Author: bharati

  • इंदौर मेट्रो के अंडरग्राउंड सफर की शुरुआत, थाईलैंड की हाईटेक TBM बनाएगी मजबूत सुरंग, 24 घंटे चलेगा काम

    इंदौर मेट्रो के अंडरग्राउंड सफर की शुरुआत, थाईलैंड की हाईटेक TBM बनाएगी मजबूत सुरंग, 24 घंटे चलेगा काम


    इंदौर  इंदौर मेट्रो परियोजना के अंडरग्राउंड चरण ने अब नई रफ्तार पकड़ ली है। शहर में पहली बार अत्याधुनिक टनल बोरिंग मशीन यानी टीबीएम की मदद से भूमिगत सुरंग निर्माण का काम शुरू होने जा रहा है। थाईलैंड से लाई गई करीब 1000 टन वजनी इस हाईटेक मशीन की असेंबलिंग का काम शुरू हो चुका है और अगले एक महीने में इसे जमीन के करीब 20 मीटर नीचे उतार दिया जाएगा। इसके बाद यह मशीन चौबीसों घंटे लगातार काम करते हुए प्रतिदिन लगभग 20 मीटर लंबी सुरंग तैयार करेगी।

    इंदौर मेट्रो परियोजना का यह चरण तकनीकी दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि टीबीएम केवल सुरंग की खुदाई नहीं करेगी बल्कि उसी समय सुरंग की मजबूत कंक्रीट दीवारें भी तैयार करती चलेगी। इससे निर्माण कार्य की गति बढ़ेगी और सुरंग की मजबूती तथा सुरक्षा भी सुनिश्चित होगी। आधुनिक तकनीक से लैस यह मशीन भूमिगत निर्माण को पहले की तुलना में कहीं अधिक सुरक्षित और तेज बनाएगी।

    अधिकारियों के अनुसार मशीन का पहला ऑपरेशन एयरपोर्ट क्षेत्र से शुरू होगा। यहां से कालानी नगर तक पहले चरण की अंडरग्राउंड सुरंग तैयार की जाएगी। इसके बाद अगले चरण में आगे का निर्माण कार्य शुरू होगा। इंदौर मेट्रो परियोजना के तहत कुल 12 किलोमीटर लंबा अंडरग्राउंड कॉरिडोर बनाया जाना है जिसे पूरा होने में लगभग चार से पांच वर्ष का समय लग सकता है।

    टनल बोरिंग मशीन को भूमिगत इंजीनियरिंग का चलता फिरता कारखाना कहा जाता है। इसके सबसे आगे लगा विशाल गोलाकार कटर हेड लगातार घूमते हुए मिट्टी और चट्टानों को काटता है। करीब साढ़े छह मीटर व्यास वाले इस कटर हेड में लगे मजबूत स्टील ब्लेड कठिन से कठिन चट्टानों को भी आसानी से काट सकते हैं। मशीन जैसे जैसे आगे बढ़ती है वैसे वैसे उसके पीछे सुरंग का निर्माण पूरा होता जाता है।

    खुदाई के दौरान निकलने वाली मिट्टी और पत्थरों को मशीन के अंदर लगे विशेष कन्वेयर सिस्टम के माध्यम से पीछे की ओर भेजा जाता है। वहां से इस मलबे को बाहर निकाला जाता है। इस पूरी प्रक्रिया के दौरान सुरंग के भीतर मलबा जमा नहीं होता और मशीन बिना किसी रुकावट के लगातार आगे बढ़ती रहती है।

    टीबीएम की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि खुदाई के साथ ही सुरंग की स्थायी कंक्रीट लाइनिंग भी तैयार हो जाती है। मशीन के भीतर लगे हाइड्रोलिक सिस्टम पहले से तैयार कंक्रीट रिंग को एक के बाद एक जोड़ते चलते हैं। ये सभी रिंग मिलकर सुरंग की मजबूत गोलाकार दीवार का निर्माण करती हैं। इससे मिट्टी धंसने या सुरंग कमजोर होने की संभावना काफी कम हो जाती है और निर्माण कार्य भी तेजी से पूरा होता है।

    इस हाईटेक मशीन में मैकेनिकल हाइड्रोलिक इलेक्ट्रिकल और ऑटोमेटिक कंट्रोल सिस्टम का समन्वय किया गया है। शक्तिशाली मोटर गियर और सेंसर लगातार मशीन की गति दिशा और दबाव पर नजर रखते हैं ताकि सुरंग निर्माण पूरी सटीकता और सुरक्षा के साथ किया जा सके। यही वजह है कि दुनिया के अधिकांश बड़े मेट्रो और रेलवे प्रोजेक्ट में इसी तकनीक का उपयोग किया जाता है।

    इंदौर मेट्रो के अंडरग्राउंड सेक्शन में दो समानांतर सुरंगों का निर्माण किया जाएगा। एक सुरंग से मेट्रो ट्रेन शहर की ओर जाएगी जबकि दूसरी सुरंग से वापसी करेगी। इस दोहरी सुरंग व्यवस्था से दोनों दिशाओं में ट्रेन संचालन सुचारू रूप से किया जा सकेगा और यात्रियों को तेज सुरक्षित तथा आधुनिक परिवहन सुविधा उपलब्ध होगी।

