Author: bharati

  • दुनिया में एयर एंबुलेंस के दौर में पाकिस्तान की पुरानी योजना पर छिड़ी नई बहस..

    दुनिया में एयर एंबुलेंस के दौर में पाकिस्तान की पुरानी योजना पर छिड़ी नई बहस..


    नई दिल्ली।
    सोशल मीडिया के विभिन्न डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर इन दिनों पाकिस्तान के कराची शहर से जुड़ा एक वीडियो तेजी से प्रसारित हो रहा है। इस वीडियो में बुनियादी मेडिकल किट से लैस साइकिल एंबुलेंस व्यवस्था को दिखाया गया है, जिसे लेकर इंटरनेट पर विविध प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं। आधुनिक दौर में जहां विश्व स्तर पर एयर एंबुलेंस और ड्रोन आधारित आपातकालीन स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार हो रहा है, वहीं इस तरह की पहल को लेकर कई यूजर्स पाकिस्तान की वर्तमान स्वास्थ्य प्रणाली और बुनियादी ढांचे पर सवाल उठा रहे हैं। हालांकि, इस वायरल वीडियो के पीछे का वास्तविक संदर्भ और उद्देश्य काफी अलग है।

    यह वायरल सामग्री कोई नई नीति या हालिया लॉन्च नहीं है, बल्कि मई 2025 में पाकिस्तान की आपातकालीन सेवा ‘रेस्क्यू 1122’ द्वारा शुरू की गई एक पुरानी प्रायोगिक परियोजना का हिस्सा है। कराची जैसे घने और अत्यधिक आबादी वाले महानगर में कई ऐसे क्षेत्र हैं जहां अत्यंत संकरी गलियां हैं और अक्सर भारी ट्रैफिक जाम की स्थिति बनी रहती है। ऐसे इलाकों में आपात स्थिति के दौरान पारंपरिक बड़े एंबुलेंस वाहनों का समय पर पहुंचना बेहद चुनौतीपूर्ण हो जाता है। इसी भौगोलिक और यातायात संबंधी बाधा को दूर करने के लिए इस वैकल्पिक त्वरित प्रतिक्रिया मॉडल को तैयार किया गया था।

    तकनीकी रूप से यह साइकिल केवल एक सामान्य सवारी साधन नहीं है, बल्कि इसे आपातकालीन प्राथमिक उपचार के अनुकूल विशेष रूप से तैयार किया गया है। इसमें ऑक्सीजन मास्क, नेबुलाइजर, ब्लड शुगर जांचने के उपकरण, प्राथमिक चिकित्सा किट और अन्य जरूरी जीवनरक्षक दवाएं रखी जाती हैं। प्रशिक्षित स्वयंसेवक, जिनमें विशेष रूप से प्रशिक्षित महिला कार्यकर्ता भी शामिल हैं, भीड़भाड़ वाले मार्गों से आसानी से निकलकर मरीज तक त्वरित पहुंच बनाते हैं। इनका मुख्य कार्य मुख्य एंबुलेंस के आगमन तक मरीज को शुरुआती महत्वपूर्ण मिनटों में प्राथमिक चिकित्सा प्रदान कर स्थिति को स्थिर बनाए रखना है।

    वैश्विक स्तर पर भी देखें तो कई विकसित और विकासशील देशों के पुराने शहरों तथा सघन शहरी क्षेत्रों में साइकिल या मोटरसाइकिल आधारित प्रथम प्रतिक्रिया टीमों का उपयोग एक स्थापित मानक प्रक्रिया के रूप में किया जाता है। कराची की यह व्यवस्था सामान्य एंबुलेंस सेवा का विकल्प न होकर, केवल एक सहायक आपातकालीन प्रणाली है। सोशल मीडिया पर बिना पूरे संदर्भ के शुरू हुई इस बहस के बाद अब कई विश्लेषकों का मानना है कि शहरी यातायात की जटिलताओं को देखते हुए स्थानीय स्तर पर जान बचाने के लिए उठाए गए व्यावहारिक कदमों को केवल व्यंग्य के दृष्टिकोण से देखना उचित नहीं है।

  • महाभारत से जुड़ी थी टाइम मशीन की कहानी करण जौहर की एक पेशकश के बाद ठंडे बस्ते में चली गई फिल्म

    महाभारत से जुड़ी थी टाइम मशीन की कहानी करण जौहर की एक पेशकश के बाद ठंडे बस्ते में चली गई फिल्म


    नई दिल्ली । फिल्म निर्माता और लेखक करण राजदान ने बॉलीवुड की सबसे चर्चित लेकिन अधूरी रह गई फिल्मों में शामिल टाइम मशीन को लेकर बड़ा खुलासा किया है। यह फिल्म निर्देशक शेखर कपूर के निर्देशन में बननी थी जिसमें आमिर खान और जूही चावला मुख्य भूमिकाओं में नजर आने वाले थे। विज्ञान कल्पना और भारतीय पौराणिक इतिहास को जोड़ने वाली इस फिल्म को उस दौर का सबसे महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट माना जा रहा था लेकिन कई कारणों से यह फिल्म कभी पर्दे तक नहीं पहुंच सकी।

    करण राजदान ने बताया कि टाइम मशीन की कहानी आमिर खान के किरदार पर आधारित थी जो गलती से एक ऐसी मशीन के जरिए अतीत में पहुंच जाता है जहां महाभारत का युद्ध चल रहा होता है। वहां उसकी मुलाकात भगवान कृष्ण से होती है और वह इतिहास के सबसे बड़े युद्ध का प्रत्यक्षदर्शी बन जाता है। इस अनोखे विचार ने शुरुआत में पूरी टीम को बेहद उत्साहित कर दिया था।

