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  • युद्ध की आशंका के बीच अमेरिका-इजरायल का ईरान पर बड़ा हमला, तनाव चरम पर!

    युद्ध की आशंका के बीच अमेरिका-इजरायल का ईरान पर बड़ा हमला, तनाव चरम पर!



    नई दिल्ली। अमेरिका और इजरायल ने 28 फरवरी 2026 को एक संयुक्त सैन्य हमला शुरू किया, जिसे कोड‑नेम “Operation Epic Fury / Lion’s Roar” कहा जा रहा है। इस बड़े ऑपरेशन में दोनों देशों ने ईरान के कई शहरों और सैन्य‑रणनीतिक ठिकानों को निशाना बनाया, जिसमें तेहरान, इस्फ़हान, नतांज़ और फ़ोर्डो सहित कई प्रमुख लक्ष्य शामिल थे।

    अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने ईरानी जनता से अपील की कि वे “अपने भाग्य की बागडोर अपने हाथ में लें” और **1979 से शासन कर रहे इस्लामी नेतृत्व के खिलाफ विद्रोह करें।” इस हमले को उन्होंने “आगामी खतरों को ख़त्म करने” और ईरान की सैन्य क्षमता को क्षतिग्रस्थ बनाने का लक्ष्य बताया।

    हमले की मौजूदा स्थिति
    संयुक्त हमले में 200 से अधिक लक्ष्य पर हमला किया गया, और ईरानी सुरक्षा नेतृत्व के कई वरिष्ठ अधिकारी मारे गए या प्रभावित हुए हैं।

    ईरान की ओर से जवाबी मिसाइलें दागी गईं, जिसमें मिसाइल और ड्रोन हमले शामिल हैं और कई देशों में (जैसे अरब अमीरात, कुवैत, बहरैन और कतर) सुरक्षा व्यवस्था सक्रिय कर दी गई है।

    ईरानी नागरिकों में भय और पैनिक फैल चुका है; लोगों ने राजधानी से बाहर भागने और पेट्रोल आदि सामान जमा करने जैसे हालात देखे जा रहे हैं।
    नागरिक असर और क्षेत्रीय तनाव

    बड़े पैमाने पर विस्फोटों और हमलों के कारण ईरान में भारी जनहानि और जन‑जीवन प्रभावित हुआ है, और कई देशों ने अपने नागरिकों को सावधानी बरतने की चेतावनी जारी की है। इस तनाव के चलते कई देशों का एयरस्पेस भी अस्थायी रूप से बंद हुआ है और यात्रियों की उड़ानों में व्यवधान आया है।
    ये हमला एक मध्य पूर्व में सबसे बड़े सैन्य संघर्षों में से एक माना जा रहा है, जो पहले की 12‑दिन की जंग के बाद क्षेत्रीय अस्थिरता को और बढ़ा रहा है।

  • खामेनेई के निधन के बाद ईरान में सत्ता संकट, सेना में भ्रम; नए सुप्रीम लीडर की जल्द नियुक्ति की मांग तेज

    खामेनेई के निधन के बाद ईरान में सत्ता संकट, सेना में भ्रम; नए सुप्रीम लीडर की जल्द नियुक्ति की मांग तेज

    नई दिल्ली । ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई के निधन की पुष्टि के बाद देश की सत्ता और सैन्य ढांचे में गहरा संकट उभर आया है। ईरानी मीडिया में आई खबरों के अनुसार खामेनेई के 47 साल लंबे प्रभावशाली नेतृत्व का अंत होते ही इस्लामिक गणतंत्र की चेन ऑफ कमांड में अस्थिरता और भ्रम की स्थिति पैदा हो गई है। अब सत्ता के शीर्ष पद पर नए नेतृत्व की नियुक्ति को लेकर अंदरूनी हलचल तेज हो गई है।

    रिपोर्टों के मुताबिक इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड्स कॉर्प्स ने नए सुप्रीम लीडर के चयन की प्रक्रिया को तेज करने के लिए दबाव बनाना शुरू कर दिया है। सूत्रों का दावा है कि IRGC कानूनी प्रक्रिया से हटकर जल्द से जल्द नए नेता को तख्त पर बैठाने के पक्ष में है। सामान्यतः सुप्रीम लीडर का चुनाव संवैधानिक संस्था असेंबली ऑफ एक्सपर्ट्स द्वारा किया जाता है लेकिन जारी हवाई हमलों और अस्थिर सुरक्षा हालात के कारण उसका सत्र बुलाना मुश्किल बताया जा रहा है।

    बताया जा रहा है कि IRGC का बचा हुआ कमांड ढांचा 1 मार्च की सुबह तक नए नेतृत्व पर अंतिम निर्णय चाहता है। सूत्रों का कहना है कि खामेनेई की मौत के बाद सुरक्षा और सैन्य तंत्र में तालमेल की कमी साफ दिख रही है। आदेशों के प्रवाह में बाधा आ रही है और कुछ हिस्सों में कमांड संरचना लगभग बिखर गई है। इससे संकट प्रबंधन और जमीनी स्तर पर फैसले लेने की क्षमता प्रभावित हो सकती है।

