Author: bharati

  • आज नरसिंह जयंती का महापर्व: दुर्लभ संयोग में करें सही पूजा, इन गलतियों से दूर रहें वरना मिलेगा विपरीत फल

    आज नरसिंह जयंती का महापर्व: दुर्लभ संयोग में करें सही पूजा, इन गलतियों से दूर रहें वरना मिलेगा विपरीत फल


    नई दिल्ली । आज पूरे देश में नरसिंह जयंती का पावन पर्व श्रद्धा और आस्था के साथ मनाया जा रहा है। यह दिन भगवान विष्णु के उग्र और रक्षक अवतार भगवान नरसिंह को समर्पित है जिनकी पूजा से भक्तों के जीवन से भय, बाधाएं और शत्रु समाप्त होते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन विधि-विधान से पूजा करने पर विशेष फल मिलता है लेकिन छोटी-छोटी गलतियां भी पूजा का प्रभाव कम कर सकती हैं इसलिए सावधानी बेहद जरूरी मानी गई है।

    पंचांग के अनुसार इस वर्ष चतुर्दशी तिथि 29 अप्रैल की शाम से शुरू होकर 30 अप्रैल की रात तक रहेगी और उदयातिथि के आधार पर आज गुरुवार को ही नरसिंह जयंती मनाई जा रही है। इस बार का पर्व इसलिए भी खास है क्योंकि इस दिन दो बेहद शुभ और दुर्लभ संयोग बन रहे हैं जो इसकी आध्यात्मिक शक्ति को कई गुना बढ़ा देते हैं।

    पहला संयोग है गुरुवार का जो भगवान विष्णु की आराधना के लिए समर्पित दिन माना जाता है। ऐसे में नरसिंह जयंती का इस दिन पड़ना इसे और भी फलदायी बना देता है। दूसरा बड़ा संयोग है रवि योग का निर्माण जिसे ज्योतिष शास्त्र में सभी दोषों को समाप्त करने वाला और कार्यों में सफलता दिलाने वाला माना जाता है। मान्यता है कि इस योग में की गई पूजा, व्रत और दान अक्षय फल प्रदान करते हैं और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार करते हैं।

    इस पावन अवसर पर भक्तों को सुबह जल्दी उठकर स्नान करना चाहिए और साफ-सुथरे तथा पीले या केसरिया रंग के वस्त्र धारण करने चाहिए। इसके बाद भगवान नरसिंह की मूर्ति या तस्वीर का गंगाजल और पंचामृत से अभिषेक करना अत्यंत शुभ माना गया है। पूजा के दौरान भगवान को प्रसन्न करने के लिए सत्तू, तिल और गुड़ का दान करना भी विशेष फलदायी बताया गया है। इन उपायों से भगवान की कृपा प्राप्त होती है और जीवन में सुख-समृद्धि का आगमन होता है।

    लेकिन जितना जरूरी सही पूजा करना है उतना ही जरूरी कुछ गलतियों से बचना भी है। इस दिन घर में किसी भी प्रकार का झगड़ा या क्लेश करना अशुभ माना जाता है क्योंकि इससे नकारात्मक ऊर्जा बढ़ती है और पूजा का फल नष्ट हो सकता है। इसके अलावा प्याज, लहसुन या किसी भी प्रकार के तामसिक भोजन का सेवन नहीं करना चाहिए। धार्मिक मान्यता के अनुसार इस दिन सात्विकता बनाए रखना बेहद आवश्यक है।

    इसके साथ ही किसी भी असहाय या जरूरतमंद व्यक्ति का अपमान करना बहुत बड़ा दोष माना गया है। नरसिंह भगवान को धर्म और न्याय का प्रतीक माना जाता है इसलिए इस दिन करुणा, दया और सेवा भाव रखना विशेष रूप से जरूरी होता है। ऐसा करने से ही पूजा का पूरा लाभ प्राप्त होता है।

    नरसिंह जयंती केवल एक धार्मिक पर्व नहीं बल्कि यह आस्था और विश्वास का प्रतीक भी है। यह हमें सिखाता है कि यदि विश्वास अटूट हो तो भगवान किसी भी रूप में अपने भक्त की रक्षा के लिए प्रकट हो सकते हैं। इसलिए इस दिन श्रद्धा, नियम और सकारात्मक भाव के साथ पूजा करना ही सबसे बड़ा उपाय है जो जीवन में सुख, शांति और सुरक्षा प्रदान करता है।

  • मजबूत घरेलू खपत और बैंकिंग सिस्टम ने वैश्विक झटकों को किया बेअसर।

    मजबूत घरेलू खपत और बैंकिंग सिस्टम ने वैश्विक झटकों को किया बेअसर।

    नई दिल्ली । दुनिया भर में छाई आर्थिक अनिश्चितता और विशेष रूप से पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था एक सुरक्षित और मजबूत स्थिति में नजर आ रही है। वित्त मंत्रालय द्वारा जारी ताजा आर्थिक विश्लेषण के अनुसार, वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में पैदा हुई बड़ी बाधाओं के बावजूद भारत की आंतरिक मजबूती इसके बचाव में सबसे बड़ी ढाल बनी हुई है। रिपोर्ट यह रेखांकित करती है कि देश की मजबूत घरेलू मांग, प्रभावी सरकारी निवेश और एक बेहद लचीली वित्तीय प्रणाली ने मिलकर अर्थव्यवस्था को एक ऐसा सुरक्षा कवच प्रदान किया है, जो बाहरी झटकों को सहने में पूरी तरह सक्षम है।

