प्रदेश की प्रगति का उल्लेख करते हुए कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत आगे बढ़ रहा है और मुख्यमंत्री मोहन यादव के नेतृत्व में मध्य प्रदेश भी विकास की दिशा में आगे बढ़ रहा है। उन्होंने सनातन परंपराओं का पालन करते हुए आगे बढ़ने की बात कही।

    भोपाल के नेहरू नगर पुलिस लाइन स्थित मैदान में हुआ यह आयोजन विजयादशमी के अवसर पर आयोजित धार्मिक और सांस्कृतिक गतिविधियों की कड़ी का हिस्सा रहा। शस्त्र पूजन के माध्यम से पर्व की परंपरा का निर्वहन किया गया। मंत्री सारंग ने पूजन के बाद अपने संदेश में विजयादशमी की शुभकामनाएं देते हुए बुराई पर अच्छाई की जीत के महत्व को सामने रखा।

    विजयादशमी भारत में मनाए जाने वाले प्रमुख पर्वों में शामिल है। इस दिन विभिन्न स्थानों पर धार्मिक अनुष्ठान और परंपरागत कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। मध्य प्रदेश में भी पर्व के अवसर पर शस्त्र पूजन की परंपरा निभाई गई। भोपाल में आयोजित कार्यक्रम में मंत्री विश्वास सारंग की भागीदारी इसी आयोजन का प्रमुख हिस्सा रही।

  • आज दशहरे पर देश में इन 7 जगह नहीं होगा रावण दहन…. कहीं दामाद तो कहीं पूर्वज के रूप में पूजे जाएंगे दशानन…

    आज दशहरे पर देश में इन 7 जगह नहीं होगा रावण दहन…. कहीं दामाद तो कहीं पूर्वज के रूप में पूजे जाएंगे दशानन…


    नई दिल्ली।
    आज देशभर में विजयादशमी (Vijayadashami) यानी दशहरा (Dussehra) मनाया जा रहा है. इस दिन देश के विभिन्न हिस्सों में रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतले जलाए जाते हैं. लेकिन भारत में कुछ जगह ऐसी भी हैं, जहां रावण दहन (Burning Ravana) नहीं किया जाता, बल्कि दशानन की पूजा (Worship) होती है. इसके पीछे स्थानीय इतिहास, धार्मिक आस्था और पीढ़ियों से चली आ रही मान्यताएं हैं. आइए जानते हैं कि रावण की पूजा देश में कहां-कहां होती है।


    1. बिसरख गांव (उत्तर प्रदेश)

    उत्तर प्रदेश के ग्रेटर नोएडा में स्थित बिसरख गांव का नाम रावण से जोड़ा जाता है. स्थानीय परंपरा के अनुसार, यह रावण के पिता ऋषि विश्रवा से संबंधित स्थान है. इसी वजह से गांव के लोग रावण को विशेष सम्मान देते हैं. यहां दशहरे के दिन रावण का पुतला जलाने के बजाए उसकी पूजा-अर्चना की जाती है. गांव में रावण का एक मंदिर भी है, जहां श्रद्धालु अपनी आस्था के अनुसार पूजा करते हैं।


    2. मंदसौर (मध्य प्रदेश)

    मध्य प्रदेश का मंदसौर भी उन खास जगहों में से एक है, जहां रावण की पूजा होती है.मान्यता है कि रावण की पत्नी मंदोदरी इसी क्षेत्र की रहने वाली थीं. इसी वजह से मंदसौर को रावण का ससुराल कहा जाता है. स्थानीय परंपरा में दामाद को सम्मान देने की वजह से रावण की पूजा होती है. यही कारण है कि यहां के कुछ इलाकों में विजयादशमी पर रावण का पुतला जलाने के बजाय उसकी पूजा करते हैं।


    3. रावनग्राम (मध्य प्रदेश)

