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  • एक्सप्लेनर: शी जिनपिंग की अमेरिका यात्रा के बीच AI की जंग, मॉडल में अंतर सिर्फ 2.7%, चिप्स में कौन आगे?

    एक्सप्लेनर: शी जिनपिंग की अमेरिका यात्रा के बीच AI की जंग, मॉडल में अंतर सिर्फ 2.7%, चिप्स में कौन आगे?

    नई दिल्ली। चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग 23 से 25 सितंबर तक अमेरिका की राजकीय यात्रा पर हैं। यह एक दशक से ज्यादा समय बाद उनकी वॉशिंगटन यात्रा है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और शी के बीच होने वाली बातचीत में व्यापार, दुर्लभ खनिज, ताइवान और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसे मुद्दे अहम रहने वाले हैं। दोनों देशों के बीच AI को लेकर प्रतिस्पर्धा अब केवल सॉफ्टवेयर या चैटबॉट तक सीमित नहीं है। इसमें अत्याधुनिक चिप्स, डेटा सेंटर, बिजली, मॉडल और पूरे तकनीकी इकोसिस्टम की भूमिका है।

    ऐसे में सवाल है कि AI की दौड़ में अमेरिका और चीन में फिलहाल किसकी स्थिति कैसी है? इसका जवाब एक ही आंकड़े से नहीं दिया जा सकता। कुछ क्षेत्रों में अमेरिका आगे है, जबकि चीन ने मॉडल, रिसर्च, पेटेंट और औद्योगिक इस्तेमाल में बड़ी बढ़त बनाई है।

    AI मॉडल में अंतर कितना रह गया?

    स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी की 2026 AI Index Report के मुताबिक अमेरिका और चीन के शीर्ष AI मॉडलों के बीच प्रदर्शन का अंतर काफी कम हो चुका है। मार्च 2026 तक शीर्ष अमेरिकी मॉडल चीनी मॉडल से केवल 2.7 प्रतिशत आगे था। रिपोर्ट यह भी बताती है कि 2025 की शुरुआत से दोनों देशों के मॉडल कई बार प्रदर्शन रैंकिंग में एक-दूसरे से आगे-पीछे होते रहे हैं।

    हालांकि इसका अर्थ यह नहीं है कि दोनों देशों की AI क्षमता हर क्षेत्र में बराबर हो गई है। अमेरिका अभी भी शीर्ष स्तर के अधिक AI मॉडल विकसित कर रहा है। 2025 में अमेरिका ने 59 उल्लेखनीय AI मॉडल विकसित किए, जबकि चीन की संख्या 35 रही। दूसरी ओर, चीन AI शोध प्रकाशनों, उद्धरणों और पेटेंट की संख्या में आगे है।

    अमेरिका की सबसे बड़ी ताकत क्या है?

    अमेरिका की ताकत केवल AI मॉडल में नहीं है। उसके पास अत्याधुनिक AI चिप्स, विशाल कंप्यूटिंग क्षमता, डेटा सेंटर और सेमीकंडक्टर तकनीक की मजबूत श्रृंखला है।

    स्टैनफोर्ड AI Index के अनुसार अमेरिका में 5,427 डेटा सेंटर हैं, जो किसी भी दूसरे देश की तुलना में 10 गुना से ज्यादा हैं। दुनिया के सबसे उन्नत AI चिप्स के निर्माण में ताइवान की TSMC की भूमिका भी बेहद महत्वपूर्ण है। यानी अमेरिका की AI बढ़त के पीछे मॉडल के साथ-साथ कंप्यूटिंग इंफ्रास्ट्रक्चर और हार्डवेयर का पूरा नेटवर्क मौजूद है।

    AI में निजी निवेश के मामले में भी अमेरिका की बढ़त बड़ी है। स्टैनफोर्ड के अनुसार 2025 में अमेरिका का निजी AI निवेश चीन से करीब 23 गुना ज्यादा रहा। हालांकि चीन में सरकारी फंड और रणनीतिक निवेश का बड़ा हिस्सा निजी निवेश के आंकड़ों में पूरी तरह दिखाई नहीं देता।

    चीन की रणनीति क्या है?

    चीन की रणनीति AI के पूरे इकोसिस्टम को घरेलू स्तर पर विकसित करने की है। इसका मतलब केवल बड़े AI मॉडल बनाना नहीं, बल्कि उन मॉडलों को चलाने के लिए चिप्स, सर्वर, डेटा सेंटर और सॉफ्टवेयर का विकल्प तैयार करना भी है।

    अमेरिकी प्रतिबंधों के बाद चीन की कंपनियां घरेलू AI चिप्स पर ज्यादा जोर दे रही हैं। Huawei अपनी Ascend श्रृंखला को आगे बढ़ा रही है, जबकि Alibaba ने Zhenwu M890 जैसे AI चिप विकसित किए हैं। मई 2026 में Alibaba ने M890 पेश करते हुए इसे Nvidia के विकल्प के तौर पर विकसित किए जा रहे घरेलू AI हार्डवेयर का हिस्सा बताया था।

    सितंबर 2026 में Alibaba ने इससे भी आगे बढ़ते हुए Zhenwu V900 चिप पेश की, जिसके बारे में कंपनी ने कहा है कि यह उसके पिछले चिप की तुलना में तीन गुना प्रदर्शन देती है। कंपनी ने 5 से 10 ट्रिलियन पैरामीटर वाला नया AI मॉडल विकसित करने की योजना भी बताई है।

    असली मुकाबला चिप्स का है

    AI मॉडल कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो, उसे प्रशिक्षित करने और चलाने के लिए भारी कंप्यूटिंग क्षमता चाहिए। यही वजह है कि AI की रणनीतिक प्रतिस्पर्धा में Nvidia जैसे चिप निर्माताओं की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हो गई है।

    चीन की बड़ी समस्या यह है कि उसे सबसे उन्नत AI चिप्स और उन्हें बनाने वाली अत्याधुनिक तकनीक तक अमेरिकी निर्यात नियंत्रणों के कारण सीमित पहुंच है। Huawei घरेलू विकल्प विकसित कर रही है, लेकिन उसकी चिप तकनीक अभी Nvidia के सबसे उन्नत उत्पादों से पीछे मानी जाती है। Huawei ने 2027 में नए Ascend 960DT और 960PR चिप लॉन्च करने की योजना भी घोषित की है।

    फिर चीन पीछे है या तेजी से बराबरी कर रहा है?

