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  • दिल्ली में धरना…. कांग्रेस ने मीनाक्षी नटराजन के नामांकन रद्द को बताया सीट चोरी.. EC से भिड़ गए रमेश

    दिल्ली में धरना…. कांग्रेस ने मीनाक्षी नटराजन के नामांकन रद्द को बताया सीट चोरी.. EC से भिड़ गए रमेश


    नई दिल्ली।
    मध्य प्रदेश (Madhya Pradesh) में होने वाले राज्य सभा चुनाव (Rajya Sabha Elections) में कांग्रेस की उम्मीदवार मीनाक्षी नटराजन (Meenakshi Natarajan) का नामांकन खारिज कर दिया गया है। उन पर आपराधिक मामलों की जानकारी छुपाने के आरोप हैं। इस घटना से नाराज कांग्रेस नेताओं ने जहां इसे सीट चोरी बताया है, वहीं इसकी शिकायत करने सीधे चुनाव आयोग के दफ्तर जा पहुंचे। मामले में शिकायत दर्ज करवाने कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेता मंगलवार (9 जून) की शाम नई दिल्ली स्थित चुनाव आयोग के मुख्यालय पहुंचे तो उन्हें अंदर प्रवेश की अनुमति नहीं मिली। इस दौरान कांग्रेस महासिव जयराम रमेश को आयोग के सुरक्षा अधिकारियों से भिड़ते हुए देखा गया। रमेश ने धौंस दिखाते हुए सुरक्षा अधिकारियों से कहा कि कहानी मत बनाओ, 35 साल से सांसद हूं। अंदर आयोग के वेटिंग रूम में जाने दो, जब इसके बाद भी उन्हें इजाजत नहीं मिली तो कांग्रेस नेता मुख्य द्वार पर ही धरने पर बैठ गए।

    जयराम रमेश के साथ कांग्रेस के संगठन महासचिव केसी वेणुगोपाल, छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल और सचिन पायलट तथा कुछ अन्य नेता मंगलवार देर शाम आयोग के मुख्यालय पहुंचे थे। कांग्रेस का आरोप है कि उनके उम्मीदवार का नामांकन सिर्फ एक नोटिस का हवाला देकर खारिज कर दिया गया, जबकि उनके खिलाफ कोई मामला दर्ज नहीं है। वेणुगोपाल ने संवाददाताओं ने कहा कि जब तक कांग्रेस नेताओं को आयोग के भीतर जाने की इजाजत नहीं मिलती, तब तक धरना जारी रहेगा। हालांकि, कुछ देर बाद आयोग की ओर से पार्टी के दो नेताओं को ज्ञापन सौंपने की अनुमति मिली और फिर वेणुगोपाल एवं बघेल ने अंदर जाकर ज्ञापन सौंपा। इसके बाद घरना खत्म कर दिया गया।


    इंसाफ दीजिए, नहीं तो जाएंगे कोर्ट

    वेणुगोपाल ने संवाददाताओं से कहा, ”शाम 7.25 बजे हमने निर्वाचन आयोग को शिकायत दर्ज कराने के मकसद से मुलाकात के वक्त के लिए पत्र दिया। अब निर्वाचन आयोग के अंदर हमें जाने नहीं दिया जा रहा है।” उन्होंने सवाल किया, ”इस देश में क्या हो रहा है? क्या यह ‘बनाना रिपब्लिक’ है?” वेणुगोपाल का कहना था, ”हमें इंसाफ चाहिए, (हम) कानूनी कदम उठाएंगे, हम अदालत भी जाएंगे।” उन्होंने दावा किया कि बिना किसी कारण के नटराजन का नामांकन रद्द कर दिया गया है।


    ऐसा पहले कभी नहीं हुआ

    वहीं सचिन पायलट ने कहा कि मीनाक्षी नटराजन के खिलाफ न तो कोई मामला दर्ज है, न आरोप-पत्र दाखिल हुआ है और न ही किसी मामले में सजा हुई है, इसके बावजूद एक नोटिस मिलने का हवाला देकर नामांकन खारिज कर दिया गया। उन्होंने कहा कि इसके पीछे निश्चित तौर पर कोई षड्यंत्र है और इसपर निर्वाचन आयोग को ध्यान देना चाहिए। पायलट का कहना था कि ऐसा पहले कभी नहीं हुआ कि एक राष्ट्रीय पार्टी के उम्मीदवार का नामांकन बिना किसी कारण के खारिज कर दिया गया हो।


    नटराजन का नामांकन पत्र खारिज करना भाजपा की साजिश

    इससे पहले, वेणुगोपाल ने ‘एक्स’ पर पोस्ट किया, ”मीनाक्षी नटराजन का नामांकन पत्र खारिज करना भाजपा द्वारा गुप्त तरीके से लोकतांत्रिक प्रक्रिया को नष्ट करने का एक प्रयास है। उनके नामांकन में किसी भी त्रुटि या कोई जानकारी छिपाने का आरोप पूरी तरह से मूर्खतापूर्ण है और कांग्रेस से एक सीट छीनने का यह हताशापूर्ण प्रयास है।” उनका कहना था, ”जब उन्हें (भाजपा को) एहसास हुआ कि हमारे कांग्रेस विधायकों से सौदा करने की उनकी गंदी चालें विफल होने वाली हैं, तो वे इतने नीचे गिर गए कि उनका (मीनाक्षी नटराजन का) नामांकन खारिज करवा दिया।”

    वेणुगोपाल ने दावा किया कि यह संविधान और लोकतंत्र के प्रति भाजपा की खोखली प्रतिबद्धता को दर्शाता है और वह हर कदम पर किसी न किसी तरह “वोट चोरी” पर आमादा है। कांग्रेस नेता ने कहा, ”हम लोकतंत्र की इस दिनदहाड़े लूट को बर्दाश्त नहीं करेंगे और इसके खिलाफ कानूनी तथा सड़क पर उतरकर लड़ाई लड़ेंगे।”

  • समीक्षा बैठक में देर से पहुंचे अधिकारी पर स्वास्थ्य मंत्री का बड़ा एक्शन, डीडीपीओ तत्काल निलंबित

