क्या है पैक्स सिलिका और इसका उद्देश्य
भारत के लिए क्यों अहम है यह कदम
अमेरिका का स्पष्ट संकेत
भारत का सेमीकंडक्टर विजन

भारत के लिए क्यों अहम है यह कदम
अमेरिका का स्पष्ट संकेत
भारत का सेमीकंडक्टर विजन

मुझे नोबेल की कोई परवाह नहींट्रंप का यू-टर्न
अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने कई बार शांति नोबेल पुरस्कार की इच्छा जाहिर की थीलेकिन अब उन्होंने पूरी तरह पलटी ले ली है। उन्होंने कहा कि उन्हें नोबेल पुरस्कार की कोई परवाह नहीं है। यह बयान उस चिट्ठी के लीक होने के बाद आयाजो उन्होंने नॉर्वे के प्रधानमंत्री को लिखी थी। इसमें उन्होंने स्पष्ट किया कि दुनिया में शांति की चिंता उनके लिए कोई बड़ी बात नहीं हैक्योंकि उन्हें शांति का नोबेल पुरस्कार तो मिला ही नहीं।
जामिया प्रोफेसर पर हमलाआदिवासी युवक घायल
दिल्ली की जामिया मिलिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी का एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ है। इसमें एक एसोसिएट प्रोफेसर ने अनुसूचित जनजाति के एक कर्मचारी को जमकर पीटामुंह भी तोड़ दिया और जातिसूचक गालियां दीं। इस मामले में पुलिस को मेडिकल रिपोर्ट और अन्य सबूतों के साथ लिखित शिकायत दर्ज कराई गई है।
एलन मस्क के नाम पर ठगीशिमला का शख्स हुआ लाखों का शिकार
हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला से ठगी का मामला सामने आया है। ठगों ने एलन मस्क के नाम का इस्तेमाल कर शख्स को फंसाया और लाखों रुपये ठग लिए। ठगी के चक्कर में पीड़ित को टेस्ला कारनकद राशि और 2.3 करोड़ रुपये के सोने का लालच दिया गया।
दिल्ली-NCR में GRAP-4 हटायास्टेज-3 प्रतिबंध जारी
दिल्ली-एनसीआर में प्रदूषण नियंत्रण के लिए लागू GRAP-4 प्रतिबंध हटा दिए गए हैं। वायु गुणवत्ता में सुधार के कारण यह फैसला लिया गया है। हालांकि स्टेज-1स्टेज-2 और स्टेज-3 के तहत लगाए गए कुछ प्रतिबंध अभी भी जारी रहेंगे।आज की इन खबरों ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति और घरेलू मुद्दों पर लोगों की निगाहें टिकाए रखीं। रूस और अमेरिका की बयानबाजीशिक्षा संस्थानों में हिंसा और ठगी जैसे मामले लगातार चर्चा में बने हुए हैं

स्वच्छ ऊर्जा और जलवायु प्रतिबद्धता
ड्राफ्ट नीति भारत की जलवायु प्रतिबद्धताओं के अनुरूप भी है। इसके तहत 2030 तक कार्बन उत्सर्जन की तीव्रता को 2005 के स्तर से 45 प्रतिशत कम करने और 2070 तक नेट-जीरो उत्सर्जन का लक्ष्य हासिल करने की योजना है। इसके लिए स्वच्छ और कम कार्बन वाली ऊर्जा की ओर तेजी से बढ़ना जरूरी बताया गया है।
राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर योजना
विद्युत मंत्रालय ने बताया कि नीति लागू होने के बाद यह 2005 की एनईपी की जगह लेगी। इसके तहत बिजली की मांग को समय पर पूरा करने के लिए डिस्कॉम और एसएलडीसी राज्य स्तर पर रिसोर्स एडिक्वेसी (आरए) प्लान तैयार करेंगे। वहीं, केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण (CEA) पूरे देश के लिए एक राष्ट्रीय योजना बनाएगा।