    दोनों बातें अलग-अलग क्षेत्रों में सही हो सकती हैं। फ्रंटियर मॉडल और अत्याधुनिक AI कंप्यूटिंग में अमेरिका की बढ़त अभी मौजूद है, लेकिन चीन ने AI मॉडल की गुणवत्ता और घरेलू तकनीकी इकोसिस्टम में अंतर तेजी से कम किया है।

    स्टैनफोर्ड के आंकड़े बताते हैं कि चीन शोध प्रकाशनों, उद्धरणों और पेटेंट की संख्या में आगे है, जबकि अमेरिका ज्यादा उल्लेखनीय मॉडल और ज्यादा प्रभावशाली पेटेंट तैयार कर रहा है। चीन औद्योगिक रोबोटों की तैनाती में भी काफी आगे है। 2024 में दुनिया भर में लगाए गए औद्योगिक रोबोटों में चीन की हिस्सेदारी 54 प्रतिशत थी।

    एडवांस्ड चिप में चीन कितनी दूरी तय कर सकता है?

    Goldman Sachs के एक अनुमान के मुताबिक 7 नैनोमीटर और उससे छोटे प्रोसेस पर बनने वाले चीन के एडवांस्ड चिप्स की घरेलू सप्लाई 2025 से 2035 के बीच सालाना औसतन 46 प्रतिशत की दर से बढ़ सकती है। इससे घरेलू आपूर्ति और मांग के बीच का अंतर 2025 के 92 प्रतिशत से घटकर 2035 तक 34 प्रतिशत रह सकता है।

    लेकिन यह एक अनुमान है, उपलब्धि नहीं। इस अनुमान के सामने सबसे बड़ी चुनौती लिथोग्राफी तकनीक है। Goldman के मॉडल में चीन की घरेलू चिप उत्पादन क्षमता और उत्पादन दक्षता में बहुत तेज सुधार की जरूरत मानी गई है। इसलिए 2035 का अनुमान यह साबित नहीं करता कि चीन तब तक पूरी तरह से सेमीकंडक्टर आत्मनिर्भर हो जाएगा।

    AI की दौड़ में बिजली भी बड़ा हथियार

    AI की प्रतिस्पर्धा में चिप और मॉडल के साथ बिजली भी महत्वपूर्ण होती जा रही है। बड़े AI मॉडल के प्रशिक्षण और संचालन के लिए विशाल डेटा सेंटर चाहिए, जिन्हें लगातार भारी मात्रा में बिजली की जरूरत होती है।

    स्टैनफोर्ड AI Index के अनुसार AI डेटा सेंटर की बिजली क्षमता तेजी से बढ़ रही है और AI कंप्यूटिंग का ऊर्जा इस्तेमाल अब एक महत्वपूर्ण रणनीतिक मुद्दा बन चुका है। अमेरिका के पास बड़े डेटा सेंटर नेटवर्क की बढ़त है, जबकि चीन के पास विशाल औद्योगिक आधार और बड़ी स्थापित बिजली उत्पादन क्षमता है।

    तो फिलहाल कौन कितना आगे?

    मॉडल: अंतर बेहद कम हो चुका है। मार्च 2026 में शीर्ष अमेरिकी मॉडल की बढ़त 2.7 प्रतिशत थी।

    फ्रंटियर AI: अमेरिका अभी ज्यादा शीर्ष-स्तरीय मॉडल विकसित कर रहा है।

    AI रिसर्च और पेटेंट: चीन प्रकाशनों, उद्धरणों और पेटेंट संख्या में मजबूत है, जबकि अमेरिका उच्च-प्रभाव वाले पेटेंट में आगे है।

    AI चिप्स: सबसे उन्नत चिप और कंप्यूटिंग इकोसिस्टम में अमेरिका की बढ़त बनी हुई है; चीन घरेलू विकल्प तेजी से विकसित कर रहा है।

    डेटा सेंटर: अमेरिका के पास सबसे बड़ा डेटा सेंटर आधार है।

    औद्योगिक इस्तेमाल: चीन औद्योगिक रोबोटों की तैनाती में स्पष्ट रूप से आगे है।

    यानी AI की यह रेस केवल यह तय करने की नहीं है कि सबसे अच्छा चैटबॉट किस देश के पास है। असली मुकाबला मॉडल + चिप + डेटा सेंटर + बिजली + रिसर्च + मैन्युफैक्चरिंग के पूरे इकोसिस्टम का है। इसी वजह से शी जिनपिंग और ट्रंप की मौजूदा मुलाकात में AI केवल तकनीकी मुद्दा नहीं, बल्कि दोनों देशों के आर्थिक और रणनीतिक रिश्तों का भी महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया है।

  • ट्रंप बोले- चीन अमेरिका की जासूसी करता है तो हम भी करते हैं, जिनपिंग की यात्रा से पहले बड़ा बयान