    रिपोर्ट्स में यह भी सामने आया है कि कुछ सैन्य कमांडर और निचले रैंक के कर्मी अपने बेस पर रिपोर्ट नहीं कर रहे हैं। इस स्थिति ने IRGC की चिंता और बढ़ा दी है। आशंका जताई जा रही है कि रविवार सुबह तक देश के अलग-अलग हिस्सों में लोग सड़कों पर उतर सकते हैं और विरोध प्रदर्शनों का नया दौर शुरू हो सकता है। राजनीतिक अनिश्चितता और संभावित जन असंतोष ने हालात को और जटिल बना दिया है।

    इस पूरे घटनाक्रम के बीच अमेरिका की प्रतिक्रिया भी सामने आई है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि ईरान पर हालिया हमले विफल कूटनीतिक प्रयासों का परिणाम थे। अधिकारी के अनुसार अमेरिका ने ईरान को स्थायी रूप से मुफ्त परमाणु ईंधन देने की पेशकश की थी लेकिन तेहरान ने यूरेनियम संवर्धन की अपनी क्षमता छोड़ने से इनकार कर दिया। अमेरिका इसे परमाणु हथियार विकसित करने की संभावित कोशिश के रूप में देखता रहा है। साथ ही ईरान ने बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम और क्षेत्रीय उग्रवादी समूहों के समर्थन जैसे मुद्दों पर भी बातचीत से दूरी बनाए रखी।

    खामेनेई की मौत ऐसे समय में हुई है जब ईरान पहले से ही बाहरी सैन्य दबाव और आंतरिक असंतोष का सामना कर रहा है। नेतृत्व का यह खालीपन न केवल राजनीतिक बल्कि सैन्य और वैचारिक स्तर पर भी बड़ा बदलाव ला सकता है। अब नजर इस बात पर टिकी है कि क्या ईरान संवैधानिक प्रक्रिया के तहत नया सुप्रीम लीडर चुनेगा या IRGC के दबाव में कोई त्वरित और असाधारण फैसला लिया जाएगा।

  • होर्मुज जलडमरूमध्य पर ताला: ईरान के फैसले से तेल सप्लाई पर संकट, दुनिया में बढ़ी युद्ध की आशंका

    होर्मुज जलडमरूमध्य पर ताला: ईरान के फैसले से तेल सप्लाई पर संकट, दुनिया में बढ़ी युद्ध की आशंका


    नई दिल्ली । मध्य पूर्व में बढ़ते टकराव के बीच ईरान ने दुनिया के सबसे अहम समुद्री तेल मार्ग होर्मुज जलडमरूमध्य को बंद करने का कदम उठाया है। रिपोर्टों के अनुसार अब इस जलडमरूमध्य से किसी भी जहाज को गुजरने की अनुमति नहीं दी जा रही। यह फैसला अमेरिका और इजरायल की ओर से ईरान पर किए गए हालिया हमलों के जवाब में लिया गया बताया जा रहा है। हालांकि तेहरान ने आधिकारिक तौर पर इसकी पुष्टि नहीं की है लेकिन समुद्री सुरक्षा एजेंसियों को मिले संदेशों ने वैश्विक बाजारों में हलचल मचा दी है।

    यूरोपीय संघ की नौसैनिक मिशन ऑपरेशन एस्पाइड्स के एक अधिकारी के मुताबिक शनिवार को होर्मुज से गुजरने वाले जहाजों को वीएचएफ रेडियो पर चेतावनी संदेश मिला कि जलडमरूमध्य से कोई भी पोत पार नहीं हो सकता। ये संदेश कथित तौर पर इस्लामिक रिवॉल्यूशनरी गार्ड्स कॉर्प्स की ओर से प्रसारित किए गए। इसी बीच यूके मारिटाइम ट्रेड ऑपरेशंस ने भी जहाजों को अतिरिक्त सतर्कता बरतने की सलाह दी है। अमेरिका ने अपने व्यावसायिक जहाजों को खाड़ी क्षेत्र से दूर रहने की चेतावनी जारी की है ताकि किसी संभावित हमले से बचा जा सके।

    होर्मुज जलडमरूमध्य वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति की धुरी है। सऊदी अरब ईरान इराक और संयुक्त अरब अमीरात जैसे प्रमुख तेल उत्पादक देशों का निर्यात इसी मार्ग से होकर ओमान की खाड़ी और अरब सागर तक पहुंचता है। दुनिया की लगभग 20 प्रतिशत तेल आपूर्ति इसी रास्ते से गुजरती है। ऐसे में अगर यह मार्ग बाधित होता है तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल आ सकता है जिसका असर ईंधन परिवहन और महंगाई दर पर पड़ेगा। वैश्विक अर्थव्यवस्था पहले ही अस्थिरता से जूझ रही है ऐसे में यह घटनाक्रम नई चुनौती बनकर उभरा है।

