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  • क्रिसमस पार्टी में बिन मेकअप भी चमकता चेहरा! अपनाएं ये 5 आसान स्किनकेयर टिप्स

    क्रिसमस पार्टी में बिन मेकअप भी चमकता चेहरा! अपनाएं ये 5 आसान स्किनकेयर टिप्स


    नई दिल्ली
    /क्रिसमस का त्योहार नजदीक आते ही ऑफिस पार्टियों का दौर शुरू हो जाता है। इस खास मौके पर हर कोई चाहता है कि वह सबसे अलग और आत्मविश्वास से भरा नजर आए। अच्छी ड्रेस और मेकअप के साथ अगर स्किन हेल्दी और ग्लोइंग हो, तो पर्सनैलिटी अपने आप निखर जाती है। लेकिन बढ़ती उम्र, प्रदूषण और गलत लाइफस्टाइल के कारण स्किन की चमक धीरे-धीरे कम होने लगती है। ऐसे में पार्टी से पहले महंगे ब्यूटी प्रोडक्ट्स पर निर्भर होने के बजाय, सही स्किनकेयर रूटीन अपनाना जरूरी है।

    -रोजाना फेस क्लीनिंग

    चेहरे की सफाई से ही सही स्किनकेयर की शुरुआत होती है। बाहर से आने पर चेहरे पर धूल-मिट्टी और पसीना जम जाता है, जिससे पोर्स बंद हो सकते हैं। दिन में कम से कम दो बार माइल्ड फेस वॉश से चेहरा साफ करने से स्किन फ्रेश रहती है और पिंपल्स की समस्या भी कम होती है।

    -सीरम से नमी और चमक


    फेस सीरम स्किन के लिए किसी बूस्टर की तरह काम करता है। यह फाइन लाइन्स को कम करने के साथ-साथ त्वचा को गहराई से हाइड्रेट करता है। रोजाना सुबह और रात को फेस वॉश के बाद सीरम लगाने से स्किन ज्यादा सॉफ्ट और ग्लोइंग दिखती है।

    -सनस्क्रीन को न करें नजरअंदाज


    धूप में निकलने से त्वचा टैनिंग और पिगमेंटेशन का शिकार हो सकती है। इसलिए चाहे सर्दी हो या गर्मी, घर से बाहर निकलने से पहले सनस्क्रीन लगाना बेहद जरूरी है। यह त्वचा को सूरज की हानिकारक किरणों से बचाने में मदद करता है।

    -हल्दी-बेसन का देसी फेस पैक


    नेचुरल निखार के लिए हफ्ते में दो बार हल्दी और बेसन का फेस पैक लगाना फायदेमंद होता है। यह त्वचा की गहराई से सफाई करता है और डेड स्किन हटाकर नेचुरल ग्लो लाता है। इसे गुलाब जल या दूध के साथ मिलाकर इस्तेमाल किया जा सकता है।

    –नाइट क्रीम से पाएं ओवरनाइट ग्लो

    रात में सोते समय त्वचा खुद को रिपेयर करती है। इसलिए नाइट क्रीम लगाने से त्वचा को पोषण मिलता है और सुबह चेहरा ज्यादा फ्रेश नजर आता है। रोजाना सोने से पहले नाइट क्रीम लगाना अच्छी स्किनकेयर आदत मानी जाती है।इन आसान लेकिन असरदार टिप्स को अभी से अपनाकर आप ऑफिस क्रिसमस पार्टी में बिना ज्यादा मेकअप के भी नेचुरल ग्लोइंग स्किन पा सकती हैं।

  • क्रिसमस पार्टी में बिना मेकअप भी दमकेगा चेहरा, अपनाएं ये 5 आसान और असरदार स्किन केयर टिप्स

    क्रिसमस पार्टी में बिना मेकअप भी दमकेगा चेहरा, अपनाएं ये 5 आसान और असरदार स्किन केयर टिप्स


    नई दिल्ली । क्रिसमस का त्योहार आते ही ऑफिस पार्टियों और गेट-टुगेदर का सिलसिला शुरू हो जाता है। इस मौके पर हर कोई चाहता है कि वह सबसे अलग फ्रेश और कॉन्फिडेंट नजर आए। खूबसूरत ड्रेस और हल्का-फुल्का मेकअप जरूर आपकी पर्सनैलिटी को निखारता है लेकिन अगर स्किन हेल्दी और ग्लोइंग हो तो लुक अपने आप खास बन जाता है। कई बार लोग पार्टी से ठीक पहले महंगे ब्यूटी प्रोडक्ट्स या ट्रीटमेंट पर भरोसा करने लगते हैं लेकिन इसका असर हमेशा वैसा नहीं होता जैसा उम्मीद की जाती है।

    असल में स्किन की चमक धीरे-धीरे कम होने के पीछे बढ़ती उम्र प्रदूषण तनाव और गलत लाइफस्टाइल बड़ी वजह होते हैं। ऐसे में अगर समय रहते सही स्किन केयर रूटीन अपनाया जाए तो बिना मेकअप भी चेहरे पर नेचुरल ग्लो लाया जा सकता है। आइए जानते हैं 5 ऐसी आसान और असरदार स्किन केयर टिप्स जिन्हें अपनाकर आप ऑफिस क्रिसमस पार्टी में सबका ध्यान खींच सकती हैं।

    रोजाना फेस क्लीनिंग है सबसे जरूरी

    स्किन केयर की शुरुआत हमेशा चेहरे की सही सफाई से होती है। दिनभर बाहर रहने के कारण चेहरे पर धूल मिट्टी पसीना और प्रदूषण की परत जम जाती है जिससे पोर्स बंद हो सकते हैं और पिंपल्स की समस्या बढ़ जाती है। इसलिए दिन में कम से कम दो बार सुबह और रात माइल्ड फेस वॉश से चेहरा साफ करना जरूरी है। इससे स्किन न सिर्फ साफ रहती है बल्कि फ्रेश और हेल्दी भी नजर आती है।

    सीरम से मिलेगी नमी और चमक

    फेस सीरम स्किन के लिए किसी बूस्टर से कम नहीं होता। यह त्वचा की गहराई तक जाकर नमी पहुंचाता है और फाइन लाइन्स व डलनेस को कम करने में मदद करता है। फेस वॉश के बाद कुछ बूंदें सीरम की लगाकर हल्के हाथों से मसाज करें। सुबह और रात दोनों समय सीरम लगाने से स्किन ज्यादा सॉफ्ट स्मूद और ग्लोइंग दिखाई देती है।