    मध्य प्रदेश के विदिशा से करीब 50 किलोमीटर दूर रावनग्राम में भी रावण के पुतले का दहन नहीं होता है. यहां भी रावण को पूजने की परंपरा है. स्थानीय लोगों की आस्था में रावण का विशेष स्थान है. इस गांव में उसकी विशाल प्रतिमा स्थापित होने की बात भी कही जाती है. रावनग्राम की परंपरा बताती है कि अलग-अलग क्षेत्रों में रामायण के पात्रों को लेकर धार्मिक मान्यताएं एक जैसी नहीं हैं।


    4. कानपुर (उत्तर प्रदेश)

    उत्तर प्रदेश के कानपुर में स्थित दशानन मंदिर रावण की पूजा के लिए प्रसिद्ध है. बताया जाता है कि इस मंदिर का इतिहास करीब 135 साल पुराना है. यहां मंदिर के कपाट सालभर खुले नहीं रहते, बल्कि दशहरे के दिन श्रद्धालुओं के दर्शन के लिए खोले जाते हैं. शेष दिनों में रावण की प्रतिमा ढकी रहती है. विजयादशमी पर भक्त मंदिर पहुंचकर पूजा-अर्चना करते हैं और तेल के दीपक जलाते हैं. धार्मिक मान्यता के अनुसार, श्रद्धालु रावण से बुद्धि, ज्ञान और शक्ति की कामना करते हैं।


    5. जोधपुर (राजस्थान)

    राजस्थान के जोधपुर में भी कुछ समुदाय रावण को अपने पूर्वज के रूप में देखते हैं. इनकी मान्यताओं में रावण का संबंध वंश परंपरा से जुड़ा हुआ है. इसी कारण दशहरे के अवसर पर ये लोग रावण का पुतला जलाने के बजाय उसकी पूजा करते हैं. यहां रावण को लेकर प्रचलित आस्था मुख्यधारा में दिखाई देने वाली रावण दहन की परंपरा से अलग है. यह स्थानीय समुदायों की धार्मिक मान्यताओं और सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा मानी जाती है।


    6. काकिनाडा (आंध्र प्रदेश)

    आंध्र प्रदेश के काकिनाडा में रावण को समर्पित एक मंदिर है. यहां उसे एक पराक्रमी शासक और भगवान शिव के परम भक्त के रूप में देखा जाता है. मंदिर में रावण के साथ भगवान शिव की पूजा किए जाने की परंपरा भी बताई गई है. स्थानीय मान्यताओं में रावण की शिवभक्ति और उसके सामर्थ्य को महत्व दिया जाता है. इस वजह से यहां रावण को देखने का नजरिया उन स्थानों से अलग है, जहां विजयादशमी पर उसके पुतले का दहन किया जाता है।


    7. कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश)

    हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले में भी रावण को लेकर अलग धार्मिक मान्यताएं प्रचलित हैं. यहां कुछ स्थानों पर रावण को भगवान शिव का बड़ा उपासक मानकर सम्मान दिया जाता है. मान्यता है कि रावण ने कठोर तपस्या से शिवजी को प्रसन्न किया था और उनकी कृपा प्राप्त की थी. कुछ स्थानीय परंपराओं में यह भी माना जाता है कि रावण को मोक्ष मिला था. इसी आस्था के चलते यहां कुछ लोग दशहरे पर रावण का दहन करने के बजाय उसकी पूजा-अर्चना करते हैं।

  • सेवा भारती करेगी 501 कन्याओं का पूजन, 16 अक्टूबर को मानस भवन में होगा आयोजन

    सेवा भारती करेगी 501 कन्याओं का पूजन, 16 अक्टूबर को मानस भवन में होगा आयोजन

    शिवपुरी। सेवा भारती शिवपुरी द्वारा नवरात्रि में घरों में होने वाले कन्या पूजन को सामूहिक रूप दिया जा रहा है। शहर के मानस भवन में 16 अक्टूबर को सामूहिक कन्या पूजन कार्यक्रम आयोजित किया जाएगा। आयोजन की खास बात यह है कि एक ही स्थान पर 501 कन्याओं का पूजन किया जाएगा।

