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  • US-ईरान तनाव के बीच अलर्ट: भारतीय दूतावास, तेहरान ने भारतीयों से तुरंत ईरान छोड़ने को कहा

    US-ईरान तनाव के बीच अलर्ट: भारतीय दूतावास, तेहरान ने भारतीयों से तुरंत ईरान छोड़ने को कहा


    नई दिल्ली । मध्य पूर्व में तेजी से बदलते हालात और अमेरिका-ईरान के बीच बढ़ते तनाव के बीच तेहरान स्थित भारतीय दूतावास ने 23 फरवरी 2026 को एक अहम एडवाइजरी जारी कर ईरान में रह रहे भारतीय नागरिकों से तुरंत देश छोड़ने की अपील की है। दूतावास ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि मौजूदा सुरक्षा परिस्थितियों को देखते हुए छात्र, तीर्थयात्री, व्यापारी और पर्यटक उपलब्ध सभी साधनों, विशेषकर वाणिज्यिक उड़ानों, का उपयोग कर जल्द से जल्द ईरान से बाहर निकलने की योजना बनाएं। यह सलाह पहले 5 जनवरी और 14 जनवरी को जारी परामर्शों की निरंतरता में दोहराई गई है, लेकिन इस बार लहजा अधिक सतर्क और गंभीर है।

    दूतावास ने अपनी आधिकारिक एडवाइजरी में कहा है कि ईरान में स्थिति तेजी से बदल रही है और किसी भी संभावित आपात परिस्थिति से बचने के लिए एहतियात बरतना बेहद जरूरी है। भारतीय नागरिकों को विरोध प्रदर्शनों और भीड़भाड़ वाले इलाकों से दूर रहने, स्थानीय प्रशासन के निर्देशों का पालन करने और दूतावास के साथ लगातार संपर्क में बने रहने की सलाह दी गई है। साथ ही सभी से अपने पासपोर्ट, वीजा और अन्य पहचान दस्तावेज तैयार रखने को कहा गया है, ताकि आवश्यकता पड़ने पर तुरंत यात्रा की जा सके।

    दूतावास ने यह भी दोहराया है कि जिन भारतीयों ने अभी तक अपने प्रवास का पंजीकरण नहीं कराया है, वे तुरंत आधिकारिक लिंक के माध्यम से रजिस्ट्रेशन कराएं। यदि इंटरनेट कनेक्टिविटी में बाधा आ रही हो तो भारत में रह रहे उनके परिजन पंजीकरण प्रक्रिया पूरी कर सकते हैं। किसी भी आपात स्थिति में सहायता के लिए दूतावास ने हेल्पलाइन नंबर +989128109115, +989128109109, +989128109102 और +989932179359 जारी किए हैं। इसके अलावा [email protected] पर ईमेल के माध्यम से भी संपर्क किया जा सकता है। दूतावास ने भरोसा दिलाया है कि भारतीय समुदाय की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है और हर संभव सहायता उपलब्ध कराई जाएगी।

    दरअसल, यह एडवाइजरी ऐसे समय आई है जब ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर अमेरिका और ईरान के बीच तनाव चरम पर पहुंचता दिख रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने ईरान को नए परमाणु समझौते पर सहमति के लिए सीमित समय का अल्टीमेटम दिया है और चेतावनी दी है कि विफलता की स्थिति में कड़े परिणाम भुगतने होंगे। रिपोर्ट्स के अनुसार, अमेरिका ने मध्य पूर्व क्षेत्र में अपनी सैन्य मौजूदगी बढ़ा दी है, जिसमें युद्धपोत, फाइटर जेट्स और अन्य रणनीतिक संसाधन शामिल हैं। दूसरी ओर, ईरान में विरोध प्रदर्शन और झड़पों की खबरों ने हालात को और संवेदनशील बना दिया है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि यदि कूटनीतिक प्रयास सफल नहीं होते तो क्षेत्र में सैन्य टकराव की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। ऐसे परिदृश्य में भारतीय दूतावास का यह कदम एहतियाती और रणनीतिक दोनों ही दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। बदलती परिस्थितियों के बीच भारतीय नागरिकों से अपील की गई है कि वे अफवाहों से बचें, केवल आधिकारिक सूचनाओं पर भरोसा करें और अपनी सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दें।

  • बांग्लादेशी सेना में बड़ा बदलाव, भारत में तैनात अधिकारी को वापस बुलाया

    बांग्लादेशी सेना में बड़ा बदलाव, भारत में तैनात अधिकारी को वापस बुलाया


    नई दिल्ली । बांग्लादेश सेना के उच्च कमान में रविवार को बड़ा फेरबदल हुआ जिसमें नए चीफ ऑफ जनरल स्टाफ की नियुक्ति भी शामिल है। इस बदलाव से प्रमुख रणनीतिक कमान और देश की मुख्य सैन्य खुफिया एजेंसी प्रभावित हुई है। ढाका ट्रिब्यून की रिपोर्ट के अनुसार ये बदलाव प्रधानमंत्री तारिक रहमान की नई सरकार के सत्ता संभालने के कुछ दिनों बाद हुए। रिपोर्ट के मुताबिक लेफ्टिनेंट जनरल एम मैनुर रहमान को CGS नियुक्त किया गया जो पहले सेना प्रशिक्षण और सिद्धांत कमान ARTDOC के प्रमुख या जनरल ऑफिसर कमांडिंग GOC के पद पर थे।

    भारत में तैनात अधिकारी को वापस बुलाया
    भारत में बांग्लादेश उच्चायोग में रक्षा सलाहकार के पद पर तैनात ब्रिगेडियर जनरल मोहम्मद हाफिजुर रहमान को मेजर जनरल के दर्जे के साथ पैदल सेना डिवीजन का GOC बनने के लिए वापस बुलाया गया है।