    तनाव की जड़ हालिया सैन्य कार्रवाई मानी जा रही है। अमेरिका और इजरायल ने कथित तौर पर ऑपरेशन एपिक फ्यूरी के तहत ईरान पर बड़े हमले किए। ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई के कार्यालय के पास हमलों की खबरों ने स्थिति को और गंभीर बना दिया। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इन कार्रवाइयों को मेजर कॉम्बैट ऑपरेशंस बताया। जवाब में ईरान ने ट्रुथफुल प्रॉमिस 4 अभियान चलाते हुए इजरायल और अमेरिकी ठिकानों पर मिसाइल हमले किए। कतर यूएई सऊदी अरब और जॉर्डन जैसे अमेरिकी सहयोगी देशों को भी निशाना बनाए जाने की खबरों ने पूरे क्षेत्र में अस्थिरता बढ़ा दी है। तेहरान में धमाके और तेल अवीव में सायरन इस संघर्ष की गंभीरता को दर्शा रहे हैं।

    विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान लंबे समय तक जलडमरूमध्य को पूरी तरह बंद नहीं रख पाएगा क्योंकि इससे उसके अपने तेल निर्यात और अर्थव्यवस्था पर भी असर पड़ेगा। फिर भी यह कदम एक रणनीतिक दबाव बनाने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है। भारत जैसे बड़े तेल आयातक देशों के लिए यह स्थिति चिंताजनक है। यदि कच्चे तेल की कीमतों में तेजी आती है तो घरेलू बाजार में ईंधन महंगा हो सकता है जिससे महंगाई और व्यापार संतुलन पर दबाव बढ़ेगा। कुल मिलाकर होर्मुज जलडमरूमध्य पर बढ़ा यह तनाव न केवल मध्य पूर्व बल्कि पूरी दुनिया की आर्थिक स्थिरता के लिए खतरे की घंटी साबित हो सकता है।

  • जलालाबाद में पाकिस्तानी फाइटर जेट क्रैश, पायलट जिंदा पकड़ा गया अफगानिस्तान-पाक संघर्ष ने लिया खतरनाक मोड़

    जलालाबाद में पाकिस्तानी फाइटर जेट क्रैश, पायलट जिंदा पकड़ा गया अफगानिस्तान-पाक संघर्ष ने लिया खतरनाक मोड़


    नई दिल्ली । अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच जारी सैन्य टकराव शनिवार सुबह उस समय और भड़क उठा जब पूर्वी अफगानिस्तान के शहर जलालाबाद में एक पाकिस्तानी लड़ाकू विमान दुर्घटनाग्रस्त हो गया। अफगान सैन्य और पुलिस सूत्रों के हवाले से समाचार एजेंसी AFP ने दावा किया है कि विमान का पायलट जिंदा पकड़ा गया है और उसे अफगान सेना ने बंदी बना लिया है। इस घटना ने पूरे क्षेत्र में सनसनी फैला दी है और दोनों देशों के बीच जारी संघर्ष को एक निर्णायक और खतरनाक मोड़ पर पहुंचा दिया है।

    प्रत्यक्षदर्शियों और एएफपी के पत्रकारों के मुताबिक शनिवार सुबह शहर खासकर हवाई अड्डे के आसपास दो जोरदार धमाकों की आवाज सुनाई दी। धमाकों से ठीक पहले आसमान में तेज रफ्तार से उड़ते जेट की गड़गड़ाहट सुनाई दी थी। कुछ ही मिनटों में विमान के क्रैश होने की खबर फैल गई। रणनीतिक दृष्टि से बेहद अहम जलालाबाद जो नंगरहार प्रांत की राजधानी है और काबुल से पाकिस्तानी सीमा को जोड़ने वाले मुख्य मार्ग पर स्थित है अब इस संघर्ष का नया केंद्र बनता दिख रहा है। यहां हुआ यह घटनाक्रम सीधे तौर पर पाकिस्तान की सैन्य सक्रियता और अफगानिस्तान के कड़े प्रतिरोध का संकेत माना जा रहा है।

    इस बीच पाकिस्तान सरकार ने भी आक्रामक रुख अपनाया है। पाकिस्तान के राज्य मंत्री तलाल चौधरी ने एक टीवी कार्यक्रम में स्पष्ट कहा कि जब तक तालिबान अपनी गुरिल्ला मानसिकता नहीं छोड़ता पाकिस्तान की नीति में कोई बदलाव नहीं होगा। उन्होंने तीखे शब्दों में कहा यह युद्ध हम जीतेंगे और इसका अंत तय है। अगर यह सीधे रास्ते से हल नहीं हुआ तो हम कठोर दृष्टिकोण अपनाकर इसे पूरी तरह समाप्त करेंगे। उनके इस बयान ने दोनों देशों के बीच तनाव को और बढ़ा दिया है।

    एक ओर सीमा पर तोपों और विमानों की गड़गड़ाहट सुनाई दे रही है वहीं दूसरी ओर अफगानिस्तान कूटनीतिक मोर्चे पर भी सक्रिय हो गया है। अफगान विदेश मंत्रालय के दूसरे राजनीतिक निदेशक जाकिर जलाली के अनुसार अफगानिस्तान वैध और जिम्मेदार सैन्य अभियान के साथ साथ अंतरराष्ट्रीय समुदाय को अपनी स्थिति से अवगत करा रहा है। अफगान अधिकारियों ने तुर्किये कतर और सऊदी अरब के विदेश मंत्रियों से विस्तृत परामर्श किया है। तालिबान प्रशासन इन देशों के माध्यम से यह संदेश देना चाहता है कि उसकी सैन्य कार्रवाई केवल पाकिस्तानी घुसपैठ के जवाब में की जा रही रक्षात्मक कार्रवाई है।