    ट्रंप बोले- चीन अमेरिका की जासूसी करता है तो हम भी करते हैं, जिनपिंग की यात्रा से पहले बड़ा बयान


    नई दिल्ली। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की अगले सप्ताह होने वाली अमेरिका यात्रा से पहले दोनों देशों के रिश्तों और जासूसी को लेकर बड़ा बयान दिया है। ट्रंप ने कहा कि चीन अमेरिका की जासूसी करता है तो संभव है कि अमेरिका भी चीन की जासूसी करता हो। उन्होंने कहा कि शी जिनपिंग के साथ उनके अच्छे संबंध हैं और उनकी आगामी मुलाकात अच्छी रहने की उम्मीद है।

    ट्रंप ने कहा कि उन्हें उम्मीद है कि शी जिनपिंग अगले सप्ताह अमेरिका आएंगे। उन्होंने चीन के साथ अमेरिका के संबंधों को भी अच्छा बताया। ट्रंप के मुताबिक, जिनपिंग के साथ उनकी अच्छी रिलेशनशिप है और उनकी यात्रा के दौरान दोनों देशों के बीच कई अलग-अलग समझौते होने की संभावना है।

    टैरिफ से चीन को हो रहा नुकसान

    अमेरिकी राष्ट्रपति ने चीन से जुड़े व्यापारिक मुद्दों पर भी बात की। उन्होंने कहा कि चीन अमेरिका को काफी टैरिफ दे रहा है। ट्रंप के अनुसार, इन टैरिफ की वजह से चीन को काफी नुकसान हो रहा था और वह ऐसा नहीं करना चाहते थे।

    चीन की कथित जासूसी को लेकर सवाल पूछे जाने पर ट्रंप ने कहा कि किसी ने उनसे कहा था कि चीन अमेरिका की जासूसी करता है। इस पर उन्होंने कहा कि शायद चीन ऐसा करता हो, लेकिन अमेरिका भी चीन की जासूसी करता है।

    एयरपोर्ट पर जिनपिंग का स्वागत कर सकते हैं ट्रंप

    रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, एक वरिष्ठ अमेरिकी अधिकारी ने शुक्रवार को बताया कि ट्रंप अगले सप्ताह वॉशिंगटन डीसी के बाहर जॉइंट बेस एंड्रयूज पहुंचने पर शी जिनपिंग का एयरपोर्ट पर स्वागत करने की योजना बना रहे हैं। अधिकारी ने कहा कि किसी विदेशी नेता का अमेरिकी राष्ट्रपति द्वारा एयरपोर्ट पर स्वागत किया जाना दुर्लभ है।

    अधिकारियों के मुताबिक, शी जिनपिंग की अमेरिका यात्रा के दौरान व्हाइट हाउस में स्वागत समारोह आयोजित किया जाएगा। इसके बाद रोज गार्डन में सैन्य समीक्षा और शाम को स्टेट डिनर का कार्यक्रम भी शामिल होगा।

    डिनर में टेक कंपनियों के CEO भी होंगे शामिल

    अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार, स्टेट डिनर में कई बड़ी टेक कंपनियों के CEO के शामिल होने की संभावना है। इनमें Amazon के जेफ बेजोस, Alphabet के सुंदर पिचाई, OpenAI के सैम ऑल्टमैन, Apple के टिम कुक, Tesla के एलन मस्क, Nvidia के जेनसन हुआंग और Dell Technologies के माइकल डेल शामिल हैं।

    अधिकारियों ने बताया कि जिनपिंग की यात्रा के दौरान अमेरिका और चीन के बीच व्यापार के साथ वैश्विक अर्थव्यवस्था में रेयर अर्थ की आपूर्ति और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा होने की उम्मीद है। यात्रा को दोनों देशों के बीच व्यापार और रणनीतिक संबंधों के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

  • मोदी के डिनर में क्यों नहीं पहुंचे शी जिनपिंग? पुतिन ने चखा भारतीय जायका, देखें पूरा मेन्यू

    मोदी के डिनर में क्यों नहीं पहुंचे शी जिनपिंग? पुतिन ने चखा भारतीय जायका, देखें पूरा मेन्यू


    नई दिल्ली।
    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शनिवार शाम भारत मंडपम में ब्रिक्स देशों के नेताओं और प्रतिनिधियों के लिए विशेष रात्रिभोज का आयोजन किया। इस डिनर में भारत की विविध पाक परंपराओं और शाकाहारी व्यंजनों को खास तौर पर मेन्यू में शामिल किया गया था। रात्रिभोज के दौरान ‘नवरस : द यूनिवर्स ऑफ शेयर्ड इमोशन्स’ नाम से विशेष सांस्कृतिक कार्यक्रम भी प्रस्तुत किया गया।

    हालांकि, इस खास आयोजन में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की गैरमौजूदगी चर्चा का विषय रही। सूत्रों के मुताबिक, शी जिनपिंग प्रधानमंत्री मोदी की ओर से आयोजित रात्रिभोज में शामिल नहीं हुए। उनके डिनर में शामिल न होने की तत्काल कोई आधिकारिक वजह सामने नहीं आई। एक सूत्र के अनुसार, शी आराम करने के लिए अपने होटल लौट गए थे।

    दूसरी ओर, रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन समेत ब्रिक्स के अन्य नेताओं ने रात्रिभोज में हिस्सा लिया और भारतीय व्यंजनों का स्वाद चखा। अबू धाबी के युवराज शेख खालिद बिन मोहम्मद भी डिनर में शामिल नहीं हुए।