    सनस्क्रीन को बिल्कुल न करें नजरअंदाज

    अक्सर लोग सर्दियों में सनस्क्रीन लगाना छोड़ देते हैं जबकि यह सालभर जरूरी होती है। सूरज की हानिकारक यूवी किरणें स्किन को टैनिंग पिगमेंटेशन और समय से पहले झुर्रियों का शिकार बना सकती हैं। इसलिए घर से बाहर निकलने से पहले सनस्क्रीन जरूर लगाएं। यह आपकी स्किन को सुरक्षित रखने के साथ-साथ उसका नेचुरल ग्लो भी बरकरार रखती है।

    हल्दी-बेसन का देसी फेस पैक अपनाएं

    नेचुरल निखार के लिए घरेलू नुस्खे आज भी सबसे असरदार माने जाते हैं। हफ्ते में दो बार हल्दी और बेसन का फेस पैक लगाने से त्वचा की गहराई से सफाई होती है और डेड स्किन निकल जाती है। इसमें गुलाब जल या दूध मिलाकर लगाने से स्किन को अतिरिक्त पोषण मिलता है और चेहरा तुरंत फ्रेश दिखने लगता है।

     नाइट क्रीम से पाएं ओवरनाइट ग्लो.

    रात के समय हमारी स्किन खुद को रिपेयर करती है। ऐसे में सोने से पहले नाइट क्रीम लगाना बेहद फायदेमंद होता है। नाइट क्रीम स्किन को पोषण देती है ड्रायनेस दूर करती है और सुबह उठने पर चेहरा ज्यादा मुलायम और चमकदार नजर आता है। इसे रोजाना की आदत बनाना आपकी स्किन के लिए बेहद लाभकारी है। अगर आप इन 5 आसान लेकिन असरदार स्किन केयर टिप्स को अभी से अपनी डेली रूटीन में शामिल कर लें तो ऑफिस क्रिसमस पार्टी में बिना ज्यादा मेकअप के भी नेचुरल ग्लोइंग स्किन पा सकती हैं और पूरे कॉन्फिडेंस के साथ सबका ध्यान अपनी ओर खींच सकती हैं।

  • सर्दियों में दिल्ली का अलग ही रंग! घूमने के लिए ये हैं राजधानी की टॉप 5 जगहें, एक भी मिस मत करना

    सर्दियों में दिल्ली का अलग ही रंग! घूमने के लिए ये हैं राजधानी की टॉप 5 जगहें, एक भी मिस मत करना


    नई दिल्ली /देश की राजधानी दिल्ली सर्दियों के मौसम में एक अलग ही अंदाज़ में नजर आती है। ठंडी हवाएं, हल्की धूप और अपेक्षाकृत साफ माहौल दिल्ली को घूमने के लिए सबसे बेहतरीन बना देते हैं। दिसंबर से फरवरी के बीच न सिर्फ स्थानीय लोग बल्कि देश-विदेश से आने वाले पर्यटक भी राजधानी की खूबसूरती का आनंद लेने पहुंचते हैं। इस मौसम में दिल्ली के पार्क, ऐतिहासिक स्थल और बाजार खास रौनक से भर जाते हैं। अगर आप भी सर्दियों में दिल्ली घूमने का प्लान बना रहे हैं, तो ये पांच जगहें आपकी ट्रैवल लिस्ट में जरूर शामिल होनी चाहिए।

    1. लोधी गार्डन – सुकून और हरियाली का ठिकाना

    सर्दियों में लोधी गार्डन दिल्लीवालों की पहली पसंद बन जाता है। यहां ठंडी हवा के बीच धूप में नहाते हरे-भरे पेड़, रंग-बिरंगे फूल और ऐतिहासिक मकबरे मन को सुकून देते हैं। सुबह की वॉक, योग या जॉगिंग के लिए यह जगह आदर्श है। वहीं, दिन चढ़ने के साथ परिवार और दोस्त पिकनिक मनाते नजर आते हैं। अगर आप शांति से बैठकर किताब पढ़ना चाहते हैं या प्रकृति के बीच वक्त बिताना चाहते हैं, तो लोधी गार्डन सर्दियों में सबसे बेहतर विकल्प है।

    2. इंडिया गेट – सर्द शामों का खास आकर्षण
    दिल्ली की पहचान माने जाने वाले इंडिया गेट की रौनक सर्दियों में और बढ़ जाती है। ठंडी शामों में यहां टहलना अपने आप में एक खास अनुभव होता है। आसपास हरी-भरी लॉन, बच्चों की चहल-पहल और स्ट्रीट फूड का मजा लोगों को खूब भाता है। फैमिली पिकनिक हो या दोस्तों के साथ समय बिताना, इंडिया गेट सर्दियों में हर किसी को अपनी ओर खींचता है।

    3. हौज खास विलेज – इतिहास और मॉडर्न लाइफ का मेल

    अगर आप इतिहास के साथ-साथ कैफे कल्चर और आर्ट स्पेस का आनंद लेना चाहते हैं, तो हौज खास विलेज सर्दियों में घूमने के लिए बेहतरीन जगह है। यहां स्थित ऐतिहासिक किला और झील ठंड के मौसम में बेहद खूबसूरत नजर आते हैं। झील के किनारे बैठकर धूप सेंकना और आसपास के कैफे में गर्म कॉफी या चाय का आनंद लेना सर्दियों का मजा दोगुना कर देता है। यह जगह युवाओं और कपल्स के बीच खासा लोकप्रिय है।

    4. सुंदर नर्सरी – शहर की भागदौड़ से राहत

    पिछले कुछ सालों में सुंदर नर्सरी दिल्ली के सबसे पसंदीदा पिकनिक स्पॉट्स में शामिल हो चुकी है। सर्दियों में यहां खिलते फूल, साफ-सुथरे रास्ते और शांत वातावरण पर्यटकों को आकर्षित करते हैं। यह जगह परिवार, कपल्स और फोटोग्राफी के शौकीनों के लिए किसी जन्नत से कम नहीं है। यहां कुछ घंटे बिताकर आप शहर की भीड़-भाड़ से दूर सुकून महसूस कर सकते हैं।