    उन्होंने बताया कि इस कहानी की प्रेरणा उन्हें और शेखर कपूर को अपने निजी जीवन की एक भावुक घटना से मिली थी। दोनों ने कम समय के अंतराल में अपने माता पिता को खो दिया था और अक्सर यह सोचते थे कि काश समय में पीछे जाकर उनसे एक बार फिर मिल पाते। इसी भावना ने टाइम मशीन की कहानी को जन्म दिया। केवल तीन महीने में पूरी कहानी पटकथा और संवाद तैयार कर लिए गए थे।

    शेखर कपूर इस प्रोजेक्ट को लेकर इतने उत्साहित थे कि उन्होंने संगीतकार लक्ष्मीकांत प्यारेलाल और गीतकार आनंद बख्शी को भी इससे जोड़ लिया था। आमिर खान परेश रावल और अन्य कलाकारों को भी कहानी सुनाई गई और सभी ने इसकी कल्पना और विषय की सराहना की। उस समय यह फिल्म भारतीय सिनेमा में तकनीकी और कहानी के स्तर पर बड़ा बदलाव ला सकती थी।

    करण राजदान ने यह भी खुलासा किया कि कई बड़े निर्माता इस फिल्म को बनाना चाहते थे। उन्होंने धर्मा प्रोडक्शंस के प्रमुख करण जौहर को भी स्क्रिप्ट भेजी थी लेकिन उन्हें स्क्रिप्ट के बदले केवल पच्चीस लाख रुपये की पेशकश की गई। राजदान के मुताबिक उन्हें लगा कि इतनी बड़ी और अनोखी कहानी की यह कीमत बेहद कम थी इसलिए बात आगे नहीं बढ़ सकी। बाद में निर्माता फिरोज नाडियाडवाला ने भी इस प्रोजेक्ट को दोबारा शुरू करने की कोशिश की लेकिन निर्देशन को लेकर सहमति नहीं बन पाई। राजकुमार संतोषी का नाम भी सामने आया लेकिन राजदान का मानना था कि यह उनकी शैली की फिल्म नहीं थी।

    आज जब भारतीय सिनेमा में विज्ञान कल्पना और पौराणिक कथाओं पर आधारित बड़े बजट की फिल्में बन रही हैं तब टाइम मशीन का अधूरा रह जाना एक बड़ी चूक माना जाता है। यदि यह फिल्म अपने समय में बन जाती तो संभव है कि भारतीय सिनेमा की सबसे यादगार फिल्मों में इसका नाम शामिल होता। वर्षों बाद सामने आए इन खुलासों ने एक बार फिर इस अधूरे ड्रीम प्रोजेक्ट को चर्चा के केंद्र में ला दिया है।

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    #TimeMachine #AamirKhan #JuhiChawla #ShekharKapur #BollywoodNews

  • विदेशी सरजमीं पर लगातार सीरीज गंवाने के बाद बैकफुट पर भारतीय क्रिकेट टीम: 'ऑल इज वेल' के दावे के बीच बोर्ड और मुख्य कोच के फैसलों पर तीखी बहस

    विदेशी सरजमीं पर लगातार सीरीज गंवाने के बाद बैकफुट पर भारतीय क्रिकेट टीम: 'ऑल इज वेल' के दावे के बीच बोर्ड और मुख्य कोच के फैसलों पर तीखी बहस


    नई दिल्ली।
    विदेशी सरजमीं पर भारतीय क्रिकेट टीम के हालिया निराशाजनक प्रदर्शन ने खेल प्रेमियों और खेल विश्लेषकों को चिंता में डाल दिया है। आयरलैंड के खिलाफ मिली झटकों भरी हार के बाद इंग्लैंड दौरे पर भी टी20 और वनडे सीरीज में भारतीय टीम को पराजय का सामना करना पड़ा है। लगातार मिल रही असफलताओं के बावजूद भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड यानी बीसीसीआई का रवैया बेहद शांत नजर आ रहा है। बोर्ड की ओर से दिए जा रहे ‘ऑल इज वेल’ के बयानों पर अब सवाल उठने लगे हैं कि आखिर टीम प्रबंधन और मुख्य कोच से इस हार का हिसाब कब मांगा जाएगा।

    भारतीय टीम का हालिया विदेशी दौरा कई मोर्चों पर कमजोरियों को उजागर कर चुका है। आयरलैंड जैसी अपेक्षाकृत कमजोर मानी जाने वाली टीम के खिलाफ उम्मीद के मुताबिक प्रदर्शन न कर पाना और फिर इंग्लैंड की मजबूत टीम के सामने पूरी तरह पस्त हो जाना, भारतीय क्रिकेट के गिरते स्तर की ओर इशारा करता है। विशेषकर इंग्लैंड दौरे पर खेली गई टी20 और वनडे सीरीज में न तो भारतीय बल्लेबाजी में गहराई दिखी और न ही गेंदबाजी आक्रमण में वह धार नजर आई, जिसके लिए भारतीय टीम जानी जाती है। महत्वपूर्ण मौकों पर टीम के सीनियर और युवा खिलाड़ियों दोनों ने ही निराश किया है।

    टीम प्रबंधन के फैसलों और रणनीति पर लगातार उंगलियां उठ रही हैं। मुख्य कोच गौतम गंभीर के कार्यकाल में टीम के रणनीतिक बदलावों को लेकर तीखी आलोचना हो रही है। प्लेयिंग इलेवन के चयन में लगातार किए जा रहे प्रयोग, खिलाड़ियों के बल्लेबाजी क्रम में बार-बार बदलाव और फॉर्म में चल रहे खिलाड़ियों को नजरअंदाज करने की नीति टीम के संतुलन को बिगाड़ रही है। क्रिकेट विशेषज्ञों का मानना है कि मैदान पर सही समय पर सही फैसले न ले पाने के कारण टीम को बार-बार हार का मुंह देखना पड़ रहा है।

