इस साल अब तक महंगा ही रहा सोना-चांदी
ऊंचाई से नीचे आए दाम
वैश्विक संकेतों का असर, बाजार में उतार-चढ़ाव

ऊंचाई से नीचे आए दाम

कंपनी की आय में भी इस तिमाही के दौरान कमी देखी गई है। कुल राजस्व सालाना आधार पर 3.55 प्रतिशत घटकर 6.51 करोड़ रुपये पर आ गया, जो पिछले वर्ष की समान अवधि की तुलना में कम है। इसके साथ ही कर पूर्व मुनाफा भी करीब 91 प्रतिशत गिरकर 5.46 करोड़ रुपये रह गया, जो एक साल पहले 62.05 करोड़ रुपये था। ये आंकड़े संकेत देते हैं कि कंपनी की लाभप्रदता पर कई स्तरों पर असर पड़ा है।
हालांकि लागत के मोर्चे पर कंपनी ने कुछ राहत दर्ज की है। मार्च तिमाही में कुल खर्च में सालाना आधार पर लगभग 55 प्रतिशत की गिरावट आई और यह घटकर 1.05 करोड़ रुपये रह गया। इसके बावजूद कर्मचारी लागत में उल्लेखनीय वृद्धि देखी गई, जो तीन गुना से अधिक बढ़कर 0.22 करोड़ रुपये तक पहुंच गई। वहीं अन्य खर्चों में भी गिरावट दर्ज की गई, जिससे यह 0.83 करोड़ रुपये पर आ गया।
कमजोर वित्तीय प्रदर्शन के बावजूद कंपनी ने अपने शेयरधारकों के लिए डिविडेंड की घोषणा की है। बोर्ड ने 31 मार्च 2026 को समाप्त वित्त वर्ष के लिए प्रति शेयर 60 रुपये का अंतिम डिविडेंड प्रस्तावित किया है, जो अंकित मूल्य के आधार पर 600 प्रतिशत के बराबर है। यह प्रस्ताव आगामी वार्षिक आम बैठक में अनुमोदन के अधीन रहेगा। यदि इसे स्वीकृति मिलती है तो भुगतान 4 अगस्त 2026 तक किया जा सकता है, जबकि पात्र शेयरधारकों के निर्धारण के लिए रिकॉर्ड तिथि 30 जून 2026 तय की गई है।
कंपनी का मुख्य व्यवसाय ऑटोमोबाइल उद्योग के लिए डाई, जिग्स, फिक्स्चर और डाई कास्टिंग कंपोनेंट्स के निर्माण से जुड़ा है, हालांकि वर्तमान में यह एक सक्रिय वाहन निर्माता के बजाय मुख्य रूप से निवेश कंपनी के रूप में कार्य कर रही है। यह कंपनी Bajaj Holdings and Investment Limited की सहायक इकाई है और एक गैर पंजीकृत कोर इन्वेस्टमेंट कंपनी के रूप में संचालित होती है।
विशेषज्ञों के अनुसार कंपनी की आय का प्रमुख स्रोत उसके निवेश पोर्टफोलियो से प्राप्त रिटर्न है, जिसमें समूह की अन्य कंपनियों में किया गया निवेश शामिल है। ऐसे में बाजार की परिस्थितियों और निवेश से मिलने वाले लाभ में उतार चढ़ाव का सीधा असर इसके वित्तीय परिणामों पर पड़ता है। हालिया तिमाही के नतीजे भी इसी प्रवृत्ति को दर्शाते हैं, जहां निवेश आधारित आय में कमी ने समग्र लाभप्रदता को प्रभावित किया है।