    शुक्रवार को तालिबान वायुसेना द्वारा इस्लामाबाद के नजदीक किए गए हमलों के बाद शनिवार को जलालाबाद में पाकिस्तानी विमान का गिरना और पायलट का पकड़ा जाना पाकिस्तान के लिए बड़ा सैन्य और कूटनीतिक झटका माना जा रहा है। दोनों देशों के बीच संवाद लगभग टूट चुका है और हालात सीमाई झड़प से आगे बढ़कर व्यापक युद्ध की शक्ल लेते दिख रहे हैं। जलालाबाद और आसपास के इलाकों में आम नागरिकों के बीच भय और अनिश्चितता का माहौल है। लोग सुरक्षित स्थानों की तलाश में पलायन को मजबूर हैं जबकि अंतरराष्ट्रीय समुदाय की निगाहें इस तेजी से बिगड़ते घटनाक्रम पर टिकी हुई हैं।

  • युद्ध लंबा चला तो ईरान टिक नहीं पाएगा, चीन का समर्थन भी पर्याप्त नहीं, जाने एक्सपर्ट्स का विश्लेषण

    युद्ध लंबा चला तो ईरान टिक नहीं पाएगा, चीन का समर्थन भी पर्याप्त नहीं, जाने एक्सपर्ट्स का विश्लेषण


    नई दिल्ली। अमेरिका और Iran के बीच बढ़ते सैन्य टकराव और इजरायल पर हुए हमलों के बाद मध्य-पूर्व के कई देशों में युद्ध जैसी स्थिति बन चुकी है। हालांकि रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान के पास इतने संसाधन नहीं हैं कि वह लंबे समय तक अमेरिका और इजरायल जैसे शक्तिशाली देशों का मुकाबला कर सके।

    अमेरिका के तीन प्रमुख लक्ष्य
    सेवानिवृत्त लेफ्टिनेंट जनरल राजेन्द्र सिंह के अनुसार, अमेरिका के ईरान पर हमले के पीछे तीन मुख्य उद्देश्य हैं: ईरान में सत्ता परिवर्तन लाना, उसके मिसाइल कार्यक्रम को नष्ट करना और परमाणु कार्यक्रम को आगे बढ़ने से रोकना। अमेरिका चाहता है कि ईरान भविष्य में किसी भी प्रकार का खतरा न बन सके।

    वहीं, ईरान की जवाबी कार्रवाई केवल उन हमलों का प्रतिकार है। लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि उसकी ताकत इतनी नहीं कि वह लंबे समय तक संघर्ष जारी रख सके। उसे अपने मिसाइल और सीमित संसाधनों के सहारे अमेरिका और इजरायल का मुकाबला करना कठिन होगा, इसलिए अंततः बातचीत की मेज पर आने की नौबत आएगी।

    ईरान की सीमित ताकत

    पूर्व एयर वाइस मार्शल ओपी तिवारी के अनुसार, ईरान की एयरफोर्स कमजोर है और हिज़बुल्ला तथा कुछ शिया संगठनों का समर्थन पहले जैसा नहीं रहा। जबकि रूस फिलहाल हथियारों की मदद नहीं दे सकता, चीन कुछ हथियारों से सहायता कर सकता है, लेकिन यह भी अमेरिका और इजरायल के मुकाबले पर्याप्त नहीं है। विशेषज्ञों का निष्कर्ष है कि ईरान के लिए लंबा युद्ध संभव नहीं और उसकी संभावित तबाही तय है।

    तेल की कीमतों और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर असर

    विशेषज्ञों के अनुसार, युद्ध से मध्य-पूर्व में तेल की कीमतों में इजाफा हो रहा है, जिससे वैश्विक अर्थव्यवस्था प्रभावित हो सकती है। भारत इन देशों से तेल आयात करता है, इसलिए तेल की कीमतों और आपूर्ति में बाधा देश के लिए चुनौती बनेगी। अमेरिका के पास वेनेजुएला से तेल का विकल्प मौजूद है, जबकि भारत रूस से तेल खरीदने का विकल्प इस्तेमाल कर सकता है।

    भारतीय नागरिकों की सुरक्षा चुनौती
    लेफ्टिनेंट जनरल राजेन्द्र सिंह ने बताया कि ईरान, इजरायल, कतर, सऊदी अरब, बहरीन और यूएई में लाखों भारतीय नागरिक रहते हैं। युद्ध की स्थिति में उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करना चुनौतीपूर्ण होगा। हालांकि ईरान के हमले ज्यादातर अमेरिकी बेसों को निशाना बना रहे हैं, लेकिन मिसाइलों के भटकने का खतरा भी पूरी तरह टला नहीं जा सकता।
  • ईरान-इजरायल जंग का असर: अबू धाबी के हिंदू मंदिर पर लटके ताले, आसमानी हमलों से दहला रेगिस्तान

    ईरान-इजरायल जंग का असर: अबू धाबी के हिंदू मंदिर पर लटके ताले, आसमानी हमलों से दहला रेगिस्तान


