Category: International

  • सिंधु जल विवाद पर पाकिस्तान के आरोपों की पड़ताल, जल संकट की जड़ में भारत नहीं बल्कि दशकों की नीतिगत लापरवाही?

    सिंधु जल विवाद पर पाकिस्तान के आरोपों की पड़ताल, जल संकट की जड़ में भारत नहीं बल्कि दशकों की नीतिगत लापरवाही?

    नई दिल्ली । पाकिस्तान में गहराते जल संकट को लेकर एक बार फिर भारत और सिंधु जल संधि चर्चा के केंद्र में हैं। पाकिस्तान की ओर से भारत पर पानी रोकने और जल संकट पैदा करने के आरोप लगाए जा रहे हैं, जबकि विशेषज्ञों का एक वर्ग मानता है कि मौजूदा स्थिति के पीछे सबसे बड़ी वजह पाकिस्तान की अपनी जल प्रबंधन प्रणाली, अधूरी परियोजनाएं और दशकों से चली आ रही नीतिगत कमियां हैं। इसी कारण यह बहस तेज हो गई है कि संकट का वास्तविक कारण सीमा पार की गतिविधियां हैं या घरेलू स्तर पर जल संसाधनों का कमजोर प्रबंधन।

    सिंधु जल संधि के तहत भारत और पाकिस्तान के बीच नदियों के जल बंटवारे की व्यवस्था पहले से निर्धारित है। भारत को आवंटित पूर्वी नदियों के जल का उपयोग करने का अधिकार प्राप्त है। हाल के वर्षों में भारत ने अपने हिस्से के पानी के बेहतर उपयोग के लिए कई सिंचाई और जल भंडारण परियोजनाओं पर काम तेज किया है। इन परियोजनाओं का उद्देश्य भारत को आवंटित जल संसाधनों का अधिकतम उपयोग करना है, न कि पाकिस्तान के हिस्से का पानी रोकना।

    विशेषज्ञों का कहना है कि पाकिस्तान लंबे समय से पर्याप्त जलाशयों और आधुनिक जल संरक्षण ढांचे के निर्माण में अपेक्षित निवेश नहीं कर पाया। परिणामस्वरूप मानसून के दौरान बड़ी मात्रा में पानी बिना उपयोग के समुद्र में बह जाता है। इसके अलावा कई बड़े बांधों में वर्षों से गाद जमा होने के कारण उनकी जल भंडारण क्षमता भी लगातार कम होती गई है, जिससे सूखे और जल संकट की स्थिति और गंभीर होती है।

    जल संसाधन प्रबंधन से जुड़े जानकारों का यह भी मानना है कि पाकिस्तान के कई क्षेत्रों में पुरानी सिंचाई प्रणाली, रिसाव, अवैध जल दोहन और वितरण व्यवस्था की कमजोर निगरानी के कारण बड़ी मात्रा में पानी बर्बाद होता है। कृषि क्षेत्र में भी पानी के उपयोग की दक्षता अपेक्षाकृत कम मानी जाती है, जिससे उपलब्ध संसाधनों पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है। कई शहरी क्षेत्रों में पाइपलाइन नेटवर्क की खराब स्थिति और अवैध जल आपूर्ति भी संकट को बढ़ाने वाले कारकों में शामिल हैं।

    हाल के वर्षों में भारत ने सीमावर्ती क्षेत्रों में जल संसाधनों के बेहतर उपयोग के उद्देश्य से कई परियोजनाओं को गति दी है। इनका उद्देश्य अपने हिस्से के जल का उपयोग बढ़ाना, सिंचाई सुविधाओं का विस्तार करना और जल संरक्षण को मजबूत बनाना है। विशेषज्ञों का कहना है कि इन परियोजनाओं को सिंधु जल संधि के प्रावधानों के अनुरूप तैयार किया गया है और इनका उद्देश्य जल प्रवाह को राजनीतिक हथियार बनाना नहीं बल्कि उपलब्ध अधिकारों का उपयोग करना है।

    दूसरी ओर पाकिस्तान में जल अवसंरचना से जुड़े निवेश में कमी, नए बांधों के निर्माण में देरी और जल संरक्षण योजनाओं के धीमे क्रियान्वयन को लेकर भी लगातार सवाल उठते रहे हैं। विभिन्न विश्लेषणों में यह बात सामने आई है कि यदि समय रहते जलाशयों का विस्तार, वितरण व्यवस्था का आधुनिकीकरण और जल संरक्षण पर प्रभावी निवेश किया जाता, तो वर्तमान संकट की गंभीरता काफी हद तक कम हो सकती थी।

    विशेषज्ञों का मानना है कि जल संकट जैसे जटिल मुद्दे का समाधान केवल राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से संभव नहीं है। दीर्घकालिक समाधान के लिए प्रभावी जल प्रबंधन, आधुनिक अवसंरचना, जल संरक्षण तकनीकों का व्यापक उपयोग और संसाधनों के वैज्ञानिक प्रबंधन की आवश्यकता होगी। ऐसे कदम ही भविष्य में जल सुरक्षा सुनिश्चित करने और क्षेत्रीय स्तर पर स्थायी समाधान की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

  • यमन में फिर बढ़ा युद्ध का खतरा, ईरानी विमान की लैंडिंग के बाद सऊदी गठबंधन की हूतियों को कड़ी चेतावनी, क्षेत्रीय तनाव गहराया

    यमन में फिर बढ़ा युद्ध का खतरा, ईरानी विमान की लैंडिंग के बाद सऊदी गठबंधन की हूतियों को कड़ी चेतावनी, क्षेत्रीय तनाव गहराया