    सेवा भारती के विभाग समन्वयक अर्जुन सिंह दांगी ने बताया कि कार्यक्रम 16 अक्टूबर को सुबह 10 बजे शुरू होगा। आयोजन की पूरी तैयारियां कर ली गई हैं। संस्था ने समाज के लोगों से कार्यक्रम में सहभागी बनने और कन्या शक्ति के सम्मान के लिए आगे आने की अपील की है।

  • देशभर में आज श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की धूम…. जानिए क्या है पूजा का शुभ मुहूर्त

    देशभर में आज श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की धूम…. जानिए क्या है पूजा का शुभ मुहूर्त


    नई दिल्ली।
    आज देशभर में जन्माष्टमी (Krishna Janmashtami 2026) का महापर्व मनाया जा रहा है। जन्माष्टमी को कृष्णाष्टमी, गोकुलाष्टमी, कृष्ण जयंती, श्रीकृष्ण जयंती, यदुकुलाष्टमी और अष्टमी रोहिणी के नामों से भी जाना जाता है. हर साल यह पर्व भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाता है. यह पर्व भगवान विष्णु (Lord Vishnu) के आठवें अवतार श्री कृष्ण के जन्मोत्सव (Krishna Janmashtami 2026) के रूप में मनाया जाता है. द्रिक पंचांग के अनुसार, यह भगवान कृष्ण का 5253वां जन्मोत्सव है।

    जन्माष्टमी के दिन भगवान श्रीकृष्ण के बाल स्वरूप लड्डू गोपाल की उपासना की जाती है. भक्त इस दिन व्रत रखते हैं और विधि-विधान से भगवान का श्रृंगार करते हैं. लड्डू गोपाल को पंचामृत से स्नान कराया जाता है, सुंदर वस्त्र और आभूषण पहनाए जाते हैं और उन्हें पालने में बैठाकर झुलाया जाता है. तो आइए जानते हैं कि कृष्ण जन्माष्टमी पर आज रात लड्डू गोपाल के पूजन का क्या मुहूर्त (Muhurat) रहेगा।


    कृष्ण जन्माष्टमी 2026 शुभ मुहूर्त (Shubh Muhurat)

    भाद्रपद कृष्ण अष्टमी की तिथि 4 सितंबर यानी आज अर्धरात्रि में 2 बजकर 25 मिनट पर शुरू हो चुकी है, जो कि 5 सितंबर की रात 12 बजकर 13 मिनट पर समाप्त होगी. आज श्रीकृष्ण की पूजा का मुहूर्त रात 11 बजकर 57 मिनट से लेकर 12 बजकर 42 मिनट तक रहेगा, जिसके लिए कुल 45 मिनट मिलेंगे. इसी अवधि में लड्डू गोपाल का जन्म होगा और जन्मोत्सव मनाया जाएगा.

    भगवान कृष्ण का जन्म रोहिणी नक्षत्र में हुआ था और इसलिए, कृष्ण जन्माष्टमी हमेशा रोहिणी नक्षत्र में ही मनाई जाती है. रोहिणी नक्षत्र अर्धरात्रि में 12 बजकर 29 मिनट पर लग चुका है और इसका समापन आज रात 11 बजकर 4 मिनट पर होगा.