    नई दिल्ली। मध्य-पूर्व में छिड़ा भीषण युद्ध अब आस्था के केंद्रों तक पहुँच गया है। ईरान द्वारा अमेरिका और उसके सहयोगियों पर किए जा रहे विनाशकारी पलटवार का सीधा असर अब अबू धाबी स्थित भव्य हिंदू मंदिर पर भी देखने को मिला है। ताजा सुरक्षा हालातों और आसमान से बरसती मिसाइलों के खतरे को देखते हुए मंदिर प्रशासन ने एहतियात के तौर पर मंदिर को दर्शनार्थियों के लिए पूरी तरह बंद कर दिया है। स्थानीय रिपोर्ट्स के अनुसार, ईरान की तरफ से संयुक्त अरब अमीरात UAE को निशाना बनाकर लगातार दागी जा रही मिसाइलों और ‘शाहेद’ ड्रोन्स की बढ़ती संख्या ने सुरक्षा व्यवस्था को डिलीट कर नई चुनौतियाँ पेश कर दी हैं। मंदिर प्रशासन ने एक आधिकारिक बयान जारी कर स्पष्ट किया है कि वे राष्ट्रीय सुरक्षा दिशानिर्देशों का पूरी तरह पालन कर रहे हैं और इस कठिन समय में शांति के लिए प्रार्थना कर रहे हैं।

    दूसरी ओर, युद्ध की विभीषिका थमने का नाम नहीं ले रही है। ईरान की तरफ से आ रही मिसाइलों की दूसरी बड़ी खेप की पुष्टि खुद संयुक्त अरब अमीरात की रक्षा प्रणालियों ने की है। अमीरात के सैन्य अधिकारियों का दावा है कि उन्होंने कई ईरानी मिसाइलों को सफलतापूर्वक इंटरसेप्ट किया है, लेकिन मलबे के गिरने और संभावित खतरों को देखते हुए यूएई ने अपना हवाई क्षेत्र भी अस्थाई तौर पर बंद कर दिया है। मंदिर बंद होने से वहां पहुँचने वाले श्रद्धालुओं में भारी निराशा है, लेकिन सुरक्षा सर्वोपरि होने के कारण प्रशासन ने किसी भी प्रकार की ढील देने से मना कर दिया है।

    अबू धाबी का यह मंदिर न केवल वास्तुकला का बेजोड़ नमूना है बल्कि वैश्विक शांति का प्रतीक भी माना जाता है, लेकिन वर्तमान में युद्ध के बादलों ने इसकी रौनक को अस्थाई रूप से ढक दिया है। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए यूएई सरकार पल-पल की निगरानी कर रही है और नागरिकों से सुरक्षित स्थानों पर रहने की अपील की जा रही है। मंदिर के द्वार फिर कब खुलेंगे, यह पूरी तरह से आगामी सैन्य घटनाक्रमों और क्षेत्र की शांति बहाली पर निर्भर करेगा।

  • ईरान का 'ऑपरेशन एपिक फ्यूरी' पर पलटवार: बुर्ज खलीफा के पास गिरे ड्रोन, यूएई में हाई अलर्ट और दहशत का माहौल

    ईरान का 'ऑपरेशन एपिक फ्यूरी' पर पलटवार: बुर्ज खलीफा के पास गिरे ड्रोन, यूएई में हाई अलर्ट और दहशत का माहौल


    नई दिल्ली। मध्य पूर्व में जारी तनाव अब एक बेहद खतरनाक मोड़ पर पहुँच गया है, जहाँ खाड़ी के सबसे सुरक्षित माने जाने वाले शहर दुबई में भी अब युद्ध की आहट सुनाई देने लगी है। अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान पर किए गए ‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी’ के जवाब में ईरान ने भीषण पलटवार किया है, जिसका सीधा असर संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के प्रमुख शहरों पर देखने को मिला है। सबसे चौंकाने वाली खबर दुनिया की सबसे ऊंची इमारत बुर्ज खलीफा से जुड़ी है, जहाँ सुरक्षा कारणों और आसपास हुए विस्फोटों के चलते पूरी इमारत को खाली करा लिया गया है। हालांकि, राहत की बात यह है कि बुर्ज खलीफा को अभी तक सीधे तौर पर निशाना नहीं बनाया गया है और न ही इसे कोई भौतिक नुकसान पहुँचा है, लेकिन एहतियातन इसे खाली कराना शहर में व्याप्त गहरी चिंता और डर का प्रतीक बन गया है।

    सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे वीडियो में बुर्ज खलीफा के आसपास के क्षेत्र में भारी विस्फोट और काला धुआं उठता हुआ साफ़ देखा जा सकता है। कुछ वीडियो में ईरानी ‘शाहेद’ ड्रोन दो बड़ी इमारतों के बीच गिरते हुए दिखाई दे रहे हैं, जिससे वहां भी जोरदार धमाका हुआ। ईरान ने इस जवाबी कार्रवाई के तहत खाड़ी क्षेत्र में स्थित अमेरिकी सैन्य ठिकानों को अपना लक्ष्य बनाया है, लेकिन इसकी चपेट में दुबई और अबू धाबी जैसे नागरिक इलाके भी आ गए हैं। अबू धाबी में मिसाइल का मलबा गिरने से एक नागरिक की मौत की खबर है, जबकि दुबई के मशहूर ‘पाम जुमेराह’ इलाके में एक होटल के पास हुए विस्फोट में चार लोग घायल हुए हैं। यूएई की अत्याधुनिक वायु रक्षा प्रणाली ने कई मिसाइलों को बीच हवा में ही नष्ट करने में सफलता पाई है, लेकिन गिरते हुए मलबे ने शहर की शांति को डिलीट कर दहशत फैला दी है।