    बाजार के वर्तमान आंकड़ों पर नजर डालें तो खपत का स्तर उम्मीद से कहीं बेहतर है। मार्च महीने के दौरान वाहनों और ट्रैक्टरों की खुदरा बिक्री में हुई बढ़ोतरी इस बात का प्रमाण है कि देश के ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में मांग का पहिया तेजी से घूम रहा है। हालांकि, समीक्षा में इस बात को लेकर आगाह भी किया गया है कि भविष्य की आर्थिक दिशा काफी हद तक इस बात पर निर्भर करेगी कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इनपुट लागत और आपूर्ति श्रृंखला पर कितना दबाव रहता है। उम्मीद जताई गई है कि साल 2026 के उत्तरार्ध तक मध्य पूर्व की स्थितियों में सुधार देखने को मिल सकता है, जिससे वैश्विक व्यापार को राहत मिलेगी।

    चुनौतियों के मोर्चे पर मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि यदि पश्चिम एशिया का संघर्ष लंबा खिंचता है, तो इसके राजकोषीय प्रभाव पड़ना तय है। इससे न केवल केंद्र बल्कि राज्यों की राजस्व प्राप्ति और खर्च करने की क्षमता पर भी असर पड़ सकता है।

    ऊर्जा और उर्वरक की आपूर्ति में संभावित अनिश्चितता मुद्रास्फीति (महंगाई) और व्यापार घाटे को बढ़ा सकती है। हालिया आंकड़ों के अनुसार, भारत का व्यापार घाटा पिछले वर्ष के मुकाबले बढ़कर 333.2 अरब डॉलर तक पहुँच गया है, और यह प्रवृत्ति अगले वित्त वर्ष में भी जारी रहने की संभावना है। इसके बावजूद, सरकार ने ‘आर्थिक स्थिरीकरण कोष’ जैसी रणनीतियों के माध्यम से किसी भी आपात स्थिति से निपटने के लिए पर्याप्त राजकोषीय गुंजाइश बना रखी है।

    आर्थिक विकास की इस गति को भविष्य में भी बनाए रखने के लिए सरकार अब नई तकनीकों और कौशल विकास पर दांव लगा रही है। रिपोर्ट में इस बात पर जोर दिया गया है कि युवाओं को कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और टिकाऊ व्यापार कौशल में निपुण बनाकर घरेलू विनिर्माण और सेवा क्षेत्र को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाया जा सकता है।

    इससे न केवल रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे, बल्कि अंतरराष्ट्रीय बाजारों में भारत के निर्यात की हिस्सेदारी भी बढ़ेगी। कुल मिलाकर, रिपोर्ट का निष्कर्ष है कि सावधानीपूर्ण नीतिगत फैसलों और आंतरिक मजबूती के दम पर भारत वैश्विक संकटों के बीच भी अपनी विकास दर को सुरक्षित रखने में कामयाब रहेगा।

  • अदाणी पोर्ट्स का रिकॉर्ड प्रदर्शन, 50 करोड़ टन कार्गो के साथ आय और लाभ में उल्लेखनीय बढ़ोतरी

    अदाणी पोर्ट्स का रिकॉर्ड प्रदर्शन, 50 करोड़ टन कार्गो के साथ आय और लाभ में उल्लेखनीय बढ़ोतरी

    नई दिल्ली । वित्त वर्ष 2026 अदाणी पोर्ट्स के लिए मजबूत प्रदर्शन और विस्तार का वर्ष साबित हुआ है, जहां कंपनी ने अपने मुनाफे और आय दोनों में उल्लेखनीय बढ़ोतरी दर्ज की है। इस दौरान कंपनी ने न केवल वित्तीय रूप से मजबूती दिखाई, बल्कि परिचालन स्तर पर भी कई नए रिकॉर्ड स्थापित किए।

    कंपनी का शुद्ध लाभ इस वित्त वर्ष में 16 प्रतिशत की वृद्धि के साथ 12,782 करोड़ रुपये तक पहुंच गया। वहीं, कुल आय में भी उल्लेखनीय उछाल देखा गया, जो 25 प्रतिशत बढ़कर 38,736 करोड़ रुपये से अधिक हो गई। यह बढ़ोतरी इस बात का संकेत है कि कंपनी ने अपने विभिन्न कारोबार क्षेत्रों में संतुलित और प्रभावी रणनीति अपनाई है।

    इस दौरान परिचालन लाभ यानी एबिटा में भी 20 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई, जो 22,851 करोड़ रुपये तक पहुंच गया। यह आंकड़ा कंपनी की मजबूत कार्यप्रणाली और लागत नियंत्रण को दर्शाता है।

    परिचालन उपलब्धियों की बात करें तो कंपनी ने इस वर्ष एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर हासिल किया। एक ही वर्ष में 50 करोड़ मीट्रिक टन से अधिक कार्गो को संभालना अपने आप में एक बड़ी उपलब्धि है, जिसने कंपनी को देश के अग्रणी एकीकृत परिवहन ऑपरेटर के रूप में स्थापित किया है।