    कृष्ण जन्माष्टमी की पूजन सामग्री (Janmashtami Puja Samagri)

    जन्माष्टमी के दिन श्री कृष्ण जन्माष्टमी के पावन अवसर पर लड्डू गोपाल के पूजन और भव्य श्रृंगार के लिए मुख्य रूप से बाल गोपाल की मूर्ति, झूला, नए वस्त्र, मुकुट, बांसुरी, मोरपंख, चंदन, रोली, अक्षत, दीपक, धूप, कपूर और ताजे फूलों की आवश्यकता होती है. इसके साथ ही भगवान के अभिषेक के लिए पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, गंगाजल) और उनके प्रिय भोग के रूप में माखन-मिश्री, धनिया पंजीरी, ऋतुफल, मिठाई तथा पान-सुपारी तैयार की जाती है, जिसमें तुलसी दल मिलाना अत्यंत अनिवार्य माना गया है।


    कृष्ण जन्माष्टमी पर ऐसे करें श्रीकृष्ण की पूजा

    कृष्ण जन्माष्टमी के पावन पर्व पर भगवान श्री कृष्ण के बाल रूप ‘लड्डू गोपाल’ की पूजा के लिए सबसे पहले सुबह स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें और पूरे दिन सात्विक रहते हुए व्रत का संकल्प लें. पूजन स्थल एवं मंदिर को अच्छे से साफ कर सजाएं और बाल गोपाल के लिए एक सुंदर झूला तैयार करें. मुख्य पूजा मध्यरात्रि 12 बजे की जाती है, जब भगवान का जन्म हुआ था; इस समय लड्डू गोपाल को पहले गंगाजल और फिर पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, गंगाजल) से स्नान कराकर नए वस्त्र, मुकुट, बांसुरी, मोरपंख और चंदन से उनका दिव्य श्रृंगार करें।

    इसके बाद उन्हें झूले में विराजमान कराकर प्रेमपूर्वक झूला झुलाएं और उनके अत्यंत प्रिय माखन-मिश्री, धनिया पंजीरी, पंचामृत एवं फलों का भोग लगाएं, जिसमें तुलसी दल मिलाना अनिवार्य माना गया है. अंत में धूप-दीप जलाकर श्रद्धापूर्वक आरती करें, अनजाने में हुई भूल-चूक के लिए क्षमा प्रार्थना करें और सभी में प्रसाद बांटकर अपना व्रत खोलें।


    इन दिव्य मंत्रों का करें जाप (Sri Krishna Mantra)

    – कृं कृष्णाय नमः
    – ऊं देविकानन्दनाय विधमहे वासुदेवाय धीमहि तन्नो कृष्ण:प्रचोदयात
    – ओम क्लीम कृष्णाय नमः
    – गोकुल नाथाय नमः
    – ऊं नमो भगवते श्रीगोविन्दाय नम:

    कृष्ण जन्माष्टमी उपाय (Krishna Janmashtami Upay)

    1. जन्माष्टमी की रात 12 बजे लड्डू गोपाल के जन्मोत्सव के बाद केसर मिश्रित दूध से उनका अभिषेक करें. धार्मिक मान्यता है कि ऐसा करने से घर में सुख-समृद्धि और खुशहाली का वास होता है.

    2. जन्माष्टमी की रात भगवान श्रीकृष्ण को पान का पत्ता अर्पित करना भी शुभ माना जाता है. मान्यता है कि अगले दिन उस पत्ते पर रोली से श्री यंत्र बनाकर उसे तिजोरी या धन रखने के स्थान पर रखने से आर्थिक परेशानियों से राहत मिल सकती है।

  • सावन में शिव आराधना के साथ खानपान और पूजा विधि का रखें ध्यान, जानिए महिलाओं के लिए बताए गए जरूरी नियम

    सावन में शिव आराधना के साथ खानपान और पूजा विधि का रखें ध्यान, जानिए महिलाओं के लिए बताए गए जरूरी नियम


    नई दिल्ली । 
    हिंदू धर्म में सावन का महीना भगवान शिव और माता पार्वती की आराधना के लिए विशेष माना जाता है। इस दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालु व्रत रखते हैं और शिव मंदिरों में पूजा-अर्चना करते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार सावन में की गई शिव उपासना, सोमवार व्रत और विशेष धार्मिक अनुष्ठानों का अलग महत्व होता है। सुहागिन महिलाएं भी पति की सुख-समृद्धि और परिवार की खुशहाली की कामना के साथ इस महीने में विभिन्न व्रत और पूजा करती हैं।

