कच्चे तेल की कीमतें बनीं बड़ी चुनौती
रिपोर्ट के अनुसार, वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए सबसे बड़ी चुनौती बनकर सामने आई हैं। अनुमान है कि तेल की औसत कीमत करीब 95 डॉलर प्रति बैरल रह सकती है, जिससे ऊर्जा आयात पर खर्च बढ़ेगा और इसका सीधा असर उद्योगों की लागत पर पड़ेगा।इसके चलते उत्पादन महंगा होगा और महंगाई पर भी दबाव बढ़ सकता है।
अल्पकाल में ग्रोथ पर दिख सकता है असर
Morgan Stanley की रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि निकट भविष्य में आर्थिक विकास की रफ्तार थोड़ी धीमी पड़ सकती है। जून 2026 तिमाही में जीडीपी ग्रोथ घटकर 5.9 प्रतिशत तक पहुंचने की आशंका जताई गई है। इसकी वजह औद्योगिक गतिविधियों में सुस्ती, वित्तीय स्थितियों में सख्ती और कंपनियों के मुनाफे में कमी को माना गया है।
महंगाई और रुपए पर बढ़ेगा दबाव
ऊर्जा कीमतों में उछाल का असर सिर्फ उत्पादन तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह महंगाई और मुद्रा पर भी असर डालेगा। रिपोर्ट के मुताबिक, वित्त वर्ष 2027 में खुदरा महंगाई दर औसतन 5.1 प्रतिशत रह सकती है। इसके अलावा, बढ़ते आयात बिल और कमजोर पूंजी प्रवाह के चलते भारतीय रुपए पर भी दबाव बढ़ने की संभावना है।
चालू खाता घाटा बढ़ने की आशंका
बढ़ती तेल कीमतों का असर भारत के चालू खाता घाटे (CAD) पर भी पड़ सकता है।रिपोर्ट में अनुमान जताया गया है कि यह घाटा जीडीपी के 1 प्रतिशत से बढ़कर 2.5 प्रतिशत तक पहुंच सकता है। यह स्थिति देश के बाहरी आर्थिक संतुलन को प्रभावित कर सकती है और भुगतान संतुलन पर भी दबाव डाल सकती है।
सरकार के उपायों से मिलेगी राहत
हालांकि, रिपोर्ट में यह भी उम्मीद जताई गई है कि सरकारी नीतियों और आपूर्ति में सुधार से हालात धीरे-धीरे बेहतर हो सकते हैं। सरकार शुरुआती चरण में सब्सिडी और लागत नियंत्रण जैसे उपायों का सहारा ले सकती है, जिससे अर्थव्यवस्था को स्थिर बनाए रखने में मदद मिलेगी।
लंबी अवधि में भारत की ग्रोथ बरकरार
वैश्विक अनिश्चितताओं और महंगे तेल के दबाव के बावजूद भारत की अर्थव्यवस्था मजबूत बनी हुई है, जहां 6.2% जीडीपी ग्रोथ का अनुमान है, हालांकि अल्पकाल में महंगाई और रुपए पर दबाव बढ़ सकता है।
