Author: bharati

  • 15 महीने बाद Apple की धमाकेदार वापसी, Nvidia को पछाड़कर बनी दुनिया की सबसे मूल्यवान कंपनी

    15 महीने बाद Apple की धमाकेदार वापसी, Nvidia को पछाड़कर बनी दुनिया की सबसे मूल्यवान कंपनी


    नई दिल्ली। आईफोन बनाने वाली दिग्गज टेक कंपनी Apple ने करीब 15 महीने बाद एक बार फिर दुनिया की सबसे मूल्यवान कंपनी का खिताब हासिल कर लिया है। कंपनी ने मार्केट वैल्यूएशन के मामले में AI चिप निर्माता Nvidia को पीछे छोड़ते हुए शीर्ष स्थान पर कब्जा कर लिया।

    Apple की कुल वैल्यूएशन करीब 4.88 ट्रिलियन डॉलर पहुंच गई, जबकि Nvidia की वैल्यूएशन में 3.5 प्रतिशत की गिरावट के बाद यह लगभग 4.86 ट्रिलियन डॉलर रह गई। इस बदलाव के साथ टेक कंपनियों की वैश्विक रैंकिंग में भी बड़ा फेरबदल देखने को मिला और Apple फिर से नंबर-1 कंपनी बन गई।

    खास बात यह है कि Apple पिछले साल अप्रैल के बाद पहली बार इस मुकाम पर लौटी है। कंपनी की यह उपलब्धि ऐसे समय में आई है, जब सीईओ टिम कुक का कार्यकाल खत्म होने की चर्चाएं तेज हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक, कुक सितंबर में अपना पद हार्डवेयर विशेषज्ञ जॉन टर्नस को सौंपने की तैयारी कर रहे हैं।

    निवेशकों का भरोसा Apple पर क्यों बढ़ा?
    बाजार विशेषज्ञों का कहना है कि निवेशकों का नजरिया अब बदल रहा है। कुछ समय पहले तक आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की लहर में Nvidia को सबसे बड़ा फायदा उठाने वाली कंपनी माना जा रहा था, लेकिन अब Apple की मजबूत कमाई, विशाल इकोसिस्टम और सर्विस बिजनेस ने निवेशकों का ध्यान फिर अपनी ओर खींचा है।

    BRI वेल्थ मैनेजमेंट के इन्वेस्टमेंट हेड टोनी मीडोज के अनुसार, Apple को पहले इसलिए पीछे माना जा रहा था क्योंकि कंपनी AI मॉडल बनाने पर भारी खर्च नहीं कर रही थी। लेकिन अब बाजार की सोच बदल रही है।

    उनका कहना है कि Apple पर कैपिटल एक्सपेंडिचर का दबाव कम है और कंपनी अपनी सर्विसेज, मजबूत इकोसिस्टम और हार्डवेयर अपग्रेड के जरिए AI से कमाई करने की बेहतर स्थिति में है। यह बदलाव AI से जुड़े संभावित फायदों के बजाय कंपनी की स्थिर कमाई पर निवेशकों के भरोसे को दर्शाता है।

    Siri में बदलाव से Apple को उम्मीद
    Apple ने हाल ही में अपने वर्चुअल असिस्टेंट Siri में लंबे समय से चल रहे बदलावों को लागू किया है। विशेषज्ञों को उम्मीद है कि नया और बेहतर Siri सिस्टम AI के क्षेत्र में Apple को बड़ी टेक कंपनियों और नए स्टार्टअप्स के करीब लाने में मदद करेगा।

    कुछ विश्लेषकों का मानना है कि Apple के पास हर iPhone में मौजूद यूजर डेटा के रूप में AI के लिए बड़ा आधार है। यह डेटा Siri को अधिक उपयोगी और स्मार्ट बनाने में मदद कर सकता है। हालांकि, कंपनी के सामने चुनौती यह है कि यूजर प्राइवेसी को ध्यान में रखते हुए इस डेटा की क्षमता का सही इस्तेमाल कैसे किया जाए।

    Nvidia की वापसी की संभावना भी बरकरार
    हालांकि बाजार की स्थिति बदलने पर Nvidia फिर से शीर्ष स्थान हासिल कर सकती है। Nvidia अब भी AI इंफ्रास्ट्रक्चर की सबसे बड़ी लाभार्थी कंपनियों में शामिल है। कंपनी के ग्राफिक्स प्रोसेसर (GPU) दुनिया भर में इस्तेमाल होने वाले अधिकांश जनरेटिव AI मॉडल को चलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। यही वजह है कि AI सेक्टर में Nvidia की मजबूत पकड़ अभी भी बनी हुई है।

  • चीन में मकॉक बंदरों की कीमतों में उछाल, एक बंदर के लिए देने पड़ रहे ₹25 लाख से ज्यादा, जाने वजह

    चीन में मकॉक बंदरों की कीमतों में उछाल, एक बंदर के लिए देने पड़ रहे ₹25 लाख से ज्यादा, जाने वजह


    नई दिल्ली। चीन में इन दिनों बंदरों की कीमतों में ऐसी बढ़ोतरी देखने को मिल रही है कि वे सोने से भी ज्यादा महंगे साबित हो रहे हैं। खासतौर पर मकॉक बंदरों की मांग इतनी बढ़ गई है कि एक-एक बंदर की कीमत करीब 24 से 25 लाख रुपये तक पहुंच गई है। भारी कीमत चुकाने के बाद भी कई वैज्ञानिकों को ये बंदर आसानी से उपलब्ध नहीं हो पा रहे हैं।

    इन बंदरों का इस्तेमाल नई दवाओं की खोज और मेडिकल रिसर्च में किया जाता है। हालांकि, कीमतों में अचानक आए इस उछाल के कारण कुछ शोधकर्ताओं को अपनी स्टडी तक रोकनी पड़ रही है।