    कंपनी के लॉजिस्टिक्स कारोबार ने इस वृद्धि में अहम भूमिका निभाई। इस सेगमेंट में 55 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई, जो ट्रांसपोर्ट और माल ढुलाई सेवाओं के विस्तार के कारण संभव हो पाई। वहीं समुद्री कारोबार में 134 प्रतिशत की तेज वृद्धि ने कंपनी के कुल प्रदर्शन को और मजबूती दी। बेड़े में जहाजों की संख्या बढ़ने से इस क्षेत्र में तेजी आई है।

    अंतरराष्ट्रीय संचालन से भी कंपनी को सकारात्मक परिणाम मिले हैं। विदेशी बंदरगाहों से प्राप्त राजस्व में 34 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई, जो वैश्विक स्तर पर कंपनी के विस्तार को दर्शाता है।

    वित्त वर्ष की अंतिम तिमाही में भी कंपनी का प्रदर्शन संतोषजनक रहा। इस अवधि में आय में 26 प्रतिशत की वृद्धि हुई, जबकि मुनाफा 9 प्रतिशत बढ़कर 3,308 करोड़ रुपये तक पहुंच गया। इससे स्पष्ट है कि वर्ष के अंत तक भी कंपनी की विकास दर बनी रही।

    भविष्य की योजनाओं को लेकर कंपनी ने स्पष्ट संकेत दिए हैं कि आने वाले वर्षों में वह अपनी क्षमता और दायरे को और बढ़ाने पर ध्यान केंद्रित करेगी। कार्गो हैंडलिंग क्षमता बढ़ाने, सेवाओं का विस्तार करने और निवेश को संतुलित बनाए रखने की रणनीति पर काम किया जा रहा है।

  • कच्चे तेल की तेजी ने बढ़ाई चिंता-बिकवाली के दबाव में बाजार, सेंसेक्स-निफ्टी में गिरावट

    कच्चे तेल की तेजी ने बढ़ाई चिंता-बिकवाली के दबाव में बाजार, सेंसेक्स-निफ्टी में गिरावट

    नई दिल्ली । वैश्विक स्तर पर बढ़ती अनिश्चितता और कच्चे तेल की कीमतों में आई तेजी का असर भारतीय शेयर बाजार पर साफ तौर पर देखने को मिला, जहां कारोबारी सत्र के अंत में प्रमुख सूचकांक गिरावट के साथ बंद हुए। दिनभर बाजार में उतार-चढ़ाव का माहौल बना रहा, लेकिन अंततः निवेशकों की सतर्कता और बिकवाली के दबाव ने बाजार को लाल निशान में पहुंचा दिया।

    कारोबार की शुरुआत हल्की मजबूती के साथ हुई थी, लेकिन जैसे-जैसे दिन आगे बढ़ा, बाजार पर दबाव बढ़ता गया। निवेशकों ने जोखिम लेने के बजाय मुनाफावसूली को प्राथमिकता दी, जिसके चलते सूचकांक धीरे-धीरे नीचे आते गए। दिन के अंत तक सेंसेक्स और निफ्टी दोनों में लगभग 0.7 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई, जो यह दर्शाती है कि बाजार का मूड फिलहाल कमजोर बना हुआ है।

    इस गिरावट के पीछे अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रम एक प्रमुख कारण रहा। वैश्विक स्तर पर तनाव बढ़ने के चलते कच्चे तेल की कीमतों में उछाल आया, जिससे आर्थिक अनिश्चितता बढ़ गई। तेल की कीमतों में तेजी का सीधा असर महंगाई और उत्पादन लागत पर पड़ता है, जिससे कंपनियों के मुनाफे पर दबाव बढ़ सकता है। यही कारण है कि निवेशकों ने सतर्क रुख अपनाते हुए बाजार से दूरी बनानी शुरू कर दी।

    बाजार के विभिन्न सेक्टरों में भी कमजोरी का रुख देखने को मिला। धातु, बैंकिंग, रियल एस्टेट और उपभोक्ता क्षेत्र से जुड़े शेयरों में खासा दबाव रहा। इन क्षेत्रों में आई गिरावट यह संकेत देती है कि व्यापक स्तर पर निवेशकों का भरोसा डगमगाया है। हालांकि कुछ चुनिंदा सेक्टरों में हल्की बढ़त देखने को मिली, लेकिन वह समग्र गिरावट को संतुलित करने के लिए पर्याप्त नहीं रही।

    मिडकैप और स्मॉलकैप शेयरों में भी गिरावट दर्ज की गई, जो यह दर्शाता है कि बाजार का दबाव केवल बड़े शेयरों तक सीमित नहीं रहा। व्यापक बाजार में कमजोरी का मतलब है कि निवेशकों ने सभी स्तरों पर सतर्कता अपनाई है और जोखिम कम करने की कोशिश की है।

    व्यक्तिगत शेयरों की बात करें तो कुछ कंपनियों के शेयरों में मजबूती जरूर देखने को मिली, लेकिन गिरावट वाले शेयरों की संख्या ज्यादा रही। यह असंतुलन बाजार की वर्तमान स्थिति को दर्शाता है, जहां सकारात्मक संकेत सीमित हैं और नकारात्मक कारक हावी हैं।

    विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक वैश्विक स्थिति में स्थिरता नहीं आती और कच्चे तेल की कीमतें नियंत्रण में नहीं आतीं, तब तक बाजार में उतार-चढ़ाव बना रह सकता है। निवेशकों के लिए यह समय सतर्कता और सोच-समझकर फैसले लेने का है।

  • तेल कोटे पर टकराव के बाद यूएई का बड़ा फैसला, ओपेक से बाहर निकलने से दुनिया में हलचल

    तेल कोटे पर टकराव के बाद यूएई का बड़ा फैसला, ओपेक से बाहर निकलने से दुनिया में हलचल


    नई दिल्ली । वैश्विक ऊर्जा बाजार में एक बड़ा बदलाव सामने आया है जहां United Arab Emirates ने 1 मई से OPEC से अलग होने का ऐलान कर दिया है। यह फैसला ऐसे समय में आया है जब दुनिया पहले से ही ऊर्जा संकट और भू-राजनीतिक तनाव से जूझ रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस कदम का असर सिर्फ तेल की कीमतों तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि यह वैश्विक अर्थव्यवस्था और खासतौर पर भारत जैसे आयातक देशों पर भी गहरा प्रभाव डालेगा।

    भारत के पूर्व राजदूत Navdeep Singh Suri के मुताबिक यूएई का यह फैसला अचानक नहीं है बल्कि पिछले पांच वर्षों से इसकी तैयारी चल रही थी। उनका कहना है कि यूएई लंबे समय से ओपेक द्वारा तय किए गए उत्पादन कोटे से असंतुष्ट था। शुरुआत में उसे करीब 2.7 मिलियन बैरल प्रतिदिन उत्पादन की अनुमति थी जिसे बाद में बढ़ाकर 3.4 मिलियन बैरल किया गया लेकिन यह भी उसकी बढ़ती क्षमता के अनुरूप नहीं था।

    सूरी ने बताया कि यूएई ने पिछले कुछ वर्षों में अपनी तेल उत्पादन क्षमता में भारी निवेश किया है और वह जल्द ही 5 मिलियन बैरल प्रतिदिन उत्पादन करने की स्थिति में पहुंच सकता है। ऐसे में वह ओपेक के कड़े नियमों और सऊदी अरब के प्रभाव वाले फैसलों से मुक्त होकर अपनी क्षमता का पूरा इस्तेमाल करना चाहता है। यही वजह है कि उसने स्वतंत्र रूप से आगे बढ़ने का रास्ता चुना।

    हालांकि इस फैसले का असर वैश्विक बाजार पर तुरंत देखने को मिल सकता है। मौजूदा समय में Strait of Hormuz में तनाव और रुकावट के कारण तेल की सप्लाई प्रभावित हो रही है जिससे कीमतें 125 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच चुकी हैं। ऐसे में यूएई का ओपेक से बाहर होना बाजार में अस्थिरता को और बढ़ा सकता है।

    विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर आने वाले समय में होर्मुज स्ट्रेट में स्थिति सामान्य होती है और तेल की आपूर्ति सुचारू रूप से शुरू हो जाती है तो यूएई का अतिरिक्त उत्पादन वैश्विक बाजार में कीमतों को नियंत्रित करने में मदद कर सकता है। इससे भारत जैसे देशों को राहत मिल सकती है जो अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बड़े पैमाने पर आयात पर निर्भर हैं।

    लेकिन दूसरी ओर एक बड़ा खतरा भी सामने आता है। ओपेक लंबे समय से तेल की मांग और आपूर्ति के बीच संतुलन बनाए रखने की कोशिश करता रहा है जिससे कीमतों में अत्यधिक उतार-चढ़ाव को रोका जा सके। यदि यूएई जैसे बड़े उत्पादक देश इस संगठन से बाहर निकलते हैं तो ओपेक की पकड़ कमजोर हो सकती है और वैश्विक बाजार में अनिश्चितता बढ़ सकती है।

    इस पूरे घटनाक्रम के बीच Iran और United States के बीच जारी तनाव ने स्थिति को और जटिल बना दिया है। पूर्व राजदूत सूरी ने स्पष्ट कहा कि इन हालातों का सीधा असर भारत की अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है। उनका मानना है कि क्षेत्र में बढ़ती अस्थिरता और आपूर्ति में रुकावट वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा के लिए गंभीर चुनौती बनती जा रही है।

    कुल मिलाकर यूएई का यह कदम आने वाले समय में वैश्विक तेल बाजार की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभा सकता है। यह देखना दिलचस्प होगा कि अन्य देश इस फैसले के बाद क्या रणनीति अपनाते हैं और बाजार किस दिशा में आगे बढ़ता है।

  • मिडिल ईस्ट युद्ध के बीच अमेरिका की दुविधा: क्या चीन पर से हट रहा है फोकस?

    मिडिल ईस्ट युद्ध के बीच अमेरिका की दुविधा: क्या चीन पर से हट रहा है फोकस?


