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  • सब्जियों से पाएं घर पर ही चमकती और स्वस्थ त्वचा, जानिए कैसे करें इस्‍तेमाल?

    सब्जियों से पाएं घर पर ही चमकती और स्वस्थ त्वचा, जानिए कैसे करें इस्‍तेमाल?


    नई दिल्‍ली । आज के समय में बाजार में स्किन केयर के लिए कई महंगे प्रोडक्ट्स उपलब्ध हैं लेकिन असली खूबसूरती आपकी त्वचा को मिलने वाले पोषण पर निर्भर करती है। सब्जियां विटामिन और मिनरल्स का खजाना होती हैं और यही आपकी त्वचा की प्राकृतिक चमक का राज हैं। अपनी डाइट में भरपूर सब्जियों को शामिल करना पहला कदम है लेकिन कुछ सब्जियों का रस सीधे चेहरे पर लगाने से भी अद्भुत परिणाम मिल सकते हैं। त्वचा के लिए विटामिन A C और E बेहद महत्वपूर्ण हैं क्योंकि ये सूर्य की हानिकारक किरणों से बचाते हैं और त्वचा को स्वस्थ बनाए रखते हैं।

    उदाहरण के तौर पर टमाटर का रस दाग-धब्बों पिगमेंटेशन और सूर्य की वजह से टैनिंग में राहत देता है। टमाटर में लाइकोपीन विटामिन C और अन्य शक्तिशाली एंटीऑक्सीडेंट्स भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं जो त्वचा को अंदर तक साफ और ताजगी भरी बनाते हैं। आप पके हुए टमाटर का रस निकालकर उसमें दही और शहद मिलाकर चेहरे पर 15–20 मिनट तक लगा सकते हैं। इसके अलावा टमाटर के फ्रीज किए हुए स्लाइस से हल्की मसाज करने पर खुले पोर्स कसने और त्वचा में ताजगी लाने में मदद मिलती है।

    आलू का रस भी चेहरे की प्राकृतिक चमक के लिए फायदेमंद है। आलू त्वचा को अंदर से पोषण देता है और रंगत को सुधारने में मदद करता है। इसे सीधे चेहरे पर लगाना या चावल का आटा हल्दी टमाटर का रस और गुलाबजल के साथ फेस पैक बनाकर इस्तेमाल करना प्रभावी होता है। हफ्ते में दो बार इसका प्रयोग करने से त्वचा में निखार आता है।

    बीटरूट यानी चुकंदर त्वचा में गुलाबी और ताजगी भरी चमक लाने में कारगर है। इसके रस को सीधे चेहरे पर हल्की मसाज के लिए लगाया जा सकता है या नारियल तेल के साथ मिलाकर लिप बाम की तरह इस्तेमाल किया जा सकता है। चुकंदर दही बेसन और नींबू के साथ फेस पैक बनाकर 15–20 मिनट तक चेहरे पर लगाने से स्किन रेडिएंट बनती है।

    खीरा त्वचा को प्राकृतिक हाइड्रेशन देने के लिए अच्छा है। गर्मियों में खीरे का कद्दूकस करके पलकों पर 10–15 मिनट रखने से आंखों के नीचे पफीनेस और थकान कम होती है। खीरे का रस सीधे चेहरे पर लगाने या टमाटर के रस के साथ मिलाकर इस्तेमाल करने से त्वचा क्लीन और ग्लोइंग बनती है।

    सर्दियों में गाजर का रस भी त्वचा के लिए बेहतरीन है। यह विटामिन A का खजाना है और एक्ने कम करने त्वचा को रेडिएंट बनाने और पोर्स को कसाव देने में मदद करता है। गाजर का रस सीधे चेहरे पर लगाना या बेसन हल्दी और शहद के साथ फेस पैक बनाकर इस्तेमाल करना फायदेमंद होता है।

  • हल्की खांसी भी हो सकती है फेफड़ों के कैंसर की चेतावनी, आयुष मंत्रालय ने दिए जरूरी लक्षण

    हल्की खांसी भी हो सकती है फेफड़ों के कैंसर की चेतावनी, आयुष मंत्रालय ने दिए जरूरी लक्षण


    नई दिल्ली ।देश में डायबिटीज और थायराइड की बढ़ती समस्या के बाद अब फेफड़ों का कैंसर भी तेजी से बढ़ता जा रहा है। आईसीएमआर की रिपोर्ट के अनुसार 2025 में 81,219 पुरुष और 30,109 महिलाओं में नए फेफड़ों के कैंसर के मामले दर्ज किए गए। विशेषज्ञों का कहना है कि हल्की खांसी और सामान्य श्वसन संबंधी परेशानियां भी कभी-कभार कैंसर का संकेत हो सकती हैं। इसी को ध्यान में रखते हुए आयुष मंत्रालय ने हाल ही में फेफड़ों के कैंसर के प्रति जागरूकता फैलाने के लिए सोशल मीडिया पोस्ट शेयर किया है और इस गंभीर बीमारी के लक्षण और बचाव के उपाय बताए हैं।