    स्टार्टर में खंडवी और खुंब गलौटी

    रात्रिभोज की शुरुआत भारतीय स्वाद वाले खास स्टार्टर से हुई। मेहमानों को खंडवी मिलेफॉय परोसी गई। इसमें बेसन से तैयार स्टीम्ड खंडवी को सरसों, नारियल और करी पत्ते के तड़के के साथ परोसा गया। इसके साथ केसर आम, माइक्रोग्रीन्स और योगर्ट ड्रेसिंग का संयोजन रखा गया।

    इसके अलावा मेन्यू में खुंब गलौटी भी शामिल थी। इसमें तवे पर हल्के से ग्रिल किए गए मशरूम कबाब को मिंट पर्ल्स और शीरमल ब्रेड के साथ परोसा गया।

    डेजर्ट में पुरानी दिल्ली का स्वाद

    डेजर्ट को भी भारतीय परंपरागत स्वाद से जोड़ा गया। मेहमानों के लिए ओल्ड दिल्ली फ्रूट क्रीम विद जलेबी परोसी गई। इसमें मौसमी फलों और हल्की व्हिप्ड क्रीम के साथ कुरकुरी जलेबी को शामिल किया गया था।

    इसके साथ शहतूत फिरनी भी डेजर्ट का हिस्सा रही, जिसने पारंपरिक भारतीय मिठास का स्वाद मेन्यू में जोड़ा।

    मेन कोर्स में पनीर लबाबदार और हिमालयी गुच्छी

    मुख्य भोजन में कई तरह के भारतीय शाकाहारी व्यंजन शामिल किए गए। इनमें पनीर लबाबदार के साथ हिमालयी गुच्छी मशरूम और शतावरी से तैयार गुच्छी मार्मिक प्रमुख रहे। इस व्यंजन में केसर, किशमिश और ममरा बादाम का इस्तेमाल किया गया।

    इसके अलावा मेन कोर्स में कैरट बीन पोरियाल, अरहर दाल और टमाटर से तैयार दक्षिण भारतीय शैली का हल्का सूप ढक्काली बेले सारू भी परोसा गया।

    मेहमानों के लिए मिवेट पुलाव, बीटरूट रायता और कई तरह की भारतीय रोटियां भी मेन्यू में शामिल थीं। इस पूरे शाकाहारी मेन्यू के जरिए भारत की अलग-अलग क्षेत्रीय पाक परंपराओं और विविध स्वादों को एक ही टेबल पर पेश करने की कोशिश की गई।

  • विवादों के समाधान पर चीन का बड़ा संकेत, जिनपिंग की भारत यात्रा से पहले सीमा मुद्दे पर बढ़ी उम्मीद

    विवादों के समाधान पर चीन का बड़ा संकेत, जिनपिंग की भारत यात्रा से पहले सीमा मुद्दे पर बढ़ी उम्मीद

    नई दिल्ली। भारत और चीन के बीच रिश्तों में सुधार के संकेतों के बीच चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की भारत यात्रा को काफी अहम माना जा रहा है। ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में हिस्सा लेने के लिए नई दिल्ली पहुंचे जिनपिंग की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ द्विपक्षीय बैठक प्रस्तावित है। इस मुलाकात से पहले भारत में चीन के राजदूत शू फेइहोंग के बयान ने दोनों देशों के संबंधों को लेकर सकारात्मक उम्मीदें बढ़ाई हैं।

    चीनी राजदूत ने कहा है कि चीन और भारत बातचीत को आगे बढ़ाने, सहयोग मजबूत करने और आपसी मतभेदों का उचित समाधान निकालने के लिए मिलकर काम करेंगे। उनके इस बयान को सीमा विवाद समेत दोनों देशों के बीच लंबे समय से चले आ रहे मुद्दों को बातचीत के जरिए सुलझाने की दिशा में महत्वपूर्ण संकेत माना जा रहा है।

    लगातार तीसरे साल मोदी-शी की मुलाकात

    शू फेइहोंग ने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट में बताया कि चीन और भारत राष्ट्रपति शी जिनपिंग तथा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच होने वाली द्विपक्षीय बैठक की तैयारियां कर रहे हैं। रूस के कजान और चीन के तियानजिन में दोनों नेताओं की मुलाकातों के बाद यह लगातार तीसरा वर्ष होगा, जब मोदी और शी आमने-सामने बातचीत करेंगे।

    चीनी राजदूत ने कहा कि चीन दोनों नेताओं की ओर से दिए गए रणनीतिक मार्गदर्शन को लागू करने के लिए भारत के साथ मिलकर काम करेगा। दोनों देशों के संबंधों को रणनीतिक और दीर्घकालिक नजरिए से आगे बढ़ाने, संवाद बढ़ाने और सहयोग मजबूत करने पर जोर दिया जाएगा।

    उन्होंने कहा कि दोनों देश अपने मतभेदों को उचित तरीके से सुलझाने के साथ अच्छे पड़ोसियों की तरह मित्रता निभाएंगे और एक-दूसरे की सफलता में साझेदार बनकर आगे बढ़ेंगे।

    धीरे-धीरे सामान्य हो रहे भारत-चीन संबंध

    पिछले कुछ वर्षों में भारत और चीन के रिश्तों में धीरे-धीरे सुधार के संकेत मिले हैं। वर्ष 2024 में रूस के कजान में हुए ब्रिक्स शिखर सम्मेलन और 2025 में चीन के तियानजिन में आयोजित शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) शिखर सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच महत्वपूर्ण बातचीत हुई थी।

    इन मुलाकातों के बाद दोनों देशों के बीच संवाद बढ़ाने और द्विपक्षीय संबंधों को आगे ले जाने की कोशिशें तेज हुई हैं। ऐसे में नई दिल्ली में प्रस्तावित मोदी-शी बैठक को इस प्रक्रिया की अगली महत्वपूर्ण कड़ी के तौर पर देखा जा रहा है।