    सावन के दौरान महिलाओं के लिए सुबह जल्दी उठकर स्नान करने और स्वच्छ वस्त्र धारण करने की परंपरा बताई गई है। इसके बाद भगवान शिव की पूजा और अपनी श्रद्धा के अनुसार व्रत या धार्मिक अनुष्ठान किया जाता है। मान्यता है कि दिन की शुरुआत धार्मिक कार्यों और सकारात्मक विचारों के साथ करने से पूजा के प्रति एकाग्रता बनी रहती है।

    धार्मिक मान्यताओं में सावन के दौरान काले वस्त्रों से परहेज करने की बात कही जाती है। इसके स्थान पर हरे रंग को शुभ माना जाता है। सावन में हरा रंग प्रकृति, हरियाली और सौभाग्य से जोड़ा जाता है। हालांकि इन परंपराओं को धार्मिक मान्यता के रूप में ही देखा जाना चाहिए और अलग-अलग क्षेत्रों तथा परिवारों में इनके पालन का तरीका अलग हो सकता है।

    शिव पूजा से जुड़ी सामग्री को लेकर भी कुछ मान्यताएं प्रचलित हैं। सावन में भगवान शिव को बेलपत्र, भांग और धतूरा अर्पित करने की परंपरा है। वहीं तुलसी, हल्दी और केतकी के फूल को शिव पूजा में अर्पित न करने की धार्मिक मान्यता बताई जाती है। पूजा सामग्री का उपयोग करते समय श्रद्धालु अपने परिवार की परंपरा और स्थानीय धार्मिक विधि का भी ध्यान रखते हैं।

    सावन के व्रत के दौरान सात्विक भोजन करने पर विशेष जोर दिया जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस अवधि में मांसाहार और मदिरा से दूर रहने की परंपरा है। व्रत रखने वाली महिलाएं अपनी धार्मिक परंपरा के अनुसार फलाहार या सात्विक भोजन करती हैं। भोजन को लेकर किसी भी प्रकार का व्रत रखने से पहले अपनी शारीरिक क्षमता और स्वास्थ्य का ध्यान रखना भी जरूरी है।

    सावन के व्रत और पूजा के दिनों में बैंगन, मूली तथा कुछ पत्तेदार सब्जियों से परहेज करने की परंपरा भी बताई जाती है। इसके पीछे धार्मिक मान्यताओं के साथ मौसम संबंधी पारंपरिक कारण भी बताए जाते हैं। बारिश के मौसम में कुछ सब्जियों में कीड़े लगने की संभावना अधिक मानी जाती थी, इसलिए पुराने समय से इनके सेवन को सीमित करने की परंपरा विकसित हुई।

    मासिक धर्म को लेकर भी कुछ पारंपरिक धार्मिक नियम बताए जाते हैं, जिनमें शिवलिंग को स्पर्श न करने की मान्यता शामिल है। हालांकि यह धार्मिक परंपरा का विषय है और अलग-अलग परिवारों तथा समुदायों में इसके पालन के तरीके भिन्न हो सकते हैं। इस दौरान महिलाओं के लिए व्यक्तिगत स्वच्छता और स्वास्थ्य का ध्यान रखना महत्वपूर्ण है।

    सुहागिन महिलाओं के लिए सावन में मंगली गौरी, शिवरात्रि और हरियाली तीज जैसे व्रतों का भी विशेष महत्व बताया जाता है। वहीं अविवाहित लड़कियां भी अच्छे जीवनसाथी की कामना से सावन के सोमवार का व्रत रखने की धार्मिक परंपरा का पालन करती हैं। सावन का मूल उद्देश्य श्रद्धा, संयम और भगवान शिव की भक्ति से जुड़ा माना जाता है। इसलिए पूजा और व्रत करते समय धार्मिक आस्था के साथ स्वास्थ्य, स्वच्छता और अपनी क्षमता का ध्यान रखना भी आवश्यक है।