    आयुष मंत्रालय ने बताया कि फेफड़ों के कैंसर के शुरुआती लक्षण अक्सर हल्के होते हैं और इन्हें सामान्य श्वसन संबंधी बीमारियों से मिलाया जा सकता है। लगातार खांसी, थकान, सांस लेने में कठिनाई, सीने में दर्द या बिना किसी स्पष्ट कारण के वजन कम होना जैसे संकेतों को नजरअंदाज करना खतरनाक हो सकता है। मंत्रालय ने जोर दिया कि सही समय पर लक्षणों को पहचानकर डॉक्टर से सलाह लेना और इलाज शुरू करना कई लोगों की जान बचा सकता है।

    फेफड़ों के कैंसर के मुख्य कारणों में सिर्फ तंबाकू या धूम्रपान ही शामिल नहीं हैं। इसमें परोक्ष धूम्रपान वायु प्रदूषण और रसायनों या एस्बेस्टस से जुड़े व्यावसायिक उद्योग भी जोखिम बढ़ाते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि इन कारकों के प्रभाव को समझना और बचाव के उपाय अपनाना हर व्यक्ति के लिए आवश्यक है।

    फेफड़ों का कैंसर मूलतः तब होता है जब फेफड़ों की कोशिकाएं सामान्य विभाजन प्रक्रिया के दौरान अनियमित रूप से बदल जाती हैं और ट्यूमर का रूप ले लेती हैं। इस स्थिति में फेफड़े ठीक से काम नहीं कर पाते और समय रहते इलाज न मिलने पर शरीर के अन्य हिस्सों में भी बीमारी फैल सकती है। फेफड़ों में मुख्यतः दो प्रकार के कैंसर पाए जाते हैं। पहला नॉन-स्मॉल सेल लंग कैंसर है और दूसरा स्मॉल सेल लंग कैंसर।

    भारत में नॉन-स्मॉल सेल लंग कैंसर के मामले अधिक पाए जाते हैं। यदि इसे शुरुआती दौर में पहचान लिया जाए तो इसका इलाज संभव है और मरीज स्वस्थ हो सकते हैं। वहीं स्मॉल सेल लंग कैंसर अधिक खतरनाक माना जाता है क्योंकि यह शरीर के अन्य हिस्सों में तेजी से फैलता है और इलाज मुश्किल हो जाता है। विशेषज्ञों का मानना है कि सही समय पर जांच और उपचार न होने पर दोनों प्रकार के कैंसर गंभीर परिणाम दे सकते हैं।

    आयुष मंत्रालय ने लोगों से आग्रह किया है कि फेफड़ों से जुड़ी किसी भी असामान्य समस्या को नजरअंदाज न करें। हल्की खांसी को भी गंभीरता से लें और डॉक्टर से जांच कराएं। साथ ही तंबाकू और धूम्रपान से दूर रहें, वायु प्रदूषण से बचाव करें और व्यावसायिक जोखिमों को समझें। यदि समय पर सावधानी और इलाज शुरू कर दिया जाए तो फेफड़ों के कैंसर से बचाव और रोग प्रबंधन दोनों ही संभव हैं।

    देश में जागरूकता फैलाना और लोगों को लक्षणों की पहचान कराना बेहद महत्वपूर्ण है। आयुष मंत्रालय की पहल इसी दिशा में एक कदम है। विशेषज्ञों का कहना है कि नियमित स्वास्थ्य जांच और समय पर इलाज से फेफड़ों के कैंसर से होने वाली मृत्यु दर को कम किया जा सकता है।

  • वेलेंटाइन डे पर पार्टनर के साथ रोड ट्रिप के लिए ये जगहें हैं परफेक्ट

    वेलेंटाइन डे पर पार्टनर के साथ रोड ट्रिप के लिए ये जगहें हैं परफेक्ट


    नई दिल्ली । वेलेंटाइन डे का नाम आते ही अक्सर हमारे मन में किसी महंगे होटल या कैंडल लाइट डिनर का ख्याल आता है, लेकिन प्यार का असली आनंद तो साथ बिताए गए उन लम्हों में है, जहां शोर कम और सुकून ज्यादा हो. इस 14 फरवरी अगर आप अपनी पार्टनर के साथ भीड़भाड़ से दूर कुछ अलग प्लान करना चाहते हैं, तो रोड ट्रिप से बेहतर कुछ नहीं हो सकता.भारत में कई ऐसे ड्राइविंग रूट्स हैं जहां खिड़की के बाहर बदलते नजारे, हल्का संगीत और पार्टनर का साथ आपके सफर को किसी फिल्म के रोमांटिक सीन जैसा बना देगा. तो चलिए जानते हैं उन खूबसूरत रास्तों के बारे में जहां मंजिल की जल्दबाजी नहीं, बल्कि रास्तों की खूबसूरती आपके प्यार को एक नया अहसास देगी.