बिजली दरों और सब्सिडी सुधार
ड्राफ्ट नीति में कहा गया है कि बिजली टैरिफ को उपयुक्त इंडेक्स से जोड़ा जाना चाहिए, जिससे हर साल अपने आप संशोधन हो सके। इसके साथ ही फिक्स्ड लागत की भरपाई धीरे-धीरे डिमांड चार्ज के जरिए की जाएगी, ताकि अलग-अलग उपभोक्ताओं पर सब्सिडी का बोझ कम हो।
उद्योगों के लिए राहत और प्रतिस्पर्धा बढ़ाना
नीति में सुझाव दिया गया है कि मैन्युफैक्चरिंग उद्योग, रेलवे और मेट्रो रेलवे को क्रॉस-सब्सिडी और अतिरिक्त शुल्क से छूट दी जाए। इससे भारतीय उत्पादों की प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी और लॉजिस्टिक्स लागत कम होगी। साथ ही जिन उपभोक्ताओं का बिजली लोड 1 मेगावाट या उससे अधिक है, उनके लिए कुछ मामलों में यूनिवर्सल सर्विस ऑब्लिगेशन से छूट दी जा सकती है।
विवाद निपटान और उपभोक्ता संरक्षण
ड्राफ्ट नीति में विवाद निपटान व्यवस्था को मजबूत करने पर जोर दिया गया है, ताकि बिजली से जुड़े विवाद जल्दी सुलझें और उपभोक्ताओं पर आर्थिक बोझ कम हो।
नवीकरणीय ऊर्जा को बढ़ावा
नीति में रिन्यूएबल ऊर्जा को बढ़ावा देने के लिए बाजार आधारित तरीके अपनाने और कैप्टिव पावर प्लांट्स के जरिए नई क्षमता जोड़ने का सुझाव दिया गया है। छोटे उपभोक्ताओं के लिए स्टोरेज सुविधा डिस्कॉम के जरिए उपलब्ध कराई जाएगी, जिससे लागत कम होगी। इसके अलावा उपभोक्ता डिस्ट्रिब्यूटेड रिन्यूएबल एनर्जी (DRE) से बची हुई बिजली का व्यापार कर सकेंगे।
परमाणु ऊर्जा में लक्ष्य
शांति अधिनियम 2025 के तहत नीति में एडवांस न्यूक्लियर तकनीक, मॉड्यूलर रिएक्टर और छोटे परमाणु रिएक्टर का इस्तेमाल बढ़ाने और उद्योगों द्वारा परमाणु ऊर्जा का उपयोग कर 2047 तक 100 गीगावाट न्यूक्लियर ऊर्जा क्षमता हासिल करने की सिफारिश की गई है।
इतिहास और प्रगति
पहली राष्ट्रीय विद्युत नीति 2005 में बिजली की कमी, सीमित पहुंच और कमजोर ढांचे जैसी समस्याओं को दूर करने का लक्ष्य रखा गया था। तब से भारत के विद्युत क्षेत्र में अभूतपूर्व प्रगति हुई है। सरकार का कहना है कि ड्राफ्ट एनईपी 2026 एक ऐसा पूरा खाका है, जिससे देश के लोगों को सस्ती, भरोसेमंद और उच्च गुणवत्ता की बिजली मिल सकेगी।

दूसरे राउंड की बढ़त और रिकॉर्ड तोड़ जीत
दूसरे राउंड में सबालेंका ने फिर जोरदार प्रदर्शन करते हुए 4-0 से बढ़त बनाई और अंततः 74 मिनट में मैच जीतकर तीसरे राउंड में जगह पक्की की। अब उनका मुकाबला 28वीं सीड एम्मा राडुकानू या अनास्तासिया पोटापोवा से होगा। इस जीत के साथ सबालेंका ने अपनी 25वीं एकल मैच जीत दर्ज की और वह 2000 के बाद यह उपलब्धि हासिल करने वाली छठी महिला खिलाड़ी बन गई हैं। इस मुकाम से पहले सेरेना विलियम्स, लिंडसे डेवनपोर्ट, जस्टिन हेनिन, ऐश बार्टी और इगा स्वियाटेक तक ही पहुँच पाई थीं। दो बार की ऑस्ट्रेलियन ओपन चैंपियन सबालेंका ने लगातार सातवीं जीत दर्ज की और 2026 का सीजन बेहतरीन अंदाज में शुरू किया। वह लगातार छठे साल तीसरे राउंड तक पहुँच रही हैं और दूसरे राउंड में उनका रिकॉर्ड भी 7-0 का है।
