Author: bharati

  • अक्षय कुमार का बड़ा खुलासा: फिलहाल ठंडे बस्ते में गई 'हेरा फेरी 3', अगले एक साल तक शुरू होने की उम्मीद नहीं।

    अक्षय कुमार का बड़ा खुलासा: फिलहाल ठंडे बस्ते में गई 'हेरा फेरी 3', अगले एक साल तक शुरू होने की उम्मीद नहीं।

    नई दिल्ली: हिंदी सिनेमा की सबसे लोकप्रिय और कालजयी कॉमेडी फ्रेंचाइजी ‘हेरा फेरी’ के तीसरे भाग की प्रतीक्षा कर रहे करोड़ों सिनेप्रेमियों के लिए एक अत्यंत निराशाजनक खबर सामने आई है। लंबे समय से कयासों, विवादों और कानूनी पचड़ों में घिरी इस फिल्म के भविष्य पर स्वयं अभिनेता अक्षय कुमार ने बड़ा बयान देकर विराम लगा दिया है। एक ताजा संवाद के दौरान अक्षय कुमार ने यह स्पष्ट किया है कि राजू, श्याम और बाबूराव की आइकोनिक तिकड़ी फिलहाल बड़े पर्दे पर वापसी नहीं कर रही है। अभिनेता ने सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया है कि फिल्म का निर्माण कार्य वर्तमान में पूरी तरह से ठप पड़ गया है और निकट भविष्य में इसकी शूटिंग शुरू होने की कोई भी संभावना नजर नहीं आ रही है। अक्षय के इस चौंकाने वाले खुलासे ने उन तमाम उम्मीदों को गहरा आघात पहुंचाया है जो फिल्म के जल्द ही धरातल पर उतरने की प्रतीक्षा कर रहे थे।

    फिल्म की वर्तमान स्थिति पर गहन चर्चा करते हुए अक्षय कुमार ने कहा कि ‘हेरा फेरी 3’ फिलहाल नहीं बन रही है और इस वास्तविकता ने उन्हें स्वयं भी काफी हैरान और व्यथित किया है। उन्होंने अपनी चिर-परिचित शैली में लेकिन गंभीर लहजे में टिप्पणी की कि शायद अब कुछ ईश्वरीय मदद या विशेष ‘मंत्रों’ की आवश्यकता है ताकि बिगड़ी हुई चीजें एक बार फिर पटरी पर आ सकें। अभिनेता के अनुसार, अगले कम से कम एक वर्ष तक फिल्म की दिशा में किसी भी प्रकार की प्रगति होने के कोई आसार दिखाई नहीं दे रहे हैं। हालांकि, उन्होंने स्थिति स्पष्ट करते हुए यह भी कहा कि फिल्म के निर्माण में आ रही बाधाओं का मुख्य कलाकारों के आपसी संबंधों से कोई लेना-देना नहीं है। अक्षय कुमार, सुनील शेट्टी और परेश रावल के बीच की बॉन्डिंग आज भी उतनी ही मजबूत है और वे अन्य बड़ी परियोजनाओं में एक साथ काम भी कर रहे हैं, किंतु ‘हेरा फेरी’ का मामला जटिल कानूनी और तकनीकी उलझनों में बुरी तरह फंसा हुआ है।

    फिल्म के निर्माण में आ रही रुकावटों का मूल कारण विभिन्न अनुबंधों, बौद्धिक संपदा अधिकारों और फिल्म के मालिकाना हक से जुड़े गंभीर कानूनी विवाद बताए जा रहे हैं। अक्षय कुमार ने संकेत दिया कि कुछ व्यवसायिक और तकनीकी समझौते ऐसे हैं जिन्हें वह खुलकर सार्वजनिक मंच पर साझा नहीं कर सकते, लेकिन इन्हीं पेंचों ने इस महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट को काफी पीछे धकेल दिया है। ज्ञात हो कि इस फ्रेंचाइजी के अधिकारों को लेकर न्यायालय में पहले से ही कुछ मामले लंबित हैं और निर्माताओं के बीच के आंतरिक मतभेदों ने स्थिति को और अधिक पेचीदा बना दिया है। इन निरंतर बढ़ते विवादों ने फिल्म की रचनात्मक प्रक्रिया और पूर्व-निर्माण कार्यों को पूरी तरह प्रभावित किया है, जिससे पूरी टीम और निवेश करने वाले पक्ष असमंजस की स्थिति में हैं।

    अभिनेता अक्षय कुमार ने यह भी स्वीकार किया कि वह व्यक्तिगत रूप से इस देरी से काफी आहत हैं क्योंकि यह फ्रेंचाइजी उनके करियर के सबसे महत्वपूर्ण पड़ावों में से एक रही है और प्रशंसकों का इससे गहरा भावनात्मक जुड़ाव है। उन्होंने भावुक होते हुए कहा कि वह केवल यह कामना करते हैं कि यह फिल्म तब तक बन जाए जब तक वे तीनों कलाकार सक्रिय भूमिका निभाने की अवस्था में हों। हालांकि उन्होंने भविष्य के लिए उम्मीद के दरवाजे पूरी तरह बंद नहीं किए हैं और उन्हें विश्वास है कि जब समय और परिस्थितियां अनुकूल होंगी, तब यह फिल्म अपने आप आकार ले लेगी। फिलहाल, अक्षय कुमार अपनी अन्य बड़ी फिल्मों पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं जहां वह अपने पुराने साथियों के साथ पर्दे पर नजर आएंगे, लेकिन ‘हेरा फेरी’ के तीसरे भाग की राह अभी भी अत्यंत कठिन बनी हुई है।