    नई दिल्ली । अमेरिका की रणनीतिक प्राथमिकताओं को लेकर वाशिंगटन में एक नई बहस तेज हो गई है जहां सांसदों ने मिडिल ईस्ट में बढ़ते सैन्य तनाव के बीच चीन पर से ध्यान हटने की आशंका जताई है पेंटागन के बजट से जुड़ी एक अहम सुनवाई के दौरान कई सांसदों ने चिंता व्यक्त की कि मौजूदा हालात अमेरिका की इंडो पैसिफिक रणनीति को प्रभावित कर सकते हैं

    हाउस आर्म्ड सर्विसेज कमेटी के अध्यक्ष माइक डी रॉजर्स ने कहा कि अमेरिका इस समय अभूतपूर्व वैश्विक चुनौतियों का सामना कर रहा है जिसमें चीन सबसे बड़ा दीर्घकालिक खतरा बनकर उभर रहा है उन्होंने स्पष्ट किया कि चीन अब केवल अपनी सीमाओं की रक्षा तक सीमित नहीं है बल्कि वह प्रशांत महासागर के गहरे हिस्सों तक अपनी सैन्य ताकत का विस्तार कर रहा है इसके लिए वह नौसैनिक जहाजों मिसाइल सिस्टम और अंतरिक्ष क्षमताओं में तेजी से निवेश कर रहा है

    सुनवाई के दौरान सांसदों ने इस बात पर भी जोर दिया कि मिडिल ईस्ट में अमेरिका की बढ़ती सैन्य तैनाती विशेष रूप से कैरियर स्ट्राइक ग्रुप्स की मौजूदगी से संसाधनों पर दबाव बढ़ रहा है इसका सीधा असर इंडो पैसिफिक क्षेत्र में अमेरिका की प्रतिक्रिया क्षमता पर पड़ सकता है जहां चीन को सबसे बड़ा रणनीतिक चुनौती माना जाता है

    कई सांसदों ने चेतावनी दी कि अगर अमेरिका का ध्यान इस महत्वपूर्ण क्षेत्र से हटता है तो चीन को अपनी स्थिति और मजबूत करने का मौका मिल सकता है उन्होंने कहा कि यह केवल सैन्य नहीं बल्कि भू राजनीतिक संतुलन का भी मामला है जहां थोड़ी सी ढील भी दीर्घकालिक प्रभाव डाल सकती है

    जॉइंट चीफ्स ऑफ स्टाफ के अध्यक्ष डैन केन ने इन चिंताओं पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि सैन्य तैनाती हमेशा रणनीतिक संतुलन का हिस्सा होती है उन्होंने बताया कि हर निर्णय में जोखिम और विकल्पों का आकलन किया जाता है और उसी के आधार पर प्राथमिकताएं तय की जाती हैं उनका कहना था कि अमेरिका को एक साथ कई क्षेत्रों में अपनी प्रतिबद्धताओं को संतुलित करना पड़ता है

    वहीं रक्षा सचिव पीट हेगसेथ ने सरकार की रणनीति का बचाव करते हुए कहा कि अमेरिकी सेना दुनिया भर में एक साथ कई खतरों से निपटने में सक्षम है उन्होंने भरोसा जताया कि मौजूदा रणनीति तत्काल चुनौतियों से निपटने के साथ साथ दीर्घकालिक सुरक्षा को भी सुनिश्चित करती है

    हालांकि आलोचकों का मानना है कि मिडिल ईस्ट में लंबे समय तक सैन्य संलिप्तता अमेरिका की क्षमताओं पर दबाव डाल सकती है और इससे विरोधी देशों को गलत संदेश जा सकता है उन्होंने यह भी कहा कि यदि इंडो पैसिफिक क्षेत्र से ध्यान हटता है तो चीन को अपनी सैन्य और आर्थिक पकड़ मजबूत करने का अतिरिक्त अवसर मिल सकता है

    गौरतलब है कि इंडो पैसिफिक क्षेत्र अमेरिका की विदेश और रक्षा नीति का केंद्र बना हुआ है जहां वह अपने सहयोगी देशों के साथ साझेदारी को मजबूत करने में जुटा है ऐसे में यह बहस इस बात को दर्शाती है कि बदलते वैश्विक परिदृश्य में अमेरिका को अपनी रणनीतिक प्राथमिकताओं के बीच संतुलन बनाए रखना कितना चुनौतीपूर्ण हो गया है

  • यूरोप में बढ़ता जलवायु संकट: रिकॉर्ड गर्मी और हीटवेव का खतरा, WMO ने जारी किया अलर्ट

    यूरोप में बढ़ता जलवायु संकट: रिकॉर्ड गर्मी और हीटवेव का खतरा, WMO ने जारी किया अलर्ट


    नई दिल्ली । यूरोप में जलवायु परिवर्तन की स्थिति लगातार गंभीर होती जा रही है और ताजा रिपोर्ट्स ने इस खतरे को और स्पष्ट कर दिया है विश्व मौसम विज्ञान संगठन और कोपरनिकस क्लाइमेट चेंज सर्विस की संयुक्त रिपोर्ट के अनुसार यूरोप दुनिया का सबसे तेजी से गर्म होने वाला महाद्वीप बन चुका है जहां तापमान वृद्धि वैश्विक औसत की तुलना में लगभग दोगुनी रफ्तार से हो रही है

    डब्ल्यूएमओ की महासचिव सेलेस्टे साउलो ने यूरोपियन स्टेट ऑफ द क्लाइमेट रिपोर्ट 2025 पेश करते हुए कहा कि 1980 के बाद से यूरोप में तापमान में तेज बढ़ोतरी दर्ज की गई है और यह स्थिति अब पर्यावरण से लेकर मानव जीवन तक हर क्षेत्र को प्रभावित कर रही है रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए तो आने वाले वर्षों में हालात और भयावह हो सकते हैं