एलिना स्वितोलिना का फॉर्म जारी: तीसरे राउंड में जगह बनाई
सबालेंका की जीत के साथ ही एलिना स्वितोलिना ने भी 2026 सीजन में अपने शानदार फॉर्म को जारी रखा। उन्होंने लिंडा क्लिमोविकोवा को 7-5, 6-1 से हराकर तीसरे राउंड में प्रवेश किया। अब उनका सामना डायना श्नैडर से होगा। श्नैडर ने ऑस्ट्रेलियाई वाइल्डकार्ड टैलिया गिब्सन के खिलाफ 3-6, 7-5, 6-3 से जीत दर्ज की, जिसमें उन्होंने दो मैच पॉइंट बचाए और जीत सुनिश्चित की।
महिलाओं के सिंगल्स ड्रॉ में रोमांच और आगे की लड़ाई
सबालेंका और स्वितोलिना की जीत ने महिलाओं के सिंगल्स ड्रॉ को और रोमांचक बना दिया है। तीसरे राउंड में उनका प्रदर्शन यह तय करेगा कि कौन ग्रैंड स्लैम में अगले राउंड में दबदबा दिखा पाएगा। ऑस्ट्रेलियन ओपन में अब तक की इस शानदार शुरुआत के बाद सबालेंका की गति और फोकस उन्हें शीर्ष फेवरेट बनाए हुए हैं। वहीं, स्वितोलिना की रणनीति और अनुभव भी उनके लिए मैचों को आसान बनाने में मदद कर रही है।
रोचक तथ्य और रिकॉर्ड्स
सबालेंका की लगातार सातवीं जीत, लगातार छठे साल तीसरे राउंड तक पहुंचना और 25वीं एकल मैच जीत ने उन्हें महिला टेनिस की चमकती हुई सितारा बना दिया है। वहीं, स्वितोलिना की जीत में लगातार अच्छा प्रदर्शन और मैच पॉइंट बचाने की क्षमता ने उनके आत्मविश्वास को और बढ़ा दिया है। इस टूर्नामेंट में अब हर मैच महत्वपूर्ण है और तीसरे राउंड में आने वाले मुकाबले दर्शकों के लिए रोमांचक होंगे।

उन्होंने कहा, ‘‘हम फिलहाल इस प्रस्ताव के सभी विवरणों का अध्ययन कर रहे हैं और सभी विवरणों को स्पष्ट करने के लिए अमेरिकी पक्ष से संपर्क किए जाने की उम्मीद है।’’ कई अन्य देशों को भी अमेरिका से इस संस्था में शामिल होने के प्रस्ताव मिले हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और उनके पाकिस्तानी समकक्ष शहबाज शरीफ को भी शांति बोर्ड में शामिल होने का आमंत्रण मिला है।
रूस के ‘चैनल-1 टीवी’ ने सोमवार को अपने राजनीतिक कार्यक्रम ‘प्रयामोई एफिर’ (लाइव ब्रॉडकास्ट) में कहा, ‘‘रूस गाजा शांति बोर्ड को संयुक्त राष्ट्र संगठन का प्रतिद्वंद्वी बनाने की अमेरिकी कोशिश के रूप में देखता है, जिसका अधिकार क्षेत्र अधिक व्यापक होगा।’’
क्या हैं रूस को आमंत्रण देने के मायने
रूस को आमंत्रण देने के कई मायने निकाले जा रहे हैं।

कहां बोल रहे थे मुनीर
इस दौरान पत्रकारों से बात करते हुए आसिम मुनीर ने कहा कि पाकिस्तान तेजी से अपने लक्ष्य की तरफ बढ़ रहा है।
अंतर्राष्ट्रीय पहचान की बात
