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  • PM मोदी का वैश्विक लोकप्रियता में दबदबा कायम… सर्वे में शीर्ष पर बरकरार…

    PM मोदी का वैश्विक लोकप्रियता में दबदबा कायम… सर्वे में शीर्ष पर बरकरार…


    नई दिल्ली।
    वैश्विक लोकप्रियता सर्वे (Global Popularity Survey) में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Prime Minister Narendra Modi) अभी भी शीर्ष पर बरकरार हैं। अमेरिकी ओपिनियन रिसर्च इंस्टीट्यूट मॉर्निंग कंसल्ट की ओर से जारी हालिया सर्वेक्षण के नतीजों में यह बात सामने आई है। सर्वे में यह भी कहा गया कि वैश्विक राजनीति में एक बार फिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Prime Minister Narendra Modi) का दबदबा साबित कर दिया है। करीब 24 लोकतांत्रिक देशों में किए गए इस सर्वे में शामिल 70 फीसदी लोगों ने उनके नेतृत्व पर भरोसा जताया है।

    सर्वेक्षण के मुताबिक, प्रधानमंत्री मोदी की लोकप्रियता का ग्राफ अन्य वैश्विक नेताओं की तुलना में काफी ऊंचा है। वहीं, दूसरी ओर जर्मनी के चांसलर फ्रेडरिक मर्ज इस मामले में पिछड़ गए हैं, उन्हें दुनिया का सबसे अलोकप्रिय नेता आंका गया है। इस सूची में दूसरे स्थान पर दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति ली जे-म्युंग (63 फीसदी) और तीसरे स्थान पर चेक गणराज्य के प्रधानमंत्री आंद्रेज बाबिस (55 फीसदी) रहे। लेकिन मोदी शीर्ष पर रहे।
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    मॉर्निंग कंसल्ट के सर्वे में यह भी कहा गया कि एक ओर जहां भारतीय प्रधानमंत्री की वैश्विक स्वीकार्यता और मजबूत हो रही है। वहीं, यूरोप के प्रमुख देशों के नेताओं को जनता के विरोध और अविश्वास का सामना करना पड़ रहा है। हालांकि अमेरिकी राष्ट्रपति की लोकप्रियता का स्तर भी गिर गया है।

    मैक्रों और ट्रंप की स्थिति
    लोकप्रियता के मामले में फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों दूसरे सबसे अलोकप्रिय नेता हैं, जिनसे 75% जनता असंतुष्ट है। वहीं, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप इस सूची में नीचे से 10वें स्थान पर हैं। ईरान के साथ संघर्ष जैसी चुनौतियों के बावजूद, लगभग 38% अमेरिकियों ने ट्रंप के कामकाज का समर्थन किया है। बता दें, 2025 में दूसरे कार्यकाल की शुरुआत में डोनाल्ड ट्रंप की लोकप्रियता रेटिंग लगभग 47-51% के बीच थी। अप्रैल 2026 तक इसका स्तर -18 के पास पहुंच गया, जिससे वे आधुनिक समय के सबसे कम लोकप्रिय राष्ट्रपतियों में से एक बन गए।

  • भीमेश्वर मंदिर : प्रकृति और इतिहास का संगम, महाबली भीम ने स्वयं की थी स्थापना..

    भीमेश्वर मंदिर : प्रकृति और इतिहास का संगम, महाबली भीम ने स्वयं की थी स्थापना..

    नई दिल्ली:   कर्नाटक के शिमोगा जिले के सागर क्षेत्र में स्थित भीमेश्वर मंदिर आस्था, प्रकृति और प्राचीन इतिहास का एक अनूठा संगम माना जाता है। घने जंगलों और हरियाली से घिरे पश्चिमी घाट की गोद में स्थित यह मंदिर न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि अपनी प्राकृतिक सुंदरता के कारण पर्यटकों को भी आकर्षित करता है। यहां आने वाले श्रद्धालु इसे एक ऐसा स्थान मानते हैं जहां आध्यात्मिक शांति और प्राकृतिक सौंदर्य दोनों का अनुभव एक साथ मिलता है।

    इस मंदिर का संबंध महाभारत काल से जोड़ा जाता है और स्थानीय मान्यताओं के अनुसार यह स्थान पांडवों के अज्ञातवास से भी जुड़ा हुआ है। कहा जाता है कि इसी क्षेत्र में पांडवों ने कुछ समय के लिए आश्रय लिया था और इसी दौरान भीम ने यहां भगवान शिव की आराधना से जुड़े एक महत्वपूर्ण स्थल की स्थापना की थी। इसी मान्यता के कारण इस स्थान का नाम भीमेश्वर पड़ा।