    समीक्षा बैठक में देर से पहुंचे अधिकारी पर स्वास्थ्य मंत्री का बड़ा एक्शन, डीडीपीओ तत्काल निलंबित


    नई दिल्ली ।
    हरियाणा सरकार की प्रशासनिक जवाबदेही और अनुशासन पर जोर देने की नीति के बीच नारनौल में एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक कार्रवाई देखने को मिली। जिले के विकास कार्यों और विभिन्न विभागों की प्रगति की समीक्षा के लिए आयोजित बैठक के दौरान स्वास्थ्य मंत्री आरती सिंह राव ने जिला विकास एवं पंचायत अधिकारी (डीडीपीओ) प्रमोद कुमार के खिलाफ तत्काल प्रभाव से निलंबन की कार्रवाई के निर्देश दिए। मंत्री के इस निर्णय के बाद प्रशासनिक हलकों में चर्चा तेज हो गई है।

    नारनौल स्थित पीडब्ल्यूडी रेस्ट हाउस में आयोजित समीक्षा बैठक में जिले के विकास कार्यों, पंचायत योजनाओं और विभिन्न विभागों की प्रगति का आकलन किया जा रहा था। बैठक में जनप्रतिनिधियों और प्रशासनिक अधिकारियों की उपस्थिति में विभिन्न योजनाओं के क्रियान्वयन की स्थिति पर विस्तार से चर्चा की गई। इसी दौरान कुछ विभागों के कार्यों को लेकर शिकायतें और अनियमितताओं से जुड़ी बातें भी सामने आईं, जिन पर मंत्री ने नाराजगी व्यक्त की।

    जानकारी के अनुसार, समीक्षा बैठक के लिए सभी संबंधित अधिकारियों को निर्धारित समय पर उपस्थित रहने के निर्देश दिए गए थे। बैठक को प्रशासनिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा था क्योंकि इसमें विकास परियोजनाओं की प्रगति और जनहित से जुड़े कार्यों की समीक्षा की जानी थी। इसके बावजूद जिला विकास एवं पंचायत अधिकारी प्रमोद कुमार समय पर बैठक में उपस्थित नहीं हो सके। इस स्थिति को मंत्री ने गंभीरता से लिया और इसे प्रशासनिक अनुशासन के उल्लंघन के रूप में देखा।

    बैठक के दौरान मंत्री ने स्पष्ट संकेत दिया कि सरकारी योजनाओं और जनहित के कार्यों के संचालन में किसी भी प्रकार की लापरवाही स्वीकार नहीं की जाएगी। उन्होंने अधिकारियों को समयबद्ध कार्यप्रणाली अपनाने और जवाबदेही सुनिश्चित करने के निर्देश भी दिए। इसी क्रम में डीडीपीओ के खिलाफ तत्काल निलंबन की कार्रवाई के आदेश जारी किए गए।

    प्रशासनिक मामलों के जानकारों का मानना है कि इस तरह की कार्रवाई का उद्देश्य केवल किसी एक अधिकारी के खिलाफ कदम उठाना नहीं होता, बल्कि पूरे प्रशासनिक तंत्र को जवाबदेही और अनुशासन का संदेश देना भी होता है। सरकारें अक्सर विकास योजनाओं की प्रभावी निगरानी और समय पर क्रियान्वयन सुनिश्चित करने के लिए अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर विशेष ध्यान देती हैं।

    बैठक में स्थानीय जनप्रतिनिधियों के साथ उपायुक्त और विभिन्न विभागों के वरिष्ठ अधिकारी भी मौजूद रहे। इस दौरान सड़क, पंचायत, स्वास्थ्य और अन्य विकास योजनाओं की प्रगति की समीक्षा की गई। अधिकारियों को लंबित कार्यों को निर्धारित समय सीमा के भीतर पूरा करने और जनता से जुड़े मामलों में तत्परता दिखाने के निर्देश दिए गए।

    स्वास्थ्य मंत्री की इस कार्रवाई को प्रशासनिक सख्ती और कार्यसंस्कृति में सुधार के प्रयास के रूप में देखा जा रहा है। हाल के वर्षों में कई राज्य सरकारें अधिकारियों की जवाबदेही तय करने और विकास परियोजनाओं की निगरानी को लेकर अधिक सक्रिय हुई हैं। ऐसे में नारनौल में हुई यह कार्रवाई भी उसी दिशा में उठाया गया एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।

    घटना के बाद प्रशासनिक अधिकारियों के बीच समय की पाबंदी, कार्य निष्पादन और विभागीय जिम्मेदारियों को लेकर चर्चा तेज हो गई है। माना जा रहा है कि इस कार्रवाई का प्रभाव भविष्य में अधिकारियों की कार्यशैली और सरकारी बैठकों में अनुशासन के पालन पर भी दिखाई दे सकता है।

  • टीएमसी संकट के बीच शत्रुघ्न सिन्हा की चुप्पी चर्चा में, बंगाल की सियासत में बढ़े नए कयास..

    टीएमसी संकट के बीच शत्रुघ्न सिन्हा की चुप्पी चर्चा में, बंगाल की सियासत में बढ़े नए कयास..

    नई दिल्ली । पश्चिम बंगाल की राजनीति में इन दिनों तृणमूल कांग्रेस के भीतर उभर रहे मतभेदों और सांसदों के रुख को लेकर चर्चाओं का दौर जारी है। इसी बीच पार्टी सांसद शत्रुघ्न सिन्हा की चुप्पी राजनीतिक गलियारों में विशेष चर्चा का विषय बन गई है। जहां विभिन्न नेताओं की ओर से लगातार बयान सामने आ रहे हैं, वहीं अनुभवी नेता और अभिनेता से राजनेता बने शत्रुघ्न सिन्हा ने अब तक किसी भी पक्ष में सार्वजनिक रूप से कोई स्पष्ट टिप्पणी नहीं की है। उनकी यही खामोशी राजनीतिक विश्लेषकों और पर्यवेक्षकों का ध्यान अपनी ओर खींच रही है।