    भारत की ब्रिक्स अध्यक्षता का भी चीन ने किया समर्थन

    शी जिनपिंग की भारत यात्रा से पहले चीन ने भारत की ब्रिक्स अध्यक्षता का भी समर्थन किया है। शू फेइहोंग ने एक अन्य सोशल मीडिया पोस्ट में कहा था कि चीन ब्रिक्स सहयोग को काफी महत्व देता है और इस वर्ष सफल ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के आयोजन में भारत का समर्थन करता है।

    यह बयान ऐसे समय आया है जब भारत नई दिल्ली में 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की मेजबानी कर रहा है। सम्मेलन में दुनिया की कई प्रमुख उभरती अर्थव्यवस्थाओं के राष्ट्राध्यक्ष और प्रतिनिधि हिस्सा लेने पहुंचे हैं।

    मोदी-शी की बैठक पर टिकी निगाहें

    ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के दौरान होने वाली प्रधानमंत्री मोदी और शी जिनपिंग की द्विपक्षीय बैठक पर दोनों देशों के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय समुदाय की भी नजर है। बैठक में सीमा विवाद, व्यापार, निवेश, क्षेत्रीय सुरक्षा और वैश्विक परिस्थितियों से जुड़े मुद्दों पर चर्चा होने की संभावना है।

    चीनी राजदूत के ताजा बयान से संकेत मिलता है कि बीजिंग भारत के साथ मतभेदों को टकराव के बजाय संवाद और कूटनीति के माध्यम से सुलझाने पर जोर दे रहा है। ऐसे में नई दिल्ली में होने वाली मोदी-शी वार्ता भारत-चीन संबंधों की आगे की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

  • BRICS Summit: चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग पूरे लाव-लश्कर के साथ आएंगे दिल्ली….

    BRICS Summit: चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग पूरे लाव-लश्कर के साथ आएंगे दिल्ली….


    नई दिल्ली।
    भारत (India) की अध्यक्षता में 12-13 सितंबर को हो रहे ब्रिक्स शिखर सम्मेलन (BRICS Summit) में हिस्सा लेने के लिए चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग (Chinese President Xi Jinping) दिल्ली आएंगे। सूत्रों के अनुसार, राष्ट्रपति जिनपिंग की यात्रा का आधिकारिक कार्यक्रम अभी नहीं आया है लेकिन उनके दौरे को अंतिम रूप दिया जा रहा है। वे एक उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल के साथ भारत आ रहे हैं।

    जिनपिंग की भारत यात्रा करीब सात सालों के बाद हो रही है। इससे पहले वे अक्तूबर 2019 में द्विपक्षीय वार्ता के लिए भारत आए थे। सूत्रों ने कहा कि जिनपिंग की भारत यात्रा के दौरान दोनों देशों में द्विपक्षीय वार्ता भी होगी जिसमें सीमा से संबंधित मुद्दों पर भी चर्चा होगी। ब्रिक्स में प्रमुख हस्तियों में जिनपिंग के अलावा रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन होंगे। चुनाव के चलते ब्राजील के राष्ट्रपति लूला हिस्सा नहीं लेंगे। उसके भी विदेश मंत्री आएंगे। जबकि ईरान, इंडोनेशिया के राष्ट्रपति के हिस्सा लेने की संभावना है।


    बांग्लादेशी पीएम के आने की संभावना नहीं

    बिम्स्टेक के अध्यक्ष के रूप में ब्रिक्स में आमंत्रित बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान के सम्मेलन में आने के आसार नही हैं। संभावना है कि विदेश मंत्री बांग्लादेश का प्रतिनिधित्व कर सकते हैं। आपको बता दें कि बांग्लादेश शेख हसीना को वापस भेजने की मांग कर रहा है। इस वजह से दोनों देशों के बीच कूटनीतिक स्तर पर तनाव बढ़ा है।

    तारिक रहमान की यात्रा को लेकर राष्ट्रपति भवन ने एक बार बयान भी जारी कर दिया था जिसे बाद में वापस लेना पड़ा। बांग्लादेश के विदेश मंत्रालय ने कहा था कि तारिक रहमान की यात्रा के लिए अनुकूल माहौल बनाने की जरूरत है। इस दौरे के रद्द होने के बाद कहा जा रहा था कि रहमान ब्रिक्स सम्मेलन के दौरान भारत आ सकते हैं।हालांकि वह ब्रिक्स शिखऱ सम्मेलन में हिस्सा लेने भी नहीं आ रहे हैं।


    ब्रिक्स प्रधान न्यायाधीशों की बैठक शुरू

    ब्रिक्स प्रधान न्यायाधीश मंच की बैठक को संबोधित करते हुए न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने वाणिज्यिक विवादों को सुलझाने के लिए मध्यस्थता एवं सुलह के लिए एक साझा मंच बनाने का प्रस्ताव भी रखा। सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को यहां ब्रिक्स प्रधान न्यायाधीश मंच की बैठक का आयोजन किया। इसमें ब्रिक्स के सदस्य देशों और सहयोगी देशों के प्रधान न्यायाधीश, शीर्ष अदालतों के प्रमुख और वरिष्ठ न्यायिक अधिकारी शामिल हुए।

    ब्रिक्स प्रधान न्यायाधीश मंच की बैठक के उद्घाटन के दिन प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत ने न्यायिक प्रतिनिधिमंडलों के प्रमुखों के साथ कई द्विपक्षीय बैठकें कीं।सीजेआई ने तीन दिवसीय सम्मेलन के पहले दिन रूस, चीन, मिस्र, इंडोनेशिया, संयुक्त अरब अमीरात (यूएई), बेलारूस, कजाकिस्तान, दक्षिण अफ्रीका, ईरान और उज्बेकिस्तान के न्यायिक प्रमुखों से मुलाकात की।