    ईरानी विदेश मंत्रालय ने इस हमले को जायज ठहराते हुए कहा है कि वे आक्रामकों के खिलाफ निर्णायक जवाब देना जारी रखेंगे। इस हमले के बाद दुबई इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर उड़ानों का संचालन पूरी तरह रोक दिया गया है और पूरे शहर में लोग डर के मारे अपने घरों में दुबक गए हैं। दुबई मीडिया ऑफिस ने नागरिकों से अपील की है कि वे सोशल मीडिया पर वीडियो शेयर कर अफवाहें न फैलाएं और शांति बनाए रखें। यह घटना न केवल क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए एक बड़ा खतरा बन गई है, बल्कि कुवैत, कतर, बहरीन और सऊदी अरब जैसे पड़ोसी देशों में भी अलर्ट जारी कर दिया गया है। फिलहाल, बुर्ज खलीफा को खाली कराने और शहर में हुए इन विस्फोटों ने दुबई की वैश्विक छवि और सुरक्षा दावों को भी प्रभावित किया है। आने वाले समय में यह संघर्ष कितना और फैलता है, यह पूरी तरह से वैश्विक शक्तियों की अगली कार्रवाई पर निर्भर करेगा।

  • West Asia की जंग से दुनिया दो खेमों में विभाजित…. ट्रंप के सैन्य अभियान की घोषणा से गहरी हुई चिंता की लकीरें

    West Asia की जंग से दुनिया दो खेमों में विभाजित…. ट्रंप के सैन्य अभियान की घोषणा से गहरी हुई चिंता की लकीरें


    वॉशिंगटन।
    पश्चिम एशिया (West Asia) में भड़की भीषण जंग ने पूरी दुनिया को दो स्पष्ट कूटनीतिक ध्रुवों में विभाजित कर दिया है। शनिवार सुबह जब अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप (American President Donald Trump) ने ईरान (Iran) के मिसाइल उद्योग (Missile Industry) व उसकी नौसेना को नेस्तनाबूद करने के लिए बड़े सैन्य अभियान की घोषणा की, तो वैश्विक राजनीति की लकीरें और गहरी हो गईं। ईरान में हुए मिसाइल हमलों के बाद वाशिंगटन (Washington) ने इसे ईरानी शासन से खतरों को खत्म करने का मिशन बताया है। इस्त्राइली पीएम बेंजामिन नेतन्याहू (Israeli PM Benjamin Netanyahu) ने भी इसे अस्तित्व की रक्षा के लिए उठाया गया कदम बताया। उन्होंने कहा कि इससे ईरानी जनता को अपना भाग्य खुद चुनने का अवसर मिलेगा। संघर्ष शुरू होने के बाद भारत के कश्मीर से लेकर जर्मनी व ब्रिटेन तक कहीं इसके विरोध तो कहीं पक्ष में प्रदर्शन हुए हैं।

    ईरान के हमले की कई इस्लामी देशों ने भी आलोचना की है और अमेरिका और इस्राइल के संयुक्त हमले का समर्थन किया है। यूक्रेन, कतर, यूएई, बहरीन, कुवैत, सऊदी अरब आदि देशों ने अपनी प्रतिक्रियाएं दी हैं। यूएई ने ईरान के हमले को कायराना हरकत करार देते हुए जवाब देने का अधिकार सुरक्षित रखने की बात कही है, जबकि सऊदी अरब ने इसके गंभीर परिणाम भुगतने की चेतावनी दी है। यूक्रेन ने भी इस तनाव के लिए सीधे तौर पर ईरान के आंतरिक दमन और हालिया महीनों में प्रदर्शनकारियों पर हुई हिंसा को जिम्मेदार ठहराया है।


    शांति की अपील वाले देश

    यूरोपीय संघ, जर्मनी, फ्रांस व ब्रिटेन ने ईरान से अंधाधुंध सैन्य कार्रवाई रोकने व वार्ता दोबारा शुरू करने की अपील की। फ्रांस के राष्ट्रपति एमैनुएल मैक्रों, जर्मनी के चांसलर फ्रेडरिक मर्ज और ब्रिटेन के पीएम कीर स्टारमर ने संयुक्त बयान में कहा, हम पश्चिम एशियाई देशों पर ईरानी हमलों की कड़े शब्दों में निंदा करते हैं। बेल्जियम ने कहा, ईरानी जनता अपनी सरकार के फैसलों की कीमत न चुकाए।


