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  • फ्रांस में शांतिपूर्ण प्रदर्शनों के बीच कौन फैला रहा हिंसा, नकाबपोश 'कैसर्स' की भूमिका से बढ़ी सुरक्षा एजेंसियों की चिंता

    फ्रांस में शांतिपूर्ण प्रदर्शनों के बीच कौन फैला रहा हिंसा, नकाबपोश 'कैसर्स' की भूमिका से बढ़ी सुरक्षा एजेंसियों की चिंता

    नई दिल्ली ।फ्रांस में महंगाई, आर्थिक असमानता और सरकारी नीतियों के खिलाफ जारी विरोध प्रदर्शन अब हिंसक घटनाओं के कारण चर्चा में हैं। लगातार तीसरे सप्ताहांत हजारों लोग सड़कों पर उतरे। देश के अधिकांश हिस्सों में प्रदर्शन शांतिपूर्ण रहे, लेकिन 31 अक्टूबर को रैलियां समाप्त होने के दौरान पेरिस सहित कई शहरों में नकाबपोश लोगों के समूहों की पुलिस से झड़प हो गई। इन घटनाओं के बाद सवाल उठने लगा है कि शांतिपूर्ण प्रदर्शनों के बीच हिंसा फैलाने वाले ये लोग कौन हैं और उनका विरोध करने का तरीका क्या है?

    फ्रांस में ऐसे उपद्रवियों के लिए ‘कैसर्स’ शब्द इस्तेमाल किया जाता है। फ्रांसीसी भाषा में इसका अर्थ तोड़फोड़ करने वाले होता है। ये किसी एक पंजीकृत संगठन या राजनीतिक दल के सदस्य नहीं हैं, बल्कि अलग-अलग छोटे समूहों में सक्रिय रहते हैं। प्रदर्शन के दौरान इनकी गतिविधियों में सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाना, पुलिस से भिड़ना और सरकारी व्यवस्था के खिलाफ हिंसक कार्रवाई करना शामिल बताया जाता है।

    इन समूहों में अक्सर युवा और कट्टर वामपंथी विचारधारा से जुड़े कार्यकर्ताओं की मौजूदगी बताई जाती है। इन्हें कई बार अल्ट्रा-लेफ्ट समूहों के रूप में भी पहचाना जाता है। हालांकि, इनका कोई केंद्रीय नेतृत्व या साझा सदस्यता व्यवस्था सामने नहीं आई है। अलग-अलग समूहों में सक्रिय रहने के कारण इनकी पहचान और संगठनात्मक ढांचे का पता लगाना सुरक्षा एजेंसियों के लिए चुनौती बना रहता है।

    कैसर्स आमतौर पर बड़े प्रदर्शनों के दौरान रैलियों के किनारे या उनके अंतिम पड़ाव पर सक्रिय होते हैं। शांतिपूर्ण तरीके से अपनी मांग रखने के बजाय ये पुलिस के साथ टकराव और तोड़फोड़ की घटनाओं में शामिल होते हैं। पहचान छिपाने के लिए नकाब, चश्मे और काले कपड़ों का इस्तेमाल करते हैं। कुछ घटनाओं में इनके पास हथौड़े और आतिशबाजी से जुड़ी सामग्री भी देखी गई है। बैंकों, रियल एस्टेट कार्यालयों और बड़े कारोबारी प्रतिष्ठानों को निशाना बनाने की घटनाएं भी इनके विरोध के तरीकों में शामिल बताई जाती हैं।

    31 अक्टूबर को फ्रांस के विभिन्न शहरों में करीब 3.20 लाख लोग प्रदर्शन में शामिल हुए। इनमें लगभग 70 हजार लोग अकेले पेरिस में सड़कों पर उतरे थे। अधिकांश रैलियां शांतिपूर्ण रहीं, लेकिन राजधानी में पोर्टे डी शारांटों के आसपास स्थिति बिगड़ गई। काले कपड़े पहने दर्जनों नकाबपोश लोगों ने हथौड़ों से सड़क के पत्थर उखाड़कर पुलिस पर फेंके। सुरक्षा बलों पर एक आग लगाने वाला उपकरण भी फेंका गया। जवाब में पुलिस ने आंसू गैस, स्टन ग्रेनेड और लाठीचार्ज का इस्तेमाल किया।

    पुलिस अधिकारियों के अनुसार, कुछ सौ उपद्रवियों का एक समूह लगातार सुरक्षा बलों पर हमले कर रहा था। पेरिस में 400 से 800 कट्टर वामपंथी कार्यकर्ताओं की मौजूदगी का अनुमान लगाया गया था। हालांकि, यह अनुमानित संख्या थी और इससे सभी उपद्रवियों की प्रमाणित पहचान नहीं होती।

    इस बार हैलोवीन के त्योहार ने भी सुरक्षा व्यवस्था को चुनौती दी। कई प्रदर्शनकारी स्पाइडरमैन और फ्रैंकेंस्टाइन जैसे किरदारों की पोशाक पहनकर पहुंचे। कुछ लोगों ने हैलोवीन के मुखौटों से चेहरे ढके। गृह मंत्री लॉरां नूनेज ने चेतावनी दी थी कि पहचान छिपाने के लिए चेहरा ढकने वालों पर जुर्माना लगाया जा सकता है। सोशल मीडिया पर हैलोवीन की रात क्रांति शुरू करने की अपील वाले संदेश भी सामने आए थे।

    इन घटनाओं के बीच कैसर्स को अप्रवासी समुदाय से जोड़ने की कोशिशों पर भी सवाल उठे हैं। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, इन हिंसक समूहों को सीधे अप्रवासी समुदाय से जोड़ने का कोई ठोस आधार नहीं है। इनमें फ्रांसीसी नागरिकों और कट्टर वामपंथी विचारधारा से जुड़े युवाओं की भी बड़ी संख्या बताई गई है।

    दरअसल, मौजूदा आंदोलन की शुरुआत महंगाई, बढ़ती जीवनयापन लागत, आर्थिक असमानता और सार्वजनिक सेवाओं की स्थिति के विरोध में हुई थी। इसमें छात्र, ट्रेड यूनियन और येलो वेस्ट आंदोलन से जुड़े लोग शामिल हैं। पुलिस कार्रवाई और प्रदर्शनकारियों के घायल होने के बाद नागरिक स्वतंत्रता तथा विरोध के अधिकार की मांग भी आंदोलन का हिस्सा बन गई।

    17 अक्टूबर को हुए शुरुआती बड़े प्रदर्शनों के दौरान कई शहरों में दुकानों में लूटपाट और सार्वजनिक इमारतों में आगजनी हुई थी। अब छात्र संगठनों ने नवंबर के पहले सप्ताह में स्कूलों और विश्वविद्यालयों को बंद कराने तथा 5 नवंबर को मजदूर संगठनों के साथ प्रदर्शन करने की घोषणा की है। ऐसे में फ्रांस में आने वाले दिनों में विरोध प्रदर्शनों और सुरक्षा व्यवस्था पर नजर बनी रहेगी।

  • भारत की कूटनीति में अक्टूबर के आखिरी सप्ताह बड़ा बदलाव, अमेरिका से यूरोप तक कई अहम मुलाकातों ने बढ़ाई हलचल|