    प्रशंसकों के लिए यह जानकारी इसलिए भी अधिक पीड़ादायक है क्योंकि पिछले कुछ समय से ऐसी खबरें लगातार आ रही थीं कि फिल्म की पटकथा और कास्टिंग को लेकर बड़े स्तर पर तैयारियां पूरी कर ली गई हैं। विशेष रूप से परेश रावल द्वारा ‘बाबूराव’ के किरदार को दोबारा जीवंत करने की खबरों ने सोशल मीडिया पर भारी उत्साह पैदा किया था। किंतु अब अनुबंधों की जटिलताओं और अदालती कार्यवाहियों ने इस सुनहरे सपने को फिलहाल अनिश्चितकाल के लिए ठंडे बस्ते में डाल दिया है। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या फिल्म के निर्माता इन गंभीर कानूनी चुनौतियों का समाधान ढूंढ पाते हैं या फिर ‘हेरा फेरी 3’ केवल एक अधूरा और प्रतीक्षित अध्याय बनकर इतिहास के पन्नों में दब जाएगा।

  • स्मृति मंधाना ने रचा इतिहास टी20 अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में रोहित शर्मा का रिकॉर्ड तोड़ बनीं भारत की सबसे सफल बल्लेबाज

    स्मृति मंधाना ने रचा इतिहास टी20 अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में रोहित शर्मा का रिकॉर्ड तोड़ बनीं भारत की सबसे सफल बल्लेबाज

    नई दिल्ली/डरबन। भारतीय महिला क्रिकेट टीम की अनुभवी सलामी बल्लेबाज स्मृति मंधाना ने खेल के सबसे छोटे प्रारूप में एक अभूतपूर्व उपलब्धि हासिल करते हुए नया कीर्तिमान स्थापित किया है। दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ खेली जा रही मौजूदा श्रृंखला के दौरान मंधाना ने वह मुकाम हासिल किया जो अब तक किसी भी भारतीय क्रिकेटर के नाम नहीं था। स्मृति मंधाना अब भारत की ओर से टी20 अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में सबसे अधिक रन बनाने वाली बल्लेबाज बन गई हैं। उन्होंने इस विशिष्ट उपलब्धि के मामले में भारतीय पुरुष टीम के पूर्व कप्तान और दिग्गज खिलाड़ी रोहित शर्मा के स्थापित रिकॉर्ड को पीछे छोड़ दिया है।

    मैदान पर अपनी कलात्मक बल्लेबाजी के लिए पहचानी जाने वाली मंधाना ने जैसे ही इस मुकाबले में व्यक्तिगत स्तर पर तेरहवां रन बनाया वैसे ही उन्होंने रोहित शर्मा के पूर्ववर्ती रनों के आंकड़े को पार कर लिया। रोहित शर्मा ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस प्रारूप से विदाई लेने से पहले जो शिखर स्थापित किया था उसे अब मंधाना ने नई ऊंचाइयों पर पहुंचा दिया है। स्मृति मंधाना के नाम अब एक सौ इकसठ मैचों में चार हजार दो सौ चवालीस रन दर्ज हो गए हैं जो उन्हें भारतीय क्रिकेट इतिहास का सबसे सफल टी20 बल्लेबाज बनाता है।

    मैच के घटनाक्रम पर नजर डालें तो विपक्षी टीम ने टॉस जीतकर पहले गेंदबाजी करने का फैसला किया था। भारतीय टीम ने निर्धारित ओवरों में सात विकेट खोकर एक चुनौतीपूर्ण स्कोर खड़ा किया। हालांकि लक्ष्य का पीछा करते हुए विरोधी टीम ने अंतिम क्षणों में जीत हासिल कर ली लेकिन भारतीय खेमे के लिए मंधाना की यह व्यक्तिगत सफलता सबसे बड़ी चर्चा का विषय बनी रही। हार के बावजूद मंधाना के बल्ले से निकला यह रिकॉर्ड भारतीय महिला क्रिकेट के सशक्तिकरण और वैश्विक मंच पर उनकी बढ़ती धमक का प्रतीक बनकर उभरा है।

    विश्व स्तर पर सर्वाधिक टी20 रनों की सूची पर गौर करें तो स्मृति मंधाना अब दूसरे पायदान पर पहुंच गई हैं। उनसे आगे अब केवल न्यूजीलैंड की एक खिलाड़ी का नाम आता है जबकि भारतीय खिलाड़ियों की सूची में मंधाना अब शीर्ष पर विराजमान हैं। मंधाना के बाद रोहित शर्मा और फिर हरमनप्रीत कौर का स्थान आता है। मंधाना का यह सफर आने वाले समय में युवा महिला क्रिकेटरों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनेगा। यह उपलब्धि केवल आंकड़ों का खेल नहीं है बल्कि यह महिला क्रिकेट के प्रति बदलते नजरिए और मैदान पर उनके अटूट समर्पण की जीत है।

  • सहज प्रशंसा और प्रतिक्रियाओं को छिपाने की विवशता पर आधुनिक समाज के लिए एक बड़ा नैतिक सवाल।

    सहज प्रशंसा और प्रतिक्रियाओं को छिपाने की विवशता पर आधुनिक समाज के लिए एक बड़ा नैतिक सवाल।

    नई दिल्ली:आधुनिक दौर में सोशल मीडिया की चमक-धमक जितनी लुभावनी है, इसके अदृश्य खतरे भी उतने ही गहरे हैं। हाल ही में एक मशहूर अंतरराष्ट्रीय मॉडल और एक दिग्गज भारतीय खिलाड़ी के बीच हुए एक संक्षिप्त डिजिटल घटनाक्रम ने इंटरनेट की दुनिया में नई बहस छेड़ दी है। यह पूरा मामला तब प्रकाश में आया जब सोशल मीडिया पर खिलाड़ी द्वारा मॉडल की कुछ चुनिंदा तस्वीरों को पसंद करने और फिर तुरंत उस प्रतिक्रिया को वापस लेने की बात सार्वजनिक हुई। तकनीक के इस युग में जहां हर गतिविधि पर करोड़ों नजरें चौबीसों घंटे टिकी रहती हैं, वहां एक छोटी सी चूक या सामान्य मानवीय व्यवहार भी राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा और विश्लेषण का विषय बन जाता है। इस प्रकरण ने एक बार फिर यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या अत्यधिक ख्याति किसी व्यक्ति की स्वाभाविक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को अनचाही बेड़ियों में जकड़ देती है।