    नई दिल्ली । यमन में एक बार फिर सैन्य तनाव बढ़ने के संकेत दिखाई दे रहे हैं। राजधानी सना में ईरान के एक नागरिक विमान के उतरने के बाद सऊदी नेतृत्व वाले गठबंधन और हूती विद्रोहियों के बीच बयानबाजी तेज हो गई है। दोनों पक्षों की ओर से जारी चेतावनियों ने पूरे मध्य पूर्व में सुरक्षा स्थिति को लेकर नई चिंताएं पैदा कर दी हैं। घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया है जब क्षेत्र पहले से ही कई भू-राजनीतिक चुनौतियों का सामना कर रहा है।

    जानकारी के अनुसार, हूती नियंत्रण वाले सना अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर एक ईरानी विमान के उतरने के दौरान तनावपूर्ण स्थिति उत्पन्न हुई। हूती पक्ष का दावा है कि विमान को रोकने की कोशिश के जवाब में उन्होंने अपने वायु रक्षा तंत्र को सक्रिय किया। वहीं दूसरी ओर सऊदी समर्थित गठबंधन इस घटनाक्रम को क्षेत्रीय सुरक्षा और यमन की स्थिति के लिए गंभीर मान रहा है।

    सऊदी नेतृत्व वाले गठबंधन ने स्पष्ट किया है कि यदि उसकी सुरक्षा, क्षेत्रीय स्थिरता या यमन की संप्रभुता को चुनौती देने की कोई भी कोशिश की गई तो उसका कड़ा जवाब दिया जाएगा। गठबंधन का कहना है कि हाल के घटनाक्रम केवल सैन्य चुनौती नहीं हैं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय समुद्री मार्गों और क्षेत्रीय सुरक्षा व्यवस्था पर भी असर डाल सकते हैं।

    उधर हूती विद्रोहियों ने भी अपने हालिया बयानों में सऊदी अरब के विभिन्न रणनीतिक ठिकानों को निशाना बनाने की चेतावनी दी है। उनका कहना है कि यदि उनके नियंत्रण वाले क्षेत्रों में हस्तक्षेप जारी रहा तो वे जवाबी कार्रवाई करने से पीछे नहीं हटेंगे। इस बयान के बाद दोनों पक्षों के बीच तनाव और अधिक बढ़ गया है।

    यमन की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त सरकार ने भी पूरे घटनाक्रम पर चिंता व्यक्त की है। सरकार की ओर से आयोजित आपात बैठक में ईरानी विमान की लैंडिंग पर आपत्ति जताते हुए इसे देश की संप्रभुता से जुड़ा मुद्दा बताया गया। साथ ही संयुक्त राष्ट्र और अंतरराष्ट्रीय समुदाय से क्षेत्र में तनाव कम करने तथा हालात को नियंत्रण में रखने के लिए सक्रिय भूमिका निभाने का आग्रह किया गया है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि यह घटनाक्रम केवल यमन तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके व्यापक क्षेत्रीय प्रभाव हो सकते हैं। सऊदी अरब और ईरान लंबे समय से विभिन्न क्षेत्रीय मुद्दों पर अलग-अलग पक्षों का समर्थन करते रहे हैं। ऐसे में यमन में बढ़ता तनाव दोनों देशों के बीच पहले से मौजूद संवेदनशील समीकरणों को और जटिल बना सकता है।

    यमन वर्ष 2015 से लगातार संघर्ष का केंद्र बना हुआ है। लंबे समय से जारी गृहयुद्ध के कारण लाखों लोग विस्थापित हुए हैं और देश गंभीर मानवीय संकट का सामना कर रहा है। संयुक्त राष्ट्र सहित कई अंतरराष्ट्रीय संगठन समय-समय पर संघर्ष विराम और राजनीतिक समाधान की आवश्यकता पर जोर देते रहे हैं, लेकिन स्थायी समाधान अब तक नहीं निकल सका है।

    ताजा घटनाक्रम ने एक बार फिर यह संकेत दिया है कि यदि सभी पक्ष संयम नहीं बरतते, तो यमन में सैन्य टकराव का नया दौर शुरू हो सकता है। फिलहाल पूरे क्षेत्र की नजर सऊदी नेतृत्व वाले गठबंधन, हूती विद्रोहियों और अंतरराष्ट्रीय समुदाय की आगामी रणनीति पर बनी हुई है, क्योंकि किसी भी बड़े कदम का असर पूरे मध्य पूर्व की सुरक्षा और स्थिरता पर पड़ सकता है।

  • ग्वादर में पाकिस्तान सुरक्षा बलों पर बड़ा हमला, BLA ने पैरामिलिट्री कैंप को बनाया निशाना, भारी नुकसान का दावा, आधिकारिक पुष्टि का इंतजार

    ग्वादर में पाकिस्तान सुरक्षा बलों पर बड़ा हमला, BLA ने पैरामिलिट्री कैंप को बनाया निशाना, भारी नुकसान का दावा, आधिकारिक पुष्टि का इंतजार

    नई दिल्ली। पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत में स्थित ग्वादर क्षेत्र एक बार फिर हिंसक घटना के कारण चर्चा में है। यहां पाकिस्तान कोस्ट गार्ड्स के एक सुरक्षा कैंप पर हुए आत्मघाती हमले की जिम्मेदारी प्रतिबंधित संगठन बलोच लिबरेशन आर्मी (BLA) ने ली है। संगठन ने दावा किया है कि इस हमले में पाकिस्तान के अर्धसैनिक बलों के 30 से अधिक जवान मारे गए, जबकि कई अन्य घायल हुए हैं। हालांकि, इन दावों की पाकिस्तान की ओर से आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है।

    BLA की ओर से जारी बयान के अनुसार, विस्फोटकों से लदे एक वाहन का इस्तेमाल कर ग्वादर जिले के जिवानी क्षेत्र स्थित कोस्ट गार्ड्स कैंप को निशाना बनाया गया। संगठन ने इस हमले को आत्मघाती वाहन आधारित विस्फोटक हमले के रूप में वर्णित किया है। बयान में दावा किया गया कि प्रारंभिक विस्फोट के बाद संगठन के सशस्त्र सदस्यों ने कैंप पर आगे की कार्रवाई भी की।