    भारत की कूटनीति में अक्टूबर के आखिरी सप्ताह बड़ा बदलाव, अमेरिका से यूरोप तक कई अहम मुलाकातों ने बढ़ाई हलचल|

    नई दिल्ली ।अक्टूबर 2026 का आखिरी सप्ताह भारत की विदेश नीति और अंतरराष्ट्रीय संबंधों के लिहाज से काफी महत्वपूर्ण रहा। 25 से 31 अक्टूबर के बीच भारत ने यूरोप, पश्चिम एशिया, उत्तरी अमेरिका और हिंद-प्रशांत क्षेत्र के कई देशों के साथ कूटनीतिक संपर्क तेज किए। इस दौरान उच्चस्तरीय यात्राओं, द्विपक्षीय बैठकों और बहुपक्षीय सम्मेलनों के जरिए व्यापार, निवेश, रक्षा, प्रौद्योगिकी और क्षेत्रीय सुरक्षा जैसे मुद्दों पर बातचीत हुई। सप्ताह के दौरान भारत ने पुराने साझेदारों के साथ संबंधों को आगे बढ़ाने के साथ नए सहयोग की संभावनाओं पर भी ध्यान केंद्रित किया।

    इस सप्ताह की सबसे महत्वपूर्ण गतिविधि 30 और 31 अक्टूबर को अमेरिका के अटलांटा में आयोजित जी-20 विदेश मंत्रियों की बैठक रही। विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने इस बैठक में भारत का प्रतिनिधित्व किया। उन्होंने वैश्विक संघर्षों, ऊर्जा सुरक्षा, खाद्य आपूर्ति, समुद्री व्यापार और अंतरराष्ट्रीय सहयोग से जुड़े मुद्दों पर भारत का पक्ष रखा।

    जयशंकर ने अपने संबोधन में कहा कि दुनिया के सामने मौजूद चुनौतियों का समाधान सैन्य कार्रवाई के बजाय कूटनीति और बातचीत के माध्यम से तलाशा जाना चाहिए। उन्होंने युद्धों के व्यापक आर्थिक प्रभावों का भी उल्लेख किया। उनके अनुसार, किसी क्षेत्र में होने वाला संघर्ष केवल संबंधित देशों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि खाद्य आपूर्ति, ऊर्जा और वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं को प्रभावित करता है। इसका असर विशेष रूप से ग्लोबल साउथ के विकासशील देशों पर पड़ता है।

    अटलांटा में ही क्वाड देशों के विदेश मंत्रियों की बैठक भी हुई। इसमें भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया ने हिंद-प्रशांत क्षेत्र में सहयोग, क्षेत्रीय सुरक्षा और रणनीतिक समन्वय से जुड़े विषयों पर चर्चा की। इस बैठक को आगामी क्वाड नेताओं के शिखर सम्मेलन की तैयारियों के लिहाज से भी महत्वपूर्ण माना गया।

    जी-20 बैठक के दौरान जयशंकर ने कई देशों के प्रतिनिधियों के साथ अलग-अलग द्विपक्षीय मुलाकातें कीं। 30 अक्टूबर को उन्होंने यूरोपीय संघ की विदेश नीति प्रमुख काजा कैलास से बातचीत की। इस दौरान यूक्रेन संघर्ष और पश्चिम एशिया के मौजूदा हालात पर विचारों का आदान-प्रदान हुआ।

    कनाडा की विदेश मंत्री अनीता आनंद के साथ हुई मुलाकात में दोनों देशों के बीच सहयोग की प्रगति की समीक्षा की गई। वहीं, ऑस्ट्रेलिया की विदेश मंत्री पेनी वोंग के साथ भी बातचीत हुई। इन संपर्कों में ऑस्ट्रेलिया, कनाडा और भारत के बीच प्रौद्योगिकी एवं नवाचार साझेदारी को आगे बढ़ाने पर विशेष ध्यान दिया गया।

    जयशंकर ने अर्जेंटीना, ब्राजील, मैक्सिको और जर्मनी के विदेश मंत्रियों से भी मुलाकात की। अर्जेंटीना के साथ व्यापार, महत्वपूर्ण खनिज, रक्षा और परमाणु सहयोग जैसे विषय चर्चा में रहे। मैक्सिको के साथ बातचीत में द्विपक्षीय संबंधों को और गति देने पर जोर दिया गया। इन बैठकों के जरिए भारत ने विभिन्न क्षेत्रों में आर्थिक और रणनीतिक सहयोग के अवसर तलाशे।

    इससे पहले 25 से 28 अक्टूबर तक लिकटेंस्टीन के वंशानुगत राजकुमार एलोइस अपनी पत्नी राजकुमारी सोफी के साथ भारत की राजकीय यात्रा पर आए थे। इस यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हैदराबाद हाउस में उनसे मुलाकात की। बातचीत में व्यापार, निवेश, विज्ञान, प्रौद्योगिकी और नवाचार के क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने पर चर्चा हुई। भारत और यूरोपीय मुक्त व्यापार संघ (ईएफटीए) के बीच हुए समझौते के तहत आर्थिक साझेदारी को आगे बढ़ाना भी प्रमुख विषय रहा।

    यूरोप के साथ संबंधों को लेकर ऑस्ट्रिया की विदेश मंत्री बीट माइनल-राइजिंगर की भारत यात्रा भी महत्वपूर्ण रही। विदेश मंत्री एस. जयशंकर के साथ उनकी बातचीत में व्यापार, प्रौद्योगिकी और यूरोपीय देशों के साथ सहयोग बढ़ाने से जुड़े मुद्दे शामिल रहे। इसके साथ ही खाड़ी देशों के साथ भारत के बढ़ते संपर्क भी व्यापक कूटनीतिक गतिविधियों का हिस्सा रहे।

    पूरे सप्ताह की गतिविधियों से भारत की विदेश नीति की तीन प्रमुख प्राथमिकताएं सामने आईं। पहली, अमेरिका, यूरोप और हिंद-प्रशांत क्षेत्र के प्रमुख साझेदारों के साथ रणनीतिक संवाद बनाए रखना। दूसरी, व्यापार, ऊर्जा, महत्वपूर्ण खनिज और आधुनिक तकनीक के क्षेत्र में सहयोग के नए रास्ते तलाशना। तीसरी, रूस-यूक्रेन युद्ध और पश्चिम एशिया के संघर्षों के बीच बातचीत तथा कूटनीतिक समाधान को बढ़ावा देना।

    इस तरह अक्टूबर का अंतिम सप्ताह भारत के लिए केवल बैठकों और यात्राओं तक सीमित नहीं रहा, बल्कि वैश्विक मंचों पर अपनी प्राथमिकताएं रखने और विभिन्न देशों के साथ साझेदारी को आगे बढ़ाने का अवसर भी बना।

  • कन्नड़ राज्योत्सव पर बेंगलुरु-मुंबई को मिली नई सौगात, अश्विनी वैष्णव ने शुरू की वंदे भारत स्लीपर सेवा

    कन्नड़ राज्योत्सव पर बेंगलुरु-मुंबई को मिली नई सौगात, अश्विनी वैष्णव ने शुरू की वंदे भारत स्लीपर सेवा

