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  • पूजा में नैवेद्य अर्पित करने की सही विधि: बीज वाले फलों के भोग से जुड़े नियम और ध्यान रखने योग्य महत्वपूर्ण बातें

    पूजा में नैवेद्य अर्पित करने की सही विधि: बीज वाले फलों के भोग से जुड़े नियम और ध्यान रखने योग्य महत्वपूर्ण बातें

    नई दिल्ली। सनातन धर्म और हिंदू धार्मिक मान्यताओं में पूजा-पाठ के दौरान देवी-देवताओं को नैवेद्य यानी भोग अर्पित करने का विशेष महत्व बताया गया है। शास्त्रों के अनुसार बिना भोग लगाए कोई भी पूजा पूर्ण नहीं मानी जाती है। ईश्वर को प्रसन्न करने और उनकी कृपा प्राप्त करने के लिए भक्त अपनी श्रद्धा अनुसार मिठाई, खीर और विभिन्न प्रकार के ताजे फलों का अर्पण करते हैं। हालांकि, पूजा में फलों के चुनाव और उन्हें अर्पित करने के सही तरीकों को लेकर अक्सर श्रद्धालुओं के मन में संशय रहता है। विशेषकर बीज वाले फलों को भगवान के समक्ष चढ़ाने के नियमों को लेकर धार्मिक ग्रंथों और परंपराओं में स्पष्ट मार्गदर्शन प्रदान किया गया है।

    धार्मिक विद्वानों और शास्त्रों के अनुसार पूजा-पाठ में फलों का अर्पण अत्यंत सात्विक और उत्तम माना जाता है। मौसम के अनुसार उपलब्ध ताजे फलों का भोग लगाने से पूजा का पूर्ण फल प्राप्त होता है। जहां तक बीज वाले फलों का प्रश्न है, तो ऐसे फलों को भगवान को अर्पित किया जा सकता है, परंतु इसके लिए एक निश्चित विधि का पालन करना आवश्यक है। जिस प्रकार कोई व्यक्ति स्वयं भोजन ग्रहण करते समय या बच्चों को फल देते समय बीज अलग करता है, उसी प्रकार पूर्ण श्रद्धा और भाव के साथ भगवान को भी बीज निकालकर ही फल अर्पित करने चाहिए।

    भोग लगाने की विधि में शुद्धता और भाव का सबसे अधिक महत्व होता है। बड़े या अधिक बीज वाले फल जैसे आम, तरबूज या अन्य मौसमी फलों का भोग लगाते समय पहले उन्हें अच्छी तरह स्वच्छ जल से धोना चाहिए। इसके बाद पूजा के समय ही उन्हें काटकर उनके बीजों को अलग कर देना चाहिए। पहले से काटकर रखे गए बासी या दूषित फलों को पूजा में चढ़ाना वर्जित माना गया है। इसके अलावा, भगवान विष्णु या उनके अवतारों को भोग अर्पित करते समय उसमें तुलसी का पत्ता रखना अत्यंत शुभ और अनिवार्य माना जाता है।

    पूजा-पाठ में नैवेद्य अर्पित करते समय भक्त के मन का भाव पूरी तरह से निष्काम और अहंकार रहित होना चाहिए। शास्त्रों में स्पष्ट किया गया है कि भोग केवल एक औपचारिकता नहीं, बल्कि ईश्वर के प्रति समर्पण और कृतज्ञता व्यक्त करने का माध्यम है। इसलिए सही नियमों का पालन करते हुए, स्वच्छता और मर्यादा के साथ अर्पित किया गया साधारण सा भोग भी भगवान सहर्ष स्वीकार करते हैं और साधक पर अपनी कृपा बरसाते हैं।

  • देवशयनी एकादशी: 24 या 25 जुलाई? जानें सही तिथि, पूजा का शुभ मुहूर्त और व्रत पारण का समय

    देवशयनी एकादशी: 24 या 25 जुलाई? जानें सही तिथि, पूजा का शुभ मुहूर्त और व्रत पारण का समय


    नई दिल्ली। आषाढ़ शुक्ल पक्ष की देवशयनी एकादशी हिंदू धर्म में विशेष महत्व रखती है। मान्यता है कि इसी दिन भगवान श्रीहरि विष्णु चार माह के लिए योगनिद्रा में चले जाते हैं। इसके साथ ही चातुर्मास की शुरुआत होती है और विवाह, गृह प्रवेश सहित अन्य मांगलिक कार्यों पर विराम लग जाता है। ऐसे में कई लोगों के मन में सवाल है कि वर्ष 2026 में देवशयनी एकादशी 24 जुलाई को मनाई जाएगी या 25 जुलाई को। आइए जानते हैं सही तिथि, पूजा का शुभ मुहूर्त और व्रत पारण का समय।

    देवशयनी एकादशी कब है?
    देवशयनी एकादशी तिथि की शुरुआत 24 जुलाई 2026 को सुबह 9:13 बजे से होगी और इसका समापन 25 जुलाई 2026 को सुबह 11:35 बजे होगा। उदया तिथि के आधार पर देवशयनी एकादशी का व्रत और पर्व 25 जुलाई 2026 (शनिवार) को मनाया जाएगा।