    क्यों बढ़ी मकॉक बंदरों की कीमत?
    रिपोर्ट के अनुसार, गुआंगझोउ की जिनान यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिक गुओ शियांगयू दिमाग से जुड़ी गंभीर बीमारियों के लिए नॉन-ह्यूमन प्राइमेट मॉडल विकसित करने पर शोध कर रहे हैं। इसके लिए उनकी लैब में मकॉक बंदरों की जरूरत होती है, लेकिन अब इनकी बढ़ती कीमत और कमी के कारण शोध कार्य प्रभावित हो रहा है।

    चीनी नव वर्ष के बाद से लैब में इस्तेमाल होने वाले मकॉक बंदरों की कीमत लगातार बढ़ी है। वर्तमान में सप्लायर एक मकॉक बंदर के लिए करीब 1 लाख 80 हजार युआन, यानी लगभग 25 लाख 58 हजार 772 रुपये तक मांग रहे हैं।

    गुओ शियांगयू के मुताबिक, समस्या सिर्फ कीमत की नहीं है। कई बार इतनी अधिक रकम देने के बावजूद भी बंदर उपलब्ध नहीं हो पाते, क्योंकि मांग बहुत ज्यादा है और सप्लाई सीमित है। गुओ ग्वांगडोंग प्रोविंशियल की-लैबोरेटरी ऑफ नॉन-ह्यूमन प्राइमेट रिसर्च से जुड़े हैं।

    रिसर्च के लिए मकॉक बंदर ही क्यों जरूरी?
    वैज्ञानिकों के अनुसार, मकॉक बंदर इंसानों के सबसे करीब माने जाने वाले जीवों में शामिल हैं। इनके डीएनए और शरीर की जैविक प्रतिक्रिया इंसानों से काफी मिलती-जुलती है। इसी वजह से नई दवाओं और उपचारों की जांच के लिए इनका इस्तेमाल बड़े पैमाने पर किया जाता है।

    गुओ ने बताया कि उनकी लैब को हर साल वैज्ञानिक अध्ययन के लिए करीब 30 से 50 बंदरों की जरूरत होती है। इनमें पैथोलॉजिकल और मॉलिक्यूलर बायोलॉजिकल एनालिसिस जैसे शोध शामिल हैं।

    चीन में दवा और बायोटेक उद्योग तेजी से विस्तार कर रहा है। चीनी सरकार नई दवाओं और बायोलॉजिकल मेडिसिन के विकास को बढ़ावा दे रही है। इसका उद्देश्य पश्चिमी देशों की दवा क्षेत्र में पकड़ को चुनौती देकर चीन को दुनिया का प्रमुख मेडिसिन हब बनाना है।

    दवा बनाने की प्रक्रिया में बंदरों की भूमिका
    किसी भी नई दवा को सीधे बाजार में लॉन्च नहीं किया जाता। पहले उसे प्रयोगशालाओं में जांचा जाता है और इसके बाद जानवरों पर परीक्षण किए जाते हैं, ताकि दवा के प्रभाव और सुरक्षा का आकलन किया जा सके। इन चरणों में सफल होने के बाद ही संबंधित अधिकारियों की अनुमति और सर्टिफिकेशन के बाद दवा बाजार में लाई जाती है।

    घटती संख्या बनी वैज्ञानिकों के लिए चुनौती
    चीन ने पिछले कुछ वर्षों में बायोटेक सेक्टर में भारी निवेश किया है। देश में कैंसर, मोटापा, डायबिटीज, हार्ट अटैक और ऑटोइम्यून जैसी बीमारियों के इलाज के लिए नई दवाओं पर तेजी से काम हो रहा है।

    लेकिन मकॉक बंदरों की कमी अब वैज्ञानिकों के लिए बड़ी चुनौती बन रही है। बढ़ती मांग के कारण जंगलों में इनकी संख्या पर भी असर पड़ रहा है। अनुमान है कि चीन में वर्ष 2025 से 2027 के बीच हर साल लैब रिसर्च के लिए करीब 49 हजार से 52 हजार बंदर ही उपलब्ध हो पाएंगे।

  • ट्रंप के नए प्रस्ताव से अमेरिका में डेढ़ लाख भारतीय ट्रक ड्राइवरों की नौकरी खतरे में

    ट्रंप के नए प्रस्ताव से अमेरिका में डेढ़ लाख भारतीय ट्रक ड्राइवरों की नौकरी खतरे में


    नई दिल्ली।
    अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (American President Donald Trump) ने प्रवासियों (Migrants) को लेकर एक नया और बेहद विवादित प्रस्ताव पेश किया है, जिसका सीधा और बड़ा असर अमेरिका में रह रहे लाखों भारतीय प्रवासियों (Indian Migrants) पर पड़ सकता है. ट्रंप ने घोषणा की है कि उनकी सरकार देश की सड़कों पर दौड़ रहे बड़ी संख्या में अप्रवासी ट्रक ड्राइवरों को हटाकर उनकी जगह अमेरिकी सेना के सेवानिवृत्त सैनिकों को तैनात करेगी।

    ट्रंप ने आरोप लगाया कि प्रवासियों में से अधिकांश ड्राइवर नशे की लत में डूबे हैं और सड़कों पर कई लोगों की जान ले रहे हैं. पेंसिल्वेनिया में आयोजित मिलिट्री इन्वेस्टमेंट समिट में बोलते हुए ट्रंप ने कहा कि उनका प्रशासन गैर-कानूनी और बिना उचित दस्तावेजों के बड़े ट्रक चलाने वाले ड्राइवरों के खिलाफ देशव्यापी कार्रवाई कर रहा है।

    ट्रंप ने कहा, “मेरा प्रशासन जल्द ही अवैध विदेशी ट्रक ड्राइवरों के खिलाफ ऐतिहासिक कार्रवाई करेगा, जो सड़कों पर कई लोगों की जान ले रहे हैं. वे सड़कों पर लगे साइन बोर्ड तक नहीं पढ़ सकते. उनमें से कई ड्रग्स या शराब के नशे में होते हैं. वे पूरी तरह से अवैध रूप से देश में आए हैं, और हम उन्हें अमेरिकी सड़कों पर गाड़ियां चलाते हुए नहीं देखना चाहते।

