Category: International

  • रूस ने फिर दिखाई दोस्ती, विदेश मंत्री बोले- भारत की अध्यक्षता में BRICS का हम करेंगे समर्थन

    रूस ने फिर दिखाई दोस्ती, विदेश मंत्री बोले- भारत की अध्यक्षता में BRICS का हम करेंगे समर्थन


    मास्को।
    रूस (Russia) के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव (Foreign Minister Sergei Lavrov) ने सोमवार को कहा कि भारत (India) की अध्यक्षता में हम ब्रिक्स (BRICS) और उनके एजेंडे का पूरा समर्थन करेंगे। एक इंटरव्यू में लावरोव ने कहा कि आज के समय को देखते हुए भारत का एजेंडा बेहद प्रासंगिक, तार्किक है। वह आतंकवाद (Terrorism) और ऊर्जा सुरक्षा (Energy Security) से जुड़ा है। लावरोव ने कहा कि मेरी राय में भारत की अध्यक्षता में जो एजेंडा प्रस्तुत किया जा रहा है, वह भविष्य की तैयारी और वर्तमान चुनौतियों का समाधान करता है। हम इसका सक्रिय रूप से समर्थन करेंगे।

    रूसी विदेश मंत्री ने कहा कि भारत का जोर आतंकवाद विरोधी गतिविधियों पर है जो बेहद जरूरी भी है। क्योंकि इस समय विश्व के कई हिस्से आतंकवाद प्रभावित हैं। अफगानिस्तान सीमा, भारत-पाकिस्तान-अफगानिस्तान गलियारे के साथ-साथ अन्य जगहों पर आतंकी गतिविधियां देखी जा रही है।

    यह प्राथमिकता हमारे लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, खासकर जब हम संयुक्त राष्ट्र में भारत के साथ मिलकर एक वैश्विक आतंकवाद विरोधी एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए सक्रिय रूप से काम कर रहे हैं। इसका मसौदा पहले ही तैयार हो चुका है, हालांकि अभी तक आम सहमति नहीं बन पाई है।

    लावरोव ने कहा, भारत की अध्यक्षता खाद्य और ऊर्जा सुरक्षा के मुद्दों, सूचना प्रौद्योगिकी, को प्राथमिकता देती है। भारत आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस शिखर सम्मेलन की मेजबानी करेगा, जिसमें रूस को आमंत्रित किया गया है, और हम एजेंडे में सक्रिय रूप से योगदान दे रहे हैं।

  • इजरायल की विस्तारवादी नीतियों के खिलाफ 8 मुस्लिम देशों ने खोला मोर्चा… दी कड़ी चेतावनी

    इजरायल की विस्तारवादी नीतियों के खिलाफ 8 मुस्लिम देशों ने खोला मोर्चा… दी कड़ी चेतावनी


    इस्लामाबाद।
    पाकिस्तान (Pakistan) समेत आठ मुस्लिम देशों (Eight Muslim Countries) ने सोमवार (9 फरवरी) को एक संयुक्त बयान जारी कर कब्जे वाले पश्चिमी तट (वेस्ट बैंक) में इज़रायल (Israel) की “लगातार विस्तारवादी नीतियों” के खिलाफ कड़ी चेतावनी दी है। इन देशों ने इज़रायल पर अवैध तरीके से संप्रभुता थोपने, यहूदी बस्तियों के विस्तार और फ़िलिस्तीनी जनता को विस्थापित करने का आरोप लगाया है। इस संयुक्त बयान पर पाकिस्तान, मिस्र, जॉर्डन, संयुक्त अरब अमीरात (UAE), इंडोनेशिया, तुर्किये, सऊदी अरब और कतर के विदेश मंत्रियों के हस्ताक्षर हैं। बयान में कहा गया कि इज़रायल द्वारा लिए जा रहे फैसले पश्चिमी तट को अवैध रूप से अपने में मिलाने की प्रक्रिया को तेज कर रहे हैं।

    यह बयान ऐसे समय में आया है, जब इज़रायल की सुरक्षा कैबिनेट ने हाल ही में कुछ ऐसे कदमों को मंजूरी दी है, जिनसे पश्चिमी तट में यहूदी बसने वालों के लिए जमीन खरीदना आसान हो जाएगा और फ़िलिस्तीनियों पर इज़रायली प्रशासन के प्रवर्तन अधिकार बढ़ जाएंगे। इज़रायली मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, दशकों पुराने उन नियमों को हटाने का भी फैसला किया गया है, जो यहूदी नागरिकों को निजी तौर पर पश्चिमी तट में जमीन खरीदने से रोकते थे।


    इजरायल को चेतावनी

    ऐसी स्थिति में आठों मुस्लिम देशों ने दो टूक कहा कि इजरायल का कब्जे वाले फिलस्तीनी इलाकों पर कोई संप्रभु अधिकार नहीं है। बयान में चेतावनी दी गई है कि पश्चिमी तट में अपनाई जा रही नीतियाँ क्षेत्र में हिंसा और संघर्ष को और भड़का रही हैं। इन देशों के विदेश मंत्रियों ने इजरायल की कार्रवाइयों को अंतरराष्ट्रीय कानून का खुला उल्लंघन बताते हुए कहा कि ये कदम दो-राष्ट्र समाधान को कमजोर करते हैं और फ़िलिस्तीनी जनता के स्वतंत्र और संप्रभु राष्ट्र के अधिकार पर सीधा हमला हैं।


    संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव का भी हवाला

    बयान में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव 2334 का भी हवाला दिया गया है, जिसमें 1967 के बाद कब्जे वाले फ़िलिस्तीनी इलाक़ों की जनसांख्यिकी, स्वरूप और स्थिति बदलने के किसी भी प्रयास की निंदा की गई है। साथ ही, अंतरराष्ट्रीय न्यायालय (ICJ) की 2024 की सलाहकारी राय का उल्लेख करते हुए कहा गया कि अदालत ने इजरायल की मौजूदगी और नीतियों को अवैध करार दिया है। विदेश मंत्रियों ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से अपील की कि वह अपनी क़ानूनी और नैतिक ज़िम्मेदारियाँ निभाए और इज़रायल को पश्चिमी तट में खतरनाक तनाव बढ़ाने और उसके नेताओं के भड़काऊ बयानों पर रोक लगाने के लिए मजबूर करे।


    दो-राष्ट्र समाधान के जरिये ही शांति संभव

    उन्होंने जोर देकर कहा कि फ़िलिस्तीनी जनता के आत्मनिर्णय और स्टेटहुड के अधिकार की पूर्ति ही स्थायी समाधान है, जो अंतरराष्ट्रीय प्रस्तावों और अरब शांति पहल के अनुरूप दो-राष्ट्र समाधान के जरिये ही संभव है। ग़ौरतलब है कि यही आठ देश पिछले वर्ष अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन के साथ गाज़ा में युद्ध और कथित नरसंहार को समाप्त करने की योजना पर भी काम कर चुके हैं। इस महीने की शुरुआत में इन देशों ने गाज़ा में संघर्ष विराम के बार-बार उल्लंघन को लेकर भी इजरायल की निंदा की थी।

  • एलन मस्क की स्टारलिंक को पाकिस्तान में प्रवेश के लिए नहीं मिल रहा लाइसेंस… फंसा पेच?

    एलन मस्क की स्टारलिंक को पाकिस्तान में प्रवेश के लिए नहीं मिल रहा लाइसेंस… फंसा पेच?


    नई दिल्ली।
    अरबपति व्यवसायी एलन मस्क (Billionaire Businessman Elon Musk) की स्टारलिंक (Starlink) को डेटा सुरक्षा संबंधी चिंताओं, मस्क-ट्रंप विवाद और चीनी कंपनियों से प्रतिस्पर्धा के कारण पाकिस्तान (Pakistan) के सैटेलाइट इंटरनेट बाजार (Satellite Internet Market.) में प्रवेश करने का लाइसेंस मिलने में देरी हो रही है। एक पाकिस्तानी अखबार में रविवार को प्रकाशित खबर में यह बात कही गई है।

    एक खबर में कहा है कि स्टारलिंक उन कई कंपनियों में शामिल है, जिन्होंने पाकिस्तान के सैटेलाइट इंटरनेट बाजार में परिचालन की अनुमति मांगी है, लेकिन विभिन्न अनसुलझे सुरक्षा और भूराजनीतिक मुद्दों के कारण अनुमोदन प्रक्रिया धीमी हो गई है। खबर के मुताबिक, सरकार को पता चला है कि स्टारलिंक पाकिस्तान के निगरानी, ​​नियामक और सुरक्षा ढांचे का उल्लंघन करते हुए कुछ डेटा प्रसारित कर सकता है।

    खबर में एक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी के हवाले से कहा गया है कि हम पाकिस्तान में उपयोगकर्ताओं के डेटा की सुरक्षा सुनिश्चित करने और डेटा चोरी रोकने के लिए सुरक्षा जांच के बिना स्टारलिंक को लाइसेंस नहीं दे सकते। अधिकारियों के अनुसार, मस्क और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीच विवाद एक और बड़ी वजह है, जिसके चलते पाकिस्तान सरकार सुरक्षा मंजूरी देने में हिचकिचा रही है।

    उन्होंने कहा कि ट्रंप के पिछले साल जनवरी में दूसरी बार अमेरिका का राष्ट्रपति बनने के बाद वाशिंगटन और इस्लामाबाद के बीच रिश्तों में सुधार हुआ है, ऐसे में पाकिस्तान ऐसा कोई कदम नहीं उठाना चाहता है, जो अमेरिका को नागवार गुजरे। खबर में कहा गया है कि मौजूदा समय में पांच कंपनियां पाकिस्तान में उपग्रह आधारित इंटरनेट सेवाओं के लिए लाइसेंस हासिल करने की कोशिश कर रही हैं और देश में लाखों अमेरिकी डॉलर का निवेश करने की योजना बना रही हैं।

    पाकिस्तान अंतरिक्ष गतिविधि नियामक बोर्ड (पीएसएआरबी) के मुताबिक, स्टारलिंक और चीन स्थित शंघाई स्पेसकॉम सैटेलाइट टेक्नोलॉजी लिमिटेड (एसएसएसटी) सहित पांच कंपनियों ने उपग्रह आधारित इंटरनेट सेवाएं प्रदान करने में गहरी दिलचस्पी दिखाई है।