    नई दिल्ली । कर्नाटक के स्थापना दिवस यानी कन्नड़ राज्योत्सव के अवसर पर बेंगलुरु और मुंबई के बीच रेल कनेक्टिविटी को नई सुविधा मिली है। रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने रविवार, 1 नवंबर 2026 को बेंगलुरु के एम. विश्वेश्वरैया टर्मिनल (एसएमवीटी) से वंदे भारत स्लीपर एक्सप्रेस को हरी झंडी दिखाकर रवाना किया। इस नई ट्रेन सेवा का उद्देश्य देश के दो प्रमुख शहरों के बीच रात के समय यात्रा को अधिक सुविधाजनक बनाना है। इससे तकनीकी और आर्थिक गतिविधियों के प्रमुख केंद्र बेंगलुरु का संपर्क देश की वित्तीय राजधानी मुंबई से बेहतर होगा।

    उद्घाटन समारोह में केंद्रीय रेल राज्यमंत्री वी. सोमन्ना, केंद्रीय मंत्री प्रल्हाद जोशी और एचडी कुमारस्वामी मौजूद रहे। इनके अलावा केंद्रीय राज्यमंत्री शोभा करंदलाजे, भाजपा सांसद तेजस्वी सूर्या, पी.सी. मोहन और सी.एन. मंजूनाथ तथा राज्यसभा सदस्य लहर सिंह सिरोया और जगेश ने भी कार्यक्रम में हिस्सा लिया।

    इस अवसर पर अश्विनी वैष्णव ने कर्नाटक और बेंगलुरु के लोगों को कन्नड़ राज्योत्सव की शुभकामनाएं दीं। उन्होंने कहा कि इस विशेष अवसर पर बेंगलुरु और मुंबई के बीच वंदे भारत स्लीपर सेवा की शुरुआत की जा रही है। उनके अनुसार, यह देश की तीसरी वंदे भारत स्लीपर सेवा होगी। उन्होंने इस रेल सेवा को तकनीकी क्षेत्र में अग्रणी बेंगलुरु और आर्थिक गतिविधियों के प्रमुख केंद्र मुंबई को जोड़ने वाली महत्वपूर्ण सुविधा बताया।

    रेल मंत्री ने बताया कि ट्रेन के निर्माण और डिजाइन में यात्रियों की सुविधा तथा सुरक्षा को प्राथमिकता दी गई है। इसमें यात्रियों की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए कई नए फीचर शामिल किए गए हैं। लोकोमोटिव पायलटों के लिए विशेष सुविधाएं विकसित की गई हैं। इसके अलावा बर्थ पर आसानी से चढ़ने और उतरने के लिए भी अतिरिक्त व्यवस्था की गई है। दिव्यांग यात्रियों की सुविधा को ध्यान में रखते हुए भी ट्रेन में विशेष प्रावधान किए गए हैं।

    वंदे भारत स्लीपर एक्सप्रेस में कुल 823 यात्रियों के सफर करने की क्षमता होगी। ट्रेन में 11 एसी थ्री-टियर कोच होंगे, जिनमें 611 यात्रियों के लिए जगह उपलब्ध रहेगी। इसके अलावा चार एसी टू-टियर कोच में 188 यात्री सफर कर सकेंगे। ट्रेन में एक फर्स्ट एसी कोच भी होगा, जिसकी क्षमता 24 यात्रियों की होगी। इस तरह अलग-अलग श्रेणियों के यात्रियों को एक ही ट्रेन में यात्रा का विकल्प मिलेगा।

    रेल राज्यमंत्री वी. सोमन्ना ने इस मौके पर केंद्र सरकार की रेलवे विकास योजनाओं का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि पिछले पांच वर्षों में कर्नाटक में रेलवे के विकास पर 52 हजार करोड़ रुपये से अधिक खर्च किए गए हैं। उनके मुताबिक, देशभर में 14 हजार रेलवे ओवरब्रिज बनाए गए हैं, जिनमें 900 से अधिक ओवरब्रिज कर्नाटक में हैं। उन्होंने उत्तरी, मध्य और दक्षिणी कर्नाटक में रेलवे कनेक्टिविटी को मजबूत करने पर भी जोर दिया।

    दक्षिण पश्चिम रेलवे इस नई सेवा का संचालन और रखरखाव करेगा। इसके लिए ट्रेन को दो नंबर दिए गए हैं। ट्रेन संख्या 27652 बेंगलुरु के एसएमवीटी से मुंबई के छत्रपति शिवाजी महाराज टर्मिनस (सीएसएमटी) के बीच चलेगी, जबकि 27651 मुंबई से बेंगलुरु के लिए निर्धारित की गई है।

    बेंगलुरु से मुंबई जाने वाली ट्रेन शाम 7 बजकर 45 मिनट पर रवाना होगी और अगले दिन सुबह 11 बजकर 55 मिनट पर सीएसएमटी पहुंचेगी। इस यात्रा में करीब 16 घंटे लगेंगे। वापसी में ट्रेन मुंबई से रात 8 बजकर 10 मिनट पर रवाना होगी और अगले दिन दोपहर बेंगलुरु पहुंचेगी। यह सेवा सप्ताह में छह दिन संचालित होगी। बेंगलुरु से मुंबई की यात्रा सोमवार को और मुंबई से बेंगलुरु की वापसी मंगलवार को ट्रेन नहीं चलेगी। रातभर की इस रेल सेवा से दोनों शहरों के बीच यात्रियों को सीधी कनेक्टिविटी का विकल्प मिलेगा।

  • सरदार पटेल की विरासत को अमेरिका में मिलेगी नई पहचान, अटलांटा में बनने जा रहा 'आयरन मैन यूनिटी बैंक'

    सरदार पटेल की विरासत को अमेरिका में मिलेगी नई पहचान, अटलांटा में बनने जा रहा 'आयरन मैन यूनिटी बैंक'


    नई दिल्ली ।भारत के लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल की विरासत अब अमेरिका में एक नई पहचान हासिल करने की तैयारी में है। अटलांटा क्षेत्र में उनके नाम और विचारों से प्रेरित एक सामुदायिक बैंक स्थापित करने की योजना पर काम चल रहा है। प्रस्तावित संस्थान का नाम ‘आयरन मैन यूनिटी बैंक’ रखा गया है। इसके आयोजकों को उम्मीद है कि आवश्यक सरकारी औपचारिकताएं पूरी होने के बाद अप्रैल 2027 तक बैंक की शुरुआत हो सकती है। हालांकि, फिलहाल इसकी स्थापना से जुड़ी प्रक्रियाएं पूरी होना बाकी हैं।

    कम्युनिटी लीडर डॉ. वासुदेव पटेल ने बताया कि बैंक की स्थापना की दिशा में काम किया जा रहा है। उनके अनुसार, संस्थान अगले छह महीनों में शुरू हो सकता है। उन्होंने यह भी उम्मीद जताई कि शेष सरकारी प्रक्रियाएं अप्रैल 2027 तक पूरी कर ली जाएंगी। हालांकि, उन्होंने स्पष्ट किया कि यह समयसीमा फिलहाल अनुमान पर आधारित है और बैंक की वास्तविक शुरुआत औपचारिक मंजूरियों पर निर्भर करेगी।

