मल्टीप्लेक्स के शोर में भी बुलंद है इन सिनेमाघरों की गूंज: भारत के वो आइकोनिक सिंगल स्क्रीन थिएटर जो आज भी हैं शान की विरासत


नई दिल्ली। भारतीय सिनेमा केवल तीन घंटे का मनोरंजन नहीं बल्कि एक गहरा भावनात्मक अनुभव रहा है। एक वह भी दौर था जब बड़े पर्दे पर अपने पसंदीदा नायक को देखने के लिए लोग किसी त्यौहार की तरह सज-धजकर सिनेमाघरों का रुख करते थे। उस जमाने में ‘सिंगल स्क्रीन थिएटर’ इस अनुभव की आत्मा हुआ करते थे। आज भले ही मल्टीप्लेक्स संस्कृति और चमचमाते मॉल्स ने हर शहर में अपनी पैठ बना ली है लेकिन सिनेमा की वह पुरानी और गौरवशाली विरासत आज भी कुछ ऐतिहासिक थिएटरों के रूप में जिंदा है। हाल ही में आमिर खान और जावेद अख्तर जैसे दिग्गजों ने देश में थिएटरों की घटती संख्या पर चिंता व्यक्त की लेकिन इसके बावजूद भारत में कुछ ऐसेआइकोनिक थिएटर मौजूद हैं जो समय की धूल को पछाड़कर आज भी सीना ताने खड़े हैं।

इस सूची में राजस्थान की गुलाबी नगरी जयपुर काराज मंदिर सबसे ऊपर आता है। साल 1976 में निर्मित यह थिएटर अपनी वास्तुकला के कारण ‘एशिया का गौरव’ कहा जाता है। इसकी भव्यता किसी शाही महल जैसी है जहाँ बड़े-बड़े झूमर और दीवारों पर की गई बारीक नक्काशी आज भी दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर देती है। यहाँ फिल्म देखना महज एक शो नहीं बल्कि एक राजसी अनुभव की तरह है। वहीं मायानगरी मुंबई कामराठा मंदिर तो भारतीय सिनेमा के इतिहास का एक अभिन्न अंग बन चुका है। ‘दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे’ DDLJ को पिछले तीन दशकों से लगातार चलाने के कारण इसका नाम गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में दर्ज है। सस्ती टिकट और आम आदमी से जुड़ाव इसे आज भी मुंबई की जान बनाए हुए है।

राजधानी दिल्ली की बात करें तो कनॉट प्लेस कारीगल सिनेमा इतिहास के पन्नों में दर्ज है। 1932 में बना यह हॉल राज कपूर का पसंदीदा था जहाँ उनकी फिल्मों के भव्य प्रीमियर हुआ करते थे। यहाँ तक कि देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू भी यहाँ सिनेमा देखने आया करते थे। दिल्ली में ही स्थितडिलाइट सिनेमा अपने विंटेज लुक और मॉडर्न साउंड सिस्टम के मेल के लिए मशहूर है। इसी तरह मुंबई कालिबर्टी सिनेमा जो 1947 में भारत की आजादी के साल बनकर तैयार हुआ अपनी आर्ट-डेको शैली और ‘मुगल-ए-आजम’ जैसी फिल्मों के साथ जुड़ी अपनी यादों के लिए प्रसिद्ध है।

कोलकाता कामेट्रो सिनेमा और बेंगलुरु काएवरेस्ट टॉकीज भी इसी कड़ी के मजबूत स्तंभ हैं। 1935 में बना मेट्रो सिनेमा अपनी भव्य सीढ़ियों और ब्रिटिश कालीन फर्नीचर के जरिए दर्शकों को बीते जमाने की याद दिलाता है। ये थिएटर केवल ईंट और पत्थर की इमारतें नहीं हैं बल्कि ये उस दौर के गवाह हैं जब सिनेमा देखना एक साझा सामाजिक उत्सव होता था। मल्टीप्लेक्स के दौर में भी इन सिंगल स्क्रीन्स का टिके रहना यह साबित करता है कि विरासत को आधुनिकता कभी पूरी तरह खत्म नहीं कर सकती।