    टीबीएम के मैदान में उतरने के साथ ही इंदौर मेट्रो परियोजना का सबसे चुनौतीपूर्ण चरण शुरू होने जा रहा है। आधुनिक तकनीक और तेज निर्माण गति के कारण यह परियोजना शहर के सार्वजनिक परिवहन को नई पहचान देने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम साबित होगी।

  • इंदौर में EOW की बड़ी कार्रवाई, MY अस्पताल के फार्मासिस्ट के ठिकानों से करोड़ों की संपत्ति के दस्तावेज मिले

    इंदौर में EOW की बड़ी कार्रवाई, MY अस्पताल के फार्मासिस्ट के ठिकानों से करोड़ों की संपत्ति के दस्तावेज मिले


    नई दिल्ली। इंदौर के महात्मा गांधी स्मृति चिकित्सा महाविद्यालय से जुड़े एमवाय अस्पताल में पदस्थ फार्मासिस्ट राकेश गोरखे के खिलाफ आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ ने बड़ी कार्रवाई करते हुए उनके ठिकानों पर छापेमारी की है। आय से अधिक संपत्ति के मामले में हुई इस कार्रवाई के दौरान प्रारंभिक जांच में चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं। जांच एजेंसी के अनुसार आरोपी ने सरकारी सेवा के दौरान कथित रूप से सरकारी दवाओं के स्टॉक में गड़बड़ी कर अपनी वैध आय से लगभग 108 प्रतिशत अधिक संपत्ति अर्जित की है। इसके अलावा बिना विभागीय अनुमति विदेश यात्रा करने का मामला भी जांच के दायरे में आ गया है।

    आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ की टीम ने मंगलवार सुबह करीब आठ बजे इंदौर स्थित विभिन्न ठिकानों पर एक साथ कार्रवाई शुरू की। कई घंटे तक चली तलाशी के दौरान संपत्ति से जुड़े दस्तावेज बैंक रिकॉर्ड पासपोर्ट और नकदी जब्त की गई। अधिकारियों के मुताबिक जांच अभी जारी है और दस्तावेजों का विस्तृत परीक्षण किया जा रहा है।

    जांच में सामने आया कि राकेश गोरखे की नियुक्ति वर्ष 2007 में फार्मासिस्ट के पद पर हुई थी। वर्ष 2015 में उनका मासिक वेतन लगभग 18711 रुपए था जो वर्ष 2025 तक बढ़कर 54664 रुपए हो गया। उनकी पत्नी कीर्ति गोरखे वर्ष 2010 से शासकीय दंत चिकित्सालय में लाइब्रेरियन के पद पर कार्यरत हैं और वर्तमान में उनका मासिक वेतन 42402 रुपए है। दोनों की संयुक्त वैध आय का आकलन करने पर जांच अवधि में कुल आय लगभग 1 करोड़ 11 लाख 31 हजार रुपए पाई गई।

    इसके विपरीत जांच एजेंसी को दंपती के पास 2 करोड़ 13 लाख 85 हजार रुपए से अधिक मूल्य की चल और अचल संपत्तियों की जानकारी मिली है। यह उनकी घोषित वैध आय से करीब 108 प्रतिशत अधिक बताई जा रही है। इसी आधार पर EOW ने आय से अधिक संपत्ति का मामला दर्ज कर विस्तृत जांच शुरू की है।

    तलाशी के दौरान इंदौर के विभिन्न क्षेत्रों में स्थित छह संपत्तियों का पता चला। इनमें स्कीम नंबर 140 स्थित वृंदावन गार्डन का दो मंजिला मकान साकार एनआरआई सिटी में बड़ा प्लॉट साहिल इंद्रांचल होम्स संघवी रेजीडेंसी और सद्गुरु नंदी विहार में प्लॉट शामिल हैं। इसके अलावा ओमेक्स डेवलपर्स की परियोजना में प्लॉट बुकिंग के लिए लगभग 6 लाख 70 हजार रुपए का भुगतान किए जाने के दस्तावेज भी मिले हैं।

    जांच के दौरान एक और महत्वपूर्ण खुलासा हुआ है। जब्त किए गए पासपोर्ट से पता चला कि राकेश गोरखे अक्टूबर 2023 में बिना विभागीय अनुमति थाईलैंड की यात्रा पर गए थे। अब EOW इस विदेश यात्रा पर हुए पूरे खर्च का आकलन कर रही है और इसे भी आरोपी के कुल व्यय और संपत्ति के मूल्यांकन में शामिल किया जाएगा। यदि यात्रा का खर्च वैध आय से मेल नहीं खाता है तो यह जांच को और मजबूत आधार दे सकता है।

    कार्रवाई के दौरान अधिकारियों ने करीब 1 लाख 51 हजार रुपए नकद भी बरामद किए हैं। साथ ही कई बैंक पासबुक संपत्ति से जुड़े दस्तावेज और अन्य वित्तीय रिकॉर्ड अपने कब्जे में लिए हैं। प्रारंभिक जांच में यह भी सामने आया है कि आरोपी ने कई संपत्तियों की जानकारी अपने विभाग को नहीं दी थी जबकि शासकीय कर्मचारियों के लिए ऐसी संपत्तियों की जानकारी विभाग को देना अनिवार्य होता है।

    आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ अब जब्त किए गए सभी दस्तावेजों का सत्यापन कर रहा है। जांच पूरी होने के बाद यदि आरोप प्रमाणित होते हैं तो आरोपी के खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत आगे की कानूनी कार्रवाई की जाएगी। यह मामला सरकारी विभागों में पारदर्शिता और जवाबदेही को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है।

  • एंथ्रोपिक और एडब्ल्यूएस की बड़ी साझेदारी, भारत के एआई डाटा की सुरक्षा और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर को मिलेगी मजबूती

    एंथ्रोपिक और एडब्ल्यूएस की बड़ी साझेदारी, भारत के एआई डाटा की सुरक्षा और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर को मिलेगी मजबूती

    नई दिल्ली । कृत्रिम बुद्धिमत्ता अर्थात एआई क्षेत्र की प्रमुख कंपनी एंथ्रोपिक ने भारत में अपने कारोबार का रणनीतिक विस्तार करते हुए एक बड़ी योजना की घोषणा की है। कंपनी के क्लाउड एआई मॉडल अब अमेजन बेडरॉक के भारतीय बुनियादी ढांचे के जरिए देश के भीतर ही संचालित होंगे। इस नई व्यवस्था से भारतीय उपयोगकर्ताओं और बड़े संगठनों का संवेदनशील एआई डाटा देश की सीमाओं के भीतर सुरक्षित रहेगा, जिससे डेटा रेजिडेंसी और कानूनी नियमों का पालन करना अत्यधिक सुगम हो जाएगा।

    स्थानीय स्तर पर डेटा प्रोसेसिंग होने का सबसे बड़ा लाभ बैंकिंग, वित्तीय सेवाओं, सरकारी एजेंसियों, स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं और अन्य विनियमित क्षेत्रों को प्राप्त होगा। इन क्षेत्रों में डेटा की गोपनीयता और सुरक्षा सर्वोपरि होती है। अमेजन वेब सर्विसेज इंडिया के अनुसार, भारतीय सर्वरों पर क्लाउड मॉडलों की उपलब्धता से घरेलू एआई आधारित एप्लीकेशन तैयार करने वाले डेवलपर्स और कंपनियों को कम लेटेंसी और बेहतर प्रदर्शन का लाभ मिलेगा।

    एंथ्रोपिक के अधिकारियों का मानना है कि भारत क्लाउड एआई के लिए वैश्विक स्तर पर सबसे तेजी से बढ़ते बाजारों में शामिल है। स्थानीय एआई विशेषज्ञता को बढ़ावा देने के उद्देश्य से कंपनी अपने पार्टनर नेटवर्क के माध्यम से भारत में 5,000 से अधिक पेशेवरों को प्रशिक्षित करने जा रही है। इसके साथ ही कंपनी भारत में अपने कार्यबल का विस्तार करने और भारतीय भाषाओं के लिए अपने मॉडल के समर्थन को मजबूत करने पर ध्यान केंद्रित कर रही है।

    साइबर सुरक्षा और डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करने के लिए एंथ्रोपिक ने डेटा सिक्योरिटी काउंसिल ऑफ इंडिया, एमओएसआईपी और ओपनजीटूपी जैसी संस्थाओं के साथ साझेदारी की है। एआई आधारित सुरक्षा परीक्षण के माध्यम से संगठन अपनी सॉफ्टवेयर कमजोरियों की पहचान कर सकेंगे। इसके अतिरिक्त भारतीय भाषाओं में एआई के प्रदर्शन को बेहतर बनाने के लिए कंपनी ने कार्या के साथ भी सहयोग किया है, जिससे डिजिटल सेवाओं की पहुंच आम जनता तक आसान होगी।

  • ऑपरेशन त्रिशूल के तहत 7 सालों में भारत लाए गए 274 भगोड़े, 17 हजार करोड़ से अधिक की संपत्ति जब्त

    ऑपरेशन त्रिशूल के तहत 7 सालों में भारत लाए गए 274 भगोड़े, 17 हजार करोड़ से अधिक की संपत्ति जब्त

    नई दिल्ली । केंद्र सरकार ने विदेशों में छिपे भगोड़े अपराधियों के विरुद्ध चलाए जा रहे ऑपरेशन त्रिशूल के तहत बड़ी सफलता प्राप्त करने का दावा किया है। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार बीते सात वर्षों में 36 विभिन्न देशों से कुल 274 वांछित अपराधियों को भारत वापस लाया जा चुका है। इन भगोड़ों में आतंकवाद, वित्तीय धोखाधड़ी, मादक पदार्थों की तस्करी, संगठित अपराध, हत्या और पोक्सो जैसे अति गंभीर मामलों के आरोपी शामिल हैं।

    गृह मंत्रालय के अनुसार विदेशों में पहचान बदलकर रह रहे अपराधियों को खोजने के लिए डिजिटल फुटप्रिंट, सैटेलाइट इनपुट और जियो-लोकेशन जैसी अत्याधुनिक तकनीकों का प्रयोग किया जा रहा है। सरकार की ओर से दी गई जानकारी के मुताबिक वर्ष 2025 में रिकॉर्ड 70 भगोड़ों का प्रत्यर्पण कराया गया, जबकि वर्ष 2026 में जुलाई महीने तक 45 अन्य अपराधियों को भारत वापस लाने में सफलता मिली है।

