मेष संक्रांति पर सत्तू दान से प्राप्त पुण्य, स्वास्थ्य और समृद्धि


नई दिल्ली । मेष संक्रांति हिन्दू धर्म का एक महत्वपूर्ण पर्व है, जिसे सूर्य देव के मेष राशि में प्रवेश के अवसर पर मनाया जाता है। इस साल यह पर्व 14 अप्रैल 2026 को पड़ रहा है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन सूर्य देव की पूजा करने से उत्तम स्वास्थ्य, सफलता और धन-ऐश्वर्य प्राप्त होता है। इसलिए श्रद्धालु इस दिन गंगा स्नान, सूर्य को अर्घ्य देने और दान-पुण्य करने का विशेष महत्व देते हैं।

मेष संक्रांति के दिन सत्तू का दान करने की परंपरा सदियों से चली आ रही है। धार्मिक दृष्टि से देखा जाए तो सत्तू दान करने से व्यक्ति को पुण्य की प्राप्ति होती है और जीवन में सुख-समृद्धि आती है। वहीं वैज्ञानिक दृष्टि से इसे समझें तो अप्रैल के महीने में गर्मी बढ़ने लगती है, ऐसे में सत्तू शरीर को ठंडक देता है और ऊर्जा प्रदान करता है। इसलिए इस दिन जरूरतमंदों को सत्तू, जल, फल और वस्त्र का दान करना अत्यंत फलदायी माना गया है।

भारत में मेष संक्रांति का उत्सव अलग-अलग राज्यों में विभिन्न नामों और परंपराओं के साथ मनाया जाता है। पंजाब में इसे बैसाखी कहा जाता है, पश्चिम बंगाल में पोइला बोइशाख के रूप में, तमिलनाडु में पुथंडु और असम में बोहाग बिहू इसी दिन या इसके आसपास मनाए जाते हैं। यह पर्व सूर्य के मेष राशि में प्रवेश का प्रतीक है और कई जगह इसे नए साल की शुरुआत के रूप में भी मनाया जाता है।

धार्मिक दृष्टिकोण से मेष संक्रांति का महत्व अत्यंत बड़ा है। इस दिन सूर्य देव की विशेष पूजा-अर्चना करने से जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और व्यक्ति नई शुरुआत और उन्नति की ओर अग्रसर होता है। पुराणों में वर्णित है कि इस दिन पवित्र नदियों में स्नान करने और दान-पुण्य करने से कई गुना अधिक पुण्य की प्राप्ति होती है। खासकर गंगा स्नान और सूर्य को अर्घ्य देने की परंपरा अत्यंत शुभ मानी जाती है।

सत्तू का दान केवल धार्मिक लाभ ही नहीं देता, बल्कि स्वास्थ्य के लिहाज से भी फायदेमंद है। यह शरीर को ठंडक पहुंचाता है, गर्मी में ऊर्जा बनाए रखता है और पाचन तंत्र को भी संतुलित करता है। इसी कारण, इस दिन जरूरतमंदों को सत्तू, जल, फल और अन्य वस्तुएं दान करना समृद्धि और पुण्य दोनों का माध्यम माना गया है।

संक्षेप में, मेष संक्रांति का पर्व न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है बल्कि यह शरीर, मन और समाज के लिए भी लाभकारी है। सत्तू दान, गंगा स्नान और सूर्य पूजा जैसी परंपराओं से व्यक्ति न केवल पुण्य कमाता है, बल्कि जीवन में स्वास्थ्य, सकारात्मक ऊर्जा और समृद्धि भी प्राप्त करता है। यह दिन नई शुरुआत, उन्नति और शुभ कार्यों के आरंभ का प्रतीक माना जाता है, इसलिए इसे पूरी श्रद्धा और विधिपूर्वक मनाना अत्यंत महत्वपूर्ण है।