    5. चांदनी चौक -स्वाद और संस्कृति का संगम

    दिल्ली की सर्दियां चांदनी चौक के बिना अधूरी मानी जाती हैं। यहां के गर्म पराठे, कचौड़ी, जलेबी और कुल्हड़ वाली चाय ठंड के मौसम का मजा दोगुना कर देते हैं। इसके अलावा, संकरी गलियों में घूमते हुए दिल्ली की पुरानी संस्कृति और इतिहास को करीब से देखने का मौका मिलता है। सर्दियों में यहां शॉपिंग करना भी खास अनुभव बन जाता है।सर्दियों में दिल्ली घूमना सिर्फ ट्रैवल नहीं, बल्कि एक यादगार अनुभव होता है। अगर आप इस मौसम में राजधानी आ रहे हैं, तो इन टॉप 5 जगहों को जरूर एक्सप्लोर करें और दिल्ली की सर्दियों का असली मजा लें।

  • सर्दियों में हनीमून के लिए भारत की सबसे खूबसूरत और रोमांटिक जगहें, अभी करें बुकिंग

    सर्दियों में हनीमून के लिए भारत की सबसे खूबसूरत और रोमांटिक जगहें, अभी करें बुकिंग

    नई दिल्ली  शादी का सीजन और बैंड-बाजा-बरात का माहौल हो-तो नए जोड़ों के लिए हनीमून प्लान करना सबसे रोमांटिक अनुभव बन जाता है। सर्दियों में भारत के कई ऐसे खूबसूरत हनीमून डेस्टिनेशन हैं-जहां आप अपने पार्टनर के साथ यादगार पल बिता सकते हैं। यहाँ का मौसम, प्राकृतिक सुंदरता और रोमांटिक माहौल आपके हनीमून को और भी खास बना देंगेनई दिल्ली
    1. जम्मू और कश्मीर – बर्फ से ढकी रोमांस की दुनिया
    सर्दियों में हनीमून के लिए अगर आप ठंडी और बर्फ से ढकी जगहों को पसंद करते हैं तो जम्मू और कश्मीर परफेक्ट है। यहाँ आप गुलमर्ग, पहलगाम, सोनमर्ग, पत्नीतॉप जैसी जगहों पर जा सकते हैं। बर्फीले पहाड़ और खूबसूरत घाटियां आपका रोमांस और बढ़ा देंगी। अगर आप धार्मिक यात्रा भी पसंद करते हैं तो वैष्णो देवी मंदिर की यात्रा भी रोमांचक अनुभव देगी।

    2. जैसलमेर  -गिस्तानी रोमांस और सांस्कृतिक अनुभव

    अगर आपको ज्यादा ठंड पसंद नहीं है और आप कुछ अलग चाहते हैं तो राजस्थान का जैसलमेर अच्छा विकल्प है। यहाँ आप रेगिस्तानी सफारी का मज़ा ले सकते हैं और सुनहरी हवेलियों, किलों और ऐतिहासिक जगहों को देख सकते हैं। शाम के समय रेगिस्तान में सूरज ढलते हुए सुनहरा नजारा और रात में स्टार गेजिंग आपके हनीमून को रोमांचक बना देंगे।

    3. ऊटी, तमिलनाडु – हरियाली और पहाड़ी रोमांस
    हरियाली और ठंडी हवा के बीच अगर आप शांत और रोमांटिक पल बिताना चाहते हैं तो ऊटी आपके लिए सही है। नीलगिरी पहाड़ों के बीच बसे ऊटी में आप ऊटी लेक, रोज गार्डन, नीलगिरी माउंटेन रेलवे और पास के कुन्नूर घूम सकते हैं। यहाँ का मौसम और प्राकृतिक सुंदरता आपके हनीमून को यादगार बना देगा।

    4. दार्जिलिंग, पश्चिम बंगाल – चाय बागानों और पहाड़ियों का नजारा
    अगर आप अपने हनीमून को और भी रंगीन बनाना चाहते हैं तो दार्जिलिंग एक शानदार विकल्प है। यहाँ चाय के बागान, देवदार के जंगल और रंग-बिरंगे नदियों का संगम आपका मन मोह लेंगे। आप माउंट कैनिंग और टाइगर हिल जैसी जगहों की सैर कर सकते हैं, जहाँ से सूर्योदय का दृश्य बेहद रोमांटिक लगता है।

    हनीमून के लिए टिप्स

    बुकिंग जल्दी करें: सर्दियों में हनीमून डेस्टिनेशन जल्दी भर जाते हैं, इसलिए पहले से बुकिंग कर लें।
    बजट का ध्यान रखें: चाहे आप लग्जरी होटल लें या बजट में रहें, हर जगह रोमांस का अनुभव शानदार रहेगा। सही मौसम का चुनाव: ठंडी जगहों के लिए गर्म कपड़े साथ रखें और हल्की ठंडी जगहों के लिए हल्के कपड़े पर्याप्त हैं।सर्दियों में हनीमून के लिए भारत के ये डेस्टिनेशन नए जोड़ों के लिए परफेक्ट हैं। चाहे बर्फीले पहाड़ हों, रेगिस्तान की सुनहरी धूप, हरियाली से भरे हिल स्टेशन हों या चाय के बागानों वाली पहाड़ियों का रोमांस, हर जगह अपने खास अनुभव के लिए यादगार बन सकती है। अपने हनीमून की योजना अभी बनाएं और अपने जीवन के सबसे रोमांटिक पलों का आनंद लें।

  • पहाड़ों का असली स्वाद: उत्तराखंड की रसोईजहां हर कौर में बसती है देवभूमि की खुशबू

    पहाड़ों का असली स्वाद: उत्तराखंड की रसोईजहां हर कौर में बसती है देवभूमि की खुशबू


    नई दिल्ली । उत्तराखंडजिसे देवभूमि के नाम से भी जाना जाता हैएक ऐसी जगह है जो अपनी प्राकृतिक सुंदरता और धार्मिक महत्व के लिए प्रसिद्ध है। जब भी इस राज्य का नाम लिया जाता हैतो अक्सर हमारे दिमाग में बर्फ से ढके पहाड़शांत झीलें और ऐतिहासिक मंदिरों की छवियां उभर आती हैं। लेकिन इस राज्य की असली खूबसूरती केवल उसके दृश्य नहीं हैंबल्कि उसकी पारंपरिक रसोई में भी बसी हुई है। पहाड़ों का खाना सिर्फ पेट भरने का साधन नहीं हैयह एक कला हैजो सादगीस्वाद और सेहत का बेहतरीन मिश्रण है।

