जबलपुर के अनुभवी सर्राफा व्यापारी अजीत जैन के अनुसार, 9 कैरेट सोने की सबसे बड़ी कमजोरी इसकी संरचना में छिपी है। तकनीकी रूप से देखें तो 9 कैरेट गोल्ड का अर्थ है कि उस आभूषण में मात्र 37.5 प्रतिशत शुद्ध सोना है, जबकि शेष 62.5 प्रतिशत हिस्सा मिश्र धातु अलॉय का होता है। हालांकि, यह सोना भी अब BIS-हॉलमार्क के अंतर्गत आता है और सरकारी मानकों पर खरा उतरता है, लेकिन सोने की मात्रा इतनी कम होने के कारण यह पारंपरिक सोने 22K या 24K जैसा अनुभव नहीं दे पाता।
व्यापारियों का कहना है कि 9 कैरेट गोल्ड के रंग और चमक को लेकर सबसे ज्यादा शिकायतें आ रही हैं। इसमें मिश्र धातु की मात्रा अधिक होने के कारण कुछ समय बाद इसका पीलापन हल्का पड़ने लगता है और यह दिखने में असली सोने जैसा नहीं लगता। यदि इसे ठीक से मेंटेन न किया जाए, तो यह काला भी पड़ सकता है। यही वजह है कि ग्राहक इसे खरीदने के बाद पछतावे से बचने के लिए अभी भी 22 या 18 कैरेट के आभूषणों पर ही भरोसा जता रहे हैं।
निवेश के दृष्टिकोण से भी 9 कैरेट गोल्ड एक ‘फेल’ सौदा साबित हो रहा है। जब कोई व्यक्ति सोना खरीदता है, तो उसकी उम्मीद होती है कि भविष्य में उसे उस पर अच्छा रिटर्न मिलेगा। लेकिन 9 कैरेट सोने में शुद्ध सोने की मात्रा कम होने की वजह से री-सेल वैल्यू दोबारा बेचने पर मिलने वाली कीमत काफी कम होती है। लोग पूछते जरूर हैं, लेकिन जब उन्हें पता चलता है कि इसमें 60 फीसदी से ज्यादा अन्य धातुएं हैं, तो वे निवेश के लिए वापस 24 या 22 कैरेट की ओर मुड़ जाते हैं।
वर्तमान में 9 कैरेट गोल्ड की मांग केवल बड़े शहरों में कुछ फैशनेबल और ‘डेली वियर’ ज्वेलरी तक सीमित है। शादियों और त्योहारों के सीजन में, जहाँ प्रतिष्ठा और शुद्धता का महत्व होता है, वहाँ यह सस्ता सोना अपनी जगह बनाने में नाकाम रहा है। अंततः, भारतीय ग्राहकों के लिए सोना आज भी वही है जो बरसों तक अपनी चमक और कीमत दोनों बरकरार रख सके।