    नई सरकार और चुनाव का संदर्भ

    बांग्लादेश राष्ट्रवादी पार्टी BNP ने 12 फरवरी को हुए चुनाव में दो-तिहाई बहुमत हासिल किया। 60 वर्षीय तारिक रहमान ने 17 फरवरी को प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली जिससे मुहम्मद यूनुस के 18 महीने के अंतरिम शासन का अंत हुआ।

    भारत-बांग्लादेश संवाद को बढ़ावा
    ढाका में नियुक्त भारतीय उच्चायुक्त प्रणय वर्मा ने कहा कि नई सरकार के साथ सक्रिय संवाद को लेकर भारत उत्सुक है। उन्होंने बांग्लादेश के विदेश मंत्री खलीलुर रहमान से मुलाकात की और संवाद सहयोग और पारस्परिक हितों पर जोर दिया। उच्चायुक्त वर्मा ने कहा कि भारत बांग्लादेश के साथ हर क्षेत्र में सकारात्मक और भविष्योन्मुखी सहयोग को मजबूत करना चाहता है। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि यूनुस के कार्यकाल के दौरान भारत-बांग्लादेश संबंधों में गिरावट आई थी और 1971 के बाद यह सबसे निचले स्तर पर पहुंच गए थे।

  • अमेरिका के लोग ट्रंप की नीतियों और देश चलाने के तरीके से खुश नहीं… 60% टैरिफ फैसलों से नाराज

    अमेरिका के लोग ट्रंप की नीतियों और देश चलाने के तरीके से खुश नहीं… 60% टैरिफ फैसलों से नाराज


    वाशिंगटन।
    अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (American President Donald Trump) अपने कामों से अधिक अपने बयानों को लेकर चर्चा में रहते हैं। कब क्या कहेंगे, शायद ट्रंप खुद नहीं जानते। यही कारण है कि वे अक्सर चर्चा में बने रहते हैं। इस बीच एक सर्वे रिपोर्ट सामने आया है। इस सर्वे के अनुसार, अधिकतर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (American President Donald Trump) की नीतियों और देश चलाने के तरीके से खुश नहीं है। फरवरी 2026 के सर्वेक्षण में ट्रंप की कुल अस्वीकृति दर (Disapproval Rating) लगभग 60% पहुंच गई है, जो उनके दूसरे कार्यकाल में अब तक की सबसे ऊंची दरों में से एक है और 2021 में पद छोड़ते समय वाली स्थिति के समान है। सर्वे के अनुसार, अधिकतर लोग महंगाई, टैरिफ, विदेश संबंध, आव्रजन और समग्र अर्थव्यवस्था जैसे रोजमर्रा के महत्वपूर्ण मुद्दों पर ट्रंप के तरीके से असहमत हैं।

    यह सर्वेक्षण ABC न्यूज/वाशिंगटन पोस्ट/इप्सोस द्वारा इप्सोस के नॉलेजपैनल के जरिए किया गया था, और यह सुप्रीम कोर्ट द्वारा ट्रंप के पहले के वैश्विक टैरिफ को रद्द करने से ठीक पहले हुआ था। सर्वेक्षण के अनुसार, लगभग दो-तिहाई अमेरिकी (करीब 65%) ट्रंप द्वारा महंगाई से निपटने के तरीके से असहमत हैं। आयातित वस्तुओं पर टैरिफ लगाने के उनके तरीके को 64% लोग नापसंद करते हैं, जबकि 62% लोग विदेशी संबंधों को संभालने के तरीके से असहमत हैं। 58% प्रतिभागियों ने आव्रजन (इमिग्रेशन) को संभालने के तरीके का विरोध किया, और 57% ने कहा कि समग्र अर्थव्यवस्था को बेहतर तरीके से संभाला जा सकता है। इनमें से किसी भी मुद्दे पर ट्रंप को जनता से स्पष्ट समर्थन नहीं मिल रहा है।


    ट्रंप से नाखुश लेकिन डेमोक्रेट्स पर भरोसा नहीं

    सर्वे के अनुसार, अधिकतर लोग ट्रंप से नाखुश हैं, लेकिन अमेरिकी कांग्रेस में डेमोक्रेट्स पर भी पूरा भरोसा नहीं है। दरअसल, जब लोगों से पूछा गया कि देश की सबसे बड़ी समस्याओं को सुलझाने के लिए वे किस पर ज्यादा भरोसा करते हैं, तो राय लगभग बराबर बंट गई। ट्रंप (33%), डेमोक्रेट्स (31%), या ‘दोनों में से कोई नहीं’ (31%)। सर्वे रिपोर्ट से साफ है कि कई अमेरिकी दोनों पक्षों से नाखुश हैं।

    सर्वे के अनुसार, ट्रंप को सबसे कम समर्थन डेमोक्रेट्स और निर्दलीय (इंडिपेंडेंट) मतदाताओं से मिला, जिन्होंने लगभग हर मुद्दे पर उनसे असहमति जताई। इतना ही नहीं, रिपब्लिकन पार्टी में भी मतभेद हैं। रिपोर्ट के अनुसार, मेक अमेरिका ग्रेट अगेन (MAGA) आंदोलन के मजबूत समर्थक ज्यादातर ट्रंप के फैसलों से सहमत थे, लेकिन MAGA से खुद को अलग मानने वाले रिपब्लिकन अधिक आलोचनात्मक थे, खासकर महंगाई और विदेश नीति जैसे मुद्दों पर। कुल मिलाकर, ट्रंप की अस्वीकृति दर लगभग 60% है, जो उनके दूसरे कार्यकाल में अब तक की सबसे ऊंची दरों में से एक है और 2021 में पद छोड़ते समय वाली दर के बराबर है।