    प्रस्तावित बैंक की पहचान को सरदार पटेल के व्यक्तित्व और राष्ट्रीय एकता में उनके योगदान से जोड़ने की योजना बनाई गई है। इसके लिए बैंक के लोगो में गुजरात स्थित स्टैच्यू ऑफ यूनिटी की झलक शामिल करने का प्रस्ताव है। यह प्रतीक बैंक के चेक और अन्य ब्रांडिंग सामग्री पर भी दिखाई देगा। आयोजकों का उद्देश्य बैंक की पहचान के माध्यम से ग्राहकों को भारत के एकीकरण में सरदार पटेल की ऐतिहासिक भूमिका से परिचित कराना है।

    डॉ. पटेल के अनुसार, बैंक के लोगो को देखकर अलग-अलग समुदायों के लोग इसके पीछे की कहानी जानने में रुचि दिखा सकते हैं। इससे उन्हें सरदार पटेल के योगदान और भारत को एकजुट करने में निभाई गई उनकी भूमिका के बारे में जानकारी देने का अवसर मिलेगा। इस तरह प्रस्तावित बैंक केवल वित्तीय संस्थान की पहचान तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि उसकी ब्रांडिंग में भारतीय इतिहास और राष्ट्रीय एकता से जुड़े प्रतीकों को भी प्रमुखता दी जाएगी।

    हालांकि, बैंक की योजना को लेकर अभी कई महत्वपूर्ण जानकारियां सामने नहीं आई हैं। डॉ. वासुदेव पटेल ने इसकी प्रस्तावित पूंजी, मालिकाना हक की व्यवस्था और पूरी की जाने वाली सरकारी औपचारिकताओं का विस्तृत विवरण साझा नहीं किया। ऐसे में बैंक की स्थापना, संचालन और वित्तीय ढांचे से जुड़ी अंतिम तस्वीर आवश्यक प्रक्रियाएं पूरी होने के बाद ही स्पष्ट हो सकेगी।

    इस प्रस्ताव की जानकारी अटलांटा स्थित भारतीय वाणिज्य दूतावास में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान सामने आई। यह कार्यक्रम राष्ट्रीय एकता दिवस के अवसर पर आयोजित किया गया था। इसमें भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने सरदार वल्लभभाई पटेल की प्रतिमा का अनावरण किया। इस प्रतिमा को अमेरिका के फेडरेशन ऑफ गुजराती एसोसिएशन्स की राष्ट्रीय टीम ने प्रायोजित किया था। संगठन के अध्यक्ष डॉ. वासुदेव पटेल ने इसकी जानकारी दी।

    सरदार वल्लभभाई पटेल स्वतंत्र भारत के पहले उपप्रधानमंत्री और गृह मंत्री थे। देश की आजादी के बाद विभिन्न रियासतों को भारतीय संघ में शामिल कराने में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण रही। उनके प्रयासों से स्वतंत्र भारत के एकीकरण की प्रक्रिया को मजबूती मिली। इसी योगदान के कारण उन्हें भारत का लौह पुरुष कहा जाता है।

    गुजरात में स्थापित स्टैच्यू ऑफ यूनिटी भी उनकी इसी ऐतिहासिक विरासत का प्रतीक है। सरदार पटेल की जयंती 31 अक्टूबर को देशभर में राष्ट्रीय एकता दिवस के रूप में मनाई जाती है। अटलांटा में प्रस्तावित बैंक का नाम और प्रतीक इसी विरासत को अमेरिका में पहचान दिलाने की पहल के रूप में देखा जा रहा है। हालांकि, इसके शुरू होने की अंतिम तारीख सरकारी मंजूरियों और बाकी प्रक्रियाओं पर निर्भर करेगी।

  • भारत-स्पेन संबंधों को नई ऊंचाई देने स्पेन जाएंगे पबित्रा मार्गेरिटा, मैड्रिड में कई अहम बैठकों पर रहेंगी नजरें

    भारत-स्पेन संबंधों को नई ऊंचाई देने स्पेन जाएंगे पबित्रा मार्गेरिटा, मैड्रिड में कई अहम बैठकों पर रहेंगी नजरें

    नई दिल्ली ।विदेश एवं कपड़ा राज्य मंत्री पबित्रा मार्गेरिटा 3 नवंबर से तीन दिवसीय आधिकारिक यात्रा पर स्पेन जाएंगे। इस दौरान वह 30वें इबेरो-अमेरिकन कॉन्फ्रेंस शिखर सम्मेलन में भारत का प्रतिनिधित्व करेंगे। भारत इस सम्मेलन में एसोसिएट ऑब्जर्वर यानी सहयोगी पर्यवेक्षक के रूप में भाग ले रहा है। इस यात्रा को दोनों देशों के बीच राजनयिक, सांस्कृतिक और आर्थिक संबंधों को आगे बढ़ाने के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    स्पेन में आयोजित होने वाले इस सम्मेलन में लैटिन अमेरिका और यूरोप के कई देश हिस्सा लेते हैं। वर्तमान में इसके सदस्य देशों की संख्या 22 है। इनमें लैटिन अमेरिका के 19 देश और यूरोप के तीन देश स्पेन, पुर्तगाल तथा अंडोरा शामिल हैं। इसके अलावा सम्मेलन में 12 एसोसिएट ऑब्जर्वर और 20 कंसल्टेटिव ऑब्जर्वर भी जुड़े हुए हैं। भारत सहयोगी पर्यवेक्षक के रूप में इस मंच की गतिविधियों में भागीदारी कर रहा है।

    पबित्रा मार्गेरिटा की यात्रा के दौरान सम्मेलन के इतर विभिन्न देशों के प्रतिनिधियों के साथ द्विपक्षीय बैठकों का कार्यक्रम भी प्रस्तावित है। इन मुलाकातों में आपसी सहयोग और साझा हितों से जुड़े विषयों पर चर्चा होगी। इसके अलावा राज्य मंत्री स्पेन की राजधानी मैड्रिड में रहने वाले भारतीय समुदाय के लोगों से भी मुलाकात करेंगे। इससे स्पेन में बसे भारतीय नागरिकों के साथ संपर्क और संवाद को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है।

    यह यात्रा भारत और स्पेन के बीच वर्ष 2026 के लिए घोषित संयुक्त पहल के संदर्भ में भी महत्वपूर्ण है। दोनों देशों ने 2026 को संस्कृति, पर्यटन और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी कृत्रिम बुद्धिमत्ता के संयुक्त वर्ष के रूप में मनाने का निर्णय लिया है। इस पहल के तहत दोनों देशों में विभिन्न कार्यक्रम और गतिविधियां आयोजित की जा रही हैं। राज्य मंत्री की यात्रा इन्हीं आयोजनों की कड़ी का हिस्सा होगी।

    भारत और स्पेन के बीच राजनयिक संबंध वर्ष 1956 में स्थापित हुए थे। वर्ष 2026 में दोनों देशों के संबंधों के 70 वर्ष पूरे हो रहे हैं। इस अवसर पर दोनों देशों ने सहयोग के नए क्षेत्रों को प्राथमिकता दी है। इसी वर्ष आयोजित एआई इम्पैक्ट समिट में स्पेन के राष्ट्रपति पेड्रो सांचेज भी नई दिल्ली पहुंचे थे। इस दौरान उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात की थी।