    पौराणिक कथाओं के अनुसार, भीम ने यहां शिवलिंग की स्थापना की थी और भगवान शिव की पूजा के लिए इस स्थल को पवित्र रूप दिया गया था। इसके साथ ही एक मान्यता यह भी है कि अर्जुन ने अपने बाण से यहां एक जलधारा उत्पन्न की थी, जो आज भी एक झरने के रूप में बहती हुई देखी जाती है और मंदिर की पवित्रता को और अधिक विशेष बनाती है। यह जलधारा आज भी श्रद्धालुओं के लिए आस्था का केंद्र बनी हुई है।

    मंदिर का निर्माण काले पत्थरों से किया गया है और इसकी वास्तुकला प्राचीन दक्षिण भारतीय शैली को दर्शाती है। मंदिर परिसर में मजबूत स्तंभों पर बनी आकृतियां और धार्मिक प्रतीक इसकी ऐतिहासिकता को और गहराई प्रदान करते हैं। यहां भगवान शिव के साथ भगवान गणेश, नंदी और भगवान विष्णु की प्रतिमाएं भी स्थापित हैं, जो इस स्थल की धार्मिक विविधता को दर्शाती हैं।

    स्थानीय मान्यताओं के अनुसार यह मंदिर अत्यंत प्राचीन है और इसे चालुक्य काल से भी जोड़ा जाता है। समय के साथ यह स्थान प्राकृतिक परिवेश में स्थित होने के कारण अपेक्षाकृत कम विकसित रहा है, लेकिन इसकी आध्यात्मिक पहचान आज भी मजबूत बनी हुई है। यहां सावन माह और शिवरात्रि के अवसर पर विशेष पूजा और आयोजन किए जाते हैं, जिनमें बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल होते हैं।

    जंगलों के बीच स्थित होने के कारण इस मंदिर तक पहुंचने के लिए पैदल यात्रा और ट्रैकिंग का सहारा लेना पड़ता है, जो इसे एक रोमांचक तीर्थ यात्रा का अनुभव भी बना देता है। निकटतम रेलवे स्टेशन से लेकर सड़क मार्ग तक पहुंचने के बाद भी मंदिर तक लगभग दो किलोमीटर की पैदल यात्रा करनी पड़ती है, जिससे यह स्थान और अधिक प्राकृतिक और शांत वातावरण में स्थित प्रतीत होता है।

    भीमेश्वर मंदिर आज भी आस्था और प्रकृति के बीच संतुलन का एक जीवंत उदाहरण है, जहां प्राचीन कथाएं, धार्मिक विश्वास और प्राकृतिक सौंदर्य एक साथ मिलकर एक अनूठा अनुभव प्रदान करते हैं।

  • कांग्रेस विधायक विनय कुलकर्णी समेत 16 दोषियों को उम्रकैद, राजनीतिक साजिश के आरोपों पर सख्त टिप्पणी

    कांग्रेस विधायक विनय कुलकर्णी समेत 16 दोषियों को उम्रकैद, राजनीतिक साजिश के आरोपों पर सख्त टिप्पणी

    नई दिल्ली /बेंगलुरु की एक विशेष अदालत ने वर्ष 2016 में हुए भाजपा कार्यकर्ता योगेश गौड़ा की हत्या के मामले में ऐतिहासिक निर्णय सुनाते हुए कांग्रेस विधायक और पूर्व मंत्री विनय कुलकर्णी सहित कुल 16 दोषियों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई है। लंबे समय से चल रहे इस चर्चित प्रकरण में अदालत के फैसले के बाद मामले ने एक निर्णायक मोड़ ले लिया है। अदालत ने अपने आदेश में इस घटना को गंभीर आपराधिक साजिश से जुड़ा मामला मानते हुए कड़ी सजा का आधार तैयार किया।

    विशेष न्यायाधीश संतोष गजानन भट ने फैसले में कहा कि प्रस्तुत साक्ष्य और जांच रिपोर्ट यह दर्शाते हैं कि यह मामला केवल व्यक्तिगत विवाद का नहीं था, बल्कि इसके पीछे संगठित साजिश की भूमिका सामने आई है। अदालत ने विनय कुलकर्णी को इस पूरे प्रकरण का प्रमुख सूत्रधार मानते हुए हत्या और आपराधिक साजिश से संबंधित धाराओं के तहत दोषी ठहराया।

    यह घटना 15 जून 2016 की है, जब धारवाड़ में भाजपा नेता और जिला पंचायत के पूर्व सदस्य योगेश गौड़ा की उनके जिम परिसर में हत्या कर दी गई थी। इस वारदात के बाद स्थानीय थाने में प्राथमिकी दर्ज की गई थी और प्रारंभिक जांच के बाद मामला आगे बढ़ते हुए केंद्रीय जांच एजेंसी तक पहुंचा। विस्तृत जांच के दौरान कई महत्वपूर्ण साक्ष्य सामने आए, जिनके आधार पर आरोपपत्र दाखिल किया गया और अदालत में सुनवाई शुरू हुई।