    ट्रंप के सत्ता संभालने के हालात और हुए खराब

    इस बीच, अर्थव्यवस्था को लेकर लोगों का नजरिया भी निराशाजनक है। लगभग आधे अमेरिकियों का कहना है कि ट्रंप के सत्ता संभालने के बाद हालात और खराब हुए हैं। सिर्फ करीब 3% लोगों ने कहा कि अर्थव्यवस्था में सुधार हुआ है। सर्वेक्षण में शामिल केवल 22% लोगों ने ही आर्थिक रूप से खुद को बेहतर महसूस किया, जबकि अधिकांश ने कहा कि उनकी स्थिति पहले जैसी है या और खराब हो गई है।

    सर्वेक्षण में ट्रंप की राष्ट्रपति बनने की योग्यता पर भी सवाल उठे। सर्वे रिपोर्ट के मुताबिक, आधे से ज्यादा अमेरिकियों ने कहा कि उनमें राष्ट्रपति बनने के लिए जरूरी मानसिक क्षमता नहीं है, और लगभग आधे ने कहा कि वे शारीरिक रूप से भी पूरी तरह स्वस्थ नहीं हैं। रिपब्लिकन इस पर काफी हद तक असहमत थे, लेकिन डेमोक्रेट्स और निर्दलीय मतदाताओं ने इन चिंताओं को मजबूती से साझा किया।

    भरोसा भी एक बड़ी समस्या है। लगभग 70% अमेरिकियों (दस में से सात) ने कहा कि ट्रंप ईमानदार या भरोसेमंद नहीं हैं। कई लोगों का मानना है कि वे राष्ट्रपति पद का दुरुपयोग अपने निजी फायदे के लिए कर रहे हैं, और अधिकांश को लगता है कि उन्होंने अपनी कानूनी शक्तियों का उल्लंघन किया है। वहीं, खास कार्रवाइयों के बारे में ज्यादातर अमेरिकी बच्चों के लिए अनुशंसित टीकों में कटौती का विरोध करते हैं और अन्य देशों में बदलाव लाने के लिए अमेरिकी सेना के इस्तेमाल का समर्थन नहीं करते। कई लोगों का यह भी मानना है कि प्रशासन जेफरी एपस्टीन फाइलों जैसे संवेदनशील मामलों पर पारदर्शी नहीं रहा है। बता दें कि यह सर्वेक्षण अमेरिका भर में 2500 से ज्यादा वयस्कों पर किया गया है।

  • US में हिंदू सबसे अधिक शिक्षित धार्मिक समुदाय, प्यू रिसर्च सेंटर की रिपोर्ट में हुआ खुलासा

    US में हिंदू सबसे अधिक शिक्षित धार्मिक समुदाय, प्यू रिसर्च सेंटर की रिपोर्ट में हुआ खुलासा


    वाशिंगटन।
    अमेरिका (America) में हिंदू सबसे अधिक शिक्षित धार्मिक समूह (Hindus most Educated Religious Group) हैं। प्यू रिसर्च सेंटर (Pew Research Center) की नई रिपोर्ट (New report ) से यह सामने आया है। 2023-24 के रिलिजियस लैंडस्केप स्टडी (RLS) में पाया गया कि यूएस में रहने वाले 70 प्रतिशत हिंदू वयस्कों के पास कम से कम बैचलर डिग्री या उससे उच्च शिक्षा है। यह आंकड़ा राष्ट्रीय औसत से कहीं अधिक है, जहां सभी अमेरिकी वयस्कों में मात्र 35 प्रतिशत के पास ही बैचलर डिग्री या उससे ज्यादा है। यह अध्ययन अमेरिका में धर्म और सार्वजनिक जीवन पर सबसे व्यापक सर्वेक्षणों में से एक माना जाता है, जिसमें 36908 वयस्कों से जुलाई 2023 से मार्च 2024 तक जानकारी ली गई।

    रिपोर्ट 19 फरवरी 2026 को जारी की गई। हिंदू समुदाय की यह उपलब्धि इमिग्रेशन पैटर्न से जुड़ी हुई है, क्योंकि अधिकांश हिंदू उच्च शिक्षा या कुशल वीजा के माध्यम से अमेरिका आए हैं। इस अध्ययन में हिंदुओं के बाद यहूदी दूसरे स्थान पर हैं, जहां 65 प्रतिशत वयस्कों के पास बैचलर डिग्री या उससे अधिक शिक्षा है। मुसलमान, बौद्ध और ऑर्थोडॉक्स ईसाई भी राष्ट्रीय औसत से ऊपर हैं। इनमें 40 प्रतिशत से अधिक (मुसलमानों में 44 प्रतिशत) वयस्कों के पास उच्च शिक्षा है। ये अल्पसंख्यक धार्मिक समूह अमेरिकी आबादी का छोटा हिस्सा हैं- हिंदू लगभग 0.5-1 प्रतिशत, मुसलमान 1-1.3 प्रतिशत और यहूदी लगभग 2 प्रतिशत।

    ईसाई समुदाय कुल आबादी का 70%
    अमेरिका में ईसाई समुदाय कुल आबादी का बड़ा हिस्सा लगभग 70 प्रतिशत है, लेकिन उनके कई उपसमूह जैसे इवैंजेलिकल प्रोटेस्टेंट (29 प्रतिशत) और ऐतिहासिक रूप से ब्लैक प्रोटेस्टेंट (24 प्रतिशत) में कॉलेज ग्रेजुएट्स का प्रतिशत राष्ट्रीय औसत से कम है। रिपोर्ट बताती है कि शिक्षा स्तर में अंतर मुख्य रूप से इमिग्रेशन और जनसांख्यिकीय कारकों से जुड़ा है। हिंदू, मुसलमान और बौद्ध समुदायों में से अधिकांश विदेशी मूल के हैं, जो अमेरिका में उच्च शिक्षा या स्किल्ड जॉब वीजा पर आते हैं। इससे इन समूहों में उच्च शिक्षित व्यक्तियों का अनुपात बढ़ जाता है। उदाहरण के लिए हिंदुओं में 77 प्रतिशत विदेश में जन्मे हैं।