    अधिकारियों के अनुसार, पाकिस्तानी बाजार में अमेरिकी कंपनियों की तुलना में चीनी कंपनियों की पहले से ही मजबूत पकड़ है और पाकिस्तान के सैटेलाइट इंटरनेट बाजार में कदम रखने की इच्छुक चीनी कंपनियां स्टारलिंक को अपना सीधा प्रतिस्पर्धी मानती हैं। हालांकि, अधिकारियों ने बताया कि पंजीकरण प्रक्रिया अभी भी पीएसएआरबी बोर्ड के पास लंबित है, जिसने लाइसेंसिंग व्यवस्था को अंतिम रूप नहीं दिया है।

  • ईरान का ट्रंप को साफ संदेश: ‘ना डरते हैं, ना किसी का हुक्म मानेंगे’

    ईरान का ट्रंप को साफ संदेश: ‘ना डरते हैं, ना किसी का हुक्म मानेंगे’


    नई दिल्ली। अमेरिका और ईरान के बीच तनाव लगातार बढ़ता जा रहा है, और फिलहाल युद्ध के खतरे को पूरी तरह टाला नहीं जा सका है। बातचीत की कोशिशों के बीच रविवार को ईरान ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को अपना रुख फिर स्पष्ट कर दिया। ईरान ने कहा कि वह अपने यूरेनियम संवर्धन कार्यक्रम को किसी भी दबाव के बावजूद नहीं छोड़ेगा और किसी अन्य देश के आदेश में काम नहीं करेगा।

    तेहरान में एक सार्वजनिक मंच से बोलते हुए ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने कहा कि ईरान अपनी परमाणु नीति किसी से डरकर नहीं बदलेगा। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय मीडिया और दर्शकों के सामने कहा कि यूरेनियम संवर्धन उनके लिए गैर-समझौते वाला मुद्दा है।अराघची ने कहा, “हम संवर्धन क्यों करते हैं और इसे छोड़ने से इंकार क्यों करते हैं, भले ही युद्ध का खतरा हो? क्योंकि किसी को भी हम पर हुक्म चलाने का अधिकार नहीं है।”

    अमेरिका पर भरोसा नहीं

    ईरानी विदेश मंत्री ने क्षेत्र में अमेरिकी सैन्य मौजूदगी को दबाव बनाने की कमजोर रणनीति बताया। अराघची ने कहा, “क्षेत्र में उनकी सैन्य तैनाती हमें डराती नहीं है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि ईरान को अमेरिका पर बिल्कुल भरोसा नहीं है। अराघची ने बताया कि कुछ संकेत अमेरिकी गंभीरता दिखाते हैं, जबकि कई संकेत इसे झूठा साबित करते हैं। उनके मुताबिक, ईरान के खिलाफ जारी प्रतिबंध और पश्चिम एशिया में अमेरिकी सैन्य गतिविधियां अमेरिका की गंभीरता पर सवाल खड़े करती हैं।

    समझौते के लिए ईरान की शर्तें

    अराघची ने कहा कि ईरान सभी संकेतों का मूल्यांकन करेगा। उन्होंने उल्लेख किया कि अमेरिका के साथ अप्रत्यक्ष बातचीत समझौते की राह खोल सकती है, लेकिन केवल तभी जब अमेरिकी मांगें वास्तविक और न्यायसंगत हों। उन्होंने कहा, “अगर अमेरिका का दृष्टिकोण सम्मानजनक और आपसी हितों पर आधारित होगा, तभी समझौता संभव है।”

  • सिंधु जल संधि सस्पेंड के बाद बड़ा कदम, चिनाब नदी पर 5129 करोड़ का सावलकोट पावर प्रोजेक्ट शुरू

    सिंधु जल संधि सस्पेंड के बाद बड़ा कदम, चिनाब नदी पर 5129 करोड़ का सावलकोट पावर प्रोजेक्ट शुरू


    नई दिल्ली। पाकिस्तान के साथ सिंधु जल संधि को निलंबित किए जाने के बाद केंद्र सरकार ने अब बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर और ऊर्जा प्रोजेक्ट्स पर तेजी से काम शुरू कर दिया है। इसी कड़ी में सरकारी कंपनी एनएचपीसी (NHPC) ने जम्मू-कश्मीर के रामबन जिले में चिनाब नदी पर बनने वाले सावलकोट हाइड्रो इलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट के निर्माण के लिए टेंडर जारी कर दिया है। इस परियोजना को देश की ऊर्जा जरूरतों और जल संसाधनों के बेहतर उपयोग की दिशा में एक बड़ा और रणनीतिक कदम माना जा रहा है।

    जानकारी के मुताबिक, इस महत्वाकांक्षी परियोजना को करीब 5129 करोड़ रुपए की लागत से तैयार किया जाएगा। एनएचपीसी द्वारा जारी टेंडर के तहत पूरे निर्माण कार्य को एक ही पैकेज में शामिल किया गया है, ताकि काम को तेज गति से पूरा किया जा सके। टेंडर दस्तावेजों के अनुसार, इस पैकेज में डाइवर्जन टनल का निर्माण, एडिट, डीटी और कोफर डैम बनाने जैसे प्रमुख कार्य शामिल हैं।