    उत्तराखंड का जायका: सादगी और सेहत का अनोखा संयोजन

    उत्तराखंड के हर कोने में आपको एक अनोखा जायका मिलेगाजो परंपरा और प्रकृति से गहरे जुड़ा हुआ है। पहाड़ी इलाकों में जहां संसाधनों की कमी रहती हैवहां की रसोई ने सादगी में भी स्वाद का खजाना खोज निकाला है। यहां का खाना न केवल आपके शरीर को ताजगी और ऊर्जा देता हैबल्कि आपके स्वाद कलियों को भी एक नई यात्रा पर ले जाता है।

    पहाड़ी व्यंजन: सेहत से भरपूर और स्वादिष्ट

    उत्तराखंड की पारंपरिक रसोई में स्थानीय सामग्री का इस्तेमाल प्रमुख होता है। यहां के भोजन में ताजे और प्राकृतिक सामान का भरपूर उपयोग किया जाता है। खासतौर पर गेंहूमक्काजौदालऔर फल-सब्जियां प्रमुख होती हैं। पहाड़ी खाने का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है ‘भात’जो विभिन्न प्रकार से पकाया जाता हैजैसे ताजे घी के साथ ‘कढ़ी’ या ‘अलू के पकौड़े’ के साथ।
    यहां की सबसे प्रसिद्ध डिश है क्योंली जो जौ से बनी होती है और आलू के गुटके’जो आलू को मसाले और हरी मिर्च के साथ पकाकर बनाए जाते हैं। इन्हें आमतौर पर मक्के की रोटी के साथ खाया जाता है। इसके अलावा गड़ै और घोल भी बहुत लोकप्रिय हैंजो किसी विशेष मौके पर तैयार किए जाते हैं।

    जखिया और चूल्हे पर पकते व्यंजन

    उत्तराखंड की रसोई में जखिया जो एक प्रकार का धान का भोजन है और लकड़ी के चूल्हे पर पकने वाली डिशेज की खुशबू आपको कहीं भी नहीं मिलती। जब पहाड़ों में सुबह-सुबह ठंडी हवा का एहसास होता हैतो घी और लकड़ी के चूल्हे पर पकने वाले व्यंजनों की खुशबू आपके दिल को सुकून देती है। ये व्यंजनजो पूरी तरह से प्राकृतिक और स्थानीय होते हैंआपके शरीर के लिए बेहद पौष्टिक होते हैं और मन को शांति का अहसास कराते हैं।

    नैनीतालमसूरी और केदारनाथ के पारंपरिक व्यंजन

    उत्तराखंड के प्रमुख पर्यटन स्थलोंजैसे नैनीतालमसूरी और केदारनाथमें पर्यटकों के लिए विशेष प्रकार के व्यंजन उपलब्ध हैं। नैनीताल की ‘सूखी भिंडी’ और मसूरी के ‘पेटिस’ विशेष रूप से प्रसिद्ध हैं। वहींकेदारनाथ में ‘भात-दाल’ का स्वाद यात्रा के बाद एक अलग ही आनंद देता है। इन जगहों पर यात्रा करते वक्त इन पारंपरिक व्यंजनों का स्वाद आपको देवभूमि की असली आत्मा से जोड़े रखता है।

    पहाड़ी भोजन का सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व

    उत्तराखंड के पहाड़ी घरों में भोजन केवल पेट भरने का एक साधन नहीं होताबल्कि यह एक सांस्कृतिक परंपरा का हिस्सा है। यहां की रसोई में एक विशेष सादगी और प्रेम होता हैजो परिवार के हर सदस्य को जोड़ता है। स्थानीय त्योहारों और विशेष अवसरों पर परिवार एक साथ बैठकर पारंपरिक भोजन का आनंद लेते हैंजो उनके रिश्तों में गर्माहट और प्यार की भावना पैदा करता है। पहाड़ी भोजन का महत्व सिर्फ स्वाद तक सीमित नहीं है। यह हर कौर में प्रकृति और परिवार की मेहनत की महक को समेटे हुए है। इन व्यंजनों के सेवन से शरीर को पौष्टिकता मिलती है और आत्मिक शांति का अनुभव होता है।

    उत्तराखंड की रसोई: एक अद्भुत अनुभव

    अगर आप उत्तराखंड की यात्रा पर हैंतो सिर्फ पहाड़ों की सुंदरता और मंदिरों की ओर न भागें। उत्तराखंड का असली अनुभव तो उसकी रसोई में बसा है। यहां का हर कौरहर स्वाददेवभूमि की खुशबू और संस्कृति को महसूस कराने में सक्षम है। उत्तराखंड के पहाड़ी व्यंजन न सिर्फ खाने का अनुभव बल्कि एक सांस्कृतिक और आत्मिक यात्रा भी हैंजो आपको जीवनभर याद रहेगी।

  • हनुक्का 2025: यहूदी रोशनी का पर्व और आठ दिनों तक मनाने का इतिहास

    हनुक्का 2025: यहूदी रोशनी का पर्व और आठ दिनों तक मनाने का इतिहास

    नई दिल्ली । हनुक्काजिसे यहूदी समुदाय में ‘फेस्टिवल ऑफ़ लाइट्स’ यानी रोशनी का पर्व कहा जाता हैयहूदी धर्म के प्रमुख त्योहारों में गिना जाता है। यह पर्व यहूदी कैलेंडर के किस्लेव महीने की 25 तारीख से शुरू होता है और लगातार आठ दिनों तक मनाया जाता है। हनुक्का केवल धार्मिक उत्सव नहीं हैबल्कि यह यहूदी समुदाय की आस्थासाहस और धार्मिक स्वतंत्रता की जीत का प्रतीक भी माना जाता है।

    इस पर्व की उत्पत्ति दूसरी सदी ईसा पूर्व की हैजब यहूदी लोगों ने सिरेस साम्राज्य के खिलाफ संघर्ष किया। उस समय यहूदियों के मंदिर पर विदेशी हुकूमत का कब्ज़ा हो गया था और यहूदी धर्म के धार्मिक कृत्यों पर रोक लगा दी गई थी। मक्काबी विद्रोह के दौरान यहूदियों ने हेरोडियन और सिरीयन साम्राज्य के अधीन अपने मंदिर को वापस हासिल किया। मंदिर को फिर से शुद्ध करना और वहां पुनः पूजा करना यहूदियों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण था।