    आर्थिक अपराधों पर लगाम लगाने के लिए चलाए गए इस अभियान के तहत धन शोधन निवारण अधिनियम के अंतर्गत भगोड़ों की 17,874 करोड़ रुपये की अवैध संपत्तियां जब्त की गई हैं। इसके अलावा लगभग 18,762 करोड़ रुपये की राशि भी रिकवर की जा चुकी है। सरकार का मुख्य उद्देश्य अपराध से अर्जित अवैध कमाई को पूरी तरह से कुर्क कर अपराधियों के आर्थिक नेटवर्क को ध्वस्त करना है।

    अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपराधियों को घेरने के लिए इंटरपोल के माध्यम से रेड कॉर्नर नोटिस जारी करने की दर में भी अप्रत्याशित तेजी आई है। अकेले वर्ष 2026 में अब तक 182 रेड कॉर्नर नोटिस जारी किए जा चुके हैं, जबकि पिछले तीन सालों में यह संख्या 401 तक पहुंच गई है। वैश्विक पुलिस संस्थाओं के साथ बेहतर तालमेल के कारण भगोड़ों की गिरफ्तारी अब पहले से काफी सुगम हो गई है।

    अभियान को और अधिक धार देने के लिए जनवरी 2026 में एक विशेष खुफिया समन्वय समूह का गठन किया गया था, जो विभिन्न सुरक्षा एजेंसियों के बीच समन्वय स्थापित कर प्राथमिकता वाले मामलों पर काम कर रहा है। इसके साथ ही देश में लागू नए और संशोधित आपराधिक कानूनों ने आरोपी की गैर-मौजूदगी में भी अदालती प्रक्रिया चलाकर न्याय सुनिश्चित करने का रास्ता साफ कर दिया है।

  • Oil Spill: ओमान तट पर फंसे रूसी तेल टैंकर से बढ़ा रिसाव, गहराया पर्यावरणीय संकट; तट तक पहुंचा ऑयल स्पिल

    Oil Spill: ओमान तट पर फंसे रूसी तेल टैंकर से बढ़ा रिसाव, गहराया पर्यावरणीय संकट; तट तक पहुंचा ऑयल स्पिल

    नई दिल्ली । ओमान के तट के निकट बीते कई सप्ताह से फंसे हुए एक रूसी तेल टैंकर से हो रहा कच्चे तेल का रिसाव बेहद भयावह रूप लेता जा रहा है। सैटेलाइट तस्वीरों के माध्यम से इस बात की पुष्टि हुई है कि समुद्र की सतह पर फैला कच्चा तेल अब आसपास के तटीय क्षेत्रों और द्वीपों तक पहुंच चुका है। इससे क्षेत्र के दुर्लभ समुद्री वन्यजीवों और पर्यावरण के लिए एक बहुत बड़ा संकट पैदा हो गया है।

    पर्यावरण संगठनों के अनुसार इस तेल रिसाव का फैलाव बेहद कम समय में काफी तेजी से बढ़ा है। जहां कुछ समय पहले तक रिसाव का दायरा सीमित था, वहीं अब यह बढ़कर लगभग 150 वर्ग किलोमीटर से अधिक के विशाल क्षेत्र में फैल चुका है। तेल की यह काली और खतरनाक परत ओमान के मुख्य प्रांत धोफार के समीप स्थित किब्लियाह द्वीप के तटीय हिस्सों को अपनी चपेट में ले चुकी है।

    जिस 274 मीटर लंबे सूएजमैक्स श्रेणी के टैंकर से यह रिसाव हो रहा है, उसका नाम कैरोलिन बेजेंगी बताया जा रहा है। इस जहाज पर रूस के कच्चे तेल का परिवहन करने के कारण ब्रिटेन, यूरोपीय संघ और कनाडा जैसे देशों ने कड़े प्रतिबंध लगा रखे हैं। जून महीने से ही यह टैंकर ओमान के तट के पास फंसा हुआ था, जब इसके चालक दल ने जहाज के भीतर एक विस्फोट होने की सूचना दी थी।

    यह पूरा प्रभावित इलाका अरब सागर रिजर्व के अंतर्गत आता है, जिसे एक संवेदनशील समुद्री संरक्षित क्षेत्र घोषित किया गया है। इस क्षेत्र में बेहद दुर्लभ प्रजाति की अरब सागर हंपबैक व्हेल और संकटग्रस्त पेट्रेल पक्षी निवास करते हैं। समुद्र में तेजी से फैल रहे इस गाढ़े विषैले तेल के कारण इन जीवों के अस्तित्व पर सीधा और गंभीर खतरा उत्पन्न हो गया है।

    पर्यावरण विशेषज्ञों का अनुमान है कि इस टैंकर में लगभग 8 लाख बैरल से अधिक कच्चा तेल मौजूद था। जानकारों का कहना है कि यह दुर्घटना रूस के शैडो फ्लीट और पुराने टैंकरों के माध्यम से बिना कड़े सुरक्षा मानकों के किए जा रहे तेल परिवहन के बेहद गंभीर खतरों को उजागर करती है। समय रहते इस रिसाव को न रोका गया तो यह क्षेत्र के लिए एक स्थायी प्राकृतिक आपदा बन सकता है।

  • PoJK Unrest: अधिकार मांगने वालों का दमन, खौफनाक हालात में बेबस मां ने सुनाई पीड़ा, पीओके पर भारत ने क्या कहा?