    इसके अलावा मांडिया नाला डीटी का निर्माण, उससे संबंधित सड़क, राइट बैंक स्पाइरल टनल, एक्सेस टनल और डैम से जुड़े सभी सहायक कार्य भी इसी प्रोजेक्ट के अंतर्गत किए जाएंगे। चिनाब नदी पर बनने वाला यह प्रोजेक्ट बिजली उत्पादन के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है और इससे जम्मू-कश्मीर सहित देश के कई हिस्सों को लाभ मिलने की उम्मीद है।

    एनएचपीसी की ओर से जारी जानकारी के अनुसार, इस परियोजना के लिए बोली प्रक्रिया 12 मार्च से शुरू होगी और 20 मार्च तक चलेगी। बोली की वैधता 180 दिनों के लिए तय की गई है। वहीं, इस पूरे प्रोजेक्ट को पूरा करने के लिए लगभग 3285 दिनों की समयसीमा निर्धारित की गई है, यानी इसे चरणबद्ध तरीके से दीर्घकालिक योजना के तहत तैयार किया जाएगा।

    सावलकोट हाइड्रो इलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट के जरिए कुल 1856 मेगावाट बिजली उत्पादन का लक्ष्य रखा गया है। इतना बड़ा उत्पादन देश के पावर ग्रिड को मजबूती देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। खासकर जम्मू-कश्मीर जैसे पहाड़ी इलाकों में बिजली की उपलब्धता बेहतर होगी और औद्योगिक व घरेलू जरूरतों को पूरा करने में भी मदद मिलेगी।

    ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि इस प्रोजेक्ट के शुरू होने से न केवल बिजली उत्पादन बढ़ेगा, बल्कि स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर भी पैदा होंगे। साथ ही, यह परियोजना जल संसाधनों के बेहतर उपयोग और क्षेत्रीय विकास को भी गति देगी।

    भारत सरकार ने यह कदम ऐसे समय पर उठाया है जब पाकिस्तान के साथ सिंधु जल संधि को लेकर तनाव की स्थिति बनी हुई है। ऐसे में चिनाब नदी पर इस तरह की बड़ी परियोजना को रणनीतिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इससे भारत अपने जल संसाधनों का बेहतर उपयोग कर सकेगा और ऊर्जा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की दिशा में एक और मजबूत कदम बढ़ाएगा।

    विशेषज्ञों का मानना है कि यह प्रोजेक्ट केवल बिजली उत्पादन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह देश की दीर्घकालिक ऊर्जा नीति और जल प्रबंधन योजना का भी अहम हिस्सा है। आने वाले वर्षों में इसके पूरा होने पर देश की ऊर्जा क्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि होने की संभावना है।

  • बांग्लादेश की जेल में अवामी लीग के वरिष्ठ नेता रमेश चंद्र सेन का निधन, सुरक्षा व्यवस्था पर उठे सवाल

    बांग्लादेश की जेल में अवामी लीग के वरिष्ठ नेता रमेश चंद्र सेन का निधन, सुरक्षा व्यवस्था पर उठे सवाल


    ढाका। बांग्लादेश की दिनाजपुर जेल से पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना की पार्टी अवामी लीग के वरिष्ठ नेता और पूर्व मंत्री रमेश चंद्र सेन के निधन की खबर सामने आई है। अधिकारियों और स्थानीय मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, उनका शनिवार सुबह जेल में तबीयत बिगड़ने के बाद अस्पताल में निधन हो गया। वे अवामी लीग के प्रमुख अल्पसंख्यक नेताओं में गिने जाते थे और शेख हसीना की सरकार में जल संसाधन मंत्री रह चुके थे।

    बताया जा रहा है कि 86 वर्षीय रमेश चंद्र सेन पांच बार सांसद चुने गए थे और उन्होंने अपना आखिरी चुनाव साल 2024 में लड़ा था। बांग्लादेश के प्रमुख समाचार पत्र प्रथम आलो की रिपोर्ट के अनुसार, शनिवार सुबह करीब 9 बजकर 10 मिनट पर उनकी अचानक तबीयत बिगड़ गई। इसके बाद उन्हें तत्काल इलाज के लिए दिनाजपुर मेडिकल कॉलेज अस्पताल ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया।

    जेल में एक पूर्व मंत्री की मौत की खबर सामने आने के बाद अवामी लीग के वरिष्ठ नेताओं और पूर्व मंत्रियों की सुरक्षा को लेकर कई सवाल खड़े हो गए हैं। पार्टी से जुड़े लोगों और स्थानीय स्तर पर इस घटना को लेकर चिंता जताई जा रही है।

    जेल प्रशासन की ओर से दी गई जानकारी के मुताबिक, रमेश चंद्र सेन की तबीयत अचानक बिगड़ी और वे बेहोश होकर गिर पड़े। उन्हें तुरंत अस्पताल पहुंचाया गया, लेकिन इलाज के दौरान सुबह करीब 9:30 बजे डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। अधिकारियों का कहना है कि वे लंबे समय से कई बीमारियों से जूझ रहे थे, जिसके कारण उनकी हालत पहले से ही कमजोर थी।