    रिसर्च के नतीजे क्या कह रहे
    यह पैटर्न दिखाता है कि अमेरिका की इमिग्रेशन नीतियां कुशल और शिक्षित प्रवासियों को आकर्षित करती हैं, जिससे छोटे धार्मिक समूहों में शिक्षा का स्तर ऊंचा रहता है। कुल मिलाकर यह अध्ययन US में धार्मिक विविधता और शिक्षा के बीच संबंध को उजागर करता है। हिंदू और यहूदी जैसे समूह सबसे आगे हैं, जबकि मुसलमान और अन्य अल्पसंख्यक भी औसत से बेहतर प्रदर्शन कर रहे हैं। यह निष्कर्ष अमेरिकी समाज में अल्पसंख्यक समुदायों की सफलता और योगदान को सामने रखता है। साथ ही, इमिग्रेशन के सकारात्मक प्रभाव को भी दर्शाता है।

  • अमेरिका-ईरान तनाव चरम पर? सुप्रीम लीडर खामेनेई का बड़ा दांव, लारिजानी को सौंपी अहम जिम्मेदारी

    अमेरिका-ईरान तनाव चरम पर? सुप्रीम लीडर खामेनेई का बड़ा दांव, लारिजानी को सौंपी अहम जिम्मेदारी


    नई दिल्ली । मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव और संभावित टकराव की आशंकाओं के बीच ईरान की सत्ता संरचना में बड़ा फेरबदल देखने को मिला है। रिपोर्ट के मुताबिक ईरान के सुप्रीम लीडर अली खामेनेई ने राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े व्यापक अधिकार अपने भरोसेमंद सहयोगी अली लारीजानी को सौंप दिए हैं। इस कदम को संभावित युद्ध परिस्थिति में कमान को केंद्रीकृत करने की रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है।

    लारिजानी के हाथ में सैन्य और कूटनीतिक कमान

    रिपोर्ट के अनुसार लारिजानी अब सुरक्षा सैन्य संचालन और कूटनीतिक पहलुओं से जुड़े अहम फैसले लेने की स्थिति में हैं। वे सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल के प्रमुख पद पर रहते हुए परमाणु वार्ताओं क्षेत्रीय सहयोगियों से समन्वय और आंतरिक सुरक्षा व्यवस्थाओं की निगरानी कर रहे हैं। माना जा रहा है कि संभावित संघर्ष की स्थिति में तेज और एकीकृत निर्णय प्रक्रिया सुनिश्चित करने के लिए यह बदलाव किया गया है।

    राष्ट्रपति की भूमिका सीमित उत्तराधिकार की तैयारी
    ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेज़ेशकियन की भूमिका इस बदलाव के बाद अपेक्षाकृत सीमित बताई जा रही है। विश्लेषकों का मानना है कि शीर्ष नेतृत्व ने आकस्मिक परिस्थितियों यहां तक कि नेतृत्व स्तर पर किसी अप्रत्याशित घटना को ध्यान में रखते हुए उत्तराधिकार की बहुस्तरीय व्यवस्था पर काम शुरू किया है। सेना को हाई अलर्ट पर रखने मिसाइल सिस्टम की रणनीतिक तैनाती और आंतरिक सुरक्षा बलों को तैयार रखने की खबरें भी सामने आई हैं।

    होर्मुज जलडमरूमध्य में बढ़ी गतिविधियां
    रणनीतिक दृष्टि से अहम  क्षेत्र में ईरान की सैन्य गतिविधियों में तेजी देखी जा रही है। मिसाइल परीक्षण और नौसैनिक अभ्यासों की खबरों ने वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति और समुद्री व्यापार को लेकर चिंताएं बढ़ा दी हैं। यह जलमार्ग विश्व के बड़े हिस्से के तेल निर्यात का प्रमुख रास्ता है इसलिए यहां की हलचल का असर अंतरराष्ट्रीय बाजारों पर भी पड़ सकता है।

    क्षेत्रीय समीकरण और वैश्विक नजर

    मध्य पूर्व पहले से ही संवेदनशील भू-राजनीतिक समीकरणों का केंद्र रहा है। ऐसे में तेहरान का यह कदम संकेत देता है कि ईरान संभावित टकराव की आशंका को गंभीरता से ले रहा है। हालांकि आधिकारिक स्तर पर व्यापक युद्ध की पुष्टि नहीं हुई है लेकिन सैन्य और सुरक्षा ढांचे में यह पुनर्संरचना बताती है कि देश किसी भी आपात स्थिति के लिए तैयार रहने की रणनीति अपना रहा है।

  • वैश्विक टैरिफ बढ़ोतरी के साए में भारत अमेरिका व्यापार वार्ता स्थगित, हालात की समीक्षा के बाद होगा अगला दौर

    वैश्विक टैरिफ बढ़ोतरी के साए में भारत अमेरिका व्यापार वार्ता स्थगित, हालात की समीक्षा के बाद होगा अगला दौर


    नई दिल्ली। भारत और अमेरिका के बीच प्रस्तावित अंतरिम द्विपक्षीय व्यापार समझौते को लेकर होने वाली अहम बैठक को फिलहाल रीशेड्यूल कर दिया गया है। भरोसेमंद सूत्रों के अनुसार दोनों देशों ने बदलते वैश्विक व्यापारिक हालात और अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले को ध्यान में रखते हुए आधिकारिक बैठक को टालने का निर्णय लिया है।

