वैश्विक आर्थिक खतरा: चीन की जनसंख्या में गिरावट, भारत से पिछड़ने के बाद दोहरी चुनौती

बीजिंग। चीन, जो दशकों तक दुनिया का सबसे अधिक आबादी वाला देश था, अब ऐतिहासिक जनसांख्यिकीय बदलाव का सामना कर रहा है। 2023 में भारत ने चीन को पीछे छोड़कर सबसे अधिक आबादी वाला देश बनने का ताज हासिल कर लिया। 2025 के आंकड़े और भी चिंताजनक हैं।

नेशनल स्टैटिस्टिक्स ब्यूरो के अनुसार, चीन की जन्म दर रिकॉर्ड निचले स्तर 7.93 मिलियन (79.3 लाख) पर आ गई है और कुल जनसंख्या में 33.9 लाख की गिरावट देखी गई है। प्रजनन दर केवल 1.3 रह गई है, जबकि स्थिर आबादी के लिए इसे 2.1 होना चाहिए।

जनसंख्या गिरावट के कारण और प्रभाव:
घटता वर्कफोर्स: काम करने वाले लोगों की संख्या अब कुल आबादी का 60.6% है, जो एक दशक पहले 70% थी।
बुजुर्गों की बढ़ती संख्या: 2034 तक 60 वर्ष या उससे अधिक उम्र के लोग चीन की कुल आबादी का 30% बन सकते हैं।
आर्थिक दबाव: श्रमिकों की कमी से मजदूरी बढ़ेगी और सामान महंगा होगा। पेंशन और हाउसिंग जैसे सेक्टर भी दबाव में आएंगे।

सरकार की कोशिशें:
2016 में दो बच्चों की अनुमति, 2021 में इसे बढ़ाकर तीन कर दिया गया।
बच्चों की देखभाल के लिए सब्सिडी (करीब 500 डॉलर प्रति वर्ष)।
रिटायरमेंट उम्र धीरे-धीरे बढ़ाने की योजना।
शिक्षा की लागत कम करने और गर्भपात रोकने के लिए कदम।

समस्या की जड़:
‘वन-चाइल्ड पॉलिसी’ (1979–2016) के चलते चीन में लंबे समय तक जन्म दर पर सख्त नियंत्रण रहा। यह नीति अब भी देश को लंबे समय तक प्रभावित कर रही है।

विशेषज्ञों का मानना है कि चीन के लिए यह चुनौती आसान नहीं है। जापान और दक्षिण कोरिया के अनुभव बताते हैं कि समाज की सोच और जीवनयापन की लागत में बदलाव के बाद जन्म दर बढ़ाना कठिन हो जाता है। चीन अब “बूढ़े होने से पहले अमीर बनने” की दौड़ में भी पिछड़ता दिखाई दे रहा है।