    इस पूरे घटनाक्रम में सबसे अधिक ध्यान खींचने वाली बात बीसीसीआई का रुख है। अमूमन किसी बड़े दौरे पर हार के बाद बोर्ड सख्त रुख अपनाता है और समीक्षा बैठकें आयोजित करता है, लेकिन इस बार बोर्ड की ओर से सब कुछ सामान्य दिखाने की कोशिश की जा रही है। बोर्ड के अधिकारियों की यह चुप्पी कई सवाल खड़े कर रही है। खेल जगत में यह चर्चा तेज है कि जब तक प्रबंधन और कोचिंग स्टाफ की जवाबदेही तय नहीं की जाएगी, तब तक प्रदर्शन में सुधार की उम्मीद करना बेमानी होगा।

    भारतीय टीम के इस लचर प्रदर्शन से प्रशंसकों में भारी निराशा व्याप्त है। सोशल मीडिया से लेकर खेल के मंचों तक मुख्य कोच की कार्यप्रणाली और कप्तान के फैसलों की कड़ी समीक्षा की मांग की जा रही है। आगामी बड़ी प्रतियोगिताओं और दौरों को देखते हुए यदि समय रहते इन कमियों को दूर नहीं किया गया, तो भारतीय क्रिकेट को भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है। अब देखना यह होगा कि क्या बीसीसीआई वाकई समीक्षा बैठक बुलाकर कड़े कदम उठाता है या फिर ‘ऑल इज वेल’ के आवरण में इन असफलताओं को ढका जाता रहेगा।

  • अक्षय खन्ना की दमदार एक्शन थ्रिलर जिसने सच्ची घटना को किया पर्दे पर जिंदा 7.5 रेटिंग वाली फिल्म आज भी जीत रही दिल

    अक्षय खन्ना की दमदार एक्शन थ्रिलर जिसने सच्ची घटना को किया पर्दे पर जिंदा 7.5 रेटिंग वाली फिल्म आज भी जीत रही दिल


    नई दिल्ली । बॉलीवुड अभिनेता अक्षय खन्ना इन दिनों अपनी फिल्मों को लेकर एक बार फिर चर्चा में हैं। उनकी हालिया मौजूदगी के बाद दर्शक उनकी पुरानी फिल्मों को भी बड़े उत्साह से देख रहे हैं। अगर आप भी अक्षय खन्ना की दमदार एक्टिंग के प्रशंसक हैं और एक ऐसी फिल्म की तलाश में हैं जिसमें एक्शन रोमांच और देशभक्ति का बेहतरीन मिश्रण हो तो साल 2021 में रिलीज हुई स्टेट ऑफ सीज टेंपल अटैक आपके लिए शानदार विकल्प हो सकती है। इस फिल्म को दर्शकों से अच्छी प्रतिक्रिया मिली और इसे 7.5 की प्रभावशाली रेटिंग भी हासिल हुई।

    फिल्म की कहानी वर्ष 2002 में गुजरात के गांधीनगर स्थित अक्षरधाम मंदिर पर हुए आतंकवादी हमले से प्रेरित है। 24 सितंबर 2002 को हुए इस हमले में आतंकवादियों ने मंदिर परिसर में अंधाधुंध फायरिंग कर कई निर्दोष लोगों की जान ले ली थी जबकि दर्जनों लोग घायल हुए थे। हालात बेहद गंभीर हो गए थे और इसके बाद राष्ट्रीय सुरक्षा गार्ड यानी एनएसजी के कमांडोज ने ऑपरेशन चलाकर आतंकवादियों का सफाया किया और सैकड़ों लोगों की जान बचाई। फिल्म इसी साहसिक अभियान को सिनेमाई अंदाज में पेश करती है।

    स्टेट ऑफ सीज टेंपल अटैक की सबसे बड़ी ताकत इसकी कहानी और निर्देशन है। निर्देशक केन घोष ने वास्तविक घटना के तनाव और भावनात्मक पहलुओं को प्रभावी तरीके से पर्दे पर उतारा है। हालांकि फिल्म में कुछ सिनेमाई बदलाव किए गए हैं लेकिन मूल घटना की गंभीरता और सुरक्षा बलों के साहस को पूरी ईमानदारी से दिखाया गया है। यही वजह है कि फिल्म केवल मनोरंजन तक सीमित नहीं रहती बल्कि दर्शकों को भावनात्मक रूप से भी जोड़ती है।

    फिल्म में अक्षय खन्ना ने मेजर हनुत सिंह के किरदार को बेहद प्रभावशाली ढंग से निभाया है। उन्होंने बिना किसी अतिनाटकीय अंदाज के केवल अपने शांत अभिनय और मजबूत स्क्रीन प्रेजेंस से एक अनुशासित और बहादुर कमांडो की छवि को जीवंत कर दिया है। उनके अभिनय को फिल्म की सबसे बड़ी उपलब्धियों में गिना जाता है।

    फिल्म के एक्शन दृश्य भी इसकी खास पहचान हैं। मंदिर परिसर के भीतर आतंकवादियों और एनएसजी कमांडोज के बीच होने वाली मुठभेड़ को बेहद वास्तविक अंदाज में फिल्माया गया है। हर दृश्य में तनाव और रोमांच का ऐसा माहौल बनता है जो दर्शकों को अंत तक स्क्रीन से बांधे रखता है। करीब 110 मिनट की यह फिल्म कहीं भी अपनी गति नहीं खोती और लगातार रोमांच बनाए रखती है।

    स्टेट ऑफ सीज टेंपल अटैक केवल एक एक्शन फिल्म नहीं बल्कि उन बहादुर सुरक्षा कर्मियों को श्रद्धांजलि भी है जिन्होंने अपनी जान की परवाह किए बिना निर्दोष लोगों की रक्षा की। फिल्म यह संदेश देती है कि देश की सुरक्षा में जुटे जवानों का साहस और समर्पण किसी भी चुनौती से बड़ा होता है।