    विनय कुलकर्णी को वर्ष 2020 में गिरफ्तार किया गया था और बाद में उन्हें सशर्त जमानत दी गई थी। हालांकि वर्ष 2025 में अदालत ने गवाहों को प्रभावित किए जाने के आरोपों और सबूतों की गंभीरता को देखते हुए उनकी जमानत रद्द कर दी थी, जिसके बाद सुनवाई की प्रक्रिया और तेज हो गई थी।

    अदालत ने अपने फैसले में कहा कि इस प्रकार की संगठित आपराधिक गतिविधियां लोकतांत्रिक व्यवस्था और कानून के शासन के लिए गंभीर चुनौती हैं। इसलिए दोषियों को कठोर सजा देना आवश्यक है ताकि समाज में स्पष्ट संदेश जाए कि ऐसे अपराधों को किसी भी स्थिति में स्वीकार नहीं किया जाएगा।

    सभी दोषियों को हत्या और आपराधिक साजिश से संबंधित धाराओं के तहत आजीवन कारावास की सजा के साथ आर्थिक दंड भी दिया गया है। इसके अतिरिक्त अन्य संबंधित धाराओं में अलग-अलग सजाएं निर्धारित की गई हैं, जो कानून के अनुसार साथ-साथ चलेंगी। अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि मृतक के परिवार को मुआवजा प्रदान किया जाए ताकि उन्हें आर्थिक सहायता मिल सके।

    इस फैसले के बाद राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर इस मामले को लेकर चर्चा तेज हो गई है। वर्षों पुराने इस हाई प्रोफाइल हत्याकांड में अदालत का यह निर्णय न्यायिक प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण और निर्णायक चरण माना जा रहा है।

  • सुपर स्पेशियलिटी मेडिकल क्षेत्रों में शिक्षकों की नियुक्ति से शिक्षा व्यवस्था मजबूत होगी

    सुपर स्पेशियलिटी मेडिकल क्षेत्रों में शिक्षकों की नियुक्ति से शिक्षा व्यवस्था मजबूत होगी

    नई दिल्ली: झारखंड में चिकित्सा शिक्षा के क्षेत्र को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए 90 असिस्टेंट प्रोफेसर पदों पर भर्ती प्रक्रिया शुरू की जा रही है। इस भर्ती का उद्देश्य राज्य के मेडिकल कॉलेजों में सुपर स्पेशियलिटी विभागों में शिक्षकों की कमी को पूरा करना और उच्च स्तरीय चिकित्सा शिक्षा व्यवस्था को सुदृढ़ बनाना है।

    जारी जानकारी के अनुसार इस भर्ती के लिए ऑनलाइन आवेदन प्रक्रिया 28 अप्रैल 2026 से शुरू होगी और उम्मीदवार 12 मई 2026 तक आवेदन कर सकेंगे। आवेदन शुल्क जमा करने की अंतिम तिथि 14 मई 2026 निर्धारित की गई है। इस पूरी प्रक्रिया में पात्र उम्मीदवारों से ऑनलाइन माध्यम से आवेदन आमंत्रित किए गए हैं।

    इन पदों के लिए आवेदन करने वाले उम्मीदवारों के पास संबंधित सुपर स्पेशियलिटी विषय में डीएम, एमसीएच या डीएनबी जैसी उच्च स्तरीय योग्यता होना अनिवार्य है। इसके साथ ही चिकित्सा शिक्षा के लिए निर्धारित अन्य मानकों को भी पूरा करना आवश्यक होगा। यह नियुक्तियां राज्य के विभिन्न मेडिकल कॉलेजों में की जाएंगी, जिससे शिक्षा और प्रशिक्षण की गुणवत्ता में सुधार संभव हो सकेगा।

    आयु सीमा के अनुसार न्यूनतम आयु 30 वर्ष रखी गई है, जबकि अधिकतम आयु श्रेणी के अनुसार निर्धारित नियमों के तहत अलग अलग होगी। आरक्षित वर्गों को सरकारी नियमों के अनुसार आयु सीमा में छूट प्रदान की जाएगी, जिससे अधिक योग्य उम्मीदवारों को अवसर मिल सके।

    चयन प्रक्रिया में उम्मीदवारों की शैक्षणिक योग्यता और साक्षात्कार के आधार पर मेरिट तैयार की जाएगी। इसमें उम्मीदवारों के शैक्षणिक रिकॉर्ड और इंटरव्यू प्रदर्शन को प्रमुख आधार माना जाएगा।

    यह भर्ती चिकित्सा शिक्षा क्षेत्र के लिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि इससे सुपर स्पेशियलिटी विभागों में विशेषज्ञ शिक्षकों की उपलब्धता बढ़ेगी। इससे न केवल मेडिकल कॉलेजों की क्षमता में सुधार होगा बल्कि छात्रों को बेहतर और उन्नत प्रशिक्षण भी प्राप्त हो सकेगा।

  • लोकसभा में राहुल गांधी के भाषण पर निशिकांत दुबे का तंज, बोले माइकल जैक्शन का डांस याद आ गया’