इतना ही नहीं, मुनीर ने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पाकिस्तान का दबदबा बढ़ाने की बात की। संभवत: वह डोनाल्ड ट्रंप के साथ वाइट हाउस में मीटिंग और डिनर की तरफ इशारा कर रहे थे। इसके अलावा पाकिस्तान के गाजा पीस में शामिल होने का भी उन्होंने जिक्र किया। इतना ही नहीं, मुनीर ने यह भी बताने की कोशिश की कि मई 2025 में भारत के साथ युद्ध में पाकिस्तान हावी रहा था।
कैसे अलग हैं मुनीर
बता दें कि फील्ड मार्शल आसिम मुनीर अपने पूर्ववर्तियों से काफी अलग हैं। पिछले आर्मी चीफ ज्यादातर सैंडहर्स्ट-प्रशिक्षित अधिकारी थे, जो औपचारिक रूप से राजनीति और धर्म दोनों से दूर रहते थे, और उन्हें पश्चिमी संगीत और व्हिस्की का शौक था। इसके उलट मुनीर, हाफिए-ए-कुरान हैं। हाफिज-ए-कुरान उसे कहते हैं, जिसे कुरान याद है। ऐसे में मुनीर के लिए धर्म एक बड़ा आधार है। मुनीर, मिलिट्री इंटेलीजेंस और आईएसआई दोनों के मुखिया हैं। उनके पद ग्रहण करने के बाद से ही पाकिस्तानी सेना में धर्म की तरफ रुझान दिखाई देने लगा है।
सेना में धर्म का बढ़ता प्रभाव
मुनीर के नेतृत्व में, सेना ने न केवल राज्य की रक्षा करने के रूप में ही नहीं, बल्कि इस्लाम की रक्षा करने के रूप में भी अधिक स्पष्ट रूप से प्रस्तुत किया है। इसमें 7वीं सदी के अरबी और इस्लामी प्रतीकों का भारी इस्तेमाल किया गया है। सशस्त्र विरोधियों, जिनमें बलोचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा के विद्रोही शामिल हैं, को ‘फितना अल-खवारिज’ और ‘फितना अल-हिंदुस्तान’ कहा गया है, जिससे उन्हें धर्मभ्रष्ट विद्रोही और भारतीय दलाल के रूप में चित्रित किया गया है।

चीनी राजदूत याओ वेन ने सोमवार को रंगपुर जिले के कौनिया उपजिला में तीस्ता नदी के कटाव प्रभावित क्षेत्र का दौरा किया। इस दौरान बांग्लादेश की पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन सलाहकार सैयदा रिजवाना हसन उनके साथ थीं।
बांग्लादेश की जल संसाधन सलाहकार सैयदा रिजवाना हसन ने कहा कि चीन तीस्ता मास्टर प्लान (TMP) को जल्द से जल्द लागू करने का इच्छुक है। उनके अनुसार- बांग्लादेश और चीन दोनों ही TMP को अमल में लाने के लिए प्रतिबद्ध हैं। हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि परियोजना की जांच-परख (स्क्रूटनी) की प्रक्रिया अभी पूरी नहीं हुई है, इसलिए फिलहाल काम शुरू करना संभव नहीं है।
भारत और पश्चिम बंगाल की चिंताएं
बांग्लादेश के उत्तरी जिलों में कृषि और आजीविका के लिए तीस्ता नदी जीवनरेखा मानी जाती है। लेकिन भारत के लिए- खासतौर पर पश्चिम बंगाल के लिए भी यह नदी उतनी ही अहम है। इसी कारण तीस्ता जल-बंटवारे को लेकर दशकों से बातचीत चल रही है, मगर पश्चिम बंगाल सरकार की चिंताओं के चलते अंतिम समझौता अब तक नहीं हो सका है।
