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  • मोहनीश बहल की पत्नी आरती की सादगी के आगे फीकी पड़ती हैं कई हसीनाएं, देखें खास झलक

    मोहनीश बहल की पत्नी आरती की सादगी के आगे फीकी पड़ती हैं कई हसीनाएं, देखें खास झलक


    नई दिल्ली।हिंदी सिनेमा की दिग्गज अदाकारा नूतन आज भी अपनी बेहतरीन अभिनय क्षमता और दमदार फिल्मों के लिए याद की जाती हैं। अपने दौर में उन्होंने जिस तरह से सादगी और गहराई भरे किरदार निभाए, वह आज भी मिसाल माने जाते हैं। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि उनके परिवार में एक ऐसी शख्सियत भी शामिल हैं, जो अपनी खूबसूरती और सादगी के कारण अक्सर चर्चा में आ जाती हैं।

    नूतन की बहू आरती बहल एक समय में फिल्म और टेलीविजन इंडस्ट्री का हिस्सा रह चुकी हैं, हालांकि बाद में उन्होंने ग्लैमर की दुनिया से दूरी बना ली। शादी के बाद उन्होंने अपना पूरा ध्यान परिवार पर केंद्रित कर लिया और सार्वजनिक जीवन से काफी हद तक दूर हो गईं। इसके बावजूद उनकी मौजूदगी और पुरानी तस्वीरें समय-समय पर सोशल मीडिया पर वायरल होती रहती हैं, जिनमें उनकी सादगी और आकर्षक व्यक्तित्व की खूब सराहना होती है।

    हाल ही में आरती बहल और उनके पति मोहनीश बहल की शादी की सालगिरह की कुछ झलकियां सामने आईं, जिसमें दोनों के बीच गहरा प्रेम और आपसी समझ साफ दिखाई देती है। इस खास मौके पर शेयर की गई तस्वीरों ने एक बार फिर लोगों का ध्यान उनकी ओर खींच लिया और प्रशंसकों ने उन्हें बेहद खूबसूरत और ग्रेसफुल बताया।

    आरती बहल और मोहनीश बहल की शादी 1990 के दशक की शुरुआत में हुई थी और इस जोड़े की दो बेटियां हैं, जिनमें प्रनूतन बहल भी शामिल हैं, जो खुद अभिनय की दुनिया में कदम रख चुकी हैं। परिवार में सिनेमा की मजबूत विरासत होने के बावजूद आरती ने हमेशा खुद को लाइमलाइट से दूर रखा और एक सादा जीवन जीना पसंद किया।

    नूतन, जो अपने समय की सबसे प्रतिष्ठित अभिनेत्रियों में गिनी जाती थीं, एक प्रतिष्ठित फिल्मी परिवार से ताल्लुक रखती थीं। उनके परिवार में कला और अभिनय की परंपरा गहराई से जुड़ी रही है। इसी विरासत का हिस्सा आज भी उनका परिवार किसी न किसी रूप में आगे बढ़ा रहा है।

    आज आरती बहल भले ही फिल्मों में सक्रिय नहीं हैं, लेकिन उनकी शालीनता और सहज व्यक्तित्व उन्हें अक्सर चर्चा में बनाए रखता है। सोशल मीडिया पर जब भी उनकी तस्वीरें सामने आती हैं, लोग उनकी तुलना पुरानी दौर की अभिनेत्रियों की ग्रेस से करते हुए उनकी सराहना करते हैं।

  • नीति आयोग को मिला बड़ा महत्व, पीएम मोदी ने बताया देश की नीति-निर्माण व्यवस्था का मजबूत स्तंभ

    नीति आयोग को मिला बड़ा महत्व, पीएम मोदी ने बताया देश की नीति-निर्माण व्यवस्था का मजबूत स्तंभ


    नई दिल्ली। देश की विकास और नीति-निर्माण प्रणाली में नीति आयोग की भूमिका लगातार महत्वपूर्ण होती जा रही है। केंद्र सरकार के अनुसार यह संस्था न केवल नीतियों को आकार देने का काम कर रही है, बल्कि देश के अलग-अलग क्षेत्रों में विकास को गति देने में भी अहम योगदान निभा रही है। इसी संदर्भ में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नीति आयोग को भारत की नीति-निर्माण व्यवस्था का एक मजबूत स्तंभ बताया है।