    दरअसल दोनों देशों के मुख्य ट्रेड नेगोशिएटर्स की अगुवाई वाली टीमों के बीच तीन दिन की बैठक 23 फरवरी से अमेरिका में प्रस्तावित थी। इस बैठक में अंतरिम व्यापार समझौते के कई अहम बिंदुओं को अंतिम रूप दिया जाना था। हालांकि अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट द्वारा पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के टैरिफ उपायों को अवैध करार दिए जाने के बाद परिस्थितियां तेजी से बदलीं और दोनों पक्षों ने पहले कानूनी और नीतिगत प्रभावों का अध्ययन करने का फैसला किया।

    एक वरिष्ठ अधिकारी ने पुष्टि की है कि भारतीय टीम का प्रस्तावित वॉशिंगटन दौरा फिलहाल टाल दिया गया है। दोनों देश पहले सुप्रीम कोर्ट के फैसले और उसके बाद उत्पन्न परिस्थितियों की विस्तार से समीक्षा करेंगे। इसके बाद आपसी सहमति से नई तारीख तय की जाएगी। अधिकारी ने कहा कि निर्णय दोनों पक्षों की सुविधा और रणनीतिक प्राथमिकताओं को ध्यान में रखकर लिया जाएगा।

    गौरतलब है कि अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में डोनाल्ड ट्रंप द्वारा लगाए गए व्यापक टैरिफ उपायों को रद्द कर दिया। कोर्ट ने 6-3 के फैसले में कहा कि कार्यपालिका ने 1977 के इंटरनेशनल इमरजेंसी इकोनॉमिक पावर्स एक्ट के तहत आपातकालीन शक्तियों का इस्तेमाल कर बड़े पैमाने पर आयात शुल्क लगाकर अपने संवैधानिक अधिकार का अतिक्रमण किया। इस फैसले के बाद ट्रंप के कई टैरिफ अमान्य हो गए हालांकि सभी नहीं।

    कोर्ट के इस निर्णय के बाद डोनाल्ड ट्रंप ने प्रतिक्रिया देते हुए पहले लगाए गए 10 प्रतिशत ग्लोबल टैरिफ को बढ़ाकर 15 प्रतिशत करने की घोषणा कर दी। उन्होंने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर फैसले को शर्मनाक बताते हुए कहा कि कई देश दशकों से अमेरिका के साथ असंतुलित व्यापार कर रहे हैं और उनके पास वैकल्पिक योजना भी तैयार है।

    इन घटनाक्रमों ने वैश्विक व्यापारिक माहौल को अस्थिर बना दिया है। भारत और अमेरिका के बीच प्रस्तावित अंतरिम समझौता ऐसे समय में हो रहा था जब दोनों देश आपसी व्यापार को नए स्तर पर ले जाने की कोशिश में हैं। भारत की ओर से बाजार पहुंच, शुल्क संरचना और निवेश से जुड़े मुद्दों पर स्पष्टता की अपेक्षा है जबकि अमेरिका भी संतुलित व्यापारिक ढांचे पर जोर दे रहा है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले और टैरिफ बढ़ोतरी से उत्पन्न अनिश्चितता के बीच दोनों देशों का सावधानीपूर्वक कदम उठाना रणनीतिक रूप से उचित है। पहले कानूनी स्थिति स्पष्ट होगी उसके बाद ही किसी औपचारिक समझौते की दिशा में आगे बढ़ना सुरक्षित माना जा रहा है।

    फिलहाल दोनों पक्ष हालात पर नजर बनाए हुए हैं और नई तारीख जल्द तय होने की संभावना जताई जा रही है। यह स्पष्ट है कि वैश्विक टैरिफ नीति और कानूनी पेचीदगियां भारत अमेरिका व्यापार संबंधों की गति और दिशा दोनों को प्रभावित कर सकती हैं।

  • US: जेपीमॉर्गन ने 6 जनवरी 2021 के बाद बंद कर दिए थे ट्रंप के खाते… कोर्ट में बैंक ने पहली बार स्वीकारा

    US: जेपीमॉर्गन ने 6 जनवरी 2021 के बाद बंद कर दिए थे ट्रंप के खाते… कोर्ट में बैंक ने पहली बार स्वीकारा


    वॉशिंगटन।
    छह जनवरी 2021 को अमेरिकी कैपिटल (American Capitol) पर हुए हमले के बाद राष्ट्रपति ट्रंप (President Trump) के बैंक खातों को बंद किए जाने का मामला फिर चर्चा में है। जेपीमॉर्गन चेज (JPMorgan Chase) ने पहली बार अदालत में स्वीकार किया है कि फरवरी 2021 में ट्रंप और उनकी कुछ कंपनियों के खाते बंद किए गए थे। यह स्वीकारोक्ति उस मुकदमे के दौरान सामने आई है जिसमें ट्रंप ने बैंक और उसके प्रमुख जेमी डाइमोन पर 5 अरब डॉलर का दावा ठोका है। ट्रंप का आरोप है कि उनके खाते राजनीतिक कारणों से बंद किए गए, जिससे उनके कारोबार को नुकसान हुआ।

    दायर हलफनामे में बैंक के पूर्व मुख्य प्रशासनिक अधिकारी डैन विल्कनिंग ने लिखा कि फरवरी 2021 में निजी बैंक और कमर्शियल बैंक से जुड़े कुछ खाते बंद करने की सूचना दी गई थी। अब तक बैंक केवल सामान्य तौर पर खाते बंद करने की नीतियों पर बात करता रहा था, लेकिन यह पहली बार है जब उसने सीधे तौर पर ट्रंप के खातों के बंद होने की पुष्टि की है। बैंक ने पहले कहा था कि यह मुकदमा बेबुनियाद है।