    तृणमूल कांग्रेस के भीतर कथित असंतोष और सांसदों के अलग-अलग रुख की चर्चाओं के बीच कई नेताओं ने खुलकर अपनी स्थिति स्पष्ट की है। इसके विपरीत शत्रुघ्न सिन्हा ने न तो किसी संभावित बागी समूह के समर्थन में कोई बयान दिया है और न ही सार्वजनिक रूप से पार्टी नेतृत्व के पक्ष में कोई विशेष प्रतिक्रिया व्यक्त की है। इस कारण राजनीतिक हलकों में उनके अगले कदम को लेकर विभिन्न तरह की अटकलें लगाई जा रही हैं।

    राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि शत्रुघ्न सिन्हा का लंबा राजनीतिक अनुभव उन्हें जल्दबाजी में कोई निर्णय लेने से रोक सकता है। राष्ट्रीय राजनीति में कई दशक सक्रिय रहने और विभिन्न राजनीतिक परिस्थितियों का अनुभव रखने वाले सिन्हा अक्सर महत्वपूर्ण मुद्दों पर सोच-समझकर प्रतिक्रिया देने के लिए जाने जाते हैं। ऐसे में मौजूदा घटनाक्रम पर उनकी चुप्पी को कुछ लोग रणनीतिक प्रतीक्षा की स्थिति के रूप में देख रहे हैं।

    शत्रुघ्न सिन्हा ने वर्ष 2022 में तृणमूल कांग्रेस का दामन थामा था। इसके बाद उन्हें आसनसोल लोकसभा सीट से चुनाव मैदान में उतारा गया, जहां उन्होंने जीत दर्ज की। बाद में आम चुनाव में भी उन्होंने अपनी सीट बरकरार रखी। राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि पश्चिम बंगाल की राजनीति में उनकी सक्रिय भूमिका को स्थापित करने में पार्टी नेतृत्व की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। यही कारण है कि उनके रुख को लेकर राजनीतिक हलकों में विशेष रुचि बनी हुई है।

    विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि किसी भी बड़े राजनीतिक घटनाक्रम के दौरान वरिष्ठ नेता अक्सर तत्काल प्रतिक्रिया देने के बजाय परिस्थितियों का आकलन करना पसंद करते हैं। शत्रुघ्न सिन्हा का नाम उन नेताओं में शामिल रहा है जिन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर विभिन्न दलों के नेताओं के साथ लंबे समय तक काम किया है। उनके राजनीतिक संबंध और अनुभव उन्हें परिस्थितियों को गहराई से समझने का अवसर देते हैं।

    राजनीतिक चर्चाओं में यह भी कहा जा रहा है कि बंगाल की मौजूदा परिस्थितियों पर राष्ट्रीय दलों की भी नजर बनी हुई है। ऐसे माहौल में किसी भी वरिष्ठ नेता का सार्वजनिक रुख महत्वपूर्ण राजनीतिक संकेत माना जा सकता है। हालांकि अभी तक शत्रुघ्न सिन्हा की ओर से कोई आधिकारिक टिप्पणी सामने नहीं आई है, इसलिए उनके बारे में लगाए जा रहे अधिकांश अनुमान केवल राजनीतिक चर्चाओं तक ही सीमित हैं।

    इस पूरे घटनाक्रम के बीच पार्टी के कुछ सांसद नेतृत्व के समर्थन में खुलकर सामने आए हैं, जबकि कुछ अन्य नेताओं ने सार्वजनिक रूप से अपनी स्थिति स्पष्ट नहीं की है। इसी श्रेणी में शत्रुघ्न सिन्हा का नाम भी लिया जा रहा है। फिलहाल उनकी चुप्पी को लेकर कई तरह के राजनीतिक अर्थ निकाले जा रहे हैं, लेकिन वास्तविक स्थिति तभी स्पष्ट होगी जब वह स्वयं इस मुद्दे पर अपनी प्रतिक्रिया देंगे।

    बंगाल की राजनीति में आने वाले दिनों में घटनाक्रम किस दिशा में आगे बढ़ता है, इस पर सभी की नजर बनी हुई है। ऐसे समय में शत्रुघ्न सिन्हा जैसे वरिष्ठ नेता का रुख न केवल पार्टी के भीतर बल्कि व्यापक राजनीतिक परिदृश्य में भी महत्वपूर्ण माना जा सकता है। फिलहाल उनकी खामोशी ही सबसे अधिक चर्चा का विषय बनी हुई है।

  • राज्यसभा की 26 सीटों पर मुकाबले से पहले तेज हुई रणनीतिक जंग, भाजपा के दांव से कांग्रेस सतर्क

    राज्यसभा की 26 सीटों पर मुकाबले से पहले तेज हुई रणनीतिक जंग, भाजपा के दांव से कांग्रेस सतर्क

    नई दिल्ली । राज्यसभा की रिक्त हो रही 26 सीटों के लिए 18 जून को होने वाले चुनाव से पहले देश की राजनीति में गतिविधियां तेज हो गई हैं। सत्तारूढ़ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन राज्यसभा में अपनी स्थिति और मजबूत करने की दिशा में सक्रिय दिखाई दे रहा है, जबकि विपक्षी दल अपने मौजूदा संख्या बल को सुरक्षित रखने और संभावित राजनीतिक चुनौतियों से निपटने की रणनीति तैयार कर रहे हैं। चुनावी प्रक्रिया शुरू होने के साथ ही कई राज्यों में राजनीतिक समीकरणों और संभावित क्रॉस-वोटिंग को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं।

    इस बार सबसे अधिक चर्चा मध्य प्रदेश और झारखंड की हो रही है, जहां भाजपा के कुछ फैसलों ने विपक्षी दलों की चिंताएं बढ़ा दी हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इन दोनों राज्यों में उम्मीदवारों के चयन और चुनावी गणित ने मुकाबले को अपेक्षा से अधिक दिलचस्प बना दिया है। भाजपा की कोशिश केवल अपनी सीटें सुरक्षित करने तक सीमित नहीं दिख रही, बल्कि वह विपक्षी दलों पर मनोवैज्ञानिक और रणनीतिक दबाव बनाने का प्रयास भी कर रही है।