देश के प्रमुख शहरों की बात करें तो दिल्ली में पेट्रोल ₹94.77 और डीजल ₹87.67 प्रति लीटर मिल रहा है। मुंबई में पेट्रोल ₹103.54 और डीजल ₹90.03 प्रति लीटर है। वहीं कोलकाता में पेट्रोल ₹105.41 और डीजल ₹92.02, चेन्नई में पेट्रोल ₹100.84 और डीजल ₹92.61 प्रति लीटर बिक रहा है। बेंगलुरु में पेट्रोल ₹102.96 और डीजल ₹90.99, जबकि हैदराबाद में पेट्रोल ₹107.50 और डीजल ₹95.70 प्रति लीटर के भाव पर मिल रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतों में अस्थिरता के बावजूद भारत में कीमतें स्थिर हैं। इसके पीछे सरकार की नीतियां और चुनावी माहौल को भी एक कारण माना जा रहा है।
सोने की कीमतों में फिर उछाल
दूसरी ओर, सोने की कीमतों में तेजी देखी जा रही है। मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज (MCX) पर 24 कैरेट सोना करीब 1.01% की बढ़त के साथ ₹1,53,200 प्रति 10 ग्राम तक पहुंच गया।
इंडियन बुलियन एंड ज्वैलर्स एसोसिएशन (IBJA) के मुताबिक, आज 24 कैरेट सोने का भाव ₹1,52,355 प्रति 10 ग्राम है। वहीं 22 कैरेट सोना ₹1,39,557 और 18 कैरेट सोना ₹1,14,266 प्रति 10 ग्राम पर पहुंच गया है।
अगर शहरों के हिसाब से देखें तो दिल्ली, गाजियाबाद, नोएडा और लखनऊ में 24 कैरेट सोना ₹1,55,430 प्रति 10 ग्राम के आसपास बिक रहा है। मुंबई, कोलकाता और बेंगलुरु में यह ₹1,55,280 के करीब है, जबकि चेन्नई में यह ₹1,55,990 प्रति 10 ग्राम तक पहुंच गया है।
क्यों बढ़ रहे हैं सोने के दाम?
विशेषज्ञों के अनुसार, पश्चिम एशिया में जारी तनाव के कारण निवेशक सुरक्षित निवेश के रूप में सोने की ओर रुख कर रहे हैं। इसके अलावा डॉलर की मजबूती और वैश्विक अनिश्चितता भी सोने की कीमतों को प्रभावित कर रही है।
शहरों में अलग-अलग क्यों होते हैं रेट?
पेट्रोल-डीजल और सोने की कीमतें हर शहर में अलग होती हैं। इसकी मुख्य वजह केंद्र और राज्य सरकारों के टैक्स, परिवहन लागत और स्थानीय मांग होती है। इसी कारण अलग-अलग शहरों में कीमतों में फर्क देखने को मिलता है।
क्या है आम लोगों के लिए मतलब?
जहां पेट्रोल-डीजल की कीमतों में स्थिरता आम जनता को राहत दे रही है, वहीं सोने की बढ़ती कीमतें खरीदारों और निवेशकों के लिए चिंता का विषय बन सकती हैं। आने वाले दिनों में वैश्विक हालात के आधार पर इनकी दिशा तय होगी।

क्या है नया नियम?
RBI की ओर से जारी Digital Payment E-Mandate Framework 2026 के अनुसार, बार-बार होने वाले ट्रांजैक्शन (Recurring Payments) को आसान बनाने के लिए यह बदलाव किया गया है। नए नियम के तहत ₹15,000 तक के भुगतान बिना OTP के पूरे हो सकेंगे, जबकि इससे ज्यादा राशि के ट्रांजैक्शन पर अतिरिक्त सुरक्षा के तौर पर OTP जरूरी होगा। हालांकि, कुछ खास कैटेगरी जैसे बीमा, म्यूचुअल फंड और क्रेडिट कार्ड बिल के लिए ₹1 लाख तक के ऑटो-पेमेंट बिना OTP के किए जा सकेंगे। यह सुविधा ग्राहकों को बार-बार OTP डालने की झंझट से राहत देगी।
ई-मैंडेट क्या होता है?