    रिपोर्ट के मुताबिक 2025 में यूरोप के लगभग 95 प्रतिशत हिस्से में सामान्य से अधिक तापमान दर्ज किया गया इसमें मेडिटेरेनियन क्षेत्र से लेकर आर्कटिक सर्कल तक लंबे समय तक गर्मी का असर बना रहा कई क्षेत्रों में रिकॉर्ड हीटवेव देखने को मिली खासतौर पर सब आर्कटिक क्षेत्र फेनोस्कैंडिया में जुलाई के महीने में लगातार 21 दिन तक हीटवेव चली जो अब तक की सबसे लंबी और गंभीर मानी जा रही है

    स्थिति इतनी गंभीर हो चुकी है कि आर्कटिक सर्कल के आसपास तापमान 30 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया जो सामान्य परिस्थितियों में बेहद असामान्य है इसके अलावा बढ़ती गर्मी और सूखे हालात ने जंगल की आग के खतरे को भी कई गुना बढ़ा दिया है रिपोर्ट के अनुसार 2025 में यूरोप में लगभग 1.034 मिलियन हेक्टेयर जमीन आग की चपेट में आई जो साइप्रस देश के कुल क्षेत्रफल से भी ज्यादा है

    जंगल की आग के कारण उत्सर्जन में भी भारी वृद्धि हुई है जिसमें स्पेन का योगदान सबसे अधिक रहा इस तरह की घटनाओं ने न केवल पर्यावरण को नुकसान पहुंचाया है बल्कि जैव विविधता पर भी गंभीर प्रभाव डाला है समुद्री हीटवेव के कारण भूमध्य सागर में सीग्रास जैसे संवेदनशील इकोसिस्टम को नुकसान पहुंचा है वहीं पीटलैंड क्षेत्रों में आग लगने से कार्बन उत्सर्जन और बढ़ गया है

    जलवायु परिवर्तन का असर केवल पर्यावरण तक सीमित नहीं है बल्कि यह मानव स्वास्थ्य और अर्थव्यवस्था पर भी गहरा असर डाल रहा है Food and Agriculture Organization और डब्ल्यूएमओ की संयुक्त रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि अत्यधिक गर्मी वैश्विक खाद्य प्रणाली को प्रभावित कर रही है जिससे एक अरब से ज्यादा लोग जोखिम में आ सकते हैं इसके अलावा हीट स्ट्रेस के कारण हर साल दुनिया भर में लगभग 500 अरब काम के घंटे का नुकसान हो रहा है

    विशेषज्ञों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन अब भविष्य की नहीं बल्कि वर्तमान की समस्या बन चुका है और इससे निपटने के लिए तत्काल और ठोस कदम उठाने की जरूरत है यूरोपीय देशों ने 2030 और 2050 के लिए कई लक्ष्य तय किए हैं लेकिन रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि इन प्रयासों की गति को और तेज करने की आवश्यकता है कुल मिलाकर यह रिपोर्ट एक स्पष्ट चेतावनी है कि यदि दुनिया ने अभी कदम नहीं उठाए तो जलवायु संकट आने वाले समय में और भी विनाशकारी रूप ले सकता है

  • मोदी के निमंत्रण पर भारत आएंगे वियतनाम के राष्ट्रपति टो लैम, अहम मुद्दों पर होगी बड़ी चर्चा

    मोदी के निमंत्रण पर भारत आएंगे वियतनाम के राष्ट्रपति टो लैम, अहम मुद्दों पर होगी बड़ी चर्चा


    नई दिल्ली । भारत और वियतनाम के बीच कूटनीतिक रिश्तों को नई दिशा देने वाला एक अहम दौरा जल्द शुरू होने जा रहा है जहां टो लैम 5 मई से तीन दिवसीय भारत यात्रा पर पहुंचेंगे यह दौरा कई मायनों में खास माना जा रहा है क्योंकि हाल ही में राष्ट्रपति चुने जाने के बाद यह उनका पहला भारत दौरा होगा

    भारत सरकार के निमंत्रण पर हो रही इस यात्रा के दौरान राष्ट्रपति टो लैम 5 से 7 मई तक भारत में रहेंगे इस दौरान उनके साथ एक उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल भी होगा जिसमें वियतनाम सरकार के मंत्री वरिष्ठ अधिकारी और एक बड़ा बिजनेस डेलिगेशन शामिल रहेगा यह संकेत देता है कि इस यात्रा का फोकस केवल राजनीतिक ही नहीं बल्कि आर्थिक और व्यापारिक सहयोग को भी आगे बढ़ाना है

    दौरे की शुरुआत 6 मई को औपचारिक स्वागत समारोह से होगी जहां राष्ट्रपति टो लैम का स्वागत राष्ट्रपति भवन में किया जाएगा इसके बाद उनकी मुलाकात भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से होगी इस बैठक में दोनों नेता द्विपक्षीय संबंधों के साथ साथ क्षेत्रीय और वैश्विक मुद्दों पर विस्तार से चर्चा करेंगे माना जा रहा है कि इस दौरान रक्षा सहयोग व्यापार निवेश और इंडो पैसिफिक क्षेत्र में साझेदारी जैसे अहम विषयों पर भी बातचीत होगी