    हनुक्का आठ दिनों तक इसलिए मनाया जाता है क्योंकि जब यहूदी मक्काबी युद्ध के बाद अपने मंदिर में लौटेतो उन्होंने तेल की कमी का सामना किया। मंदिर के मेनोराह दीपमाला में हमेशा प्रकाश जलता रहता थालेकिन उनके पास केवल एक दिन के लिए पर्याप्त शुद्ध तेल बचा था। चमत्कारिक रूप से यह तेल आठ दिनों तक जलता रहाजिससे यहूदियों को नया शुद्ध तेल तैयार करने का समय मिल गया। इस चमत्कारिक घटना के स्मरण में हनुक्का का उत्सव आठ दिनों तक मनाया जाता है।

    हनुक्का के दौरान यहूदियों के घरों में मेनोराह या हनुक्कियाह सजाई जाती है। इसमें नौ दीयों का विशेष प्रबंध होता है आठ दिन के लिए हर दिन एक अतिरिक्त दीपक जलाया जाता है और नौवां दीपक जिसे ‘शमाश’ कहते हैंदूसरों को जलाने के लिए इस्तेमाल होता है। इस उत्सव में पारंपरिक भोजन जैसे लेट्टुसेस आलू के पकौड़े डॉनट्स और अन्य तेल में तली हुई चीज़ें बनाई जाती हैंजो मंदिर में तेल के चमत्कार का प्रतीक हैं।

    हनुक्का का पर्व केवल धार्मिक आस्था तक ही सीमित नहीं है। यह यहूदी समुदाय के लिए एक सामाजिक और सांस्कृतिक उत्सव भी है। इस दौरान परिवार और मित्र मिलकर हनुक्का गीत गाते हैंखेल खेलते हैं और बच्चों को गिफ्ट्स देते हैं। खासकर द्रेडेल नामक खेलजो छोटी घूमने वाली घूमती हुई वस्तु से खेला जाता हैइस पर्व की पहचान बन चुका है।

    इतिहास में हनुक्का ने यहूदी लोगों को अपनी धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान को बनाए रखने की प्रेरणा दी है। यह पर्व हमें संघर्ष के समय में आशा बनाए रखने और अपने विश्वास पर अडिग रहने की शिक्षा देता है। यही वजह है कि हनुक्का न केवल धार्मिक उत्सव बल्कि स्वतंत्रता और साहस का प्रतीक भी माना जाता है।

    सन 2025 में हनुक्का 25 दिसंबर से शुरू होकर 1 जनवरी 2026 तक मनाया जाएगा। यह समय विशेष रूप से विश्वभर में यहूदी समुदाय के लिए उत्सवरोशनी और सौहार्द का प्रतीक है। हर घर में दीप जलाकर और पारंपरिक व्यंजन बनाकर यहूदी लोग अपनी सांस्कृतिक विरासत को संजोते हैं और आने वाली पीढ़ियों को इसे आगे बढ़ाने की प्रेरणा देते हैं।

    हनुक्का के इस पर्व से जुड़े संदेश आज भी प्रासंगिक हैं। यह हमें याद दिलाता है कि कठिन परिस्थितियों में भी धैर्य और विश्वास के साथ आगे बढ़ना संभव है। यह पर्व यहूदियों की पहचानसाहस और स्वतंत्रता की भावना का प्रतीक हैजो दुनिया भर में उनके समुदाय और सांस्कृतिक मूल्यों को जोड़ता है। इस प्रकार हनुक्का केवल आठ दिनों की रोशनी का उत्सव नहीं हैबल्कि यह यहूदियों के संघर्षआस्था और चमत्कारिक विश्वास का जीवंत प्रतीक है। हर वर्ष यह पर्व हमें यह सिखाता है कि अंधकार चाहे कितना भी गहरा क्यों न होएक छोटी सी रोशनी भी आशा और जीत का मार्ग दिखा सकती है।

  • तानसेन: संगीत सम्राट की कहानी जिनकी आवाज़ में अग्नि और बादल दोनों बसते थे

    तानसेन: संगीत सम्राट की कहानी जिनकी आवाज़ में अग्नि और बादल दोनों बसते थे


    नई दिल्ली । तानसेन जिनका नाम भारतीय संगीत के इतिहास में सुनहरे अक्षरों में लिखा गया है उन्‍हें संगीत सम्राट माना जाता है। उनका जीवन और संगीत दोनों ही रहस्य और किवदंतियों से भरपूर हैं। कहा जाता है कि उनकी आवाज़ में एक विशेष प्रकार का जादू था जिससे अग्नि और बादल दोनों सक्रिय हो जाते थे। तानसेन का संगीत केवल एक कला नहीं था बल्कि यह प्रकृति के साथ एक संवाद था जो श्रोताओं के दिलों और प्रकृति दोनों को छूता था।

    तानसेन का जन्म ग्वालियर के पास स्थित बेहट गांव में हुआ था। बचपन में उनका नाम तन्ना था और वे एक शरारती और जिज्ञासु बालक थे। गांव वाले अक्सर उनकी आवाजों से चौंकते थे जो वह जानवरों और पक्षियों की तरह निकालते थे। कभी जंगल में शेर की दहाड़ सुनाई देती तो कभी पक्षियों की अजीब आवाजें आतीं। यह सब तन्ना की आवाज़ का ही जादू था। लेकिन इस प्रतिभा के साथ वह धीरे-धीरे संगीत की गहरी दुनिया में कदम रखने लगे जो अंततः उन्हें भारत के महानतम संगीतकारों में से एक बना देगा।

    तानसेन के संगीत से जुड़ी कई किवदंतियां प्रचलित हैं। उनकी आवाज़ इतनी प्रभावशाली थी कि कहा जाता है कि वह जो राग गाते थे वह न केवल श्रोताओं के दिलों में गूंजते थे बल्कि प्रकृति पर भी उनका प्रभाव पड़ता था। उनके बारे में यह किंवदंती है कि जब वह दीपक राग गाते थे तो बुझी हुई दीपक अपने आप जल उठती थीं। इसी तरह मेघ राग से वह ऐसा प्रभाव छोड़ते थे कि आसमान में बादल घिर आते और बारिश हो जाती। इसके अलावा उनके गायन से चट्टानें भी पिघलने का दावा किया जाता है।