    दोनों नेताओं के बीच हुई बातचीत में रक्षा, सुरक्षा, प्रौद्योगिकी और अन्य क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने के उपायों पर चर्चा हुई थी। भारत और स्पेन के बीच रक्षा आधुनिकीकरण, एयरोस्पेस, नौसैनिक तकनीक और आतंकवाद विरोधी सहयोग जैसे क्षेत्रों में भी साझेदारी विकसित हो रही है।

    व्यापारिक मोर्चे पर स्पेन यूरोप में भारत का छठा सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है। वर्ष 2023 में दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार 9.9 अरब डॉलर दर्ज किया गया था। भारत में 250 से अधिक स्पेनिश कंपनियां सक्रिय रूप से कारोबार कर रही हैं। इन कंपनियों की मौजूदगी दोनों देशों के बीच आर्थिक संबंधों के विस्तार को दर्शाती है।

    स्पेन में भारतीय समुदाय की संख्या लगभग 75 हजार बताई जाती है। दोनों देशों के बीच लोगों के स्तर पर संपर्क बढ़ाने के लिए भी कई प्रयास किए गए हैं। अगस्त 2024 में बार्सिलोना में भारत का नया महावाणिज्य दूतावास खोला गया था। इससे स्पेन में भारतीय नागरिकों को राजनयिक और अन्य आवश्यक सेवाएं उपलब्ध कराने में मदद मिल रही है।

    शिक्षा और संस्कृति के क्षेत्र में भी दोनों देशों के बीच सहयोग जारी है। स्पेन के वलाडोलिड विश्वविद्यालय में हिंदी और भारतीय अध्ययन से जुड़ी पीठ स्थापित है। इसके अलावा स्पेन के कई शहरों में हर साल अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। पबित्रा मार्गेरिटा की आगामी यात्रा के दौरान होने वाली बैठकों और सम्मेलन में भागीदारी से इन सांस्कृतिक, शैक्षणिक, व्यापारिक और तकनीकी संबंधों को आगे बढ़ाने के अवसर मिलेंगे।

  • ईरान के रहस्यमयी परमाणु ठिकाने पर ट्रंप की नजर, पिकएक्स माउंटेन को लेकर फिर दी हमले की चेतावनी

    ईरान के रहस्यमयी परमाणु ठिकाने पर ट्रंप की नजर, पिकएक्स माउंटेन को लेकर फिर दी हमले की चेतावनी

    नई दिल्ली ।अमेरिका और ईरान के बीच परमाणु कार्यक्रम को लेकर तनाव एक बार फिर बढ़ता दिखाई दे रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने फ्लोरिडा में ईरान के साथ अप्रत्यक्ष बातचीत की तारीफ करते हुए भी उसके एक महत्वपूर्ण भूमिगत परमाणु ठिकाने पिकएक्स माउंटेन का जिक्र किया। उन्होंने संकेत दिया कि ईरान के कुछ परमाणु प्रतिष्ठान अभी भी ऐसे हैं, जिनसे निपटना बाकी है। ट्रंप ने विशेष रूप से पिकएक्स माउंटेन को संभावित सैन्य लक्ष्य बताते हुए कहा कि इस पर तेजी से हमला किया जा सकता है। उनकी इस टिप्पणी ने ईरान के परमाणु कार्यक्रम और अमेरिकी सैन्य रणनीति को लेकर नई चर्चा शुरू कर दी है।

    पिकएक्स माउंटेन ईरान के इस्फहान प्रांत में स्थित एक पहाड़ी क्षेत्र है। इसे स्थानीय भाषा में कूह-ए कोलांग गज ला कहा जाता है। अंग्रेजी में इसे पिकएक्स माउंटेन नाम इसलिए दिया गया है, क्योंकि स्थानीय शब्द कोलांग का संबंध कुदाल या पहाड़ खोदने वाले औजार से है। यह स्थान ईरान के प्रमुख परमाणु प्रतिष्ठान नतांज से लगभग दो किलोमीटर दक्षिण में और राजधानी तेहरान से करीब 220 किलोमीटर दूर स्थित है।

    इस पहाड़ी के भीतर सुरंगों का एक बड़ा भूमिगत परिसर विकसित किया गया है। यहां दो अलग-अलग सुरंग परिसरों के प्रवेश मार्ग बनाए गए हैं। इस ठिकाने की सबसे बड़ी विशेषता इसकी प्राकृतिक भौगोलिक सुरक्षा है। पहाड़ के भीतर मजबूत ग्रेनाइट चट्टानों के बीच सुरंगें बनाई गई हैं। माना जाता है कि इसकी गहराई और चट्टानों की मजबूती इसे सामान्य हवाई हमलों से काफी हद तक सुरक्षित बना सकती है।

    पश्चिमी देशों के परमाणु विशेषज्ञों की चिंता इस परिसर के संभावित इस्तेमाल को लेकर है। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान यहां यूरेनियम संवर्धन की सुविधा विकसित कर सकता है। ऐसी भूमिगत संरचना का उद्देश्य संवेदनशील परमाणु गतिविधियों को संभावित सैन्य हमलों से सुरक्षित रखना हो सकता है। हालांकि, अभी तक इस बात की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है कि यहां यूरेनियम संवर्धन का काम शुरू हो चुका है।

    यूरेनियम संवर्धन परमाणु ईंधन तैयार करने की प्रक्रिया है। कम संवर्धित यूरेनियम का इस्तेमाल बिजली उत्पादन करने वाले परमाणु संयंत्रों में किया जा सकता है, जबकि अत्यधिक संवर्धित यूरेनियम का उपयोग परमाणु हथियार बनाने में भी संभव है। इसी वजह से ईरान की भूमिगत परमाणु सुविधाओं को लेकर अमेरिका और पश्चिमी देशों की चिंता बनी हुई है।

    16 अक्टूबर 2026 की एक विशेषज्ञ रिपोर्ट में उपग्रह तस्वीरों के आधार पर इस परिसर की स्थिति का आकलन किया गया था। इसमें बताया गया कि सुरंगों के प्रवेश मार्गों पर मिट्टी के अवरोध अब भी मौजूद हैं। इससे संकेत मिलता है कि वहां फिलहाल नियमित परिचालन या बड़े पैमाने पर निर्माण गतिविधियां नहीं हो रही हैं। हालांकि, परिसर में महत्वपूर्ण उपकरण या सामग्री मौजूद होने की संभावना से इनकार नहीं किया गया।

    इससे पहले जुलाई में आई मीडिया रिपोर्टों में इजरायली खुफिया एजेंसियों के हवाले से दावा किया गया था कि ईरान ने यहां सेंट्रीफ्यूज और उनके पुर्जे पहुंचाए हैं। हालांकि, इस दावे की भी स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।