    इस पूरे घटनाक्रम पर अब संबंधित मॉडल ने अपनी चुप्पी तोड़ते हुए एक अत्यंत परिपक्व और संतुलित वक्तव्य साझा किया है। मॉडल ने स्पष्ट रूप से कहा कि उन्हें उस खिलाड़ी की स्थिति को देखकर सहानुभूति महसूस होती है, क्योंकि एक वैश्विक पहचान रखने वाले व्यक्ति के लिए अपनी सहज पसंद को साझा करना भी भारी पड़ सकता है। उनके अनुसार, यदि किसी व्यक्ति को एक सामान्य सी प्रतिक्रिया देने के बाद उसे सामाजिक दबाव, छवि खराब होने के डर या किसी अन्य विवशता के कारण वापस लेना पड़ता है, तो यह उस व्यक्ति के भीतर चल रहे निरंतर मानसिक संघर्ष को दर्शाता है। मॉडल ने इसे खिलाड़ी की मजबूरी करार देते हुए कहा कि इतने बड़े कद के व्यक्तित्व को सदैव एक पूर्व निर्धारित और आदर्श छवि के संकीर्ण दायरे में रहना पड़ता है, जो किसी भी इंसान के लिए काफी थकाऊ और तनावपूर्ण हो सकता है।

    सोशल मीडिया पर प्रशंसकों और आलोचकों के बीच इस मुद्दे को लेकर एक लंबी बहस छिड़ गई है। जहां प्रशंसकों का एक पक्ष इसे मानवीय भूल या अनजाने में हुआ स्पर्श बताकर खिलाड़ी का बचाव कर रहा है, वहीं दूसरा वर्ग इसे सार्वजनिक जीवन में बढ़ती असुरक्षा और दोहरे मापदंडों के रूप में देख रहा है। खिलाड़ियो को अक्सर समाज में एक त्रुटिहीन आदर्श के रूप में स्थापित कर दिया जाता है, जिसके कारण उनके निजी जीवन की सूक्ष्म गतिविधियां भी कठोर सामाजिक समीक्षा के घेरे में आ जाती हैं। इस निरंतर दबाव के कारण कई बार ये हस्तियां अपने वास्तविक और स्वाभाविक व्यक्तित्व को छिपाने के लिए विवश होती हैं। डिजिटल पदचिह्नों के इस दौर में किसी भी गतिविधि को पूरी तरह मिटाना असंभव है और यही कारण है कि यह विवाद समाप्त होने के बजाय नित नए आयाम लेता जा रहा है।

    मनोवैज्ञानिकों का तर्क है कि इस तरह की घटनाएं केवल किसी खिलाड़ी की निजी पसंद का साधारण मामला नहीं हैं, बल्कि यह उस व्यापक सामाजिक परिवेश को प्रतिबिंबित करती हैं जहां हम दूसरों के जीवन में अत्यधिक हस्तक्षेप करने को अपना अधिकार समझने लगे हैं। किसी भी व्यक्ति के लिए यह अनुभव अत्यंत दमघोंटू हो सकता है कि उसकी हर गतिविधि पर समाज का एक वर्ग निरंतर पहरा दे रहा हो। मॉडल के इस नवीन दृष्टिकोण ने न केवल खिलाड़ी के प्रति जनमानस के नजरिए को सहानुभूतिपूर्ण बनाया है, बल्कि सोशल मीडिया के नैतिक उपयोग पर भी गंभीर सवाल खड़े किए हैं। उन्होंने बहुत ही शालीनता से यह संदेश दिया है कि किसी की सुंदरता या कला की प्रशंसा करना एक सहज और सकारात्मक मानवीय आचरण है, जिसे अनावश्यक विवाद या नकारात्मक संदर्भ में नहीं देखा जाना चाहिए।

  • तमिलनाडु विधानसभा चुनाव सिनेमाई सितारों की लोकप्रियता और राजनीतिक भविष्य का नया इम्तिहान

    तमिलनाडु विधानसभा चुनाव सिनेमाई सितारों की लोकप्रियता और राजनीतिक भविष्य का नया इम्तिहान

    नई दिल्ली/चेन्नई। दक्षिण भारत की राजनीति में सिनेमा और सत्ता का अटूट रिश्ता एक बार फिर इतिहास के पन्ने पलटने को तैयार है। तमिलनाडु विधानसभा चुनाव के इस दौर में चुनावी मैदान केवल घोषणापत्रों और नारों तक सीमित नहीं रह गया है बल्कि यह सिल्वर स्क्रीन के नायकों की जमीनी पकड़ का सबसे बड़ा परीक्षण केंद्र बन गया है। दशकों से राज्य की जनता ने अपने पसंदीदा अभिनेताओं को पलकों पर बिठाया है और उन्हें मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचाया है। वर्तमान चुनाव इस विरासत को आगे बढ़ाने की दिशा में एक नया अध्याय जोड़ रहे हैं जहां फिल्मी चमक दमक और जनसेवा के वादों के बीच मुकाबला बेहद दिलचस्प मोड़ पर आ खड़ा हुआ है। इस बार के चुनाव में नए राजनीतिक दलों का उदय और बड़े फिल्मी नामों की सीधी भागीदारी ने पारंपरिक द्रविड़ राजनीति के समीकरणों को चुनौती दी है।

    चुनावी सरगर्मी के बीच यह स्पष्ट रूप से देखा जा रहा है कि मतदाताओं का एक बड़ा वर्ग विशेष रूप से युवा पीढ़ी अपने चहेते सितारों की तरफ उम्मीद भरी नजरों से देख रही है। अभिनेताओं ने अपने विशाल प्रशंसक समूहों को राजनीतिक कार्यकर्ताओं में तब्दील कर दिया है जो घर घर जाकर नए भविष्य का सपना बेच रहे हैं। हालांकि राजनीति की यह राह उतनी आसान नहीं है जितनी फिल्मों की पटकथा होती है। स्थापित राजनीतिक दलों ने भी अपनी किलेबंदी मजबूत कर ली है और वे फिल्मी ग्लैमर के मुकाबले अपने संगठनात्मक अनुभव और कल्याणकारी योजनाओं का हवाला दे रहे हैं। ऐसे में मुकाबला केवल व्यक्ति विशेष का न रहकर विचारधारा और कार्यशैली के बीच का संघर्ष बन गया है। भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाने और प्रशासनिक सुधारों के वादे के साथ फिल्मी सितारे जनता के बीच जा रहे हैं जिससे मुकाबला त्रिकोणीय या उससे भी अधिक जटिल होने की संभावना बढ़ गई है।