    PoJK Unrest: अधिकार मांगने वालों का दमन, खौफनाक हालात में बेबस मां ने सुनाई पीड़ा, पीओके पर भारत ने क्या कहा?


    नई दिल्ली ।
    पाकिस्तान के अवैध कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर अर्थात पीओके में अपने बुनियादी अधिकारों की मांग कर रहे आम नागरिकों पर वहां की सुरक्षा बलों द्वारा किए जा रहे दमन और अत्याचार की खौफनाक तस्वीरें सामने आ रही हैं। रावलकोट में एक 15 वर्षीय निर्दोष किशोर की गोली मारकर हत्या किए जाने के बाद परिजनों की बेबसी और चीत्कार ने क्षेत्र में व्याप्त भयावह स्थिति को उजागर कर दिया है।

    पीओके की जनता पिछले काफी समय से सस्ता आटा, किफायती बिजली और मूलभूत जनसुविधाओं की मांग को लेकर शांतिपूर्ण विरोध-प्रदर्शन कर रही है। हालांकि जवाब में पाकिस्तानी प्रशासन और सुरक्षा बल नागरिकों पर अंधाधुंध गोलियां चला रहे हैं। स्थानीय लोगों का आरोप है कि अधिकारों की आवाज उठाने के एवज में युवाओं को निशाना बनाया जा रहा है, जिससे दर्जनों परिवारों के चिराग बुझ चुके हैं।

    क्षेत्र में इंटरनेट सेवाओं को पूरी तरह ठप कर दिया गया है और सड़कों पर कड़ा पहरा लगा दिया गया है, ताकि हिंसा की खबरें बाहर न आ सकें। स्थानीय अस्पतालों की स्थिति भी अत्यंत दयनीय बनी हुई है। डॉक्टरों के अनुसार प्राथमिक इलाज की पर्याप्त सामग्री उपलब्ध नहीं है और इलाज कराने आने वाले घायल युवाओं में डर का माहौल है। लोगों को भय है कि अस्पताल जाने पर उन्हें गिरफ्तार कर लिया जाएगा या फिर मार दिया जाएगा।

    दूसरी ओर भारत ने पीओके में हाल ही में आयोजित कराए गए चुनावों को पूरी तरह से एक ढोंग और छलावा करार दिया है। भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा कि पाकिस्तान लोकतंत्र का दिखावा करके वहां चल रहे जनविरोध और हत्याओं के कड़वे सच को छिपाने का प्रयास कर रहा है। फर्जी चुनावों के जरिए अपनी अवैध वैधता साबित करने की यह कोशिश अंतरराष्ट्रीय समुदाय को धोखा देने जैसी है।

    विदेश मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार जून 2026 से लेकर अब तक वहां पाकिस्तानी सेना और सुरक्षा बलों की कार्रवाई में कम से कम 90 बेगुनाह नागरिकों की जान जा चुकी है। भारत ने अंतरराष्ट्रीय मंचों से मांग की है कि वैश्विक समुदाय को पाकिस्तान द्वारा नागरिकों पर किए जा रहे इन अत्याचारों, संचार प्रतिबंधों और मानवाधिकारों के दोहरे रवैये के खिलाफ सख्त रुख अपनाते हुए उसे जवाबदेह ठहराना चाहिए।

  • गोल्ड मेडल की असली सच्चाई आई सामने, जानें किस धातु से बनता है स्वर्ण पदक और क्यों चढ़ाई जाती है सोने की परत

    गोल्ड मेडल की असली सच्चाई आई सामने, जानें किस धातु से बनता है स्वर्ण पदक और क्यों चढ़ाई जाती है सोने की परत

    नई दिल्ली । अंतरराष्ट्रीय खेल प्रतियोगिताओं में जब कोई एथलीट स्वर्ण पदक जीतता है, तो उसकी चमक पूरे देश को गौरवान्वित करती है। आम तौर पर लोगों की धारणा यही रहती है कि यह पदक पूरी तरह से ठोस सोने का बना होता है। हालांकि वास्तविक सच इससे काफी अलग है। आधुनिक ओलंपिक और बड़ी वैश्विक खेल प्रतियोगिताओं में दिए जाने वाले गोल्ड मेडल पूरी तरह सोने के नहीं होते, बल्कि इन्हें खास अंतरराष्ट्रीय मानकों और वैज्ञानिक प्रक्रियाओं के तहत तैयार किया जाता है।

    खेल नियमों के अनुसार एक स्वर्ण पदक का मुख्य हिस्सा चांदी का बना होता है। किसी भी मानक गोल्ड मेडल में कम से कम 92.5 प्रतिशत शुद्ध चांदी का उपयोग किया जाता है। इसके ऊपरी हिस्से पर ही केवल असली सोने की एक पतली परत चढ़ाई जाती है। यही परत पदक को उसकी खास सुनहरी चमक और पहचान प्रदान करती है, जिससे यह देखने में पूरी तरह सोने का प्रतीत होता है।

    अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति के नियमों के तहत एक स्वर्ण पदक का कुल वजन सामान्यतः 500 ग्राम के आसपास रखा जाता है। इतने वजन वाले पदक में मात्र 6 ग्राम शुद्ध सोना होना अनिवार्य होता है, जो ऊपर से कोटेड होता है। बाकी का पूरा हिस्सा उच्च गुणवत्ता वाली चांदी से ही निर्मित होता है। यदि पूरा पदक शुद्ध सोने से तैयार किया जाए, तो इसकी लागत काफी अधिक बढ़ जाएगी और यह व्यावहारिक नहीं रहेगा।

    शुद्ध सोना एक बेहद मुलायम धातु मानी जाती है, जिससे यदि पूरा मेडल बनाया जाए तो उसके आसानी से मुड़ने या खराब होने का जोखिम बना रहता है। चांदी अधिक मजबूत, टिकाऊ और लंबे समय तक सुरक्षित रहने वाली धातु है। इसी कारण चांदी के आधार पर सोने की कोटिंग करना सबसे उपयुक्त और टिकाऊ विकल्प माना जाता है।

    अगर इतिहास की बात करें तो वर्ष 1912 के स्टॉकहोम ओलंपिक तक खिलाड़ियों को पूरी तरह सोने के बने मेडल ही दिए जाते थे। इसके बाद प्रथम विश्व युद्ध के दौरान और बढ़ती लागत के चलते नियमों में बदलाव किया गया। वर्तमान व्यवस्था में केवल सोने की परत चढ़ाने का नियम लागू है, जिससे पदकों की गुणवत्ता और मजबूती दोनों बनी रहती है।

    किसी भी खिलाड़ी के लिए स्वर्ण पदक की असली कीमत उसकी धातु की बाजार दर से नहीं तय होती। यह पदक वर्षों की कड़ी मेहनत, त्याग, अनुशासन और अपने देश को शीर्ष पर पहुंचाने के गौरव का प्रतीक होता है। यही ऐतिहासिक और भावनात्मक सम्मान इस पदक को दुनिया का सबसे प्रतिष्ठित खेल पुरस्कार बनाता है।

  • काजोल के 52वें जन्मदिन पर जानिए करियर के अनसुने किस्से, नेगेटिव रोल से रचा इतिहास और बनीं करण की लकी चार्म

    काजोल के 52वें जन्मदिन पर जानिए करियर के अनसुने किस्से, नेगेटिव रोल से रचा इतिहास और बनीं करण की लकी चार्म

    नई दिल्ली । केंद्र सरकार ने भगोड़े अपराधियों के खिलाफ चलाए जा रहे ऑपरेशन त्रिशूल के तहत बड़ी सफलता का दावा किया है। सरकार के अनुसार पिछले सात वर्षों में 36 देशों से कुल 274 वांछित अपराधियों को भारत वापस लाया गया है। इन अपराधियों में आतंकवाद, संगठित अपराध, आर्थिक अपराध, मादक पदार्थों की तस्करी, हत्या, दुष्कर्म और पॉक्सो जैसे गंभीर मामलों में वांछित आरोपी शामिल हैं। सरकार का कहना है कि आधुनिक तकनीक, अंतरराष्ट्रीय सहयोग और मजबूत कानूनी व्यवस्था के कारण प्रत्यर्पण की प्रक्रिया पहले की तुलना में अधिक प्रभावी हुई है।

    गृह मंत्रालय के अनुसार विदेशों में अलग-अलग पहचान के साथ छिपे अपराधियों का पता लगाने के लिए सैटेलाइट इनपुट, डिजिटल फुटप्रिंट, प्रोफाइल ट्रैकिंग और जियो-लोकेशन जैसी तकनीकों का व्यापक उपयोग किया गया। इन प्रयासों के परिणामस्वरूप विभिन्न देशों की एजेंसियों के साथ समन्वय स्थापित कर कई बड़े अपराधियों को भारत लाया गया। सरकार ने बताया कि वर्ष 2025 में सबसे अधिक 70 भगोड़ों का प्रत्यर्पण हुआ, जबकि वर्ष 2026 में जुलाई तक 45 अपराधियों को भारत वापस लाया जा चुका है।

    सरकार ने यह भी जानकारी दी कि धन शोधन निवारण अधिनियम के तहत भगोड़े अपराधियों से जुड़ी 17,874 करोड़ रुपये की संपत्तियां जब्त की गई हैं। इसके अतिरिक्त लगभग 18,762 करोड़ रुपये की राशि भी वापस लाई गई है। अधिकारियों के अनुसार आर्थिक अपराधों से अर्जित अवैध संपत्ति पर कार्रवाई को इस अभियान का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया गया है ताकि अपराध से अर्जित लाभ को समाप्त किया जा सके और कानून का प्रभावी पालन सुनिश्चित हो।

    इंटरपोल के सहयोग से रेड कॉर्नर नोटिस जारी करने की प्रक्रिया में भी उल्लेखनीय तेजी आई है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2026 में अब तक 182 रेड कॉर्नर नोटिस जारी किए जा चुके हैं। पिछले तीन वर्षों में कुल 401 नोटिस जारी हुए हैं, जिनमें वित्तीय अपराध, आतंकवाद, संगठित अपराध, हत्या, मादक पदार्थों की तस्करी, यौन अपराध और साइबर अपराध जैसे मामले प्रमुख रहे। सरकार का मानना है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बढ़ते सहयोग से भगोड़ों की तलाश और गिरफ्तारी में महत्वपूर्ण मदद मिली है।

