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  • बारिश का मजा भी और सेहत की सुरक्षा भी, मानसून में खुद की देखभाल के लिए अपनाएं ये आसान और असरदार उपाय

    बारिश का मजा भी और सेहत की सुरक्षा भी, मानसून में खुद की देखभाल के लिए अपनाएं ये आसान और असरदार उपाय


    नई दिल्ली । बरसात का मौसम गर्मी से राहत लेकर आता है और हरियाली के साथ वातावरण को खुशनुमा बना देता है लेकिन इस मौसम में सेहत का खास ख्याल रखना भी उतना ही जरूरी होता है। बारिश के दौरान हवा में नमी बढ़ जाती है और मौसम में लगातार बदलाव देखने को मिलता है। ऐसे में थोड़ी सी लापरवाही भी सर्दी खांसी बुखार पेट से जुड़ी परेशानी और त्वचा संबंधी समस्याओं का कारण बन सकती है। इसलिए मानसून का आनंद लेने के साथ साथ खुद की देखभाल पर ध्यान देना जरूरी है। सही खानपान साफ सफाई और रोजमर्रा की कुछ अच्छी आदतें अपनाकर इस मौसम में खुद को स्वस्थ और फिट रखा जा सकता है।

    बरसात के मौसम में सबसे पहले साफ सफाई पर विशेष ध्यान देना चाहिए। घर के आसपास पानी जमा नहीं होने देना चाहिए क्योंकि जमा हुआ पानी मच्छरों के पनपने का कारण बन सकता है। बारिश में बाहर से आने के बाद गीले कपड़ों को तुरंत बदल देना चाहिए और शरीर को अच्छी तरह सुखाना चाहिए। लंबे समय तक गीले कपड़े पहनने से त्वचा में खुजली और फंगल संक्रमण जैसी समस्याएं बढ़ सकती हैं। पैरों को भी साफ और सूखा रखना जरूरी है क्योंकि मानसून में पैरों में संक्रमण होने की संभावना बढ़ जाती है। बाहर से आने के बाद हाथ और पैरों को अच्छी तरह धोने की आदत स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद हो सकती है।

    इस मौसम में खानपान का भी विशेष महत्व होता है। बाहर का खुला और लंबे समय से रखा हुआ खाना खाने से बचना चाहिए। बारिश के दिनों में ताजा और घर का बना भोजन ज्यादा सुरक्षित विकल्प माना जाता है। भोजन में फल सब्जियां दाल और अन्य पौष्टिक चीजों को शामिल करना चाहिए ताकि शरीर को जरूरी पोषण मिल सके। पर्याप्त मात्रा में पानी पीना भी जरूरी है क्योंकि कई लोग ठंडे मौसम में पानी कम पीने लगते हैं। शरीर को हाइड्रेट रखना सेहत के लिए हर मौसम में जरूरी है। पीने के पानी और खाने की स्वच्छता का ध्यान रखना भी इस मौसम में महत्वपूर्ण होता है।

    मानसून में त्वचा की देखभाल को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। बढ़ी हुई नमी के कारण त्वचा चिपचिपी हो सकती है और कुछ लोगों को पिंपल्स या रैशेज की परेशानी हो सकती है। इसलिए चेहरे और शरीर को साफ रखना जरूरी है। त्वचा पर बहुत ज्यादा भारी उत्पादों का इस्तेमाल करने के बजाय अपनी स्किन टाइप के अनुसार हल्के और उपयुक्त उत्पादों का चयन किया जा सकता है। किसी भी नई स्किन प्रोडक्ट से एलर्जी या जलन महसूस होने पर उसका इस्तेमाल बंद कर देना चाहिए।

    बरसात के दिनों में पर्याप्त नींद और आराम भी जरूरी है। मौसम में बदलाव के कारण शरीर थका हुआ महसूस कर सकता है इसलिए रोजाना पर्याप्त नींद लेने की कोशिश करनी चाहिए। हल्की एक्सरसाइज योग या घर पर स्ट्रेचिंग जैसी गतिविधियां शरीर को सक्रिय रखने में मदद कर सकती हैं। अगर बाहर बारिश हो रही हो तो घर के अंदर ही कुछ समय शारीरिक गतिविधि के लिए निकालना बेहतर हो सकता है। मानसिक स्वास्थ्य का ख्याल रखना भी सेल्फ केयर का महत्वपूर्ण हिस्सा है इसलिए अपनी पसंद की गतिविधियों के लिए समय निकालना चाहिए।

    बारिश में भीगने का आनंद लेना गलत नहीं है लेकिन लंबे समय तक गीले रहने से बचना चाहिए। अगर बारिश में भीग जाएं तो घर पहुंचकर जल्द से जल्द सूखे कपड़े पहनें और शरीर को गर्म और आरामदायक रखें। किसी भी तरह के लगातार बुखार तेज कमजोरी सांस लेने में परेशानी या अन्य गंभीर लक्षण दिखाई देने पर घरेलू उपायों पर निर्भर रहने के बजाय डॉक्टर की सलाह लेना जरूरी है। मानसून में छोटी छोटी सावधानियां अपनाकर न केवल बीमारियों के जोखिम को कम किया जा सकता है बल्कि पूरे मौसम का आनंद भी बेहतर तरीके से लिया जा सकता है। साफ सफाई पौष्टिक भोजन पर्याप्त पानी अच्छी नींद और सक्रिय दिनचर्या ही बरसात के मौसम में खुद की बेहतर देखभाल का सबसे आसान तरीका है।

  • स्किन केयर रूटीन में शामिल करें एवोकाडो, पोषण और नमी से त्वचा को बना सकता है ज्यादा सॉफ्ट और हेल्दी

    स्किन केयर रूटीन में शामिल करें एवोकाडो, पोषण और नमी से त्वचा को बना सकता है ज्यादा सॉफ्ट और हेल्दी


    नई दिल्ली । त्वचा की देखभाल के लिए लोग बाजार में मिलने वाले महंगे ब्यूटी प्रोडक्ट्स का इस्तेमाल करते हैं लेकिन कई प्राकृतिक चीजें भी स्किन केयर रूटीन में उपयोगी साबित हो सकती हैं। इन्हीं में से एक है एवोकाडो जो अपने पोषक तत्वों और हेल्दी फैट्स के कारण काफी लोकप्रिय है। एवोकाडो को खाने के साथ साथ त्वचा की देखभाल में भी शामिल किया जा सकता है। इसमें मौजूद पोषक तत्व त्वचा को नमी देने और उसे मुलायम बनाए रखने में सहायक हो सकते हैं। खासतौर पर जिन लोगों की त्वचा रूखी रहती है उनके लिए एवोकाडो आधारित घरेलू स्किन केयर उपाय उपयोगी हो सकते हैं। हालांकि हर व्यक्ति की त्वचा अलग होती है इसलिए किसी भी चीज को चेहरे पर लगाने से पहले सावधानी रखना जरूरी है।