    पहाड़ों की ठंडी हवाओं में घुलेगा रोमांस

    उत्तर भारत के जोड़ों के लिए हिमालय की गोद में बसी वादियां हमेशा से पहली पसंद रही हैं. दिल्ली से मनाली का सफर हो या मसूरी की धुंध भरी सुबह, इन रास्तों पर बर्फ से ढके पहाड़ और देवदार के पेड़ों के बीच से गुजरना एक जादुई अनुभव होता है. इसके अलावा, दिल्ली से कसौली की घुमावदार सड़कें शिवालिक पहाड़ियों के ऐसे नजारे पेश करती हैं जो आपके सफर को यादगार बना देते हैं. यही नहीं, मसूरी के लाल टिब्बा पर साथ में सूर्यास्त देखना हो या सोलंग वैली की बर्फीली वादियों में हाथ थामकर चलना, पहाड़ों की यह शांति आपके बीच की बातचीत को और भी गहरा और अर्थपूर्ण बना देती है.

    राजस्थान की सड़कों पर महसूस करें शाही अंदाज

    अगर आप अपने वेलेंटाइन को थोड़ा राजसी और ऐतिहासिक रंग देना चाहते हैं, तो राजस्थान की सड़कें आपका स्वागत करने के लिए तैयार हैं. जयपुर से उदयपुर की ड्राइव आपको किलों और महलों के बीच से ले जाती है, जहां पहुंचकर पिछोला झील के किनारे शाही डिनर का लुत्फ उठाया जा सकता है. उदयपुर को ‘सिटी ऑफ लेक्स’ के साथ-साथ प्रेम का शहर भी कहा जाता है, जो जोड़ों के लिए स्वर्ग से कम नहीं है. इसके अलावा, अगर आपको रेगिस्तान की खामोशी पसंद है, तो जैसलमेर के सुनहरे रेत के टीलों पर पार्टनर के साथ डूबते सूरज को देखना एक ऐसा अहसास है जो शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता.

    दक्षिण भारत के कॉफी बागानों और समंदर का साथ

    प्राकृतिक सुंदरता और शांति की तलाश करने वाले कपल्स के लिए दक्षिण भारत के रास्ते किसी जन्नत से कम नहीं हैं. बेंगलुरु से कूर्ग की ड्राइव आपको भारत के ‘स्कॉटलैंड’ तक ले जाती है, जहां कॉफी के बागानों की खुशबू और चारों तरफ फैली हरियाली आपके मन को तरोताजा कर देती है. इसके अलावा, कोच्चि से मुन्नार का रास्ता चाय के बागानों और खूबसूरत झरनों से होकर गुजरता है, जो सफर को बेहद रोमांटिक बना देता है. यही नहीं, चेन्नई से पांडिचेरी का ईस्ट कोस्ट रोड एक तरफ नीला समंदर और दूसरी तरफ खुली सड़क का ऐसा मेल कराता है, जहां गाड़ी चलाना अपने आप में एक उत्सव बन जाता है.

    बीच वाइब्स और लॉन्ग ड्राइव का बेजोड़ मेल

    एडवेंचर और मस्ती पसंद करने वाले जोड़ों के लिए पश्चिम भारत की सड़कें सबसे रोमांचक विकल्प पेश करती हैं. मुंबई से गोवा का सफर उन लोगों के लिए बेहतरीन है जो आजादी और पार्टी वाइब्स को प्यार के साथ जोड़ना चाहते हैं. यहां के नारियल के पेड़ों से घिरी सड़कें और समंदर किनारे के कैफे आपके वेलेंटाइन को जोश से भर देते हैं. इसके अलावा, अगर आपके पास समय कम है, तो मुंबई से लोनावला की छोटी सी ड्राइव भी एक परफेक्ट रोमांटिक गेटअवे साबित हो सकती है. लोनावला की हरी-भरी वादियां और रास्ते में मिलने वाले छोटे-छोटे झरने आपके सफर में प्यार की मिठास घोलने के लिए काफी हैं.

  • राजा बेटा कहकर पाल रहे हैं तो सावधान भारतीय पेरेंटिंग की यह आदत बहुओं और समाज पर डाल रही बोझ

    राजा बेटा कहकर पाल रहे हैं तो सावधान भारतीय पेरेंटिंग की यह आदत बहुओं और समाज पर डाल रही बोझ

    नई दिल्ली :भारतीय परिवारों में राजा बेटा शब्द अक्सर प्यार और गर्व के साथ बोला जाता है। मां बाप को लगता है कि बेटे को हर सुविधा देना और हर जिम्मेदारी से दूर रखना उनका फर्ज है। लेकिन मनोवैज्ञानिक अब चेतावनी दे रहे हैं कि यही सोच आगे चलकर बच्चों खासकर बेटों के भविष्य के लिए खतरनाक साबित हो सकती है। इस व्यवहार को विशेषज्ञ राजा बेटा सिंड्रोम का नाम दे रहे हैं।

    मनोवैज्ञानिकों के अनुसार राजा बेटा सिंड्रोम कोई मेडिकल बीमारी नहीं बल्कि एक व्यवहारिक स्थिति है। यह तब विकसित होती है जब माता पिता बेटे से कभी जवाबदेही की उम्मीद नहीं करते। उसे घर के कामों से दूर रखा जाता है। उसकी गलतियों को यह कहकर टाल दिया जाता है कि वह अभी बच्चा है। नतीजा यह होता है कि उम्र बढ़ने के साथ शरीर तो बड़ा हो जाता है लेकिन मानसिक परिपक्वता विकसित नहीं हो पाती।