    संगठन का कहना है कि विस्फोट इतना शक्तिशाली था कि सुरक्षा कैंप को भारी क्षति पहुंची। BLA ने दावा किया कि बड़ी संख्या में सुरक्षाकर्मी मारे गए और कई अन्य गंभीर रूप से घायल हुए हैं। साथ ही यह भी कहा गया कि मलबे में दबे लोगों के कारण हताहतों की संख्या बढ़ सकती है। हालांकि इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि फिलहाल उपलब्ध नहीं है।

    हमले के बाद संगठन के मीडिया प्रकोष्ठ की ओर से एक वीडियो भी जारी किए जाने का दावा किया गया है। बताया गया कि वीडियो में विस्फोट से पहले एक वाहन सुरक्षा परिसर की ओर बढ़ता दिखाई देता है, जिसके बाद तेज धमाका होता है। इस वीडियो की प्रामाणिकता की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हो सकी है और आधिकारिक एजेंसियों ने भी इस संबंध में कोई पुष्टि नहीं की है।

    दूसरी ओर, पाकिस्तान सरकार और सुरक्षा एजेंसियों की ओर से घटना को लेकर विस्तृत आधिकारिक बयान जारी नहीं किया गया है। न ही अब तक BLA द्वारा किए गए हताहतों के दावे की पुष्टि की गई है। ऐसे मामलों में प्रारंभिक दावों और वास्तविक स्थिति के बीच अंतर हो सकता है, इसलिए आधिकारिक जांच और पुष्टि का इंतजार किया जा रहा है।

    बलूचिस्तान लंबे समय से सुरक्षा चुनौतियों का सामना करता रहा है। इस क्षेत्र में सक्रिय प्रतिबंधित उग्रवादी संगठनों द्वारा समय-समय पर सुरक्षा प्रतिष्ठानों, सरकारी संस्थानों और बुनियादी ढांचे को निशाना बनाए जाने की घटनाएं सामने आती रही हैं। ग्वादर का रणनीतिक महत्व और वहां चल रही विकास परियोजनाओं के कारण यह क्षेत्र सुरक्षा की दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील माना जाता है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस हमले में बड़े पैमाने पर नुकसान की पुष्टि होती है तो इससे क्षेत्र की सुरक्षा व्यवस्था और आतंकवाद-रोधी रणनीति को लेकर नए सिरे से समीक्षा की आवश्यकता पड़ सकती है। फिलहाल सभी की नजर पाकिस्तान की आधिकारिक जांच और सुरक्षा एजेंसियों की विस्तृत रिपोर्ट पर बनी हुई है, जिससे घटना की वास्तविक परिस्थितियों और हताहतों की सही संख्या स्पष्ट हो सकेगी।

  • ईरानी प्रतिनिधिमंडल को निशाना बनाने की साजिश के दावे पर बढ़ा विवाद, न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट को इजरायल ने बताया पूरी तरह निराधार

    ईरानी प्रतिनिधिमंडल को निशाना बनाने की साजिश के दावे पर बढ़ा विवाद, न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट को इजरायल ने बताया पूरी तरह निराधार


    नई दिल्ली ।
    इजरायल और अमेरिकी समाचार पत्र के बीच एक रिपोर्ट को लेकर नया विवाद सामने आया है। रिपोर्ट में दावा किया गया कि अमेरिकी अधिकारियों ने ईरान को उन संभावित खतरों के बारे में आगाह किया था, जिनमें परमाणु वार्ता में शामिल ईरानी प्रतिनिधियों को इजरायल द्वारा निशाना बनाए जाने की आशंका जताई गई थी। हालांकि इजरायल ने इन दावों को पूरी तरह खारिज करते हुए उन्हें तथ्यहीन और मनगढ़ंत करार दिया है।

    रिपोर्ट में दावा किया गया कि अप्रैल के दौरान अमेरिकी अधिकारियों ने तेहरान को चेतावनी दी थी कि ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची और संसद अध्यक्ष मोहम्मद बाघेर गालिबाफ संभावित सुरक्षा खतरे का सामना कर सकते हैं। दोनों नेता उस समय परमाणु वार्ता से जुड़े महत्वपूर्ण प्रतिनिधिमंडल का हिस्सा बताए गए थे। रिपोर्ट के अनुसार, वाशिंगटन को आशंका थी कि क्षेत्रीय तनाव के बीच इन नेताओं की सुरक्षा प्रभावित हो सकती है।

    इजरायल के प्रधानमंत्री कार्यालय ने इन दावों का तत्काल खंडन किया। आधिकारिक बयान में कहा गया कि प्रकाशित रिपोर्ट वास्तविक तथ्यों पर आधारित नहीं है और इसमें लगाए गए सभी आरोप पूरी तरह निराधार हैं। सरकार का कहना है कि इस प्रकार की खबरें तथ्यों से परे हैं और इन्हें बिना पर्याप्त आधार के प्रकाशित किया गया है।

    दूसरी ओर संबंधित अमेरिकी समाचार संस्थान ने अपनी रिपोर्ट का बचाव किया है। संस्थान का कहना है कि रिपोर्ट वर्तमान और पूर्व अमेरिकी अधिकारियों से प्राप्त जानकारी पर आधारित है तथा प्रकाशन से पहले संबंधित पक्षों से प्रतिक्रिया लेने का प्रयास भी किया गया था। समाचार पत्र ने यह भी कहा कि रिपोर्ट प्रकाशित होने से पहले इजरायल की ओर से कोई आधिकारिक टिप्पणी उपलब्ध नहीं कराई गई थी।

    रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया कि कुछ अमेरिकी अधिकारियों का मानना था कि संघर्षविराम के बाद इजरायल कथित रूप से ईरानी नेतृत्व के कुछ प्रमुख चेहरों को संभावित लक्ष्य के रूप में देख रहा था। इसी संदर्भ में संसद अध्यक्ष गालिबाफ के यात्रा कार्यक्रम को लेकर भी सुरक्षा संबंधी चिंताओं का उल्लेख किया गया। हालांकि इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है और न ही किसी आधिकारिक एजेंसी ने इन्हें प्रमाणित किया है।

    रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया कि गालिबाफ की वापसी यात्रा के दौरान संभावित खतरे की सूचना मिलने के बाद उनके विमान ने मार्ग में आपात स्थिति के तहत लैंडिंग की थी। हालांकि इस घटनाक्रम के संबंध में भी संबंधित पक्षों की ओर से कोई आधिकारिक पुष्टि सामने नहीं आई है। इसलिए इन दावों को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं है।

    इजरायल और ईरान के बीच लंबे समय से जारी तनाव तथा परमाणु कार्यक्रम को लेकर चल रही अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक गतिविधियों के बीच इस तरह की रिपोर्टों ने नई बहस को जन्म दिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे संवेदनशील मामलों में आधिकारिक पुष्टि और विश्वसनीय तथ्यों का विशेष महत्व होता है। फिलहाल दोनों पक्ष अपने-अपने रुख पर कायम हैं। एक ओर इजरायल ने रिपोर्ट को पूरी तरह खारिज किया है, वहीं अमेरिकी समाचार संस्थान अपनी रिपोर्टिंग को तथ्य-आधारित बताते हुए उस पर कायम रहने की बात कह रहा है।

  • बांग्लादेश की तीस्ता परियोजना में चीन की बढ़ती भूमिका पर भारत सतर्क, विदेश मंत्रालय बोला- हर घटनाक्रम पर है पैनी नजर

    बांग्लादेश की तीस्ता परियोजना में चीन की बढ़ती भूमिका पर भारत सतर्क, विदेश मंत्रालय बोला- हर घटनाक्रम पर है पैनी नजर

    नई दिल्ली । बांग्लादेश में तीस्ता नदी प्रबंधन एवं पुनर्स्थापन परियोजना और चीन-बांग्लादेश-म्यांमार आर्थिक गलियारे (CBMEC) को लेकर चीन की बढ़ती सक्रियता पर भारत ने सतर्क प्रतिक्रिया दी है। विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि भारत अपने पड़ोसी देशों में होने वाले सभी महत्वपूर्ण घटनाक्रमों पर लगातार नजर बनाए हुए है और आवश्यकता पड़ने पर अपने हितों के अनुरूप उचित कदम उठाएगा। इस बयान को क्षेत्रीय रणनीतिक गतिविधियों के बीच भारत की सतर्क कूटनीतिक नीति के रूप में देखा जा रहा है।

    हाल के दिनों में बांग्लादेश और चीन के बीच रणनीतिक सहयोग में तेजी आई है। दोनों देशों ने तीस्ता नदी प्रबंधन एवं पुनर्स्थापन परियोजना पर सहयोग बढ़ाने की सहमति जताई है। इसके साथ ही चीन ने चीन-बांग्लादेश-म्यांमार आर्थिक गलियारे को आगे बढ़ाने की अपनी प्रतिबद्धता भी दोहराई है। इन दोनों परियोजनाओं को क्षेत्रीय संपर्क, आधारभूत ढांचे और आर्थिक सहयोग के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    भारत के विदेश मंत्रालय ने इस पूरे घटनाक्रम पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि पड़ोसी देशों में होने वाली सभी महत्वपूर्ण गतिविधियों पर लगातार निगरानी रखी जाती है। मंत्रालय ने यह भी स्पष्ट किया कि भारत अपने राष्ट्रीय हितों और क्षेत्रीय परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए समय आने पर आवश्यक निर्णय लेगा। हालांकि सरकार ने संभावित कदमों या रणनीति के बारे में कोई विस्तृत जानकारी साझा नहीं की।

    विदेश मंत्रालय ने यह भी दोहराया कि भारत और बांग्लादेश के बीच विकास सहयोग से जुड़े कार्यक्रम दोनों देशों की आपसी सहमति और निर्धारित रोडमैप के आधार पर संचालित होते हैं। सरकार का कहना है कि इन परियोजनाओं की समय-समय पर समीक्षा की जाती है और तीस्ता परियोजना को लेकर भारत पहले ही अपना पक्ष बांग्लादेश के समक्ष रख चुका है। भविष्य के सभी निर्णय क्षेत्रीय परिस्थितियों और राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखकर लिए जाएंगे।

    विशेषज्ञों का मानना है कि चीन की इन परियोजनाओं में बढ़ती भागीदारी का रणनीतिक महत्व भी है। यदि चीन-बांग्लादेश-म्यांमार आर्थिक गलियारा आगे बढ़ता है तो चीन की क्षेत्रीय संपर्क क्षमता और बंगाल की खाड़ी तक पहुंच मजबूत हो सकती है। इसके अलावा तीस्ता नदी परियोजना में चीनी तकनीकी विशेषज्ञों की भागीदारी को भी भारत रणनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण मान रहा है, क्योंकि यह इलाका भारत के पूर्वोत्तर क्षेत्र से जुड़े संवेदनशील भूभाग के निकट स्थित है।

    बांग्लादेश की सरकार ने हाल के महीनों में नदी प्रबंधन और जल संसाधन विकास से संबंधित योजनाओं के लिए चीन से तकनीकी सहयोग की मांग की है। इसके तहत चीनी विशेषज्ञों द्वारा परियोजना की व्यवहार्यता का अध्ययन भी किया जा चुका है। दोनों देशों के बीच इस सहयोग को भविष्य में और विस्तार मिलने की संभावना जताई जा रही है।