    इस ठिकाने को निशाना बनाने में अमेरिका के सामने सैन्य चुनौती भी कम नहीं होगी। अमेरिकी सेना के पास जीबीयू-57 जैसे शक्तिशाली बंकर बस्टर बम हैं, जिन्हें जमीन के भीतर बने मजबूत ठिकानों को भेदने के लिए तैयार किया गया है। इसके बावजूद विशेषज्ञों का मानना है कि पहाड़ के भीतर काफी गहराई में मौजूद पूरे परिसर को नष्ट करना आसान नहीं होगा।

    संभावित हमले में सुरंगों के प्रवेश द्वार, बिजली आपूर्ति, वेंटिलेशन और दूसरे सहायक ढांचे को नुकसान पहुंचाया जा सकता है। लेकिन इससे यह सुनिश्चित नहीं होगा कि पहाड़ के भीतर मौजूद सभी सुविधाएं भी पूरी तरह नष्ट हो गई हैं। अमेरिका के सामने एक बड़ी चुनौती संभावित परमाणु उपकरणों और सामग्री को दोबारा इस्तेमाल होने से रोकने की भी होगी।

    ईरान का कहना है कि उसका परमाणु कार्यक्रम शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए है, जबकि पश्चिमी देशों को उसकी संवर्धन गतिविधियों और भूमिगत ढांचे पर संदेह है। नतांज और फोर्दो जैसे परमाणु ठिकानों पर हमलों के बाद भी पिकएक्स माउंटेन चर्चा में बना हुआ है। अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी ने अब तक इस परिसर का निरीक्षण नहीं किया है। ऐसे में वहां मौजूद उपकरणों, गतिविधियों और वास्तविक उद्देश्य को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं है।

  • अमेरिका में भारतीय छात्रों की संख्या में 13.5% की बड़ी गिरावट, मास्टर्स प्रोग्राम से सबसे ज्यादा छात्र हुए कम

    अमेरिका में भारतीय छात्रों की संख्या में 13.5% की बड़ी गिरावट, मास्टर्स प्रोग्राम से सबसे ज्यादा छात्र हुए कम

    नई दिल्ली । अमेरिका में पढ़ाई करने वाले भारतीय छात्रों की संख्या में एक साल के भीतर बड़ी गिरावट दर्ज की गई है। अमेरिकी गृह सुरक्षा विभाग (डीएचएस) के ताजा आंकड़ों के अनुसार, अक्टूबर 2026 में अमेरिका में सक्रिय भारतीय छात्रों की संख्या घटकर 3,16,893 रह गई। अक्टूबर 2025 में यह आंकड़ा 3,66,258 था। इस तरह एक साल के दौरान भारतीय छात्रों की संख्या में 49,365 की कमी आई है, जो लगभग 13.5 प्रतिशत की गिरावट दर्शाती है। हालांकि, इस कमी के बावजूद अमेरिका में अंतरराष्ट्रीय छात्रों के सबसे बड़े समूह के रूप में भारत की स्थिति बरकरार है।

    स्टूडेंट एंड एक्सचेंज विजिटर इंफॉर्मेशन सिस्टम (एसईवीआईएस) के आंकड़ों के मुताबिक, अमेरिका में सभी देशों के सक्रिय अंतरराष्ट्रीय छात्रों की संख्या भी घटी है। अक्टूबर 2025 में यह संख्या 12,83,240 थी, जो अक्टूबर 2026 में घटकर 11,92,572 रह गई। इस प्रकार कुल अंतरराष्ट्रीय छात्रों की संख्या में लगभग 7.1 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई। भारतीय छात्रों की संख्या में आई गिरावट इस समग्र कमी से अधिक रही है।

    अमेरिका में अंतरराष्ट्रीय छात्रों के दूसरे सबसे बड़े समूह चीन से आने वाले विद्यार्थियों का है। इस श्रेणी में भी एक साल के दौरान कमी दर्ज की गई। अक्टूबर 2025 में चीन के 2,45,038 सक्रिय छात्र अमेरिका में थे, जबकि अक्टूबर 2026 में यह संख्या घटकर 2,20,157 रह गई। इस तरह चीनी छात्रों की संख्या में लगभग 10.2 प्रतिशत की गिरावट आई है।

    अंतरराष्ट्रीय छात्रों के कुल आंकड़ों में भारत की हिस्सेदारी भी कम हुई है। अक्टूबर 2025 में अमेरिका में सक्रिय विदेशी छात्रों में भारतीय विद्यार्थियों की हिस्सेदारी लगभग 28.5 प्रतिशत थी। अक्टूबर 2026 में यह घटकर करीब 26.6 प्रतिशत रह गई। इसके बावजूद भारत सबसे अधिक अंतरराष्ट्रीय छात्र भेजने वाला देश बना हुआ है।

    भारतीय छात्रों की संख्या में सबसे ज्यादा कमी मास्टर्स यानी स्नातकोत्तर पाठ्यक्रमों में सामने आई है। अक्टूबर 2025 में अमेरिका के मास्टर्स प्रोग्राम में 2,92,929 भारतीय छात्र नामांकित थे। अक्टूबर 2026 में यह संख्या घटकर 2,34,034 रह गई। इस स्तर पर लगभग 20 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है। भारतीय विद्यार्थियों का बड़ा हिस्सा अमेरिका में उच्च शिक्षा के लिए मास्टर्स पाठ्यक्रमों को चुनता रहा है, इसलिए इस श्रेणी में आई कमी कुल आंकड़ों को भी प्रभावित कर रही है।

    हालांकि, डॉक्टोरल यानी पीएचडी स्तर पर इसके विपरीत रुझान देखने को मिला है। अक्टूबर 2025 में इस स्तर पर भारतीय छात्रों की संख्या 28,609 थी, जो अक्टूबर 2026 में बढ़कर 41,729 हो गई। यानी पीएचडी में भारतीय विद्यार्थियों का नामांकन बढ़ा है। वहीं, स्नातक यानी बैचलर स्तर पर छात्रों की संख्या 38,522 से घटकर 36,011 रह गई।

    आंकड़ों के अनुसार, अक्टूबर 2026 में अमेरिका में सक्रिय भारतीय छात्रों में 1,95,341 पुरुष और 1,21,552 महिला विद्यार्थी शामिल थे। एसईवीआईएस के आंकड़ों में उन विद्यार्थियों को शामिल किया जाता है जिनका रिकॉर्ड संबंधित सिस्टम में सक्रिय रहता है। इसमें ऑप्शनल प्रैक्टिकल ट्रेनिंग (ओपीटी) के तहत रहने वाले छात्र भी शामिल हैं। इसलिए ये आंकड़े किसी एक महीने की स्थिति बताते हैं, न कि पूरे वर्ष अमेरिका पहुंचे विद्यार्थियों की कुल संख्या।

    छात्रों की संख्या में गिरावट ऐसे समय में सामने आई है, जब अमेरिका में छात्र वीजा से जुड़ी जांच प्रक्रिया सख्त हुई है। ओपीटी और एसटीईएम एक्सटेंशन पर नई फीस लगाने का प्रस्ताव भी चर्चा में है। इसके साथ ही कानूनी आव्रजन के विभिन्न रास्तों को लेकर नियमों और प्रक्रियाओं में सख्ती बढ़ाई जा रही है। इन परिस्थितियों के बीच भारतीय मूल के नेताओं के एक गैर-लाभकारी नेटवर्क ने 30 अक्टूबर को जारी बयान में अमेरिका में पढ़ाई के लिए जाने वाले भारतीय छात्रों की संख्या घटने की बात कही। संगठन ने इस रुझान को मौजूदा चुनावी माहौल में भारत-विरोधी बयानबाजी से भी जोड़ा है।