    सोशल मीडिया पर साइकोलॉजिस्ट स्नोई राही का एक वीडियो इन दिनों चर्चा में है। इस वीडियो में उन्होंने इस सिंड्रोम की जड़ पर सीधा प्रहार किया है। उन्होंने एक असल अनुभव साझा करते हुए बताया कि वह एक घर में गईं जहां एक पूरी तरह वयस्क बेटा सोफे पर लेटा हुआ था। न उसने मेहमान का अभिवादन किया और न ही अपनी जगह से हिला। मां ने प्यार से उसके सिर को चूमा तो उसका जवाब था कि उसे गेम खेलने दिया जाए। यह दृश्य बताता है कि कैसे जरूरत से ज्यादा लाड़ प्यार सम्मान और जिम्मेदारी की भावना को खत्म कर देता है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि राजा बेटा सिंड्रोम का सबसे गहरा असर शादी के बाद सामने आता है। ऐसे पुरुष शादी के बाद भी अपने रोजमर्रा के कामों के लिए पत्नी पर निर्भर रहते हैं। खाना बनाना हो घर संभालना हो या छोटी छोटी जिम्मेदारियां निभानी हों वे अक्सर यह कहकर बच निकलते हैं कि उन्हें यह सब नहीं आता। समस्या यह नहीं कि वे सीख नहीं सकते बल्कि यह है कि उनसे कभी सीखने की उम्मीद ही नहीं की गई।

    इस विषय पर इंटरनेट पर तीखी बहस छिड़ गई है। कई लोग अपनी निजी कहानियां साझा कर रहे हैं। किसी ने लिखा कि उनके भाई की परवरिश भी बिल्कुल इसी पैटर्न पर हुई है। एक यूजर ने बताया कि एक कामकाजी व्यक्ति हर पंद्रह दिन में अपने गंदे कपड़ों का सूटकेस मां के पास धुलवाने के लिए लेकर आता है। कुछ लोगों का यह भी कहना है कि कई बार माता पिता अपनी निजी जिंदगी के खालीपन को भरने के लिए बेटे को जरूरत से ज्यादा केंद्र में रख लेते हैं जिससे आगे चलकर बहू के प्रति असंतोष और टकराव पैदा होता है।

    मनोवैज्ञानिक साफ कहते हैं कि प्यार जरूरी है लेकिन बिना जिम्मेदारी के प्यार नुकसानदेह है। अगर बेटे को हर चीज तैयार मिलती रही तो वह एक सक्षम वयस्क नहीं बन पाएगा। जिम्मेदारी उठाना सीखना आत्मनिर्भर बनने की पहली सीढ़ी है। सही परवरिश वही है जिसमें प्यार और अनुशासन के बीच संतुलन हो ताकि बच्चा सिर्फ राजा बेटा नहीं बल्कि एक जिम्मेदार इंसान बन सके।

  • How To Get Glowing skin: चेहरे पर चाहिए नेचुरल चमक? ये 2 चीज लगाने से स्किन होगी रेशम जैसी मुलायम

    How To Get Glowing skin: चेहरे पर चाहिए नेचुरल चमक? ये 2 चीज लगाने से स्किन होगी रेशम जैसी मुलायम


    नई दिल्ली।सर्दियों त्वचा के लिए यह किसी परीक्षा से कम नहीं होता. ठंडी और शुष्क हवाएं स्किन की नमी को धीरे-धीरे सोख लेती हैं, जिससे चेहरे का कुदरती निखार कहीं खो जाता है. अक्सर इस मौसम में चेहरा काला, बेजान और पपड़ीदार दिखने लगता है. जब हवा में नमी की कमी होती है तो हमारी त्वचा के प्राकृतिक तेल सूखने लगते हैं जिससे बारीक रेखाएं और झुर्रियां उभरने लगती हैं. महिलाएं अक्सर इस रूखेपन को छिपाने के लिए ढेर सारा मेकअप या केमिकल वाली क्रीम लगाती हैं.
    ऐसे में हम यहां आपको बाजार के महंगे प्रोडक्ट्स के बजाय रसोई में मौजूद केला और मलाई का कॉम्बो वाले पैक की जानकारी दे रहे हैं जो आपकी स्किन के लिए किसी वरदान से कम नहीं है. केला विटामिन और पोटैशियम से भरपूर होता है जो त्वचा को पोषण देता है, वहीं मलाई एक नेचुरल मॉइस्चराइजर का काम करती है जो चेहरे पर कुदरती चमक और गुलाबी निखार लाती है.

    केले और मलाई का फेस पैक कैसे बनाएं?
    बनाने का तरीका: एक पका हुआ आधा केला लें और उसे अच्छी तरह मैश (मसल) लें. अब इसमें एक बड़ा चम्मच ताजी दूध की मलाई मिलाएं. अगर आपकी स्किन ज्यादा ड्राई है, तो इसमें आधा चम्मच शहद भी डाल सकते हैं.

