चिलकुर के इस धाम में मन्नत मांगते ही दूर होती है विदेश यात्रा की हर बाधा..

नई दिल्ली। भारत अपनी विविधता और आस्था के अनगिनत केंद्रों के लिए पूरी दुनिया में जाना जाता है, लेकिन तेलंगाना की राजधानी हैदराबाद के निकट एक ऐसा मंदिर है जिसकी ख्याति आधुनिक युग की जरूरतों से जुड़ी हुई है। उस्मान सागर झील के किनारे बसे चिलकुर गांव में स्थित भगवान वेंकटेश्वर का पावन धाम ‘चिलकुर बालाजी’ के नाम से जाना जाता है, जिसे लोग प्यार से ‘वीजा मंदिर’ भी कहते हैं। यह मंदिर उन युवाओं और पेशेवरों के लिए आशा की एक बड़ी किरण बन चुका है, जो विदेश में पढ़ाई या नौकरी का सपना देखते हैं। मान्यता है कि यहाँ श्रद्धापूर्वक माथा टेकने से वीजा मिलने की प्रक्रिया में आने वाली हर रुकावट जादुई रूप से दूर हो जाती है।

इस मंदिर का इतिहास सदियों पुराना है और इसके पीछे एक अत्यंत भावुक पौराणिक कथा प्रचलित है। कहा जाता है कि 16वीं या 17वीं शताब्दी में भगवान तिरुपति बालाजी का एक अनन्य भक्त स्वास्थ्य कारणों से तिरुमाला की लंबी यात्रा करने में असमर्थ था। अपने भक्त की व्याकुलता और सच्ची भक्ति देख भगवान स्वयं चिलकुर के इसी स्थान पर प्रकट हुए थे। आज के दौर में इस स्थान ने एक अनूठी पहचान बना ली है। यहाँ की सबसे खास बात यह है कि यहाँ आने वाले भक्त अक्सर अपने हाथों में पेन और आवेदन पत्र जैसे दस्तावेज लेकर भगवान के दरबार में हाजिरी लगाते हैं और विदेश यात्रा का सफल आशीर्वाद मांगते हैं।

यहाँ मन्नत मांगने और उसे पूर्ण करने की परंपरा भी काफी दिलचस्प और अनुशासित है। जब कोई भक्त पहली बार अपनी मनोकामना लेकर आता है, तो वह मंदिर के गर्भगृह की 11 बार परिक्रमा करता है। जैसे ही उसकी विदेश जाने की मुराद पूरी हो जाती है और उसे वीजा प्राप्त हो जाता है, वह भगवान का धन्यवाद करने के लिए दोबारा मंदिर आता है और इस बार श्रद्धा भाव से 108 बार परिक्रमा करता है। चिलकुर बालाजी मंदिर की एक और बड़ी विशेषता इसकी सादगी है। यहाँ न तो कोई दान पेटी रखी गई है और न ही यहाँ किसी भी तरह का सशुल्क ‘वीआईपी’ दर्शन कराया जाता है। राजा हो या रंक, यहाँ सभी के लिए एक समान व्यवस्था है, जो इस मंदिर को आधुनिक समय में भी आध्यात्मिकता का एक सच्चा केंद्र बनाती है।