गुजरात से तैयार हुआ था राष्ट्रीय अभियान का खाका
‘मोदी आर्काइव’ ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर साझा पोस्ट में बताया कि राष्ट्रीय स्तर पर लागू होने से पहले इस अभियान की नींव गुजरात में रखी गई थी। गुजरात में चलाए गए ‘कन्या केलवणी’ और ‘शाला प्रवेशोत्सव’ जैसे कार्यक्रमों ने आंकड़े बदलने से पहले समाज की सोच बदली। खराब महिला साक्षरता, स्कूल छोड़ने की ऊंची दर और बुनियादी सुविधाओं की कमी जैसी समस्याओं से जूझ रहे राज्य में इन योजनाओं ने बड़ा बदलाव लाया।
2001 की सच्चाई और बदलाव का संकल्प
वीडियो में बताया गया कि साल 2001 में जब नरेंद्र मोदी ने गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में कार्यभार संभाला, तब महिला साक्षरता दर केवल 57.80 प्रतिशत थी। लगभग 38.92 प्रतिशत लड़कियां स्कूल बीच में छोड़ देती थीं, जबकि 42 हजार स्कूलों में लड़कियों के लिए शौचालय तक नहीं थे। इन हालातों को बदलने के लिए मुख्यमंत्री मोदी ने ठोस कदम उठाने का संकल्प लिया।
गांव-गांव जाकर बदली सोच
मुख्यमंत्री रहते नरेंद्र मोदी खुद गांव-गांव पहुंचे। भीषण गर्मी में तीन दिन तक चलने वाले अभियानों में मुख्यमंत्री, मंत्रिमंडल और सैकड़ों वरिष्ठ अधिकारी शामिल होते थे। हर साल 634 अधिकारी 18 हजार से अधिक गांवों में जाकर माता-पिता से अपील करते थे “अपनी बेटियों को स्कूल भेजिए।” इस अभियान का एक ही लक्ष्य था हर लड़की को स्कूल तक पहुंचाना।
इंफ्रास्ट्रक्चर से लेकर आर्थिक सहायता तक
इस दौरान सिर्फ बेटियों के लिए 42,371 शौचालय, 58,463 नई कक्षाएं और 22,758 स्कूलों में बिजली पहुंचाई गई। ‘कन्या केलवणी’ योजना के तहत 55 हजार से अधिक लड़कियों को आर्थिक सहायता दी गई। सरस्वती साइकिल योजना, विद्या लक्ष्मी बॉन्ड और छात्राओं को टैबलेट देने जैसे प्रयासों से शिक्षा को प्रोत्साहन मिला।
आंकड़ों में दिखा असर
इन प्रयासों का नतीजा यह रहा कि महिला साक्षरता दर 57.80 प्रतिशत से बढ़कर 70.73 प्रतिशत हो गई। स्कूल छोड़ने वाली लड़कियों की संख्या 38.92 प्रतिशत से घटकर 7.08 प्रतिशत रह गई। ‘मोदी आर्काइव’ के अनुसार, इस तरह राष्ट्रीय नारा बनने से पहले ही ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ एक सफल जमीनी आंदोलन बन चुका था।