    लगाने का तरीका: इस स्मूथ पेस्ट को चेहरे और गर्दन पर अच्छी तरह लगाएं. इसे 15-20 मिनट तक लगा रहने दें जब तक यह हल्का सूख न जाए.
    साफ करने का तरीका: चेहरे को गुनगुने पानी से हल्के हाथों से मसाज करते हुए धो लें. टॉवल से चेहरा पोंछने के बाद आप महसूस करेंगे कि आपकी त्वचा रेशम जैसी मुलायम और चमकदार हो गई है.
  • यात्रा से पहले दिखने वाले संकेत:भारतीय लोकमान्यताओं में शुभ और अशुभ संकेतों का इतिहास

    यात्रा से पहले दिखने वाले संकेत:भारतीय लोकमान्यताओं में शुभ और अशुभ संकेतों का इतिहास


    नई दिल्ली।भारत में यात्रा को केवल एक जगह से दूसरी जगह जाने तक सीमित नहीं माना गया बल्कि इसे निर्णय जोखिम और परिणाम से जुड़ी प्रक्रिया समझा गया है। यही वजह है कि परंपरागत समाज में यात्रा के समय आसपास घटने वाली घटनाओं और दृश्य संकेतों को विशेष महत्व दिया गया। समय के साथ इन संकेतों को शुभ और अशुभ में वर्गीकृत किया गया जो आज भी जनमानस में प्रचलित हैं।

    समाजशास्त्रियों के अनुसार जब वैज्ञानिक जानकारी और पूर्वानुमान के साधन सीमित थे तब मनुष्य अपने अनुभवों के आधार पर प्रकृति और जीव-जंतुओं के व्यवहार को समझने की कोशिश करता था। यात्रा के दौरान बार-बार घटने वाली घटनाओं से लोगों ने निष्कर्ष निकाले और इन्हें संकेतों का रूप दिया। यही प्रक्रिया आगे चलकर शकुन परंपरा के रूप में स्थापित हुई।

    लोक मान्यताओं में कुछ पशु और पक्षियों को सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक माना गया। यात्रा के समय मोर नीलगाय या नेवले का दिखना कई क्षेत्रों में शुभ संकेत माना जाता रहा। ग्रामीण समाज में आज भी इन दृश्यों को यात्रा की सफलता और कार्य में लाभ से जोड़ा जाता है। विशेषज्ञ मानते हैं कि ऐसे विश्वास व्यक्ति को मानसिक रूप से निश्चिंत करते हैं और आत्मविश्वास बढ़ाते हैं।

    कुछ संकेत सीधे मानव जीवन और सामाजिक मूल्यों से जुड़े हैं। जैसे घर से निकलते समय किसी शांत व्यक्ति गाय या जल से भरे पात्र का दिखना संतुलन स्थिरता और समृद्धि का संकेत माना गया। इतिहासकार बताते हैं कि ये प्रतीक उस समय के सामाजिक और धार्मिक मूल्यों को दर्शाते हैं जब शुद्धता और संतुलन को जीवन का आधार माना गया।

    भारतीय लोक परंपरा में पक्षियों की आवाज़ और दिशा पर भी ध्यान दिया जाता रहा। शांत स्वर में बोलती चिड़िया या स्थिर बैठे पक्षी को लाभकारी माना गया जबकि अचानक घबराहट में उड़ते पक्षियों को सतर्कता का संकेत माना गया। यह पर्यावरणीय बदलावों को समझने की मानवीय कोशिश भी हो सकती है।कुछ मान्यताओं में यह देखा गया कि संकेत किस दिशा से दिखाई दे रहे हैं। दाईं ओर दिखने वाली गतिविधियों को कई क्षेत्रों में सकारात्मक माना गया। ये विश्वास क्षेत्रीय परंपराओं के अनुसार विकसित हुए हैं।

    मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से ऐसे संकेत व्यक्ति की मानसिक स्थिति पर असर डालते हैं। सकारात्मक संकेत आत्मविश्वास बढ़ाते हैं और बेहतर निर्णय में मदद करते हैं जबकि नकारात्मक संकेत सतर्कता और जोखिम कम करने में सहायक साबित होते हैं।आधुनिक समय में शहरों और तकनीकी समाज में इन संकेतों को अब व्यक्तिगत आस्था के रूप में देखा जाता है। हालांकि ये पूरी तरह समाप्त नहीं हुए हैं। विशेषज्ञ मानते हैं कि इन्हें अंधविश्वास न मानकर सांस्कृतिक विरासत और व्यवहारिक मनोविज्ञान के संदर्भ में समझना चाहिए।

  • दिल्ली का दूसरा साइड तो आपने देखा ही नहीं…5 ऐसी जगह जो राजधानी को दिखाती हैं औरों से अलग

    दिल्ली का दूसरा साइड तो आपने देखा ही नहीं…5 ऐसी जगह जो राजधानी को दिखाती हैं औरों से अलग


    नई दिल्ली । दिल्ली में हर मूड के इंसान के लिए कुछ ना कुछ है आप यहां इतिहास देख लें या यहां की संस्कृति सब कुछ एकदम अलग लगता है। दिल्ली केवल सैकड़ों साल पुराने किलों और इमारतों तक सीमित नहीं है बल्कि यहां पक्षियों से भरे वेटलैंड्स शांति-सुकून देने वाले पार्क और सलीके से बनाए गए गार्डन्स भी हैं जो टूरिस्ट ही नहीं बल्कि लोकल लोगों को भी बार-बार खींच लाते हैं। दिल्ली को देखना चाहते हैं तो चलिए जानते हैं यहां की कुछ ऐसी जगहों के बारे में जो उसे दूसरे शहरों से अलग बनाती हैं।