    तानसेन का संगीत अकबर के दरबार में बहुत प्रसिद्ध हुआ। 1556 में वे अकबर के दरबार में आए और जल्द ही वह ‘नवरत्नों’ में से एक बन गए। उनकी गायन कला और संगीत में महारत के कारण उन्हें ‘संगीत सम्राट’ की उपाधि दी गई। वह दरबार में न केवल एक गायक थे बल्कि एक संगीत गुरु भी थे। अकबर और तानसेन के बीच की मित्रता और संगीत के प्रति उनका प्रेम अविस्मरणीय था। अकबर ने तानसेन के संगीत को इतना पसंद किया था कि वह अक्सर उनके रागों से मंत्रमुग्ध हो जाते थे।

    तानसेन की गायन शैली में भव्यता जटिलता और गहराई थी जो उन्हें अपने समकालीन संगीतज्ञों से अलग करती थी। वह मुख्य रूप से हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के बड़े प्रवर्तक थे और उनकी गायन में ध्रुपद खयाल और ठुमरी जैसे विभिन्न शैलियों का संगम था। वह केवल एक गायक नहीं थे बल्कि उन्होंने भारतीय संगीत को एक नई दिशा दी। उनकी दी गई रचनाओं में कुछ ऐसे राग भी थे जो आज भी संगीतकारों द्वारा गाए जाते हैं और जिनका प्रभाव भारतीय संगीत पर सदियों तक रहेगा।

    तानसेन के संगीत के बारे में सबसे दिलचस्प बात यह है कि उन्होंने अपनी कला को न केवल अभ्यास बल्कि गहरी साधना और ध्यान के माध्यम से सीखा। उनका जीवन संगीत के प्रति समर्पण का प्रतीक था और इसीलिए उनकी कला ने उन्हें ‘संगीत सम्राट’ का दर्जा दिलवाया। उनके गायन की विशेषता थी कि वह केवल स्वर नहीं गाते थे बल्कि उनकी आवाज़ में एक ऐसी शक्ति थी जो श्रोताओं के दिलों को छू जाती थी।

    तानसेन के जीवन के बारे में कई रहस्यमयी कहानियाँ और किवदंतियाँ प्रचलित हैं लेकिन उनकी संगीत यात्रा हमेशा प्रेरणा का स्रोत बनी रहेगी। उनका संगीत भारतीय सांस्कृतिक धरोहर का एक अमूल्य हिस्सा है। आज भी उनके रागों और गायन को श्रद्धा के साथ याद किया जाता है और संगीत प्रेमी उनके संगीत को हर पीढ़ी में जीवित रखने की कोशिश करते हैं।

    तानसेन का जीवन यह साबित करता है कि कला और प्रतिभा न केवल व्यक्ति के जीवन को संवारती है बल्कि वह समाज और संस्कृति को भी समृद्ध करती है। उनके गायन में जो जादू था वह आज भी लोगों के दिलों में गूंजता है और भारतीय संगीत के इतिहास में उनका नाम सदैव अमर रहेगा।

  • ठंड और बढ़ता वायु प्रदूषण बना सेहत के लिए खतरा, आयुर्वेदिक उपाय बन सकते हैं सुरक्षा कवच

    ठंड और बढ़ता वायु प्रदूषण बना सेहत के लिए खतरा, आयुर्वेदिक उपाय बन सकते हैं सुरक्षा कवच


    नई दिल्ली  /प्रदेश में जैसे-जैसे ठंड बढ़ रही है, वैसे-वैसे वायु प्रदूषण का स्तर भी चिंताजनक होता जा रहा है। राजधानी समेत कई जिलों में हवा की गुणवत्ता खराब हो चुकी है, जिसका सीधा असर लोगों की सेहत पर दिखाई दे रहा है। अस्पतालों में छींक, खांसी, गले में खराश, सांस लेने में दिक्कत, कब्ज और एलर्जी के मरीजों की संख्या तेजी से बढ़ रही है।

    विशेषज्ञों के अनुसार, यह मौसम खासतौर पर उन लोगों के लिए ज्यादा जोखिम भरा है, जिनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर है या जो पहले से ही अस्थमा, ब्रोंकाइटिस, एलर्जी और अन्य श्वसन संबंधी बीमारियों से ग्रस्त हैं। ऐसे में आयुर्वेदिक उपाय ठंड और प्रदूषण दोनों से बचाव का प्रभावी, सुरक्षित और किफायती विकल्प बनकर सामने आ रहे हैं।

    सही दिनचर्या से मिलेगा दोहरी सुरक्षा
    राजकीय आयुर्वेदिक कॉलेज के रोग एवं विकृति विभाग के विशेषज्ञ डॉ. अमरेंद्र कुमार सिंह बताते हैं कि सर्दियों में यदि ऋतु के अनुसार दिनचर्या और भोजन अपनाया जाए, तो ठंड और प्रदूषण से होने वाले दुष्प्रभावों को काफी हद तक रोका जा सकता है। उनके अनुसार, रोजाना सरसों के तेल से हल्की मालिश सिर से पांव तक करने से शरीर में गर्माहट बनी रहती है और त्वचा भी सुरक्षित रहती है। इसके साथ ही सुबह नाक में अणु तेल या सरसों तेल की 1–2 बूंद डालने से नाक और फेफड़ों को प्रदूषण से होने वाले नुकसान से बचाया जा सकता है।

    सूर्यस्नान, योग और भाप के लाभ

    सर्दियों में रोजाना कम से कम 30 मिनट धूप में बैठना शरीर को प्राकृतिक ऊर्जा देता है और इम्यून सिस्टम को मजबूत बनाता है। विशेषज्ञों की सलाह से अनुलोम-विलोम, कपालभाति और भ्रामरी प्राणायाम करने से श्वसन तंत्र सशक्त होता है और फेफड़े बेहतर तरीके से काम करते हैं। रात में भाप लेना भी बेहद फायदेमंद माना गया है। इससे नाक और सांस की नलियां साफ होती हैं, बलगम निकलता है और सर्दी-जुकाम में राहत मिलती है।