  • बीजिंग में शी जिनपिंग-पुतिन की बैठक: दुनिया ‘जंगलराज’ की ओर बढ़ रही, ईरान युद्ध रोकने की अपील

    बीजिंग में शी जिनपिंग-पुतिन की बैठक: दुनिया ‘जंगलराज’ की ओर बढ़ रही, ईरान युद्ध रोकने की अपील



    नई दिल्ली। बीजिंग में वैश्विक राजनीति पर बड़ा बयान देते हुए चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने मौजूदा अंतरराष्ट्रीय हालात को लेकर गंभीर चेतावनी दी है। रूस के राष्ट्रपति व्लादिमिर पुतिन के साथ हुई उच्चस्तरीय बैठक के दौरान जिनपिंग ने कहा कि दुनिया एक बार फिर “जंगलराज” जैसी स्थिति की ओर बढ़ रही है, जहां अंतरराष्ट्रीय नियम और वैश्विक स्थिरता कमजोर पड़ती नजर आ रही है।

    एक रिर्पोट के मुताबिक, बीजिंग के ग्रेट हॉल ऑफ द पीपल में दोनों नेताओं की मुलाकात के दौरान शी जिनपिंग ने मिडिल ईस्ट में जारी संघर्ष, खासकर ईरान से जुड़े तनाव को लेकर चिंता जताई। उन्होंने स्पष्ट कहा कि यदि युद्ध और सैन्य कार्रवाई पर रोक नहीं लगाई गई तो इसका असर पूरी दुनिया की शांति और व्यवस्था पर पड़ेगा।

    जिनपिंग ने कहा कि एकतरफा सैन्य कार्रवाई और लंबे समय तक चलने वाले युद्ध वैश्विक व्यवस्था को अस्थिर कर रहे हैं और इससे अंतरराष्ट्रीय कानूनों की भूमिका कमजोर हो सकती है। उन्होंने जोर देते हुए कहा कि वर्तमान हालात में संघर्षों को रोकना और संवाद के जरिए समाधान निकालना बेहद जरूरी है।

    बैठक के दौरान दोनों नेताओं ने वैश्विक राजनीति, ऊर्जा सुरक्षा, व्यापार और BRICS जैसे मंचों पर भी चर्चा की। रूस के राष्ट्रपति व्लादिमिर पुतिन ने कहा कि पिछले 25 वर्षों में रूस और चीन के संबंध लगातार मजबूत हुए हैं और दोनों देश विभिन्न क्षेत्रों में रणनीतिक सहयोग बढ़ा रहे हैं।

    पुतिन ने यह भी कहा कि रूस और चीन की साझेदारी का उद्देश्य न केवल आर्थिक विकास है, बल्कि वैश्विक स्थिरता और संतुलित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को बढ़ावा देना भी है। उन्होंने कहा कि दोनों देश संप्रभुता और राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए एक-दूसरे के साथ मजबूती से खड़े हैं।

    इस दौरान दोनों नेताओं ने कई महत्वपूर्ण समझौतों पर भी चर्चा की, जिनमें ऊर्जा, व्यापार, पर्यटन और शिक्षा जैसे क्षेत्र शामिल हैं। रिपोर्ट्स के अनुसार, इस दौरे में लगभग 40 समझौतों पर हस्ताक्षर होने की संभावना जताई गई है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि रूस और चीन के बीच बढ़ती यह साझेदारी वैश्विक शक्ति संतुलन को नया रूप दे रही है, खासकर ऐसे समय में जब यूक्रेन युद्ध और मिडिल ईस्ट संकट जैसी स्थितियों से दुनिया में तनाव बढ़ा हुआ है।

    गौरतलब है कि शी जिनपिंग और व्लादिमिर पुतिन अब तक 40 से अधिक बार मिल चुके हैं और दोनों देशों के बीच रणनीतिक संबंध लगातार मजबूत होते जा रहे हैं। दोनों नेता अक्सर खुद को “मल्टीपोलर वर्ल्ड ऑर्डर” के समर्थक के रूप में पेश करते हैं, जिसमें वैश्विक शक्ति केवल एक देश के हाथों में नहीं बल्कि कई देशों में बंटी होती है।

  • शी जिनपिंग-ट्रंप मुलाकात: G2 की चर्चा के बीच व्यापार और रणनीति पर टकराव, अमेरिका-चीन रिश्तों में नई खींचतान

    शी जिनपिंग-ट्रंप मुलाकात: G2 की चर्चा के बीच व्यापार और रणनीति पर टकराव, अमेरिका-चीन रिश्तों में नई खींचतान



    नई दिल्ली। डोनाल्ड ट्रंप के हालिया चीन दौरे को लेकर वैश्विक राजनीति में कई तरह की चर्चाएं तेज हो गई हैं। ट्रंप ने इस यात्रा को व्यापारिक सफलता बताया और दावा किया कि चीन ने अमेरिका से बड़े पैमाने पर खरीदारी पर सहमति जताई है, लेकिन बीजिंग ने इन दावों को स्पष्ट रूप से खारिज कर दिया है, जिससे दोनों देशों के बीच मतभेद फिर उजागर हो गए हैं।

    ट्रंप ने कहा कि चीन ने अमेरिका से 200 बोइंग विमान खरीदने और अरबों डॉलर के बीफ व सोयाबीन आयात पर सहमति दी है। हालांकि चीन की ओर से इस पर कोई औपचारिक पुष्टि नहीं आई, जिससे यह दावा विवादों में आ गया है। इसी बीच ट्रंप के साथ गए अमेरिकी बिजनेस डेलिगेशन को भी ठोस व्यापारिक समझौते के बिना लौटना पड़ा।