    ट्रंप ने आगे कहा कि इन ड्राइवरों की जगह गर्वित अमेरिकी दिग्गजों को दी जाएगी. प्रस्ताव के तहत, सेना में भारी ट्रक चलाने का अनुभव रखने वाले किसी भी अमेरिकी नागरिक को बिना किसी परेशानी के सीधे कमर्शियल ड्राइविंग लाइसेंस (CDL) जारी कर दिया जाएगा।


    2 लाख प्रवासियों के लाइसेंस पहले ही हो चुके हैं रद्द

    यह कोई हवाई घोषणा नहीं है, बल्कि ट्रंप प्रशासन इस पर पहले से ही एक बड़ा क्रैकडाउनकर रहा है. रिपोर्ट्स के मुताबिक, इसी साल मार्च में नए नियमों के तहत लगभग 2,00,000 अप्रवासी ड्राइवरों के कमर्शियल लाइसेंस रद्द कर दिए गए हैं, जिनके पास पहले अमेरिका में रहने और काम करने का कानूनी अधिकार था।

    दरअसल, अमेरिकी नागरिकों द्वारा ट्रक ड्राइविंग से दूरी बनाने के कारण हाल के वर्षों में वैध और अवैध दोनों तरह के प्रवासियों के लिए यह सेक्टर मोटी कमाई का जरिया बन गया था।

    भारतीय समुदाय, खासकर सिख और पंजाबी ड्राइवरों को लगेगा तगड़ा झटकानॉर्थ अमेरिकन पंजाबी ट्रकर्स एसोसिएशन (NAPTA) के आंकड़ों के मुताबिक, इस समय अमेरिका में करीब 1.3- 1.5 लाख ट्रक ड्राइवर पंजाब और हरियाणा के रहने वाले हैं।

    यदि ट्रंप का यह नया प्रस्ताव पूरी तरह लागू होता है, तो इन परिवारों की रोजी-रोटी पर सीधा संकट आ जाएगा. भारतीय मूल के ट्रक चालक पहले से ही सरकार के कड़े फैसलों, जैसे- अनिवार्य अंग्रेजी दक्षता परीक्षा और नए दलीला कानून की मार झेल रहे हैं।

  • मेक्सिको में आया 7.4 की तीव्रता का भूकंप, आसपास के कई देशों में महसूस हुए झटके

    मेक्सिको में आया 7.4 की तीव्रता का भूकंप, आसपास के कई देशों में महसूस हुए झटके


    मेक्सिको सिटी।
    मेक्सिको (Mexico) में 7.4 की तीव्रता के साथ भयंकर भूकंप (Earthquake) आया है। रिपोर्ट्स के मुताबिक देश के दक्षिणी राज्य चियापास (Southern state Chiapas) के पास इसका केंद्र था। इस शक्तिशाली भूकंप (Powerful Earthquake) की वजह से मेक्सिको समेत आस पास के कई देशों जैसे कि अल सल्वाडोर और ग्वाटेमाला में झटके महसूस किए गए हैं। हालांकि अभी तक मानवीय नुकसान के बारे में कोई स्पष्ट जानकारी सामने नहीं आई है।

    शुक्रवार को आए इस भूकंप के बारे में अमेरिकी भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (USGS) विभाग ने स्पष्ट रूप से जानकारी दी। उन्होंने बताया कि भूकंप का केंद्र मेक्सिकों के प्यूर्टो मादेरो शहर से करीब 10 किलोमीटर की गहराई में था। अब ऑफ्टर शॉक की वजह से और भी झटके आने की आशंका है। रिपोर्ट्स के मुताबिक 7.4 तीव्रता के झटके बाद कई झटके और लगे। इसमें सबसे तेज झटका 6.1 की तीव्रता का था।

    मेक्सिको की राष्ट्रपति क्लाउडिया शिनबाम ने कहा कि भूकंप के बाद चियापास और टबास्को राज्यों में नुकसान की कोई तत्काल खबर नहीं मिली है। प्रभावित इलाकों में नुकसान का आकलन जारी है और अधिकारी स्थिति पर नजर रखे हुए हैं। वहीं, ग्वाटेमाला के राष्ट्रपति बर्नार्डो अरेवालो ने भी पुष्टि की, “अब तक किसी की मौत की खबर नहीं है। एजेंसियां पल-पल की स्थिति पर नजर रख रही हैं।” उन्होंने आगे कहा, “मैं लोगों से शांत रहने और ऐसे मामलों में दी गई सलाह का पालन करने की अपील करता हूं।”


    सुनामी की चेतावनी जारी

    इस शक्तिशाली भूकंप के बाद अमेरिकी अमेरिकी सुनामी चेतावनी प्रणाली (US Tsunami Warning System) ने इस क्षेत्र के लिए सुनामी खतरे की चेतावनी जारी की है। इसके साथ ही उन्होंने प्रभावित तटीय इलाकों में समुद्र के जल-स्तर में खतरनाक बदलाव की संभावना के प्रति आगाह किया।

    सोशल मीडिया पर भूकंप के बाद के कई वीडियो वायरल हो रहे हैं। इसमें इमारतें तेजी के साथ हिलती हुई नजर आ रही हैं।

    मेक्सिको में आए इस भूकंप का असर पड़ोसी देशों में भी देखा गया। रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक ग्वाटेमाला सिटी में इमारतें बुरी तरह से हिल गई हैं। दूसरी तरफ अल सल्वाडोर में भी निवासियों ने तेज भूकंप के झटके महसूस किए हैं। फिलहाल किसी भी देश में कितना नुकसान हुआ है, इसके बारे में स्पष्ट जानकारी सामने नहीं आई है। हालांकि, इतने शक्तिशाली भूकंप के बाद नुकसान की आशंका बढ़ गई है।