    प्रधानमंत्री ने कहा कि यह संस्था सहकारी संघवाद को मजबूत करने, प्रशासनिक सुधारों को आगे बढ़ाने और नागरिकों के जीवन को आसान बनाने यानी ‘ईज ऑफ लिविंग’ को बेहतर करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि नीति आयोग आज एक ऐसे मंच के रूप में उभर चुका है जहां नवाचार, दीर्घकालिक सोच और प्रभावी रणनीति पर काम किया जाता है।

    हाल ही में सरकार द्वारा नीति आयोग का पुनर्गठन किया गया, जिसके बाद इसके नए नेतृत्व को जिम्मेदारियां सौंपी गईं। प्रधानमंत्री ने नए उपाध्यक्ष और अन्य पूर्णकालिक सदस्यों को शुभकामनाएं देते हुए उम्मीद जताई कि वे अपने कार्यकाल में प्रभावशाली और परिणाम देने वाला कार्य करेंगे। उन्होंने कहा कि यह टीम देश की नीति निर्माण प्रक्रिया को और अधिक मजबूत बनाने में योगदान देगी।

    प्रधानमंत्री ने यह भी बताया कि नीति आयोग का उद्देश्य केवल योजनाएं बनाना नहीं है, बल्कि उन्हें जमीन पर प्रभावी ढंग से लागू करने में भी सहायता करना है। यह संस्था केंद्र और राज्यों के बीच समन्वय को मजबूत बनाकर विकास को संतुलित दिशा देने का कार्य कर रही है।

    इस अवसर पर उन्होंने विशेष रूप से नए उपाध्यक्ष के अनुभव की सराहना की। अर्थशास्त्र और सार्वजनिक नीति के क्षेत्र में उनके लंबे अनुभव को देखते हुए प्रधानमंत्री ने विश्वास जताया कि उनके मार्गदर्शन में नीति आयोग की भूमिका और अधिक प्रभावी होगी। सरकार का मानना है कि ऐसे अनुभवी विशेषज्ञों की भागीदारी से नीतियों की गुणवत्ता और कार्यान्वयन क्षमता दोनों में सुधार होगा।

    नीति आयोग देश के दीर्घकालिक विकास लक्ष्यों को ध्यान में रखते हुए काम करता है। यह केवल आर्थिक नीतियों तक सीमित नहीं है, बल्कि सामाजिक, तकनीकी और प्रशासनिक सुधारों को भी अपनी कार्ययोजना में शामिल करता है। इसका उद्देश्य भारत को एक समग्र विकास मॉडल की ओर ले जाना है, जहां हर क्षेत्र को समान अवसर मिल सके।

    वर्तमान समय में जब भारत तेजी से आर्थिक और सामाजिक बदलावों से गुजर रहा है, नीति आयोग की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो गई है। यह संस्था सरकार को नीतिगत सुझाव देने के साथ-साथ विभिन्न राज्यों के विकास मॉडल का विश्लेषण कर बेहतर समाधान प्रस्तुत करने का काम करती है।

    प्रधानमंत्री के इस बयान से यह स्पष्ट होता है कि सरकार नीति आयोग को भविष्य की विकास रणनीति के केंद्र में देख रही है। आने वाले समय में यह संस्था देश के विकास एजेंडे को दिशा देने में और भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली है, जिससे भारत के ‘विकसित राष्ट्र’ बनने के लक्ष्य को गति मिलेगी।

  • नए उपाध्यक्ष के तौर पर सक्रिय हुए अशोक लाहिड़ी, पीएम से मुलाकात में विकास एजेंडे पर चर्चा..

    नए उपाध्यक्ष के तौर पर सक्रिय हुए अशोक लाहिड़ी, पीएम से मुलाकात में विकास एजेंडे पर चर्चा..

    नई दिल्ली। नीति आयोग के नए उपाध्यक्ष के रूप में जिम्मेदारी संभालने के बाद वरिष्ठ अर्थशास्त्री अशोक लाहिड़ी ने राजधानी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात की। यह मुलाकात पदभार ग्रहण करने के तुरंत बाद हुई एक महत्वपूर्ण औपचारिक बैठक मानी जा रही है, जिसमें देश की आर्थिक नीतियों और विकास योजनाओं से जुड़े व्यापक मुद्दों पर विचार-विमर्श की संभावना रही।

    अशोक लाहिड़ी लंबे समय से भारत की आर्थिक नीति निर्माण प्रक्रिया से जुड़े रहे हैं और उन्होंने कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय संस्थानों में महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभाई हैं। उनके अनुभव को देखते हुए नीति आयोग में उनकी नियुक्ति को सरकार के आर्थिक दृष्टिकोण को और मजबूत करने की दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा है।