    हालांकि, मामले से जुड़े कुछ लोगों का आरोप है कि जेल में उनकी देखभाल ठीक से नहीं हो रही थी। उनकी मौत के बाद सोशल मीडिया पर कई तरह की प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। कुछ लोग इसे हिरासत में हुई मौत बता रहे हैं, जबकि प्रशासन इसे प्राकृतिक कारणों से हुई मृत्यु बता रहा है।

    रमेश चंद्र सेन की गिरफ्तारी अगस्त 2024 में शेख हसीना की सरकार गिरने के बाद हुई थी। उन पर हत्या सहित तीन गंभीर आरोप लगाए गए थे, जिसके बाद उन्हें हिरासत में लिया गया था। उस समय उनकी एक तस्वीर भी सोशल मीडिया पर वायरल हुई थी, जिसमें उनके हाथों में रस्सी बंधी हुई नजर आई थी।

    सरकार बदलने के बाद अवामी लीग के कई नेता हमलों के डर से देश छोड़कर चले गए थे, लेकिन रमेश चंद्र सेन ने अपना घर नहीं छोड़ा। उन्हें भरोसा था कि उन्होंने कोई गलत काम नहीं किया है और वे कानून का सामना करेंगे।

    उनकी मौत के बाद सोशल मीडिया पर लोगों की प्रतिक्रियाएं लगातार सामने आ रही हैं। कुछ यूजर्स ने इसे संदिग्ध बताते हुए जांच की मांग की है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, हिरासत के दौरान अब तक पार्टी के कम से कम पांच वरिष्ठ नेताओं की मौत हो चुकी है, जिससे राजनीतिक माहौल और ज्यादा संवेदनशील हो गया है।

  • जेएनयू में फिर टकराव की स्‍थ‍िति बनी, अभाविप का उग्र विरोध सामने आया

    जेएनयू में फिर टकराव की स्‍थ‍िति बनी, अभाविप का उग्र विरोध सामने आया


    नई दिल्ली। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) एक बार फिर छात्र राजनीति और प्रशासनिक फैसलों को लेकर विवाद के केंद्र में आ गया है। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (अभाविप) की जेएनयू इकाई ने विश्वविद्यालय प्रशासन पर गंभीर आरोप लगाते हुए निष्कासन और भारी जुर्माने की कार्रवाई को तानाशाही करार दिया है। संगठन का कहना है कि छात्र आंदोलनों को दबाने के लिए प्रशासन दमनकारी नीतियों का सहारा ले रहा है, जिसे किसी भी हाल में स्वीकार नहीं किया जाएगा।

    अभाविप के अनुसार, हाल के दिनों में कई छात्र कार्यकर्ताओं के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की गई है, जिसमें निष्कासन और आर्थिक दंड शामिल हैं। संगठन ने आरोप लगाया कि प्रशासन इन कदमों के जरिए सक्रिय छात्रों की आवाज दबाने की कोशिश कर रहा है। उनका कहना है कि इस तरह की कार्रवाई छात्रों के अधिकारों का उल्लंघन है, उनके शैक्षणिक भविष्य के साथ भी सीधा खिलवाड़ है।

    संगठन ने इन फैसलों को अलोकतांत्रिक बताते हुए कहा कि जुर्माने की राशि इतनी अधिक रखी गई है कि आम छात्र के लिए उसे भर पाना बेहद मुश्किल है। अभाविप जेएनयू अध्यक्ष मयंक पंचाल ने कहा कि कुछ मामलों में जुर्माना करीब 4,83,000 रुपये तक लगाया गया है, जो प्रशासनिक संवेदनहीनता को दर्शाता है। उनका कहना है कि यह कदम छात्रों को डराने और आंदोलन को कमजोर करने की एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है।

    विरोध जताने के लिए अभाविप कार्यकर्ताओं ने परिसर में दमनकारी आदेशों की प्रतियां जलाकर अपना आक्रोश व्यक्त किया। संगठन ने इसे प्रतीकात्मक विरोध बताते हुए कहा कि यह उस व्यवस्था के खिलाफ चेतावनी है जो छात्रों के अधिकारों को कुचलने की कोशिश कर रही है। कार्यकर्ताओं का कहना है कि उनका आंदोलन पूरी तरह शांतिपूर्ण है, लेकिन अन्याय के खिलाफ उनकी लड़ाई मजबूती से जारी रहेगी।

    इस पूरे विवाद के केंद्र में CPO (चीफ प्रॉक्टर ऑफिस) मैनुअल भी है, जिसे लेकर अभाविप शुरू से ही विरोध जता रही है। संगठन का कहना है कि यह मैनुअल जेएनयू जैसे खुले और लोकतांत्रिक माहौल वाले विश्वविद्यालय के लिए खतरा है। अभाविप के मुताबिक, इसके प्रावधान छात्रों की स्वतंत्रता को सीमित करते हैं और प्रशासन को अत्यधिक अधिकार देते हैं। संगठन ने मांग की है कि इस मैनुअल को तत्काल प्रभाव से निरस्त किया जाए।