    मध्य प्रदेश में भाजपा द्वारा तीसरे उम्मीदवार के रूप में महेश केवट को मैदान में उतारना राजनीतिक हलकों में चर्चा का प्रमुख विषय बन गया है। विधानसभा में भाजपा के पास स्पष्ट बहुमत है और वह दो सीटों पर सहज जीत की स्थिति में मानी जा रही है। हालांकि तीसरे उम्मीदवार की एंट्री ने विपक्ष, विशेषकर कांग्रेस, को सतर्क कर दिया है। कांग्रेस का मानना है कि यह कदम चुनावी मुकाबले को जटिल बनाने और विपक्षी खेमे में असहजता पैदा करने की रणनीति का हिस्सा हो सकता है।

    राजनीतिक हलकों में यह भी चर्चा है कि कांग्रेस अपने विधायकों को एकजुट बनाए रखने के लिए विशेष कदम उठा सकती है। संभावित क्रॉस-वोटिंग या अनुपस्थिति की आशंकाओं के बीच पार्टी नेतृत्व लगातार अपने विधायकों के संपर्क में बताया जा रहा है। इसी कारण राज्यसभा चुनाव से पहले मध्य प्रदेश की राजनीति में गतिविधियां सामान्य से अधिक तेज हो गई हैं।

    विधानसभा के वर्तमान गणित के अनुसार किसी उम्मीदवार को जीत के लिए निर्धारित संख्या में मतों की आवश्यकता होगी। ऐसे में अतिरिक्त उम्मीदवार की मौजूदगी चुनाव को केवल औपचारिक प्रक्रिया न बनाकर रणनीतिक मुकाबले में बदल सकती है। यही कारण है कि दोनों प्रमुख दल लगातार एक-दूसरे पर राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप भी कर रहे हैं।

    झारखंड में भी राजनीतिक तस्वीर कम दिलचस्प नहीं है। यहां दो सीटों के लिए तीन उम्मीदवार मैदान में हैं, जिससे मुकाबला त्रिकोणीय स्वरूप ले चुका है। झारखंड मुक्ति मोर्चा और कांग्रेस ने अपने-अपने उम्मीदवार उतारे हैं, जबकि राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन ने निर्दलीय उम्मीदवार परिमल नाथवानी को समर्थन देकर चुनावी समीकरणों को नया मोड़ दे दिया है। इस फैसले ने राज्य में राजनीतिक चर्चाओं को और तेज कर दिया है।

    झारखंड में अब नजर इस बात पर रहेगी कि उपलब्ध संख्या बल और सहयोगी दलों के समर्थन के आधार पर कौन-सा उम्मीदवार बढ़त हासिल कर पाता है। राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि यदि मतदान के दौरान कोई अप्रत्याशित घटनाक्रम सामने आता है तो परिणामों पर उसका सीधा प्रभाव पड़ सकता है।

    दूसरी ओर राजस्थान में स्थिति अपेक्षाकृत शांत दिखाई दे रही है। यहां रिक्त सीटों के मुकाबले उतने ही उम्मीदवार मैदान में होने के कारण निर्विरोध निर्वाचन की संभावना मजबूत मानी जा रही है। वहीं गुजरात में भी भाजपा के उम्मीदवारों की राह अपेक्षाकृत आसान दिखाई दे रही है और वहां बड़े मुकाबले की संभावना कम नजर आ रही है।

    राज्यसभा चुनाव भले ही प्रत्यक्ष जनमत से नहीं लड़े जाते, लेकिन इनका राजनीतिक महत्व बेहद व्यापक होता है। संसद के उच्च सदन में संख्या बल किसी भी सरकार की विधायी क्षमता को प्रभावित करता है। यही कारण है कि चुनाव से पहले प्रत्येक सीट को लेकर राजनीतिक दल पूरी ताकत और रणनीति के साथ मैदान में उतरते हैं। इस बार भी मध्य प्रदेश और झारखंड जैसे राज्यों में विकसित हो रहे समीकरण चुनावी प्रक्रिया को राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बना रहे हैं।

  • सहमति से बने विवाहपूर्व संबंध चरित्र का पैमाना नहीं, सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी ने दी महत्वपूर्ण संवैधानिक व्याख्या

    सहमति से बने विवाहपूर्व संबंध चरित्र का पैमाना नहीं, सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी ने दी महत्वपूर्ण संवैधानिक व्याख्या

    नई दिल्ली । सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि दो अविवाहित वयस्कों के बीच आपसी सहमति से स्थापित शारीरिक संबंधों को किसी व्यक्ति के चरित्र, नैतिकता या योग्यता के खिलाफ प्रमाण के रूप में नहीं देखा जा सकता। अदालत ने कहा कि बदलते सामाजिक परिवेश में ऐसे संबंधों को केवल नैतिक दृष्टिकोण के आधार पर गलत ठहराना उचित नहीं है और इन्हें किसी व्यक्ति के आचरण पर नकारात्मक निष्कर्ष निकालने का आधार नहीं बनाया जाना चाहिए।

    यह टिप्पणी उस मामले की सुनवाई के दौरान सामने आई जिसमें तेलंगाना राज्य स्तरीय पुलिस भर्ती प्रक्रिया से जुड़े एक उम्मीदवार की नियुक्ति रद्द कर दी गई थी। भर्ती बोर्ड ने एक पुराने आपराधिक मामले को आधार बनाते हुए उम्मीदवार को नियुक्ति देने से इनकार किया था। मामला एक असफल प्रेम संबंध और उसके बाद दर्ज हुए विवाद से जुड़ा हुआ था। बाद में संबंधित प्रकरण समझौते के जरिए समाप्त हो गया था, लेकिन भर्ती प्रक्रिया के दौरान इसे उम्मीदवार के खिलाफ प्रतिकूल तथ्य के रूप में देखा गया।

    न्यायालय ने कहा कि किसी भी प्रेम संबंध का विवाह में बदलना अनिवार्य नहीं होता। दो वयस्कों के बीच बने संबंध विभिन्न परिस्थितियों में समाप्त हो सकते हैं और केवल संबंध के अंत को धोखा या छल का प्रमाण नहीं माना जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी रिश्ते का विवाह तक न पहुंचना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि किसी एक पक्ष ने दूसरे के साथ गलत व्यवहार किया है।