    राष्ट्रपति टो लैम भारत की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु से भी मुलाकात करेंगे इसके अलावा कई अन्य वरिष्ठ नेताओं के साथ भी उनकी बैठक प्रस्तावित है इन मुलाकातों के जरिए दोनों देशों के बीच राजनीतिक विश्वास और सहयोग को और मजबूत करने का प्रयास किया जाएगा

    इस दौरे का एक महत्वपूर्ण पहलू सांस्कृतिक और धार्मिक जुड़ाव भी है राष्ट्रपति टो लैम अपने कार्यक्रम के तहत बिहार के बोधगया भी जाएंगे जो बौद्ध धर्म का प्रमुख केंद्र है इसके साथ ही वे मुंबई का भी दौरा करेंगे जहां व्यापारिक और औद्योगिक गतिविधियों को लेकर चर्चाएं हो सकती हैं

    भारत और वियतनाम के संबंध ऐतिहासिक और सभ्यतागत आधार पर टिके हुए हैं पिछले कुछ वर्षों में इन रिश्तों में लगातार मजबूती आई है खासतौर पर 2016 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के वियतनाम दौरे के दौरान दोनों देशों के बीच व्यापक रणनीतिक साझेदारी स्थापित की गई थी अब इस साझेदारी के 10 वर्ष पूरे होने के मौके पर यह दौरा और भी महत्वपूर्ण हो जाता है

    इससे पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने टो लैम को राष्ट्रपति चुने जाने पर बधाई देते हुए दोनों देशों के रिश्तों को और मजबूत करने की इच्छा जताई थी उन्होंने भरोसा जताया था कि टो लैम के नेतृत्व में भारत और वियतनाम की दोस्ती और गहरी होगी

    विशेषज्ञों का मानना है कि यह दौरा न केवल द्विपक्षीय संबंधों को नई ऊंचाई देगा बल्कि क्षेत्रीय स्थिरता और आर्थिक सहयोग को भी बढ़ावा देगा आने वाले समय में भारत और वियतनाम के बीच साझेदारी और मजबूत होती दिखाई दे सकती है

  • बीजिंग मिशन से पहले औपचारिकता पूरी: राष्ट्रपति मुर्मु से मिले विक्रम दोराईस्वामी, सौंपे गए परिचय पत्र

    बीजिंग मिशन से पहले औपचारिकता पूरी: राष्ट्रपति मुर्मु से मिले विक्रम दोराईस्वामी, सौंपे गए परिचय पत्र


    नई दिल्ली ।
    भारत और चीन के बीच कूटनीतिक संबंधों के लिहाज से एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम सामने आया है जहां विक्रम दोराईस्वामी ने चीन में भारत के राजदूत के रूप में अपनी नई जिम्मेदारी संभालने से पहले औपचारिक प्रक्रिया पूरी कर ली है उन्होंने भारत की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु से मुलाकात कर अपने परिचय पत्र प्राप्त किए हैं जो किसी भी राजनयिक नियुक्ति का एक जरूरी और औपचारिक चरण माना जाता है

    चीन में भारतीय दूतावास ने इस मुलाकात की जानकारी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स के माध्यम से साझा की और बताया कि दोराईस्वामी को उनके नए असाइनमेंट के लिए राष्ट्रपति से क्रेडेंशियल्स प्रदान किए गए हैं यह नियुक्ति ऐसे समय में हुई है जब भारत और चीन के बीच संबंध कई वैश्विक और क्षेत्रीय मुद्दों के चलते काफी अहम माने जा रहे हैं ऐसे में एक अनुभवी राजनयिक की तैनाती को रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है

    1992 बैच के भारतीय विदेश सेवा अधिकारी विक्रम दोराईस्वामी का कूटनीतिक करियर बेहद समृद्ध और विविध अनुभवों से भरा रहा है उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा दिल्ली विश्वविद्यालय से इतिहास विषय में मास्टर डिग्री हासिल कर पूरी की इसके बाद 1992 से 1993 के दौरान नई दिल्ली में अपनी इन सर्विस ट्रेनिंग पूरी की और मई 1994 में हांगकांग स्थित भारतीय दूतावास में थर्ड सेक्रेटरी के रूप में अपनी पहली विदेशी नियुक्ति संभाली

    दिलचस्प बात यह है कि उन्होंने हांगकांग के चीनी विश्वविद्यालय से चीनी भाषा में डिप्लोमा भी किया है जो उन्हें चीन से जुड़े मामलों में एक अतिरिक्त विशेषज्ञता प्रदान करता है यही कारण है कि उन्हें पहले भी बीजिंग में भारतीय दूतावास में कार्य करने का अनुभव मिल चुका है जहां उन्होंने लगभग चार वर्षों तक अपनी सेवाएं दी थीं

    इसके अलावा दोराईस्वामी ने विदेश मंत्रालय में कई महत्वपूर्ण पदों पर कार्य किया है जिसमें डिप्टी चीफ ऑफ प्रोटोकॉल और प्रधानमंत्री कार्यालय में निजी सचिव जैसे अहम पद शामिल हैं उन्होंने संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी मिशन न्यूयॉर्क में राजनीतिक सलाहकार के रूप में भी काम किया और दक्षिण अफ्रीका के जोहान्सबर्ग में महावाणिज्य दूत की जिम्मेदारी भी संभाली