    इस नई जिम्मेदारी के साथ नीति आयोग में कार्यशैली और प्राथमिकताओं में भी बदलाव की उम्मीद की जा रही है। सरकार का फोकस इस समय विकास, निवेश और आर्थिक सुधारों को गति देने पर है, ऐसे में लाहिड़ी की भूमिका को बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    लाहिड़ी का करियर चार दशकों से अधिक का रहा है, जिसमें उन्होंने मुख्य आर्थिक सलाहकार और विभिन्न वैश्विक वित्तीय संस्थानों के साथ काम किया है। उनकी विशेषज्ञता खास तौर पर वित्तीय नीति और मैक्रो-इकोनॉमिक प्लानिंग में मानी जाती है।

    उनकी नियुक्ति ऐसे समय में हुई है जब देश तेजी से बदलते वैश्विक आर्थिक माहौल के बीच अपनी विकास रणनीतियों को मजबूत करने पर ध्यान दे रहा है। इस संदर्भ में नीति आयोग में उनकी भूमिका नीति निर्माण को और अधिक व्यावहारिक और डेटा आधारित बनाने में मदद कर सकती है।

    प्रधानमंत्री से उनकी यह मुलाकात केवल औपचारिकता नहीं मानी जा रही, बल्कि इसे आने वाले समय की नीति दिशा और प्राथमिकताओं के संकेत के रूप में भी देखा जा रहा है।

  • AAP में बगावत पर सियासी संग्राम: 7 सांसदों के BJP में जाने पर बोले संजय सिंह, यह असंवैधानिक, सदस्यता रद्द हो

    AAP में बगावत पर सियासी संग्राम: 7 सांसदों के BJP में जाने पर बोले संजय सिंह, यह असंवैधानिक, सदस्यता रद्द हो


    नई दिल्ली। आम आदमी पार्टी के कई राज्यसभा सांसदों के भारतीय जनता पार्टी में शामिल होने की खबर के बाद सियासी हलचल तेज हो गई है। इस घटनाक्रम पर पार्टी के वरिष्ठ नेता और सांसद संजय सिंह ने कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए इसे अवैध और असंवैधानिक करार दिया है।  संजय सिंह ने कहा कि राघव चड्ढा समेत सात राज्यसभा सांसदों का यह कदम संसदीय नियमों के खिलाफ है। उन्होंने स्पष्ट किया कि वह राज्यसभा के सभापति और उपराष्ट्रपति को पत्र लिखकर इन सांसदों की सदस्यता समाप्त करने की मांग करेंगे।

    पार्टी के प्रति जिम्मेदारी पर उठाए सवाल

    संजय सिंह ने पार्टी छोड़ने वाले नेताओं पर निशाना साधते हुए कहा कि जिन्हें पार्टी ने अवसर और पहचान दी, उनसे अपेक्षा थी कि वे जनता और संगठन के हित में काम करेंगे। उन्होंने खासतौर पर पंजाब के संदर्भ में कहा कि इन नेताओं को राज्य और पार्टी के विस्तार में योगदान देना चाहिए था।

    सोशल मीडिया पर भी उठाया मुद्दा

    संजय सिंह ने यह भी दावा किया कि पार्टी के सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स इंस्टाग्राम और फेसबुक को निलंबित कर दिया गया है। उन्होंने समर्थकों से अपील की कि वे व्हाट्सऐप और अन्य माध्यमों के जरिए पार्टी का संदेश ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाएं। इस पूरे घटनाक्रम के बाद अब राजनीतिक नजरें इस बात पर टिकी हैं कि राज्यसभा में इस मुद्दे पर क्या रुख अपनाया जाता है और क्या वाकई इन सांसदों की सदस्यता पर कोई कार्रवाई होती है। फिलहाल इतना तय है कि यह मामला आने वाले दिनों में और ज्यादा गरमाने वाला है।
  • आईओएल में नौकरी का बड़ा मौका, इंजीनियर और मैनेजमेंट पदों पर 6 वैकेंसी, आवेदन 15 मई तक

    आईओएल में नौकरी का बड़ा मौका, इंजीनियर और मैनेजमेंट पदों पर 6 वैकेंसी, आवेदन 15 मई तक

    नई दिल्ली। देहरादून स्थित इंडिया ऑप्टेल लिमिटेड ने युवाओं के लिए रोजगार का एक नया अवसर जारी किया है। कंपनी ने प्रोजेक्ट इंजीनियर सहित कुल 6 पदों पर भर्ती की घोषणा की है, जो अनुबंध आधारित होगी। इस भर्ती में तकनीकी और प्रबंधन दोनों क्षेत्रों के उम्मीदवारों के लिए अवसर शामिल हैं।