    एवोकाडो में प्राकृतिक रूप से हेल्दी फैट्स पाए जाते हैं जो त्वचा की नमी बनाए रखने में मदद कर सकते हैं। रूखी और बेजान त्वचा में नमी की कमी होने पर चेहरा खिंचा हुआ और थका हुआ दिखाई देने लगता है। ऐसे में एवोकाडो का गूदा त्वचा को मॉइस्चराइज करने वाले घरेलू उपाय के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है। पके हुए एवोकाडो को अच्छी तरह मैश करके चेहरे पर हल्के हाथों से लगाया जा सकता है और कुछ समय बाद साफ पानी से धोया जा सकता है। यह त्वचा को मुलायम महसूस कराने में मदद कर सकता है।

    त्वचा की देखभाल के लिए एवोकाडो का इस्तेमाल अन्य प्राकृतिक चीजों के साथ भी किया जाता है। उदाहरण के लिए इसे थोड़ी मात्रा में शहद के साथ मिलाकर फेस पैक के रूप में लगाया जा सकता है। शहद त्वचा को नमी देने वाले गुणों के लिए जाना जाता है और एवोकाडो के साथ इसका संयोजन रूखी त्वचा के लिए उपयोगी महसूस हो सकता है। इस तरह के घरेलू फेस पैक को चेहरे पर बहुत अधिक देर तक रखने की जरूरत नहीं होती। लगाने से पहले त्वचा को साफ कर लेना चाहिए और बाद में चेहरे को सामान्य पानी से धोना बेहतर रहता है।

    अगर त्वचा बहुत ज्यादा रूखी दिखाई देती है तो एवोकाडो को दही जैसे हल्के प्राकृतिक पदार्थों के साथ मिलाकर भी इस्तेमाल किया जा सकता है। इससे त्वचा को ताजगी और नमी का एहसास मिल सकता है। हालांकि संवेदनशील त्वचा वाले लोगों को किसी भी नए मिश्रण का उपयोग करने से पहले पैच टेस्ट जरूर करना चाहिए। चेहरे पर सीधे कोई भी घरेलू नुस्खा लगाने से पहले हाथ के छोटे हिस्से पर जांच करना एक सुरक्षित तरीका हो सकता है। जलन खुजली लालिमा या किसी भी तरह की परेशानी महसूस होने पर उसका इस्तेमाल तुरंत बंद कर देना चाहिए।

    एवोकाडो का लाभ केवल बाहर से लगाने तक सीमित नहीं है। संतुलित आहार में पोषक तत्वों से भरपूर खाद्य पदार्थों को शामिल करना भी त्वचा के स्वास्थ्य के लिए महत्वपूर्ण होता है। पर्याप्त पानी पीना संतुलित भोजन करना अच्छी नींद लेना और नियमित रूप से त्वचा की सफाई करना हेल्दी स्किन के लिए जरूरी आदतें हैं। केवल एक घरेलू चीज से त्वचा की हर समस्या खत्म होने की उम्मीद करना सही नहीं है लेकिन सही जीवनशैली के साथ प्राकृतिक चीजों का संतुलित उपयोग स्किन केयर रूटीन को बेहतर बना सकता है।

    एवोकाडो को स्किन केयर का हिस्सा बनाते समय यह ध्यान रखना जरूरी है कि प्राकृतिक होने का मतलब यह नहीं है कि हर चीज हर व्यक्ति की त्वचा के लिए पूरी तरह उपयुक्त होगी। अगर लंबे समय से मुंहासे एलर्जी खुजली या अन्य त्वचा संबंधी समस्या बनी हुई है तो घरेलू उपायों पर निर्भर रहने के बजाय त्वचा विशेषज्ञ की सलाह लेना बेहतर होता है। सही देखभाल और संतुलित दिनचर्या के साथ एवोकाडो को अपने ब्यूटी रूटीन में शामिल कर त्वचा को प्राकृतिक पोषण और नमी देने की कोशिश की जा सकती है।

  • सुबह शहद-नींबू पानी पीना है वेट लॉस का फॉर्मूला? जानिए क्या कहता है विज्ञान

    सुबह शहद-नींबू पानी पीना है वेट लॉस का फॉर्मूला? जानिए क्या कहता है विज्ञान


    नई दिल्ली। आज के समय में बढ़ता वजन और पेट की चर्बी लोगों के लिए बड़ी चिंता बन चुके हैं। वजन कम करने के लिए लोग डाइट से लेकर एक्सरसाइज तक कई तरीके अपनाते हैं। इसी बीच सुबह खाली पेट गुनगुने पानी में नींबू और शहद मिलाकर पीने का चलन भी काफी बढ़ गया है। इसे अक्सर फैट बर्निंग या डिटॉक्स ड्रिंक के तौर पर प्रचारित किया जाता है। दावा किया जाता है कि रोजाना इसका सेवन करने से शरीर में जमा अतिरिक्त चर्बी तेजी से कम होती है और मेटाबॉलिज्म भी बेहतर होता है। लेकिन सवाल यह है कि क्या वाकई यह पेय अकेले वजन कम कर सकता है?

