खंडवा में ‘डबल कुर्सी’ का खेल, पद महिला जनप्रतिनिधियों के और फैसले पति के हाथ


नई दिल्ली। खंडवा जिले में पंचायत से लेकर नगर निकाय और राजनीतिक पदों पर महिलाओं की भागीदारी बढ़ी है, लेकिन इसके साथ ही “डबल कुर्सी” संस्कृति भी चर्चा में आ गई है। स्थिति यह है कि 11 प्रमुख पदों पर महिलाएं निर्वाचित हैं, लेकिन कई जगहों पर प्रशासनिक और राजनीतिक फैसले उनके पति या परिजन पर्दे के पीछे से लेते नजर आ रहे हैं।

दफ्तरों में ‘डबल कुर्सी’ आधिकारिक और अनौपचारिक सत्ता साथ-साथ

जिले के कई कार्यालयों में यह दृश्य आम हो गया है कि एक कुर्सी पर महिला जनप्रतिनिधि और दूसरी पर उनके पति बैठे दिखाई देते हैं। आरोप है कि वास्तविक निर्णय प्रक्रिया में भी कई बार पति ही सक्रिय भूमिका निभाते हैं, जबकि महिला जनप्रतिनिधि औपचारिक रूप से पद संभाल रही होती हैं। इस प्रवृत्ति को स्थानीय स्तर पर “डबल कुर्सी कल्चर” कहा जा रहा है।

विधायक से लेकर नगर निकाय तक पति निभा रहे ‘अतिरिक्त भूमिका’

कई पदों पर महिलाओं के पति को अनौपचारिक रूप से ज्यादा सक्रिय माना जा रहा है। खंडवा विधायक कंचन तनवे के पति मुकेश तनवे को राजनीतिक हलकों में “सुपर विधायक” तक कहा जाता है। इसी तरह महापौर अमृता यादव के पति अमर यादव नगर निगम से जुड़े मामलों में सक्रिय भूमिका निभाते रहे हैं, हालांकि विवाद के बाद उनकी गतिविधियां सीमित हो गई हैं।

नगर पंचायत और जनपदों में भी समान स्थिति

जनपद पंचायत और नगर परिषदों में भी यही तस्वीर सामने आ रही है। खंडवा जनपद अध्यक्ष मीनाबाई सोलंकी, मूंदी नगर परिषद अध्यक्ष ज्योतिबाला राठौर, ओंकारेश्वर नगर परिषद अध्यक्ष मनीषा परिहार समेत कई स्थानों पर उनके पति या परिजन कार्यालयीन कामकाज में सक्रिय दिखाई देते हैं। इससे प्रशासनिक पारदर्शिता और वास्तविक नेतृत्व को लेकर सवाल उठ रहे हैं।

कहां महिलाएं खुद संभाल रही जिम्मेदारी

हालांकि सभी जगह ऐसी स्थिति नहीं है। पंधाना विधायक छाया मोरे जैसी कुछ महिला जनप्रतिनिधि अपने निर्णय स्वयं लेती हैं, हालांकि कुछ मामलों में वे राजनीतिक सलाहकारों पर निर्भर रहती हैं।

जिले में महिलाओं की मजबूत भागीदारी, लेकिन बहस जारी

वर्तमान में जिले में जिला पंचायत अध्यक्ष, विधायक, महापौर और कई नगर पंचायत अध्यक्ष सहित 11 अहम पदों पर महिलाएं काबिज हैं, जबकि 7 प्रमुख पद पुरुषों के पास हैं। महिलाओं की बढ़ती भागीदारी को जहां एक ओर सकारात्मक बदलाव माना जा रहा है, वहीं “डबल कुर्सी” कल्चर इसे लेकर नई बहस भी खड़ी कर रहा है कि क्या वास्तविक सत्ता महिलाओं के हाथ में है या फिर निर्णय कहीं और से नियंत्रित हो रहे हैं।