    अगर आपको सच्ची घटनाओं पर आधारित फिल्में पसंद हैं और आप देशभक्ति के साथ दमदार एक्शन और सस्पेंस का अनुभव करना चाहते हैं तो स्टेट ऑफ सीज टेंपल अटैक जरूर देखनी चाहिए। अक्षय खन्ना का शानदार अभिनय और मजबूत कहानी इसे एक यादगार सिनेमाई अनुभव बनाते हैं।

  • जन नायगन विजय की आखिरी नहीं बल्कि मुख्यमंत्री बनने के बाद पहली फिल्म एच विनोद के बयान से बढ़ी हलचल

    जन नायगन विजय की आखिरी नहीं बल्कि मुख्यमंत्री बनने के बाद पहली फिल्म एच विनोद के बयान से बढ़ी हलचल


    नई दिल्ली । साउथ सुपरस्टार और तमिलनाडु के मुख्यमंत्री विजय की बहुप्रतीक्षित फिल्म जन नायगन रिलीज से पहले ही सुर्खियों में बनी हुई है। लंबे समय से इस फिल्म को विजय के अभिनय करियर की आखिरी फिल्म माना जा रहा था लेकिन अब निर्देशक एच विनोद के एक बयान ने इस धारणा को पूरी तरह बदल दिया है। उनका कहना है कि जन नायगन को विजय की अंतिम फिल्म के रूप में नहीं बल्कि मुख्यमंत्री बनने के बाद उनकी पहली फिल्म के रूप में देखा जाना चाहिए। इस बयान के बाद फिल्म को लेकर दर्शकों की उत्सुकता और भी बढ़ गई है।

    एक इंटरव्यू में एच विनोद ने कहा कि जन नायगन केवल एक मसाला एंटरटेनर नहीं है बल्कि लोकतंत्र और राजनीति से जुड़े गंभीर विषयों पर आधारित फिल्म है। उन्होंने स्पष्ट किया कि फिल्म का उद्देश्य केवल विजय को बड़े पर्दे पर नायक के रूप में पेश करना नहीं बल्कि उन चुनौतियों को सामने लाना है जिनका सामना लोकतंत्र करता है। उनके अनुसार फिल्म में लोकतंत्र को कमजोर करने वाली ताकतों और उसकी रक्षा करने वालों के बीच संघर्ष को बेहद प्रभावशाली तरीके से दिखाया गया है।

    निर्देशक ने दावा किया कि फिल्म का लगभग आधे घंटे का हिस्सा इतना मजबूत और विचारोत्तेजक है कि दर्शक उसे बार बार देखकर नए अर्थ निकाल सकते हैं। उन्होंने कहा कि इस हिस्से में कई परतें हैं जिन्हें समझने में समय लगेगा और आने वाले वर्षों तक इस पर चर्चा होती रहेगी। उनका मानना है कि जन नायगन उन फिल्मों में शामिल होगी जिन्हें दस बीस या तीस साल बाद भी याद किया जाएगा।

    एच विनोद ने फिल्म से जुड़ा एक और दिलचस्प खुलासा किया। उन्होंने बताया कि जन नायगन की कहानी सबसे पहले विजय को नहीं बल्कि एक अन्य बड़े अभिनेता को सुनाई गई थी। हालांकि उन्होंने उस अभिनेता का नाम नहीं बताया। निर्देशक के अनुसार जब उन्होंने बताया कि यह एक राजनीतिक विषय पर आधारित फिल्म है तो उस अभिनेता ने इसे करने में रुचि नहीं दिखाई। इसके बाद यह कहानी विजय तक पहुंची और उन्होंने इसे करने का फैसला लिया।

    फिल्म में आधुनिक युद्ध और बदलती वैश्विक परिस्थितियों को भी अहम स्थान दिया गया है। एच विनोद ने कहा कि आज की दुनिया में युद्ध केवल सीमाओं पर नहीं लड़े जाते बल्कि ड्रोन तकनीक और आधुनिक हथियारों के जरिए भी संघर्ष होता है। फिल्म में इसी नए दौर की चुनौतियों को भी कहानी का हिस्सा बनाया गया है जिससे यह सिर्फ राजनीतिक नहीं बल्कि समकालीन मुद्दों पर आधारित फिल्म भी बन जाती है।

    निर्देशक ने यह भी स्वीकार किया कि फिल्म की रिलीज को लेकर वह काफी उत्साहित होने के साथ साथ चिंतित भी हैं। उनका कहना है कि यह सामान्य व्यावसायिक फिल्म नहीं है इसलिए इसकी तुलना किसी दूसरी फिल्म के बॉक्स ऑफिस प्रदर्शन से नहीं की जा सकती। फिल्म की रिलीज कई बार टल चुकी है और इसे संवेदनशील माहौल में रिलीज किया जा रहा है। इसके अलावा फिल्म को मिला ए सर्टिफिकेट भी उनके लिए चिंता का विषय है क्योंकि विजय की फिल्मों को बड़ी संख्या में बच्चे भी पसंद करते हैं।

    जन नायगन में विजय के साथ पूजा हेगड़े बॉबी देओल प्रकाश राज प्रियामणि ममिता बैजू गौतम वासुदेव मेनन और नारायण जैसे कई कलाकार अहम भूमिकाओं में नजर आएंगे। फिल्म 23 जुलाई 2026 को दुनियाभर के सिनेमाघरों में रिलीज होगी। दर्शकों को उम्मीद है कि यह फिल्म मनोरंजन के साथ साथ राजनीति और समाज पर नई बहस भी छेड़ेगी।

  • नसीरुद्दीन शाह की अधूरी प्रेम कहानी पहली शादी से लेकर बेटी की अनदेखी तक आत्मकथा में किए भावुक खुलासे

    नसीरुद्दीन शाह की अधूरी प्रेम कहानी पहली शादी से लेकर बेटी की अनदेखी तक आत्मकथा में किए भावुक खुलासे