    दूसरी ओर चीन ने इस मुलाकात को कूटनीतिक रूप से बेहद सोच-समझकर आयोजित किया, जहां सैन्य प्रदर्शन, औपचारिक स्वागत और शी जिनपिंग के साथ निजी मुलाकातों के जरिए अपनी वैश्विक शक्ति का संदेश देने की कोशिश की गई। विश्लेषकों के मुताबिक, इस पूरे दौरे में चीन का आत्मविश्वास और रणनीतिक स्थिति मजबूत नजर आई।

    रिपोर्ट्स के अनुसार, अमेरिका और चीन के बीच चर्चा के केंद्र में तीन ‘B’ (Boeing, Beef, Beans) और तीन ‘T’ (Taiwan, Tariff, Technology) रहे। ट्रंप प्रशासन ने ताइवान मुद्दे पर नरम रुख दिखाया, जबकि चीन ने तकनीक और व्यापार नीति पर सख्त रुख बनाए रखा। इसी दौरान अमेरिका द्वारा हथियार आपूर्ति में देरी जैसी खबरों ने भी रणनीतिक संतुलन पर असर डाला है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि चीन फिलहाल अमेरिका के साथ “G2 व्यवस्था” यानी वैश्विक शक्ति साझेदारी की अवधारणा को बढ़ावा देना चाहता है, ताकि दुनिया की नीतियों में उसकी बराबर की भागीदारी हो सके। हालांकि दीर्घकाल में उसका लक्ष्य वैश्विक नेतृत्व हासिल करना बताया जा रहा है।

    इस पूरे घटनाक्रम ने साफ कर दिया है कि अमेरिका और चीन के रिश्ते सहयोग और प्रतिस्पर्धा के बीच झूल रहे हैं, और आने वाले समय में यह वैश्विक शक्ति संतुलन को काफी हद तक प्रभावित कर सकते हैं।

  • ट्रंप-शी की नजदीकी से भारत की बढ़ी टेंशन! सुरक्षा से व्यापार तक बदल सकते हैं एशिया के समीकरण

    ट्रंप-शी की नजदीकी से भारत की बढ़ी टेंशन! सुरक्षा से व्यापार तक बदल सकते हैं एशिया के समीकरण



    नई दिल्ली। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की हालिया मुलाकात ने भारत की रणनीतिक चिंताओं को बढ़ा दिया है। 13 से 15 मई तक बीजिंग में हुई इस बैठक को वैश्विक राजनीति में बड़े बदलाव के संकेत के तौर पर देखा जा रहा है। माना जा रहा है कि अगर अमेरिका और चीन के रिश्तों में नरमी आती है तो इसका सीधा असर भारत की सुरक्षा, व्यापार और क्षेत्रीय प्रभाव पर पड़ सकता है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि पिछले दो दशकों में भारत ने अमेरिका-चीन तनाव के बीच खुद को हिंद-प्रशांत क्षेत्र में एक मजबूत साझेदार के रूप में स्थापित किया था। लेकिन अगर वॉशिंगटन और बीजिंग के बीच समझौते बढ़ते हैं तो अमेरिका के लिए भारत की रणनीतिक अहमियत कम हो सकती है। इससे रक्षा सहयोग, खुफिया साझेदारी और क्षेत्रीय शक्ति संतुलन पर असर पड़ने की आशंका है।

    व्यापार के मोर्चे पर भी भारत के लिए खतरे की घंटी मानी जा रही है। हाल के वर्षों में कई वैश्विक कंपनियां चीन से बाहर निकलकर भारत में निवेश कर रही थीं, लेकिन अगर अमेरिका चीन पर लगाए गए टैरिफ और तकनीकी प्रतिबंधों में ढील देता है तो निवेश दोबारा चीन की ओर लौट सकता है। इससे भारत के “चीन प्लस वन” रणनीति के तहत मिले फायदे कमजोर पड़ सकते हैं।

    चीन-पाकिस्तान गठजोड़ भी भारत की चिंता का बड़ा कारण है। विश्लेषकों का कहना है कि अगर अमेरिका चीन के साथ रिश्ते सुधारने की दिशा में आगे बढ़ता है तो पाकिस्तान में चीन की बढ़ती गतिविधियों पर उसका दबाव कम हो सकता है। इससे चीन खुलकर पाकिस्तान का समर्थन कर सकता है, जिसका असर कश्मीर और सीमा सुरक्षा से जुड़े मामलों पर दिखाई दे सकता है।

    पश्चिम एशिया और ऊर्जा सुरक्षा के मुद्दे पर भी भारत सतर्क नजर आ रहा है। भारत की बड़ी तेल जरूरतें होर्मुज जलडमरूमध्य पर निर्भर हैं। अगर अमेरिका और चीन ईरान और खाड़ी क्षेत्र को लेकर किसी नई रणनीति पर साथ आते हैं तो भारत की भूमिका सीमित हो सकती है। इससे क्षेत्रीय समुद्री सुरक्षा और ऊर्जा आपूर्ति पर असर पड़ने की आशंका है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप-शी मुलाकात केवल दो देशों की कूटनीतिक बैठक नहीं है, बल्कि इसका असर पूरी दुनिया की शक्ति संतुलन पर पड़ेगा। भारत के लिए यह संकेत है कि आने वाले समय में उसे अपनी विदेश नीति, आर्थिक रणनीति और सुरक्षा ढांचे को और मजबूत करना होगा, ताकि बदलते वैश्विक समीकरणों में उसका प्रभाव कायम रह सके।