    जनवरी 2026 में खुफिया समन्वय को और मजबूत करने के उद्देश्य से एक विशेष समूह का गठन भी किया गया, जो विभिन्न एजेंसियों के बीच समन्वय स्थापित करने और प्राथमिकता वाले मामलों में कार्रवाई तेज करने का कार्य कर रहा है। सरकार के अनुसार जटिल मामलों में तकनीकी निगरानी और कूटनीतिक प्रयासों के संयोजन से प्रत्यर्पण प्रक्रिया को गति मिली है। इसी क्रम में कई चर्चित मामलों में भी उल्लेखनीय प्रगति दर्ज की गई है।

    सरकार का कहना है कि हाल के वर्षों में लागू किए गए नए आपराधिक कानूनों और संशोधित कानूनी प्रावधानों ने भगोड़े अपराधियों के खिलाफ कार्रवाई को और प्रभावी बनाया है। अब कुछ मामलों में आरोपी की अनुपस्थिति में भी मुकदमा चलाने की व्यवस्था उपलब्ध है, जिससे न्यायिक प्रक्रिया बाधित नहीं होती। केंद्र का दावा है कि आधुनिक तकनीक, वैश्विक सहयोग, खुफिया समन्वय और सख्त कानूनी ढांचे के माध्यम से अपराधियों के खिलाफ कार्रवाई को और अधिक मजबूत बनाया गया है तथा भविष्य में भी ऐसे अभियानों को प्राथमिकता के साथ जारी रखा जाएगा।

  • भगवान शिव के भस्म धारण करने की परंपरा का क्या है महत्व, धार्मिक मान्यताओं में छिपा है गहरा जीवन दर्शन

    भगवान शिव के भस्म धारण करने की परंपरा का क्या है महत्व, धार्मिक मान्यताओं में छिपा है गहरा जीवन दर्शन


    नई दिल्ली ।
    सनातन धर्म में भगवान शिव का स्वरूप अत्यंत विलक्षण और आध्यात्मिक रहस्यों से परिपूर्ण माना गया है। जहां अन्य देवी-देवताओं को दिव्य वस्त्रों और आभूषणों से सुसज्जित देखा जाता है, वहीं महादेव अपने शरीर पर श्मशान की भस्म धारण करते हैं। यह केवल एक परंपरा नहीं बल्कि मानव जीवन के सबसे बड़े सत्य को दर्शाने वाला एक गहरा दर्शन है।

    वैदिक मान्यताओं के अनुसार भस्म धारण करना इस बात का प्रतीक है कि यह भौतिक संसार अनित्य है। मनुष्य जिस शरीर और सांसारिक वस्तुओं पर गर्व करता है, वे सब अंततः राख में बदल जाने वाली हैं। महादेव इस स्वरूप के माध्यम से मनुष्य को यह सीख देते हैं कि नश्वर चीज़ों से मोह बांधने के बजाय शाश्वत सत्य और आत्मज्ञान की खोज करनी चाहिए।

    पौराणिक संदर्भों में भस्म से जुड़े कई महत्वपूर्ण प्रसंग मिलते हैं। एक कथा के अनुसार जब कामदेव ने भगवान शिव की तपस्या भंग करने का प्रयास किया, तो महादेव ने अपने तीसरे नेत्र की ज्वाला से उन्हें भस्म कर दिया। इसके बाद उन्होंने उस राख को अपने शरीर पर लगाया, जो वासना और भौतिक इच्छाओं पर पूर्ण विजय का संदेश देती है।

    धार्मिक दृष्टिकोण से अग्नि में जलने के बाद बचा हुआ अवशेष ही भस्म कहलाता है, जिसमें किसी प्रकार की अशुद्धि शेष नहीं रहती। इसीलिए इसे परम पवित्र माना गया है। भगवान शिव इसे अपने अंग पर लगाकर संसार को यह समझाते हैं कि व्यक्ति को अपने भीतर की बुराइयों, अहंकार और वासनाओं को भस्म करके पवित्रता प्राप्त करनी चाहिए।

    सामान्य श्रद्धालुओं के लिए भी विभूति धारण करने का विशेष नियम बताया गया है। जनसामान्य को श्मशान की राख के स्थान पर यज्ञ अथवा विधिवत पूजित भस्म का प्रयोग करना चाहिए। इसे मस्तक पर त्रिपुंड के रूप में लगाया जाता है। यह त्रिपुंड भक्ति, ज्ञान और वैराग्य का प्रतिनिधित्व करता है, जिससे व्यक्ति में सकारात्मक ऊर्जा और आत्मविश्वास का संचार होता है।

    महादेव का यह अलौकिक वेश आज भी हर जीव को समभाव, संयम और वैराग्य का मार्ग दिखाता है। यह संदेश देता है कि जीवन की वास्तविक सुंदरता बाहरी आभूषणों में नहीं, बल्कि आंतरिक शुद्धता और ईश्वर के प्रति समर्पण में निहित है।

  • रेसीडेंशियल भवनों में कमर्शियल गतिविधियों पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला आज, भोपाल में बढ़ी हलचल