    रूस-चीन ईरान के पक्ष में

    कई ताकतवर देश ईरान के समर्थन में भी उतरे हैं। इनमें रूस, चीन, ओमान, तुर्किये व नॉर्वे शामिल हैं। रूस ने अमेरिका पर तीखा हमला करते हुए कहा कि वाशिंगटन ने ईरान के साथ चल रही परमाणु वार्ता का इस्तेमाल केवल अपने सैन्य हमलों को छिपाने के लिए किया। रूस की सुरक्षा परिषद के उपाध्यक्ष और पूर्व राष्ट्रपति दिमित्री मेदवेदेव ने कहा, शांतिदूत (ट्रंप) ने एक बार फिर अपना चेहरा दिखाया है। चीन ने भी सैन्य कार्रवाई तत्काल रोकने व ईरान की क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान करने की मांग की है।

    ब्राजील की सरकार ने ईरान में हमलों की कड़ी निंदा की और क्षेत्र में बढ़ते तनाव पर गंभीर चिंता जताई। विदेश मंत्रालय ने शनिवार को कहा कि ये हमले ऐसे समय में हुए, जब बातचीत की प्रक्रिया चल रही थी, जिसे शांति का एकमात्र व्यवहारिक रास्ता बताया गया। ब्राजील ने स्पष्ट किया कि विवादों के समाधान के लिए संवाद ही वैध और टिकाऊ माध्यम है।


    ईरान आतंक का प्रमुख स्रोत : कार्नी

    कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने पश्चिम एशिया पर कड़ा रुख अपनाते हुए कहा कि ईरान पूरे क्षेत्र में अस्थिरता और आतंक का मुख्य स्रोत है। उसे किसी भी कीमत पर परमाणु हथियार हासिल करने या विकसित करने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। मुंबई में एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कार्नी ने कहा, ईरान का मानवाधिकार रिकॉर्ड दुनिया में सबसे खराब रिकॉर्डों में से एक है।

    कार्नी ने कहा, कनाडा और उसके अंतरराष्ट्रीय साझेदार लगातार ईरानी शासन से उसके परमाणु कार्यक्रम को समाप्त करने की अपील करते रहे हैं। उन्होंने कन्नानास्किस में हुए जी7 शिखर सम्मेलन और संयुक्त राष्ट्र की ओर से प्रतिबंधों की पुनः बहाली का भी उल्लेख किया। कार्नी ने मुंबई में नवाचार प्रदर्शनी में हिस्सा लिया और विश्वविद्यालयों के शोधकर्ताओं से मुलाकात की। कार्नी ने शनिवार को मुंबई में भारत-कनाडा टैलेंट एंड इनोवेशन स्ट्रैटेजी की शुरुआत की।

  • अमेरिका-ईरान युद्ध का भारत पर पड़ सकता है असर, जानिए क्‍या-क्‍या होंगे प्रभावित?

    अमेरिका-ईरान युद्ध का भारत पर पड़ सकता है असर, जानिए क्‍या-क्‍या होंगे प्रभावित?



    नई दिल्ली। अमेरिका और Iran के बीच बढ़ते सैन्य टकराव का असर सिर्फ इन देशों या Israel तक सीमित नहीं है। मध्य पूर्व के अन्य देशों जैसे सऊदी अरब, यूएई, कतर और बहरीन पर भी इसके प्रभाव दिख रहे हैं। युद्ध के विस्तार की स्थिति में भारत पर इसका व्यापक आर्थिक असर पड़ सकता है। आइए जानते हैं कि किस तरह सोना-चांदी, शेयर बाजार और बासमती चावल प्रभावित हो सकते हैं।

    क्रूड ऑयल की कीमतों में उछाल
    पूरा मध्य पूर्व क्षेत्र तेल का प्रमुख उत्पादक है और भारत कच्चे तेल के आयात पर पूरी तरह निर्भर है। हाल के महीनों में रूस की जगह सऊदी अरब से तेल खरीद बढ़ी थी, लेकिन युद्ध के कारण सप्लाई चेन प्रभावित हो सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर युद्ध लंबा खिंचता है तो क्रूड ऑयल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकती हैं।

    शेयर बाजार पर दबाव
    अमेरिका-ईरान युद्ध की अनिश्चितता का असर भारतीय शेयर बाजार पर भी पड़ रहा है। शुक्रवार को बाजार में गिरावट देखी गई, और विशेषज्ञों का अनुमान है कि सोमवार को यह गिरावट जारी रह सकती है। वैश्विक तनाव हमेशा शेयर बाजार में भारी दबाव डालता है, और निवेशक सतर्क हो जाते हैं।

    सोने और चांदी की कीमतों में तेजी
    शेयर बाजार में गिरावट के बीच निवेशक सुरक्षित विकल्प की ओर रुख करते हैं। इससे सोने और चांदी की कीमतों में इजाफा होने की संभावना है। विशेषज्ञों के अनुसार सोने का भाव 1,70,000 रुपये प्रति 10 ग्राम और चांदी 30 लाख रुपये प्रति किलोग्राम तक पहुंच सकता है।

    बासमती चावल के निर्यात पर असर
    भारत मध्य पूर्व के कई देशों को बासमती चावल निर्यात करता है, जिसमें ईरान भी शामिल है। युद्ध के कारण इस निर्यात पर असर पड़ सकता है, जिससे किसानों और निर्यातकों की आमदनी प्रभावित हो सकती है।