  • ट्रंप का चीन दौरा रहा बेनतीजा! जिनपिंग के सामने ईरान, ताइवान और व्यापार पर नहीं बनी कोई सहमति

    ट्रंप का चीन दौरा रहा बेनतीजा! जिनपिंग के सामने ईरान, ताइवान और व्यापार पर नहीं बनी कोई सहमति


    नई दिल्ली।
    अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की बहुचर्चित चीन यात्रा इस बार किसी बड़े नतीजे के बिना खत्म हो गई। बीजिंग में चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ कई दौर की बातचीत के बावजूद ईरान, ताइवान और व्यापार जैसे अहम मुद्दों पर कोई ठोस समझौता सामने नहीं आया।

    दोनों नेताओं ने बातचीत को सकारात्मक बताया, लेकिन अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों के अनुसार इस दौरे से कोई बड़ा कूटनीतिक या आर्थिक ऐलान नहीं हुआ। ट्रंप लगभग 40 घंटे से ज्यादा बीजिंग में रहे और कई बैठकों में शामिल हुए, फिर भी दोनों देशों के बीच रणनीतिक मतभेद जस के तस बने रहे।

    सबसे बड़ा मुद्दा ईरान और होर्मुज जलडमरूमध्य रहा, जहां ऊर्जा आपूर्ति और सैन्य तनाव को लेकर अमेरिका और चीन की स्थिति अलग-अलग दिखाई दी। अमेरिकी पक्ष ने दावा किया कि दोनों देश ऊर्जा प्रवाह को लेकर सहमत हैं, लेकिन चीन की ओर से इस पर कोई स्पष्ट प्रतिबद्धता सामने नहीं आई।

    ताइवान को लेकर स्थिति और भी सख्त नजर आई, जहां शी जिनपिंग ने इसे चीन की “रेड लाइन” बताते हुए किसी भी बाहरी हस्तक्षेप को अस्वीकार्य करार दिया। इस बयान को अमेरिका के लिए एक स्पष्ट कूटनीतिक संदेश के रूप में देखा जा रहा है।

    व्यापार और आर्थिक सहयोग के मोर्चे पर भी कोई बड़ा समझौता नहीं हो सका। उम्मीद थी कि चीन बड़ी मात्रा में अमेरिकी कृषि और औद्योगिक उत्पादों की खरीद बढ़ाने का ऐलान करेगा, लेकिन ऐसा कोई महत्वपूर्ण निर्णय सामने नहीं आया।

    कुल मिलाकर इस दौरे को विशेषज्ञों ने “बिना ठोस नतीजे वाली कूटनीतिक मुलाकात” बताया है, जहां दोनों देशों ने रिश्तों में सुधार की बात जरूर कही, लेकिन जमीनी स्तर पर कोई बड़ा बदलाव नहीं दिखा।

  • शी जिनपिंग की सीट से उठते ही फाइलें देखने लगे ट्रंप! चीन समिट का VIDEO वायरल, सोशल मीडिया पर मचा बवाल

    शी जिनपिंग की सीट से उठते ही फाइलें देखने लगे ट्रंप! चीन समिट का VIDEO वायरल, सोशल मीडिया पर मचा बवाल



    नई दिल्ली। डोनाल्ड ट्रम्प एक बार फिर अपने व्यवहार को लेकर अंतरराष्ट्रीय चर्चा के केंद्र में आ गए हैं। चीन दौरे के दौरान उनका एक वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है, जिसमें वह कथित तौर पर Xi Jinping के सामने रखे दस्तावेजों और डायरी को देखने की कोशिश करते नजर आ रहे हैं। इस वीडियो के सामने आने के बाद इंटरनेट पर बहस छिड़ गई है और लोग ट्रंप के व्यवहार पर सवाल उठा रहे हैं।

    वायरल वीडियो में दिखाई देता है कि अमेरिका-चीन बैठक के दौरान शी जिनपिंग अपनी सीट से कुछ देर के लिए उठते हैं। इसी बीच ट्रंप सामने रखे दस्तावेजों की तरफ झुकते हैं और एक नोटबुक या डायरी जैसी चीज को देखने लगते हैं। वीडियो में मौजूद कुछ अमेरिकी अधिकारी भी इस दौरान असहज दिखाई देते हैं। हालांकि यह स्पष्ट नहीं है कि ट्रंप वास्तव में क्या पढ़ रहे थे और वह दस्तावेज निजी थे या बैठक से जुड़े आधिकारिक कागज।

    सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर इस वीडियो को लेकर तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं। कई यूजर्स ने इसे “डिप्लोमैटिक प्रोटोकॉल के खिलाफ” बताया, जबकि कुछ लोगों ने मजाकिया अंदाज में कहा कि ट्रंप “चीन के सीक्रेट” जानने की कोशिश कर रहे थे। कुछ पोस्ट्स में ट्रंप के व्यवहार को लेकर उनकी कार्यशैली और सार्वजनिक आचरण पर भी सवाल उठाए गए।

    बांग्लादेशी पत्रकार Salah Uddin Shoaib Choudhury ने भी इस वीडियो पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि इतने संवेदनशील अंतरराष्ट्रीय मंच पर ऐसा व्यवहार कई सवाल खड़े करता है। उन्होंने इसे कूटनीतिक माहौल के लिहाज से असामान्य बताया।

    हालांकि अब तक अमेरिका या चीन की ओर से इस वीडियो को लेकर कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया गया है। यह भी साफ नहीं हो पाया है कि वीडियो किस संदर्भ में रिकॉर्ड हुआ और ट्रंप वास्तव में क्या देख रहे थे। बावजूद इसके, यह क्लिप सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रही है और दुनियाभर में चर्चा का विषय बनी हुई है।