    भारत पहले भी तीस्ता नदी के संरक्षण और प्रबंधन में सहयोग की इच्छा जता चुका है। दोनों देशों के बीच साझा नदियों के प्रबंधन को लेकर लंबे समय से संवाद चलता रहा है। हालांकि तीस्ता नदी के जल बंटवारे पर अब तक कोई औपचारिक समझौता नहीं हो सका है। ऐसे में चीन की बढ़ती भागीदारी के बीच भारत की सतर्क कूटनीतिक निगरानी आने वाले समय में इस पूरे क्षेत्रीय घटनाक्रम का महत्वपूर्ण पहलू बनी रहेगी।

  • अयातुल्ला अली खामेनेई को अंतिम विदाई में उमड़ा जनसैलाब, गालिबाफ और अराघची हुए भावुक, ईरान में छह दिवसीय श्रद्धांजलि कार्यक्रम शुरू

    अयातुल्ला अली खामेनेई को अंतिम विदाई में उमड़ा जनसैलाब, गालिबाफ और अराघची हुए भावुक, ईरान में छह दिवसीय श्रद्धांजलि कार्यक्रम शुरू

    नई दिल्ली । ईरान के दिवंगत सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई को अंतिम विदाई देने के लिए देशभर में श्रद्धांजलि कार्यक्रमों का सिलसिला शुरू हो गया है। राजधानी तेहरान में आयोजित मुख्य समारोह के दौरान बड़ी संख्या में लोग अंतिम दर्शन के लिए पहुंचे। इस अवसर पर ईरान के शीर्ष राजनीतिक और सरकारी नेतृत्व की मौजूदगी रही, जबकि कई वरिष्ठ नेता भावुक दिखाई दिए। समारोह से जुड़े वीडियो और तस्वीरें सोशल मीडिया पर भी तेजी से साझा की जा रही हैं।

    तेहरान के ग्रैंड मोसल्ला धार्मिक परिसर में आयोजित श्रद्धांजलि कार्यक्रम में संसद अध्यक्ष मोहम्मद बाघेर गालिबाफ, विदेश मंत्री सैयद अब्बास अराघची तथा सरकार और सैन्य प्रतिष्ठान के कई वरिष्ठ अधिकारी मौजूद रहे। अंतिम प्रार्थना के दौरान गालिबाफ की आंखों में आंसू दिखाई दिए, जबकि अराघची भी श्रद्धांजलि अर्पित करते समय भावुक नजर आए। दोनों नेताओं की भावनात्मक प्रतिक्रिया समारोह का प्रमुख केंद्र बन गई।

    श्रद्धांजलि सभा के दौरान खामेनेई का ताबूत ईरान के राष्ट्रीय ध्वज के रंगों से ढका हुआ रखा गया। बड़ी संख्या में नागरिकों ने अंतिम दर्शन कर उन्हें श्रद्धांजलि दी। धार्मिक अनुष्ठानों के बीच लोगों ने उनके सम्मान में प्रार्थनाएं कीं और देशभर से आए समर्थकों ने उन्हें अंतिम विदाई दी। पूरे परिसर में सुरक्षा व्यवस्था बेहद कड़ी रखी गई ताकि कार्यक्रम शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न हो सके।

    ईरानी नेतृत्व ने नागरिकों से बड़ी संख्या में श्रद्धांजलि कार्यक्रमों में शामिल होने की अपील की है। अधिकारियों का कहना है कि छह दिनों तक चलने वाले अंतिम संस्कार और श्रद्धांजलि कार्यक्रमों में करोड़ों लोगों के शामिल होने की संभावना है। इसी को देखते हुए राजधानी तेहरान और आसपास के क्षेत्रों में अतिरिक्त सुरक्षा बलों की तैनाती की गई है तथा संवेदनशील स्थानों पर विशेष निगरानी रखी जा रही है।

    खामेनेई के अंतिम संस्कार की प्रक्रिया कई चरणों में पूरी की जाएगी। तेहरान में मुख्य श्रद्धांजलि कार्यक्रम के बाद अंतिम यात्रा राजधानी की प्रमुख सड़कों से निकलेगी। इसके बाद पवित्र शहर कोम में भी श्रद्धांजलि कार्यक्रम आयोजित होगा, जहां बड़ी संख्या में धार्मिक विद्वानों और श्रद्धालुओं के पहुंचने की संभावना है। अंतिम चरण में उनका पार्थिव शरीर मशहद ले जाया जाएगा, जिसे उनका पैतृक शहर माना जाता है।

    मशहद में धार्मिक परंपराओं के अनुसार अंतिम संस्कार की प्रक्रिया पूरी की जाएगी। इसके साथ ही पड़ोसी देश इराक के नजफ और कर्बला जैसे प्रमुख शिया धार्मिक केंद्रों में भी विशेष प्रार्थना सभाओं और श्रद्धांजलि कार्यक्रमों की तैयारी की गई है। विभिन्न देशों के शिया समुदायों द्वारा भी अलग-अलग स्थानों पर श्रद्धांजलि कार्यक्रम आयोजित किए जाने की जानकारी सामने आई है।

    गौरतलब है कि अयातुल्ला अली खामेनेई का निधन हालिया क्षेत्रीय सैन्य संघर्ष के दौरान हुए हमलों में हुआ था। उनके निधन के बाद मध्य पूर्व की राजनीतिक और सामरिक परिस्थितियों पर व्यापक असर देखा गया। अब अंतिम संस्कार कार्यक्रमों के बीच दुनिया की नजर ईरान के अगले राजनीतिक कदमों और क्षेत्रीय घटनाक्रम पर भी बनी हुई है। फिलहाल देश में शोक का माहौल है और लाखों लोग अपने लंबे समय तक सर्वोच्च नेतृत्व संभालने वाले नेता को अंतिम विदाई देने के लिए श्रद्धांजलि कार्यक्रमों में शामिल हो रहे हैं।