    क्षेत्रीय मुद्दों की बात करें तो कृषि ऋण की माफी शिक्षा के क्षेत्र में आमूलचूल परिवर्तन और महिलाओं के लिए आर्थिक सहायता जैसे विषय चर्चा के केंद्र में हैं। फिल्मी सितारों ने अपने चुनावी घोषणापत्रों में इन संवेदनशील मुद्दों को प्राथमिकता दी है जिससे आम जनमानस में उनकी स्वीकार्यता बढ़ी है। उनकी रैलियों में उमड़ने वाली भीड़ इस बात का प्रमाण है कि सिनेमाई करिश्मा आज भी जनता के दिलों पर राज करता है। परंतु मतदान केंद्र तक इस भीड़ को वोटों में तब्दील करना एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। ग्रामीण क्षेत्रों में जहां बुनियादी सुविधाओं की मांग प्रबल है वहां फिल्मी सितारों की साख और उनकी योजनाओं की व्यवहारिकता की कड़ी जांच हो रही है।

    राज्य की राजनीति में दशकों पुराने द्रविड़ वर्चस्व को चुनौती देना किसी भी नए खिलाड़ी के लिए कठिन कार्य रहा है। लेकिन इस बार के चुनाव में बदलाव की बयार महसूस की जा रही है क्योंकि फिल्मी चेहरों ने सीधे तौर पर व्यवस्था परिवर्तन की बात कही है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन का माध्यम नहीं है बल्कि यह राज्य की राजनीतिक संस्कृति के भविष्य को भी तय करेगा। क्या जनता एक बार फिर पर्दे के नायक को अपना वास्तविक नेता चुनेगी या फिर अनुभव और पुरानी निष्ठा जीत का आधार बनेगी यह आने वाले परिणाम ही स्पष्ट करेंगे। फिलहाल पूरे राज्य में चुनावी शोर अपने चरम पर है और हर तरफ केवल इसी बात की चर्चा है कि इस बार बॉक्स ऑफिस की सफलता मतपेटियों में कितनी प्रभावी साबित होगी।

  • लोकसभा में नहीं पास हो सका महिला आरक्षण बिल, बहुमत से 54 वोट कम पड़े

    लोकसभा में नहीं पास हो सका महिला आरक्षण बिल, बहुमत से 54 वोट कम पड़े


    नई दिल्ली । सरकार द्वारा पेश किए गए महिला आरक्षण से जुड़े तीनों विधेयक लोकसभा में पारित नहीं हो सके। 131वें संविधान संशोधन बिल को पास कराने के लिए आवश्यक दो-तिहाई बहुमत नहीं मिल पाया और यह 54 वोटों से पीछे रह गया। कुल 528 सांसदों ने मतदान में हिस्सा लिया, जिसमें सरकार को जरूरी 352 वोटों के मुकाबले सिर्फ 298 वोट ही मिल सके।

    संख्या बल में कमी से गिरा प्रस्ताव
    विधेयक के खिलाफ 230 वोट पड़े, जिसके चलते यह आवश्यक बहुमत तक नहीं पहुंच सका और गिर गया। बिल के असफल होने के बाद सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी की महिला सांसदों ने मकर द्वार पर विरोध प्रदर्शन किया। पार्टी ने 18 अप्रैल से देशभर में विरोध प्रदर्शन करने का ऐलान भी किया है।

    सरकार ने विपक्ष को ठहराया जिम्मेदार

    गृह मंत्री अमित शाह ने बिल के गिरने के लिए कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस समेत अन्य विपक्षी दलों को जिम्मेदार ठहराया। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर पोस्ट कर इस पर प्रतिक्रिया दी और बिल के असफल होने पर जश्न मनाए जाने की आलोचना की। यह विधेयक एक दिन पहले कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल द्वारा लोकसभा में पेश किया गया था।

    लंबी बहस के बावजूद नहीं बनी सहमति

    इस बिल पर संसद में करीब 20 घंटे से अधिक समय तक चर्चा हुई। गुरुवार को सुबह 11 बजे से लेकर देर रात 1 बजे तक बहस चली, जबकि शुक्रवार को भी सुबह से शाम तक चर्चा जारी रही। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मतदान से पहले विपक्ष से सहयोग की अपील की थी और सांसदों से अंतरात्मा की आवाज पर वोट करने का आग्रह किया था, लेकिन इसका असर नजर नहीं आया।

    परिसीमन बना मुख्य विवाद का कारण

    चर्चा के दौरान विपक्षी दलों ने साफ कहा कि वे महिला आरक्षण के पक्ष में हैं, लेकिन परिसीमन के मुद्दे पर सहमत नहीं हैं। इसी कारण उन्होंने विधेयक का विरोध किया।

    संसदीय प्रक्रिया और राजनीतिक टकराव

    गृह मंत्री अमित शाह के जवाब के बाद कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने विधेयक को विचार के लिए पेश किया, लेकिन मतदान में यह आवश्यक समर्थन हासिल नहीं कर सका। बता दें कि बजट सत्र को लेकर भी सरकार और विपक्ष के बीच मतभेद सामने आए। सरकार ने 16 से 18 अप्रैल तक सत्र बढ़ाने का प्रस्ताव रखा, जबकि विपक्ष ने चुनावों के बाद सर्वदलीय बैठक की मांग की थी, जिसे सरकार ने स्वीकार नहीं किया।

  • होर्मुज तनाव के बीच अमेरिका ने बदला रुख, रूसी तेल खरीद पर फिर मिली अस्थायी छूट

    होर्मुज तनाव के बीच अमेरिका ने बदला रुख, रूसी तेल खरीद पर फिर मिली अस्थायी छूट


    नई दिल्‍ली । ईरान के साथ जारी तनाव और वैश्विक तेल कीमतों में उछाल के बीच अमेरिका ने अपने रुख में बदलाव करते हुए बड़ा फैसला लिया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन ने रूसी तेल की खरीद पर एक बार फिर अस्थायी छूट दे दी है। खास बात यह है कि यह निर्णय उस घोषणा के दो दिन बाद आया है, जिसमें कहा गया था कि इस राहत को आगे नहीं बढ़ाया जाएगा।

