नई दिल्ली। इंडियन प्रीमियर लीग के पिछले कुछ वर्षों के प्रदर्शन पर नजर डालें तो मुंबई इंडियंस का घर से बाहर खेलने का रिकॉर्ड सभी दस टीमों के मुकाबले सबसे कमजोर पाया गया है। साल 2023 के सीजन से लेकर अब तक मुंबई की टीम अपने विदेशी यानी अवे मैचों में केवल 36 प्रतिशत मुकाबले ही जीतने में सफल रही है। यह आंकड़ा लीग की अन्य सभी टीमों के बीच सबसे न्यूनतम जीत प्रतिशत है। जहां अन्य टीमें विपक्षी टीम के मैदान पर जाकर अंक बटोरने में सफल रही हैं वहीं मुंबई इंडियंस के दिग्गज खिलाड़ी विदेशी पिचों की परिस्थितियों और वातावरण के साथ तालमेल बिठाने में लगातार संघर्ष करते नजर आए हैं। यह गिरावट उस टीम के लिए बहुत बड़ा झटका है जिसने कभी पूरे भारत के हर मैदान पर अपनी धाक जमाई थी।
घर से बाहर खेलते समय टीम की मुख्य समस्या निरंतरता की कमी और दबाव के क्षणों में बिखर जाना रही है। आंकड़ों के मुताबिक वानखेड़े की पिच पर मुंबई के बल्लेबाज जिस निडरता के साथ खेलते हैं वैसी बल्लेबाजी चेपॉक या ईडन गार्डन्स जैसे बड़े मैदानों पर दिखाई नहीं देती। इसके अलावा गेंदबाजी विभाग भी अवे मैचों में रनों की गति पर अंकुश लगाने और नियमित अंतराल पर विकेट निकालने में पिछड़ता रहा है। 36 प्रतिशत का यह जीत का आंकड़ा दर्शाता है कि टीम अपनी घरेलू परिस्थितियों पर अत्यधिक निर्भर हो चुकी है और बाहर के मैदानों की चुनौती स्वीकार करने में उसकी रणनीतिक तैयारी अपर्याप्त साबित हो रही है। किसी भी टीम के लिए प्लेऑफ की राह तभी आसान होती है जब वह अपने घर के साथ-साथ विपक्षी के मैदान पर भी अंक हासिल करे।
इस निराशाजनक प्रदर्शन के पीछे कई कारण माने जा रहे हैं जिनमें टीम के संतुलन में बदलाव और प्रमुख खिलाड़ियों की चोटें शामिल हैं। हालांकि मुंबई इंडियंस के पास विश्व स्तरीय प्रतिभाओं की कोई कमी नहीं है लेकिन मैदान पर उनका सामूहिक प्रदर्शन वह परिणाम नहीं दे पा रहा है जिसकी उम्मीद उनके करोड़ों प्रशंसक करते हैं।
विपक्षी टीमें अब मुंबई की इस कमजोरी को भांप चुकी हैं और अपने घरेलू मैदान पर उन्हें घेरने की विशेष योजनाएं बना रही हैं। यदि मुंबई इंडियंस को अपनी पुरानी साख वापस पानी है और आगामी सीजन में खिताब की दौड़ में मजबूती से शामिल होना है तो उन्हें घर से बाहर खेलने की अपनी रणनीति में आमूलचूल परिवर्तन करना होगा और खिलाड़ियों के आत्मविश्वास को फिर से जगाना होगा।