    पीठ ने यह भी रेखांकित किया कि भारतीय कानून दो अविवाहित वयस्कों को आपसी सहमति से संबंध स्थापित करने से नहीं रोकता। ऐसे में केवल इस आधार पर किसी व्यक्ति के चरित्र पर प्रश्नचिह्न लगाना या उसे सार्वजनिक रोजगार के लिए अनुपयुक्त मानना न्यायसंगत नहीं कहा जा सकता। अदालत के अनुसार व्यक्तिगत स्वतंत्रता और वयस्कों की स्वायत्त पसंद का सम्मान संवैधानिक मूल्यों का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

    सुनवाई के दौरान न्यायालय ने यह भी कहा कि जब तक किसी व्यक्ति के खिलाफ लगाए गए आरोप न्यायिक रूप से सिद्ध नहीं हो जाते, तब तक उसे निर्दोष माना जाना चाहिए। केवल आरोप या समझौते के आधार पर किसी व्यक्ति के बारे में प्रतिकूल धारणा बनाना कानून के मूल सिद्धांतों के विपरीत है। अदालत ने माना कि आरोप सिद्ध होने और मात्र आरोप लगाए जाने के बीच महत्वपूर्ण अंतर है, जिसे नियुक्ति देने वाले संस्थानों को समझना चाहिए।

    फैसले में शादी का वादा करके दुष्कर्म से जुड़े मामलों पर भी महत्वपूर्ण टिप्पणी की गई। न्यायालय ने कहा कि यदि कोई आपराधिक मामला समझौते के माध्यम से समाप्त होता है तो इसे स्वतः अपराध स्वीकार करने के रूप में नहीं देखा जा सकता। जब तक यह साबित न हो कि समझौता किसी दबाव, धमकी या अनुचित प्रभाव के तहत कराया गया था, तब तक उसके आधार पर आरोपी के खिलाफ नकारात्मक निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा।

    अदालत ने आधुनिक सामाजिक परिस्थितियों का उल्लेख करते हुए कहा कि विवाहपूर्व संबंध आज के समय में पहले की तुलना में अधिक सामान्य होते जा रहे हैं। यदि दो वयस्क लंबे समय तक आपसी सहमति से संबंध में रहे हों, तो सामान्यतः यह माना जाएगा कि संबंध स्वेच्छा और समझदारी के साथ स्थापित किया गया था। ऐसे मामलों में नैतिक मान्यताओं के बजाय कानूनी तथ्यों और उपलब्ध साक्ष्यों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

    कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार यह फैसला व्यक्तिगत स्वतंत्रता, गरिमा और समान अवसर के अधिकार से जुड़े मामलों में भविष्य के लिए एक महत्वपूर्ण संदर्भ बन सकता है। अदालत की टिप्पणी यह संकेत देती है कि सार्वजनिक संस्थानों और नियोक्ताओं को किसी व्यक्ति का मूल्यांकन करते समय निजी जीवन से जुड़े ऐसे पहलुओं को सावधानी और संवैधानिक दृष्टिकोण से देखना होगा, न कि केवल सामाजिक धारणाओं के आधार पर।

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  • दिल्ली, यूपी और पंजाब में ईडी की ताबड़तोड़ कार्रवाई, संजीव अरोड़ा से जुड़े परिसरों की तलाशी से बढ़ी सियासी हलचल

    दिल्ली, यूपी और पंजाब में ईडी की ताबड़तोड़ कार्रवाई, संजीव अरोड़ा से जुड़े परिसरों की तलाशी से बढ़ी सियासी हलचल

    नई दिल्ली । कथित मनी लॉन्ड्रिंग मामले की जांच के तहत प्रवर्तन निदेशालय ने आम आदमी पार्टी के नेता संजीव अरोड़ा से जुड़े विभिन्न ठिकानों पर व्यापक तलाशी अभियान चलाया है। मंगलवार सुबह शुरू हुई इस कार्रवाई के दौरान पंजाब, उत्तर प्रदेश और दिल्ली-एनसीआर क्षेत्र में स्थित कुल छह परिसरों को जांच के दायरे में लिया गया। एजेंसी की यह कार्रवाई धन शोधन निवारण अधिनियम (पीएमएलए) के तहत जारी जांच का हिस्सा बताई जा रही है।

    सूत्रों के अनुसार, जांच एजेंसी की टीमों ने पंजाब के लुधियाना और जालंधर, उत्तर प्रदेश के बरेली तथा दिल्ली-एनसीआर क्षेत्र के कई स्थानों पर एक साथ सर्च ऑपरेशन शुरू किया। जिन परिसरों की तलाशी ली जा रही है उनमें आवासीय संपत्तियों के साथ-साथ व्यावसायिक प्रतिष्ठान भी शामिल हैं। अधिकारियों ने दस्तावेजों, वित्तीय रिकॉर्ड और डिजिटल डेटा की जांच की प्रक्रिया शुरू की है ताकि मामले से जुड़े तथ्यों की पुष्टि की जा सके।

    जांच का केंद्र कथित तौर पर हैम्पटन स्काई रियल्टी लिमिटेड से जुड़े वित्तीय लेन-देन बताए जा रहे हैं। एजेंसी यह पता लगाने का प्रयास कर रही है कि विभिन्न कारोबारी गतिविधियों और वित्तीय लेन-देन में किसी प्रकार की अनियमितता या अवैध धन के उपयोग के संकेत मौजूद हैं या नहीं। इसी उद्देश्य से इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों, बैंकिंग दस्तावेजों और अन्य कारोबारी अभिलेखों की भी पड़ताल की जा रही है।

    दिल्ली और नोएडा क्षेत्र में भी जांच एजेंसी की टीमें सक्रिय रहीं। यहां कई स्थानों पर दस्तावेजों और डिजिटल रिकॉर्ड की जांच की गई। हालांकि समाचार लिखे जाने तक प्रवर्तन निदेशालय की ओर से छापेमारी को लेकर कोई विस्तृत आधिकारिक बयान जारी नहीं किया गया था। ऐसे में जांच के दायरे, बरामद सामग्री अथवा आगे की कार्रवाई को लेकर एजेंसी की ओर से औपचारिक जानकारी का इंतजार किया जा रहा है।