    यह भूकंप ऐसे समय में सामने आया है। जब कुछ समय पहले ही मेक्सिको के पड़ोसी देश वेनेजुएला में भूकंप ने तबाही मचाई थी। इसमें कई दर्जन लोग मारे गए थे। भारत समेत कई देशों ने मदद भेजी थी। इसके अलावा अभी हाल ही में न्यूजीलैंड और इंडोनेशिया के पास भूकंप आया था। इसके बाद भी सुनामी की चेतावनी जारी की गई थी।

  • पश्चिम बंगाल से गायब हो गई 15 साल की नेशनल लेवल की शूटर….परिवार ने दर्ज कराया केस

    पश्चिम बंगाल से गायब हो गई 15 साल की नेशनल लेवल की शूटर….परिवार ने दर्ज कराया केस


    कोलकाता।
    पश्चिम बंगाल (West Bengal) में एक चौंकाने वाली घटना सामने आई है। यहां 15 साल की नेशनल शूटर (National Shooter) गायब हो गई। इस शूटर का नाम दमयंती सेन (Damayanti Sen) बताया गया है। वह सेंट्रल हावड़ा के उमाचरण भट्टाचार्य लेन की रहने वाली है। दमयंती स्टेट लेवल पर शूटिंग में पूरी तरह से सक्रिय है। इसके अलावा वह नेशनल लेवल के टीम ट्रायल्स में भी चयनित हो चुकी है और इसके लिए जोर-शोर से तैयारी में जुटी है। दमयंती के गायब होने के बाद उसके परिवार ने पुलिस में केस कर दिया है। पुलिस दमयंती की तलाश की जा रही है। फिलहाल कोई जानकारी नहीं मिली है। परिजनों ने किसी तरह का मनमुटाव होने की बात से भी इनकार किया है।

    घर का सामान खरीदने निकली थी
    जानकारी के मुताबिक दमयंती गुरुवार को घर का सामान खरीदने निकली थी। लेकिन इसके बाद वापस नहीं लौटी। जब काफी देर हो गई तो घरवालों ने उसे ढूंढना शुरू किया। काफी देर तक दमयंती के दोस्तों वगैरह के यहां पूछा गया। इसके अलावा, उसके शूटिंग के दोस्तों और रिश्तेदारों के यहां भी पता किया गया। लेकिन कुछ पता नहीं चला। इसके बाद दमयंती के घरवाले पुलिस के पास पहुंचे। इस बीच एक सीसीटीवी फुटेज सामने आई है। इसमें दमयंती गुरुवार के दिन प्लेटफॉर्म नंबर चार और पांच के बीच घूमती नजर आ रही है। आखिरी बार यहीं पर दयमंत्री को देखा गया था। अधिकारियों ने बताया कि वह लोग पता लगाने में जुटे हैं कि इसके बाद दमयंती कहां गई। जानकारी के मुताबिक जब दमयंती ने घर छोड़ा था तो उसका मोबाइल उसके पास ही था।

    काफी ज्यादा कर रही थी मेहनत
    दमयंती के परिजनों ने बताया कि वह एक फिक्स रूटीन फॉलो करती थी। नेशनल ट्रायल्स में सेलेक्शन के बाद वह इसकी तैयारी में जुटी हुई थी। वह हर रोज सुबह जल्दी उठ जाती थी और पूरी शिद्दत से तैयारी में जुटी रहती थी। दमयंती के घरवालों ने किसी तरह का झगड़ा या मनमुटाव होने की बात से भी इनकार किया है। दमयंती की मां ने एक सोशल मीडिया पोस्ट की है। इसमें उन्होंने लिखा है कि गुरुवार सुबह 10 बजे, मेरी बेटी दमयंती हावड़ा स्टेशन के प्लेटफॉर्म नंबर चार और पांच पर देखी गई। इसके बाद से उसका कुछ पता नहीं है। उसने गुलाबी रंग की हाफ टी-शर्ट और हाफ पैंट पहन रखी थी। उन्होंने आगे लिखा है कि अगर किसी दयालु सज्जन को उसके बारे में जानकारी मिलती है तो हमारे दिए गए नंबरों पर संपर्क करें।

    मन में तरह-तरह की आशंकाएं
    शुक्रवार सुबह तक भी दमयंती के बारे में कोई जानकारी नहीं मिली थी। परिवार के सदस्यों, पड़ोसियों और टीम के साथी शूटर्स के बीच इसको लेकर काफी ज्यादा चिंता थी। हर कोई दमयंती के अचानक गायब होने से हैरान नजर आ रहा है। साथ ही उनके मन में तरह-तरह की आशंकाएं उठ रही हैं। फिलहाल पुलिस में मिसिंग केस दर्ज है और पुलिस का कहना है कि वह इस मामले को पूरी गंभीरता के साथ देख रही है।

  • देश में अगले साल आ सकते हैं 10-20 रुपये के प्लास्टिक के नोट…. RBI ने शुरू की तैयारी

    देश में अगले साल आ सकते हैं 10-20 रुपये के प्लास्टिक के नोट…. RBI ने शुरू की तैयारी


    नई दिल्ली।
    भारत (Inida) में जल्द ही कटे-फटे और गंदे नोटों की समस्या हमेशा के लिए खत्म होने वाली है। भारतीय रिजर्व बैंक (Reserve Bank of India ) ने देश में पॉलीमर (Polymer) यानी प्लास्टिक के नोट लाने का नीतिगत फैसला कर लिया है और अगले साल तक 10 और 20 रुपये के प्लास्टिक नोट बाजार में उतारे जा सकते हैं। क्रेडिट कार्ड की तरह कड़े होने के बजाय ये नोट बेहद पतले, हल्के और लचीले होंगे।

    भारत में पॉलीमर यानी प्लास्टिक के नोट चलन में लाने की तैयारी शुरू हो गई है। फिलहाल दस व बीस रुपये के प्लास्टिक नोट बाजार में लाए जाएंगे। इसमें सुरक्षा के उन्हीं उन्नत नियमों का पालन किया जाएगा जो कागज के नोट छापने में अपनाए जाते हैं। अगले साल यह नोट बाजार में आ सकते हैं।