    विशेषज्ञों के मुताबिक नींबू और शहद दोनों में कुछ पोषक और जैविक गुण जरूर पाए जाते हैं लेकिन इनके मिश्रण को सीधे तौर पर शरीर की चर्बी पिघलाने वाली ड्रिंक मानना सही नहीं है। अब तक ऐसा मजबूत वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है जो यह साबित करे कि नींबू और शहद का पानी शरीर में जमा फैट को सीधे बर्न करता है। वजन घटाने की प्रक्रिया कई चीजों पर निर्भर करती है और इसमें पूरे दिन के खान-पान के साथ शारीरिक गतिविधि और जीवनशैली की अहम भूमिका होती है।

    नींबू पानी का एक फायदा यह जरूर हो सकता है कि इसमें कैलोरी बहुत कम होती है। अगर कोई व्यक्ति मीठे पेय या ज्यादा कैलोरी वाले ड्रिंक की जगह सादा नींबू पानी पीता है तो उसकी कुल कैलोरी खपत कम हो सकती है। पर्याप्त पानी पीना भी शरीर के सामान्य कामकाज के लिए जरूरी है। पानी पीने से शरीर हाइड्रेट रहता है और कुछ लोगों को भोजन से पहले पानी लेने पर पेट भरा हुआ महसूस हो सकता है। इससे जरूरत से ज्यादा खाने से बचने में मदद मिल सकती है।

    हालांकि वजन घटाने के नाम पर नींबू पानी में अधिक मात्रा में शहद मिलाना उल्टा असर डाल सकता है। शहद प्राकृतिक जरूर है लेकिन इसमें कैलोरी और शुगर मौजूद होती है। इसलिए अगर कोई व्यक्ति रोजाना अपने पेय में ज्यादा शहद डालता है तो उसकी कुल कैलोरी खपत बढ़ सकती है। ऐसे में वेट लॉस की कोशिश प्रभावित हो सकती है। अगर किसी को नींबू पानी पसंद है तो इसे बिना शहद या बहुत कम मात्रा में शहद के साथ लिया जा सकता है।

    वास्तविक वेट लॉस के लिए किसी एक ड्रिंक पर निर्भर रहने के बजाय पूरे दिन की डाइट पर ध्यान देना ज्यादा जरूरी है। भोजन में पोषक तत्वों का संतुलन बनाए रखना और जरूरत के अनुसार कैलोरी लेना महत्वपूर्ण है। इसके साथ नियमित वॉकिंग रनिंग योग या अन्य शारीरिक गतिविधियां भी वजन नियंत्रित करने में मदद करती हैं। पर्याप्त नींद और तनाव को नियंत्रित रखना भी स्वस्थ वजन बनाए रखने की प्रक्रिया का हिस्सा है।

    इसलिए शहद-नींबू पानी को चमत्कारी फैट बर्निंग ड्रिंक मानने के बजाय इसे एक कम कैलोरी वाले पेय के रूप में देखना बेहतर है। सिर्फ इसे पीने से पेट की चर्बी तेजी से कम होने की उम्मीद करना सही नहीं होगा। वजन घटाने का टिकाऊ तरीका संतुलित भोजन नियमित गतिविधि पर्याप्त पानी अच्छी नींद और लंबे समय तक स्वस्थ आदतों को अपनाना है।

  • युवाओं में अचानक मौत की वजह क्या? 25 अस्पतालों की स्टडी में सामने आए ये बड़े जोखिम

    युवाओं में अचानक मौत की वजह क्या? 25 अस्पतालों की स्टडी में सामने आए ये बड़े जोखिम


    नई दिल्ली। जिम में कसरत करते हुए या डांस के दौरान अचानक किसी युवा की मौत की खबर अक्सर लोगों को हैरान कर देती है. देखने में पूरी तरह फिट नजर आने वाले व्यक्ति के साथ आखिर ऐसा कैसे हो सकता है. भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद यानी आईसीएमआर के एक अध्ययन ने इस सवाल से जुड़े कई अहम संकेत दिए हैं. शोधकर्ताओं के मुताबिक कम उम्र में दिल का दौरा और रक्त के थक्के बनने के पीछे कई जोखिम कारक जिम्मेदार हो सकते हैं. इनमें पहले रक्त का थक्का बनना परिवार में ऐसी समस्या का इतिहास दूसरी बीमारियां और धूम्रपान जैसे कारण प्रमुख हैं.

    यह अध्ययन आईसीएमआर के राष्ट्रीय महामारी विज्ञान संस्थान के शोधकर्ताओं ने देश के 25 बड़े अस्पतालों में किया. शोध में 18 से 45 वर्ष की उम्र के 767 मरीजों को शामिल किया गया. खास बात यह रही कि अध्ययन में ऐसे मरीजों को देखा गया जिन्हें समय पर इलाज मिलने के बाद बचा लिया गया था. इसका उद्देश्य यह समझना था कि अपेक्षाकृत कम उम्र में दिल का दौरा पड़ने या शरीर में रक्त के थक्के बनने के पीछे कौन से कारक भूमिका निभा सकते हैं.

    अध्ययन में सामने आया कि जिन लोगों को पहले भी रक्त का थक्का बनने की समस्या हो चुकी थी उनमें दिल का दौरा पड़ने का जोखिम बहुत अधिक पाया गया. ऐसे लोगों में यह खतरा करीब 60 गुना तक ज्यादा देखा गया. वहीं जिन मरीजों को पहले से कोई दूसरी बीमारी थी उनमें दिल के दौरे का जोखिम 4.6 गुना अधिक पाया गया.

    धूम्रपान करने वालों के लिए भी अध्ययन में गंभीर चेतावनी सामने आई. ऐसे लोगों में दिल के दौरे का खतरा 3.5 गुना अधिक पाया गया. इसके अलावा जिन लोगों के परिवार में पहले किसी सदस्य को रक्त का थक्का बनने की समस्या रही थी उनमें भी दिल के दौरे का जोखिम सामान्य लोगों की तुलना में करीब 3.3 गुना ज्यादा पाया गया.

    शोध में कोविड से जुड़ी जानकारी भी सामने आई. जिन लोगों को कोविड संक्रमण के कारण अस्पताल में भर्ती होना पड़ा था उनमें रक्त का थक्का बनने की समस्या देखी गई. हालांकि अध्ययन के मुताबिक कोविड वैक्सीन से लोगों को इस तरह का नुकसान होने का प्रमाण नहीं मिला.

    अध्ययन में शामिल 767 मरीजों में 432 यानी करीब 56.3 प्रतिशत लोगों को दिल का दौरा पड़ा था. वहीं 198 यानी करीब 25.8 प्रतिशत मरीजों में दिमाग की नस में रक्त का प्रवाह रुकने से जुड़ी समस्या सामने आई. दोनों तरह के मामलों को मिलाकर यह संख्या अध्ययन में शामिल मरीजों का बड़ा हिस्सा थी.

    उम्र के लिहाज से भी अध्ययन महत्वपूर्ण है. कुल मरीजों में 614 यानी करीब 80.1 प्रतिशत की उम्र 31 से 45 वर्ष के बीच थी. इसका मतलब यह है कि ऐसे जोखिम केवल बहुत अधिक उम्र के लोगों तक सीमित नहीं हैं. युवाओं में भी यदि पहले से कोई जोखिम मौजूद है तो उसे नजरअंदाज करना भारी पड़ सकता है.