    अभाविप नेताओं का आरोप है कि प्रशासन अपनी विफलताओं को छिपाने के लिए कठोर नियमों का सहारा ले रहा है। उनका कहना है कि विश्वविद्यालय को संवाद और सहयोग के जरिए चलाया जाना चाहिए, न कि दंड और निष्कासन के जरिए। संगठन ने साफ शब्दों में कहा कि राष्ट्रवादी छात्र किसी भी तरह की कायराना कार्रवाई से डरने वाले नहीं हैं। हालांकि, अभाविप ने यह भी स्पष्ट किया कि वह विरोध के नाम पर अराजकता और तोड़-फोड़ का समर्थन नहीं करती। संगठन ने कहा कि विश्वविद्यालय की सार्वजनिक संपत्ति उसकी धरोहर है और उसे नुकसान पहुंचाना किसी भी तरह से उचित नहीं है। इस दौरान अभाविप ने वामपंथी छात्र संगठनों पर परिसर में तोड़-फोड़ की राजनीति करने का आरोप लगाया और उसकी कड़ी निंदा की।

    अभाविप जेएनयू मंत्री प्रवीण कुमार पीयूष ने प्रशासन की कार्रवाई को गुंडागर्दी करार देते हुए कहा कि छात्रों को डराने की रणनीति अब काम नहीं आने वाली है। उन्होंने कहा कि निष्कासन और भारी जुर्मानों के आदेशों को जलाकर संगठन ने यह साफ संदेश दे दिया है कि वह इन फैसलों को स्वीकार नहीं करता। उनका कहना है कि यदि प्रशासन ने अपने फैसलों पर पुनर्विचार नहीं किया, तो विरोध और तेज हो सकता है। मयंक पंचाल ने कहा कि उनका मुख्य विरोध उस ढांचे के खिलाफ है, जिसमें छात्रों को निष्कासित कर उनके मौलिक अधिकारों का हनन किया जा रहा है। उन्होंने निष्कासित छात्रों की तत्काल बहाली और लगाए गए जुर्मानों को वापस लेने की मांग दोहराई। उनके अनुसार, यह पूरे परिसर के लोकतांत्रिक माहौल का सवाल है।

    इस घटनाक्रम ने जेएनयू में एक बार फिर प्रशासन और छात्र संगठनों के बीच तनाव को उजागर कर दिया है। जहां एक ओर छात्र संगठन इसे अधिकारों की लड़ाई बता रहे हैं, वहीं प्रशासन की ओर से अभी तक इस विवाद पर कोई विस्तृत सार्वजनिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। ऐसे में आने वाले दिनों में यह टकराव और बढ़ने की आशंका जताई जा रही है। इस दौरान अभाविप ने अंत में दोहराया कि वह सामान्य छात्रों के हितों और उनके अधिकारों की रक्षा के लिए लगातार संघर्ष करती रहेगी। संगठन का कहना है कि प्रशासनिक तानाशाही के खिलाफ उसकी लड़ाई अंतिम निर्णय तक जारी रहेगी और वह किसी भी स्तर पर छात्रों की आवाज को दबने नहीं देगा।

  • बांग्‍लादेश में चुनाव से पहले बिजली गुल होने का खड़ा हो गया संकट, अडानी ग्रुप का बकाया भुगतान पत्र

    बांग्‍लादेश में चुनाव से पहले बिजली गुल होने का खड़ा हो गया संकट, अडानी ग्रुप का बकाया भुगतान पत्र


    नई दिल्ली। बांग्लादेश में आगामी संसदीय चुनावों से ठीक पहले बिजली आपूर्ति और वित्तीय स्थिति को लेकर एक नया विवाद सामने आ गया है। मोहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार के कार्यकाल के अंतिम दौर में अडानी ग्रुप ने बकाया भुगतान को लेकर बांग्लादेश पावर डेवलपमेंट बोर्ड (PDB) को एक औपचारिक पत्र भेजा है। इस पत्र के बाद दोनों पक्षों के बीच चल रहा वित्तीय विवाद फिर से चर्चा में आ गया है और देश की ऊर्जा सुरक्षा को लेकर सवाल खड़े होने लगे हैं।

    रिपोर्ट के अनुसार, अडानी पावर लिमिटेड ने 29 जनवरी को पीडीबी के चेयरमैन को पत्र लिखकर तत्काल भुगतान की मांग की। कंपनी ने स्पष्ट किया कि पावर प्लांट का नियमित संचालन जारी रखने के लिए 112.7 मिलियन अमेरिकी डॉलर, यानी भारतीय मुद्रा में 1000 करोड़ रुपये से अधिक की राशि का तुरंत भुगतान आवश्यक है। यदि यह भुगतान नहीं किया गया, तो बिना बाधा बिजली आपूर्ति बनाए रखना मुश्किल हो सकता है।

    इस कुल बकाया में 53.2 मिलियन डॉलर की राशि पिछले वर्ष जून तक की देनदारी के रूप में शामिल है, जबकि 59.6 मिलियन डॉलर अक्टूबर तक दी गई बिजली सेवा का भुगतान है। कंपनी का कहना है कि कई बार आग्रह करने के बावजूद बांग्लादेश पावर बोर्ड इस रकम का पूरा भुगतान नहीं कर पाया है। ऐसे में बढ़ते बकाए का दबाव कंपनी के संचालन, मेंटेनेंस और इससे जुड़े साझेदारों पर पड़ने लगा है।