    रिजर्व बैंक ने पॉलीमर शीट आपूर्ति के लिए निजी कंपनियों को भी आमंत्रित किया है। शुरुआती चरण सफल रहा तो बड़े नोट भी चरणबद्ध तरीके से लाए जाएंगे। इन पॉलीमर नोटों के लिए डिजाइन, आकार व छपाई उसी तरह होगी जैसे कागज के नोट पर होगी। फर्जीवाड़ा रोकने के लिए इन नोटों में विशेष तकनीक अपनाई जाएगी।

    रिजर्व बैंक के अधिकारियों के मुताबिक पॉलीमर नोटों के प्रचलन में आने की समय सीमा नहीं बताई जा सकती। इतना जरूर है कि पॉलीमर यानी प्लास्टिक के नोट लाने का नीतिगत निर्णय हो चुका है और चार चरणों से गुजरने के बाद पॉलीमर नोट छापे जाएंगे।


    पतले, लचीले प्लास्टिक सब्सट्रेट से बनेंगे नोट

    इस पूरी प्रक्रिया में वक्त लगना स्वाभाविक है। इसमें मौसम, इस्तेमाल के तौर-तरीकों व जनता की सहूलियत का भी ध्यान रखा जाएगा। सूत्रों के मुताबिक पहले चरण में कितने नोट तैयार होंगे इसका आकलन बाजार में दस व बीस रुपये मूल्य वर्ग के नोटों की उपलब्धता, एटीएम व बैंकों की जरूरत के हिसाब से तय होगा। यह नोट एक पतले, लचीले प्लास्टिक सब्सट्रेट से बनेंगे। ये क्रेडिट या डेबिट कार्ड की तरह कठोर नहीं हल्के, लचीले होंगे।

    पहले भी हो चुकी है कवायद…वर्ष 2012 में भारत सरकार ने मैसूर, जयपुर, भुवनेश्वर और शिमला समेत कुछ शहरों में 10 रुपये के एक अरब पॉलीमर नोटों के परीक्षण को मंजूरी दी थी। लेकिन तकनीकी चुनौतियों के कारण यह पहल आगे नहीं बढ़ सकी।


    कटे-फटे नोटों से निजात

    लोगों को कटे, फटे व गंदे नोटों से निजात मिलेगी। इसे वह आसानी से ले जा सकेंगे। पॉलीमर करेंसी नोट में नए सुरक्षा फीचर होंगे। इससे नकली नोट तैयार होने की संभावना न के बराबर हो जाएगी। पॉलीमर नोटों में माइक्रो-ऑप्टिक होलोग्राम और विशेष स्याही जैसी उन्नत, सुविधाओं का उपयोग होगा। कागज के मुकाबले इनके निर्माण पर खर्च भी कम आएगा। ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, ब्रिटेन और न्यूजीलैंड जैसे कई देशों में पॉलीमर नोट कई वर्षों से चलन में हैं।

    नोटों की छपाई पर बढ़ रहा खर्च
    रिजर्व बैंक की रिपोर्ट के अनुसार, नोटों की छपाई पर व्यय वित्त वर्ष 2025 में बढ़कर 6,372.8 करोड़ रुपये हो गया, यह पिछले वर्ष 5,101.4 करोड़ रुपये था। यह वृद्धि मुख्य रूप से नोटों की बढ़ती मांग के कारण हुई है। वित्त वर्ष 2025 में, लगभग 23.8 अरब गंदे नोटों का निस्तारण किया गया। 10 रुपये और 20 रुपये जैसे कम मूल्यवर्ग के नोटों की जांच सबसे पहले होने की संभावना है।

  • ब्रिटेन के नए प्रधानमंत्री बनेंगे एंडी बर्नहैम…. किंग ऑफ नॉर्थ के नाम से हैं मशहूर

    ब्रिटेन के नए प्रधानमंत्री बनेंगे एंडी बर्नहैम…. किंग ऑफ नॉर्थ के नाम से हैं मशहूर


    लंदन।
    ब्रिटेन (Britain) को नया प्रधानमंत्री (New Prime Minister) मिल गया है। लेबर पार्टी ने एंडी बर्नहैम (Andy Burnham) के नाम का ऐलान कर दिया है। एंडी ग्रेटर मैनचेस्टर के पूर्व मेयर (Former Mayor Greater Manchester) और मेकरफील्ड से सांसद एंडी हैं। उन्हें मध्य लंदन में आयोजित विशेष सम्मेलन में निर्विरोध रूप से लेबर पार्टी का नया नेता चुन लिया गया है। बर्नहैम सोमवार को ब्रिटेन के नये प्रधानमंत्री के रूप में कार्यभार संभालेंगे।

    पार्टी नेता घोषित होने के बाद अपने पहले ऐतिहासिक भाषण में बर्नहैम ने ‘मैं तैयार हूं’ का नारा दिया। साथ ही देश में नई राजनीति की शुरुआत करने, कामकाजी वर्ग को उनका पुराना गौरव और उम्मीद वापस लौटाने आर्र कीर स्टारमर की बनाई मजबूत नींव पर आगे बढ़ने का दृढ़ संकल्प व्यक्त किया। उन्होंने स्पष्ट किया कि देश के हर हिस्से- चाहे वह उत्तर हो, दक्षिण, स्कॉटलैंड हो या वेल्स, सभी को समान और मजबूत आवाज दी जाएगी।