    ट्रंप ने क्या आरोप लगाए

    ट्रंप ने यह मुकदमा पहले फ्लोरिडा की अदालत में दायर किया था, जहां अब उनका मुख्य निवास है। उनका कहना है कि बैंक ने ‘ट्रेड लाइबल’ किया और फ्लोरिडा के अनुचित और भ्रामक व्यापार कानून का उल्लंघन किया। मुकदमे में आरोप है कि जब खाते बंद किए जा रहे थे, तब ट्रंप ने जेमी डाइमोन से व्यक्तिगत रूप से बात की थी और उन्होंने मामले को देखने का आश्वासन दिया था, लेकिन बाद में कोई कार्रवाई नहीं हुई।

    ट्रंप के वकीलों ने आरोप लगाया है कि बैंक ने राष्ट्रपति और उनकी कंपनियों को एक ‘ब्लैकलिस्ट’ में डाल दिया। उनका कहना है कि इस सूची का उपयोग अन्य बैंक भी करते हैं। इससे भविष्य में नए खाते खोलने या सेवाएं लेने में दिक्कत आती है। वकीलों का दावा है कि इससे ट्रंप परिवार और उनके कारोबार को भारी आर्थिक नुकसान हुआ।


    डीबैंकिंग को लेकर फिर बहस तेज

    यह मामला तथाकथित ‘डीबैंकिंग’ की बहस को फिर से तेज कर रहा है। डीबैंकिंग तब होता है जब बैंक किसी ग्राहक के खाते बंद कर देता है या उसे सेवाएं देने से मना कर देता है। पिछले कुछ वर्षों में यह मुद्दा राजनीतिक रंग ले चुका है। कई रूढ़िवादी नेताओं का आरोप रहा है कि 6 जनवरी की घटना के बाद ‘जोखिम’ के नाम पर उनके खिलाफ कार्रवाई की गई।

    जेपीमॉर्गन अब इस केस को न्यूयॉर्क स्थानांतरित कराने की कोशिश कर रहा है, जहां खाते संचालित होते थे। यह ट्रंप का किसी बड़े बैंक के खिलाफ पहला मामला नहीं है। मार्च 2025 में ट्रंप ऑर्गनाइजेशन ने क्रेडिट कार्ड कंपनी कैपिटल वन पर भी इसी तरह का मुकदमा दायर किया था, जो अभी लंबित है।

  • China: स्प्रिंग फेस्टिवल गाला में छाए ह्यूमनॉइड रोबोट… एक साल में बदली तस्वीर

    China: स्प्रिंग फेस्टिवल गाला में छाए ह्यूमनॉइड रोबोट… एक साल में बदली तस्वीर


    बीजिंग।
    जो ह्यूमनॉइड रोबोट (Humanoid Robots) एक साल पहले सार्वजनिक प्रदर्शनों में गिरते-पड़ते नजर आते थे और जिनकी तकनीकी क्षमता पर संदेह जताया जाता था, वही अब कुंग फू फ्लिप्स (Kung Fu Flips), जिम्नास्टिक (Gymnastics) और हाई-प्रिसिजन डांस मूव्स (High-precision dance moves) के साथ चीन के स्प्रिंग फेस्टिवल गाला में छा गए हैं। दुनिया के सबसे ज्यादा देखे जाने वाले इस टीवी शो में चीनी स्टार्टअप्स के रोबोट्स ने यह साफ कर दिया कि तकनीक कितनी तेजी से आगे बढ़ रही है।

    इस प्रदर्शन ने जहां दर्शकों को रोमांचित किया, वहीं अमेरिका-चीन टेक रेस, नौकरियों के भविष्य और एआई आधारित मशीनों की बढ़ती ताकत पर वैश्विक बहस भी तेज कर दी है। हालांकि विश्लेषकों ने चेतावनी दी है कि असली परीक्षा अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस मॉडल और जटिल मानवीय वातावरण में विश्वसनीय प्रदर्शन की होगी।

    एक रिपोर्ट के अनुसार चीन के स्प्रिंग फेस्टिवल गाला में इस बार कई स्टार्टअप कंपनियों के ह्यूमनॉइड रोबोट्स ने हिस्सा लिया। इन रोबोट्स ने कुंग फू स्टंट, समन्वित नृत्य और जिम्नास्टिक जैसे जटिल प्रदर्शन किए। यह प्रस्तुति 2025 के गाला से बिल्कुल अलग रही, जब अपेक्षाकृत कम उन्नत रोबोट्स रूमाल घुमाते हुए लोकनृत्य करते नजर आए थे और उनकी चाल अस्थिर दिखी थी। पिछले वर्ष अप्रैल में आयोजित एक रोबोट मैराथन भी सुर्खियों में रहा था, जहां कई रोबोट ठोकर खाते, गिरते या तकनीकी खराबी के कारण रुक जाते देखे गए थे। उस समय इन मशीनों की विश्वसनीयता पर सवाल उठे थे। लेकिन केवल एक वर्ष में तकनीकी सुधार ने धारणा बदल दी है। इस संबंध में सेमीएनालिसिस के विश्लेषक रेक नूटसेन ने कहा कि अब इन रोबोट्स को हल्के में नहीं लिया जा सकता। उनके अनुसार स्प्रिंग गाला के प्रदर्शन के बाद रोबोट पहले से अधिक संतुलित, लचीले और सक्षम दिखे हैं।


    निर्माण और तैनाती में चीन की शुरुआती बढ़त

    बार्कलेज के आंकड़ों के अनुसार 2025 में दुनिया भर में लगभग 15,000 ह्यूमनॉइड रोबोट इंस्टॉलेशन हुए, जिनमें से 85 प्रतिशत से अधिक चीन में थे, जबकि अमेरिका की हिस्सेदारी लगभग 13 प्रतिशत रही। बार्कलेज की थीमैटिक एफआईसीसी रिसर्च प्रमुख जोर्नित्सा तोदोरोवा के मुताबिक चीन की सबसे बड़ी ताकत उसकी लगभग पूर्णतः वर्टिकली इंटीग्रेटेड रोबोटिक्स वैल्यू चेन है, रेयर अर्थ खनिजों और उच्च- प्रदर्शन मैग्नेट से लेकर भौतिक पुर्जों और बैटरियों तक।