    नई दिल्ली । हिंदी सिनेमा के दिग्गज अभिनेता नसीरुद्दीन शाह अपनी दमदार अदाकारी के लिए जाने जाते हैं लेकिन उनकी निजी जिंदगी भी उतार चढ़ाव और भावनात्मक संघर्षों से भरी रही है। अपनी आत्मकथा एंड देन वन डे में अभिनेता ने पहली शादी पहली पत्नी परवीन मुराद बेटी हीबा और अपने जीवन की सबसे बड़ी भूल को लेकर खुलकर बात की है। नसीरुद्दीन शाह ने स्वीकार किया कि कम उम्र में लिए गए फैसलों और अपरिपक्व सोच की वजह से वह न तो अच्छे पति बन पाए और न ही अच्छे पिता।

    नसीरुद्दीन शाह की पहली मुलाकात परवीन मुराद से उस समय हुई थी जब वह महज 19 साल के थे और अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में पढ़ाई कर रहे थे। परवीन उनसे लगभग 15 वर्ष बड़ी थीं। वह तलाकशुदा थीं और पहले से दो बच्चों की मां भी थीं। उम्र और सामाजिक परिस्थितियों का अंतर होने के बावजूद दोनों एक दूसरे के करीब आए। नसीरुद्दीन शाह के अनुसार परवीन पहली ऐसी शख्स थीं जिन्होंने उनके भीतर छिपे अभिनेता पर भरोसा जताया और उनके सपनों को पहचान दी। यही विश्वास धीरे धीरे प्यार में बदल गया।

    हालांकि दोनों के रिश्ते को परिवारों की मंजूरी नहीं मिली। नसीरुद्दीन शाह के परिवार को परवीन के तलाकशुदा होने और दो बच्चों की मां होने पर आपत्ति थी जबकि परवीन के परिवार को दोनों की उम्र के बड़े अंतर और नसीरुद्दीन की कम उम्र को लेकर चिंता थी। विरोध के बावजूद दोनों ने शादी कर ली और अपने नए जीवन की शुरुआत की।

    शादी के करीब एक वर्ष बाद बेटी हीबा का जन्म हुआ लेकिन इस खुशी के साथ ही दोनों के रिश्ते में दूरियां बढ़ने लगीं। नसीरुद्दीन शाह ने अपनी आत्मकथा में स्वीकार किया कि उस समय वह पत्नी की भावनाओं को समझने में पूरी तरह असफल रहे। उन्होंने लिखा कि वह अपने अभिनय करियर और भविष्य को लेकर इतने व्यस्त थे कि परिवार और पत्नी की जरूरतों पर ध्यान ही नहीं दे सके। उन्होंने यह भी माना कि गर्भावस्था के दौरान वह पत्नी का साथ नहीं दे पाए और पिता बनने की जिम्मेदारी निभाने के लिए मानसिक रूप से तैयार भी नहीं थे।

    अभिनेता ने अपनी बेटी हीबा को लेकर भी बेहद भावुक स्वीकारोक्ति की है। उन्होंने लिखा कि कई वर्षों तक वह अपनी बेटी से भावनात्मक रूप से जुड़ ही नहीं पाए। उन्हें इस बात का आज भी गहरा पछतावा है कि उन्होंने पिता होने की जिम्मेदारी को गंभीरता से नहीं लिया। नसीरुद्दीन शाह के अनुसार यह उनकी जिंदगी की सबसे बड़ी गलतियों में से एक रही जिसका अफसोस उन्हें हमेशा रहेगा।

    पहली शादी टूटने के दौर में ही थिएटर के दौरान उनकी मुलाकात अभिनेत्री रत्ना पाठक से हुई। दोनों के बीच दोस्ती धीरे धीरे गहरे रिश्ते में बदल गई। परवीन मुराद से कानूनी रूप से अलग होने के बाद वर्ष 1982 में नसीरुद्दीन शाह और रत्ना पाठक ने विवाह किया। अभिनेता ने अपनी आत्मकथा में रत्ना पाठक को अपने जीवन का सबसे सच्चा प्रेम बताया है और स्वीकार किया कि उनके साथ उन्होंने रिश्तों की अहमियत को सही मायनों में समझा।

    नसीरुद्दीन शाह की यह कहानी केवल एक अभिनेता की निजी जिंदगी का किस्सा नहीं बल्कि इस बात की सीख भी देती है कि सफलता के पीछे भागते समय रिश्तों और परिवार की जिम्मेदारियों को नजरअंदाज करना जीवनभर का पछतावा बन सकता है। उनकी आत्मस्वीकृति यह साबित करती है कि गलतियों को स्वीकार करना भी साहस का सबसे बड़ा रूप होता है।

  • 11 साल की उम्र में मोहम्मद रफी संग गाया पहला गीत फिर नाम बदलते ही बॉलीवुड पर छा गईं पूर्णिमा

    11 साल की उम्र में मोहम्मद रफी संग गाया पहला गीत फिर नाम बदलते ही बॉलीवुड पर छा गईं पूर्णिमा


    नई दिल्ली । हिंदी सिनेमा के स्वर्णिम दौर में कई ऐसी आवाजें उभरीं जिन्होंने फिल्मों को नई पहचान दी लेकिन कुछ कलाकार ऐसे भी रहे जिनकी कहानी उतनी चर्चा में नहीं आई जितनी उनकी गायकी। ऐसी ही एक मशहूर गायिका हैं सुषमा श्रेष्ठा जिन्होंने बेहद कम उम्र में अपनी मधुर आवाज से संगीत प्रेमियों का दिल जीत लिया और बाद में पूर्णिमा नाम से बॉलीवुड की सफल पार्श्व गायिकाओं में अपनी अलग पहचान बनाई। उनका सफर संघर्ष प्रतिभा और सफलता का शानदार उदाहरण माना जाता है।