    पहले भी पार्टी नेतृत्व के लिए लड़ा चुनाव

    ब्रिटेन के नए प्रधानमंत्री बनने जा रहे एंडी बर्नहैम का जन्म 7 जनवरी 1970 को हुआ। फिलहाल एंडी, ग्रेटर मैनचेस्टर के मेयर हैं और हाल ही में मेकरफील्ड से सांसद चुने गए हैं। लेबर पार्टी में उन्हें पारंपरिक वामपंथी और उत्तरी इंग्लैंड का सबसे मजबूत चेहरा माना जाता है। बर्नहैम ने 1990 के दशक में राजनीति में कदम रखा। गॉर्डन ब्राउन सरकार में स्वास्थ्य और संस्कृति मंत्री रहे। बर्नहैम इससे पहले पार्टी नेतृत्व के लिए दो बार चुनाव लड़ चुके हैं, लेकिन दोनों बार उन्हें हार का सामना करना पड़ा था। 2010 और 2015 में पार्टी नेतृत्व की दौड़ में शामिल हुए, लेकिन एड मिलिबैंड और जेरेमी कॉर्बिन से हार गए।

    बनाई है अपनी अलग पहचान
    एंडी बर्नहैम को ‘किंग ऑफ नॉर्थ’ कहा जाता है। इसके पीछे एंडी का तौर-तरीका है। असल में उन्होंने एक अंदाज के राजनेता के तौर पर अपनी पहचान बनाई। एंडी ने कीमती सूट और परंपरागत टाई को छोड़कर टी-शर्ट और बॉम्बर जैकेट पहनना शुरू कर दिया। साल 2001 में वह पहली बार संसद पहुंचे। तब उन्होंने टोनी ब्लेयर और गॉर्डन ब्राउन की सरकारों में संस्कृति और स्वास्थ्य मंत्रालय जैसे बड़े पद संभाले। लेकिन 2010 और 2015 में लेबर पार्टी के नेतृत्व की रेस में पिछड़ने के बाद उन्होंने सभी को चौंकाते हुए लंदन का एलीट कूटनीतिक गलियारा छोड़ दिया। यहीं से उनकी पहनावे में बदलाव आया।


    ऐसी रही है लव लाइफ

    एंडी बर्नहैम की पत्नी का नाम है फ्रैंकी। हालांकि उनका पूरा नाम, मैरी-फ्रांस वैन हील है। इन दोनों की पहली मुलाकात साल 1989 में हुई थी। उस वक्त दोनों, कैंब्रिज यूनिवर्सिटी के फिट्जविलियम कॉलेज में पढ़ते थे। फ्रैंकी, नीदरलैंड्स से यहां पढ़ने आई थीं। दोनों के बीच पहले दोस्ती हुई फिर प्यार हो गया, आखिर साल 2000 में दोनों ने शादी कर ली। दोनों अपने बच्चों को बहुत ही सादगी से पालते हैं। उनके बच्चों के नाम जिमी, रोजी और एनी है।

    नेता चुने जाने के बाद क्या बोले
    लेबर पार्टी का चुने जाने के बाद बर्नहैम ने कहा कि ब्रिटिश जनता मौजूदा राजनीति से तंग आ चुकी है। उन्होंने 1980 के दशक की नीतियों की आलोचना करते हुए कहाकि तब राजनीतिक शक्ति का केंद्रीकरण और आर्थिक शक्ति का निजीकरण कर दिया गया था, जिससे जनता आवास, पानी, ऊर्जा और परिवहन जैसी बुनियादी जरूरतों के लिए ऊंचे दामों के जाल में फंस गई। उन्होंने स्पष्ट किया कि वे केवल नंबर हासिल करने की राजनीति के बजाय सोशल केयर जैसे बड़े और उपेक्षित मुद्दों को हल करेंगे। इसके साथ ही पूरी पार्टी में एकजुटता का आह्वान करते हुए उन्होंने कहा कि वे एक लेबर टीम की संस्कृति का निर्माण करेंगे और उनकी कैबिनेट में पार्टी के हर धड़े और विचारों के नेताओं को जगह दी जाएगी।


    सियासी यात्रा का जिक्र

    अपनी राजनीतिक यात्रा का जिक्र करते हुए बर्नहैम ने कहाकि 2009 में एनफील्ड (लिवरपूल) से उन्होंने महसूस किया था कि यह देश कामकाजी वर्ग के लिए ठीक से काम नहीं कर रहा है। उन्होंने शेफील्ड, स्कैंथॉर्प, साउथ वेल्स और क्लाइड जैसे औद्योगिक व खनन क्षेत्रों का नाम लेते हुए कहा कि इन जगहों के लोगों ने लेबर पार्टी को बनाया, लेकिन राजनीति ने उनकी उपेक्षा की। अब लेबर पार्टी उनके भरोसे को वापस जीतेगी। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती नेता कीर स्टारमर को देश और पार्टी की शानदार सेवा के लिए धन्यवाद दिया, जिनके नेतृत्व में पार्टी अपनी सबसे बड़ी हार से उबरकर सबसे बड़ी जीत तक पहुंची और वैश्विक मंच पर ब्रिटेन की साख मजबूत हुई।


    कैसे बना रास्ता

    बता दें कि लेबर पार्टी को मई में हुए स्थानीय चुनावों में करारी हार का सामना करना पड़ा। इसके बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री सर कीर स्टार्मर पर पद छोड़ने का भारी दबाव बन गया था। इसी बीच बर्नहैम ने जून में मेकरफील्ड उपचुनाव में शानदार जीत दर्ज कर संसद में वापसी की। उनके सांसद बनते ही राजनीतिक समीकरण बदल गए और स्टार्मर ने अपने पद से इस्तीफे की घोषणा कर दी। सोमवार को प्रधानमंत्री ऑफिस ‘10 डाउनिंग स्ट्रीट’ में स्टॉर्मर के भावुक संबोधन के तुरंत बाद बर्नहैम ने ‘हाउस ऑफ कॉमन्स’ में सांसद के रूप में औपचारिक रूप से शपथ ली।

  • मुकेश अंबानी को बड़ा झटका…. पहली तिमाही में 22% गिरा रिलायंस इंडस्ट्रीज का मुनाफा

    मुकेश अंबानी को बड़ा झटका…. पहली तिमाही में 22% गिरा रिलायंस इंडस्ट्रीज का मुनाफा