    विशेषज्ञों के मुताबिक इसका मतलब यह नहीं है कि जिम जाना या डांस करना अपने आप में खतरनाक है. नियमित शारीरिक गतिविधि सामान्य तौर पर स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद होती है. लेकिन जिन लोगों में पहले से हृदय संबंधी जोखिम या रक्त के थक्के से जुड़ी समस्या का इतिहास है उन्हें अपनी क्षमता के अनुसार व्यायाम करना चाहिए और जरूरत पड़ने पर डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए.

    इस अध्ययन से एक अहम संदेश यह मिलता है कि अचानक होने वाली घटनाओं के पीछे कई बार पहले से मौजूद जोखिम छिपे हो सकते हैं. इसलिए शरीर के संकेतों को नजरअंदाज करने के बजाय समय रहते जांच और चिकित्सकीय सलाह लेना जरूरी है. खासकर धूम्रपान करने वालों और परिवार में ऐसी बीमारी का इतिहास रखने वाले लोगों को अपनी सेहत को लेकर ज्यादा सतर्क रहना चाहिए.

  • मानसून में सर्दी जुकाम से बचने के लिए अपनाएं ये आसान उपाय! शरीर को गर्म और इम्युनिटी को मजबूत रखने में मिलेगी मदद

    मानसून में सर्दी जुकाम से बचने के लिए अपनाएं ये आसान उपाय! शरीर को गर्म और इम्युनिटी को मजबूत रखने में मिलेगी मदद


    नई दिल्ली। बरसात का मौसम गर्मी से राहत जरूर देता है लेकिन इस दौरान मौसम में नमी बढ़ने और तापमान में उतार चढ़ाव के कारण कई लोगों को सर्दी जुकाम खांसी और गले में खराश जैसी परेशानियां होने लगती हैं। बारिश में भीगने के बाद लंबे समय तक गीले कपड़ों में रहना या अचानक ठंडी और गर्म जगह के बीच जाना भी परेशानी बढ़ा सकता है। हालांकि केवल बारिश में भीगना ही सर्दी जुकाम का सीधा कारण नहीं होता बल्कि वायरल संक्रमण इसके प्रमुख कारणों में शामिल हैं। ऐसे में मानसून के दौरान साफ सफाई और रोजमर्रा की कुछ आदतों पर ध्यान देकर संक्रमण के जोखिम को कम करने की कोशिश की जा सकती है।

    बारिश के मौसम में सबसे पहले शरीर को गीला होने से बचाना जरूरी है। अगर आप बारिश में भीग जाते हैं तो घर पहुंचने के बाद गीले कपड़े तुरंत बदलें और शरीर को अच्छी तरह सुखाएं। गीले कपड़ों में लंबे समय तक रहने से असहजता बढ़ सकती है और शरीर को ठंड महसूस हो सकती है। बारिश के दिनों में बाहर निकलते समय छाता या रेनकोट साथ रखना भी उपयोगी आदत है।

    मानसून के दौरान हाथों की साफ सफाई पर विशेष ध्यान देना चाहिए। बाहर से घर लौटने के बाद साबुन और पानी से हाथ अच्छी तरह धोएं। बिना हाथ धोए आंख नाक और मुंह को छूने से बचें क्योंकि वायरस और अन्य संक्रमण फैलाने वाले कण हाथों के जरिए शरीर तक पहुंच सकते हैं। अगर आसपास किसी व्यक्ति को सर्दी जुकाम है तो उसके बेहद करीब जाने से बचना और व्यक्तिगत सामान साझा न करना भी संक्रमण के जोखिम को कम करने में मदद कर सकता है।

    खानपान भी मानसून में सेहत के लिए महत्वपूर्ण है। इस मौसम में ताजा और अच्छी तरह पका हुआ भोजन करना बेहतर माना जाता है। पर्याप्त पानी पीते रहें और डाइट में फल सब्जियां दालें और अन्य पोषक खाद्य पदार्थ शामिल करें। संतुलित आहार शरीर को जरूरी पोषक तत्व उपलब्ध कराने में मदद करता है। बहुत ज्यादा तला भुना या लंबे समय तक रखा हुआ भोजन खाने से बचना भी बेहतर है।

    मानसून में पर्याप्त नींद लेना और शरीर को आराम देना भी जरूरी है। लगातार कम नींद और खराब दिनचर्या से शरीर की सामान्य प्रतिरोधक क्षमता प्रभावित हो सकती है। इसलिए रोजाना पर्याप्त नींद लेने की कोशिश करें। कमरे में पर्याप्त हवा का आवागमन रखें और बहुत ज्यादा ठंडी हवा के सीधे संपर्क से बचें।

    अगर सर्दी जुकाम हो भी जाए तो पर्याप्त आराम और तरल पदार्थों का सेवन मददगार हो सकता है। गले में खराश या नाक बंद होने जैसी परेशानी लगातार बनी रहे तो डॉक्टर से सलाह लेना बेहतर है। तेज बुखार सांस लेने में परेशानी सीने में दर्द या लक्षणों के लंबे समय तक बने रहने पर खुद से दवा लेने के बजाय चिकित्सकीय सलाह लेनी चाहिए। मानसून में थोड़ी सावधानी और अच्छी स्वच्छता की आदतें अपनाकर सर्दी जुकाम समेत कई संक्रमणों के जोखिम को कम किया जा सकता है।

  • स्किन को ग्लोइंग बनाने के लिए डाइट में शामिल करें ये फल! विटामिन और एंटीऑक्सीडेंट से त्वचा को मिलेगा पोषण

    स्किन को ग्लोइंग बनाने के लिए डाइट में शामिल करें ये फल! विटामिन और एंटीऑक्सीडेंट से त्वचा को मिलेगा पोषण


    नई दिल्ली। ग्लोइंग और हेल्दी स्किन हर किसी की चाहत होती है और इसके लिए लोग तरह तरह के स्किन केयर प्रोडक्ट्स का इस्तेमाल करते हैं। हालांकि त्वचा की देखभाल केवल बाहर से किए जाने वाले स्किन केयर तक सीमित नहीं है। हमारी डाइट का भी त्वचा की सेहत पर असर पड़ता है। रोजाना की डाइट में पोषक तत्वों से भरपूर फलों को शामिल करके शरीर को जरूरी विटामिन मिनरल्स और एंटीऑक्सीडेंट मिल सकते हैं। ये पोषक तत्व त्वचा को स्वस्थ बनाए रखने में मदद कर सकते हैं। खासतौर पर कुछ फलों में मौजूद विटामिन सी विटामिन ए पानी और एंटीऑक्सीडेंट स्किन के लिए उपयोगी माने जाते हैं।