    जारी की गई भर्ती में प्रोजेक्ट इंजीनियर, सहायक प्रोजेक्ट मैनेजर और सहायक प्रोजेक्ट इंजीनियर जैसे पद शामिल हैं। प्रत्येक पद पर दो-दो रिक्तियां निर्धारित की गई हैं। इन पदों के लिए आवेदन प्रक्रिया ऑफलाइन माध्यम से शुरू हो चुकी है और अंतिम तिथि 15 मई तय की गई है।इन पदों के लिए शैक्षणिक योग्यता के रूप में उम्मीदवारों के पास संबंधित क्षेत्र में इंजीनियरिंग, फिजिक्स या मैनेजमेंट से जुड़ी डिग्री होना आवश्यक है। इसके साथ ही न्यूनतम 60 प्रतिशत अंकों के साथ बीई, बीटेक या पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा अनिवार्य रखा गया है।

    उम्मीदवारों की आयु सीमा पद के अनुसार निर्धारित की गई है, जिसमें न्यूनतम आयु 18 वर्ष और अधिकतम आयु 30 से 40 वर्ष के बीच हो सकती है। आरक्षित श्रेणियों के उम्मीदवारों को नियमों के अनुसार आयु में छूट दी जाएगी।चयन प्रक्रिया कई चरणों में पूरी की जाएगी। इसमें पहले आवेदन की स्क्रीनिंग की जाएगी, उसके बाद शॉर्टलिस्ट किए गए उम्मीदवारों का इंटरव्यू लिया जाएगा। अंतिम चयन मेरिट सूची और दस्तावेज सत्यापन के आधार पर किया जाएगा। चयनित उम्मीदवारों को पद के अनुसार 40,000 रुपये से लेकर 1,80,000 रुपये प्रति माह तक का वेतन दिया जाएगा।

    आवेदन करने के लिए उम्मीदवारों को निर्धारित फॉर्म डाउनलोड कर उसे सावधानीपूर्वक भरना होगा। इसके बाद आवश्यक दस्तावेजों को संलग्न कर फॉर्म को तय पते पर डाक के माध्यम से भेजना होगा। उम्मीदवारों को सलाह दी जाती है कि आवेदन की एक प्रति भविष्य के लिए सुरक्षित रखें।

    यह भर्ती उन उम्मीदवारों के लिए एक महत्वपूर्ण अवसर है जो तकनीकी और प्रबंधन क्षेत्र में करियर बनाना चाहते हैं और एक प्रतिष्ठित संगठन के साथ जुड़कर अनुभव हासिल करना चाहते हैं।

  • दिल्ली कैपिटल्स ने आईपीएल में बनाया अनोखा रिकॉर्ड, टॉस जीतने की लगातार 9वीं सफलता ने खींचा ध्यान

    दिल्ली कैपिटल्स ने आईपीएल में बनाया अनोखा रिकॉर्ड, टॉस जीतने की लगातार 9वीं सफलता ने खींचा ध्यान


    नई दिल्ली।
    इंडियन प्रीमियर लीग 2026 का सीजन जैसे-जैसे आगे बढ़ रहा है, वैसे-वैसे कई दिलचस्प आंकड़े और रिकॉर्ड सामने आ रहे हैं। इसी बीच दिल्ली कैपिटल्स ने एक ऐसा अनोखा रिकॉर्ड बना दिया है, जिसने क्रिकेट फैंस का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। टीम ने लगातार नौ मैचों में टॉस जीतकर आईपीएल इतिहास में एक खास उपलब्धि अपने नाम की है।

    शनिवार को खेले गए मुकाबले में दिल्ली कैपिटल्स ने एक बार फिर टॉस जीत लिया। यह मैच पंजाब किंग्स के खिलाफ खेला गया, जिसमें दिल्ली ने टॉस जीतकर पहले बल्लेबाजी करने का फैसला किया। इस जीत के साथ ही टीम का लगातार टॉस जीतने का सिलसिला नौ मैचों तक पहुंच गया।

    इस समय दिल्ली कैपिटल्स की कप्तानी अक्षर पटेल के हाथों में है। उनकी नेतृत्व क्षमता में टीम ने इस सीजन लगातार सात टॉस जीते हैं, जबकि पिछले सीजन के अंतिम दो मैचों में भी टीम ने टॉस अपने नाम किया था। इस तरह यह रिकॉर्ड एक लंबी श्रृंखला का हिस्सा बन गया है, जो अब आईपीएल इतिहास में दर्ज हो चुका है।

