यूपी में SIR के बाद बड़ा सियासी असर, BJP बहुल बड़े शहरों में ज्यादा वोट कटे, मुस्लिम बहुल जिलों में कम

लखनऊ। उत्तर प्रदेश में मतदाता पुनरीक्षण के बाद एसआईआर की फाइनल वोटर लिस्ट जारी होने से राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। इस प्रक्रिया में प्रदेश से करीब दो करोड़ नाम हटाए गए हैं, जिसके बाद सभी दलों के सामने नई चुनावी रणनीति तैयार करने की चुनौती खड़ी हो गई है। खास बात यह है कि भाजपा के प्रभाव वाले बड़े शहरों में वोटरों की संख्या में अपेक्षाकृत अधिक कमी दर्ज की गई है, जबकि मुस्लिम बहुल जिलों में यह गिरावट कम रही है।

बड़े शहरों में वोटर सूची में बड़ी कटौती
राज्य के प्रमुख शहरी क्षेत्रों में वोट कटने का प्रतिशत ज्यादा रहा है। लखनऊ में 22.89%, गौतमबुद्ध नगर में 19.33%, कानपुर नगर में 19.42% और मेरठ में 18.75% वोट घटे हैं। गाजियाबाद में करीब 20% वोटरों के नाम सूची से हटे हैं, जबकि आगरा में 17.71% और शाहजहांपुर में 17.90% की गिरावट दर्ज की गई है। इन क्षेत्रों में पिछले चुनावों में भाजपा का दबदबा रहा था, ऐसे में यह बदलाव राजनीतिक समीकरणों पर असर डाल सकता है।

मुस्लिम बहुल जिलों में अपेक्षाकृत कम गिरावट
इसके विपरीत सहारनपुर, मुजफ्फरनगर, शामली, मुरादाबाद, अमरोहा, आजमगढ़, मऊ और गाजीपुर जैसे मुस्लिम बहुल जिलों में वोट कटने का प्रतिशत कम रहा है। यहां गिरावट लगभग 8.92% से 11.53% के बीच दर्ज की गई है। ये वे क्षेत्र हैं जहां 2022 के विधानसभा चुनाव में ध्रुवीकरण का प्रभाव साफ तौर पर देखने को मिला था।

वीआईपी सीटों पर बदलते समीकरण
कई वीआईपी और बेहद करीबी मुकाबले वाली सीटों पर भी वोटर संख्या में उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई है। प्रयागराज में लगभग 8.26 लाख वोट कम हुए हैं, जबकि मंत्री नंद गोपाल गुप्ता नंदी की इलाहाबाद दक्षिणी सीट पर करीब 99,059 मतदाता घटे हैं। इसी तरह कुंडा विधानसभा में 53,539 और देवरिया की पथरदेवा सीट पर 28,637 वोट कम हुए हैं, जहां पिछला चुनाव बेहद करीबी अंतर से तय हुआ था।

राजनीतिक विश्लेषकों की राय
राजनीतिक जानकारों का कहना है कि अभी यह स्पष्ट नहीं है कि हटाए गए वोटरों में किस दल के समर्थक अधिक प्रभावित हुए हैं। न ही यह साफ है कि नए मतदाता जोड़ने की प्रक्रिया में किस पक्ष को ज्यादा लाभ मिला है। ऐसे में मिशन 2027 की चुनावी रणनीति में सभी दलों को नए सिरे से मंथन करना होगा।

विशेषज्ञों का मानना है कि मतदाता सूची से नाम कटने के पीछे मुख्य कारण विस्थापन, मृत्यु या दस्तावेजों की कमी हो सकते हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का यह भी कहना है कि 2003 के बाद हुए इस बड़े सघन पुनरीक्षण में मतदाता संख्या में गिरावट सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा है, लेकिन इसका असर आने वाले चुनावी समीकरणों पर जरूर देखने को मिलेगा।