    डॉलर मजबूत, रुपये कमजोर
    तेल की बढ़ती कीमतों का असर डॉलर और रुपये पर भी पड़ेगा। डॉलर की मांग युद्ध के कारण बढ़ेगी, जिससे अमेरिकी मुद्रा और मजबूत होगी। वहीं, रुपये में गिरावट देखने को मिल सकती है।

    महंगाई पर दबाव
    क्रूड ऑयल की कीमतों में बढ़ोतरी सीधे देश में महंगाई को बढ़ा सकती है। ईंधन और परिवहन लागत बढ़ने से अन्य वस्तुओं की कीमतों में भी इजाफा होगा, जिससे आम नागरिक पर आर्थिक दबाव बढ़ेगा।

    अर्थशास्त्रियों और विशेषज्ञों का कहना है कि अगर मध्य पूर्व में संघर्ष जारी रहा, तो भारत की आर्थिक स्थिरता और उपभोक्ताओं की जेब पर इसका असर लंबी अवधि तक महसूस होगा।

  • अफगान सीमा पर बढ़ा सैन्य टकराव, पाकिस्तान का बड़ा दावा- 352 तालिबानी मारे, 130 चौकियां तबाह

    अफगान सीमा पर बढ़ा सैन्य टकराव, पाकिस्तान का बड़ा दावा- 352 तालिबानी मारे, 130 चौकियां तबाह



    इस्लामाबाद । पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच सीमा पर जारी संघर्ष अब गंभीर और खतरनाक मोड़ लेता दिखाई दे रहा है। दोनों देशों के बीच बढ़ती सैन्य कार्रवाई ने न सिर्फ क्षेत्रीय सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ा दी है, बल्कि कूटनीतिक संबंधों पर भी इसका असर साफ नजर आने लगा है। सीमा पर तेज होती झड़पों के बीच पाकिस्तान ने दावा किया है कि उसने हवाई और जमीनी कार्रवाई में 352 अफगान तालिबान लड़ाकों और उनके सहयोगी आतंकी तत्वों को मार गिराया है।

    पाकिस्तान का दावा—भारी नुकसान पहुंचाया
    पाकिस्तान के सूचना मंत्री अत्ताउल्लाह तरार के अनुसार अब तक 352 तालिबान सदस्य मारे गए हैं, जबकि 535 घायल हुए हैं। उन्होंने बताया कि पाकिस्तानी सेना ने 130 सैन्य चौकियों को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया है और 26 सीमा चौकियों पर कब्जा कर लिया है। इसके अलावा 171 टैंक और बख्तरबंद वाहनों को नष्ट करने का भी दावा किया गया है। पाकिस्तान ने यह भी कहा है कि 41 ठिकानों पर सटीक हवाई हमले किए गए, जिनमें तालिबान के ठिकानों को निशाना बनाया गया।

    ऑपरेशन ‘ग़ज़ब-उल-हक’ के तहत कार्रवाई
    पाकिस्तान ने यह पूरी सैन्य कार्रवाई ‘ऑपरेशन ग़ज़ब-उल-हक’ के तहत शुरू की है। इस बारे में सेना के प्रवक्ता अहमद शरीफ चौधरी ने बताया कि अफगान पक्ष ने 2,600 किलोमीटर लंबी सीमा पर 53 स्थानों पर एक साथ हमले किए थे, जिसके जवाब में यह व्यापक ऑपरेशन चलाया गया। उन्होंने स्पष्ट कहा कि अफगान तालिबान को तय करना होगा कि वह पाकिस्तान का साथ देगा या आतंकी संगठनों का, क्योंकि पाकिस्तान के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा सर्वोपरि है।

    आतंक संगठनों को पनाह देने के आरोप
    पाकिस्तान लंबे समय से आरोप लगाता रहा है कि अफगान तालिबान अपनी जमीन का इस्तेमाल तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी), बलोच लिबरेशन आर्मी (बीएलए), दाएश और अल-कायदा जैसे संगठनों को करने देता है। हालांकि अफगान पक्ष इन आरोपों को सिरे से खारिज करता रहा है और उसका कहना है कि पाकिस्तान को अपनी आंतरिक समस्याओं पर ध्यान देना चाहिए।

    अमेरिका का समर्थन और बातचीत के संकेत
    इस बीच अमेरिका ने पाकिस्तान के आत्मरक्षा के अधिकार का समर्थन किया है। अमेरिका की अंडर सेक्रेटरी एलिसन हूकर ने कहा कि वे हालात पर करीबी नजर रखे हुए हैं और पाकिस्तान के आत्मरक्षा के अधिकार का समर्थन करते हैं। बढ़ते तनाव के बीच अफगान तालिबान ने बातचीत की इच्छा जताई है। अफगान विदेश मंत्री अमीर खान मुत्तकी ने कहा कि अफगानिस्तान हमेशा आपसी समझ और सम्मान के आधार पर मुद्दों को सुलझाने का पक्षधर है। वहीं तालिबान के प्रवक्ता जबीहुल्लाह मुजाहिद ने भी स्पष्ट किया कि वे इस विवाद को बातचीत के जरिए सुलझाना चाहते हैं।