    पूजा का शुभ मुहूर्त
    देवशयनी एकादशी पर भगवान विष्णु की पूजा के लिए प्रातःकाल का समय सबसे उत्तम माना गया है।
    प्रातः पूजन मुहूर्त: सुबह 4:17 बजे से 6:10 बजे तक
    अभिजीत मुहूर्त: दोपहर 12:00 बजे से 12:55 बजे तक
    संध्या पूजन मुहूर्त: शाम 7:17 बजे से रात 8:19 बजे तक

    व्रत पारण का समय
    एकादशी व्रत का पारण अगले दिन किया जाता है। इस वर्ष 26 जुलाई 2026 को सुबह 5:40 बजे से 8:20 बजे के बीच व्रत खोलना शुभ माना गया है।

    ऐसे करें भगवान विष्णु की पूजा
    देवशयनी एकादशी के दिन सुबह स्नान कर स्वच्छ पीले वस्त्र धारण करें और व्रत का संकल्प लें। इसके बाद लकड़ी की चौकी पर पीला वस्त्र बिछाकर भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें।

    भगवान विष्णु का गंगाजल और पंचामृत से अभिषेक करें। इसके बाद पीले पुष्प, चंदन, रोली, अक्षत और तुलसी दल अर्पित करें। श्रीहरि को पीले फल और सात्विक भोग अर्पित करें तथा भोग में तुलसी पत्र अवश्य शामिल करें। पूजा के दौरान ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ मंत्र का जप करें, एकादशी व्रत कथा का श्रवण या पाठ करें और अंत में धूप-दीप से आरती करें।

    देवशयनी एकादशी पर क्या करें?
    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन व्रत, भगवान विष्णु की आराधना, जप-तप और दान का विशेष महत्व है। यदि किसी कारणवश व्रत न रख सकें, तो भी श्रद्धापूर्वक दान करने से पुण्य फल प्राप्त होता है।

    क्या दान करना शुभ माना गया है?
    देवशयनी एकादशी पर अन्नदान को सर्वोत्तम माना गया है। इस दिन चावल, दाल, आटा, घी, गुड़, नमक, फल और सब्जियों का दान करना शुभ माना जाता है।

  • सावन 2026 की शुरुआत कब होगी? जानें सही तारीख, चारों सावन सोमवार और पूजा का महत्व

    सावन 2026 की शुरुआत कब होगी? जानें सही तारीख, चारों सावन सोमवार और पूजा का महत्व


    नई दिल्ली। भगवान शिव को समर्पित सावन (श्रावण) का महीना हिंदू धर्म में अत्यंत पवित्र माना जाता है। इस पूरे महीने शिव भक्त जलाभिषेक, रुद्राभिषेक, व्रत और विशेष पूजा-अर्चना करते हैं। हर वर्ष सावन की शुरुआत को लेकर लोगों के बीच उत्सुकता रहती है। ऐसे में आइए जानते हैं कि वर्ष 2026 में सावन कब से शुरू होगा, कितने सावन सोमवार पड़ेंगे और इस महीने का धार्मिक महत्व क्या है।

    सावन 2026 कब से शुरू होगा?
    द्रिक पंचांग के अनुसार, वर्ष 2026 में सावन मास 29 जुलाई (बुधवार) से प्रारंभ होकर 28 अगस्त (शुक्रवार) यानी रक्षाबंधन के दिन समाप्त होगा।

    सावन के चार सोमवार
    उत्तर भारत की मान्यता के अनुसार इस वर्ष सावन में कुल चार सोमवार पड़ेंगे-
    – पहला सावन सोमवार: 3 अगस्त 2026
    – दूसरा सावन सोमवार: 10 अगस्त 2026
    – तीसरा सावन सोमवार: 17 अगस्त 2026
    – चौथा सावन सोमवार: 24 अगस्त 2026

    क्या है सावन का धार्मिक महत्व?
    पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए सावन मास में कठोर तप किया था। इसी महीने समुद्र मंथन के दौरान निकले विष का पान कर भगवान शिव ने सृष्टि की रक्षा की थी, जिसके कारण उन्हें नीलकंठ कहा गया। विष की तीव्रता कम करने के लिए देवताओं ने शिवजी का जलाभिषेक किया था। तभी से सावन में शिवलिंग पर जल अर्पित करने की परंपरा चली आ रही है। इस माह देशभर से लाखों कांवड़िए पवित्र नदियों से जल लाकर शिव मंदिरों में भगवान शिव का अभिषेक करते हैं।

    सावन में ऐसे करें शिव पूजा
    प्रातःकाल स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें और व्रत का संकल्प लें। इसके बाद शिवलिंग पर गंगाजल या शुद्ध जल अर्पित करें। फिर दूध, दही, घी, शहद और शक्कर से पंचामृत अभिषेक करें तथा अंत में दोबारा शुद्ध जल चढ़ाएं।