ई-मैंडेट एक ऐसी सुविधा है, जिसमें ग्राहक पहले से किसी पेमेंट की अनुमति दे देता है। इसके बाद तय समय पर अपने आप खाते से पैसे कट जाते हैं। यह सुविधा आमतौर पर OTT सब्सक्रिप्शन, मोबाइल बिल, EMI और इंश्योरेंस प्रीमियम जैसे भुगतान के लिए इस्तेमाल होती है।
हर ट्रांजैक्शन से पहले मिलेगा अलर्ट
RBI के नए नियम के मुताबिक, हर ऑटो-पेमेंट से कम से कम 24 घंटे पहले ग्राहक को नोटिफिकेशन भेजा जाएगा। इस नोटिफिकेशन में मर्चेंट का नाम, पेमेंट की राशि, तारीख और समय जैसी सभी जरूरी जानकारी दी जाएगी। ग्राहक SMS या ईमेल के जरिए यह अलर्ट प्राप्त कर सकता है।
बदलाव या कैंसिल करने का नियम
अगर ग्राहक ई-मैंडेट में कोई बदलाव करना चाहता है या उसे बंद करना चाहता है, तो इसके लिए OTP जरूरी होगा। ग्राहक किसी भी समय ऑटो-पेमेंट को रोक (opt-out) सकता है, लेकिन इसके लिए भी सुरक्षा प्रक्रिया का पालन करना होगा। पहला ट्रांजैक्शन हमेशा OTP के साथ ही पूरा किया जाएगा। अगर रजिस्ट्रेशन के समय ही पेमेंट किया जाता है, तो दोनों प्रक्रियाएं एक साथ पूरी हो सकती हैं। कुछ मामलों में प्री-नोटिफिकेशन जरूरी नहीं होगा, जैसे FASTag और नेशनल कॉमन मोबिलिटी कार्ड (NCMC) के ऑटो रिचार्ज। इन सेवाओं में ऑटो-पेमेंट पहले से तय नियमों के तहत जारी रहेगा। RBI के इस नए कदम से डिजिटल पेमेंट सिस्टम को और ज्यादा सुविधाजनक और सुरक्षित बनाने की कोशिश की गई है। इससे ग्राहकों को राहत मिलेगी और डिजिटल लेन-देन को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है।

इस बयान का असर तुरंत बाजार पर दिखा, जिससे अंतरराष्ट्रीय बेंचमार्क ब्रेंट क्रूड की कीमत करीब $99.78 प्रति बैरल तक पहुंच गई, जबकि अमेरिकी कच्चा तेल WTI (West Texas Intermediate) भी बढ़कर लगभग $94.36 प्रति बैरल हो गया। तेल की कीमतों में यह उछाल सीधे तौर पर बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव का नतीजा है।
क्यों बढ़ी तेल की कीमत?
तेल की कीमत बढ़ने की सबसे बड़ी वजह ईरान-अमेरिका तनाव है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, अमेरिका ने एक ईरानी ऑयल टैंकर को समुद्र में रोक लिया, जिससे स्थिति और ज्यादा गंभीर हो गई। साथ ही यह भी साफ नहीं है कि ईरान शांति वार्ता में शामिल होगा या नहीं। ऐसी अनिश्चितता के कारण निवेशकों में डर बढ़ जाता है और वे तेल जैसे कमोडिटी में पैसा लगाते हैं, जिससे कीमतें तेजी से ऊपर जाती हैं।
होर्मुज जलडमरूमध्य पर असर
तेल सप्लाई के लिए दुनिया का सबसे अहम रास्ता स्ट्रेट ऑफ हार्मुज (Strait of Hormuz) भी इस तनाव से प्रभावित हुआ है। यह रास्ता दुनिया की लगभग 20% तेल और LNG सप्लाई को संभालता है, लेकिन हालात इतने खराब हैं कि पिछले 24 घंटों में यहां से सिर्फ 3 जहाज ही गुजर पाए। अगर यह रास्ता लंबे समय तक बाधित रहता है, तो तेल की कीमतें और ज्यादा बढ़ सकती हैं।
दुनिया पर क्या असर पड़ेगा?
तेल की कीमत बढ़ने का सीधा असर आम लोगों की जेब पर पड़ता है। पेट्रोल-डीजल महंगा हो सकता है और ट्रांसपोर्ट लॉजिस्टिक्स की लागत बढ़ सकती है, यानी कि इससे महंगाई (Inflation) बढ़ सकती है। यूरोप में तो हालात को देखते हुए एयरलाइंस के लिए भी एडवाइजरी जारी करने की तैयारी हो रही है, ताकि जेट फ्यूल की कमी जैसी स्थिति से निपटा जा सके।
रूस और यूरोप की स्थिति
इस बीच रूस और यूरोप के बीच तेल सप्लाई को लेकर भी अनिश्चितता बनी हुई है। वोलोडिमिर ज़ेलेंस्की ने संकेत दिया है कि एक अहम पाइपलाइन दोबारा शुरू हो सकती है, लेकिन दूसरी तरफ खबर है कि रूस मई से कुछ सप्लाई रोक सकता है। इससे भी वैश्विक तेल बाजार में अस्थिरता बढ़ सकती है।
आगे क्या होगा?