    लोकसभा में राहुल गांधी के भाषण पर निशिकांत दुबे का तंज, बोले माइकल जैक्शन का डांस याद आ गया’


    नई दिल्ली। महिला आरक्षण बिल पर मतदान से पहले लोकसभा में जोरदार बहस देखने को मिली। नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने केंद्र सरकार पर जाति जनगणना को लेकर सवाल उठाए और आरोप लगाया कि सरकार इस मुद्दे को दबाने की कोशिश कर रही है। वहीं बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे ने उनके भाषण पर तीखा कटाक्ष किया।

    निशिकांत दुबे ने साधा निशाना

    इस पर जवाब देते हुए बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे ने विपक्ष खासकर कांग्रेस पर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि जब कांग्रेस सत्ता में थी तब जातिगत जनगणना क्यों नहीं कराई गई। साथ ही उन्होंने पुराने परिसीमन और नीतियों का हवाला देते हुए कहा कि कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं ने पहले इसका विरोध किया था। राहुल गांधी के भाषण पर तंज कसते हुए निशिकांत दुबे ने कहा कि उन्हें उम्मीद थी कि महिला मुद्दों पर गंभीर चर्चा सुनने को मिलेगी लेकिन भाषण देखकर उन्हें माइकल जैक्शन का डांस याद आ गया।

    अखिलेश यादव से हुई तीखी नोकझोंक

    बहस के दौरान समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने भी हस्तक्षेप किया और दुबे से कहा कि वे इतिहास में ज्यादा न जाएं और मुद्दे पर बात करें। इस पर दोनों नेताओं के बीच तीखी नोकझोंक देखने को मिली। चर्चा के दौरान अखिलेश यादव ने कहा कि वे कन्नौज में एक मंदिर गए थे और उनके लौटने के बाद मंदिर को गंगाजल से धुलवाया। निशिकांत दुबे ने कहा कि जिसने भी ऐसा किया वो गलत है और मंदिर धुलवाने वाले को कानून के हिसाब से सजा मिलनी चाहिए।

    निशिकांत दुबे ने आगे कहा कि कांग्रेस लंबे समय तक जातिगत जनगणना के खिलाफ रही है। उन्होंने सोनिया गांधी और पी. चिदंबरम के पुराने बयानों का जिक्र करते हुए दावा किया कि कांग्रेस नेताओं ने पहले इस मुद्दे को संविधान और सामाजिक एकता के खिलाफ बताया था।

  • महिला आरक्षण पर राहुल गांधी ने सरकार को घेरा, कहा- यह असली वुमन बिल नहीं, दादी इंदिरा का किया जिक्र

    महिला आरक्षण पर राहुल गांधी ने सरकार को घेरा, कहा- यह असली वुमन बिल नहीं, दादी इंदिरा का किया जिक्र

    नई दिल्ली। संसद के विशेष सत्र के दूसरे दिन लोकसभा में बोलते हुए कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने महिला आरक्षण मुद्दे पर अपनी बात रखते हुए एक निजी अनुभव साझा किया और सरकार पर सवाल उठाए। उन्होंने अपनी दादी और पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को याद करते हुए कहा कि उन्होंने उन्हें बचपन में डर का सामना करना सिखाया था।

    सुनाया बचपन का किस्सा

    राहुल गांधी ने बताया कि बचपन में एक बार उनकी दादी उन्हें घर से बाहर ले गईं और कुछ समय के लिए अकेला छोड़ दिया। वहां मौजूद कुत्तों और लोगों के कारण वे डर गए थे। जब इंदिरा गांधी वापस आईं और उन्होंने अपनी परेशानी बताई तो उन्होंने समझाया कि डर असल में उनके मन में था। राहुल ने कहा कि इस अनुभव ने उन्हें जिंदगी में डर से लड़ना सिखाया।

    महिलाओं से हर कोई सीखता है

    अपने संबोधन में राहुल गांधी ने कहा कि हर व्यक्ति अपने जीवन में महिलाओं से सीखता है चाहे वह मां हो बहन हो या अन्य कोई भूमिका। उन्होंने यह भी कहा कि सच्चाई कड़वी होती है लेकिन उसका सामना करना जरूरी है। हालांकि उन्होंने मौजूदा महिला आरक्षण विधेयक पर सवाल उठाते हुए कहा कि यह वास्तव में महिलाओं के हितों का बिल नहीं है।

    विधेयक की मंशा पर उठाए सवाल

    राहुल गांधी ने कहा कि 2023 में पारित महिला आरक्षण बिल को लेकर सत्ता पक्ष के सहयोगियों ने संकेत दिया था कि इसे 10 साल बाद लागू किया जा सकता है। उनके अनुसार यह महिलाओं को तत्काल लाभ देने वाला कदम नहीं है।