    नेपाल में जन्मी सुषमा श्रेष्ठा को बचपन से ही संगीत में गहरी रुचि थी। उनके परिवार के परिचितों के माध्यम से उनकी मुलाकात फिल्म संगीत जगत से हुई और उनकी प्रतिभा ने संगीतकारों को प्रभावित कर दिया। महज 11 वर्ष की उम्र में उन्हें हिंदी फिल्म अंदाज के लिए मोहम्मद रफी और सुमन कल्याणपुर के साथ गाने का अवसर मिला। यह उपलब्धि किसी भी बाल कलाकार के लिए बेहद बड़ी मानी जाती है। इसके बाद उन्होंने लगातार कई ऐसे गीत गाए जो आज भी संगीत प्रेमियों की पसंद बने हुए हैं।

    बचपन में उन्होंने तेरा मुझसे है पहले का नाता कोई क्या हुआ तेरा वादा तेरी है जमीन तेरा आसमान और एक दिन बिक जाएगा माटी के मोल जैसे कई यादगार गीतों में अपनी आवाज दी। उनकी मासूम आवाज ने बच्चों पर आधारित गीतों को एक नई पहचान दी। उस दौर में जब अधिकतर बाल गीत बड़े गायक अपनी आवाज बदलकर गाते थे तब सुषमा श्रेष्ठा ने बाल गायिका के रूप में अलग स्थान बनाया।

    समय के साथ उन्होंने विवाह किया और कुछ वर्षों तक संगीत जगत से दूरी बना ली। इसके बाद 90 के दशक में जब उन्होंने दोबारा फिल्मों में वापसी की तो संगीत कंपनियों की सलाह पर उन्होंने अपना नाम बदलकर पूर्णिमा रख लिया। नाम बदलने के साथ उनकी नई पारी भी शानदार साबित हुई। उनकी आवाज ने उस दौर की कई बड़ी अभिनेत्रियों को नई पहचान दिलाई और वे बॉलीवुड की व्यस्त प्लेबैक सिंगर्स में शामिल हो गईं।

    पूर्णिमा ने जूही चावला के लिए तू तू तू तारा और माधुरी दीक्षित पर फिल्माए गए लोकप्रिय गीत चने के खेत में जैसे सुपरहिट गानों को अपनी आवाज दी। इसके बाद करिश्मा कपूर की फिल्मों में उनकी आवाज सबसे ज्यादा पसंद की गई। उन्होंने ऊंची है बिल्डिंग सोना कितना सोना है उई अम्मा उई अम्मा मैं पैदल से जा रहा था और मैं हूं बीवी नंबर वन जैसे कई लोकप्रिय गीत गाए जो आज भी लोगों की जुबान पर बने हुए हैं।

    पूर्णिमा की सबसे बड़ी विशेषता उनकी आवाज की बहुमुखी शैली रही। वह रोमांटिक गीतों से लेकर डांस नंबर और बच्चों के गीतों तक हर शैली में सहज नजर आईं। यही वजह रही कि उन्होंने अलग अलग दौर की कई बड़ी अभिनेत्रियों को अपनी आवाज देकर दर्शकों के दिलों में खास जगह बनाई। उनकी गायकी में मिठास ऊर्जा और भावनाओं का अद्भुत संतुलन देखने को मिलता है।

    आज भी जब 70 और 90 के दशक के लोकप्रिय गीतों की चर्चा होती है तब पूर्णिमा का नाम सम्मान के साथ लिया जाता है। उन्होंने यह साबित किया कि सच्ची प्रतिभा समय और परिस्थितियों से कभी हार नहीं मानती। एक बाल गायिका से लेकर सफल पार्श्व गायिका बनने तक का उनका सफर भारतीय फिल्म संगीत के इतिहास में प्रेरणादायक अध्याय के रूप में हमेशा याद किया जाएगा।

  • 21 जुलाई का मौसम देगा राहत या बढ़ाएगा मुश्किलें देश के कई राज्यों में भारी बारिश और गरज चमक का अलर्ट जारी

    21 जुलाई का मौसम देगा राहत या बढ़ाएगा मुश्किलें देश के कई राज्यों में भारी बारिश और गरज चमक का अलर्ट जारी


    मध्यप्रदेश । 21 जुलाई को देश के अधिकांश हिस्सों में मानसून पूरी तरह सक्रिय रहने की संभावना है। मौसम विभाग के अनुसार उत्तर भारत मध्य भारत पूर्वी भारत और पश्चिमी तटीय राज्यों में कई स्थानों पर हल्की से मध्यम बारिश के साथ कुछ इलाकों में भारी वर्षा हो सकती है। लगातार सक्रिय बने मानसूनी सिस्टम के कारण कई राज्यों में जलभराव बाढ़ और तेज हवाओं की स्थिति भी बन सकती है। ऐसे में लोगों को मौसम संबंधी ताजा अपडेट पर लगातार नजर बनाए रखने की सलाह दी गई है।

    दिल्ली एनसीआर में पूरे दिन बादल छाए रहने और रुक रुक कर बारिश होने की संभावना है। इससे तापमान में गिरावट आएगी और लोगों को उमस से राहत मिल सकती है। हालांकि कुछ निचले इलाकों में जलभराव और ट्रैफिक प्रभावित होने की आशंका भी बनी रहेगी। सुबह और शाम के समय तेज हवा के साथ बारिश का दौर देखने को मिल सकता है।

    उत्तर प्रदेश बिहार झारखंड मध्य प्रदेश छत्तीसगढ़ और राजस्थान के कई जिलों में गरज चमक के साथ तेज बारिश का अनुमान है। कुछ स्थानों पर भारी वर्षा होने से नदियों और नालों का जलस्तर बढ़ सकता है। निचले इलाकों में रहने वाले लोगों को विशेष सतर्कता बरतने की सलाह दी गई है। किसानों के लिए यह बारिश फसलों के लिहाज से लाभदायक मानी जा रही है लेकिन अत्यधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में जलभराव से नुकसान की आशंका भी बनी रहेगी।