    संतरा और अन्य खट्टे फल त्वचा के लिए अच्छी डाइट का हिस्सा हो सकते हैं। इनमें विटामिन सी पाया जाता है जो शरीर के लिए जरूरी पोषक तत्व है। संतरे जैसे फलों में पानी की मात्रा भी अच्छी होती है जिससे शरीर को हाइड्रेशन बनाए रखने में मदद मिल सकती है। नियमित रूप से मौसमी फलों का सेवन करना त्वचा के साथ साथ पूरे शरीर के लिए बेहतर डाइट का हिस्सा बन सकता है।

    पपीता भी उन फलों में शामिल है जिन्हें स्किन फ्रेंडली डाइट में जगह दी जा सकती है। इसमें विटामिन ए विटामिन सी और कई अन्य पोषक तत्व पाए जाते हैं। पपीते को नाश्ते या दिन के किसी दूसरे समय आसानी से खाया जा सकता है। इसके सेवन से शरीर को जरूरी पोषण मिलता है और संतुलित डाइट बनाए रखने में मदद मिलती है।

    तरबूज गर्म मौसम में शरीर को हाइड्रेट रखने वाला लोकप्रिय फल है। इसमें पानी की मात्रा काफी अधिक होती है। शरीर में पर्याप्त पानी होना त्वचा के सामान्य स्वास्थ्य के लिए महत्वपूर्ण है। ऐसे में तरबूज को डाइट में शामिल करना खासतौर पर गर्म दिनों में अच्छा विकल्प हो सकता है। इसे सीधे काटकर या फ्रूट बाउल के रूप में खाया जा सकता है।

    कीवी भी पोषक तत्वों से भरपूर फलों में गिना जाता है। इसमें विटामिन सी और अन्य एंटीऑक्सीडेंट पाए जाते हैं। एंटीऑक्सीडेंट युक्त खाद्य पदार्थ शरीर को ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस से बचाने में भूमिका निभाते हैं। इसलिए संतुलित डाइट में कीवी जैसे फलों को शामिल करना त्वचा के साथ संपूर्ण स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद हो सकता है।

    स्ट्रॉबेरी और दूसरे बेरीज भी डाइट को पोषक बनाने का अच्छा विकल्प हैं। इनमें विटामिन सी और एंटीऑक्सीडेंट पाए जाते हैं। इन्हें दही के साथ या सीधे फल के रूप में खाया जा सकता है। हालांकि किसी एक फल को त्वचा की सभी समस्याओं का इलाज नहीं माना जा सकता। हेल्दी स्किन के लिए संतुलित आहार पर्याप्त पानी अच्छी नींद नियमित शारीरिक गतिविधि और सही स्किन केयर रूटीन पर भी ध्यान देना जरूरी है।

    इसलिए अगर आप अपनी त्वचा को अंदर से पोषण देना चाहते हैं तो डाइट में अलग अलग रंग और प्रकार के फलों को शामिल करने की कोशिश करें। मौसमी और ताजे फलों को प्राथमिकता देना बेहतर विकल्प हो सकता है। साथ ही बहुत ज्यादा मीठे पैकेज्ड जूस की जगह साबुत फल खाना अधिक उपयोगी हो सकता है क्योंकि इससे फल में मौजूद फाइबर भी मिलता है।

  • घर में किसी को रही है गंभीर बीमारी तो सावधान! डायबिटीज और कैंसर का खतरा समझें, वक्त पर स्क्रीनिंग से रहें सुरक्षित

    घर में किसी को रही है गंभीर बीमारी तो सावधान! डायबिटीज और कैंसर का खतरा समझें, वक्त पर स्क्रीनिंग से रहें सुरक्षित


    नई दिल्ली। किसी परिवार में अगर डायबिटीज कैंसर हृदय रोग या हाई ब्लड प्रेशर जैसी बीमारी का इतिहास रहा हो तो अक्सर परिवार के दूसरे सदस्यों के मन में भी चिंता पैदा हो जाती है। सबसे बड़ा सवाल यही होता है कि क्या परिवार में किसी करीबी को बीमारी होने का मतलब यह है कि आने वाली पीढ़ियों में भी वही बीमारी होना तय है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार ऐसा जरूरी नहीं है। परिवार में किसी बीमारी की हिस्ट्री होने से व्यक्ति में उसका जोखिम बढ़ सकता है लेकिन इसका मतलब यह नहीं होता कि बीमारी निश्चित रूप से उसे भी होगी। आनुवंशिक कारणों के साथ जीवनशैली खानपान शारीरिक गतिविधि और पर्यावरण जैसे कई दूसरे कारक भी बीमारी के जोखिम को प्रभावित करते हैं।

    कुछ बीमारियों में आनुवंशिक संबंध अपेक्षाकृत स्पष्ट माना जाता है। उदाहरण के तौर पर कुछ परिवारों में कम उम्र में बहुत ज्यादा कोलेस्ट्रॉल की समस्या या हार्ट अटैक का इतिहास देखने को मिलता है। ऐसी स्थिति को सामान्य मानकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। फैमिलियल हाइपरकोलेस्ट्रोलेमिया एक ऐसी आनुवंशिक स्थिति है जिसमें खराब कोलेस्ट्रॉल यानी एलडीएल का स्तर बहुत ज्यादा हो सकता है। इसके कारण कम उम्र में कोरोनरी हार्ट डिजीज और हार्ट अटैक का खतरा बढ़ सकता है। इसलिए यदि परिवार में किसी सदस्य को कम उम्र में हार्ट अटैक हुआ है या किसी करीबी व्यक्ति का बैड कोलेस्ट्रॉल लगातार बहुत ज्यादा रहता है तो परिवार के दूसरे सदस्यों को भी डॉक्टर से सलाह लेकर जांच कराने पर विचार करना चाहिए।

