Ayurvedic Bathing Tips: सफाई के साथ स्वास्थ्य और ताजगी के लिए ये तीन स्टेप्स अपनाएं

नई दिल्ली। भागदौड़ भरी जिंदगी में लोग हर काम तेजी से करते हैं, लेकिन खुद के लिए समय निकालना मुश्किल हो गया है। ऐसे में रोज़मर्रा की जरूरतों के बीच स्नान का महत्व अक्सर अनदेखा हो जाता है। आम धारणा यह है कि नहाना केवल शरीर की बाहरी सफाई के लिए होता है, लेकिन आयुर्वेद में इसे ‘संस्कार’ और ‘चिकित्सा’ माना गया है, जो तन के साथ-साथ मन को भी शुद्ध करता है।

स्नान से शारीरिक और मानसिक लाभ

स्नान केवल शरीर की गंदगी हटाने तक सीमित नहीं है। इसके नियमित अभ्यास से:

पाचन शक्ति मजबूत होती है और मेटाबॉलिज्म में सुधार आता है।

सुस्ती और थकान कम होती है, जिससे दिनभर ऊर्जा बनी रहती है।

रक्त संचार बेहतर होता है, और शरीर की अग्नि संतुलित रहती है।

तनाव और कोर्टिसोल का स्तर कम होता है, जबकि एंडोर्फिन हार्मोन का स्तर बढ़ता है, जिससे मन प्रसन्न रहता है।

अच्छी नींद आती है, क्योंकि स्नान से नर्वस सिस्टम शांत होता है।

यदि रोज़ाना पूरा स्नान संभव न हो, तो कम से कम गुनगुने पानी में पैरों को डुबोकर रखना भी लाभकारी माना गया है।

आयुर्वेदिक तरीके से स्नान करने के तीन नियम

आयुर्वेद में स्नान को स्वास्थ्य और सकारात्मक ऊर्जा के लिए तीन मुख्य क्रियाओं में बांटा गया है:

अभ्यंग (तेल मालिश)
नहाने से लगभग 15 मिनट पहले पूरे शरीर की तेल से मालिश करें। नवजात शिशु की तरह हल्के हाथों से अभ्यंग करने से रक्त संचार बढ़ता है, शरीर पोषित होता है और त्वचा की नमी बरकरार रहती है।

उबटन का प्रयोग
अभ्यंग के बाद उबटन लगाना त्वचा के लिए बेहद फायदेमंद है। यह मृत त्वचा की कोशिकाओं को हटाकर नई कोशिकाओं के निर्माण में मदद करता है। प्राकृतिक उबटन रसायनों से मुक्त होते हैं और त्वचा को मुलायम, चमकदार और स्वस्थ बनाते हैं।

मंत्रोच्चार
स्नान के समय सकारात्मक मंत्रोच्चार करना मन और मस्तिष्क दोनों के लिए लाभकारी है। यह मानसिक तनाव कम करता है और शरीर और मन में सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह करता है।

स्नान के नियमित अभ्यास से जीवनशैली में सुधार

नियमित स्नान सिर्फ स्वच्छता का साधन नहीं, बल्कि तन, मन और आत्मा की ताजगी का माध्यम है। आयुर्वेद के अनुसार, जब शरीर पर पानी पड़ता है, तो:

पूरे शरीर में रक्त का संचार तेज़ होता है।

पाचन अग्नि सक्रिय रहती है।

थकान दूर होती है और मन प्रसन्न रहता है।

स्नान के दौरान तेल, उबटन और मंत्रोच्चार का संयोजन शरीर और मन दोनों के लिए सशक्त ऊर्जा प्रदान करता है, जिससे जीवनशैली में सुधार आता है।

स्नान को केवल नित्यकर्म मानना बड़ी भूल है। यह तन, मन और मस्तिष्क की शुद्धि का आयुर्वेदिक तरीका है। सही विधि से स्नान करने से न केवल शरीर स्वस्थ रहता है, बल्कि मानसिक तनाव भी कम होता है और दिनभर ऊर्जा बनी रहती है। इसलिए, भागदौड़ भरी जिंदगी में भी स्नान को सिर्फ स्वच्छता नहीं, बल्कि स्वास्थ्य और सकारात्मक ऊर्जा का संस्कार समझकर अपनाना चाहिए।