    चुनावी नक्शा बदलने की कोशिश

    कांग्रेस नेता ने आरोप लगाया कि देश के इलेक्टोरल मैप को बदलने की कोशिश की जा रही है जो महिला आरक्षण के मूल मुद्दे से अलग है। उन्होंने कहा कि यह एक बड़ा राजनीतिक सवाल है जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

    जाति जनगणना का भी उठाया मुद्दा

    लोकसभा में अपने भाषण के दौरान राहुल गांधी ने जाति जनगणना को लेकर भी सरकार से स्पष्ट जवाब मांगा। उन्होंने कहा कि गृह मंत्री ने इस पर बात तो की लेकिन यह स्पष्ट नहीं किया कि इसके आंकड़ों का उपयोग आरक्षण तय करने में होगा या नहीं। उन्होंने कहा कि अगर सरकार वास्तविक प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करती है तो कांग्रेस इसका पूरा समर्थन करेगी।

    सरकार पर डर की राजनीति का आरोप

    राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि सरकार डर की राजनीति कर रही है और देश की राजनीतिक संरचना को बदलने की कोशिश हो रही है। उन्होंने कहा कि छोटे राज्यों को उनकी राजनीतिक हिस्सेदारी कम होने का संकेत दिया जा रहा है जिसे विपक्ष स्वीकार नहीं करेगा। साथ ही उन्होंने कहा कि दलित और ओबीसी समुदायों को पर्याप्त राजनीतिक प्रतिनिधित्व नहीं मिल रहा है। राहुल गांधी ने अंत में कहा कि उनकी पार्टी देश के लोगों के प्रतिनिधित्व से कोई समझौता नहीं करेगी। उन्होंने भरोसा दिलाया कि किसी भी वर्ग के अधिकारों पर आंच नहीं आने दी जाएगी और हर हमले का मजबूती से विरोध किया जाएगा।

  • हरिवंश नारायण सिंह का तीसरी बार उपसभापति चुना जाना अनुभव और विश्वास की निरंतरता का प्रतीक

    हरिवंश नारायण सिंह का तीसरी बार उपसभापति चुना जाना अनुभव और विश्वास की निरंतरता का प्रतीक

    नई दिल्ली: राज्यसभा के वरिष्ठ सदस्य हरिवंश नारायण सिंह को एक बार फिर उच्च सदन का उपसभापति चुना गया है और यह उनका लगातार तीसरा कार्यकाल होगा। शुक्रवार को उनके निर्विरोध चयन की औपचारिक घोषणा की गई। विपक्ष की ओर से कोई उम्मीदवार न उतारे जाने के कारण यह चयन पहले से ही लगभग तय माना जा रहा था। इस घटनाक्रम को संसदीय परंपरा में निरंतरता और अनुभव पर भरोसे के रूप में देखा जा रहा है।

    यह पद उनके पिछले कार्यकाल की समाप्ति के बाद रिक्त हुआ था, जिसके बाद निर्धारित संवैधानिक प्रक्रिया के तहत नामांकन और चुनाव की प्रक्रिया शुरू की गई। तय समय सीमा के भीतर उनके समर्थन में कई प्रस्ताव दाखिल किए गए। राजनीतिक हलकों में यह भी चर्चा रही कि विपक्ष ने इस प्रक्रिया से दूरी बनाकर अपनी असहमति दर्ज कराई, हालांकि सदन की औपचारिक प्रक्रिया बिना किसी बाधा के पूरी हुई।

    उपसभापति के रूप में उनके चयन के बाद प्रधानमंत्री ने उन्हें बधाई देते हुए कहा कि यह लगातार तीसरी बार की जिम्मेदारी सदन के उनके प्रति गहरे विश्वास को दर्शाती है। प्रधानमंत्री ने कहा कि हरिवंश नारायण सिंह ने अपने कार्यकाल के दौरान सदन की कार्यवाही को संतुलित, व्यवस्थित और प्रभावी बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उन्होंने यह भी कहा कि विभिन्न राजनीतिक विचारधाराओं के बीच संतुलन बनाए रखना उनकी सबसे बड़ी विशेषताओं में से एक रहा है।

    प्रधानमंत्री ने आगे कहा कि हरिवंश नारायण सिंह ने सदन में सभी दलों को साथ लेकर चलने का प्रयास किया है और उनकी कार्यशैली ने संसदीय गरिमा को मजबूत किया है। अनुभव और संयम के साथ उनके द्वारा निभाई गई भूमिका ने सदन की कार्यवाही को अधिक सुचारु और प्रभावी बनाने में योगदान दिया है।

    संसदीय हलकों में भी उनके लगातार तीसरी बार चुने जाने को स्थिरता और निरंतरता के संकेत के रूप में देखा जा रहा है। उनके कार्यकाल में संवाद की गुणवत्ता और संसदीय अनुशासन को बढ़ावा मिलने की बात कही जा रही है, जिससे विधायी कार्यों के संचालन में अधिक सहजता आई है।

