यह निर्माण एमपी नगर स्थित नाप-तौल नियंत्रक कार्यालय की डेढ़ एकड़ जमीन पर प्रस्तावित है। पुराने भवन को तोड़कर नया निर्माण होगा, जिसके चलते परिसर में मौजूद सैकड़ों पेड़ों को हटाना तय माना जा रहा है। कर्मचारियों का कहना है कि नागरिक आपूर्ति निगम को छोड़ दें तो बाकी सभी विभागों के पास पहले से ही सरकारी भवन हैं। ऐसे में केवल एक विभाग के लिए 100 करोड़ रुपये खर्च करना और इसके बदले 150 पेड़ों की बलि देना अनुचित है।
मप्र नाप-तौल अधिकारी-कर्मचारी संघर्ष समिति ने मोर्चा खोल दिया है। समिति के अध्यक्ष उमाशंकर तिवारी ने बताया कि गुरुवार को भोजन अवकाश के समय कर्मचारी और पर्यावरण से जुड़े लोग पेड़ों से चिपककर चिपको आंदोलन करेंगे। विरोध के प्रतीक स्वरूप कर्मचारी काली पट्टी बांधकर काम करेंगे। कर्मचारियों ने यह भी कहा कि नए भवन के निर्माण में करीब तीन साल लगेंगे, इस दौरान मुख्यालय को किराए के भवन में शिफ्ट करना पड़ेगा जिससे लाखों रुपये अतिरिक्त खर्च होंगे।
कर्मचारियों के अनुसार सात साल पहले जगह की कमी का हवाला देकर नाप-तौल मुख्यालय से कुछ कार्यालय 50 लाख रुपये खर्च कर जेके रोड स्थित किराए के भवन में भेजे गए थे, जहां आज भी स्टाफ और सामग्री के लिए पर्याप्त जगह नहीं है। वहीं, मुख्यालय परिसर में टैंक लॉरी कैलिब्रेशन सुविधा विकसित करने के लिए पहले ही 5 करोड़ रुपये की स्वीकृति मांगी जा चुकी है।
पर्यावरणविदों का कहना है कि शहर में हरियाली लगातार घट रही है, ऐसे में पुराने और बड़े पेड़ों को बचाना प्रशासन की जिम्मेदारी है। अगर पेड़ कट गए तो न केवल शहर का हरित आवरण घटेगा बल्कि आसपास के तापमान और वायु गुणवत्ता पर भी असर पड़ेगा। कर्मचारियों और पर्यावरणविदों के इस आंदोलन से प्रशासन पर दबाव बढ़ सकता है।विरोध तेज होने के साथ ही यह मामला आने वाले दिनों में और तूल पकड़ सकता है। कर्मचारी संगठनों और पर्यावरणविदों का कहना है कि केवल प्रशासनिक फैसले से निपटने के बजाय सार्वजनिक हित और पर्यावरण सुरक्षा को ध्यान में रखना जरूरी है।