रविवार को चीनी राजदूत याओ वेन और बांग्लादेश के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार खलीलुर रहमान के बीच हुई बैठक के बाद यूनुस की प्रेस विंग ने सोशल मीडिया मंच X पर बताया- दोनों पक्षों ने साझा हितों के मुद्दों पर विचारों का आदान-प्रदान किया और बांग्लादेश–चीन की दीर्घकालिक मित्रता व विकास सहयोग की पुष्टि की।
पोस्ट के मुताबिक, बातचीत में तीस्ता रिवर कॉम्प्रिहेंसिव मैनेजमेंट एंड रेस्टोरेशन प्रोजेक्ट और प्रस्तावित बांग्लादेश–चीन फ्रेंडशिप हॉस्पिटल जैसे मुद्दे भी शामिल थे। इसमें यह भी कहा गया कि चीनी राजदूत ने परियोजना क्षेत्र का दौरा करने की जानकारी दी और तकनीकी मूल्यांकन को तेजी से पूरा करने की चीन की प्रतिबद्धता दोहराई।
बांग्लादेश सरकार ने बताया कि चीनी राजदूत ने देश के लोकतांत्रिक बदलाव के लिए अपने देश का समर्थन जताया और आगामी राष्ट्रीय चुनावों के सफल आयोजन की शुभकामनाएं भी दीं। गौरतलब है कि 2024 में मुख्य सलाहकार नियुक्त किए गए मुहम्मद यूनुस ने 2025 में चीन में दिए एक इंटरव्यू में बीजिंग से बांग्लादेश में मजबूत आर्थिक ढांचे के निर्माण का आह्वान किया था। उन्होंने बांग्लादेश को क्षेत्र में समुद्र का एकमात्र संरक्षक बताते हुए उसके रणनीतिक महत्व का जिक्र किया था।
सिलीगुड़ी कॉरिडोर भारत के लिए रणनीतिक गला है, क्योंकि कोई भी व्यवधान पूर्वोत्तर के लगभग 5 करोड़ लोगों की सुरक्षा को खतरे में डाल सकता है। यह क्षेत्र नेपाल, भूटान, बांग्लादेश और चीन से घिरा हुआ है। हाल के महीनों में बांग्लादेश द्वारा लालमोनिरहाट पुराने एयरबेस को सक्रिय करने और चीन की संभावित भागीदारी की खबरें भी भारत के लिए चिंता का विषय रही हैं।

बता दें कि पिटुफिक स्पेस बेस एक अहम अमेरिकी मिलिट्री इंस्टॉलेशन और कम्युनिकेशन हब है। यहां एक मिसाइल वॉर्निंग सिस्टम भी है जो उत्तर अमेरिका की सुरक्षा के लिए बहुत जरूरी है। वहीं हाई आर्कटिक में इसकी लोकेशन को वजह से इस क्षेत्र में इसका अहम रणनीतिक महत्व है।
अमेरिका से पहले डेनमार्क ने भी ग्रीनलैंड में अपनी मिलिट्री मौजूदगी बढ़ा दी है। रिपोर्ट्स के मुताबिक सोमवार को कई डेनिश सैनिकों और मिलिट्री उपकरणों को ले जाने वाले कई विमान द्वीप पर उतारे गए हैं। डेनिश रक्षा बलों ने बताया है कि देश की सेना प्रमुख के साथ सैनिकों की एक बड़ी टुकड़ी को नुक और कांगेरलुसुआक में तैनात किया गया है। इससे पहले यहां डेनिश सुरक्षा बलों के नेतृत्व में एक मल्टीनेशनल मिलिट्री एक्सरसाइज भी हुआ था।
ट्रंप ने लगाया 10 फीसदी टैरिफ
इससे पहले अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने डेनमार्क, फिनलैंड, फ्रांस, जर्मनी, नीदरलैंड्स, नॉर्वे, स्वीडन और ब्रिटेन पर 10 फीसदी अतिरिक्त आयात शुल्क लगाने की घोषणा की थी। ट्रंप ने इन देशों द्वारा ग्रीनलैंड की राजधानी नूक में ‘ऑपरेशन आर्कटिक एंड्योरेंस’ नाम के एक सैन्य अभ्यास के तहत सैनिक तैनात करने के बाद यह कदम उठाया।