    दक्षिण एशिया के अन्य देशों से आने वाले विद्यार्थियों की संख्या में भी कमी दर्ज की गई है। नेपाल के सक्रिय छात्रों की संख्या अक्टूबर 2025 में 35,273 थी, जो अक्टूबर 2026 में घटकर 33,992 रह गई। इस तरह अमेरिकी शिक्षा व्यवस्था में अंतरराष्ट्रीय विद्यार्थियों की संख्या घटने का रुझान कई देशों में दिखाई दे रहा है, जबकि भारतीय छात्रों के मामले में मास्टर्स स्तर की गिरावट सबसे प्रमुख बदलाव बनकर सामने आई है।

  • Israel: बदू महिलाओं ने पलटा नेतन्याहू का चुनावी पासा…! विपक्ष ला सकता है PM चुनने का विधेयक

    Israel: बदू महिलाओं ने पलटा नेतन्याहू का चुनावी पासा…! विपक्ष ला सकता है PM चुनने का विधेयक


    यरूशलम।
    उम्म खालिद फतून (Umm Khalid Fatoun) पिछले साल युद्ध पीड़ितों के लिए बने एक यहूदी-अरब सहायता केंद्र (Jewish-Arab Aid Center) में स्वयंसेवा करके लौटीं तो उन्होंने देखा कि बुलडोजर अजारनुग गांव (Ajarnug Village) में उनके बेटे के घर को ढहा रहे थे। पुलिस की निगरानी में आई टीम ने घर पर बुलडोजर चलाने से पहले फर्नीचर या सोलर पैनल तक हटाने का मौका नहीं दिया।

    अब, इस हफ्ते जब फतून को मौका मिला तो उन्होंने अपनी नाराजगी का जवाब इस्राइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू (Prime Minister Benjamin Netanyahu) के सत्तारूढ़ गठबंधन के खिलाफ मतदान करके दिया। उनका सीधा निशाना राष्ट्रीय सुरक्षा मंत्री बेन-ग्विर थे जिन्होंने फलस्तीनी और अरब समुदाय के लोगों के घरों को व्यापक स्तर पर ढहाने का आदेश दिया था। फतून कहती हैं, बेन-ग्विर को सत्ता से बाहर करना ही मेरा एकमात्र मकसद था। बदू समुदाय में ऐसा एक भी परिवार नहीं है जो हमारे खिलाफ उसके अभियानों से पीड़ित न हुआ हो। चुनाव से कुछ हफ्ते पहले फतून ने बदू महिलाओं को उनके अधिकारों और राजनीतिक ताकत के प्रति जागरूक करने के लिए जमीनी स्तर पर बाकायादा अभियान शुरू किया। इसके शानदार नतीजे भी दिखे, और चुनाव में दक्षिणी नेगेव इलाके के कुछ बदू गांवों में मतदान प्रतिशत तीन गुना तक बढ़ गया।


    हमें अपने हर वोट की ताकत झोंकनी होगी

    अल-नश्मियात अभियान का नेतृत्व करने वाली वकील हनान अलसनाह ने कहा, वर्षों के हिंसक शासन ने इस रूढ़िवादी समुदाय में बदलाव का दरवाजा खोल दिया है। हमने महिलाओं से कहा कि भले सभी पुरुष वोट दें फिर भी समुदाय का आधा हिस्सा ही होंगे। आपको अपने हर वोट की ताकत चाहिए, क्योंकि बेन-ग्विर के पास बहुत ताकत है।


    62% से 93% तक दर्ज की गई वोटिंग

    बदू समुदाय इस्राइली संसद नेसेट में अरब पार्टियों को 19 सीटें दिलाकर किंगमेकर की भूमिका में ला दिया। बदू समुदाय में सबसे कम मतदान 62% रहा, जबकि सबसे ज्यादा मतदान 93% दर्ज किया गया। उनके उत्साह से ही रआम पार्टी को चुनावी अनुमानों से काफी अधिक सफलता मिली।


    विपक्षी दल सीधे पीएम चुनने का ला सकता है विधेयक

    इस्राइल में सरकार गठन में राजनीतिक गतिरोध को तोड़ने के लिए विपक्षी गुट अरब पार्टियों के समर्थन पर निर्भर रहे बिना अल्पमत सरकार बनाने के लिए सीधे प्रधानमंत्री चुनने से संबंधित विधेयक लाने पर विचार कर रहा है। टाइम्स ऑफ इस्राइल की एक रिपोर्ट के मुताबिक, यह प्रस्ताव लागू होने पर मतदाता सरकार से अलग सीधे पीएम पद के लिए वोट डाल सकेंगे।

  • जर्मनी में Gen Z का प्रदर्शन हिंसक हुआ, फ्रैंकफर्ट में दुकानों में तोड़फोड़ और लूटपाट

    जर्मनी में Gen Z का प्रदर्शन हिंसक हुआ, फ्रैंकफर्ट में दुकानों में तोड़फोड़ और लूटपाट


    नई दिल्ली। जर्मनी में बढ़ती महंगाई, शिक्षा के लिए पर्याप्त फंडिंग और अनिवार्य सैन्य सेवा के विरोध में हजारों युवा सड़कों पर उतर आए। शनिवार को बर्लिन, फ्रैंकफर्ट और म्यूनिख समेत 34 शहरों में प्रदर्शन हुए। फ्रैंकफर्ट में प्रदर्शन के दौरान कुछ नकाबपोश लोगों ने दुकानों में लूटपाट की और कई जगह तोड़फोड़ की। पुलिस के मुताबिक, शहर के केंद्र में हिंसा हुई और आपातकालीन सेवाओं पर पेट्रोल बम भी फेंके गए।

    ये प्रदर्शन ‘जेन Z रेगेल्ट’ नामक समूह की ओर से आयोजित किए गए थे। युवाओं ने बेहतर रोजगार, आर्थिक सुरक्षा, शिक्षा के लिए अधिक सरकारी फंडिंग और सार्वजनिक सुविधाओं में सुधार की मांग उठाई। साथ ही, अनिवार्य सैन्य सेवा के खिलाफ भी विरोध जताया। ये आंदोलन यूरोप के कई हिस्सों में युवाओं की अगुवाई में चल रहे प्रदर्शनों का हिस्सा हैं।

    फ्रैंकफर्ट में हिंसा, दुकानों के शीशे तोड़े

    प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक, फ्रैंकफर्ट में प्रदर्शन ने हिंसक रूप ले लिया। कुछ नकाबपोश प्रदर्शनकारियों ने दुकानों में लूटपाट की, जबकि कई अन्य दुकानों को नुकसान पहुंचाया गया। पुलिस को स्थिति नियंत्रित करने के लिए काफी मशक्कत करनी पड़ी।