    इस पूरे घटनाक्रम को भारतीय संसदीय व्यवस्था में एक महत्वपूर्ण विकास माना जा रहा है, जहां अनुभव, संतुलन और परंपरा को महत्व देते हुए नेतृत्व की निरंतरता को आगे बढ़ाया गया है।

  • सबरीमाला मामले में सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ की सुनवाई तेज, आस्था और समानता के बीच संतुलन को लेकर ऐतिहासिक निर्णय की संभावना

    सबरीमाला मामले में सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ की सुनवाई तेज, आस्था और समानता के बीच संतुलन को लेकर ऐतिहासिक निर्णय की संभावना

    नई दिल्ली:   केरल के सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश से जुड़े संवेदनशील और लंबे समय से चले आ रहे विवाद पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई एक बार फिर तेज हो गई है। नौ जजों की संविधान पीठ इस मामले में दाखिल पुनर्विचार याचिकाओं पर विस्तार से विचार कर रही है। यह मामला अब केवल एक धार्मिक परंपरा का प्रश्न नहीं रह गया है, बल्कि यह आस्था, परंपरा और मौलिक अधिकारों के बीच संतुलन की एक व्यापक संवैधानिक बहस का रूप ले चुका है।

    सुनवाई के दौरान पीठ ने यह संकेत दिया कि धार्मिक आस्थाओं और परंपराओं को केवल कानूनी दृष्टिकोण से देखना आसान नहीं होता, क्योंकि इनमें करोड़ों लोगों की भावनाएं और विश्वास जुड़े होते हैं। अदालत ने यह भी कहा कि किसी भी सामाजिक सुधार की प्रक्रिया में धार्मिक संरचनाओं की मूल भावना को पूरी तरह नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। इन टिप्पणियों से मामले की गंभीरता और जटिलता और अधिक स्पष्ट हो गई है।

    यह पूरा विवाद वर्ष 2018 के उस ऐतिहासिक फैसले से जुड़ा है, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने सभी आयु वर्ग की महिलाओं को सबरीमाला मंदिर में प्रवेश की अनुमति दी थी। इससे पहले 1991 में केरल उच्च न्यायालय ने 10 से 50 वर्ष की महिलाओं के प्रवेश पर रोक को उचित माना था। 2018 के फैसले के बाद देशभर में इस मुद्दे पर तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आईं और इसके खिलाफ कई पुनर्विचार याचिकाएं दाखिल की गईं, जिन पर अब विस्तार से सुनवाई जारी है।

    मंदिर के प्रबंधन से जुड़े पक्ष का कहना है कि यह परंपरा भगवान अयप्पा के ब्रह्मचारी स्वरूप की मान्यता पर आधारित है और सदियों से इसका पालन होता आ रहा है। उनके अनुसार यह मामला केवल प्रशासनिक व्यवस्था या सार्वजनिक अधिकारों का नहीं, बल्कि एक गहरी धार्मिक आस्था और परंपरा का हिस्सा है, जिसे सामाजिक संदर्भ में समझना आवश्यक है।

    सुनवाई के दौरान विभिन्न पक्षों ने संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 के तहत धार्मिक स्वतंत्रता का हवाला दिया और कहा कि धार्मिक प्रथाओं के मूल स्वरूप में हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए। वहीं दूसरी ओर याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि किसी भी प्रकार का लिंग आधारित प्रतिबंध समानता के अधिकार और मौलिक अधिकारों की भावना के खिलाफ है, इसलिए इसे संवैधानिक कसौटी पर परखा जाना चाहिए।

    यह मामला केवल सबरीमाला मंदिर तक सीमित नहीं माना जा रहा है, बल्कि इसी सुनवाई के दौरान धार्मिक स्थलों में महिलाओं की भूमिका, विभिन्न समुदायों की परंपराएं और धार्मिक संस्थाओं में लैंगिक समानता जैसे व्यापक मुद्दों पर भी विचार किया जा रहा है। इसमें विभिन्न धार्मिक परंपराओं से जुड़े संवेदनशील प्रश्न भी शामिल हैं, जिससे यह मामला और अधिक व्यापक बन गया है।

    माना जा रहा है कि इस मामले में सुप्रीम कोर्ट का आने वाला निर्णय न केवल धार्मिक परंपराओं की व्याख्या को प्रभावित करेगा, बल्कि देश में आस्था, समानता और संवैधानिक अधिकारों के बीच संतुलन की दिशा भी तय कर सकता है।

  • सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, किसी भी पात्र मतदाता को वोट से वंचित नहीं किया जाएगा..

    सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, किसी भी पात्र मतदाता को वोट से वंचित नहीं किया जाएगा..