    महाराष्ट्र गुजरात गोवा कर्नाटक और केरल में भी मानसून पूरी मजबूती के साथ सक्रिय रहेगा। पश्चिमी घाट के आसपास के क्षेत्रों में भारी से बहुत भारी बारिश हो सकती है। पहाड़ी इलाकों में भूस्खलन और सड़क मार्ग प्रभावित होने की संभावना को देखते हुए स्थानीय प्रशासन ने लोगों से अनावश्यक यात्रा से बचने की अपील की है।

    हिमाचल प्रदेश उत्तराखंड और जम्मू कश्मीर के कई हिस्सों में भी बारिश का दौर जारी रह सकता है। पर्वतीय क्षेत्रों में तेज बारिश के कारण भूस्खलन और चट्टान गिरने की घटनाएं सामने आ सकती हैं। यात्रियों और श्रद्धालुओं को मौसम की जानकारी लेकर ही सफर करने की सलाह दी गई है।

    मौसम विशेषज्ञों का कहना है कि बंगाल की खाड़ी और आसपास के क्षेत्रों में सक्रिय कम दबाव का क्षेत्र मानसून को लगातार मजबूती दे रहा है। इसके प्रभाव से आने वाले कुछ दिनों तक देश के अधिकांश हिस्सों में बारिश का सिलसिला जारी रह सकता है। कई राज्यों में बिजली गिरने और तेज हवाएं चलने की संभावना भी जताई गई है इसलिए खुले मैदानों पेड़ों और बिजली के खंभों के आसपास खड़े होने से बचना चाहिए।

    विशेषज्ञों ने लोगों से अपील की है कि भारी बारिश के दौरान जलभराव वाले रास्तों से गुजरने से बचें और प्रशासन द्वारा जारी दिशा निर्देशों का पालन करें। किसानों को भी मौसम के अनुसार कृषि कार्यों की योजना बनाने की सलाह दी गई है। कुल मिलाकर 21 जुलाई का दिन देश के कई हिस्सों में बारिश राहत और सतर्कता तीनों का संदेश लेकर आएगा। जहां एक ओर गर्मी और उमस से राहत मिलेगी वहीं दूसरी ओर भारी बारिश वाले क्षेत्रों में सावधानी बरतना बेहद जरूरी रहेगा।

  • ब्रिटेन के 59वें प्रधानमंत्री बने एंडी बर्नहैम… किंग चार्ल्स III ने दिया सरकार बनाने का न्यौता

    ब्रिटेन के 59वें प्रधानमंत्री बने एंडी बर्नहैम… किंग चार्ल्स III ने दिया सरकार बनाने का न्यौता


    लंदन।
    लेबर पार्टी (Labour Party) के सांसद एंडी बर्नहैम (Andy Burnham) सोमवार को आधिकारिक तौर पर ब्रिटेन के 59वें प्रधानमंत्री (Britain’s 59th Prime Minister) बन गए हैं। बकिंघम पैलेस (Buckingham Palace) में किंग चार्ल्स तृतीय (King Charles III) के साथ एक निजी मुलाकात के दौरान उन्हें सरकार बनाने का न्यौता दिया गया। इससे पहले सर कीर स्टार्मर ने प्रधानमंत्री पद से अपना इस्तीफा सम्राट को सौंप दिया, जिसे उन्होंने स्वीकार कर लिया।

    बकिंघम पैलेस द्वारा जारी एक बयान में कहा गया कि सर कीर स्टार्मर ने आज सुबह सम्राट से मुलाकात की और प्रधानमंत्री के पद से अपना इस्तीफा सौंप दिया, जिसे महामहिम ने सहर्ष स्वीकार कर लिया। बर्नहैम पिछले एक दशक में ब्रिटेन के सातवें प्रधानमंत्री बने हैं। सबसे खास बात है एंडी बर्नहैम का अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के साथ रिश्ता। बर्नहैम, ट्रंप के मुखर आलोचक रहे हैं। अब प्रधानमंत्री बनने के बाद वह ट्रंप के साथ कैसे निभाते हैं, यह देखने वाली बात होगी।


    चुनौती होंगे ट्रंप के साथ संबंध

    बर्नहैम के सामने शुरुआती विदेश नीति की चुनौतियों में से एक अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के साथ संबंधों को संभालना होगा। बर्नहैम के पद संभालने से पहले ट्रंप ने उन्हें बेहद उदारवादी बताया था। बर्नहैम अमेरिकी राष्ट्रपति के मुखर आलोचक रहे हैं। उन्होंने अमेरिका की अत्यधिक ध्रुवीकृत राजनीति को ब्रिटेन में लाने के खिलाफ चेतावनी दी है। हालांकि उनकी इस आलोचना से अमेरिका के साथ ब्रिटेन के पुराने और मजबूत संबंधों पर असर पड़ने की संभावना कम है।


    हर तरफ से दबाव

    घरेलू मोर्चे पर, बर्नहैम को एक ऐसी सरकार विरासत में मिली है जिसे हर तरफ से राजनैतिक दबाव का सामना करना पड़ रहा है। उनका आगमन वर्षों की राजनैतिक अस्थिरता के बीच हुआ है, जिस दौरान बोरिस जॉनसन, लिज़ ट्रस, ऋषि सुनक और कीर स्टार्मर एक के बाद एक सत्ता में आए। ऐसे में श्री बर्नहैम के सामने न केवल अपने एजेंडे को पूरा करने की चुनौती है, बल्कि मतदाताओं को यह विश्वास दिलाने की भी ज़िम्मेदारी है कि उनकी सरकार वह स्थिरता प्रदान करेगी जो उनके कई पूर्ववर्तियों के समय नहीं दिख सकी।