    फ्रैंकफर्ट पुलिस ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट कर बताया कि शहर के केंद्र में हिंसक उपद्रव जारी हैं। कई दुकानों की खिड़कियां तोड़ दी गई हैं और आपातकालीन सेवाओं पर मोलोटोव कॉकटेल यानी पेट्रोल बम फेंके जा रहे हैं। पुलिस ने लोगों से शहर के केंद्र में जाने से बचने और वहां मौजूद लोगों से सुरक्षित स्थानों पर जाने की अपील की।

    हैम्बर्ग में भी कुछ बैरिकेड्स में आग लगा दी गई। जर्मन अधिकारियों के मुताबिक, अधिकांश प्रदर्शन शांतिपूर्ण रहे, लेकिन उन्होंने आशंका जताई कि चरमपंथी समूह भीड़ का फायदा उठाकर हिंसा फैला सकते हैं।

    महंगाई और आर्थिक असुरक्षा से नाराज युवा

    प्रदर्शन में शामिल युवाओं का कहना है कि यूरोप की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था जर्मनी में भी जीवन-यापन का खर्च लगातार बढ़ रहा है। महंगाई के कारण आम लोगों और खासकर युवाओं के सामने आर्थिक चुनौतियां खड़ी हो रही हैं। वे बेहतर रोजगार के अवसर, भविष्य की आर्थिक सुरक्षा और सरकारी सुविधाओं में सुधार चाहते हैं। बर्लिन में आयोजित एक रैली के दौरान ‘जेन Z रेगेल्ट’ की प्रवक्ता ने कहा कि युवा युद्ध के लिए नहीं, बल्कि शांति और आजादी के लिए संघर्ष कर रहे हैं।

    यूरोप के कई देशों में युवा आंदोलन

    जर्मनी में हुए ये प्रदर्शन यूरोप के विभिन्न देशों में युवाओं की बढ़ती सक्रियता के बीच हुए हैं। सर्बिया में छात्र आंदोलनों ने राजनीति और चुनावी माहौल को प्रभावित किया है। वहीं, फ्रांस में युवाओं के विरोध प्रदर्शनों के दौरान कई जगह हिंसा और लूटपाट की घटनाएं सामने आई थीं। शिक्षा, रोजगार, महंगाई और सरकारी नीतियों को लेकर युवाओं की नाराजगी यूरोप के कई हिस्सों में प्रदर्शनों के रूप में सामने आ रही है।

  • FATF ने पाकिस्तान पर नहीं की सख्ती, आतंकी फंडिंग के मामलों की जांच अब 2030 तक टली..

    FATF ने पाकिस्तान पर नहीं की सख्ती, आतंकी फंडिंग के मामलों की जांच अब 2030 तक टली..

    नई दिल्ली । अंतरराष्ट्रीय स्तर पर धन शोधन और आतंकवादी गतिविधियों के वित्तपोषण पर निगरानी रखने वाली संस्था फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स (FATF) की पाकिस्तान को लेकर अपनाई गई प्रक्रिया चर्चा में है। पाकिस्तान में सक्रिय आतंकी संगठनों की ओर से डिजिटल माध्यमों से कथित तौर पर धन जुटाए जाने के आरोपों के बावजूद संस्था ने फिलहाल कोई नई कार्रवाई नहीं की है। इसके बजाय पाकिस्तान से जुड़े मूल्यांकन की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने का निर्णय लिया गया है। इस प्रक्रिया के तहत संबंधित समूह को 31 मार्च 2029 तक अपना मूल्यांकन पूरा कर रिपोर्ट जमा करनी है। इसके बाद वर्ष 2030 में होने वाली पूर्ण बैठक में रिपोर्ट पर चर्चा की जाएगी और आगे के कदमों पर फैसला लिया जा सकता है।

    पेरिस में आयोजित चार दिवसीय पूर्ण बैठक के दौरान पाकिस्तान से जुड़े मुद्दे पर चर्चा हुई। इसमें पाकिस्तान में सक्रिय वैश्विक आतंकी संगठनों की डिजिटल माध्यमों से होने वाली फंडिंग का मुद्दा भी उठाया गया। हालांकि, इन आरोपों के बावजूद तत्काल किसी नई कार्रवाई की जानकारी सामने नहीं आई। मूल्यांकन और समीक्षा की मौजूदा प्रक्रिया को जारी रखने का फैसला किया गया है। इस समयसीमा के कारण पाकिस्तान के खिलाफ किसी संभावित नए कदम पर निर्णय आने में अभी कई वर्ष लग सकते हैं।

    पाकिस्तान में आतंकी संगठनों की ऑनलाइन फंडिंग को लेकर पहले भी गंभीर आरोप सामने आ चुके हैं। पिछले वर्ष सामने आई एक रिपोर्ट में दावा किया गया था कि आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद ने ऑनलाइन माध्यमों से पाकिस्तान में 391 करोड़ रुपये का चंदा जुटाया था। आरोप है कि इस रकम का इस्तेमाल संगठन की गतिविधियों और उसके ठिकानों के पुनर्निर्माण में किया गया।

    इसी मामले में दावा किया गया कि जैश-ए-मोहम्मद ने ऑपरेशन सिंदूर के दौरान ध्वस्त हुए अपने मुख्यालय का दोबारा निर्माण कराया है। बताया गया कि चंदे और पाकिस्तान सरकार से मिलने वाली कथित मदद के जरिए यह काम पूरा किया गया। हालांकि, इन आरोपों और दावों को लेकर अलग-अलग स्तर पर आधिकारिक पुष्टि तथा स्वतंत्र जांच के निष्कर्षों का विवरण सामने आना महत्वपूर्ण होगा।

    FATF के प्रमुख गिल्स थॉम्पसन ने पाकिस्तान की निगरानी और मूल्यांकन प्रक्रिया को लेकर स्थिति स्पष्ट की। उनके अनुसार, अक्टूबर 2022 में पाकिस्तान को FATF की ग्रे लिस्ट से बाहर कर दिया गया था। इसके बाद से पाकिस्तान के साथ एशिया-पैसिफिक ग्रुप (APG) के माध्यम से बातचीत और मूल्यांकन की प्रक्रिया जारी है।

    ग्रे लिस्ट से बाहर होने के बाद भी पाकिस्तान को वित्तीय निगरानी से पूरी तरह मुक्त नहीं माना जा सकता। FATF की व्यवस्था के तहत सदस्य देशों और संबंधित समूहों के माध्यम से वित्तीय पारदर्शिता, धन शोधन रोकने और आतंकवादी वित्तपोषण पर नियंत्रण से जुड़े मानकों का आकलन किया जाता है। इसी प्रक्रिया के अंतर्गत पाकिस्तान की स्थिति की समीक्षा की जा रही है।

    अब 31 मार्च 2029 तक मूल्यांकन रिपोर्ट तैयार कर जमा करने की समयसीमा निर्धारित की गई है। इसके बाद 2030 की पूर्ण बैठक में इस रिपोर्ट पर विचार किया जाएगा। ऐसे में पाकिस्तान से जुड़े मामलों में FATF की अगली महत्वपूर्ण कार्रवाई का समय मूल्यांकन के निष्कर्षों पर निर्भर करेगा। फिलहाल इस प्रक्रिया के पूरा होने तक पाकिस्तान को लेकर निगरानी और समीक्षा जारी रहेगी।