    सर्दियों में सही भोजन बनेगा सेहत की ढाल
    आयुर्वेद में हेमंत और शिशिर ऋतु में उष्ण, तरल और स्नेही आहार को लाभकारी बताया गया है। बाल रोग विभाग के विशेषज्ञ डॉ. अरविंद कुमार चौरसिया के अनुसार बच्चों को रोज हल्दी वाला दूध देना चाहिए, जिससे उनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है। इस मौसम में आसानी से मिलने वाला आंवला विटामिन-सी और आयरन का बेहतरीन स्रोत है। इसके अलावा गुड़, अदरक, कच्ची हल्दी, तिल और सोंठ से बने व्यंजन शरीर को अंदर से गर्म रखते हैं और ठंड के असर को कम करते हैं।

    पाचन ठीक रहेगा तो बीमारियां रहेंगी दूर
    प्रभारी अधीक्षक डॉ. अरुण कुमार सिंह बताते हैं कि ठंड के मौसम में पाचन शक्ति कमजोर पड़ जाती है, जिससे कब्ज, गैस और अपच की समस्या बढ़ जाती है। इससे बचने के लिए दिनभर गुनगुना पानी पीना, रात को दूध में एक चम्मच घी लेना और सुबह भिगोया हुआ मेथी दाना खाना फायदेमंद होता है।

    आयुर्वेदिक जीवनशैली है सबसे आसान समाधान
    विशेषज्ञों का मानना है कि यदि लोग नियमित योग, संतुलित आहार और आयुर्वेदिक उपायों को अपनी दिनचर्या में शामिल करें, तो ठंड और प्रदूषण के संयुक्त प्रभाव से खुद को सुरक्षित रख सकते हैं। यह न केवल बीमारी से बचाव करता है, बल्कि शरीर को अंदर से मजबूत भी बनाता है।

  • ज़रूरत की खबर सर्दियों में मुँह ढककर सोना ख़तरनाक घट सकती है 20% तक ऑक्सीजन जानें 11 गंभीर हेल्थ रिस्क

    ज़रूरत की खबर सर्दियों में मुँह ढककर सोना ख़तरनाक घट सकती है 20% तक ऑक्सीजन जानें 11 गंभीर हेल्थ रिस्क


    नई दिल्ली । सर्दी के मौसम में गर्माहट और सुरक्षित महसूस करने की चाहत में कई लोग सोते समय अपने चेहरे को रजाई या कंबल से पूरी तरह ढक लेते हैं। यह आदत भले ही आरामदायक महसूस हो लेकिन चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार यह आपकी नींद की गुणवत्ताऔर श्वसन स्वास्थ्य दोनों के लिए अत्यंत हानिकारक है।

    बेंगलुरू के स्पर्श हॉस्पिटल में पल्मोनोलॉजी विभाग के HOD डॉ. शिवराज अज्जी करियप्पाला लक्ष्मण ने इस आदत के गंभीर वैज्ञानिक और स्वास्थ्य जोखिमों पर प्रकाश डाला है।डॉक्टर के मुताबिक मुँह ढककर सोने से कंबल के अंदर ताजी हवा का फ्लो काफी कम हो जाता है जिससे हम अपनी ही छोड़ी हुई हवा जिसमें कार्बन डाइऑक्साइड अधिक होती है को दोबारा भीतर लेते हैं। इससे शरीर में ऑक्सीजन का स्तर 15 से 20% तक घट सकता है। नतीजतन फेफड़ों को पर्याप्त ऑक्सीजन ग्रहण करने के लिए ज़्यादा मेहनत करनी पड़ती है जिससे नींद बार-बार टूटती है। लंबे समय तक ऐसा करने से सुबह उठकर भारीपन थकान लगातार सिरदर्द और सांस संबंधी गंभीर दिक्कतें हो सकती हैं।

    मुँह ढककर सोना क्यों है रिस्की 11 हेल्थ रिस्क

    वैज्ञानिक स्टडीज और डॉक्टर की राय के आधार पर चेहरा ढककर सोना निम्नलिखित 11 तरह की समस्याओं को जन्म दे सकता है

    स्वास्थ्य पर पड़ने वाले मुख्य नकारात्मक प्रभाव

    ऑक्सीजन की कमी हाइपोक्सिया कंबल के भीतर CO2 का स्तर बढ़ता है और ऑक्सीजन घटती है जिससे दम घुटने जैसा एहसास होता है।

    थकान और सिरदर्द कम ऑक्सीजन के कारण सुबह उठने पर सिर भारी और शरीर थका हुआ महसूस होता है।
    नींद की गुणवत्ता पर असर: बढ़ती गर्मी और कम ऑक्सीजन के कारण गहरी नींद बाधित होती है।
    शरीर का तापमान बढ़ना कंबल के अंदर तापमान बढ़ने से पसीना आता है जिससे शरीर बेचैन होता है और नींद टूटती है।
    पिंपल्स और एक्जिमा बंद और नमी वाले माहौल में पसीना आने से त्वचा के छिद्र बंद हो जाते हैं जिससे पिंपल्स रैशेज और एक्जिमा जैसी त्वचा संबंधी समस्याएं बढ़ सकती हैं।
    ध्यान केंद्रित करने में मुश्किल: खराब नींद के कारण दिनभर चिड़चिड़ापन और एकाग्रता में कमी आती है।
    सांस की दिक्कतें बढ़ना: हवा का फ्लो रुकने से सांस उथली हो जाती है जो फेफड़ों के लिए ठीक नहीं है। गला और छाती में सूखापन सांस की हवा का संचलन न होने से म्यूकस मेंब्रेन सख सकती है।
    संक्रमण का खतरा साँस द्वारा छोड़ी गई नमी और गर्मी कंबल के भीतर सूक्ष्मजीवों के पनपने के लिए अनुकूल माहौल बनाती है।
    स्लीप एप्निया का ख़तरा सांस लेने में रुकावट की समस्या स्लीप एप्निया को यह आदत और गंभीर बना सकती है।
    गंभीर मामलों में हृदय गति पर दबाव लंबे समय तक ऑक्सीजन की कमी रहने से हृदय प्रणाली पर अनावश्यक दबाव पड़ सकता है।