    इसके बाद चंदन का तिलक लगाकर भगवान शिव को बेलपत्र, धतूरा, भांग, अक्षत, सफेद पुष्प और शमी के पत्ते अर्पित करें। माता पार्वती को सिंदूर और श्रृंगार सामग्री चढ़ाएं। धूप-दीप प्रज्ज्वलित कर ‘ॐ नमः शिवाय’ मंत्र का कम से कम 108 बार जाप करें। अंत में सावन सोमवार व्रत कथा का श्रवण या पाठ कर शिव आरती करें।

    सावन में किए जाने वाले प्रमुख उपाय
    आर्थिक समृद्धि के लिए हर सोमवार या प्रतिदिन शिवलिंग पर गन्ने का रस अर्पित करना शुभ माना जाता है। मान्यता है कि इससे धन प्राप्ति के योग मजबूत होते हैं।

    मनचाहा जीवनसाथी और वैवाहिक सुख के लिए कुंवारी कन्याएं तथा विवाहित महिलाएं केसर मिश्रित दूध से शिवलिंग का अभिषेक करें और माता पार्वती को चुनरी अर्पित करें।

    मानसिक शांति और नकारात्मक ऊर्जा से मुक्ति के लिए जल में काले तिल मिलाकर शिवलिंग का अभिषेक करें। धार्मिक मान्यता है कि इससे शनि दोष का प्रभाव भी कम होता है।

    करियर और व्यापार में उन्नति के लिए भगवान शिव को शहद अर्पित करें तथा 21 बेलपत्रों पर चंदन से “राम” लिखकर चढ़ाएं। इसे सफलता और प्रगति का शुभ उपाय माना जाता है।

  • सावन 2026 में पड़ेंगे दो ग्रहण, क्या रुकेगी शिव पूजा? जानिए सूतक, पूजा और जरूरी सावधानियां

    सावन 2026 में पड़ेंगे दो ग्रहण, क्या रुकेगी शिव पूजा? जानिए सूतक, पूजा और जरूरी सावधानियां


    नई दिल्ली। भगवान शिव की आराधना के लिए सबसे पवित्र माने जाने वाले श्रावण मास में इस बार एक विशेष ज्योतिषीय संयोग बन रहा है। वर्ष 2026 के सावन में एक सूर्य ग्रहण और एक चंद्र ग्रहण पड़ने वाले हैं। ऐसे में कई श्रद्धालुओं के मन में सवाल है कि क्या ग्रहण के कारण पूजा-पाठ प्रभावित होगा, सूतक काल मान्य रहेगा और क्या सावन के सोमवार की पूजा में कोई बाधा आएगी। आइए जानते हैं क्या कहते हैं पंचांग और धार्मिक मान्यताएं।

    कब लगेंगे सावन में ग्रहण?

    12 अगस्त 2026 – सूर्य ग्रहण
    पंचांग के अनुसार, वर्ष 2026 का दूसरा और अंतिम सूर्य ग्रहण 12 अगस्त को लगेगा। यह खग्रास सूर्य ग्रहण होगा, जो आर्कटिक, ग्रीनलैंड, आइसलैंड, स्पेन और पुर्तगाल सहित कुछ देशों में दिखाई देगा।

    28 अगस्त 2026 – चंद्र ग्रहण
    साल का अंतिम आंशिक चंद्र ग्रहण 28 अगस्त को रक्षाबंधन के दिन लगेगा। यह ग्रहण अमेरिका, यूरोप और अफ्रीका के कई हिस्सों में दिखाई देगा।

    क्या भारत में रहेगा सूतक काल?
    धार्मिक मान्यता के अनुसार, सूतक काल तभी प्रभावी माना जाता है जब ग्रहण संबंधित क्षेत्र में दिखाई दे। चूंकि वर्ष 2026 के ये दोनों ग्रहण भारत में दृश्य नहीं होंगे, इसलिए भारत में इनका सूतक काल मान्य नहीं होगा। ऐसे में श्रद्धालुओं को अपनी नियमित पूजा-पाठ या धार्मिक अनुष्ठानों में किसी प्रकार का बदलाव करने की आवश्यकता नहीं है।

    क्या पूजा-पाठ पर पड़ेगा कोई असर?
    ग्रहण भारत में दिखाई नहीं देने के कारण मंदिरों के कपाट बंद करने या पूजा-अर्चना पर रोक लगाने का कोई नियम लागू नहीं होगा। श्रद्धालु सावन के सोमवार सहित अन्य शुभ तिथियों पर भगवान शिव का जलाभिषेक, रुद्राभिषेक और नियमित पूजा-अर्चना पहले की तरह कर सकते हैं।

    इन बातों का रखें विशेष ध्यान
    हालांकि भारत में सूतक काल प्रभावी नहीं रहेगा, फिर भी धार्मिक परंपराओं और ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार कुछ सावधानियां बरतना शुभ माना गया है।