    पत्र में अडानी ग्रुप ने संकेत दिया है कि अगर भुगतान में और देरी होती है, तो बिजली उत्पादन और आपूर्ति पर असर पड़ सकता है। हालांकि इसे औपचारिक चेतावनी नहीं कहा गया, लेकिन इस तरह की भाषा ने यह स्पष्ट कर दिया है कि स्थिति गंभीर होती जा रही है और दोनों पक्षों को जल्द समाधान निकालने की जरूरत है।

    यह पहला मौका नहीं है जब इस मुद्दे पर तनाव पैदा हुआ हो। पिछले साल भी अडानी ग्रुप ने बकाया भुगतान को लेकर बांग्लादेश को पत्र भेजा था और 10 नवंबर तक की समय सीमा तय की थी। उस समय कंपनी ने साफ कहा था कि अगर तय समय तक पैसे नहीं मिले, तो 11 नवंबर से बिजली आपूर्ति बंद करनी पड़ सकती है। इसके बाद बांग्लादेश सरकार ने उसी महीने करीब 100 मिलियन डॉलर का भुगतान किया था, जिससे तत्काल संकट टल गया था। लेकिन उसके बाद भी पुराने बकाए का पूरा भुगतान नहीं हो पाया और दिसंबर से फिर देनदारी बढ़ने लगी। अब एक बार फिर वही स्थिति बनती नजर आ रही है, जिससे बिजली आपूर्ति बाधित होने की आशंका जताई जा रही है। बांग्लादेश जैसे देश के लिए, जहां ऊर्जा आपूर्ति आर्थिक गतिविधियों की रीढ़ मानी जाती है, यह स्थिति काफी गंभीर मानी जा रही है।

    इस पूरे घटनाक्रम का समय भी बेहद महत्वपूर्ण है। बांग्लादेश में 12 फरवरी को संसदीय चुनाव होने जा रहे हैं और इसके साथ जनमत संग्रह भी प्रस्तावित है। चुनावी माहौल पहले से ही गरमाया हुआ है और राजनीतिक दल पूरी ताकत से प्रचार में जुटे हैं। बीएनपी और जमात-ए-इस्लामी जैसे दल मैदान में सक्रिय हैं, जबकि पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना की पार्टी अवामी लीग पर प्रतिबंध लगा दिया गया है। ऐसे माहौल में अडानी ग्रुप का यह पत्र बांग्लादेश की आर्थिक और प्रशासनिक स्थिति को लेकर नई बहस छेड़ रहा है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि ऊर्जा क्षेत्र में वित्तीय अस्थिरता का असर सीधे आम जनता और उद्योगों पर पड़ सकता है। अगर बिजली आपूर्ति में बाधा आती है, तो इसका असर उद्योग, व्यापार और रोजमर्रा की जिंदगी पर दिखाई देगा। ऐसे में सरकार के लिए यह जरूरी हो जाता है कि वह ऊर्जा कंपनियों के साथ अपने वित्तीय दायित्वों को समय पर पूरा करे।

    अडानी ग्रुप का बांग्लादेश में बिजली उत्पादन से जुड़ा प्रोजेक्ट वहां की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इस वजह से बकाया भुगतान का मुद्दा केवल एक कारोबारी विवाद नहीं, बल्कि एक बड़े ऊर्जा और आर्थिक सवाल के रूप में देखा जा रहा है। यदि इस पर समय रहते समाधान नहीं निकला, तो यह चुनावी माहौल में एक बड़ा मुद्दा बन सकता है। इस मामले ने बांग्लादेश की आर्थिक स्थिति पर भी अप्रत्यक्ष रूप से सवाल खड़े किए हैं। लगातार बढ़ते बकाए और भुगतान में देरी यह संकेत देते हैं कि सरकार वित्तीय दबाव का सामना कर रही है। चुनाव से पहले इस तरह की खबरें राजनीतिक बहस को और तेज कर सकती हैं।

    फिलहाल सबकी नजर इस बात पर टिकी है कि बांग्लादेश पावर डेवलपमेंट बोर्ड इस बकाया भुगतान को लेकर क्या कदम उठाता है और क्या दोनों पक्षों के बीच कोई समाधान निकल पाता है। अगर भुगतान समय पर हो जाता है, तो बिजली आपूर्ति सामान्य बनी रह सकती है। लेकिन अगर विवाद लंबा खिंचता है, तो इसका असर बांग्लादेश की ऊर्जा व्यवस्था और राजनीतिक माहौल दोनों पर पड़ सकता है।

  • भारत-अमेरिका ट्रेड डील: दवाइयां, डायमंड्स, मसाले पर 0% टैरिफ, किसानों और डेयरी को पूरी सुरक्षा

    भारत-अमेरिका ट्रेड डील: दवाइयां, डायमंड्स, मसाले पर 0% टैरिफ, किसानों और डेयरी को पूरी सुरक्षा


    नई दिल्ली। भारत और अमेरिका के बीच अंतरिम व्यापार समझौते का फ्रेमवर्क जारी होने के बाद वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने विस्तार से जानकारी दी कि किन उत्पादों पर अमेरिका ने 0% टैरिफ लागू किया है। वहीं, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि भारत ने किसी भी कृषि और डेयरी उत्पादों पर कोई छूट नहीं दी है, ताकि किसानों और घरेलू उत्पादन की सुरक्षा बनी रहे।