    अमेरिका में टेस्ला का ऑप्टिमस रोबोट प्रमुख ह्यूमनॉइड परियोजनाओं में से एक है। टेस्ला के सीईओ एलन मस्क ने जनवरी 2025 की अर्निंग कॉल में कहा, यदि वार्षिक उत्पादन 10 लाख इकाइयों तक पहुंचता है तो उत्पादन लागत 20,000 डॉलर से नीचे लाई जा सकती है, हालांकि अंतिम कीमत बाजार मांग पर निर्भर करेगी।

  • नेपाल में हुई चीन-पाक की Secret Meeting…. भारत के खिलाफ साजिश रोडमैप किया तैयार

    नेपाल में हुई चीन-पाक की Secret Meeting…. भारत के खिलाफ साजिश रोडमैप किया तैयार


    बीजिंग।
    नेपाल (Nepal) की राजधानी काठमांडो के सबसे सुरक्षित माने जाने वाले रिहायशी इलाके बालुवाटार में 16 फरवरी को पाकिस्तान और चीन के अधिकारियों (Pakistani and Chinese officials) की एक सीक्रेट बैठक (Secret Meeting) आयोजित की गई। इस बैठक में चीन और पाकिस्तान के आला अधिकारी मौजूद थे। खास बात यह रही कि इस बैठक में नेपाल स्थित पाकिस्तान दूतावास में तैनात पाकिस्तानी डिफेंस अटैची कर्नल हफीज उर रहमान भी शामिल हुए।

    इस बैठक में भारत को अस्थिर करने के लिए अरुणाचल प्रदेश (Arunachal Pradesh) के नाम पर साजिश का एक रोडमैप तैयार किया गया। इसके लिए बाकायदा चीन और पाकिस्तान में नेपाल के स्थानीय पत्रकारों से लेकर समाजसेवियों व दक्षिणी नेपाल के मधेशिया समुदाय से ताल्लुक रखने वाले लोगों को चिन्हित कर टास्क देने की पूरी योजना बनाई गई। केंद्रीय खुफिया एजेंसी को लगातार मिल रहे इनपुट के आधार पर इस बात के पुख्ता प्रमाण मिल चुके हैं कि भारत के खिलाफ साजिश रचने के लिए चीन और पाकिस्तान नेपाल की जमीन का इस्तेमाल कर रहे हैं।
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    सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक इस बैठक में पाकिस्तान और चीन के सात प्रमुख अधिकारी शामिल थे। तकरीबन पौने दो घंटे चली इस बैठक में चीन की ओर से भारत को अस्थिर करने के लिए अरुणाचल प्रदेश का जिक्र किया गया। बैठक 20 फरवरी को मनाए जाने वाले अरुणाचल प्रदेश के स्थापना दिवस पर माहौल खराब करने के लिए की गई थी। इसके लिए बाकायदा चीन ने 23 स्थानीय लोगों का चयन किया था।


    एक्सचेंज प्रोग्राम की आड़ में भड़काने की योजना

    इस योजना के तहत नेपाल के उन लोगों को चयनित किया गया था जो कि चीन के अलग-अलग हिस्सों में बीते दो वर्षों के दौरान यात्रा करके आए थे। हालांकि यह बात अलग है चीन और पाकिस्तान की बड़ी साजिश जो कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तवांग को अपना हिस्सा बताने का नैरेटिव सेट करने की थी पूरी तरह फ्लॉप हो गई। इसमें योजना यह बनाई गई थी कि नेपाल के इन 23 लोगों में से कुछ लोगों को भारत भेजा जाएगा। अभी भी इसमें से 14 लोगों को नॉर्थ ईस्ट जाकर पूरी जानकारियां इकट्ठा करने के लिए भेजने की योजना बनाई जा रही है।

    केंद्रीय खुफिया एजेंसी को मिले इनपुट के आधार पर इस बात की भी पुष्टि हुई है कि इस पूरी योजना के पीछे चीन के चेंगदू स्थित पीपुल्स लिबरेशन आर्मी के पश्चिमी थिएटर कमान के कुछ अधिकारियों की पूरी साजिश थी। दरअसल दिसंबर 2024 से चीन ने नेपाल के ललितपुर और कीर्तिपुर में अपने सांस्कृतिक कार्यक्रमों और धरोहरों के साथ अपनी भाषा के प्रचार के लिए दो केंद्र स्थापित किए हैं।


    अब तक हो चुकीं कई बैठकें

    सूत्रों के मुताबिक बीते कुछ समय से चीन और पाकिस्तान के अधिकारियों के बीच में काठमांडू में लगातार कई बैठकें आयोजित की जा चुकी है। इसमें कई बैठकें तो ऐसी भी आयोजित हुई हैं जिसमें दूतावास के कार्यक्रमों के बहाने पकिस्तान की आईएसआई से जुड़े अधिकारी भी नेपाल पहुंचे। पिछले सोमवार को आयोजित हुई इस बैठक में पकिस्तान के डिफेंस अटैची समेत दूतावास के तीन प्रमुख अधिकारी भी शामिल थे।

    सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक इस बैठक में पाकिस्तान के अधिकारियों ने चीनी अधिकारियों के साथ बलूचिस्तान में हो रहे विद्रोह और उसके चलते पाकिस्तान में चीन की ओर से चलाई जाने वाले प्रोजेक्ट की पूरी रिपोर्ट की चर्चा की गई।

  • पाकिस्तान ने फिर अफगानिस्तान में घुसकर की सैन्य कार्रवाई, 7 आतंकी ठिकानों पर दागी मिसाइल

    पाकिस्तान ने फिर अफगानिस्तान में घुसकर की सैन्य कार्रवाई, 7 आतंकी ठिकानों पर दागी मिसाइल