    ब्रिटेन को बड़े बदलाव की जरूरत

    ग्रेटर मैनचेस्टर के पूर्व मेयर रहे बर्नहैम को ‘किंग ऑफ द नॉर्थ’ (उत्तर का राजा) के रूप में जाना जाता है। वह पहले भी लेबर पार्टी की सरकारों में काम कर चुके हैं। बर्नहैम लंबे समय से लंदन से बाहर के क्षेत्रों में अधिक निवेश और प्रशासनिक शक्तियां देने की वकालत करते रहे हैं। उम्मीद है कि बर्नहैम प्रधानमंत्री के रूप में अपने पहले संबोधन में इस बात पर जोर देंगे कि ब्रिटेन को एक बड़े बदलाव की जरूरत है, जिसमें आर्थिक विकास को पुनर्जीवित करने, संघर्ष कर रहे सार्वजनिक क्षेत्रों में सुधार करने और ‘ब्रिटेन को फिर से सुदृढ़ करने’ की योजनाएं शामिल हैं।

    यह भी एक रिकॉर्ड
    स्टार्मर के इस्तीफे के साथ ही ब्रिटेन में जीवित पूर्व प्रधानमंत्रियों की संख्या रिकॉर्ड नौ हो गई है। इनमें जॉन मेजर, टोनी ब्लेयर, गॉर्डन ब्राउन, डेविड कैमरन, थेरेसा मे, बोरिस जॉनसन, लिज़ ट्रस, ऋषि सुनक और कीर स्टार्मर शामिल हैं। उम्मीद है कि ये सभी नेता इस साल लंदन के सेनोटैफ में आयोजित होने वाली ‘रिमेंब्रेंस संडे’ सेवा में एक साथ नजर आएंगे।

  • US में फिर ट्रेड वॉर…. ट्रंप ने किया कनाड़ा से आयातित सामान पर 50% टैरिफ लगाने का ऐलान

    US में फिर ट्रेड वॉर…. ट्रंप ने किया कनाड़ा से आयातित सामान पर 50% टैरिफ लगाने का ऐलान


    वाशिंगटन।
    अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (American President Donald Trump) ने एक बार फिर ट्रेड वॉर (Trade War) शुरू कर दिया है। ट्रंप ने सोमवार को पड़ोसी देश कनाडा (Canada) से आयातित अधिकांश सामानों पर 50 फीसदी टैरिफ (50 Percent Tariff) लगाने का ऐलान किया है। अमेरिकी प्रशासन का आरोप है कि कनाडा अमेरिकी ऑटोमोबाइल, शराब और डेयरी उत्पादों के साथ भेदभावपूर्ण व्यवहार कर रहा है। अब ट्रंप के इस कदम से दोनों पड़ोसी देशों के बीच तनाव बढ़ने की आशंका जताई जा रही है।

    रिपोर्ट्स के मुताबिक डोनाल्ड ट्रंप ने टैरिफ बढ़ाने से जुड़े तीन फैसलों को मंजूरी दी है। अमेरिका के ट्रेड एक्ट ऑफ 1930 की धारा 338 के तहत फैसला तत्काल प्रभाव से ही लागू कर दिया गया है। ट्रंप प्रशासन से जुड़े एक अधिकारी ने फैसले के पीछे की वजह बताते हुए कहा कि चीन के अलावा कनाडा ही उन चुनिंदा देशों में शामिल था, जिसने ट्रंप द्वारा पहले लगाए गए टैरिफ का जवाब जवाबी शुल्क से दिया था। प्रशासन का कहना है कि इस तरह के रवैये के लिए कनाडा की जवाबदेही तय की जानी जरूरी थी।

    बता दें कि ट्रेड एक्ट की धारा 338 को लागू कर ट्रंप पहले भी कई देशों पर इस तरह के शुल्क लगा चुके हैं। इसके बाद बीते साल डेमोक्रेटिक सांसदों ने इस सेक्शन को खत्म करने का प्रस्ताव रखा था। सांसदों ने चेतावनी दी थी कि ट्रंप इस कानून का इस्तेमाल एकतरफा टैरिफ लगाने के लिए कर सकते हैं। इससे अमेरिकी अर्थव्यवस्था अस्थिर हो सकती है।


    किन चीजों पर पड़ेगा असर?

    ट्रंप के नए आदेश के तहत कनाडा के कुछ अहम सेक्टरों को बढ़े हुए टैरिफ से राहत दी गई है। ऊर्जा उत्पाद, पोटाश, मछली और दुर्लभ खनिजों को 50 फीसदी टैरिफ के दायरे से बाहर रखा गया है। हालांकि यह 50 फीसदी टैरिफ उन कई उत्पादों पर भी लागू होगा जिन्हें पहले ‘यूनाइटेड स्टेट्स-मेक्सिको-कनाडा एग्रीमेंट’ (USMCA) के तहत सीमा शुल्क से सुरक्षा मिली हुई थी। 2020 में लागू हुआ यह व्यापार समझौता हाल ही में खत्म हुआ था। फिलहाल इसे दोबारा लागू करने के लिए बातचीत जारी है।


    बढ़ सकती है महंगाई, रिश्तों में खटास

    अमेरिका और कनाडा की अर्थव्यवस्थाएं एक-दूसरे से गहराई से जुड़ी हुई हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि इस कदम से दोनों देशों के बीच अनिश्चितता बढ़ेगी। अमेरिका में महंगाई बढ़ने का खतरा मंडराने लगा है। वहीं दोनों देशों के बीच कूटनीतिक संबंधों में भी दरार आ सकती है। यही नहीं ट्रंप आने वाले दिनों में टैरिफ और बढ़ाने की योजना बना रहे हैं। मामले की जानकारी देने वाले अधिकारी ने बताया कि राष्ट्रपति ट्रंप ने अपने सहयोगियों को कनाडा पर अतिरिक्त शुल्क लगाने की संभावना तलाशने का निर्देश दिया है।