    इस कार्रवाई के बाद राजनीतिक प्रतिक्रिया भी सामने आई है। आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल ने सोशल मीडिया के माध्यम से प्रतिक्रिया देते हुए आरोप लगाया कि पंजाब में व्यापारियों को परेशान किया जा रहा है। उन्होंने व्यापारिक समुदाय से घबराने की आवश्यकता न होने की बात कही और भरोसा दिलाया कि राज्य सरकार उनके साथ खड़ी है। इस बयान के बाद मामले को लेकर राजनीतिक बहस भी तेज हो गई है।

    संजीव अरोड़ा पहले भी केंद्रीय एजेंसियों की जांच के दायरे में आ चुके हैं। पिछले महीने उनके चंडीगढ़ स्थित आधिकारिक आवास पर लंबी तलाशी कार्रवाई के बाद उन्हें गिरफ्तार किया गया था। गिरफ्तारी के बाद उन्हें न्यायिक हिरासत में भेजा गया था। उस समय वह पंजाब सरकार में विद्युत, उद्योग और वाणिज्य विभागों की जिम्मेदारी संभाल रहे थे।

    अरोड़ा की गिरफ्तारी के बाद राज्य सरकार ने प्रशासनिक व्यवस्था को सुचारु बनाए रखने के लिए उनके विभागों का पुनर्वितरण कर अन्य मंत्रियों को जिम्मेदारी सौंप दी थी। अब ताजा छापेमारी ने एक बार फिर इस मामले को राजनीतिक और प्रशासनिक चर्चाओं के केंद्र में ला दिया है।

    फिलहाल जांच एजेंसी विभिन्न दस्तावेजों और रिकॉर्ड का विश्लेषण कर रही है। आने वाले दिनों में जांच से जुड़े नए तथ्य सामने आने की संभावना है। मामले में आगे की कार्रवाई और एजेंसी की आधिकारिक रिपोर्ट पर राजनीतिक दलों, कारोबारी जगत और आम जनता की नजर बनी हुई है।

  • TMC में बढ़ी कलह? भाजपा का दावा- 60 विधायक नाराज, ममता-अभिषेक से बना रहे दूरी..

    TMC में बढ़ी कलह? भाजपा का दावा- 60 विधायक नाराज, ममता-अभिषेक से बना रहे दूरी..


    नई दिल्ली । 
    पश्चिम बंगाल की सत्तारूढ़ पार्टी All India Trinamool Congress के भीतर कथित असंतोष को लेकर राजनीतिक घमासान तेज हो गया है। भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता Shehzad Poonawalla ने दावा किया है कि पार्टी के भीतर बड़े स्तर पर नाराजगी बढ़ रही है और कई नेता वर्तमान नेतृत्व से दूरी बना रहे हैं।

    पूनावाला ने आरोप लगाया कि करीब 60 विधायक खुद को “असली टीएमसी” बता रहे हैं और Mamata Banerjee तथा Abhishek Banerjee के नेतृत्व से असहज हैं। उन्होंने कहा कि पार्टी में परिवारवाद हावी हो गया है, जिससे संगठन के भीतर असंतोष बढ़ रहा है।

    भाजपा प्रवक्ता ने यह भी दावा किया कि कुछ सांसद भी पार्टी नेतृत्व की कार्यशैली से संतुष्ट नहीं हैं और संगठन के भीतर मतभेद लगातार गहराते जा रहे हैं। उनके अनुसार यह स्थिति तृणमूल कांग्रेस के अंदर नेतृत्व संकट की ओर इशारा करती है।

    विवाद उस समय और बढ़ गया जब सोशल मीडिया पर एक कथित सूची वायरल हुई। इस सूची में दावा किया गया कि टीएमसी के 20 सांसदों का एक समूह केंद्र की एनडीए सरकार को समर्थन देने की तैयारी कर रहा है। सूची में पार्टी के कई वरिष्ठ और नए सांसदों के नाम होने की बात कही गई।

    हालांकि टीएमसी ने इन दावों को पूरी तरह खारिज कर दिया है। पार्टी नेता Kirti Azad ने वायरल सूची को फर्जी और मनगढ़ंत बताया। उन्होंने कहा कि सूची में शामिल कई सांसदों ने ऐसे किसी दस्तावेज पर हस्ताक्षर करने से साफ इनकार किया है।

    कीर्ति आजाद ने भाजपा पर “ऑपरेशन लोटस” के जरिए पार्टी में फूट डालने की कोशिश का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि तृणमूल कांग्रेस एकजुट है और विपक्षी दलों द्वारा फैलाए जा रहे भ्रम का कोई असर नहीं पड़ेगा।

    फिलहाल भाजपा के आरोपों और टीएमसी के खंडन के बीच पश्चिम बंगाल की राजनीति में यह मुद्दा चर्चा का केंद्र बना हुआ है। पार्टी के भीतर वास्तविक स्थिति को लेकर राजनीतिक गलियारों में अटकलों का दौर जारी है।

  • TMC बगावत पर भड़कीं सागरिका घोष, बोलीं- अमित शाह का एक फोन आते ही खत्म हो जाती है नैतिकता

    TMC बगावत पर भड़कीं सागरिका घोष, बोलीं- अमित शाह का एक फोन आते ही खत्म हो जाती है नैतिकता

    नई दिल्ली । तृणमूल कांग्रेस (TMC) में जारी राजनीतिक उठापटक के बीच Sagarika Ghose ने पार्टी से बगावत करने वाले नेताओं और सांसदों पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने सोशल मीडिया पर लंबा पोस्ट लिखकर दल-बदल की राजनीति को शर्मनाक बताते हुए इसकी नैतिकता पर सवाल खड़े किए।

    सागरिका घोष ने कहा कि वह राजनीति में इसलिए आईं क्योंकि उनका मानना है कि Narendra Modi के नेतृत्व वाली बीजेपी देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था को कमजोर कर रही है। उन्होंने कहा कि संविधान और लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा के लिए विपक्ष की लड़ाई में उनका विश्वास है।