    इस्लामाबाद/काबुल।
    पाकिस्तान (Pakistan) ने एक बार फिर अफगानिस्तान (Afghanistan.) के भीतर घुसकर सैन्य कार्रवाई (Military Action) की है. एक रिपोर्ट के मुताबिक पाकिस्तान के सूचना मंत्रालय ने सोशल मीडिया पर बयान जारी कर कहा कि सीमा पार सात आतंकी कैंप और ठिकानों को निशाना बनाया गया।

    इस्लामाबाद का कहना है कि ये ठिकाने प्रतिबंधित तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान यानी TTP और इस्लामिक स्टेट-खोरासान (ISKP) से जुड़े लोगों के थे. पाकिस्तान सरकार TTP को ‘फितना अल खवारिज’ कहती है. बयान में कहा गया कि हाल के आत्मघाती हमलों, जिनमें इस्लामाबाद की इमाम बारगाह, बाजौर और बन्नू में धमाके शामिल हैं, के बाद यह जवाबी कार्रवाई की गई. रमजान के महीने में हुए ताजा हमले को भी इसका कारण बताया गया. पाकिस्तान ने दावा किया है कि उसके पास पक्के सबूत हैं कि ये हमले अफगानिस्तान में बैठे नेतृत्व और संचालकों के इशारे पर कराए गए. बयान में कहा गया कि जिम्मेदारी भी अफगानिस्तान में मौजूद टीटीपी और ISKP ने ली थी. पाकिस्तान का कहना है कि यह कार्रवाई खुफिया जानकारी के आधार पर चुने हुए ठिकानों पर की गई. इस हमले पर तालिबान ने कहा है कि अब वह सही समय पर जवाब देगा।

    बलूच एक्टिविस्ट मीर यार बलोच ने इस हमले की कड़ी आलोचना की है. उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा कि पाकिस्तान की कायर सेना ने एक बार फिर अफगानिस्तान की हवाई सीमा का उल्लंघन किया और पक्तिका प्रांत के बरमल जिले में ड्रोन और हवाई हमले किए. उनके मुताबिक इन हमलों में एक धार्मिक मदरसे को निशाना बनाया गया, जहां मौजूद कुरान की प्रतियां भी नष्ट हो गईं. मीर यार बलोच ने इसे ‘दमनकारी सैन्य कार्रवाई’ करार दिया और कहा कि इस तरह की कार्रवाई क्षेत्र में अस्थिरता और नफरत को और बढ़ाएगी. उन्होंने यह भी याद दिलाया कि पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ने रमजान से पहले कार्रवाई की धमकी दी थी।


    तालिबान के प्रवक्ता ने क्या कहा?

    अफगान तालिबान के प्रवक्ता जबीहुल्लाह मुजाहिद ने पाकिस्तान पर तीखा हमला बोलते हुए कहा कि बीती रात पाकिस्तानी सेना ने अफगान क्षेत्र में घुसकर नंगरहार और पक्तिका प्रांतों में बमबारी की. उन्होंने दावा किया कि इन हमलों में महिलाएं और बच्चे भी मारे गए और कई लोग घायल हुए हैं. मुजाहिद ने आरोप लगाया कि पाकिस्तान अपनी सुरक्षा नाकामियों को छिपाने के लिए अफगान जमीन को निशाना बना रहा है और ऐसे कदम क्षेत्र में हालात और बिगाड़ेंगे।


    एयर स्ट्राइक से पहले दहला पाकिस्तान

    इस हमले से पहले खैबर पख्तूनख्वा के बन्नू जिले में एक आत्मघाती हमला हुआ था. पाकिस्तानी सेना के मीडिया विंग ISPR के अनुसार, एक खुफिया अभियान के दौरान सेना के काफिले को निशाना बनाया गया. हमले में एक लेफ्टिनेंट कर्नल और एक सिपाही की मौत हो गई. सेना ने कहा कि पांच आतंकियों को मार गिराया गया, लेकिन एक विस्फोटक वाहन सेना की गाड़ी से टकरा गया, जिससे भारी नुकसान हुआ. इससे पहले 16 फरवरी को बाजौर में भी एक बड़ा आत्मघाती हमला हुआ था. उसमें 11 पाकिस्तानी सैनिकों की मौत हुई थी. एक बच्ची की भी जान गई थी और कई लोग घायल हुए थे. पाकिस्तान ने कहा कि हमलावर अफगान तालिबान की विशेष इकाई से जुड़ा था और टीटीपी ने हमले की जिम्मेदारी ली थी।


    पाकिस्तान का क्या है आरोप?

    पाकिस्तान ने आरोप लगाया है कि अफगान तालिबान सरकार अपनी जमीन से टीटीपी को काम करने से रोकने में नाकाम रही है. बयान में कहा गया कि कई बार चेतावनी देने के बावजूद ठोस कदम नहीं उठाए गए. पाकिस्तान ने दोहा समझौते का हवाला देते हुए कहा कि अफगान अंतरिम सरकार को अपनी जमीन किसी दूसरे देश के खिलाफ इस्तेमाल नहीं होने देना चाहिए।


    पहले भी किया है हमला

    यह पहली बार नहीं है जब पाकिस्तान ने सीमा पार हमला किया हो. पिछले साल भी अफगानिस्तान के खोस्त, कुनार और पक्तिका प्रांतों में हवाई हमलों की खबर आई थी. उस समय काबुल ने पाकिस्तान पर बमबारी का आरोप लगाया था, हालांकि इस्लामाबाद ने आधिकारिक पुष्टि नहीं की थी. दोनों देशों के रिश्ते 2021 में अफगान तालिबान के सत्ता में आने के बाद से लगातार बिगड़ते रहे हैं. सीमा पर झड़पें आम हो चुकी हैं।