    इस उपलब्धि के साथ दिल्ली कैपिटल्स ने आईपीएल की दो बड़ी टीमों के रिकॉर्ड की बराबरी कर ली है। इससे पहले सनराइजर्स हैदराबाद और चेन्नई सुपर किंग्स भी लगातार नौ-नौ मैचों में टॉस जीतने का कारनामा कर चुकी हैं। अब दिल्ली भी इसी सूची में शामिल होकर शीर्ष स्तर पर पहुंच गई है।

    क्रिकेट में टॉस जीतना किसी भी टीम के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जाता है, क्योंकि इससे मैच की शुरुआत की दिशा तय होती है। हालांकि टॉस जीतना मैच के परिणाम की गारंटी नहीं होता, लेकिन यह टीम को परिस्थितियों के अनुसार रणनीति बनाने में मदद जरूर करता है।

    वर्तमान सीजन की बात करें तो दिल्ली कैपिटल्स का प्रदर्शन अभी तक मिला-जुला रहा है। टीम ने छह में से तीन मुकाबलों में जीत हासिल की है और अंक तालिका में छठे स्थान पर बनी हुई है। दूसरी ओर पंजाब किंग्स शानदार फॉर्म में नजर आ रही है और छह में से पांच मैच जीतकर शीर्ष स्थान पर काबिज है।

    शनिवार के मुकाबले में दोनों टीमों ने अपनी प्लेइंग इलेवन में कोई बदलाव नहीं किया, जिससे यह साफ था कि दोनों टीमें अपने मौजूदा संयोजन पर भरोसा जता रही हैं। दिल्ली जहां अपनी लय पकड़ने की कोशिश कर रही है, वहीं पंजाब लगातार अपनी जीत की लय को बनाए रखना चाहती है।

    दिल्ली कैपिटल्स का यह लगातार टॉस जीतने का रिकॉर्ड भले ही किस्मत से जुड़ा संयोग माना जाए, लेकिन यह टीम के लिए चर्चा का बड़ा विषय जरूर बन गया है। अब देखना दिलचस्प होगा कि क्या यह ‘टॉस की किस्मत’ टीम को आगे आने वाले मैचों में जीत की ओर भी ले जा पाती है या नहीं।

  • निवेशकों की बिकवाली भारी पड़ी, एक हफ्ते में सोना 500 और चांदी 7,000 रुपये से ज्यादा कमजोर

    निवेशकों की बिकवाली भारी पड़ी, एक हफ्ते में सोना 500 और चांदी 7,000 रुपये से ज्यादा कमजोर


    नई दिल्ली।इस सप्ताह कीमती धातुओं के बाजार में कमजोरी का माहौल देखने को मिला, जहां सोना और चांदी दोनों ही मुनाफावसूली के दबाव में आ गए। शुरुआती मजबूती के बाद निवेशकों ने ऊंचे स्तरों पर अपनी होल्डिंग बेचनी शुरू कर दी, जिससे कीमतों में गिरावट दर्ज की गई। हालांकि सप्ताह के अंतिम दिन हल्की रिकवरी देखने को मिली, लेकिन पूरे सप्ताह का रुझान गिरावट की ओर ही रहा।

    सोने की कीमतों में साप्ताहिक आधार पर करीब 0.34 प्रतिशत की गिरावट देखी गई। हफ्ते के अंत में इसमें मामूली सुधार हुआ और कीमत करीब 1,52,799 रुपये प्रति 10 ग्राम के आसपास पहुंच गई। दिन के दौरान सोने ने 1,53,164 रुपये का उच्च स्तर और 1,50,750 रुपये का निचला स्तर छुआ, जो बाजार में जारी अस्थिरता को दर्शाता है। पूरे सप्ताह में सोना करीब 523 रुपये सस्ता हो गया, जो यह बताता है कि निवेशक सतर्क रुख अपनाए हुए हैं।

    चांदी के मामले में गिरावट और ज्यादा गहरी रही। एक हफ्ते के दौरान इसकी कीमत में 7,000 रुपये से अधिक की कमी दर्ज की गई। हालांकि अंतिम कारोबारी दिन इसमें तेजी आई और यह करीब 2,44,321 रुपये प्रति किलोग्राम तक पहुंच गई। दिनभर के कारोबार में चांदी ने 2,45,555 रुपये का उच्च स्तर और 2,38,291 रुपये का निचला स्तर छुआ, जिससे इसके दामों में तेज उतार-चढ़ाव का अंदाजा लगाया जा सकता है।