    एक महीने के लिए मिली नई छूट

    अमेरिकी ट्रेजरी डिपार्टमेंट ने 17 अप्रैल से लागू नया नोटिफिकेशन जारी किया है। इसके तहत देशों को 16 मई तक रूसी तेल और पेट्रोलियम उत्पादों की खरीद की अनुमति दी गई है। यानी लगभग एक महीने तक समुद्र में लोड किए गए रूसी तेल पर अमेरिकी प्रतिबंध लागू नहीं होंगे। इससे पहले दी गई 30 दिन की छूट 11 अप्रैल को समाप्त हो गई थी और संकेत मिल रहे थे कि अब अमेरिका सख्ती अपनाएगा, लेकिन बदलते हालात ने फैसले को भी बदल दिया।

    क्या वजह रही इस फैसले की?
    ईरान के साथ टकराव और होर्मुज स्ट्रेट में बढ़ते तनाव ने वैश्विक तेल आपूर्ति को प्रभावित किया है। दुनिया की करीब 20% तेल और गैस सप्लाई इसी मार्ग से गुजरती है। इस रूट पर खतरा बढ़ने से तेल की कीमतों में तेज उछाल आया। ऐसे में अमेरिका के सामने चुनौती थी कि सप्लाई घटने से कीमतें और न बढ़ जाएं, जिसका असर सीधे आम जनता पर पड़ता। इसी वजह से ट्रंप प्रशासन ने बाजार में आपूर्ति बनाए रखने के लिए यह अस्थायी राहत देने का फैसला किया।

    रूस के राष्ट्रपति के दूत किरिल दिमित्रिएव के अनुसार, पहले दी गई छूट से लगभग 100 मिलियन बैरल रूसी कच्चा तेल बाजार में आ सकता था, जो एक दिन की वैश्विक खपत के बराबर है। नई छूट से भी सप्लाई को सहारा मिलने की उम्मीद जताई जा रही है।

    सहयोगी देशों की नाराजगी बढ़ी

    अमेरिका के इस कदम से उसके सहयोगी देशों में असंतोष बढ़ सकता है। यूरोप लगातार रूस पर कड़े प्रतिबंध बनाए रखने के पक्ष में रहा है। यूरोपीय यूनियन की प्रमुख उर्सुला वॉन डेर लेयेन ने भी स्पष्ट किया है कि फिलहाल रूस पर नरमी दिखाने का समय नहीं है। ऐसे में अमेरिका का यह फैसला पश्चिमी देशों की एकजुट रणनीति को कमजोर कर सकता है और यूक्रेन युद्ध से जुड़ी नीतियों पर सवाल खड़े कर सकता है।

    तेल बाजार को मिली राहत
    इस घोषणा के बाद तेल बाजार में कुछ राहत देखने को मिली है। ब्रेंट क्रूड की कीमत करीब 9% गिरकर 90 डॉलर प्रति बैरल के आसपास आ गई, जो पिछले एक महीने का न्यूनतम स्तर है। इस गिरावट की एक वजह यह भी है कि ईरान की ओर से संकेत मिले हैं कि सीजफायर के दौरान होर्मुज स्ट्रेट को व्यावसायिक जहाजों के लिए खोल दिया गया है।

  • गुजरात में मानवता की मिसाल: ब्रेन-डेड किसान के अंगों से 7 लोगों को नई जिंदगी

    गुजरात में मानवता की मिसाल: ब्रेन-डेड किसान के अंगों से 7 लोगों को नई जिंदगी

    अहमदाबाद। गुजरात के अहमदाबाद से एक भावुक और प्रेरणादायक खबर सामने आई है, जहां एक ब्रेन-डेड किसान के अंगदान ने सात लोगों को नई जिंदगी दे दी। 39 वर्षीय मनुभाई परमार के परिवार ने कठिन समय में बड़ा फैसला लेते हुए अंगदान की सहमति दी और मानवता की मिसाल पेश की।

    सड़क हादसे के बाद ब्रेन-डेड घोषित
    खेड़ा जिले के रहने वाले मनुभाई परमार 12 अप्रैल को एक सड़क दुर्घटना में गंभीर रूप से घायल हो गए थे। सिर में गहरी चोट लगने के बाद उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया, लेकिन तमाम कोशिशों के बावजूद डॉक्टर उन्हें बचा नहीं सके और ब्रेन-डेड घोषित कर दिया गया।

    परिवार ने लिया साहसी फैसला
    डॉक्टरों की सलाह पर उनकी पत्नी अरखाबेन ने अंगदान का निर्णय लिया। परिवार की इस सहमति के बाद दिल, लिवर, किडनी, आंखें और त्वचा दान की गईं, जिससे जरूरतमंद मरीजों को तुरंत लाभ मिला।

    कहां-कहां हुए ट्रांसप्लांट?

    लिवर और किडनी का ट्रांसप्लांट अहमदाबाद सिविल अस्पताल में किया गया
    दिल को CIMS अस्पताल भेजा गया
    आंखें एम एंड जे नेत्र अस्पताल को दान की गईं
    त्वचा सिविल अस्पताल के स्किन बैंक में संरक्षित की गई

    डॉक्टरों ने की सराहना
    अस्पताल के सुपरिटेंडेंट डॉ. राकेश जोशी ने परिवार के इस फैसले को सराहनीय बताते हुए कहा कि मनुभाई भले ही अब इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उनके अंगों ने सात लोगों को नया जीवन दिया है।

    अंगदान के बढ़ते मामले
    अहमदाबाद सिविल अस्पताल के अनुसार, अब तक 234 ब्रेन-डेड मरीजों द्वारा अंगदान किया जा चुका है, जिससे 774 अंग प्राप्त हुए हैं। इनमें सैकड़ों किडनी, लिवर, दिल और फेफड़े शामिल हैं।