    – सावन के पवित्र महीने में मन में नकारात्मक विचारों को स्थान न दें और सकारात्मक सोच बनाए रखें।
    – भगवान शिव के प्रति श्रद्धा और विश्वास बनाए रखते हुए मंत्र जाप एवं नियमित पूजा करें।
    – ग्रहण को लेकर सोशल मीडिया पर फैलने वाली अफवाहों या भ्रामक जानकारियों पर विश्वास न करें।
    – सावन में दान-पुण्य का विशेष महत्व माना गया है। ग्रहण वाले दिन भी अपनी श्रद्धा के अनुसार जरूरतमंदों की सहायता और सात्विक दान किया जा सकता है।

  • आगरा में फ्रिज की बर्फ में दिखी शिवलिंग जैसी आकृति, दर्शन के लिए उमड़ी भीड़, लोग कर रहे पूजा-अर्चना

    आगरा में फ्रिज की बर्फ में दिखी शिवलिंग जैसी आकृति, दर्शन के लिए उमड़ी भीड़, लोग कर रहे पूजा-अर्चना


    आगरा। उत्तर प्रदेश के आगरा में एक घर के फ्रिज के फ्रीजर में जमी बर्फ की शिवलिंग जैसी दिखाई देने वाली आकृति इन दिनों चर्चा का विषय बनी हुई है। आकृति की जानकारी मिलते ही आसपास के लोग घर पहुंचने लगे और कई श्रद्धालुओं ने इसे भगवान शिव का प्रतीक मानते हुए पूजा-अर्चना शुरू कर दी। घटना के वीडियो और तस्वीरें सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रही हैं।

    यह मामला आगरा के खेरिया मोड़ स्थित नगला भुजा क्षेत्र का बताया जा रहा है। जहां एक ओर कई लोग इसे आस्था से जोड़कर देख रहे हैं, वहीं दूसरी ओर कुछ लोग इसे बर्फ के प्राकृतिक जमाव का परिणाम मान रहे हैं।

    फ्रीजर में नजर आई शिवलिंग जैसी आकृति
    परिवार के सदस्यों के अनुसार, जब उन्होंने फ्रिज खोला तो फ्रीजर में जमी बर्फ के बीच एक ऐसी आकृति दिखाई दी, जो देखने में शिवलिंग जैसी प्रतीत हो रही थी। इसकी सूचना पड़ोसियों और परिचितों तक पहुंची तो लोगों का वहां आना शुरू हो गया।

    देखते ही देखते घर के बाहर श्रद्धालुओं की भीड़ जुट गई। कई लोगों ने हाथ जोड़कर भगवान शिव का स्मरण किया, जबकि कुछ श्रद्धालुओं ने जल, फूल और बेलपत्र अर्पित कर पूजा की। पूरे इलाके में ‘हर-हर महादेव’ और ‘बोल बम’ के जयकारे भी सुनाई दिए। स्थानीय लोगों के अनुसार, सुबह से शाम तक बड़ी संख्या में लोग दर्शन के लिए पहुंचते रहे।

    अमरनाथ हिमलिंग से की जा रही तुलना
    घटना के बाद कुछ श्रद्धालुओं ने इस आकृति की तुलना जम्मू-कश्मीर स्थित अमरनाथ गुफा में बनने वाले प्राकृतिक हिमलिंग से की। इसी दौरान मोहल्ले के एक बाबा भी मौके पर पहुंचे और उन्होंने उपस्थित लोगों को अमरनाथ गुफा से जुड़ी धार्मिक मान्यताओं तथा वहां रहने वाले कबूतरों के जोड़े की कथा सुनाई। इस दौरान बड़ी संख्या में लोग वहां मौजूद रहे।

    पूजा-अर्चना और चढ़ावा भी शुरू
    स्थानीय लोगों के मुताबिक, घटना की जानकारी फैलने के बाद श्रद्धालुओं ने मौके पर पूजा-पाठ शुरू कर दिया। कई लोगों ने जलाभिषेक किया, फूल और प्रसाद अर्पित किए। बताया जा रहा है कि श्रद्धालुओं की ओर से चढ़ावा भी चढ़ाया जा रहा है। हालांकि यह पूरी गतिविधि स्थानीय लोगों की धार्मिक आस्था के आधार पर हो रही है।

    वैज्ञानिक नजरिए से क्या है वजह?
    विशेषज्ञों के अनुसार, फ्रिज या फ्रीजर के भीतर तापमान, नमी, हवा के प्रवाह और पानी के जमने की प्रक्रिया के कारण बर्फ कई तरह की आकृतियां बना सकती है। कई बार ये आकृतियां किसी परिचित वस्तु, चेहरे या धार्मिक प्रतीक जैसी दिखाई देती हैं।

    मनोविज्ञान में इस प्रवृत्ति को ‘पैरेडोलिया (Pareidolia)’ कहा जाता है, जिसमें मानव मस्तिष्क अनियमित आकृतियों में परिचित चेहरे, आकृतियां या धार्मिक प्रतीकों जैसी छवि पहचान लेता है। वैज्ञानिक दृष्टि से ऐसी आकृतियों का बनना असामान्य नहीं माना जाता।