  • उज्जैन में विधानसभा अध्यक्ष नरेंद्र सिंह तोमर ने किए महाकालेश्वर के दर्शन, सुख-शांति के लिए की विशेष प्रार्थना

    उज्जैन में विधानसभा अध्यक्ष नरेंद्र सिंह तोमर ने किए महाकालेश्वर के दर्शन, सुख-शांति के लिए की विशेष प्रार्थना

    मध्य प्रदेश।  विधानसभा अध्यक्ष नरेंद्र सिंह तोमर ने शुक्रवार को उज्जैन स्थित विश्व प्रसिद्ध महाकालेश्वर मंदिर पहुंचकर भगवान महाकाल के दर्शन किए। उन्होंने मंदिर में विधि-विधान के साथ पूजन-अर्चन किया और मध्य प्रदेश समेत पूरे देश में सुख, शांति और समृद्धि बनाए रखने की प्रार्थना की।

    उज्जैन की धार्मिक पहचान भगवान महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग से जुड़ी हुई है। इसी आस्था के केंद्र में विधानसभा अध्यक्ष के पहुंचने पर मंदिर परिसर में निर्धारित व्यवस्थाओं के अनुसार उनका स्वागत किया गया। मंदिर प्रबंध समिति की ओर से सहायक प्रशासक मूलचंद जूनवाल ने उनका स्वागत और सत्कार किया।

    मंदिर पहुंचने के बाद नरेंद्र सिंह तोमर ने भगवान महाकाल के दर्शन किए। उन्होंने पूजा की विभिन्न प्रक्रियाओं में हिस्सा लेते हुए प्रदेश और देशवासियों के कल्याण की कामना की। पूजन के दौरान उन्होंने मध्य प्रदेश में सुख-शांति और समृद्धि बनाए रखने के लिए भगवान महाकाल से प्रार्थना की।

    दर्शन के बाद नरेंद्र सिंह तोमर ने कहा कि बाबा महाकाल के दर्शन करने का सौभाग्य उन्हें प्राप्त हुआ है। उन्होंने भगवान से प्रार्थना की कि मध्य प्रदेश और देश में सुख-समृद्धि बनी रहे तथा सभी प्रदेशवासियों का कल्याण हो।

    उन्होंने उज्जैन को आस्था और धार्मिक परंपराओं की महत्वपूर्ण नगरी बताते हुए कहा कि बाबा महाकाल की नगरी में आकर दर्शन करना उनके लिए सौभाग्य की बात है। मंदिर में दर्शन के दौरान श्रद्धालुओं में भी उत्साह का माहौल दिखाई दिया।

    नरेंद्र सिंह तोमर का यह दौरा ऐसे समय हुआ जब उज्जैन लगातार धार्मिक और पर्यटन गतिविधियों के प्रमुख केंद्र के रूप में अपनी पहचान मजबूत कर रहा है। महाकालेश्वर मंदिर में देश के विभिन्न हिस्सों से श्रद्धालु नियमित रूप से दर्शन के लिए पहुंचते हैं।

    विधानसभा अध्यक्ष के मंदिर दौरे को देखते हुए सुरक्षा व्यवस्था भी सख्त रखी गई थी। मंदिर परिसर और आसपास पुलिस तथा सुरक्षा कर्मचारियों की तैनाती की गई थी। अधिकारियों और कर्मचारियों ने निर्धारित सुरक्षा प्रोटोकॉल के तहत व्यवस्थाओं को संभाला।