    ओखला बर्ड सैंक्चुरी

    अगर लगता है कि बर्ड वॉचिंग वाली जगहों पर देखने के लिए ज्यादा कुछ नहीं है तो ओखला बर्ड सैंक्चुरी आपकी सोच बदल सकती है। ये शहर के बीच मौजूद एक खास वैटलैंड है जहां कंक्रीट की इमारतों के बैकग्राउंड आपको हैरान कर देंगे। यमुना के फ्लडप्लेन्स में फैली इस सैंक्चुरी में 300 से ज्यादा तरह के पक्षी पाए जाते हैं खासकर सर्दियों के मौसम में। यहां आप सुबह जा सकते हैं क्योंकि इस दौरान माइग्रेटरी बर्ड्स जैसे पेंटेड स्टॉर्क पेल्किन और कई तरह के शिकारी पक्षी आसानी से दिख जाते हैं।
    हौज खास विलेज
    अगर दोस्तों के साथ यादगार शाम बिताना चाहते हैं तो हौज खास विलेज से बेहतर ऑप्शन मिलना काफी मुश्किल है। ये वो जगह है जहां पुराने जमाने का इतिहास और आज की मॉडर्न लाइफस्टाइल एक साथ देखने को मिलती है। यहां 13वीं सदी का हौज तालाब कब्रें और मदरसे के खंडहर हैं जो एक खूबसूरत झील को देखते हुए बनाए गए हैं। यहां कैफे बूटीक शॉप्स और आर्ट स्पेसेज की भरमार है।

    दिल्ली रिज जंगल ट्रेल
    दिल्ली रिज को अक्सर शहर की ग्रीन लंग्स कहते हैं यहां आते ही सच में खुलकर सांस लेने का एहसास होता है। यह जगह आपको कुछ देर के लिए शहर की भीड़-भाड़ और शोर से दूर जंगल जैसे माहौल में ले जाती है। सेंट्रल रिज और नॉर्थ रिज के आसपास के इलाके नेचर वॉक बर्ड वॉचिंग और शांत ट्रेक के लिए काफी पसंद किए जाते हैं। यहां के जमीन और रास्ते थोड़े आपको ऑफबीट लगेंगे।

    दिल्ली हाट

    दिल्ली हाट राजधानी में घूमने वाली बेहतरीन जगहों में शामिल है। ये एक ऐसी एयर मार्केट है जहां आपको भारत की कला शिल्प और खाने की झलक एक ही जगह पर मिल जाती है। यहां अलग राज्यों से आए कारीगर अपनी दुकानें लगाते हैं जिनमें हैंडलूम कपड़े जूलरी मिट्टी के बर्तन और लोक कला की चीजें मिलती हैं। खाने के शौकीनों के लिए भी ये जगह किसी जन्नत से कम नहीं। मोमोज लिट्टी-चोखा डोसा से लेकर कबाब तक हर राज्य के फेमस स्वाद यहां चखने को मिल जाएंगे।

    लाल किला

    लाल किला दिल्ली की पहचान और भारत के सबसे मजबूत ऐतिहासिक प्रतीकों में से एक है। ये यूनेस्को वर्ल्ड हेरिटेज साइट मुगल बादशाह शाहजहां द्वारा बनवाया गया था। इसकी ऊंची-ऊंची लाल पत्थर की दीवारों के अंदर महल दीवाने आम दीवाने खास और म्यूजियम हैं जो भारत के इतिहास के कई अहम किस्से बताते हैं।
  • एथलीट पेरेंट्स की दुविधा: जब बच्चे का मन न लगे मैदान में, तो दबाव नहीं 'डायरेक्शन' बदलें

    एथलीट पेरेंट्स की दुविधा: जब बच्चे का मन न लगे मैदान में, तो दबाव नहीं 'डायरेक्शन' बदलें


    नई दिल्ली । अक्सर देखा जाता है कि जिन घरों में माता-पिता खुद खेल की दुनिया के दिग्गज रहे हैं, वहां समाज और परिवार को उम्मीद होती है कि उनका बच्चा भी उसी विरासत को आगे बढ़ाएगा। लेकिन हकीकत इससे अलग हो सकती है। अगर आप एक एथलीट हैं और आपका बेटा स्पोर्ट्स में रुचि नहीं ले रहा, तो यह आपके लिए निराशाजनक हो सकता है, लेकिन यहाँ यह समझना जरूरी है कि ‘जबरदस्ती का खेल’ कभी चैंपियन पैदा नहीं करता।