    बाजार में इस गिरावट की मुख्य वजह मुनाफावसूली रही। जब कीमतें लगातार बढ़ती हैं, तो निवेशक लाभ सुरक्षित करने के लिए बिकवाली करते हैं, जिससे कीमतों पर दबाव बनता है। इसके अलावा वैश्विक स्तर पर चल रहे घटनाक्रमों ने भी बाजार की दिशा तय करने में भूमिका निभाई। अंतरराष्ट्रीय तनाव के बीच कूटनीतिक हल निकलने की उम्मीदों ने सुरक्षित निवेश की मांग को थोड़ा कमजोर किया, जिससे सोने और चांदी पर दबाव पड़ा।

    हालांकि बॉन्ड यील्ड में गिरावट ने सोने को कुछ समर्थन दिया, क्योंकि इससे बिना ब्याज वाली संपत्तियों की आकर्षण क्षमता बढ़ती है। इसके बावजूद बाजार में मजबूत तेजी नहीं आ सकी, क्योंकि निवेशक अभी भी अनिश्चित परिस्थितियों को लेकर सतर्क हैं। निचले स्तरों पर खरीदारी जरूर देखने को मिली, लेकिन यह तेजी को स्थायी रूप नहीं दे सकी।

    विशेषज्ञों का मानना है कि फिलहाल बाजार संतुलन की स्थिति में है, जहां न तो तेज गिरावट की आशंका है और न ही मजबूत तेजी के स्पष्ट संकेत। आने वाले समय में अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रम, डॉलर की चाल और आर्थिक नीतियां कीमती धातुओं की दिशा तय करेंगी। ऐसे में निवेशकों को सावधानी के साथ रणनीति बनानी होगी, क्योंकि बाजार में अस्थिरता आगे भी जारी रह सकती है।

  • AAP को एक और झटका: स्वाति मालीवाल BJP में शामिल, मोदी-शाह की तारीफ कर केजरीवाल पर जमकर किए हमले

    AAP को एक और झटका: स्वाति मालीवाल BJP में शामिल, मोदी-शाह की तारीफ कर केजरीवाल पर जमकर किए हमले


    नई दिल्ली। आम आदमी पार्टी को एक और बड़ा झटका देते हुए राज्यसभा सांसद स्वाति मालीवाल ने पार्टी छोड़कर भारतीय जनता पार्टी का दामन थाम लिया है। करीब दो दशक पुराने रिश्ते को खत्म करते हुए उन्होंने इस फैसले के पीछे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व पर भरोसा जताया।

    यह घटनाक्रम ऐसे समय में हुआ है जब एक दिन पहले ही राघव चड्ढा, संदीप पाठक और अशोक मित्तल भी भाजपा में शामिल हो चुके हैं। उन्होंने पहले ही संकेत दिए थे कि पार्टी के कुछ और सांसद भी जल्द पाला बदल सकते हैं, जिस पर अब मालीवाल के फैसले से मुहर लग गई है। भाजपा में शामिल होने के बाद स्वाति मालीवाल ने कहा कि उन्होंने यह कदम किसी दबाव में नहीं, बल्कि अपनी राजनीतिक सोच और विश्वास के आधार पर उठाया है। उन्होंने लोगों से अपील की कि जो लोग सकारात्मक और रचनात्मक राजनीति करना चाहते हैं, वे भाजपा से जुड़ें।

    केजरीवाल पर तीखे आरोप

    इस दौरान स्वाति मालीवाल ने अरविंद केजरीवाल पर गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने कहा कि वह 2006 से उनके साथ थीं और हर आंदोलन में सहयोग किया, लेकिन उन्हें ही अपने घर में प्रताड़ना का सामना करना पड़ा। मालीवाल ने आरोप लगाया कि जब उन्होंने आवाज उठाई तो उन पर दबाव बनाया गया और एफआईआर वापस लेने के लिए धमकाया गया। उन्होंने केजरीवाल को “महिला विरोधी” बताते हुए यह भी कहा कि पिछले दो वर्षों में उन्हें संसद में बोलने का अवसर तक नहीं दिया गया।

    मोदी-शाह की तारीफ

    स्वाति मालीवाल ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह की नीतियों और फैसलों की सराहना की। उन्होंने कहा कि देश के विकास और बड़े निर्णयों में इनका नेतृत्व महत्वपूर्ण रहा है। कुल मिलाकर, AAP से लगातार हो रहे दलबदल ने दिल्ली की राजनीति में हलचल बढ़ा दी है और आने वाले समय में इसके और असर देखने को मिल सकते हैं।