  • लाहौर गैंगरेप मामले में बड़ा खुलासा, दो विदेशी महिलाओं से दुष्कर्म के आरोप में उप प्रधानमंत्री इशाक डार के रिश्तेदार सहित चार गिरफ्तार

    लाहौर गैंगरेप मामले में बड़ा खुलासा, दो विदेशी महिलाओं से दुष्कर्म के आरोप में उप प्रधानमंत्री इशाक डार के रिश्तेदार सहित चार गिरफ्तार

    नई दिल्ली । पाकिस्तान के लाहौर में दो विदेशी महिलाओं के कथित अपहरण, सामूहिक दुष्कर्म और फिरौती से जुड़े मामले ने राजनीतिक और प्रशासनिक स्तर पर गंभीर हलचल पैदा कर दी है। पुलिस ने इस मामले में चार आरोपियों को गिरफ्तार किया है, जिनमें पाकिस्तान के उप प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री इशाक डार का एक रिश्तेदार भी शामिल बताया जा रहा है। मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए अदालत ने सभी आरोपियों को पांच दिन की पुलिस रिमांड पर भेज दिया है, जबकि जांच एजेंसियां पूरे घटनाक्रम की विस्तृत पड़ताल कर रही हैं।

    पुलिस के अनुसार, पीड़ित महिलाओं में एक नीदरलैंड और दूसरी वेनेजुएला की नागरिक हैं। आरोप है कि 29 जून को लाहौर में दोनों महिलाओं का अपहरण कर उनके साथ सामूहिक दुष्कर्म किया गया। मामले का खुलासा तब हुआ जब स्पेन से प्राप्त एक आपातकालीन सूचना के आधार पर सुरक्षा एजेंसियों ने कार्रवाई करते हुए महिलाओं का पता लगाया और उन्हें सुरक्षित बाहर निकाला।

    जांच के दौरान पुलिस ने चार संदिग्धों को हिरासत में लिया। इनमें अहमद रजा डार, सिकंदर अजीज खान, हसन रजा और साजिद अली शामिल हैं। जांच अधिकारियों के अनुसार अहमद रजा डार को मामले का मुख्य आरोपी माना जा रहा है। चूंकि आरोपी का संबंध देश के उप प्रधानमंत्री के परिवार से बताया जा रहा है, इसलिए पूरे मामले पर राष्ट्रीय स्तर पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है।

    मामले की गंभीरता को देखते हुए पुलिस प्रशासन पर भी कार्रवाई की गई है। प्राथमिकी दर्ज करने वाले संबंधित थाना प्रभारी सहित दो अन्य पुलिस अधिकारियों को निलंबित कर दिया गया है। प्रशासनिक अधिकारियों का कहना है कि जांच प्रक्रिया में किसी भी प्रकार की लापरवाही या अनियमितता को स्वीकार नहीं किया जाएगा और सभी जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका की भी समीक्षा की जाएगी।

    जांच एजेंसियों का कहना है कि मामले के प्रत्येक पहलू की निष्पक्ष और गहन जांच की जा रही है। पुलिस आरोपियों से पूछताछ कर घटनाक्रम, कथित अपहरण, अपराध की परिस्थितियों और संभावित अन्य सहयोगियों के बारे में जानकारी जुटा रही है। साथ ही उपलब्ध डिजिटल साक्ष्यों, कॉल रिकॉर्ड, घटनास्थल से मिले प्रमाणों और अन्य तकनीकी साक्ष्यों का भी विश्लेषण किया जा रहा है।

    यह मामला इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि आरोपी का संबंध देश के एक वरिष्ठ राजनीतिक परिवार से बताया जा रहा है। ऐसे मामलों में निष्पक्ष जांच और कानूनी प्रक्रिया को लेकर सार्वजनिक निगरानी बढ़ जाती है। प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि जांच कानून के दायरे में रहकर की जाएगी और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर आगे की कार्रवाई की जाएगी।

    फिलहाल सभी आरोपी पुलिस हिरासत में हैं और जांच जारी है। अदालत द्वारा दी गई रिमांड अवधि के दौरान पुलिस साक्ष्य जुटाने, पीड़िताओं के बयान, फॉरेंसिक रिपोर्ट और अन्य उपलब्ध तथ्यों के आधार पर मामले को आगे बढ़ाएगी। इस बीच संबंधित प्रशासनिक और सुरक्षा एजेंसियां भी पूरे घटनाक्रम की निगरानी कर रही हैं ताकि जांच निष्पक्ष, पारदर्शी और कानूनी प्रक्रिया के अनुरूप पूरी की जा सके।

  • कैम्ब्रिजशायर में मंदिर के लिए हिंदूओं को नहीं दी जमीन, चर्च और मुस्लिम ग्रुप को कर दिया आवंटन

    कैम्ब्रिजशायर में मंदिर के लिए हिंदूओं को नहीं दी जमीन, चर्च और मुस्लिम ग्रुप को कर दिया आवंटन


    नई दिल्‍ली । ब्रिटेन के कैम्ब्रिजशायर स्थित नए शहर नॉर्थस्टोव में अपना पहला पूजा स्थल बनाने की कोशिश कर रहे ब्रिटिश हिंदुओं को तगड़ा झटका लगा है। स्थानीय काउंसिल ने एक जमीन के टुकड़े को हिंदू चैरिटी को देने के बजाय एक चर्च और मुस्लिम ग्रुप को आवंटित कर दिया है। यह फैसला सामने आने के बाद इलाके में रहने वाले करीब 150 हिंदू परिवारों में काफी निराशा है।