नाटो देशों का कहना है कि यह तैनाती ग्रीनलैंड की स्वायत्तता के समर्थन के लिए की गई थी, खासकर उन रिपोर्टों के बाद, जिनमें दावा किया गया था कि ट्रंप प्रशासन संसाधन-समृद्ध इस आर्कटिक द्वीप को “राष्ट्रीय सुरक्षा कारणों” से अपने अधीन करना चाहता है। इसके जवाब में ट्रंप ने कहा कि यह आयात शुल्क एक फरवरी से लागू होगा और एक जून से बढ़ाकर 25 प्रतिशत कर दिया जाएगा। उन्होंने यह भी कहा कि यह शुल्क तब तक लागू रहेगा जब तक ग्रीनलैंड की पूर्ण और सम्पूर्ण खरीद को लेकर कोई समझौता नहीं हो जाता।
यूरोपीय नेताओं ने प्रस्तावित आयात शुल्क की कड़ी निंदा की है और चेतावनी दी कि इस तरह के कदम अटलांटिक पार संबंधों को कमजोर कर सकते हैं और एक खतरनाक गिरावट के चक्र को जन्म दे सकते हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि डेनमार्क के नेतृत्व वाला सैन्य अभ्यास आवश्यक सुरक्षा जरूरतों के जवाब में है और इससे किसी को कोई खतरा नहीं है।

सांसदों के लेटर में क्या कहा गया
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को यह पत्र रिपब्लिकन सीनेटरों ने लिखे हैं। इनमें से एक हैं मोंटाना से स्टीव डेन्स और दूसरे हैं उत्तरी डकोटा से केविन क्रेमर। पत्र में कहा गया है कि उनके राज्य दो बड़े दाल उत्पादकों में से हैं, जिसमें मटर भी शामिल है। भारत इनका सबसे बड़ा उपभोक्ता है, जो विश्व का 27 फीसदी है। इसके मुताबिक भारत में लेंटिल्स, चिकपीज, सूखी दालों और मटर की सबसे ज्यादा खपत है। लेकिन भारत ने इन श्रेणियों में अमेरिकी निर्यात पर टैरिफ लगा रखा है। अमेरिकी सांसदों ने कहा कि भारत ने पिछले साल 30 अक्टूबर को पीली दाल पर भी 30 फीसदी टैरिफ लगा दिया।
पीएम मोदी से बात करने की सलाह
अमेरिकी सांसदों ने भारत द्वारा लगाए गए टैरिफ को अनफेयर बताते हुए अमेरिकी दाल उत्पादकों को नुकसान होने की बात कही है। साथ ही अमेरिकी सांसदों ने राष्ट्रपति ट्रंप को सलाह दी है कि वह दाल पर भारत द्वारा लगाए गए टैरिफ को लेकर पीएम मोदी से बात करें। ताकि दोनों देशों के बीच एक सहयोग बने, जिससे अमेरिकी उत्पादकों और भारतीय उपभोक्ताओं दोनों को फायदा मिल सके। दोनों सीनेटरों ने अपने राज्यों में बेहतर कृषि उत्पादों के लिए अमेरिकी राष्ट्रपति का शुक्रिया भी अदा किया।
लंबे समय से तनाव
बता दें कि टैरिफ के मुद्दे पर भारत और अमेरिका के बीच लंबे समय से तनाव कायम है। इसकी शुरुआत अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा भारत पर 50 प्रतिशत शुल्क (टैरिफ) लगाने के बाद हुई। इस टैरिफ में रूसी कच्चे तेल की खरीद पर 25 प्रतिशत का अतिरिक्त शुल्क भी शामिल है। इन तनावों के बीच अमेरिकी अधिकारियों द्वारा भारत के प्रति गलत टिप्पणियां माहौल को और खराब कर रही हैं। कुछ दिन पहले ही वाइट हाउस के व्यापार सलाहकार पीटर नवारो ने एक बार फिर भारत की आलोचना करते हुए सवाल उठाया कि अमेरिका के नागरिक भारत में कृत्रिम मेधा (एआई) के लिए भुगतान क्यों कर रहे हैं?