    मुम्बई।
    मुकेश अंबानी (Mukesh Ambani) की कंपनी रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड (आरआईएल) (Reliance Industries Limited – RIL) ने चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही के नतीजे जारी कर दिए हैं। इस तिमाही में कंपनी का मुनाफा (Profit) सालाना आधार पर 22 प्रतिशत घटकर 20,946 करोड़ रुपये रहा। रिलायंस इंडस्ट्रीज ने शुक्रवार को शेयर बाजार को दी सूचना में कहा कि पिछले साल की समान तिमाही में एशियन पेंट्स की हिस्सेदारी बेचने से उसे एकबारगी बड़ा लाभ हुआ था, जिससे उसका मुनाफा 26,994 करोड़ रुपये रहा था। इस वजह से इस बार लाभ में गिरावट दिख रही है। रिलायंस ने बताया कि वित्त वर्ष 2026-27 की जून तिमाही में पिछले साल जैसा 8,924 करोड़ रुपये का असाधारण लाभ नहीं था। हालांकि, अगर इस एकबारगी लाभ को हटा दिए जाए, तो कंपनी का मुख्य कारोबार स्थिर बना रहा।


    रिलायंस रिटेल के कारोबार का हाल

    रिलायंस रिटेल वेंचर्स लिमिटेड (RRVL) ने शुक्रवार को बताया कि वित्त वर्ष 2027 की पहली तिमाही में उसका नेट प्रॉफिट सालाना आधार पर 14.1 प्रतिशत घटकर 2,805 करोड़ रुपये हो गया। ऑपरेशन्स से रिलायंस रिटेल की EBITDA 1.8 प्रतिशत घटकर 5,935 करोड़ रुपये रह गई। जून में खत्म हुई तिमाही के दौरान, कंपनी की फाइनेंस कॉस्ट सालाना आधार पर 34 प्रतिशत बढ़कर 793 करोड़ रुपये हो गई।


    जियो प्लेटफॉर्म्स के मुनाफे में उछाल

    वित्त वर्ष 2026-27 की अप्रैल-जून तिमाही में जियो प्लेटफॉर्म्स का नेट प्रॉफिट 9.2 प्रतिशत बढ़कर 7,764 करोड़ रुपये रहा। जियो प्लेटफॉर्म्स लिमिटेड (जेपीएल) ने वित्त वर्ष 2025-26 की समान तिमाही में 7,110 करोड़ रुपये का मुनाफा कमाया था। कंपनी ने बताया कि चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही में उसकी परिचालन आय 11.8 प्रतिशत बढ़कर 39,173 करोड़ रुपये हो गई, जो 2025-26 की समान तिमाही में 35,032 करोड़ रुपये थी। जियो ने कहा कि जियो प्लेटफॉर्म्स का राजस्व सालाना आधार पर 12 प्रतिशत बढ़ा है।

    इसके पीछे ग्राहक बाजार हिस्सेदारी में लगातार वृद्धि, उपयोगकर्ता औसत राजस्व (एआरपीयू) में बढ़ोतरी और डिजिटल सेवाओं के कारोबार में मजबूत वृद्धि प्रमुख कारण रहे। तिमाही में जियो प्लेटफॉर्म्स का एआरपीयू 3.3 प्रतिशत बढ़कर 215.6 रुपये हो गया। वित्त वर्ष 2025-26 की समान तिमाही में कंपनी का एआरपीयू 208.8 रुपये था। कंपनी का ग्राहक आधार सालाना आधार पर 7.1 प्रतिशत बढ़कर 53.3 करोड़ हो गया, जो 2025-26 की समान तिमाही में 49.8 करोड़ था।


    शेयर का हाल

    रिलायंस इंडस्ट्रीज के शेयर की बात करें तो शुक्रवार को 1326.50 रुपये पर बंद हुआ। एक दिन पहले के मुकाबले शेयर 2.59% बढ़कर बंद हुआ। शेयर के 52 हफ्ते का हाई 1,611.20 रुपये है।

  • MP: भोपाल में दांत साफ करते समय टूथब्रश का हिस्सा टूटकर गले में फंसा… डॉक्टरों ने बचाई 5 साल के बच्चे की जान

    MP: भोपाल में दांत साफ करते समय टूथब्रश का हिस्सा टूटकर गले में फंसा… डॉक्टरों ने बचाई 5 साल के बच्चे की जान


    भोपाल।
    MP की राजधानी भोपाल (Bhopal) में एक 5 वर्षीय मासूम के साथ दर्दनाक हादसा हो गया. दांत साफ (Clean teeth) करते समय टूथब्रश अचानक टूट गया और उसका टूटा हुआ हिस्सा बच्चे के मुंह से होते हुए गले में गहराई तक फंस गया. बच्चे को तेज दर्द, बोलने और निगलने में परेशानी होने लगी. घबराए परिजन उसे तत्काल हमीदिया अस्पताल (Hamidia Hospital) लेकर पहुंचे, जहां डॉक्टरों ने समय रहते ऑपरेशन कर उसकी जान बचा ली।

    हमीदिया अस्पताल में जांच के दौरान डॉक्टरों ने पाया कि टूथब्रश का टूटा हुआ हिस्सा गले के अंदर संवेदनशील हिस्से में फंसा हुआ है. स्थिति गंभीर होने के कारण ईएनटी विशेषज्ञों की टीम ने तुरंत ऑपरेशन करने का फैसला लिया। ऑपरेशन के दौरान डॉक्टरों ने बेहद सावधानी से टूथब्रश का टूटा हुआ हिस्सा बाहर निकाला. पूरी प्रक्रिया सफल रही और बच्चे को किसी तरह की गंभीर क्षति नहीं पहुंची।