    सोशल मीडिया पर दो राय
    घटना के वीडियो सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर भी इस विषय पर बहस छिड़ गई है। एक वर्ग इसे भगवान शिव से जुड़ा चमत्कार मान रहा है, जबकि दूसरा वर्ग इसे प्राकृतिक प्रक्रिया का परिणाम बता रहा है। कई लोगों ने धार्मिक आस्था का सम्मान करने की बात कही है, वहीं कुछ लोगों का मानना है कि ऐसे मामलों को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी समझना जरूरी है। कुछ सोशल मीडिया यूजर्स ने यह भी सुझाव दिया कि यदि यह केवल बर्फ का प्राकृतिक जमाव है, तो समय के साथ उसके पिघलने से स्थिति स्वतः स्पष्ट हो जाएगी।

  • देशभर में कल मनाई जाएगी आषाढ़ अमावस्या…. जानें स्नान-दान और पूजन का मुहूर्त

    देशभर में कल मनाई जाएगी आषाढ़ अमावस्या…. जानें स्नान-दान और पूजन का मुहूर्त


    नई दिल्ली।
    हिंदू धर्म में आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष की अमावस्या (Ashadh Amavasya 2026) तिथि का विशेष महत्व है. इस वर्ष आषाढ़ अमावस्या (Ashadh Amavasya 2026) पर मंगलवार का संयोग होने के कारण इसे भौमवती अमावस्या (Bhaumvati Amavasya) भी कहा जा रहा है, जो इसके महत्व को दोगुना कर देता है. इस बार आषाढ़ अमावस्या 14 जुलाई को मनाई जाएगी. पितरों के तर्पण, कालसर्प दोष निवारण, मंगल दोष की शांति और दान-पुण्य के लिए यह दिन बेहद उत्तम माना गया है।


    आषाढ़ अमावस्या तिथि (Ashadh Amavasya Date)

    द्रिक पंचांग के अनुसार, आषाढ़ अमावस्या की तिथि 13 जुलाई को शाम 6 बजकर 50 मिनट पर शुरू होगी और तिथि का समापन 14 जुलाई को दोपहर 3 बजकर 14 मिनट पर होगा। इस दिन स्नान व दान का मुहूर्त सुबह 4 बजकर 30 मिनट से शुरू होगा और सुबह 5 बजकर 32 मिनट तक रहेगा।


    आषाढ़ अमावस्या पूजन विधि (Ashadh Amavasya Pujan Vidhi)

    सुबह सूर्योदय से पूर्व किसी पवित्र नदी, जलाशय या गंगाजल मिले हुए पानी से स्नान करें और सूर्य देव को अर्घ्य दें. फिर, तांबे के पात्र में पानी, गंगाजल, काले तिल, दूध और कुशा लेकर दक्षिण दिशा की ओर मुख करके पितरों का तर्पण करें. इसके बाद घर के मंदिर में दीपक जलाएं. भौमवती अमावस्या होने के कारण इस दिन हनुमान जी और मंगल देव की विशेष पूजा करें. हनुमान चालीसा या बजरंग बाण का पाठ करना शुभ रहेगा. पितरों के निमित्त घर में सात्विक भोजन बनाएं. अग्नि में गाय के कंडे (उपले) पर घी, गुड़ और भोजन का भोग लगाएं. भोजन का कुछ हिस्सा गाय, कौए, कुत्ते, चींटियों और ब्राह्मण के लिए निकालें. मान्यताओं के अनुसार, अमावस्या पर पितर कौए या अन्य रूपों में आकर अन्न ग्रहण करते हैं।


    इस दिन क्या दान करें?

    अमावस्या तिथि पर किया गया दान अक्षय पुण्य प्रदान करता है. इस दिन अन्न और जल जैसे गेहूं, चावल, सत्तू, या मौसमी फल. काले तिल, छाता, चप्पल या सूती वस्त्र जैसे चीजें दान की जा सकती हैं।

    आषाढ़ अमावस्या का महत्व
    – पितृ दोष से मुक्तिः-
    जिन लोगों की कुंडली में पितृ दोष होता है, उनके लिए आषाढ़ अमावस्या पर पिंड दान, तर्पण और अन्नदान करना अमोघ उपाय माना गया है. इससे अतृप्त पितर प्रसन्न होकर सुख-समृद्धि का आशीर्वाद देते हैं.

    – ग्रह दोष शांति :- ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, अमावस्या के स्वामी शनि देव हैं. इस दिन हनुमान जी की पूजा करने से शनि की साढ़ेसाती और ढैय्या का प्रभाव कम होता है. साथ ही, मंगलवार का संयोग होने से राहू-केतु और मंगल के अशुभ प्रभावों से राहत मिलती है.