    कैंसर के मामले में भी पारिवारिक इतिहास महत्वपूर्ण हो सकता है। हालांकि हर कैंसर आनुवंशिक नहीं होता और परिवार में किसी सदस्य को कैंसर होने का मतलब यह नहीं कि दूसरे सदस्य को भी कैंसर जरूर होगा। लेकिन कुछ आनुवंशिक बदलाव विशेष प्रकार के कैंसर के जोखिम को बढ़ा सकते हैं। BRCA1 और BRCA2 जैसे आनुवंशिक बदलाव वंशानुगत स्तन और अंडाशय कैंसर सिंड्रोम से जुड़े पाए गए हैं। इसी तरह लिंच सिंड्रोम कोलोरेक्टल और कुछ अन्य कैंसर के बढ़े हुए जोखिम से जुड़ा है। ऐसे मामलों में परिवार की मेडिकल हिस्ट्री को डॉक्टर के साथ साझा करना महत्वपूर्ण हो जाता है।

    डायबिटीज को लेकर भी परिवार का इतिहास एक महत्वपूर्ण जोखिम कारक हो सकता है। अगर माता पिता या भाई बहन में डायबिटीज रही है तो व्यक्ति को अपने स्वास्थ्य को लेकर ज्यादा सतर्क रहना चाहिए। लेकिन केवल आनुवंशिक जोखिम के कारण बीमारी होना तय नहीं होता। वजन खानपान शारीरिक गतिविधि और रोजमर्रा की जीवनशैली भी जोखिम को प्रभावित कर सकती है। इसलिए परिवार में बीमारी होने पर घबराने के बजाय अपने स्वास्थ्य पर ध्यान देना अधिक जरूरी है।


    डायबिटीज को लेकर भी परिवार का इतिहास एक महत्वपूर्ण जोखिम कारक हो सकता है। अगर माता पिता या भाई बहन में डायबिटीज रही है तो व्यक्ति को अपने स्वास्थ्य को लेकर ज्यादा सतर्क रहना चाहिए। लेकिन केवल आनुवंशिक जोखिम के कारण बीमारी होना तय नहीं होता। वजन खानपान शारीरिक गतिविधि और रोजमर्रा की जीवनशैली भी जोखिम को प्रभावित कर सकती है। इसलिए परिवार में बीमारी होने पर घबराने के बजाय अपने स्वास्थ्य पर ध्यान देना अधिक जरूरी है।

    विशेषज्ञों की सलाह के मुताबिक परिवार में गंभीर बीमारी की हिस्ट्री हो तो डॉक्टर को इसकी जानकारी जरूर दें। डॉक्टर आपकी उम्र स्वास्थ्य स्थिति और पारिवारिक इतिहास को ध्यान में रखते हुए जरूरी जांच या स्क्रीनिंग की सलाह दे सकते हैं। कुछ मामलों में जेनेटिक काउंसलिंग भी उपयोगी हो सकती है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि बीमारी के पारिवारिक इतिहास को डर की वजह न बनाएं बल्कि इसे समय रहते सावधान होने का संकेत समझें। नियमित स्वास्थ्य जांच संतुलित खानपान पर्याप्त शारीरिक गतिविधि और डॉक्टर की सलाह के अनुसार स्क्रीनिंग अपनाकर कई जोखिमों को समय पर पहचाना और नियंत्रित किया जा सकता है।

  • ग्लोइंग स्किन का आसान फॉर्मूला: रोज की इन आदतों से त्वचा रहेगी साफ और हेल्दी गलत स्किन केयर से बचना भी जरूरी

    ग्लोइंग स्किन का आसान फॉर्मूला: रोज की इन आदतों से त्वचा रहेगी साफ और हेल्दी गलत स्किन केयर से बचना भी जरूरी


    नई दिल्ली। स्किन केयर आज के समय में सिर्फ खूबसूरती से जुड़ा विषय नहीं है बल्कि स्वस्थ त्वचा के लिए सही देखभाल करना भी जरूरी माना जाता है। धूल मिट्टी प्रदूषण धूप बदलता मौसम तनाव और अनियमित दिनचर्या का असर त्वचा पर दिखाई दे सकता है। कई बार चेहरे पर रूखापन मुंहासे अतिरिक्त तेल या बेजानपन जैसी समस्याएं नजर आने लगती हैं। ऐसे में महंगे प्रोडक्ट्स की लंबी लिस्ट अपनाने के बजाय अपनी त्वचा की जरूरत को समझना और एक आसान नियमित स्किन केयर रूटीन बनाना ज्यादा महत्वपूर्ण हो सकता है।

    त्वचा की देखभाल की शुरुआत चेहरे की सफाई से होती है। दिनभर त्वचा पर धूल प्रदूषण और पसीना जमा हो सकता है इसलिए चेहरे को साफ रखना जरूरी है। हालांकि बहुत ज्यादा बार चेहरा धोने या कठोर क्लींजर इस्तेमाल करने से त्वचा की प्राकृतिक नमी प्रभावित हो सकती है। अपनी त्वचा के प्रकार के अनुसार हल्का क्लींजर चुनना बेहतर विकल्प हो सकता है। तैलीय त्वचा वाले लोगों को अतिरिक्त तेल पर ध्यान देना चाहिए जबकि रूखी त्वचा वालों के लिए नमी बनाए रखना ज्यादा जरूरी होता है।

    मॉइस्चराइजर भी स्किन केयर रूटीन का महत्वपूर्ण हिस्सा है। त्वचा तैलीय हो या रूखी उसे नमी की जरूरत होती है। सही मॉइस्चराइजर त्वचा को मुलायम बनाए रखने में मदद कर सकता है। इसके अलावा दिन के समय सनस्क्रीन का इस्तेमाल करना भी बेहद महत्वपूर्ण है। धूप में मौजूद पराबैंगनी किरणों से त्वचा को नुकसान पहुंच सकता है और लंबे समय में समय से पहले उम्र बढ़ने के संकेत दिखाई दे सकते हैं। इसलिए बाहर निकलने से पहले उपयुक्त सनस्क्रीन लगाना और जरूरत के अनुसार दोबारा लगाना फायदेमंद हो सकता है।

    स्किन केयर केवल बाहर से लगाए जाने वाले प्रोडक्ट्स तक सीमित नहीं है। शरीर को पर्याप्त पानी देना संतुलित भोजन लेना और पर्याप्त नींद लेना भी त्वचा के स्वास्थ्य के लिए महत्वपूर्ण है। फलों सब्जियों और पोषक तत्वों से भरपूर भोजन को रोज की डाइट में शामिल करना शरीर के साथ त्वचा के लिए भी बेहतर हो सकता है। वहीं लगातार तनाव और नींद की कमी का असर त्वचा की स्थिति पर भी पड़ सकता है इसलिए आराम और नियमित दिनचर्या को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।