    बढ़ रही जागरूकता
    गुजरात में पिछले कुछ वर्षों में अंगदान को लेकर जागरूकता बढ़ी है। सरकारी पहल और सामाजिक प्रयासों के चलते लोग इस दिशा में आगे आ रहे हैं।

    मनुभाई परमार और उनके परिवार का यह निर्णय न केवल सात जिंदगियां बचाने वाला है, बल्कि समाज को यह संदेश भी देता है कि कठिन परिस्थितियों में लिया गया एक साहसी फैसला कई लोगों के जीवन में रोशनी ला सकता है।

  • एमपी में तेज गर्मी का कहर: पारा 43 डिग्री के पार, खजुराहो सबसे गर्म, आज 16 जिलों में लू का अलर्ट

    एमपी में तेज गर्मी का कहर: पारा 43 डिग्री के पार, खजुराहो सबसे गर्म, आज 16 जिलों में लू का अलर्ट

    भोपाल । मध्य प्रदेश में गर्मी ने अब अपने तीखे तेवर दिखाने शुरू कर दिए हैं। शुक्रवार को सीजन में पहली बार तापमान 43 डिग्री के पार पहुंच गया। सबसे अधिक तापमान 43.2 डिग्री सेल्सियस छतरपुर के खजुराहो में दर्ज किया गया। इसके अलावा प्रदेश के 9 शहरों में तापमान 42 डिग्री से ऊपर रहा।

    आज कई जिलों में लू की चेतावनी

    मौसम विभाग ने शनिवार के लिए 16 जिलों में हीट वेव यानी लू चलने की चेतावनी जारी की है। इनमें अलीराजपुर झाबुआ रतलाम धार रायसेन नर्मदापुरम बैतूल छिंदवाड़ा पांढुर्णा सिवनी मंडला बालाघाट निवाड़ी टीकमगढ़ छतरपुर और पन्ना शामिल हैं।

    स्कूलों के समय में बदलाव

    भीषण गर्मी को देखते हुए प्रशासन ने स्कूलों के समय में बदलाव किया है। भोपाल में स्कूल अब सुबह 7:30 बजे से दोपहर 12 बजे तक संचालित होंगे। कलेक्टर प्रियंक मिश्रा ने इस संबंध में आदेश जारी किए हैं। इसके अलावा नर्मदापुरम ग्वालियर बालाघाट मैहर रतलाम छिंदवाड़ा नरसिंहपुर रायसेन डिंडोरी अनूपपुर और उमरिया में भी स्कूल नए समय अनुसार चलेंगे।

    कई शहरों में तापमान 42 डिग्री के पार

    शुक्रवार को प्रदेश के कई जिलों में तापमान तेजी से बढ़ा। उमरिया में 42.9 डिग्री टीकमगढ़-नौगांव में 42.8 डिग्री नौगांव में 42.6 डिग्री मंडला में 42.5 डिग्री दमोह गुना और दतिया में 42.2 डिग्री दर्ज किया गया। वहीं सागर और सतना में 41.8 डिग्री छिंदवाड़ा में 41.6 डिग्री नर्मदापुरम और शाजापुर में 41.4 डिग्री जबकि सीधी नरसिंहपुर रीवा और मलाजखंड में 41.2 डिग्री तापमान रिकॉर्ड किया गया।

    बड़े शहरों का हाल
    प्रदेश के प्रमुख शहरों में जबलपुर सबसे गर्म रहा जहां तापमान 42 डिग्री तक पहुंचा। भोपाल और ग्वालियर में 41.3 डिग्री इंदौर में 40.6 डिग्री और उज्जैन में 40.5 डिग्री दर्ज किया गया। खजुराहो सहित कई क्षेत्रों में लू के हालात भी बने रहे।

    लू से बचाव के लिए सलाह
    मौसम विभाग ने बढ़ती गर्मी को देखते हुए लोगों के लिए एडवायजरी जारी की है। इसमें दिनभर पर्याप्त पानी पीने शरीर को हाइड्रेट रखने और दोपहर के समय तेज धूप से बचने की सलाह दी गई है। साथ ही हल्के और सूती कपड़े पहनने तथा बच्चों और बुजुर्गों का विशेष ध्यान रखने को कहा गया है।

  • भारत में बढ़ी चीतों की संख्या…… दक्षिण अफ्रीका से बेंगलुरु पहुंचे 4 नए मेहमान

    भारत में बढ़ी चीतों की संख्या…… दक्षिण अफ्रीका से बेंगलुरु पहुंचे 4 नए मेहमान


    बेंगलुरु।
    भारत (India) में चीतों का कुनबा लगातार बढ़ रहा है. दक्षिण अफ्रीका (South Africa) से चार और चीतों को भारत लाया गया है. ये सभी चीते सुरक्षित तरीके से बेंगलुरु पहुंचे चुके हैं और उन्हें कर्नाटक (Karnataka) के बैनरघट्टा बायोलॉजिकल पार्क (Bannerghatta Biological Park) में रखा जाएगा. यह कदम राज्य में वन्यजीव संरक्षण को बढ़ावा देने और लोगों में जैव-विविधता के प्रति जागरूकता फैलाने के उद्देश्य से उठाया गया है.

    अधिकारियों के मुताबिक, चीतों को विशेष निगरानी के बीच लाया गया है. फिलहाल वन विभाग और पशु चिकित्सा विशेषज्ञों की टीम उनकी सेहत पर लगातार नजर रख रही है. शुरुआती जांच के बाद सभी चीतों को निर्धारित प्रोटोकॉल के तहत निगरानी में रखा गया है, जिससे नए वातावरण में उन्हें किसी तरह की परेशानी न हो।


    कर्नाटक के वन मंत्री ने दिए ये निर्देश

    कर्नाटक के वन मंत्री ईश्वर खंड्रे ने अधिकारियों को साफ निर्देश दिए हैं कि जलवायु और पर्यावरण में बदलाव के कारण चीतों को किसी प्रकार का तनाव या स्वास्थ्य संबंधी समस्या न हो. उन्होंने कहा कि सभी चीतों को कम से कम 30 दिनों के लिए क्वारंटीन में रखा जाएगा. इस दौरान उन्हें निर्धारित आहार दिया जाएगा और किसी भी संक्रमण या बीमारी की पूरी जांच की जाएगी।

    वन मंत्री ने यह भी कहा कि चीतों को उनके नए आवास में छोड़ने से पहले सभी आवश्यक मेडिकल परीक्षण पूरे किए जाएंगे. सुरक्षा और देखभाल में किसी भी तरह की लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी.