रूस का डर और नाटो की ‘नाकामी’ का तर्क ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘ट्रुथ सोशल’ पर एक के बाद एक कई पोस्ट साझा करते हुए डेनमार्क पर गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने लिखा कि “नाटो पिछले 20 वर्षों से डेनमार्क को चेतावनी दे रहा है कि उसे ग्रीनलैंड से रूसी खतरे को दूर करना होगा, लेकिन डेनमार्क इसमें विफल रहा है।” ट्रंप का तर्क है कि आर्कटिक क्षेत्र में रूस और चीन की बढ़ती सैन्य मौजूदगी अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए सीधा खतरा है। उन्होंने दोटूक शब्दों में कहा,अब समय आ गया है, और यह होकर रहेगा
टैरिफ के जरिए आर्थिक ब्लैकमेलिंग ट्रंप ने डेनमार्क और उसका समर्थन करने वाले सात अन्य नाटो सहयोगियोंब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, नॉर्वे, स्वीडन, फिनलैंड और नीदरलैंडपर कड़े आर्थिक प्रतिबंधों का जाल बुनना शुरू कर दिया है।1 फरवरी 2026 से: इन देशों से आने वाले सभी सामानों पर 10% अतिरिक्त टैरिफ लगाने का आदेश। जून 2026 से: यदि ग्रीनलैंड पर अमेरिका की शर्तें नहीं मानी गईं, तो यह शुल्क बढ़ाकर 25% कर दिया जाएगा। यूरोपीय नेताओं ने इसे ‘खुली ब्लैकमेलिंग’ करार दिया है।
‘गोल्डन डोम’ के लिए ग्रीनलैंड क्यों है जरूरी ट्रंप ने ग्रीनलैंड के प्रति अपनी जिद के पीछे एक बड़ा सैन्य कारण बताया हैगोल्डन डोम मल्टी-लेयर मिसाइल डिफेंस सिस्टम। ट्रंप प्रशासन का मानना है कि अमेरिका को एक अभेद्य सुरक्षा कवच प्रदान करने के लिए ग्रीनलैंड की भौगोलिक स्थिति अनिवार्य है। यहाँ स्थित पिटुफ़िक स्पेस बेस पूर्व में थूले एयर बेस को अपग्रेड कर पूरे अमेरिका को रूसी हाइपरसोनिक मिसाइलों से सुरक्षित करने की योजना है। ट्रंप ने कहा कि लीज पर ली गई जमीन सुरक्षा के लिए पर्याप्त नहीं है, अमेरिका को “स्थायी स्वामित्व” चाहिए।
यूरोप का जवाब: ‘बाजुका’ तैयार है डेनमार्क की प्रधानमंत्री मेटे फ्रेडरिकसन और ग्रीनलैंड के प्रधानमंत्री म्यूटे बोरुप एगेडे ने एक बार फिर दोहराया है कि ग्रीनलैंड बिक्री के लिए नहीं है। वहीं, यूरोपीय संघ EU ने भी कड़ा रुख अपनाते हुए अपने ‘ट्रेड बाजुका एंटी-कोर्शन इंस्ट्रूमेंट को सक्रिय करने की धमकी दी है। यूरोपीय संघ के नेताओं का कहना है कि वे किसी भी देश के आगे घुटने नहीं टेकेंगे और अंतरराष्ट्रीय कानून की रक्षा करेंगे।इस घटनाक्रम ने नाटो के अस्तित्व पर ही संकट खड़ा कर दिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि ट्रंप ने हार्ड वे बल प्रयोग या कड़े प्रतिबंध का रास्ता अपनाया, तो यह दूसरे विश्व युद्ध के बाद बनी वैश्विक व्यवस्था का अंत हो सकता है।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ग्रीनलैंड पर नियंत्रण पाने की अपनी महात्वाकांक्षा को अब एक बेहद आक्रामक और रणनीतिक मोड़ दे दिया है। सोमवार को ट्रंप ने सीधे तौर पर डेनमार्क को आखिरी चेतावनी देते हुए कहा कि ग्रीनलैंड पर अमेरिकी कब्जे का समय आ गया है। ट्रंप ने इस बार न केवल क्षेत्रीय संप्रभुता को चुनौती दी, बल्कि रूस और चीन के खतरे का हवाला देते हुए नाटो NATO की प्रासंगिकता पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। ट्रंप की इस आक्रामकता के बाद ट्रांसअटलांटिक संबंधों में शीत युद्ध के बाद की सबसे बड़ी दरार नजर आ रही है।