    रुचि न होने के पीछे छिपे मनोवैज्ञानिक कारण अक्सर माता-पिता बच्चे की अरुचि को उसका ‘आलस’ मान लेते हैं, जबकि इसके पीछे कई गहरे मनोवैज्ञानिक कारण हो सकते हैं। सबसे बड़ा कारण ‘परफॉर्मेंस प्रेशर’ होता है। जब बच्चा देखता है कि उसके माता-पिता खेल में सफल रहे हैं, तो उसे हारने से डर लगने लगता है। उसे लगता है कि अगर वह अच्छा नहीं खेला, तो वह अपने माता-पिता के नाम को छोटा कर देगा। इसके अलावा, खेल के मैदान पर होने वाला सोशल जजमेंट या एंग्जाइटी भी उसे पीछे धकेलती है। कभी-कभी कारण शारीरिक भी होते हैं, जैसे लो-एनर्जी लेवल या किसी खेल विशेष में रुचि की कमी। सख्त कोच का व्यवहार या साथी खिलाड़ियों से लगातार तुलना भी बच्चे के मन में खेल के प्रति नफरत पैदा कर सकती है।

    फोर्स करना क्यों हो सकता है खतरनाक? यदि आप बच्चे को उसकी इच्छा के विरुद्ध मैदान पर भेजते हैं, तो इसके परिणाम नकारात्मक हो सकते हैं। जबरदस्ती करने से बच्चा न केवल खेल से दूर होगा, बल्कि उसका आत्मविश्वास भी डगमगा सकता है। दबाव में खेलने से उसमें चिड़चिड़ापन, तनाव और माता-पिता के प्रति विद्रोह की भावना पैदा हो सकती है। खेल जो खुशी और मानसिक शांति का माध्यम होना चाहिए, वह उसके लिए एक ‘बोझ’ बन जाता है। लॉन्ग टर्म में, यह आपके और बच्चे के बीच के भावनात्मक रिश्ते को भी कमजोर कर सकता है।

    क्या करें कि वह खेलों में रुचि ले? बतौर पेरेंट्स आपकी पहली जिम्मेदारी यह पहचानना है कि बच्चा किस चीज में ‘बेस्ट’ है। यदि उसे क्रिकेट या फुटबॉल पसंद नहीं, तो शायद उसे तैराकी, बैडमिंटन या चेस जैसा कोई अन्य खेल पसंद आ सकता है। उसे विभिन्न खेलों के विकल्प दें और खुद फैसला करने का मौका दें। घर का माहौल ऐसा रखें जहाँ खेल केवल जीतने के लिए नहीं, बल्कि आनंद और सेहत के लिए खेला जाए।

    याद रखें, सही पेरेंटिंग का अर्थ बच्चे को अपनी परछाई बनाना नहीं, बल्कि उसे उसकी अपनी चमक खोजने में मदद करना है। अगर वह खेल में करियर नहीं बनाना चाहता, तो भी उसे फिजिकल एक्टिविटी के अन्य तरीकों जैसे डांस या योग के लिए प्रेरित किया जा सकता है। उसे स्पोर्ट्स के फायदे बताएं, लेकिन उसे अपनी विरासत ढोने के लिए मजबूर न करें। जब बच्चा खुद को सुरक्षित और बिना किसी जजमेंट के महसूस करेगा, तभी वह अपनी असली प्रतिभा को निखार पाएगा।

  • Chocolate Day Special: चॉकलेट डे पर चाहिए दमकती त्वचा तो स्किन केयर में करें चॉकलेट का इस्तेमाल

    नई दिल्ली । वैलेंटाइन वीक तीसरे दिन यानी कि 9 फरवरी को चॉकलेट डे मनाया जाता है ऐसे में इस दिन कपल्स एक-दूसरे को चॉकलेट तोहफे में देते हैं। पर क्या आप जानते हैं कि इसी खाने वाली चॉकलेट से आप अपने चेहरे को दमका भी सकते हैं। जी हां आपको ये जानने की जरूरत है कि डार्क चॉकलेट त्वचा के लिए किसी वरदान से कम नहीं है?

    दरअसल इसमें मौजूद एंटीऑक्सीडेंट्स फ्लेवोनॉयड्स और मिनरल्स स्किन को फ्री रेडिकल्स से बचाते हैं और नेचुरल ग्लो लाने में मदद करते हैं। खासतौर पर आजकल नेचुरल और होम रेमेडीज की डिमांड तेजी से बढ़ रही है ऐसे में चॉकलेट फेस पैक एक ट्रेंडिंग ब्यूटी हैक बन चुका है।तो अगर आप केमिकल प्रोडक्ट्स से दूर रहकर नेचुरल तरीके से ग्लोइंग स्किन पाना चाहती हैं तो चॉकलेट का सही इस्तेमाल जानना बेहद ज़रूरी है। आइए इस लेख में आपको इसी बारे में जानकारी देते हैं।

    चॉकलेट फेस पैक
    डार्क चॉकलेट में भरपूर मात्रा में एंटीऑक्सीडेंट्स पाए जाते हैं जो त्वचा को फ्री रेडिकल्स से बचाते हैं।
    जब इसमें शहद और दूध मिलाया जाता है तो यह स्किन को गहराई से मॉइश्चराइज करता है। ये फेस पैक ड्राई और डल स्किन के लिए बेहद फायदेमंद है। हफ्ते में 1–2 बार इसका इस्तेमाल करने से चेहरे पर नेचुरल ग्लो आता है और स्किन सॉफ्ट व स्मूद बनती है।
    चॉकलेट स्क्रब
    चॉकलेट और ब्राउन शुगर से बना स्क्रब त्वचा की ऊपरी परत पर जमी डेड स्किन को हटाने में मदद करता है। ये ब्लड सर्कुलेशन को भी बेहतर बनाता है जिससे चेहरे पर तुरंत फ्रेशनेस नजर आती है।
    इस स्क्रब को हफ्ते में सिर्फ एक बार ही इस्तेमाल करें ताकि त्वचा को नुकसान न पहुंचे।