    टीएमसी सांसद ने Mamata Banerjee के नेतृत्व की प्रशंसा करते हुए कहा कि उनका भरोसा ममता बनर्जी पर पहले भी था और आगे भी रहेगा। उन्होंने ममता को साहस और मूल्य आधारित राजनीति का प्रतीक बताया।

    सागरिका घोष ने पार्टी छोड़ने वाले नेताओं पर सवाल उठाते हुए कहा कि यदि किसी की प्रतिबद्धता चुनाव परिणामों के साथ बदल जाती है, तो फिर उसकी प्रतिबद्धता कभी वास्तविक थी ही नहीं। उन्होंने कहा कि किसी नेता और पार्टी के नाम पर चुनाव जीतने के बाद मुश्किल समय में उनका साथ छोड़ देना समझ से परे है।

    अपने बयान में उन्होंने सीधे तौर पर Amit Shah पर निशाना साधते हुए कहा कि क्या एक फोन कॉल आते ही सारी नैतिकता खत्म हो जाती है? उन्होंने इसे लोकतांत्रिक राजनीति के लिए दुर्भाग्यपूर्ण बताया।

    यह बयान ऐसे समय आया है जब पश्चिम बंगाल में टीएमसी के कई नेताओं और सांसदों के अलग रुख अपनाने की खबरों ने राज्य की राजनीति को गरमा दिया है। बागी खेमे के कुछ नेताओं ने दावा किया है कि कई सांसद एनडीए को समर्थन देने के पक्ष में हैं, जिससे राज्य की राजनीतिक तस्वीर में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है।

  • अश्लील वीडियो से ब्लैकमेल कर 2.77 करोड़ की उगाही का आरोप, यूथ कांग्रेस नेता समेत दो गिरफ्तार

    अश्लील वीडियो से ब्लैकमेल कर 2.77 करोड़ की उगाही का आरोप, यूथ कांग्रेस नेता समेत दो गिरफ्तार

    नई दिल्ली । कर्नाटक के मंगलुरु में एक कारोबारी से करोड़ों रुपये की कथित जबरन वसूली के मामले ने राजनीतिक और सामाजिक हलकों में चर्चा तेज कर दी है। पुलिस ने एक व्यापारी को ब्लैकमेल कर लगभग 2.77 करोड़ रुपये वसूलने के आरोप में यूथ कांग्रेस के एक पदाधिकारी और उसके सहयोगी को गिरफ्तार किया है। जांच एजेंसियों के अनुसार मामला केवल आर्थिक उगाही तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें सुनियोजित धोखाधड़ी, मानसिक दबाव और फर्जी घटनाक्रम रचने जैसे गंभीर आरोप भी शामिल हैं।

    पुलिस के मुताबिक गिरफ्तार आरोपियों की पहचान यूथ कांग्रेस से जुड़े पदाधिकारी निजाम और उसके सहयोगी जितेश के रूप में हुई है। प्रारंभिक जांच में सामने आया है कि कथित तौर पर व्यापारी को पहले निजी और संवेदनशील सामग्री के आधार पर निशाना बनाया गया। आरोप है कि व्यापारी की अश्लील तस्वीरों और वीडियो का उपयोग कर उसे ब्लैकमेल किया गया तथा बदनामी का डर दिखाकर बड़ी रकम की मांग की गई।

    जांच अधिकारियों के अनुसार शुरुआत में व्यापारी से 35 लाख रुपये मांगे गए थे। आरोपियों ने कथित रूप से वीडियो सार्वजनिक करने और परिवार तक पहुंचाने की धमकी दी थी। सामाजिक प्रतिष्ठा और पारिवारिक छवि को नुकसान पहुंचने की आशंका के चलते व्यापारी ने रकम का भुगतान कर दिया। हालांकि इसके बाद भी पैसों की मांग बंद नहीं हुई और कथित तौर पर लगातार दबाव बनाया जाता रहा।

    मामले में नया मोड़ तब आया जब पीड़ित ने सहायता के लिए निजाम से संपर्क किया। व्यापारी को उम्मीद थी कि वह विवाद सुलझाने में मदद करेगा, लेकिन पुलिस का दावा है कि निजाम भी कथित उगाही की पूरी योजना में शामिल था। जांच एजेंसियों का कहना है कि दोनों आरोपियों ने मिलकर व्यापारी पर दबाव बनाए रखने के लिए एक और साजिश रची।

    पुलिस के अनुसार मई 2024 में व्यापारी को यह विश्वास दिलाया गया कि जितेश ने आत्महत्या कर ली है। आरोपियों ने कथित तौर पर एक फर्जी सुसाइड नोट का हवाला दिया, जिसमें व्यापारी का नाम होने की बात कही गई। इसके साथ ही मौत और अंतिम संस्कार से जुड़ी तस्वीरें दिखाकर यह साबित करने का प्रयास किया गया कि घटना वास्तविक है। व्यापारी को यह भी बताया गया कि उसके खिलाफ गंभीर आपराधिक मामला दर्ज हो सकता है।

    गिरफ्तारी और कानूनी कार्रवाई के भय से व्यापारी लगातार पैसे देता रहा। पुलिस का दावा है कि वर्ष 2024 से 2026 के बीच विभिन्न माध्यमों से कुल 2.77 करोड़ रुपये की उगाही की गई। इस दौरान पीड़ित मानसिक दबाव और सामाजिक बदनामी की आशंका में आरोपियों की मांगें पूरी करता रहा।

    मामले का खुलासा तब हुआ जब जून 2026 में व्यापारी ने जितेश को मंगलुरु में जीवित देखा। जिस व्यक्ति को वह मृत समझ रहा था, उसे सामने देखकर उसे पूरे घटनाक्रम पर संदेह हुआ। इसके बाद उसने उरवा पुलिस स्टेशन पहुंचकर विस्तृत शिकायत दर्ज कराई और पूरे मामले की जानकारी अधिकारियों को दी।