  • रवि प्रदोष व्रत आज, शिव आराधना और प्रदोष काल की पूजा का विशेष संयोग, धार्मिक मान्यताओं के अनुसार बताए गए उपायों का है खास महत्व

    रवि प्रदोष व्रत आज, शिव आराधना और प्रदोष काल की पूजा का विशेष संयोग, धार्मिक मान्यताओं के अनुसार बताए गए उपायों का है खास महत्व

    नई दिल्ली । आज रविवार को रवि प्रदोष व्रत का पावन संयोग बना है। हिंदू धार्मिक परंपराओं में प्रदोष व्रत भगवान शिव की आराधना के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। जब प्रदोष व्रत रविवार के दिन पड़ता है तो इसे रवि प्रदोष व्रत कहा जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन भगवान शिव की उपासना के साथ सूर्य देव की कृपा प्राप्त करने की भी मान्यता है। श्रद्धालु दिनभर व्रत रखकर प्रदोष काल में विशेष पूजा-अर्चना करते हैं और अपने परिवार की सुख-समृद्धि, स्वास्थ्य तथा जीवन में सकारात्मक परिवर्तन की कामना करते हैं।

    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार प्रदोष काल में भगवान शिव की पूजा का विशेष महत्व बताया गया है। श्रद्धालु शिवलिंग का जल, दूध और अन्य पूजन सामग्री से अभिषेक करते हैं तथा ‘ॐ नमः शिवाय’ मंत्र का जाप करते हुए भगवान शिव का आशीर्वाद प्राप्त करने का प्रयास करते हैं। मान्यता है कि श्रद्धा और नियमपूर्वक की गई पूजा से मन को शांति मिलती है और जीवन में आने वाली विभिन्न प्रकार की बाधाओं से मुक्ति की प्रार्थना की जाती है।

    रवि प्रदोष व्रत के अवसर पर कई श्रद्धालु यश और प्रतिष्ठा की कामना से शिवलिंग पर लाल चंदन अर्पित करते हैं। धार्मिक परंपराओं में माना जाता है कि रविवार के दिन भगवान शिव की पूजा में लाल चंदन का विशेष महत्व होता है। इसके साथ ही श्रद्धालु जल अर्पित कर भगवान शिव से आत्मविश्वास, सफलता और सम्मान की प्रार्थना करते हैं। यह पूरी तरह धार्मिक आस्था और मान्यताओं पर आधारित परंपरा मानी जाती है।

    आर्थिक सुख-समृद्धि की कामना करने वाले श्रद्धालु प्रदोष काल में शिवलिंग पर शहद अर्पित कर उसके बाद शुद्ध जल से अभिषेक करते हैं। इसी प्रकार पारिवारिक सुख-शांति और सकारात्मक वातावरण की कामना के लिए कच्चा दूध, काले तिल और बेलपत्र भगवान शिव को अर्पित किए जाते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इन पूजन विधियों को श्रद्धा और विश्वास के साथ करने का विशेष महत्व बताया गया है।

    स्वास्थ्य संबंधी मंगलकामना के लिए भी अनेक श्रद्धालु गंगाजल में थोड़ा घी मिलाकर शिवलिंग का अभिषेक करते हैं और पूरे समय ‘ॐ नमः शिवाय’ मंत्र का जाप करते हैं। मान्यता है कि भगवान शिव की आराधना मन को आध्यात्मिक शक्ति प्रदान करती है और सकारात्मक ऊर्जा का संचार करती है। हालांकि इन मान्यताओं का आधार धार्मिक विश्वास है और इन्हें आस्था के दृष्टिकोण से देखा जाता है।

    रवि प्रदोष व्रत के दिन प्रदोष काल में मंदिर जाकर घी का दीपक जलाने और भगवान शिव के समक्ष अपनी प्रार्थना रखने की भी परंपरा है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन सात्विक जीवनशैली अपनाना, क्रोध से बचना, मधुर वाणी का प्रयोग करना और जरूरतमंद लोगों को दान देना शुभ माना जाता है। श्रद्धालु अपनी श्रद्धा और परंपरा के अनुसार इन नियमों का पालन करते हुए भगवान शिव की आराधना करते हैं। धार्मिक विद्वानों का भी मानना है कि पूजा-पाठ के साथ सदाचार, संयम और सेवा की भावना ही किसी भी व्रत और उपासना का सबसे महत्वपूर्ण आधार होती है।

  • योगिनी एकादशी: पढ़ें पौराणिक व्रत कथा, जानें पूजा विधि और इसका महत्‍व

    योगिनी एकादशी: पढ़ें पौराणिक व्रत कथा, जानें पूजा विधि और इसका महत्‍व


    नई दिल्ली। हिंदू धर्म में प्रत्येक एकादशी का विशेष धार्मिक महत्व माना जाता है, लेकिन आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष में पड़ने वाली योगिनी एकादशी को अत्यंत पुण्यदायी माना गया है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन श्रद्धापूर्वक व्रत, पूजा और कथा का श्रवण करने से हजारों ब्राह्मणों को भोजन कराने के बराबर पुण्य प्राप्त होता है। मान्यता है कि इस व्रत से भगवान विष्णु प्रसन्न होते हैं और साधक को पापों से मुक्ति के साथ सुख-समृद्धि का आशीर्वाद मिलता है।