    गोयल ने बताया कि अमेरिका ने भारत के लिए जिन वस्तुओं पर 0% टैरिफ लागू किया है, उनमें शामिल हैं:
    जेम्स और डायमंड्स, सोने-चांदी की आभूषण सामग्री
    दवाइयां, फार्मा प्रोडक्ट्स, स्मार्टफोन
    मसाले, चाय, कॉफी, नारियल, नारियल तेल, केस्यू नट्स
    केला, आम, चीनी, पाइनएपल, मशरूम, सब्जियों के रूट्स
    एयरक्राफ्ट और मशीनरी पार्ट्स, एल्यूमिनियम और जिंक ऑक्साइड, मिनरल्स, नेचुरल रबर
    प्रोसेस्ड फल जैसे अमरूद का जेम्स

    उद्योग मंत्री ने कहा कि भारत ने मीट, पोल्ट्री, डेयरी, सोयाबीन, मक्‍का, चावल, गेहूं, ज्वार, बाजरा, रागी, अमरनाथ फल, ग्रीन टी, कोका, चना, एनीमल सीड्स, नॉन-एल्कोहलिक उत्पाद, इथेनॉल और तंबाकू जैसी कृषि और डेयरी वस्तुओं पर किसी भी तरह की रियायत नहीं दी।

    पीयूष गोयल ने बताया कि इस समझौते से अमेरिका का 30 ट्रिलियन डॉलर का मार्केट कम टैरिफ पर खुल गया है। अमेरिकी टैरिफ अब भारत के लिए पड़ोसी देशों की तुलना में बहुत कम है—जैसे चीन पर 35%, वियतनाम 20%, और इंडोनेशिया 19% टैरिफ है, जबकि अमेरिका ने इसे भारत के लिए 18% कर दिया है।

    गोयल ने कहा कि आज का दिन भारत के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। फरवरी 2025 से द्विपक्षीय व्यापार समझौते पर बातचीत शुरू हुई थी, जिसका उद्देश्य भारत और अमेरिका के बीच सालाना 500 बिलियन डॉलर का व्यापार हासिल करना था। इस समझौते से देश के निर्यातकों के लिए नए अवसर खुलेंगे और अमेरिका भारत के लिए सबसे पसंदीदा निर्यात राष्ट्र बन जाएगा।

  • भारत-अमेरिका ट्रेड डील में रूस का तेल नहीं बनेगा बाधा, सरकार ने दिया ये स्‍पष्‍ट जवाब

    भारत-अमेरिका ट्रेड डील में रूस का तेल नहीं बनेगा बाधा, सरकार ने दिया ये स्‍पष्‍ट जवाब


    नई दिल्ली। भारत और अमेरिका के बीच हुए अंतरिम व्यापार समझौते को लेकर रूस से तेल खरीद का मुद्दा चर्चा में है। सवाल यह उठ रहा है कि क्या रूस से तेल की खरीद भारत-अमेरिका ट्रेड डील में कोई पेच खड़ा कर सकती है। इस पर भारतीय विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि देशवासियों की ऊर्जा सुरक्षा सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता है।

    विदेश मंत्रालय ने कहा कि बदलते अंतरराष्ट्रीय हालात और बाजार परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए ऊर्जा स्रोतों में विविधता लाना भारत की रणनीति का अहम हिस्सा है। मंत्रालय ने किसी भी तरह का सीधे-सीधे “हां” या “ना” वाला जवाब देने से परहेज़ किया। वाणिज्य मंत्रालय भी इस मामले में सवालों को विदेश मंत्रालय के पाले में डाल देता है।

    वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने शनिवार को कहा कि इस विषय में जवाब विदेश मंत्रालय देगा। उन्होंने भारत-अमेरिका अंतरिम व्यापार समझौते का ब्योरा देते हुए बताया कि इसमें घरेलू उत्पादकों और कृषि क्षेत्र की महत्वपूर्ण उपजों को पूरी तरह बाहर रखा गया है। इसमें मीट, पोल्ट्री, सोयामील, मक्का, चावल, गेहूं, चीनी और मिलेट्स जैसी वस्तुएं शामिल हैं, ताकि किसानों और घरेलू उत्पादन पर कोई असर न पड़े।

    विदेश मंत्रालय के अनुसार, अमेरिका ने भारत पर 25 प्रतिशत दंडात्मक आयात शुल्क हटा दिया है, जो रूस से कच्चे तेल की खरीद पर लगाया गया था। अमेरिका ने यह कदम भारत के प्रयासों और अगले 10 वर्षों में रक्षा सहयोग विस्तार के फैसले के बाद उठाया। अमेरिका का कहना है कि भारत ने रूस से तेल के प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष आयात को बंद करने की प्रतिबद्धता जताई है और वह अमेरिका से ऊर्जा उत्पादों की खरीद करेगा।विदेश मंत्रालय ने बार-बार दोहराया कि भारत के सभी कदम ऊर्जा सुरक्षा को ध्यान में रखकर उठाए गए हैं और आगे भी इसी उद्देश्य के तहत रणनीति बनाई जाएगी।