    डॉक्टरों की निगरानी में बच्चा

    हमीदिया अस्पताल की डॉ कीर्ति वाईके ने बताया कि इलाज में थोड़ी भी देरी होती तो टूथब्रश का हिस्सा श्वास नली या भोजन नली को नुकसान पहुंचा सकता था. इससे संक्रमण, अत्यधिक रक्तस्राव या सांस लेने में गंभीर परेशानी जैसी जटिलताएं पैदा हो सकती थीं. समय पर अस्पताल पहुंचने और विशेषज्ञों की त्वरित कार्रवाई से बच्चे की जान बच गई. फिलहाल मासूम की हालत स्थिर है और उसे डॉक्टरों की निगरानी में रखा गया है।

    ‘ब्रश करते समय कभी अकेला न छोड़ें’
    डॉ कीर्ति वाईके ने अभिभावकों से अपील की है कि छोटे बच्चों को ब्रश करते समय कभी अकेला न छोड़ें. बच्चों को हमेशा निगरानी में ब्रश कराएं और टूथब्रश की गुणवत्ता पर भी ध्यान दें. यदि ब्रश टूट जाए या किसी भी तरह की दुर्घटना हो जाए तो उसे स्वयं निकालने की कोशिश न करें, बल्कि तुरंत अस्पताल पहुंचें।

    यह घटना सभी अभिभावकों के लिए एक बड़ी सीख है कि छोटी-सी लापरवाही भी बच्चों के लिए जानलेवा साबित हो सकती है. समय पर इलाज और हमीदिया अस्पताल के डॉक्टरों की सतर्कता से इस मासूम की जान बच गई और एक बड़ा हादसा टल गया।

  • MP: इंदौर की 3 वर्षीय अनिका के लिए एक-एक पल भारी, राशि जुटाने के बाद शुरू नहीं हुआ इलाज…. AIIMS में घूम रहीं फाइलें

    MP: इंदौर की 3 वर्षीय अनिका के लिए एक-एक पल भारी, राशि जुटाने के बाद शुरू नहीं हुआ इलाज…. AIIMS में घूम रहीं फाइलें


    इंदौर।
    मध्य प्रदेश (Madhya Pradesh) के इंदौर (Indore) की तीन वर्षीय अनिका शर्मा (Anika Sharma) के लिए समय लगातार भारी पड़ता जा रहा है. स्पाइनल मस्क्युलर एट्रोफी (Spinal Muscular Atrophy- SMA) टाइप-2 जैसी दुर्लभ बीमारी से जूझ रही इस मासूम का इलाज अब भी शुरू नहीं हो पाया है. जबकि परिवार, समाज और संस्थाओं की मदद से उपचार के लिए अधिकांश राशि जुटाई जा चुकी है. इसके बावजूद प्रशासनिक देरी बच्ची के इलाज की सबसे बड़ी बाधा बनी हुई है.

    दरअसल, इसी मामले में मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर बेंच ने सुनवाई करते हुए दिल्ली एम्स की कार्यप्रणाली पर गंभीर चिंता जताई. अदालत ने पाया कि बार-बार अवसर दिए जाने के बावजूद एम्स की ओर से जवाब दाखिल नहीं किया गया. इस पर अदालत ने साफ निर्देश दिए कि हर हाल में 23 जुलाई 2026 तक जवाब पेश किया जाए. मामले की अगली सुनवाई 27 जुलाई को होगी।

    याचिकाकर्ता के अधिवक्ताओं ने अदालत को बताया कि इलाज के लिए अब केवल सीमित राशि की जरूरत है, लेकिन एम्स की प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ने से जीवनरक्षक इंजेक्शन की खरीद अटकी हुई है. एक ओर केंद्र सरकार से स्वीकृत सहायता की प्रक्रिया लंबित है, तो दूसरी ओर क्राउडफंडिंग से जुटाई गई राशि भी इनवॉइस के अभाव में जारी नहीं हो पा रही है।

    हाईकोर्ट ने संकेत दिए हैं कि इतने संवेदनशील मामले में अब और देरी स्वीकार नहीं की जाएगी, क्योंकि अनिका के लिए बीतता हर दिन केवल एक तारीख नहीं, बल्कि जिंदगी और उम्मीद के बीच की दूरी बढ़ा रहा है।

    इससे पहले, हाई कोर्ट ने इस मामले में केंद्र सरकार से 22 जून को जवाब तलब किया था. साथ ही राज्य सरकार से यह बताने को कहा था कि वह बच्ची के इलाज में किसी प्रकार सहायता कर सकती है या नहीं?

    बता दें कि बच्ची के इलाज के लिए करीब 9.50 करोड़ रुपये की जरूरत है. परिजन अब तक करीब 8 करोड़ रुपये जुटा चुके हैं, जिसमें केंद्र सरकार की ओर से स्वीकृत 50 लाख रुपये और तमाम लोगों एवं सामाजिक संगठनों से प्राप्त सहयोग राशि शामिल है.

    बच्ची के इलाज के लिए अमेरिका से एक इंजेक्शन मंगाया जाना है. यह इंजेक्शन मंगवाकर उसका इलाज जल्द से जल्द शुरू किया जाना चाहिए, क्योंकि हर गुजरते दिन के साथ उसके स्वास्थ्य के लिए खतरा बढ़ रहा है.

    स्पाइनल मस्कुलर एट्रोफी एक आनुवंशिक तंत्रिका-मांसपेशीय रोग है. इसमें रीढ़ की हड्डी में मौजूद ‘मोटर न्यूरॉन’ धीरे-धीरे नष्ट होने लगते हैं, जिससे मांसपेशियां कमजोर होती जाती हैं और उनका क्षय होने लगता है.

    ‘मोटर न्यूरॉन’ मस्तिष्क और रीढ़ की हड्डी में पाई जाने वाली खास तंत्रिका कोशिकाएं होती हैं, जो दिमाग से शरीर की मांसपेशियों तक अलग-अलग क्रियाओं के वास्ते संदेश पहुंचाती हैं, जिनमें सांस लेना, निगलना और बोलना शामिल हैं. फिलहाल मासूम की हालत स्थिर है और उसे डॉक्टरों की निगरानी में रखा गया है।