    चॉकलेट और कॉफी मास्क
    कॉफी में मौजूद कैफीन और चॉकलेट के पोषक तत्व मिलकर टैनिंग पिग्मेंटेशन और डार्क स्पॉट्स को हल्का करने में मदद करते हैं। गुलाब जल त्वचा को ठंडक देता है और पोर्स को टाइट करता है। ये मास्क ऑयली और कॉम्बिनेशन स्किन वालों के लिए खास तौर पर फायदेमंद है।
    बरतें ये सावधानी
    चेहरे पर लगाने से पहले हमेशा पैच टेस्ट करें ताकि किसी तरह की एलर्जी या जलन से बचा जा सके।
    स्किन के लिए केवल डार्क चॉकलेट का ही इस्तेमाल करें क्योंकि दूध या फ्लेवर वाली चॉकलेट में ज्यादा शुगर और केमिकल होते हैं।फेस पैक को 15–20 मिनट से अधिक समय तक चेहरे पर न रखें और स्क्रब करते समय त्वचा को जोर से न रगड़ें।अगर आपकी त्वचा सेंसिटिव या एक्ने-प्रोन है तो इसका इस्तेमाल सीमित मात्रा में करें। खुले घाव कट या एक्टिव मुंहासों पर चॉकलेट न लगाएं।

  • लेट मैरिज: मजबूरी नहीं, आज के युवाओं का सोच-समझकर लिया गया फैसला..

    लेट मैरिज: मजबूरी नहीं, आज के युवाओं का सोच-समझकर लिया गया फैसला..


    नई दिल्ली। आज की युवा पीढ़ी के लिए शादी अब केवल एक सामाजिक रिवाज़ भर नहीं रही। लेट मैरिज यानी 30 वर्ष की उम्र के बाद विवाह करना धीरे-धीरे एक सामान्य और स्वीकार्य ट्रेंड बनता जा रहा है। इसकी जड़ में करियर की महत्वाकांक्षा व्यक्तिगत आज़ादी और जीवन को अपने तरीके से जीने की चाह छिपी है।जहाँ पहले समय पर शादी को सफलता का पैमाना माना जाता था वहीं अब युवा खुद को पहले मानसिक आर्थिक और भावनात्मक रूप से तैयार करना ज़रूरी समझते हैं।

    आखिर क्यों बढ़ रहा है लेट मैरिज का चलन
    करियर को प्राथमिकता आज के युवा पहले अपनी पढ़ाई नौकरी बिज़नेस या स्टार्टअप में खुद को स्थापित करना चाहते हैं। वे मानते हैं कि मजबूत करियर एक स्थिर पारिवारिक जीवन की नींव है।

    आर्थिक स्वतंत्रता की चाह
    शादी से पहले आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होना अब एक सामान्य सोच बन गई है। युवाओं का मानना है कि वित्तीय स्थिरता रिश्तों में तनाव को कम करती है।

    व्यक्तिगत आज़ादी और आत्मनिर्भरता
    समाजिक दबाव अब पहले जैसा नहीं रहा। शादी को अब “ज़रूरी कदम” नहीं बल्कि एक व्यक्तिगत चुनाव के रूप में देखा जाने लगा है।

    सही साथी की तलाश
    आज की पीढ़ी भावनात्मक समझ मानसिक मेल और समान सोच को रिश्ते की सबसे बड़ी नींव मानती है। जल्दबाज़ी की जगह समझदारी को महत्व दिया जा रहा है।

    समाज का बदला नजरिया
    जहाँ कभी 25 से 28 की उम्र तक शादी को आदर्श माना जाता था वहीं अब परिवार और माता-पिता भी धीरे-धीरे इस बदलाव को स्वीकार कर रहे हैं। सोशल मीडिया सेलेब्रिटी लाइफस्टाइल और वैश्विक सोच ने इस ट्रेंड को सामान्य बनाने में अहम भूमिका निभाई है।

    चुनौतियाँ भी हैं लेकिन सोच और मजबूत
    लेट मैरिज के साथ कुछ चुनौतियाँ भी जुड़ी हैं जैसे जैविक सीमाएं पारिवारिक दबाव और सामाजिक टिप्पणियां। इसके बावजूद युवा इसे किसी समझौते की बजाय जीवन की प्राथमिकताओं से जुड़ा फैसला मान रहे हैं।लेट मैरिज आज केवल करियर का परिणाम नहीं बल्कि एक जागरूक स्वतंत्र और संतुलित निर्णय बन चुका है। यह दर्शाता है कि आज के युवा अपनी ज़िंदगी में सुकून स्थिरता और समझदारी को सबसे ऊपर रख रहे हैं।