    कर्नाटक में चीतों को कहा जाता है ‘शिवंगी’
    गौरतलब है कि कर्नाटक में कभी चीतों को स्थानीय रूप से ‘शिवंगी’ कहा जाता था. हालांकि यह प्रजाति दशकों पहले राज्य के जंगलों से विलुप्त हो चुकी थी. अब चीतों की वापसी को वन्यजीव संरक्षण के लिहाज से एक अहम कदम माना जा रहा है, जिससे पारिस्थितिकी तंत्र को भी मजबूती मिलने की उम्मीद है.

  • महिला आरक्षण बिल का विरोध…. अमित शाह के राजनीतिक दांव में उलझी अखिलेश की रणनीति!

    महिला आरक्षण बिल का विरोध…. अमित शाह के राजनीतिक दांव में उलझी अखिलेश की रणनीति!


    नई दिल्ली।
    शतरंज हो या राजनीति, चाल संभलकर खेलनी होती है. अमित शाह (Amit Shah) को भारतीय जनता पार्टी (Bharatiya Janata Party) का ‘चाणक्य’ माना जाता है, वहीं अखिलेश यादव (Akhilesh Yadav) ने लोकसभा चुनाव 2024 में उत्तर प्रदेश में मजबूत प्रदर्शन करके दिखा दिया कि वह राजनीति के कच्चे खिलाड़ी नहीं हैं. यह बात भी दीगर है कि उत्तर प्रदेश के चुनाव में इंडिया गठबंधन ने संविधान बदलने और आरक्षण खत्म करने के नैरेटिव के जरिए जीत हासिल की थी, लेकिन राजनीति में काठ की हांडी बार-बार नहीं चढ़ती है. अब बारी थी अमित शाह की. सरकार ने लोकसभा में नारी शक्ति वंदन अधिनियम (Women Empowerment Act) से जुड़े तीन बिल पेश किए. मकसद था कि महिलाओं को लोकसभा और विधानसभा में 33 फीसदी आरक्षण दिया जाए, लेकिन सारे विपक्षी दलों ने विरोध कर दिया और आखिरकार बिल लोकसभा में गिर गया।


    लोकसभा में गिरा बिल, अब क्या करेगी सरकार?

    सदन में संविधान (131वां) संशोधन विधेयक, 2026 पर मतदान हुआ. मतदान में बिल के समर्थन में 298 और विरोध में 230 वोट पड़े. लोकसभा में किसी भी संविधान संशोधन विधेयक को पास कराने के लिए दो-तिहाई बहुमत की जरूरत होती है. जब महिला आरक्षण बिल लोकसभा में गिर गया, तो परिसीमन विधेयक, 2026 और संघ राज्य विधि (संशोधन) विधेयक, 2026 को सरकार ने आगे नहीं बढ़ाया. अब सवाल है कि क्या सरकार लोकसभा और राज्यसभा दोनों का संयुक्त सत्र बुलाकर बिल पास कराएगी, हालांकि सरकार ने यह साफ नहीं किया है।


    महिला आरक्षण बिल के विरोध में सपा

    महिला आरक्षण बिल पर सपा के मुखिया अखिलेश यादव अपने पिता स्वर्गीय मुलायम सिंह यादव के पदचिन्हों पर चल रहे हैं. चाहे सत्ता में रहे हों या बाहर, वे महिला आरक्षण बिल में भी आरक्षण की मांग करते रहे, लेकिन कोई भी सरकार आरक्षण में आरक्षण देने को तैयार नहीं थी. 1996 में एच. डी. देवगौड़ा की सरकार में यह बिल पेश किया गया, लेकिन सरकारें आती-जाती रहीं और बिल पास नहीं हुआ. यह बिल इंद्र कुमार गुजराल की सरकार से होते हुए अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार तक पहुंचा, लेकिन बात सदन में मारपीट तक पहुंच गई. वाजपेयी सरकार के दौरान समाजवादी पार्टी के सांसदों ने इसे सदन में फाड़ डाला. बिल पेश करने पर कानून मंत्री थंबी दोरई की कमीज भी फाड़ दी गई थी. फिर यह बिल मनमोहन सिंह की सरकार में आया। उस समय आरजेडी सरकार का हिस्सा थी, तो समाजवादी पार्टी बाहर से समर्थन कर रही थी, लेकिन बिल का विरोध जारी रहा. हालांकि यह बिल राज्यसभा में पास हुआ, लेकिन लोकसभा में फंस गया।


    अखिलेश यादव क्यों करते हैं विरोध

    सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने इस बिल पर चर्चा करते हुए कहा कि बीजेपी ‘नारी’ को नारा बनाने की कोशिश कर रही है. उन्होंने यह भी कहा कि वे बिल के समर्थन में हैं, लेकिन सरकार की इस जल्दबाजी के पीछे छिपी साजिश का विरोध करते हैं. अखिलेश की मांग थी कि ओबीसी और अल्पसंख्यक महिलाओं को इस बिल में आरक्षण दिया जाए, जबकि अमित शाह ने जवाब दिया कि संविधान में मुस्लिमों के लिए कोई आरक्षण का प्रावधान नहीं है. वहीं अखिलेश का आरोप था कि सरकार जाति जनगणना से बचना चाहती है, तो अमित शाह ने जवाब दिया कि इस जनगणना में जाति जनगणना भी होगी. इस पर सपा के धर्मेंद्र यादव ने कहा कि जनगणना में जाति का कॉलम नहीं है. अमित शाह ने जवाब दिया कि आदमी की जाति होती है, घर की जाति नहीं होती है. अभी घरों की गणना हो रही है, उसके बाद लोगों की गणना होगी, जिसमें जाति भी शामिल रहेगी।