    क्या है पूरा मामला?
    साउथ कैम्ब्रिजशायर डिस्ट्रिक्ट काउंसिल ने 0.25 हेक्टेयर जमीन को 999 साल के लिए ‘नॉर्थस्टोव चर्च नेटवर्क’ (NCN) को लीज पर दे दिया है। इसके लिए उन्हें सिर्फ नाममात्र का किराया चुकाना होगा।

    एक रिपोर्ट के मुताबिक, स्थानीय निवासियों द्वारा बनाए गए ‘हिंदू समाज नॉर्थस्टोव’ (HSN) ने भी इस जमीन के लिए बोली लगाई थी। उन्होंने यहां एक मंदिर के साथ-साथ ‘सर्वधर्म’ और वेलबीइंग सेंटर बनाने का प्रस्ताव रखा था। हालांकि, बोलियों का आकलन करने वाले काउंसिल के अधिकारियों ने HSN के प्रस्ताव को 65% और NCN के प्रस्ताव को 81% अंक दिए, जिसके कारण जमीन चर्च नेटवर्क को मिल गई।

    मुस्लिम ग्रुप कैसे बना हिस्सेदार?
    नॉर्थस्टोव चर्च नेटवर्क (NCN) के प्रस्ताव में नॉर्थस्टोव के मुसलमानों को मुख्य किरायेदार (एंकर टेनेंट) के रूप में शामिल किया गया था। इस प्रस्ताव में उनके लिए एक अलग इस्लामिक प्रार्थना कक्ष और शिक्षा केंद्र बनाने की बात शामिल है। नॉर्थस्टोव मुस्लिम ग्रुप के अध्यक्ष नवाश ने बताया कि शहर में लगभग 200 मुस्लिम हैं, जिन्हें दिन में पांच बार नमाज पढ़ने के लिए एक स्थायी जगह की जरूरत थी, क्योंकि कम्युनिटी स्पेस इतने लंबे समय तक खुले नहीं रहते। यही वजह है कि उन्होंने एंकर टेनेंट के तौर पर आवेदन किया था। वहीं, NCN के प्रवक्ता का कहना है कि स्थानीय समुदायों और आस्था समूहों को भी जगह किराए पर लेने की अनुमति दी जाएगी।

    हिंदू परिवारों की क्या है परेशानी?
    कैम्ब्रिजशायर में कई चर्च और मस्जिदें हैं, लेकिन एक भी हिंदू मंदिर नहीं है। हिंदुओं को पूजा करने के लिए दो घंटे का सफर तय करके बर्मिंघम या वेम्बली जाना पड़ता है। वे रात भर के लिए कम्युनिटी स्पेस किराए पर नहीं ले सकते, जिससे गणपति जैसे त्योहार मनाना मुश्किल हो जाता है। हालात ये हैं कि भगवान की मूर्तियों को कैरी बैग में रखकर गैराज में रखना पड़ता है। जगह-जगह ले जाने के कारण कई मूर्तियां खंडित भी हो गई हैं।

    उत्तर प्रदेश के कानपुर से यूके गए अभिषेक श्रीवास्तव कहते हैं कि उन्हें कभी-कभी लगता है कि यूके आकर उन्होंने गलती कर दी, क्योंकि उनके 9 और 12 साल के बच्चे हिंदू त्योहारों में हिस्सा नहीं ले पाते। वहीं, 16 साल की इवा का कहना है कि उसने कभी रात भर शिवरात्रि नहीं मनाई और न ही कभी ‘हवन’ देखा है। वह कहती हैं, “मैं अक्सर भारत में अपने चचेरे भाई-बहनों को त्योहार मनाते देखती हूं। मेरी पीढ़ी यहां अपनी जड़ों, संस्कृति और विरासत से पूरी तरह अलग हो रही है।”

    हिंदू चैरिटी ने उठाए प्रक्रिया पर सवाल
    HSN की अध्यक्ष अपर्णा निगम-सक्सेना ने फैसले पर निराशा जताते हुए पारदर्शिता पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि वे इस फैसले के खिलाफ अपील करने पर विचार कर रहे हैं। दरअसल, ‘वित्तीय ट्रैक रिकॉर्ड’ की कमी सहित कई कारणों से HSN की बोली के अंक काट लिए गए थे। अपर्णा ने कहा कि उन्हें पता ही नहीं था कि यह एक महत्वपूर्ण कारक है। अगर काउंसिल को आर्किटेक्ट से तैयार कोटेशन चाहिए थे, तो उन्हें इसके लिए दिशानिर्देश देने चाहिए थे।

    दूसरी ओर, काउंसिलर डॉ. लिसा रेड्रुप ने फैसले का बचाव करते हुए कहा, “बोलियों का आकलन स्पष्ट मानदंडों के आधार पर किया गया था, जो सभी के लिए उपलब्ध थे। आवेदकों को अपने प्रोजेक्ट की जरूरत और अपनी धार्मिक प्रथाओं से जुड़ी बातों को स्पष्ट करना था।”

  • पाक के बलूचिस्तान में कोस्ट गार्ड कैंप पर बड़ा हमला, 30 से अधिक सुरक्षाकर्मी मारे जाने का BLA का दावा

    पाक के बलूचिस्तान में कोस्ट गार्ड कैंप पर बड़ा हमला, 30 से अधिक सुरक्षाकर्मी मारे जाने का BLA का दावा


    नई दिल्ली। पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत में सुरक्षा बलों पर बड़े हमले का दावा किया गया है। प्रतिबंधित संगठन बलूच लिबरेशन आर्मी (BLA) ने कहा है कि उसके लड़ाकों ने ग्वादर जिले के जीवानी क्षेत्र में स्थित पाकिस्तान कोस्ट गार्ड्स के एक कैंप को निशाना बनाते हुए आत्मघाती हमला किया। संगठन के अनुसार, इस हमले में 30 से अधिक सुरक्षाकर्मियों की मौत हुई है, जबकि कई अन्य घायल हुए हैं।