  • रामायण के भरत बने संजय जोग की जिंदगी किसी फिल्म से कम नहीं, लेकिन अंत ने सबको रुला दिया

    रामायण के भरत बने संजय जोग की जिंदगी किसी फिल्म से कम नहीं, लेकिन अंत ने सबको रुला दिया


    नई दिल्ली। भारतीय टेलीविजन के इतिहास में कुछ ऐसे किरदार हैं, जो केवल अभिनय तक सीमित नहीं रहते, बल्कि दर्शकों की भावनाओं का हिस्सा बन जाते हैं। पौराणिक धारावाहिक ‘रामायण’ में भरत का किरदार ऐसा ही एक उदाहरण है, जिसे निभाने वाले अभिनेता संजय जोग को आज भी सम्मान और श्रद्धा के साथ याद किया जाता है। उनकी जिंदगी संघर्ष, मेहनत और अचानक आए एक दुखद अंत की कहानी है।

    संजय जोग का शुरुआती जीवन बेहद साधारण था। वह एक किसान परिवार से जुड़े थे और खुद भी खेती का काम करते थे। अभिनय की दुनिया से उनका दूर-दूर तक कोई सीधा संबंध नहीं था, लेकिन उनके भीतर कुछ अलग करने की चाह जरूर थी। यही चाह उन्हें शहर की ओर खींच लाई, जहां उन्होंने अभिनय सीखने का फैसला किया।

    उन्होंने अभिनय की विधिवत ट्रेनिंग ली और फिल्मों में अपने करियर की शुरुआत की। हालांकि उनकी पहली फिल्म सफल नहीं हो पाई, जिससे उन्हें गहरा झटका लगा। इस असफलता के बाद उन्होंने कुछ समय के लिए अभिनय से दूरी बना ली और अपने गांव लौटकर फिर से खेती में लग गए। यह दौर उनके जीवन का सबसे चुनौतीपूर्ण समय माना जाता है।

    लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। कुछ समय बाद उन्होंने एक बार फिर कोशिश करने का निर्णय लिया और वापस मुंबई पहुंचे। इस बार उनकी मेहनत रंग लाई और उन्हें फिल्मों में काम मिलने लगा। धीरे-धीरे उनका आत्मविश्वास लौटने लगा और उन्होंने अपने अभिनय से लोगों का ध्यान आकर्षित किया।

    इसी दौरान उन्हें एक बड़ा अवसर मिला, जिसने उनकी किस्मत बदल दी। उन्हें एक पौराणिक धारावाहिक में भरत का किरदार निभाने के लिए चुना गया। इस भूमिका में उन्होंने जिस भावनात्मक गहराई और सच्चाई के साथ अभिनय किया, उसने उन्हें घर-घर में पहचान दिला दी। उनके चेहरे के भाव और संवाद अदायगी ने दर्शकों को गहराई से प्रभावित किया।

    भरत के रूप में उनका किरदार त्याग, प्रेम और आदर्शों का प्रतीक बन गया। यह भूमिका उनके करियर की सबसे बड़ी पहचान बन गई और आज भी उसी रूप में उन्हें याद किया जाता है। इसके बाद उन्होंने फिल्मों में भी काम किया और अपने अभिनय का प्रभाव जारी रखा।

    हालांकि उनकी जिंदगी में सफलता के साथ-साथ चुनौतियां भी बनी रहीं। उनका जीवन अचानक एक ऐसे मोड़ पर खत्म हुआ, जिसकी किसी ने कल्पना नहीं की थी। महज 40 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया, जिससे पूरी इंडस्ट्री और उनके प्रशंसकों को गहरा सदमा पहुंचा।

    उनकी असमय मृत्यु ने यह एहसास कराया कि जिंदगी कितनी अनिश्चित हो सकती है। एक ऐसा कलाकार, जिसने अपनी मेहनत से पहचान बनाई, वह इतनी जल्दी दुनिया को अलविदा कह जाएगा, यह किसी के लिए भी स्वीकार करना आसान नहीं था।

    आज भी जब ‘रामायण’ की चर्चा होती है, तो संजय जोग का नाम भरत के रूप में सबसे पहले लिया जाता है। उनका अभिनय केवल एक किरदार नहीं, बल्कि एक भावना बन चुका है, जो समय के साथ और भी मजबूत होती जा रही है।

    संजय जोग की कहानी यह सिखाती है कि जीवन में संघर्ष चाहे कितना भी बड़ा क्यों न हो, मेहनत और लगन से सफलता पाई जा सकती है। लेकिन साथ ही यह भी याद दिलाती है कि जीवन अनमोल है और हर पल को पूरी तरह जीना चाहिए।