    योगिनी एकादशी की पौराणिक कथा
    धार्मिक मान्यता के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण ने इस व्रत की महिमा और कथा धर्मराज युधिष्ठिर को सुनाई थी। प्राचीन समय में स्वर्गलोक में अलकापुरी नाम की एक सुंदर नगरी थी, जहां धन के देवता कुबेर का शासन था। कुबेर भगवान शिव के परम भक्त थे और उनकी पूजा के लिए हेम नाम का एक माली प्रतिदिन ताजे फूल लाकर अर्पित करता था।

    हेम अपनी पत्नी विशालाक्षी से अत्यधिक प्रेम करता था। एक दिन वह मानसरोवर से फूल तो ले आया, लेकिन पत्नी के साथ समय बिताने में इतना मग्न हो गया कि समय पर भगवान शिव की पूजा के लिए फूल नहीं पहुंचा सका। जब यह बात कुबेर को पता चली तो वे क्रोधित हो गए और हेम को श्राप दे दिया कि वह अपनी पत्नी से बिछड़ जाएगा और पृथ्वी पर कोढ़ी के रूप में जीवन बिताएगा।

    श्राप के प्रभाव से हेम तत्काल स्वर्ग से पृथ्वी पर आ गिरा। उसका शरीर कोढ़ से ग्रसित हो गया और पत्नी भी उससे अलग हो गई। लंबे समय तक कष्ट झेलने के बाद एक दिन वह महर्षि मार्कण्डेय के आश्रम पहुंचा। ऋषि ने उसकी दयनीय अवस्था का कारण पूछा, तब हेम ने पूरी घटना उन्हें बताई।

    हेम की व्यथा सुनने के बाद महर्षि मार्कण्डेय ने उसे योगिनी एकादशी का व्रत करने का उपदेश दिया। हेम ने श्रद्धा और विधि-विधान से व्रत किया। व्रत के प्रभाव से उसका श्राप समाप्त हो गया, वह पुनः अपने दिव्य स्वरूप को प्राप्त कर अपनी पत्नी के साथ सुखपूर्वक रहने लगा। तभी से योगिनी एकादशी को पापों का नाश करने और सुख-समृद्धि प्रदान करने वाला व्रत माना जाता है।

    योगिनी एकादशी व्रत की पूजा विधि
    योगिनी एकादशी के दिन प्रातःकाल स्नान कर व्रत का संकल्प लें। इसके बाद पूजा स्थल पर कलश स्थापित करें और भगवान विष्णु की प्रतिमा या चित्र स्थापित कर विधिपूर्वक पूजा करें। भगवान को फूल, फल और प्रसाद अर्पित करें, दीप प्रज्वलित कर आरती करें तथा गुड़ और चने का भोग लगाएं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन श्रद्धापूर्वक पूजा और व्रत करने से भगवान विष्णु तथा माता लक्ष्मी की कृपा प्राप्त होती है और जीवन में सुख, समृद्धि एवं सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।

  • आज शनि प्रदोष व्रत, बन रहा दुर्लभ संयोग, जानिए पूजा का शुभ समय और मुहूर्त

    आज शनि प्रदोष व्रत, बन रहा दुर्लभ संयोग, जानिए पूजा का शुभ समय और मुहूर्त


    नई दिल्ली। आज, 27 जून 2026 को शनि प्रदोष व्रत का विशेष और दुर्लभ संयोग बना है। शनिवार को पड़ने वाली त्रयोदशी तिथि पर रखा जाने वाला यह व्रत धार्मिक दृष्टि से अत्यंत शुभ माना जाता है। इस दिन भगवान शिव की आराधना के साथ शनिदेव की पूजा का भी विशेष महत्व होता है। मान्यता है कि श्रद्धापूर्वक व्रत और पूजा करने से शिव एवं शनिदेव दोनों की कृपा प्राप्त होती है।

    शनि प्रदोष व्रत का महत्व
    हिंदू पंचांग के अनुसार प्रत्येक माह के शुक्ल और कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को प्रदोष व्रत रखा जाता है। जब यह तिथि शनिवार को आती है, तब इसे शनि प्रदोष व्रत कहा जाता है और इसका महत्व कई गुना बढ़ जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन विधि-विधान से भगवान शिव और उनके परिवार की पूजा करने से जीवन में सुख-समृद्धि, दीर्घायु और मानसिक शांति का आशीर्वाद मिलता है। साथ ही शनि की साढ़ेसाती, ढैय्या या अन्य अशुभ प्रभावों से राहत मिलने की भी मान्यता है।

    पूजा का शुभ मुहूर्त
    प्रदोष व्रत में प्रदोष काल को सबसे शुभ समय माना गया है। आज 27 जून 2026 को प्रदोष काल शाम 7:04 बजे से रात 9:06 बजे तक रहेगा। इसी अवधि में भगवान शिव की पूजा करना सर्वाधिक फलदायी माना गया है। इसके अलावा दिन का अभिजित मुहूर्त दोपहर 1:21 बजे से 2:26 बजे तक रहेगा, जो शुभ कार्यों के लिए उपयुक्त माना जाता है।