    दर्शन और पूजन के दौरान मंदिर की सामान्य व्यवस्थाओं को भी बनाए रखा गया। श्रद्धालुओं की आवाजाही तथा धार्मिक गतिविधियां नियमित रूप से संचालित होती रहीं। मंदिर प्रबंध समिति के अधिकारी और कर्मचारी भी इस दौरान मौजूद रहे।

    पूजन कार्यक्रम पूरा होने के बाद नरेंद्र सिंह तोमर मंदिर परिसर से रवाना हो गए। उनके दौरे के दौरान मुख्य रूप से धार्मिक आस्था और प्रदेश तथा देश की खुशहाली की कामना पर जोर रहा।

    महाकालेश्वर मंदिर में दर्शन के बाद उन्होंने एक बार फिर प्रदेशवासियों के कल्याण और देश में सुख-समृद्धि की कामना दोहराई। उनका यह धार्मिक दौरा उज्जैन की धार्मिक परंपरा और जनप्रतिनिधियों की आस्था से जुड़ा कार्यक्रम रहा।

  • सवान में हर सोमवार विशेष योग और पर्व का संयोग, भगवान शिव की कृपा पाने करें ये आसान उपाय

    सवान में हर सोमवार विशेष योग और पर्व का संयोग, भगवान शिव की कृपा पाने करें ये आसान उपाय


    नई दिल्ली। श्रावण मास की शुरुआत 30 जुलाई से हो चुकी है और यह 28 अगस्त 2026 तक रहेगा। सनातन परंपरा में सावन का महीना भगवान शिव की आराधना के लिए सबसे पवित्र माना जाता है। मान्यता है कि इस दौरान विधि-विधान से शिव पूजन, जलाभिषेक और व्रत करने से मनोकामनाएं पूरी होती हैं तथा जीवन की बाधाएं दूर होती हैं।

    इस वर्ष सावन के चारों सोमवार विशेष योग और पर्वों के साथ पड़ रहे हैं, जिससे इनका धार्मिक महत्व और बढ़ गया है। आइए जानते हैं इन चारों सोमवार की विशेषता और उनसे जुड़े पारंपरिक उपाय।

    सावन के चार सोमवार और शुभ संयोग
    3 अगस्त 2026 (पहला सोमवार): सुकर्मा योग और सर्वार्थ सिद्धि योग।
    10 अगस्त 2026 (दूसरा सोमवार): सोम प्रदोष व्रत का विशेष संयोग।
    17 अगस्त 2026 (तीसरा सोमवार): नाग पंचमी के पावन पर्व के साथ।
    24 अगस्त 2026 (चौथा सोमवार): सर्वार्थ सिद्धि योग का प्रभाव।

    पहला सोमवार: आर्थिक उन्नति के लिए
    धन संबंधी परेशानियों या कर्ज से मुक्ति की कामना करने वाले श्रद्धालु पहले सोमवार भगवान शिव का जलाभिषेक करें। तांबे या चांदी के पात्र में जल लेकर उसमें थोड़ा कच्चा दूध और काले तिल मिलाएं तथा श्रद्धा के साथ शिवलिंग पर अर्पित करें।

    दूसरा सोमवार: विवाह में आ रही बाधाएं दूर करने के लिए
    यदि विवाह में विलंब हो रहा हो या मनचाहा जीवनसाथी पाने की इच्छा हो, तो दूसरे सोमवार 108 साबुत बेलपत्र लेकर प्रत्येक पर पीले चंदन से ‘ॐ’ या ‘राम’ लिखें। इसके बाद ‘ॐ नमः शिवाय’ मंत्र का जाप करते हुए एक-एक बेलपत्र शिवलिंग पर अर्पित करें।

    तीसरा सोमवार: स्वास्थ्य और मानसिक शांति के लिए
    नाग पंचमी के साथ पड़ रहे तीसरे सोमवार भगवान शिव को जल अर्पित करने के बाद शमी के पत्ते और दूर्वा चढ़ाएं। इसके पश्चात श्रद्धापूर्वक महामृत्युंजय मंत्र का 108 बार जाप करें। पारंपरिक मान्यता के अनुसार यह उपाय आरोग्य और मानसिक शांति की कामना के लिए किया जाता है।