    नई दिल्ली:   पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 से पहले मतदाता सूची को लेकर चल रहे विवाद पर सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण और निर्णायक आदेश दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि कोई भी पात्र नागरिक अपने मताधिकार से वंचित नहीं रहेगा और यदि मतदान से ठीक अंतिम समय तक भी किसी व्यक्ति को कानूनी रूप से राहत मिलती है तो उसे वोट डालने का पूरा अधिकार होगा। इस निर्णय को चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता और मतदाता अधिकारों की सुरक्षा की दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा है।

    सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि मतदान केवल एक संवैधानिक अधिकार नहीं है, बल्कि यह लोकतांत्रिक व्यवस्था की आत्मा से जुड़ा एक महत्वपूर्ण अधिकार भी है। अदालत ने चुनाव आयोग को निर्देश दिया है कि अपीलीय निर्णयों के आधार पर तुरंत एक पूरक संशोधित मतदाता सूची तैयार की जाए, ताकि किसी भी योग्य मतदाता का नाम मतदान के समय तक सूची में शामिल किया जा सके और उसे मतदान का अवसर मिल सके।

    अदालत ने व्यवस्था दी है कि जिन मामलों में अपील पर ट्रिब्यूनल मतदान से दो दिन पहले तक निर्णय देता है, उन सभी मतदाताओं के नाम संशोधित सूची में जोड़े जाएंगे। इसके साथ ही अदालत ने यह भी कहा कि अपीलीय प्रक्रिया का दुरुपयोग कर चुनावी प्रक्रिया को बाधित करने की कोशिश नहीं होनी चाहिए, जिससे चुनाव की समयबद्धता और सुचारु संचालन प्रभावित हो।

    सुप्रीम कोर्ट ने मतदान की तिथियों के अनुसार स्पष्ट समय सीमा भी निर्धारित की है। पहले चरण के मतदान के लिए यह निर्देश दिया गया है कि जिन अपीलों पर समय रहते निर्णय हो जाता है, उनके नाम निर्धारित समय सीमा के भीतर अंतिम सूची में शामिल किए जाएं। इसी तरह दूसरे चरण के मतदान के लिए भी अपीलीय निर्णयों को आधार बनाकर संशोधित सूची जारी करने का आदेश दिया गया है, ताकि किसी भी पात्र मतदाता को मतदान से वंचित न रहना पड़े।

    अदालत ने यह भी निर्देश दिया है कि ट्रिब्यूनल के निर्णय के तुरंत बाद मतदाता सूची संबंधित अधिकारियों और संबंधित पक्षों तक पहुंचाई जाए, जिससे मतदान के दिन किसी प्रकार की तकनीकी या प्रशासनिक बाधा उत्पन्न न हो। इस पूरी प्रक्रिया का उद्देश्य चुनावी प्रणाली को अधिक पारदर्शी, तेज और न्यायसंगत बनाना बताया गया है।

    यह पूरा मामला राज्य में चल रही मतदाता सूची पुनरीक्षण प्रक्रिया से जुड़ा हुआ था, जिसमें बड़ी संख्या में अपीलें लंबित थीं। कम समय में इन सभी मामलों का निपटारा करना एक बड़ी चुनौती बन गया था। इसी पृष्ठभूमि में अदालत ने अपने विशेष अधिकारों का उपयोग करते हुए यह सुनिश्चित किया कि किसी भी पात्र नागरिक का अधिकार प्रभावित न हो।

    इस फैसले के बाद राजनीतिक हलकों में भी प्रतिक्रियाएं देखने को मिली हैं और इसे लोकतांत्रिक अधिकारों की सुरक्षा की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। मतदाता अधिकारों को 

  • राष्ट्रीय विकास और जनसंख्या नियंत्रण में उत्कृष्ट कार्य करने वाले राज्यों के प्रतिनिधित्व को सुरक्षित रखना संघीय स्थिरता के लिए आवश्यक है।

    राष्ट्रीय विकास और जनसंख्या नियंत्रण में उत्कृष्ट कार्य करने वाले राज्यों के प्रतिनिधित्व को सुरक्षित रखना संघीय स्थिरता के लिए आवश्यक है।

    नई दिल्ली:भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था में राज्यों के प्रतिनिधित्व और जनसंख्या के आधार पर सीटों के आवंटन को लेकर एक अत्यंत महत्वपूर्ण बहस छिड़ गई है। हाल ही में सदन की कार्यवाही के दौरान देश के भविष्य की राजनीतिक दिशा और संघीय ढांचे की स्थिरता को लेकर गहरी चिंताएं व्यक्त की गईं। इस चर्चा का मुख्य केंद्र आगामी परिसीमन और उसके संभावित परिणाम रहे जो आने वाले दशकों में भारतीय राजनीति के स्वरूप को पूरी तरह बदल सकते हैं।
    यह तर्क दिया गया कि यदि भविष्य में लोकसभा सीटों का निर्धारण केवल जनसंख्या वृद्धि के मानकों पर किया जाता है तो इससे उन राज्यों के राजनीतिक प्रभाव में भारी कमी आने की आशंका है जिन्होंने राष्ट्रीय लक्ष्यों जैसे परिवार नियोजन और जनसंख्या नियंत्रण को सफलतापूर्वक लागू किया है। विशेष रूप से दक्षिण भारतीय राज्यों के संदर्भ में यह एक गंभीर विषय बन गया है क्योंकि उनके बेहतर सामाजिक और शैक्षिक प्रदर्शन का परिणाम उन्हें संसद में कम प्रतिनिधित्व के रूप में भुगतना पड़ सकता है।