    यह दावा द बलूचिस्तान पोस्ट की एक रिपोर्ट में सामने आया है। हालांकि, पाकिस्तानी अधिकारियों ने अब तक हमले या हताहतों की संख्या की आधिकारिक पुष्टि नहीं की है। ऐसे में इन दावों का स्वतंत्र रूप से सत्यापन नहीं हो सका है।

    BLA के प्रवक्ता जीयंद बलोच के नाम से जारी बयान में कहा गया है कि हमले को संगठन की विशेष इकाई माजिद ब्रिगेड ने अंजाम दिया। बयान के मुताबिक, जीवानी के पनवान इलाके में स्थित पाकिस्तान कोस्ट गार्ड्स की एक सुविधा पर पहले घुसपैठ की गई और उसके बाद आत्मघाती हमला किया गया।

    ग्वादर जिला रणनीतिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है, क्योंकि यहां चीन के सहयोग से विकसित किया जा रहा प्रमुख बंदरगाह परियोजना संचालित हो रही है। BLA ने इस कार्रवाई को अपने लंबे अभियान का हिस्सा बताते हुए इसे ‘फिदायीन’ हमला करार दिया है।

    बलूच लिबरेशन आर्मी पिछले कई वर्षों से बलूचिस्तान में पाकिस्तानी सेना, अर्धसैनिक बलों और सरकारी प्रतिष्ठानों को निशाना बनाती रही है। हाल के समय में क्षेत्र में उग्रवादी गतिविधियों में तेजी देखी गई है, जहां सुरक्षा बलों, बुनियादी ढांचा परियोजनाओं और सरकारी संस्थानों पर लगातार हमले किए गए हैं। संगठन लंबे समय से बलूचिस्तान के लिए अधिक स्वायत्तता और प्राकृतिक संसाधनों पर स्थानीय नियंत्रण की मांग करता रहा है।

    BLA को पाकिस्तान सहित कई देशों ने आतंकी संगठन घोषित किया हुआ है। यह संगठन पहले भी बलूचिस्तान में सुरक्षा प्रतिष्ठानों पर कई बड़े हमलों और आत्मघाती विस्फोटों को अंजाम दे चुका है। फिलहाल इस ताजा हमले और हताहतों की संख्या को लेकर पाकिस्तान की ओर से कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया गया है।

  • होर्मुज की सुरक्षा पर फ्रांस का बड़ा कदम, माइनहंटर युद्धपोत तैनात, ब्रिटेन-ओमान के साथ मिलकर संभालेगा मोर्चा

    होर्मुज की सुरक्षा पर फ्रांस का बड़ा कदम, माइनहंटर युद्धपोत तैनात, ब्रिटेन-ओमान के साथ मिलकर संभालेगा मोर्चा


    नई दिल्ली। पश्चिम एशिया में हालिया कूटनीतिक घटनाक्रम के बीच होर्मुज जलडमरूमध्य में सुरक्षित समुद्री आवागमन सुनिश्चित करने के लिए फ्रांस ने बड़ा कदम उठाया है। फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने जानकारी दी कि उनके देश ने क्षेत्र में बारूदी सुरंगों को निष्क्रिय करने वाले विशेष युद्धपोत (माइन काउंटरमेजर्स) तैनात किए हैं। साथ ही ब्रिटेन और फ्रांस ने ओमान के सहयोग से इस महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग की सुरक्षा सुनिश्चित करने और आवश्यकता पड़ने पर बहुराष्ट्रीय मिशन तैनात करने की प्रतिबद्धता जताई है।

    राष्ट्रपति मैक्रों ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर बताया कि फ्रांस ने पश्चिम एशिया में दो माइनहंटर जहाज भेजे हैं। इनके साथ दो फ्रिगेट और एक मैरीटाइम पेट्रोल एयरक्राफ्ट भी तैनात किया गया है। उन्होंने कहा कि ये सभी संसाधन सहयोगी देशों के साथ मिलकर होर्मुज जलडमरूमध्य में सुरक्षित नौवहन बहाल करने और समुद्री यातायात की सुरक्षा मजबूत करने का काम करेंगे।

    मैक्रों के अनुसार, 17 जून को अमेरिका और ईरान के बीच हुए समझौता ज्ञापन को क्षेत्रीय स्थिरता की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। उनका कहना है कि इस समझौते से होर्मुज जलडमरूमध्य में नौवहन की स्वतंत्रता को मजबूती मिली है।

    फ्रांसीसी राष्ट्रपति ने बताया कि ओमान के सुल्तान हैथम बिन तारिक अल सईद से बातचीत के बाद फ्रांस ने अपनी सैन्य तैनाती में बदलाव किया है। इसके तहत एयरक्राफ्ट कैरियर शार्ल द गॉल को उसके होम पोर्ट टूलों वापस भेजा जा रहा है, जबकि माइन काउंटरमेजर्स जहाज और उनके साथ मौजूद सुरक्षा बल क्षेत्र में तैनात रहेंगे तथा जरूरत पड़ने पर तत्काल कार्रवाई के लिए तैयार रहेंगे।

    उधर, ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर और राष्ट्रपति मैक्रों ने शुक्रवार को जारी संयुक्त बयान में कहा कि होर्मुज जलडमरूमध्य वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग है और यहां सभी देशों के जहाजों की सुरक्षित आवाजाही पूरी दुनिया के हित से जुड़ा विषय है।

    संयुक्त बयान के अनुसार, ओमान ने अपने समुद्री क्षेत्र की सुरक्षा मजबूत करने के लिए ब्रिटेन और फ्रांस के साथ मिलकर काम करने पर सहमति जताई है। दोनों देशों ने यह भी दोहराया कि वे क्षेत्रीय स्थिरता, सभी देशों की संप्रभुता के सम्मान और अंतरराष्ट्रीय कानून के पालन के प्रति पूरी तरह प्रतिबद्ध हैं।