  • नेपाल में नई सत्ता पर सवाल, छात्र राजनीति पर प्रतिबंध और सीमा शुल्क, नीति से जनता में असंतोष

    नेपाल में नई सत्ता पर सवाल, छात्र राजनीति पर प्रतिबंध और सीमा शुल्क, नीति से जनता में असंतोष


    नई दिल्ली । नेपाल की राजनीति एक बार फिर उथल-पुथल के दौर में पहुंचती दिखाई दे रही है जहां नई सरकार बनने के बाद ही असंतोष और विरोध के स्वर तेज हो गए हैं। राजधानी काठमांडू में राजनीतिक माहौल लगातार गरमाता जा रहा है और सरकार के हालिया फैसलों ने जनता के बीच बहस और नाराजगी दोनों बढ़ा दी हैं।

    केपी ओली सरकार के पतन के बाद हुए संसदीय चुनावों में युवाओं के समर्थन से राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी के नेतृत्व में नई सरकार बनी थी। इस सरकार का नेतृत्व बालेंद्र शाह कर रहे हैं जिन्हें जनरेशन-जेड आंदोलन के समर्थन से सत्ता मिली थी। शुरुआत में इसे बदलाव की बड़ी उम्मीद के रूप में देखा गया था लेकिन कुछ ही समय में स्थिति बदलती नजर आने लगी है।

    नई सरकार के गठन के बाद से ही राजनीतिक अस्थिरता के संकेत मिलने लगे जब दो मंत्रियों के इस्तीफे ने प्रशासनिक स्थिरता पर सवाल खड़े कर दिए। गृह मंत्री पर मनी लॉन्ड्रिंग के आरोप और श्रमिक मंत्री पर अनुशासनहीनता के कारण सरकार को आलोचना का सामना करना पड़ा।

    इस बीच सितंबर 2025 में हुए जनरेशन-जेड आंदोलन ने नेपाल की राजनीति को पूरी तरह बदल दिया था। यह आंदोलन भ्रष्टाचार महंगाई बेरोजगारी और सोशल मीडिया प्रतिबंध जैसे मुद्दों के खिलाफ शुरू हुआ था जो बाद में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन में बदल गया। इसी आंदोलन के बाद सत्ता परिवर्तन हुआ था।

    लेकिन अब वही युवा वर्ग सरकार के कुछ फैसलों से असंतुष्ट नजर आ रहा है। हाल ही में नेपाल सरकार ने नेपाल और भारत की सीमा पर कस्टम ड्यूटी लगाने का निर्णय लिया है जिसके तहत 100 नेपाली रुपये से अधिक मूल्य के सामान पर शुल्क लागू किया गया है। इस फैसले का सीमावर्ती इलाकों में व्यापक विरोध हो रहा है क्योंकि वहां के लोग रोजमर्रा की जरूरतों के लिए भारतीय बाजारों पर निर्भर हैं।

    इसके अलावा सरकार द्वारा छात्र राजनीति पर प्रतिबंध लगाने का निर्णय भी बड़ा विवाद बन गया है। राजनीतिक दलों से जुड़े छात्र संगठनों को सीमित करने या बंद करने के कदम ने कॉलेज और विश्वविद्यालयों में भारी विरोध को जन्म दिया है। हजारों छात्र सड़कों पर उतरकर इस फैसले का विरोध कर रहे हैं और इसे लोकतांत्रिक अधिकारों पर हमला बता रहे हैं।

    छात्र नेताओं का कहना है कि सरकार को बातचीत और सुधार के जरिए समाधान निकालना चाहिए था न कि सीधे प्रतिबंध लगाकर युवाओं की आवाज को दबाना चाहिए। इसी कारण कई शैक्षणिक संस्थानों में प्रदर्शन और हड़ताल की स्थिति बन गई है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि अगर सरकार ने जल्द ही इन विवादित फैसलों पर पुनर्विचार नहीं किया तो राजनीतिक अस्थिरता और विरोध प्रदर्शन और बढ़ सकते हैं जिससे देश की स्थिति फिर से पिछले आंदोलनों की तरह तनावपूर्ण हो सकती है। फिलहाल नेपाल की राजनीति एक नाजुक मोड़ पर खड़ी है जहां एक तरफ बदलाव की उम्मीद है और दूसरी तरफ बढ़ता जनअसंतोष सरकार के लिए बड़ी चुनौती बनता जा रहा है।