    पूजा की विधि
    व्रत के दिन सुबह स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें और पूरे दिन उपवास का संकल्प लें।

    प्रदोष काल में सबसे पहले शिवलिंग का गंगाजल से अभिषेक करें। इसके बाद दूध, दही, घी, शहद और शक्कर से पंचामृत अभिषेक करें।

    पूजा के दौरान भगवान शिव को सफेद चंदन, सफेद पुष्प, भांग, धतूरा, अक्षत और शमी पत्र अर्पित करें। चूंकि यह शनि प्रदोष है, इसलिए शमी पत्र का विशेष महत्व माना गया है।

    इसके बाद भगवान गणेश, माता पार्वती, कार्तिकेय और नंदी महाराज का स्मरण करते हुए ‘ॐ नमः शिवाय’ या ‘श्री शिवाय नमस्तुभ्यं’ मंत्र का जप करें। अंत में भगवान शिव की आरती कर घर में बनी शुद्ध खीर का भोग अर्पित करें।

    व्रत पारण का समय
    शनि प्रदोष व्रत का पारण अगले दिन 28 जून 2026 को सूर्योदय के बाद किया जाएगा। श्रद्धालु सुबह 5:49 बजे के बाद व्रत का पारण कर सकते हैं।

    विशेष उपाय
    धन-समृद्धि की कामना रखने वाले श्रद्धालु प्रदोष काल में दूध में केसर मिलाकर शिवलिंग का अभिषेक करें। वहीं परिवार की सुख-शांति और कष्टों से मुक्ति के लिए जौ के आटे की रोटियां बनाकर गाय के बछड़े को खिलाना शुभ और फलदायी माना गया है।

  • MP: धार की ऐतिहासिक भोजशाला में हिन्दुओं को मिले पूजा का अधिकार…. HC में हिन्दू पक्ष ने रखे तर्क

    MP: धार की ऐतिहासिक भोजशाला में हिन्दुओं को मिले पूजा का अधिकार…. HC में हिन्दू पक्ष ने रखे तर्क


    इंदौर।
    मध्य प्रदेश हाई कोर्ट (Madhya Pradesh High Court) की इंदौर पीठ (Indore Bench) के सामने शुक्रवार को धार की ऐतिहासिक भोजशाला (Historical Bhojshala) को लेकर एक अहम दलील पेश की गई. हिंदू याचिकाकर्ताओं ने मांग की है कि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) को इस परिसर के मूल धार्मिक स्वरूप को बहाल करने का निर्देश दिया जाए और वहां केवल हिंदुओं को पूजा की अनुमति मिले।

    ‘हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस’ के वकील विष्णु शंकर जैन ने जस्टिस विजय कुमार शुक्ला और जस्टिस आलोक अवस्थी की बेंच के सामने ASI के 7 अप्रैल 2003 के आदेश को कानून का उल्लंघन बताया।

    अभी हिंदुओं को मंगलवार को पूजा और मुस्लिमों को शुक्रवार को नमाज की अनुमति है. जैन ने कहा कि ‘प्राचीन स्मारक तथा पुरातत्वीय स्थल और अवशेष अधिनियम 1958’ के तहत किसी भी स्मारक का उपयोग उसके मूल स्वरूप के विपरीत नहीं किया जा सकता. उनके अनुसार, यह व्यवस्था हिंदुओं के मौलिक अधिकारों का हनन है।


    मंदिर बनाम मस्जिद

    याचिकाकर्ता कुलदीप तिवारी के वकील मनीष गुप्ता ने परिसर की बनावट पर बड़े सवाल उठाए. उन्होंने दावा किया कि इस ढांचे में न तो कोई मीनार है और न ही वजूखाना, जो एक पारंपरिक मस्जिद की पहचान होते हैं. उन्होंने इस दावे को भी खारिज कर दिया कि भोजशाला एक जैन मंदिर था; उन्होंने कहा कि यह स्मारक असल में एक सरस्वती मंदिर है, जिसकी स्थापना 1034 ईस्वी में परमार वंश के राजा भोज ने की थी।


    मुस्लिम पक्ष और 1991 के कानून की दलील

    मुस्लिम पक्ष ने अपनी आपत्ति दर्ज कराते हुए ‘पूजा स्थल (विशेष उपबंध) अधिनियम 1991’ का सहारा लिया. 15 अगस्त 1947 को यह परिसर एक मस्जिद के रूप में अस्तित्व में था, इसलिए कानूनन इसके स्वरूप में बदलाव नहीं किया जा सकता। विष्णु शंकर जैन ने इस तर्क को खारिज करते हुए कहा कि भोजशाला एक ASI संरक्षित स्मारक है, इसलिए 1991 का अधिनियम इस पर लागू नहीं होता।

    हाई कोर्ट इस परिसर के धार्मिक स्वरूप से जुड़ी कुल पांच याचिकाओं और एक रिट अपील पर एक साथ सुनवाई कर रहा है. मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए अदालत ने अगली सुनवाई के लिए 11 मई की तारीख तय की है।