    रेसीडेंशियल भवनों में कमर्शियल गतिविधियों पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला आज, भोपाल में बढ़ी हलचल


    भोपाल । भोपाल में आवासीय भवनों के व्यावसायिक उपयोग और अवैध निर्माण का मामला एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। बुधवार को इस महत्वपूर्ण प्रकरण पर सुनवाई होनी है जिसमें याचिकाकर्ता रेसीडेंशियल भूखंडों पर किए गए अवैध निर्माण और उनके व्यावसायिक उपयोग को लेकर अपना पक्ष रखेंगे। मंगलवार को इस मामले में सुनवाई प्रस्तावित थी लेकिन भोपाल से जुड़ी याचिका पर कोई फैसला नहीं हो सका। अब आज होने वाली सुनवाई पर व्यापारियों रहवासियों और प्रशासन की नजरें टिकी हुई हैं।

    याचिकाकर्ता विवेक त्रिपाठी के अनुसार मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट ने देश की विभिन्न राजधानियों के नगर निगम अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर गंभीर नाराजगी जताई। अदालत ने अवैध निर्माण के खिलाफ प्रभावी कार्रवाई नहीं करने वाले राज्यों को कड़ी फटकार लगाई और कई राज्यों को स्पष्ट चेतावनी भी दी। हालांकि भोपाल से संबंधित याचिका पर विस्तृत सुनवाई नहीं हो सकी थी इसलिए अब बुधवार को इस मामले पर सुनवाई होने की संभावना है।

    भोपाल में यह पूरा विवाद तब तेज हुआ जब सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बाद नगर निगम ने आवासीय भवनों में संचालित व्यावसायिक प्रतिष्ठानों के खिलाफ कार्रवाई शुरू की। कई दुकानों और प्रतिष्ठानों को सील किया गया जबकि अनेक व्यापारियों ने कार्रवाई के डर से स्वयं अपने प्रतिष्ठान बंद कर दिए थे। शहर के कई प्रमुख इलाकों में इस कार्रवाई का व्यापक असर देखने को मिला।

    हालांकि बाद में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की अध्यक्षता में हुई उच्चस्तरीय बैठक के बाद सरकार ने व्यापारियों को अंतरिम राहत देने का निर्णय लिया। बैठक में मंत्रियों जनप्रतिनिधियों और वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों ने पूरे मामले की समीक्षा की। मुख्यमंत्री ने निर्देश दिए कि सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का विस्तृत अध्ययन करने के लिए वरिष्ठ अधिकारियों की एक समिति गठित की जाए। यह समिति पूरे प्रकरण की जांच कर अपनी रिपोर्ट राज्य सरकार को सौंपेगी। तब तक व्यापारियों को अनावश्यक रूप से परेशान नहीं किया जाएगा। सरकार के इस निर्णय के बाद शहर के कई इलाकों में बंद दुकानें दोबारा खुल गईं।

    दूसरी ओर इस फैसले का शहर के कई रहवासी संगठनों ने विरोध किया है। अरेरा कॉलोनी रोहित नगर बावड़ियाकलां और अन्य क्षेत्रों के लोगों का कहना है कि आवासीय इलाकों में लगातार बढ़ रही व्यावसायिक गतिविधियों से ट्रैफिक पार्किंग शोर और सुरक्षा जैसी समस्याएं गंभीर होती जा रही हैं। संयुक्त रहवासी संघर्ष समिति के नेतृत्व में लोगों ने पैदल मार्च निकालकर नगर निगम की कार्रवाई को अधूरा बताते हुए अवैध निर्माणों के खिलाफ सख्त कदम उठाने की मांग की थी।

    याचिकाकर्ता विवेक त्रिपाठी का कहना है कि नगर निगम ने जिन प्रतिष्ठानों को नोटिस जारी किए थे उनके खिलाफ अपेक्षित कार्रवाई पूरी नहीं की गई और बाद में कई प्रतिष्ठान फिर से खुल गए जो सुप्रीम कोर्ट की भावना के अनुरूप नहीं है। उनका मानना है कि नियमों का समान रूप से पालन होना चाहिए और अवैध निर्माण पर किसी भी तरह की ढील नहीं दी जानी चाहिए।

    वहीं भोपाल चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्रीज व्यापारियों के पक्ष में खड़ा है। संगठन का कहना है कि वर्ष 2005 के बाद नया मास्टर प्लान लागू नहीं होने के कारण व्यापारियों के सामने व्यावसायिक भूखंडों की भारी कमी है। ऐसे में कई लोग मजबूरी में आवासीय परिसरों से व्यवसाय संचालित कर रहे हैं। चैंबर ने सरकार से मिक्स लैंड यूज नीति लागू करने और व्यापारियों के लिए स्थायी समाधान निकालने की मांग की है।

    अब सुप्रीम कोर्ट की आज होने वाली सुनवाई से यह तय होगा कि भोपाल में आवासीय क्षेत्रों में व्यावसायिक गतिविधियों और अवैध निर्माण के मामले में आगे की दिशा क्या होगी। अदालत के फैसले का असर हजारों व्यापारियों रहवासियों और प्रशासनिक व्यवस्था पर पड़ना तय माना जा रहा है।