    उनका अनुभव केवल बहुपक्षीय मंचों तक सीमित नहीं रहा बल्कि उन्होंने क्षेत्रीय संगठनों में भी अहम भूमिका निभाई नई दिल्ली में विदेश मंत्रालय में रहते हुए उन्होंने सार्क विभाग का नेतृत्व किया और ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के समन्वयक के रूप में भी कार्य किया

    हाल के वर्षों में वे ब्रिटेन में भारत के उच्चायुक्त के पद पर कार्यरत रहे हैं और अब उन्हें चीन जैसे महत्वपूर्ण देश में भारत का प्रतिनिधित्व करने की जिम्मेदारी सौंपी गई है ऐसे में यह नियुक्ति भारत की विदेश नीति और कूटनीतिक रणनीति के लिहाज से बेहद अहम मानी जा रही है

    आने वाले समय में विक्रम दोराईस्वामी से उम्मीद की जा रही है कि वे अपने अनुभव और विशेषज्ञता के जरिए भारत और चीन के बीच संबंधों को बेहतर बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे साथ ही क्षेत्रीय और वैश्विक स्तर पर भारत के हितों को मजबूती से आगे बढ़ाएंगे

  • तेहरान में फंसे बुजुर्ग सिख दंपति, भारत वापसी पर संकट: बीजेपी प्रवक्ता ने की अपील

    तेहरान में फंसे बुजुर्ग सिख दंपति, भारत वापसी पर संकट: बीजेपी प्रवक्ता ने की अपील


    नई दिल्ली । पश्चिम एशिया में जारी तनाव के बीच ईरान में फंसे भारतीयों की वापसी को लेकर चिंता लगातार बढ़ती जा रही है इसी बीच भारतीय जनता पार्टी के प्रवक्ता जयवीर शेरगिल ने एक महत्वपूर्ण मुद्दा उठाते हुए विदेश मंत्रालय से तत्काल हस्तक्षेप की अपील की है उन्होंने खास तौर पर तेहरान में फंसे बुजुर्ग सिख दंपतियों की स्थिति को लेकर चिंता जताई है जो इस समय वहां के गुरुद्वारा साहिब में फंसे हुए हैं

    शेरगिल ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स के जरिए अपनी अपील में कहा कि ये सिख दंपति लंबे समय से भारत लौटने का इंतजार कर रहे हैं लेकिन जरूरी अनुमति नहीं मिलने के कारण उनकी वापसी संभव नहीं हो पा रही है उन्होंने विदेश मंत्री एस. जयशंकर से व्यक्तिगत रूप से हस्तक्षेप करने का अनुरोध किया है ताकि इन परिवारों को सुरक्षित भारत लाया जा सके

    बताया जा रहा है कि ईरान से भारत के लिए महान एयरवेज की एक फ्लाइट 5 मई को संचालित होने वाली है लेकिन एयरलाइन ने स्पष्ट कर दिया है कि बिना भारत सरकार की अनुमति के इन यात्रियों को साथ लाना संभव नहीं होगा यही कारण है कि यह मामला अब और गंभीर हो गया है और तत्काल समाधान की जरूरत महसूस की जा रही है

    दरअसल ईरान में हालिया हालात के चलते वहां का एयरस्पेस काफी समय तक बंद रहा था जिसकी वजह से कई लोग वहीं फंस गए थे हालांकि अब धीरे-धीरे उड़ानों का संचालन शुरू किया जा रहा है और अलग-अलग देशों के नागरिकों को सुरक्षित निकालने की प्रक्रिया भी जारी है लेकिन कई मामलों में प्रशासनिक औपचारिकताओं के कारण देरी हो रही है

    इस बीच विदेश मंत्री एस जयशंकर और ईरान के विदेश मंत्री सैयद अब्बास अराघची के बीच हाल ही में फोन पर बातचीत भी हुई है इस बातचीत में दोनों नेताओं ने मौजूदा हालात के विभिन्न पहलुओं पर चर्चा की और संपर्क में बने रहने पर सहमति जताई इससे उम्मीद जताई जा रही है कि आने वाले दिनों में फंसे भारतीयों की वापसी को लेकर कुछ सकारात्मक कदम उठाए जा सकते हैं

    ईरानी दूतावास की ओर से भी इस बातचीत की पुष्टि की गई है जिसमें बताया गया कि दोनों देशों के बीच सीजफायर क्षेत्रीय हालात और द्विपक्षीय संबंधों को लेकर विस्तार से चर्चा हुई है ऐसे में यह कूटनीतिक संवाद भी इस पूरे मामले में अहम भूमिका निभा सकता है

    गौरतलब है कि पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव का असर सिर्फ क्षेत्रीय राजनीति तक सीमित नहीं है बल्कि आम नागरिकों की जिंदगी पर भी इसका सीधा असर पड़ रहा है खासकर वे लोग जो विदेश में फंसे हुए हैं उनके लिए हालात चुनौतीपूर्ण बने हुए हैं ऐसे में सरकारों की जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है कि वे अपने नागरिकों की सुरक्षित वापसी सुनिश्चित करें फिलहाल सभी की निगाहें भारत सरकार के अगले कदम पर टिकी हैं और उम्मीद की जा रही है कि जल्द ही कोई ठोस निर्णय लेकर इन फंसे हुए सिख परिवारों को राहत दी जाएगी