    एक आम गलती यह भी होती है कि लोग किसी दूसरे व्यक्ति की स्किन केयर रूटीन को बिना अपनी त्वचा समझे अपनाने लगते हैं। हर व्यक्ति की त्वचा अलग होती है और जो प्रोडक्ट किसी एक व्यक्ति को सूट करता है जरूरी नहीं कि वह दूसरे के लिए भी सही हो। नए प्रोडक्ट को सीधे पूरे चेहरे पर लगाने के बजाय पहले छोटे हिस्से पर पैच टेस्ट करना बेहतर रहता है। किसी प्रोडक्ट के इस्तेमाल के बाद जलन खुजली या लालिमा जैसी समस्या हो तो उसका इस्तेमाल रोक देना चाहिए।

    इसके अलावा मुंहासों को बार बार दबाना चेहरे को जरूरत से ज्यादा स्क्रब करना और बिना सलाह के कई तरह के एक्टिव प्रोडक्ट एक साथ इस्तेमाल करना त्वचा को नुकसान पहुंचा सकता है। यदि त्वचा पर लगातार गंभीर मुंहासे दाने लालिमा खुजली या कोई अन्य समस्या बनी रहती है तो घरेलू उपायों के बजाय त्वचा विशेषज्ञ से सलाह लेना बेहतर है। कुल मिलाकर हेल्दी और ग्लोइंग स्किन के लिए महंगे प्रोडक्ट्स से ज्यादा जरूरी नियमितता सही उत्पादों का चयन संतुलित खानपान धूप से बचाव और त्वचा की जरूरत को समझना है।

  • Delhi-NCR में तेजी से फैल रहा H1N1 वायरस…. गंभीर बीमारी का कारण बन सकता है ये संक्रमण

    Delhi-NCR में तेजी से फैल रहा H1N1 वायरस…. गंभीर बीमारी का कारण बन सकता है ये संक्रमण


    नई दिल्ली।
    एच1एन1 (H1N1) यानी स्वाइन फ्लू (Swine Flu), इन दिनों खूब चर्चा में है। दिल्ली-एनसीआर (Delhi-NCR) सहित देश के कई राज्य इस संक्रमण से गंभीर रूप से प्रभावित देखे जा रहे हैं। दिल्ली में इस साल अब तक 2700 से ज्यादा लोग संक्रमण का शिकार हो चुके हैं। अस्पतालों में तेज बुखार, सिरदर्द, खांसी-जुकाम और सांस की समस्याओं के शिकार मरीजों को संख्या भी बढ़ती देखी जा रही है। स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं, सभी लोगों को इन दिनों श्वसन रोगों से बचाव के लिए निरंतर प्रयास करते रहना चाहिए। कुछ लोगों में ये संक्रमण गंभीर और जानलेवा समस्याओं का कारण भी बन सकता है।

    हालिया जानकारियों के मुताबिक बॉलीवुड एक्टर इमरान हाशमी भी स्वाइन फ्लू यानी एच1एन1 से संक्रमित हो गए हैं। उनका स्वाइन फ्लू टेस्ट पॉजिटिव आया है। बताया जा रहा है कि हाल ही में शूटिंग के सिलसिले में लगातार यात्रा करने के बाद उनकी तबीयत खराब हो गई थी। डॉक्टरों ने उन्हें आराम करने और जरूरी सावधानियां बरतने की सलाह दी है।

    डॉक्टर कहते हैं, पहले से ही कमजोर इम्युनिटी वालों और कोमोरबिडिटी (व्यक्ति में एक ही समय पर दो या दो से अधिक बीमारियां) के शिकार लोगों में स्वाइन फ्लू से निमोनिया होने का खतरा हो सकता है। आइए जानते हैं कि इसकी पहचान कैसे की जा सकती है?

    डॉक्टर कहते हैं, एच1एन1 फ्लू के खतरों को देखते हुए इन दिनों अगर आपको तेज बुखार के साथ सिर और मांसपेशियों में दर्द हो या सांस लेने में दिक्कत हो तो इसे इग्नोर नहीं करना चाहिए। फ्लू कुछ लोगों में गंभीर रूप ले सकता है और फेफड़ों तक संक्रमण पहुंचने पर निमोनिया जैसी जटिलता पैदा हो सकती है।

    अच्छी बात यह है कि वैसे तो ज्यादातर लोग फ्लू से करीब एक सप्ताह में ठीक हो जाते हैं। लेकिन हर व्यक्ति में बीमारी का असर एक जैसा नहीं होता। छोटे बच्चों, बुजुर्गों, गर्भवती महिलाओं और पहले से किसी गंभीर बीमारी से जूझ रहे लोगों में जटिलताओं का खतरा ज्यादा रहता है। फ्लू के दौरान सांस लेने में परेशानी या सीने में दर्द हो, हालत तेजी से बिगड़ रही हो या ठीक होने के बाद फिर तेज बुखार शुरू हो जाए, तो इसे चेतावनी का संकेत मानना चाहिए। ऐसे मामलों में डॉक्टर से तुरंत संपर्क जरूरी है।


    कैसे पहचानें कि फ्लू गंभीर हो रहा है?

    डॉक्टर कहते हैं, सिर्फ बुखार या खांसी देखकर यह तय नहीं किया जा सकता कि फ्लू गंभीर है या नहीं? अगर आपके लक्षण लगातार बढ़ते जा रहे हैं और सांस से जुड़ी परेशानी हो रही है तो इसे अनदेखा न करें। सांस लेने में दिक्कत, सांस फूलना, सीने में दर्द या दबाव, चक्कर या भ्रम की स्थिति हो तो तुरंत डॉक्टरी सहायता लेनी चाहिए।

    संक्रमण बढ़ने पर बच्चों में तेज सांस लेने, होंठ या त्वचा का नीला पड़ने, सुस्ती या ठीक से प्रतिक्रिया न देने जैसी दिक्कतें हो सकती हैं। ये गंभीर चेतावनी संकेत हो सकते हैं। इसमें तुरंत डॉक्टर के पास ले जाना जरूरी माना जाता है।