    संसदीय पटल पर प्रस्तुत किए गए तर्कों और विश्लेषण के अनुसार यदि भविष्य में केवल जनसंख्या को ही आधार बनाया गया तो देश के राजनीतिक मानचित्र पर एक बड़ा असंतुलन पैदा हो सकता है। आंकड़ों के माध्यम से यह रेखांकित किया गया कि यदि वर्तमान जनसंख्या वृद्धि की दर और प्रस्तावित परिसीमन का मेल होता है तो भविष्य में उत्तर भारत के केवल छह या सात प्रमुख राज्यों के सहयोग से ही केंद्र में पूर्ण बहुमत वाली सरकार का गठन संभव हो जाएगा।

    ऐसी स्थिति में देश के अन्य हिस्सों विशेषकर दक्षिण और पूर्वोत्तर भारत की राजनीतिक भागीदारी और उनकी आवाज का महत्व केंद्र सरकार के निर्णयों में काफी कम हो सकता है। यह संभावना न केवल क्षेत्रीय असंतुलन को बढ़ावा दे सकती है बल्कि भारतीय लोकतंत्र की उस मूल भावना के लिए भी चुनौती बन सकती है जो विविधता में एकता और सभी क्षेत्रों की समान भागीदारी पर आधारित है।

    चर्चा के दौरान यह बात भी प्रमुखता से रखी गई कि किसी भी लोकतांत्रिक देश में कानून निर्माण की प्रक्रिया में हर भौगोलिक और सांस्कृतिक क्षेत्र का समान महत्व होना चाहिए। संघीय शासन प्रणाली की सफलता इसी बात पर निर्भर करती है कि देश का प्रत्येक नागरिक और हर राज्य स्वयं को निर्णय लेने वाली सर्वोच्च संस्था में प्रभावी रूप से प्रतिनिधित्व पाता हुआ महसूस करे।

    यदि सीटों के पुनर्गठन के बाद राजनीतिक सत्ता का केंद्र पूरी तरह से कुछ विशिष्ट राज्यों तक सीमित हो जाता है तो इससे उन राज्यों के भीतर असुरक्षा और उपेक्षा की भावना पैदा हो सकती है जिन्होंने विकास के मानकों पर शानदार कार्य किया है। लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा के लिए यह अनिवार्य माना गया कि परिसीमन को केवल एक सांख्यिकीय प्रक्रिया के रूप में न देखकर इसे एक न्यायसंगत वितरण प्रणाली के रूप में विकसित किया जाए।

    इस विषय पर विचार करते हुए यह सुझाव दिया गया कि नीति निर्माताओं को परिसीमन के नियमों पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता है। यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि बेहतर शासन और जनसंख्या नियंत्रण करने वाले राज्यों को पुरस्कृत किया जाए न कि उनकी संसदीय शक्ति को कम करके उन्हें दंडित किया जाए।

    सदन में इस विचार पर बल दिया गया कि भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में केवल संख्या बल ही सत्ता का एकमात्र आधार नहीं होना चाहिए बल्कि क्षेत्रीय योगदान और विकास के पैमानों को भी उचित सम्मान मिलना चाहिए। यदि ऐसा नहीं होता है तो आने वाले समय में राष्ट्रीय राजनीति में एक गहरा विभाजन देखने को मिल सकता है जो संघीय सहयोग और राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया को कमजोर कर सकता है।

    अंततः यह संपूर्ण चर्चा इस निष्कर्ष की ओर इशारा करती है कि भारतीय लोकतंत्र के समक्ष आने वाले वर्षों में प्रतिनिधित्व का संकट एक बहुत बड़ी चुनौती के रूप में सामने आएगा। इस जटिल मुद्दे के समाधान के लिए सभी राजनीतिक दलों और संवैधानिक संस्थाओं को सामूहिक रूप से प्रयास करने होंगे।

    संघीय ढांचे को अटूट रखने के लिए ऐसे समाधान खोजने की आवश्यकता है जो जनसंख्या के संतुलन के साथ-साथ क्षेत्रीय अस्मिता और राज्यों के विशिष्ट योगदान को भी सुरक्षित रख सकें। भविष्य में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि भारत का नेतृत्व इस संवेदनशील मुद्दे पर किस प्रकार की आम सहमति बनाता है ताकि देश का हर हिस्सा स्वयं को राष्ट्र की मुख्यधारा का एक सशक्त और अपरिहार्य अंग समझता रहे।