    चौथा सोमवार: सुखी दांपत्य जीवन के लिए
    सावन के अंतिम सोमवार भगवान शिव और माता पार्वती की संयुक्त पूजा का विशेष महत्व माना जाता है। इस दिन शिवलिंग का अभिषेक गन्ने के रस या केसर मिले दूध से करें। इसके बाद माता पार्वती को लाल चुनरी और सुहाग सामग्री अर्पित कर सुखी वैवाहिक जीवन की कामना करें।

  • बुधवार को भगवान श्री गणेश और बुध ग्रह के मंत्रों का जाप जीवन के कष्टों से दिलाएगा मुक्ति..

    बुधवार को भगवान श्री गणेश और बुध ग्रह के मंत्रों का जाप जीवन के कष्टों से दिलाएगा मुक्ति..

    नई दिल्ली । सनातन धर्म में सप्ताह का प्रत्येक दिन किसी न किसी देवी-देवता और नवग्रहों की साधना के लिए विशेष रूप से निर्धारित किया गया है। इसी क्रम में बुधवार का दिन प्रथम पूज्य भगवान श्री गणेश की आराधना और सौरमंडल के महत्वपूर्ण ग्रह बुध देव की कृपा प्राप्त करने के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन गणेश जी के साथ बुध ग्रह के मंत्रों का जाप करने से जीवन की अनेक कठिनाइयों का निवारण होता है।

    ज्योतिष शास्त्र में बुध ग्रह को बुद्धि, वाणी, तर्क शक्ति और व्यापार का कारक माना गया है। यदि किसी व्यक्ति की कुंडली में बुध ग्रह की स्थिति कमजोर होती है, तो उसे व्यापार में हानि, संवाद क्षमता में कमी और मानसिक तनाव जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। ऐसे में बुधवार के दिन विशेष मंत्र साधना के माध्यम से बुध ग्रह को मजबूत किया जा सकता है, जिससे व्यापारिक सफलता और निर्णय क्षमता में सुधार होता है।

    शास्त्रों में भगवान गणेश को विघ्नहर्ता कहा गया है, जिनकी कृपा से किसी भी कार्य में आने वाली रुकावटें स्वतः समाप्त हो जाती हैं। बुधवार की सुबह स्नान आदि से निवृत्त होकर गणेश जी की विधि-विधान से पूजा-अर्चना करनी चाहिए। पूजा के दौरान गणेश जी को दूर्वा और मोदक अर्पित करने के साथ उनके प्रभावशाली मंत्रों का जाप करने से साधक को मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है और कार्यक्षेत्र में निरंतर प्रगति के मार्ग प्रशस्त होते हैं।

    भगवान गणेश की आराधना के पश्चात बुध ग्रह के वैदिक, पौराणिक और तांत्रिक मंत्रों का जाप करना विशेष फलदायी माना गया है। नियमित और श्रद्धापूर्वक किए जाने वाले इस जाप से व्यक्ति की वाणी में मधुरता और आकर्षण का समावेश होता है। इसके साथ ही बौद्धिक क्षमताओं का विकास होता है, जिससे प्रतियोगी परीक्षाओं और व्यावसायिक जीवन में सकारात्मक परिणाम दिखाई देने लगते हैं।

    धार्मिक विद्वानों का मानना है कि इस दिन गणेश गायत्री मंत्र और बुध ग्रह के नाम मंत्रों का मानसिक या स्पष्ट उच्चारण करते हुए स्मरण करने से जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह बढ़ता है। यह साधना न केवल आर्थिक स्थिरता लाती है, बल्कि साधक को हर प्रकार के मानसिक और व्यावहारिक संकटों से बचाकर जीवन में सुख-समृद्धि का मार्ग सुलभ करती है।