    स्वाइन फ्लू से निमोनिया का खतरा

    स्वाइन फ्लू का संक्रमण निमोनिया का कारण बन सकता है, जो गंभीर स्थिति मानी जाती है। निमोनिया फेफड़ों में होने वाला एक संक्रमण है इसमें फेफड़ों में मौजूद छोटी-छोटी हवा की थैलियां (एल्वियोली) में सूजन आ जाती है और उनमें तरल पदार्थ या मवाद भर सकता है। निमोनिया में खांसी और सांस की परेशानी बढ़ जाती है। मरीज को सीने में दर्द, थकान, सांस लेने में दिक्कत होने के साथ बुखार और ठंड लगने की समस्या भी हो सकती है। अगर फ्लू के मरीज में निमोनिया का संदेह हो, तो डॉक्टर से तुरंत संपर्क करना चाहिए। वायरल फ्लू के लिए एंटीवायरल दवाएं इस्तेमाल की जा सकती हैं। समय रहते उपचार हो जाए तो इससे जान जाने को खतरा कम किया जा सकता है।

    डॉक्टर कहते हैं, गंभीर फ्लू या निमोनिया के लक्षण होने पर घर पर केवल बुखार की दवा लेकर इंतजार नहीं करना चाहिए। समय रहते डॉक्टरी सलाह और उपचार जरूरी हो जाता है। स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं, गंभीर लक्षणों या हाई-रिस्क लोगों में एंटीवायरल दवा जल्द शुरू करना जरूरी है। इंफ्लूएंजा वायरस या किसी बैक्टीरिया के कारण होने वाली निमोनिया जैसी गंभीर समस्या से बचे रहने के लिए विशेषज्ञ सभी लोगों को सालाना फ्लू की वैक्सीन लगवाने की सलाह देते हैं। इस बारे में अपने डॉक्टर की सलाह जरूर ले लें।

  • छोटे बीज, बड़े फायदे! अलसी में छिपा फाइबर और ओमेगा-3, वजन से लेकर कोलेस्ट्रॉल तक रख सकता है कंट्रोल में

    छोटे बीज, बड़े फायदे! अलसी में छिपा फाइबर और ओमेगा-3, वजन से लेकर कोलेस्ट्रॉल तक रख सकता है कंट्रोल में


    नई दिल्ली । आजकल बदलती जीवनशैली और खानपान की वजह से वजन बढ़ना कोलेस्ट्रॉल की समस्या और शरीर में सूजन जैसी परेशानियां आम होती जा रही हैं। ऐसे में संतुलित आहार को स्वस्थ जीवनशैली का अहम हिस्सा माना जाता है। विशेषज्ञों के मुताबिक रोज की डाइट में हरी सब्जियों फल प्रोटीन और फाइबर के साथ नट्स और सीड्स को भी शामिल करना फायदेमंद हो सकता है। इन्हीं पोषक तत्वों से भरपूर बीजों में अलसी यानी फ्लैक्स सीड्स का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। आकार में बेहद छोटे दिखने वाले अलसी के बीज पोषण के लिहाज से काफी महत्वपूर्ण माने जाते हैं और इनमें कई ऐसे पोषक तत्व पाए जाते हैं जो शरीर के लिए उपयोगी हो सकते हैं।

    अलसी में फाइबर प्रोटीन थायमिन और पौधों से मिलने वाला ओमेगा-3 फैटी एसिड अल्फा लिनोलेनिक एसिड यानी एएलए पाया जाता है। एएलए शरीर के लिए जरूरी वसा का एक प्रकार है और यह शरीर में सूजन से जुड़ी कुछ प्रक्रियाओं को प्रभावित कर सकता है। इसी वजह से अलसी को एंटी इंफ्लामेटरी गुणों वाला खाद्य पदार्थ माना जाता है। हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि अलसी किसी बीमारी का इलाज है बल्कि इसे संतुलित डाइट का हिस्सा बनाकर संभावित स्वास्थ्य लाभ लिए जा सकते हैं।

    जोड़ों में दर्द और सूजन की समस्या से परेशान लोगों के लिए भी अलसी उपयोगी हो सकती है। गठिया जैसी स्थितियों में शरीर में सूजन की भूमिका रहती है और अलसी में मौजूद एएलए सूजन से जुड़ी प्रक्रियाओं पर असर डाल सकता है। कुछ अध्ययनों में अलसी के सेवन से सूजन से जुड़े संकेतकों में सुधार की संभावना सामने आई है। लेकिन लगातार जोड़ों में दर्द सूजन या अकड़न रहने पर केवल अलसी पर निर्भर रहना सही नहीं है। ऐसी स्थिति में डॉक्टर से जांच और उचित उपचार जरूरी है।

    अलसी को दिल की सेहत के लिए भी उपयोगी माना जाता है। इसमें मौजूद ओमेगा-3 फैटी एसिड के साथ घुलनशील और अघुलनशील दोनों तरह का फाइबर पाया जाता है। पर्याप्त फाइबर वाली डाइट रक्त में एलडीएल यानी खराब कोलेस्ट्रॉल को नियंत्रित रखने में मदद कर सकती है। कुछ शोधों में अलसी के सेवन को ब्लड प्रेशर और कोलेस्ट्रॉल जैसे हृदय रोग के जोखिम कारकों में संभावित सुधार से जोड़ा गया है। हालांकि इसका असर व्यक्ति की पूरी डाइट शारीरिक गतिविधि और स्वास्थ्य स्थिति पर निर्भर करता है।

    वजन को नियंत्रित रखने में भी अलसी मददगार हो सकती है। इसमें मौजूद फाइबर पाचन प्रक्रिया को धीमा करने और लंबे समय तक पेट भरा हुआ महसूस कराने में सहायता कर सकता है। इससे बार बार खाने की इच्छा कम हो सकती है और कुल कैलोरी सेवन को नियंत्रित करने में मदद मिल सकती है। यही वजह है कि वजन प्रबंधन करने वाले लोगों की संतुलित डाइट में अलसी को शामिल किया जाता है।

    हालांकि अलसी को किसी बीमारी का इलाज या वजन घटाने का अकेला उपाय नहीं समझना चाहिए। इसे सीमित और संतुलित मात्रा में आहार का हिस्सा बनाना बेहतर है। किसी विशेष बीमारी से पीड़ित व्यक्ति या नियमित दवाएं लेने वाले लोगों को अपनी डाइट में बड़े बदलाव से पहले डॉक्टर या डाइटिशियन की सलाह लेनी चाहिए। कुल मिलाकर अलसी एक छोटा लेकिन पोषक तत्वों से भरपूर खाद्य पदार्थ है जिसे संतुलित खानपान और नियमित शारीरिक गतिविधि के साथ डाइट में शामिल किया जा सकता है।