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर ईरान-अमेरिका तनाव और बढ़ता है, तो होर्मुज जलडमरूमध्य बंद रह सकता है और सप्लाई चेन बाधित हो सकती है, तो तेल की कीमतें $100 के पार भी जा सकती हैं। हालांकि, अगर कूटनीतिक बातचीत सफल रहती है, तो कीमतों में कुछ नरमी आ सकती है।

कारोबार के दौरान सेंसेक्स में करीब 800 अंकों की तेज बढ़त दर्ज की गई और यह 79 हजार 296 के स्तर के आसपास पहुंच गया। वहीं निफ्टी भी मजबूत प्रदर्शन करते हुए 24 हजार 550 के पार कारोबार करता दिखाई दिया। बाजार की इस तेजी ने निवेशकों के बीच सकारात्मक माहौल बनाया और खरीदारी का रुझान बढ़ा।
इस उछाल का सबसे बड़ा कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में आई गिरावट रही। ब्रेंट क्रूड के दाम 94 से 95 डॉलर प्रति बैरल के आसपास आ गए, जिससे वैश्विक स्तर पर महंगाई को लेकर चिंताएं कुछ कम हुईं। तेल की कीमतों में नरमी से कंपनियों की लागत घटने की उम्मीद बढ़ी, जिसका असर सीधे तौर पर शेयर बाजार पर देखने को मिला।
इसके साथ ही एशियाई बाजारों में आई मजबूती ने भी भारतीय बाजार को सहारा दिया। एशिया के प्रमुख बाजारों में सकारात्मक रुझान देखने को मिला, जिससे निवेशकों की जोखिम लेने की क्षमता बढ़ी और घरेलू बाजार में भी खरीदारी तेज हो गई। वैश्विक स्तर पर स्थिरता के संकेतों ने भारतीय निवेशकों का भरोसा मजबूत किया।
सेक्टोरल स्तर पर देखें तो बैंकिंग शेयरों ने बाजार की तेजी में सबसे अहम भूमिका निभाई। बड़े निजी बैंकों में मजबूत खरीदारी देखने को मिली, जिससे निफ्टी बैंक इंडेक्स में करीब डेढ़ प्रतिशत की बढ़त दर्ज हुई। वित्तीय शेयरों में आई इस तेजी ने पूरे बाजार को ऊपर उठाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
रियल्टी सेक्टर ने आज सबसे बेहतर प्रदर्शन किया और इसमें करीब तीन प्रतिशत के आसपास की बढ़त दर्ज की गई। इसके अलावा मेटल, ऑटो, इंफ्रास्ट्रक्चर और पीएसयू बैंक सेक्टर में भी अच्छी खरीदारी देखने को मिली। इससे यह साफ संकेत मिला कि बाजार में व्यापक स्तर पर निवेशकों की भागीदारी बनी हुई है और तेजी केवल कुछ ही सेक्टरों तक सीमित नहीं है।
आईटी सेक्टर ने भी आज मजबूती दिखाई और शुरुआती कमजोरी से उबरकर इसमें सुधार देखने को मिला। प्रमुख आईटी कंपनियों के शेयरों में एक प्रतिशत से अधिक की बढ़त दर्ज की गई। हालांकि कुछ इंश्योरेंस शेयरों में हल्की कमजोरी देखने को मिली, लेकिन इसका असर पूरे बाजार पर सीमित रहा।
बाजार के आंकड़ों के अनुसार अधिकतर शेयरों में तेजी देखने को मिली, जिससे निवेशकों के बीच सकारात्मक भावना और मजबूत हुई। वोलैटिलिटी इंडेक्स में गिरावट यह संकेत देती है कि बाजार में घबराहट कम हुई है और निवेशक अधिक आत्मविश्वास के साथ ट्रेडिंग कर रहे हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि निफ्टी का 24 हजार 300 के ऊपर बने रहना बाजार के लिए मजबूत संकेत है। आने वाले समय में 24 हजार 450 से 24 हजार 500 का स्तर महत्वपूर्ण रेजिस्टेंस माना जा रहा है, जबकि नीचे की ओर 24 हजार 150 से 24 हजार 200 का स्तर सपोर्ट के रूप में काम कर सकता है। हालांकि वैश्विक राजनीतिक और आर्थिक घटनाक्रम बाजार की दिशा पर असर डाल सकते हैं।