    आगे कुआं, पीछे खाई

    देश बदल रहा है, लोगों की आकांक्षाएं बदल रही हैं. खासकर महिलाएं शिक्षा से लेकर हर क्षेत्र में बेहतर कर रही हैं. इसकी भनक अखिलेश यादव को है. उनके शासनकाल में जो कानून-व्यवस्था का हाल हुआ था, उसका खामियाजा वे करीब 10 साल से भुगत रहे हैं. योगी आदित्यनाथ के शासनकाल में हत्याएं, बलात्कार, दहेज के मामले और एसिड अटैक के मामलों में कमी आई है. नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (NCRB) के आंकड़ों के मुताबिक, 2016 में यूपी में हत्याएं 4889 थीं, जो 2023 में घटकर 3307 हो गईं. 2016 में बलात्कार की घटनाएं 4816 थीं, जो 2023 में घटकर 3556 हो गई हैं. 2016 में दहेज हत्याएं 2473 थीं, जो 2023 में घटकर 2141 हो गई हैं. महिलाओं पर एसिड फेंकने के मामले 57 थे, जो 2023 में 31 हो गए हैं. 2016 में महिलाओं के शील भंग (लज्जा भंग की कोशिश) के मामले 11335 थे, जो 2023 में घटकर 9549 हो गए हैं.

    एक तरफ अखिलेश के शासनकाल के आंकड़े हैं, तो दूसरी तरफ योगी आदित्यनाथ के कानून-व्यवस्था का इकबाल है कि जनसंख्या बढ़ने के बावजूद अपराध घट रहे हैं. इस बात का अहसास अखिलेश को है, लेकिन अगर वे इस बिल का समर्थन करते, तो पीडीए (पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक) के वोटर नाराज हो सकते थे. वहीं अब बिल का विरोध करने पर 2027 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी उन्हें “महिला विरोधी” बताकर घेर सकती है.


    महिलाओं पर मुलायम की बातों की गूंज

    भले मुलायम सिंह यादव नहीं रहे, लेकिन महिलाओं पर उनके बयान अभी तक प्रदेश की जनता भूली नहीं है. लोकसभा 2014 के दौरान अप्रैल में मुरादाबाद की एक रैली में उन्होंने कहा था, ‘क्या बलात्कार के मामले में फांसी की सजा दी जानी चाहिए? वे लड़के हैं, उनसे गलतियां हो जाती हैं.’ इसी बिल की चर्चा के दौरान बीजेपी सांसद कंगना रनौत ने भी मुलायम सिंह के पुराने बयान का जिक्र करते हुए सपा के धर्मेंद्र यादव को जवाब दिया. कंगना का कहना था कि मुलायम सिंह ने कहा था कि यह कानून नौजवानों को संसद में सीटी बजाने के लिए उकसाएगा. मुलायम सिंह ने ये भी कहा था कि महिला आरक्षण बिल के मौजूदा स्वरूप से सिर्फ बड़े घरों और शहरों की लड़कियों को फायदा मिलेगा. हमारे गांव की गरीब महिलाएं ज्यादा आकर्षक नहीं होतीं. ये सारी बातें जनता के संज्ञान में हैं.


    अखिलेश की चुनौतियां

    अखिलेश यादव को यह भी डर सता रहा है कि परिसीमन से उत्तर प्रदेश की राजनीति का गणित और केमिस्ट्री बदल सकती है. परिसीमन से यूपी में 120 से ज्यादा सीटें हो सकती हैं. इससे कहीं बीजेपी को फायदा न हो जाए. हालांकि, अखिलेश यादव बड़ी चालाकी से राजनीति कर रहे हैं. पीडीए का फॉर्मूला लोकसभा चुनाव में चल गया. इंडिया गठबंधन ने 80 में से 43 सीटें जीतकर यह बता दिया कि लोकतंत्र में कोई भी सत्ता स्थायी नहीं होती और जनमत जब करवट लेता है, तो मजबूत से मजबूत राजनीतिक दीवारें ढह जाती हैं. यह भी ध्यान देने वाली बात है कि मुलायम सिंह यादव अपने राजनीतिक जीवन में कभी भी अपने बलबूते पर 36 सीटें नहीं जीत पाए थे, जो अखिलेश ने जीतकर दिखा दिया. हालांकि, लोकसभा चुनाव के बाद हुए विधानसभा उपचुनाव में सपा को करारी हार का सामना करना पड़ा. लोकसभा चुनाव के बाद बीजेपी लगातार झारखंड को छोड़कर महाराष्ट्र, हरियाणा, दिल्ली और बिहार के चुनाव जीत चुकी है. मतलब संविधान खत्म करने और आरक्षण खत्म करने का मुद्दा फिलहाल ठंडा पड़ चुका है जो कि सिर्फ यूपी में ही चल पाया.


    अखिलेश की अग्नि परीक्षा

    भले ही अखिलेश और विपक्ष के विरोध से बिल संसद में गिर गया है, लेकिन इसका एक जोखिम भी है. शहरी और महिला वोटर्स के एक हिस्से में नकारात्मक संदेश गया है. सत्ता पक्ष अब उन्हें “महिला विरोधी” बताकर हमला करेगा. वहीं अखिलेश यह बताने की कोशिश करेंगे कि उन्होंने पीडीए के हक के लिए बिल का विरोध किया. मतलब महिला आरक्षण बिल की दोधारी तलवार पर अखिलेश चल रहे हैं. जरा सी चूक हुई, तो इसका खामियाजा भुगतना पड़ सकता है. लेकिन अगर चालाकी से चले, तो फायदा भी हो सकता है. वहीं महिलाओं के लिए नरेंद्र मोदी और योगी आदित्यनाथ सरकार के कामों को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. जनधन योजना, शौचालय, मुफ्त सिलेंडर, किसान सम्मान निधि और प्रदेश में अपराध को लेकर जीरो टॉलरेंस, खासकर एंटी रोमियो स्क्वॉड. अब समय ही तय करेगा कि महिला आरक्षण बिल का विरोध अखिलेश के लिए राजनीतिक जोखिम साबित होता है या रणनीतिक बढ़त।