    शिकायत मिलने के बाद पुलिस ने त्वरित कार्रवाई करते हुए दोनों आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया। जांच एजेंसियां अब वित्तीय लेन-देन, कथित ब्लैकमेलिंग नेटवर्क और मामले से जुड़े अन्य संभावित पहलुओं की भी पड़ताल कर रही हैं। पुलिस यह भी जांच कर रही है कि क्या इस कथित रैकेट में अन्य लोग भी शामिल थे।

    गिरफ्तारी के बाद यह मामला राजनीतिक चर्चा का विषय भी बन गया है। सोशल मीडिया पर विभिन्न राजनीतिक कार्यक्रमों और नेताओं के साथ आरोपी की तस्वीरें साझा की जा रही हैं। हालांकि जांच एजेंसियों का कहना है कि फिलहाल पूरा ध्यान आरोपों की सत्यता, वित्तीय रिकॉर्ड और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर निष्पक्ष जांच पर केंद्रित है।

  • भारतीय जड़ों से जुड़ी नित्या रमन ने बढ़ाया भारत का गौरव, लॉस एंजिलिस मेयर चुनाव के रनऑफ में बनाई जगह

    भारतीय जड़ों से जुड़ी नित्या रमन ने बढ़ाया भारत का गौरव, लॉस एंजिलिस मेयर चुनाव के रनऑफ में बनाई जगह

    नई दिल्ली । अमेरिका के लॉस एंजिलिस शहर की राजनीति में भारतीय मूल की नेता नित्या रमन एक बार फिर चर्चा के केंद्र में हैं। मेयर पद की दौड़ में उल्लेखनीय प्रदर्शन करते हुए उन्होंने रनऑफ चुनाव में अपनी जगह सुनिश्चित कर ली है। इस उपलब्धि के बाद नवंबर में उनका मुकाबला मौजूदा मेयर करेन बैस से होगा। नित्या रमन की राजनीतिक सफलता को भारतीय मूल के नेताओं की बढ़ती वैश्विक पहचान के रूप में भी देखा जा रहा है।

    44 वर्षीय नित्या रमन का जन्म भारत के केरल राज्य में हुआ था। हालांकि उनका पारिवारिक संबंध तमिल समुदाय से है और उनके माता-पिता तमिल मूल के थे। बचपन में ही उनका परिवार अमेरिका चला गया, जहां उन्होंने अपनी शिक्षा और पेशेवर जीवन की शुरुआत की। अमेरिका में पली-बढ़ीं नित्या ने शिक्षा, सामाजिक विकास और शहरी नियोजन के क्षेत्र में अपनी अलग पहचान बनाई।

    उच्च शिक्षा के लिए उन्होंने दुनिया के प्रतिष्ठित संस्थानों हार्वर्ड यूनिवर्सिटी और मैसाच्युसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी से अध्ययन किया। इसके बाद उन्होंने अर्बन प्लानिंग के क्षेत्र में काम किया और सामाजिक मुद्दों से जुड़े अभियानों में सक्रिय भूमिका निभाई। यही अनुभव आगे चलकर उनकी राजनीतिक यात्रा की मजबूत नींव बना।

    नित्या रमन पहली बार व्यापक चर्चा में तब आईं जब उन्होंने वर्ष 2020 में लॉस एंजिलिस सिटी काउंसिल चुनाव में एक स्थापित नेता को हराकर जीत दर्ज की। इस जीत ने उन्हें शहर की राजनीति में एक नए और प्रभावशाली चेहरे के रूप में स्थापित किया। वर्ष 2024 में उन्होंने दोबारा चुनाव जीतकर अपनी लोकप्रियता और जनसमर्थन को मजबूत किया।

    मेयर पद की मौजूदा दौड़ में नित्या ने फरवरी 2026 में अंतिम समय पर चुनाव लड़ने का फैसला किया था। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार यह फैसला जोखिम भरा माना जा रहा था, क्योंकि उनके सामने मौजूदा मेयर करेन बैस जैसी अनुभवी नेता थीं। इसके बावजूद नित्या ने अपने अभियान को आवास, शहरी विकास, बेघर लोगों की समस्या और सार्वजनिक सेवाओं जैसे मुद्दों पर केंद्रित रखा, जिससे उन्हें व्यापक समर्थन मिला।

    उनकी राजनीतिक पहचान एक प्रगतिशील और सुधारवादी नेता के रूप में बन चुकी है। वे लंबे समय से आवास संकट, सामाजिक असमानता और शहरी विकास से जुड़े मुद्दों पर सक्रिय रही हैं। लॉस एंजिलिस में बेघर लोगों की बढ़ती संख्या और आवास की उपलब्धता को लेकर उनके विचारों को बड़ी संख्या में मतदाताओं का समर्थन मिला है।

    नित्या रमन का निजी जीवन भी भारतीय मूल से गहराई से जुड़ा हुआ है। उनके पति वली चंद्रशेखरन भारतीय मूल के टीवी निर्माता और पटकथा लेखक हैं। दोनों के जुड़वां बच्चे हैं और परिवार लंबे समय से अमेरिका में रह रहा है। भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों और वैश्विक दृष्टिकोण के मेल ने उनकी सार्वजनिक छवि को और मजबूत बनाया है।

    अब नवंबर में होने वाला चुनाव लॉस एंजिलिस की राजनीति के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। शहर में बेघर लोगों की समस्या, आर्थिक चुनौतियां, सार्वजनिक सुरक्षा, हॉलीवुड उद्योग के पुनरुद्धार और आपदा प्रबंधन जैसे मुद्दे चुनावी बहस के केंद्र में रहेंगे। नित्या रमन इन विषयों पर लगातार मुखर रही हैं और खुद को बदलाव तथा नई सोच का प्रतिनिधि चेहरा बता रही हैं।

    राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि रनऑफ चुनाव में उनकी मौजूदगी केवल एक स्थानीय राजनीतिक घटना नहीं है, बल्कि यह अमेरिका की राजनीति में भारतीय मूल के नेताओं की बढ़ती भागीदारी और प्रभाव का भी संकेत है। आने वाले महीनों में उनकी चुनावी रणनीति और जनसमर्थन लॉस एंजिलिस की राजनीति की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।