    किन लोगों के लिए यह आदत जानलेवा हो सकती है

    डॉक्टर शिवराज अज्जी करियप्पाला लक्ष्मण स्पष्ट करते हैं कि कुछ लोगों के लिए मुँह ढककर सोना अत्यंत गंभीर और जानलेवा स्थिति उत्पन्न कर सकता हैअस्थमा और स्लीप एप्निया के मरीज़ इन स्थितियों में पहले से ही सांस लेने में दिक्कत होती है। मुँह ढकने से हवा का फ्लो और कम हो जाता है जिससे सांस रुकने जैसी गंभीर स्थिति बन सकती है। शिशु और छोटे बच्चे बच्चों खासकर शिशुओं के लिए यह आदत जानलेवा है। इसे सडेन इन्फेंट डेथ सिन्ड्रोम का एक बड़ा कारण माना जाता है। कंबल या रजाई गलती से पूरी तरह चेहरे पर आने से शिशु का दम घुट सकता है।

    मुँह ढककर सोने की आदत कैसे छुड़ाएं

    अगर आपको यह आदत है तो इसे धीरे-धीरे छोड़ना बेहतर है। धीरे आदत बदलें एकदम से चेहरा खुला न रखें। शुरुआत में कंबल में थोड़ा गैप या एयर-टनल बनाए रखें। कुछ दिनों में धीरे-धीरे कंबल को नीचे लाकर पहले नाक-मुँह और फिर पूरे चेहरे को एक्सपोज करने की आदत डालें। सचेत पोजिशनिंग: सोने से पहले कंबल को कंधों के नीचे सेट करें ताकि नींद में भी वह चेहरे तक न आए।तापमान नियंत्रित रखें कमरे का तापमान इतना आरामदायक रखें कि आपको अत्यधिक ठंड महसूस न हो और चेहरा ढकने की ज़रूरत ही न पड़े। वज़नदार कंबल का प्रयोग: कई लोग सुरक्षित एहसास के लिए मुँह ढकते हैं। इसकी जगह वेटेड ब्लैंकेट का इस्तेमाल कर सकते हैं। यह बिना मुँह ढके वही शांति और सुरक्षित होने का एहसास देता है।

  • जनवरी में बर्फबारी का मज़ा: भारत की 7 खूबसूरत और बजट-फ्रेंडली जगहें

    जनवरी में बर्फबारी का मज़ा: भारत की 7 खूबसूरत और बजट-फ्रेंडली जगहें

     सर्दियों में बर्फ और ठंडी हवा का आनंद लेना किसी भी ट्रैवलर का सपना होता है। जनवरी में हिमालय की चोटियों पर बर्फ की सफेद चादर, पहाड़ों की ठंडी हवा और प्रकृति की सुंदरता किसी का भी मन मोह लेती है। अगर आप कम बजट में सफर करना चाहते हैं, तो ये सात जगहें आपके लिए परफेक्ट हैं:

    1. औली (Uttarakhand)
    औली बर्फबारी और स्कीइंग के लिए सबसे पसंदीदा जगहों में से एक है। यहां चेयर-लिफ्ट और पहाड़ी नज़ारे बेहद खूबसूरत हैं। दिल्ली से ऋषिकेश या हरिद्वार तक सस्ती ट्रेन या बस से आसानी से पहुंचा जा सकता है, वहां से शेयर टैक्सी या बस औली के लिए उपलब्ध हैं। होमस्टे और हॉस्टल बजट ट्रैवलर्स के लिए बेहतरीन विकल्प हैं।

    2. चोपता (Uttarakhand)
    प्रकृति के करीब महसूस करना हो तो चोपता बेस्ट है। जनवरी में यहां बर्फबारी और ट्रेकिंग का मज़ा लिया जा सकता है। ऋषिकेश और हरिद्वार से सस्ती जीप और बसें मिलती हैं। टेंट में ठहरना बजट-फ्रेंडली और रोमांचक अनुभव देता है।

    3. कुल्लू-मनाली (Himachal Pradesh)
    सोलंग वैली और रोहतांग पास बर्फबारी के लिए मशहूर हैं। दिल्ली से HRTC की सस्ती बसें आसानी से मिल जाती हैं। बजट 5000 रुपये के अंदर हो तो डॉर्मिटरी, होस्टल और बजट होटल सबसे अच्छे विकल्प हैं।

    4. शिमला (Himachal Pradesh)
    शिमला का जादू सर्दियों में अलग ही होता है। कुफरी में जनवरी में जबरदस्त बर्फबारी होती है। चंडीगढ़ और दिल्ली से बस या ट्रेन आसानी से मिल जाती है। कालका से शिमला तक की टॉय ट्रेन यात्रा को और खास बनाती है। आसपास के गांवों में रहकर खर्च कम किया जा सकता है।

    5. गुलमर्ग (Jammu & Kashmir)
    असली कड़क ठंड और गहरी बर्फ का अनुभव चाहिए तो गुलमर्ग परफेक्ट है। यहां की सुंदरता फिल्मी सीन जैसी लगती है। स्नो स्कीइंग, स्नोबोर्डिंग और गोंडोला केबल कार इसकी खासियत हैं। जनवरी में यह भारत की सबसे ठंडी और खूबसूरत बर्फबारी वाली जगहों में गिना जाता है।

    6. मसूरी (Uttarakhand)
    मसूरी का मौसम जनवरी में किसी जन्नत से कम नहीं लगता। बर्फ से ढकी सड़कों पर घूमना बेहद शांत और रोमांचक अनुभव देता है। केम्प्टी फॉल्स, कंपनी गार्डन, मॉल रोड, लेक मिस्ट और मॉस्सी फॉल्स घूमने लायक हैं। बजट में रहने के लिए कई किफायती होटल और होमस्टे उपलब्ध हैं।

    7. तवांग (Arunachal Pradesh)
    तवांग बर्फबारी और ठंड के लिए प्रसिद्ध है। जनवरी में बर्फ की मोटी परतें और सेला पास, माधुरी झील, नूरानांग फॉल्स यहां की खास पहचान हैं। यह दुनिया के सबसे बड़े बौद्ध मठों में से एक का घर भी है। जनवरी–फरवरी यहां घूमने का सबसे बेहतरीन समय है।

    जनवरी में इन जगहों पर जाकर आप बर्फबारी का मज़ा, रोमांच और सुकून एक साथ ले सकते हैं। ये सभी डेस्टिनेशन बजट-फ्रेंडली होने के साथ प्राकृतिक सुंदरता से भरपूर हैं।